शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

 नाम के साथ पद्मश्री 

लगाना नियम विरूद्ध

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नाम के साथ पद्मश्री लगा लेने से 

किसी को यदि 

रोक नहीं सकते तो 

नियम ही बदल दीजिए

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   --सुरेंद्र किशोर--

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 सरकार जिस नियम को लागू नहीं करा पा रही होती है,बेहतर है कि उसे समाप्त ही कर देना चाहिए।

(क्योंकि जब एक सम्मानित व्यक्ति खुलेआम नियम तोड़ने लगता है तो सामान्य लोगों में भी नियम तोड़ने का दुःसाहस बढ़ता है।) 

 यह नियम है कि भारत रत्न व पद्म सम्मान प्राप्त व्यक्ति उसका इस्तेमाल अपने नाम के साथ टाइटिल के रूप में नहीं कर सकता।

पर, इस देश के अनेक सम्मानित लोग इस नियम की धज्जियां उड़ाते पाए जाते हैं।

  सन 2013 में तेलुगु फिल्मों की हस्तियों मोहनबाबू और ब्रह्मानंदम् का मामला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में गया था।

उन पर आरोप था कि वे पद्मश्री शब्द अपने नामों के साथ जोड़ते हैं।

  23 दिसंबर, 2013 को हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को निदेश दिया कि वह इनके पद्म पुरस्कार को वापस लेने के लिए राष्ट्रपति से सिफारिश करे।

 इन हस्तियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

सम्मानित द्वय की ओर से सुप्रीम कोर्ट से कहा गया कि वे नियम की जानकारी के अभाव में ऐसा कर रहे थे।

अब नहीं करेंगे।

  इस आश्वासन पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को स्थगित कर दिया।

  इस प्रकरण के बाद भी आज देश के अनेक सम्मानित महानुभाव अपने नाम के आगे या पीछे पद्मश्री जोड़ लेते हैं।

कुछ सज्जन तो अपने मकान के नेम प्लेट में भी ऐसा ही लिखवा लेते हैं।

अखबारों में उनके बयान और लेख भी कई बार पद्मश्री सहित उनके नाम के साथ छपते हैं।

 लेटरहेड, निमंत्रण पत्र, पोस्टर, किताब आदि में इसका इस्तेमाल  करते रहते हैं।

  यदि शासन इसे नहीं रोक सकता तो ऐसे नियम को बनाए रखकर सरकार अपना उपहास क्यों कराती रहती है ?

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  आज के ‘प्रभात खबर’,पटना में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से।


मंगलवार, 30 मार्च 2021

    हेमंत शर्मा की नई पुस्तक ‘‘एकदा भारतवर्षे...’’

   भी उनकी पिछली पुस्तकों जैसी ही पठनीय

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     --सुरेंद्र किशोर--

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एक बार सुभाषचंद्र बोस रेल की प्रथम श्रेणी में 

यात्रा कर रहे थे।

 उनके सिवा उस डिब्बे में कोई नहीं था।

अचानक उसमें एक महिला चढ़ी।

जब गाड़ी चलने लगी, तब उस महिला ने अपना मायाजाल 

फैलाया।

  बोली, ‘‘तुम्हारे पास जो कुछ भी हो,

उसे दे दो।नहीं तो अगले स्टेशन पर चिल्लाकर तुम्हें बदनाम कर दूंगी।’’

  सुभाष बाबू चुप थे।

 चुप ही रह गए।

महिला ने कई बार अपनी बात दुहराई।

तब सुभाष बाबू ने संकेत में कहा कि ‘‘मैं गूंगा और बहरा हूं।

आप क्या कह रही हैं,मैं समझ नहीं पा रहा हूं।

  कृपया आप लिख कर दीजिए।’’

महिला ने तुरंत वही बात लिखकर दे दी।

अब एक लिखित दस्तावेज सुभाष बाबू के हाथ में था।

 उन्होंने हंसते हुए कहा कि अब जो आपकी इच्छा हो, करिए।

महिला गंभीर हुई।

उसे लगा कि उसने भयंकर भूल कर दी।

पर, अब वह क्या कर सकती थी ?

गिड़गिड़ाने लगी।

 और, क्षमा मांगने के सिवा उसके पास कोई रास्ता न रहा।

सुभाष बाबू ने उसे क्षमा कर दिया।

सुभाष बाबू के लिए यह एक क्षण का फैसला था।

इस एक क्षण में उन्होंने विवेक की नींव पर पैर रखकर पासा ही पलट दिया।

ऐसे क्षण हम सभी के जीवन में आते हैं।

तय हमें करना है-डर या विवेक ?

जीवन के राजमार्ग में बिना लड़खड़ाए चलते रहने के लिए यह फैसला बेहद जरूरी है।

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ऐसी ही कथाओं का संकलन है ‘‘एकदा भारतवर्षे..।’’

  इसके रचयिता व जनसत्ता में हमारे सहकर्मी हेमंत शर्मा

का नाम ऐसे लेखकों में शमिल हो गया है जिनकी लगभग सारी पुस्तकें पठनीय हैं।

हेमंत जी की अन्य पुस्तकें हैं-भारतेंदु समग्र(संपादन),युद्ध में अयोध्या,अयोध्या का चश्मदीद, कैलास -मानसरोवर की अंतर्यात्रा कराती पुस्तक ‘द्वितीयोनास्ति’ और ‘तमाशा मेरे आगे।’

  ‘एकदा भारतवर्षे....’ (प्रभात प्रकाशन) के बारे में प्रसून जोशी लिखते हैं-

‘‘ये कथाएं संस्कृति के कैप्सूल हैं।

हेमंत जी धरती से उगे हैं।

उनके लिए मिट्टी से जुड़ा सत्य बहुुत अर्थ रखता है।

एकदा भारतवर्षे की कहानियों पर असगर वजाहत की टिप्पणी है ‘‘इन कहानियांें का भावार्थ हमारे वत्र्तमान समय के साथ जुड़ा है।’’

 ध्यान चंद- हिटलर संवाद पढ़कर असगर वजाहत की टिप्पणी आपको माकूल लगेगी। 

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  हिटलर ने हाॅकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को बुलाकर कहा कि ,,

‘‘मैं तुम्हारे हाॅकी के खेल पर मुग्ध हूं।

मैं चाहता हूं कि तुम भारत छोड़कर जर्मनी आ जाओ।

मेजर ध्यानचंद ने हंसते हुए उत्तर दिया,‘‘श्रीमन् यह असंभव है।

जिस देश की मिट्टी से यह तन बना है,जहां का अन्न खाकर बड़ा हुआ हूं।

मेरी सांसों में जहां की वायु का प्रकम्पन है,मैं चाहूंगा ,अंत तक उसी देश की सेवा करूं।’’

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ध्यानचंद के बारे में यह सच्ची कहानी, जो इससे पहले भी कई बार कही जा चुकी है,इस देश की आज की स्थिति में सर्वाधिक मौजूं है ।

आज इसी देश के अनेक लोग इसी देश का अन्न खाकर  विदेशी इशारों पर इसे टुकडे़-टुकड़े करने का नारा लगाते रहते हैं।

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29 मार्च 21    


  


 

  


शुक्रवार, 26 मार्च 2021

 



रामानंद तिवारी के जन्म दिन के अवसर पर 

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पुलिस से पुलिस मंत्री बने थे स्वतंत्रता 

सेनानी रामानंद तिवारी

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--सुरेंद्र किशोर 

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स्वतंत्रता सेनानी व समाजवादी नेता दिवंगत रामानंद तिवारी पुलिस से पुलिस मंत्री तक बने थे।

   निधन से पहले वे लोक सभा (1977)के सदस्य भी चुने  गए थे।

  पर, अंगे्रजी का ज्ञान नहीं रहने के कारण वे केंद्र में मंत्री नहीं बन सके।

  समाजवादी नेता मधु लिमये के बारे में रामानंद तिवारी  यह कहा करते थे कि ‘अंगेजी हटाओ ’ का नारा देने वाली सोशलिस्ट पार्टी के नेता मधु लिमये द्वारा यह कहा जाना कि आप केंद्र में मंत्री इसलिए नहीं बन सकते क्योंकि आप अंग्रेजी नहीं जानते, शर्म की बात है।

   मधु लिमये ने यही कह कर उनके मंत्री बनने का विरोध कर दिया था।

  यानी, यदि उन्हें अंग्रेजी आती तो वे केंद्र में भी मंत्री बने होते।

  बिहार में तो वे दो -दो बार पुलिस मंत्री रहे।

    पर ये तिवारी जी थे कौन ?

 तिवारी जी का जन्म उन्हीं के शब्दों में ‘एक कंगाल द्विज’ के घर हुआ था।

  वे अविभाजित शाहाबाद जिले के मूल निवासी थे।

  उनके होश सम्भालने से पहले ही उन पर से पिता का साया उठ गया।

   उनकी मां ने किसी तरह उन्हें बड़ा किया।

   पहले तो तिवारी जी रोजी-रोटी की तलाश में कलकत्ता गये।

   पर उन्हें वहां काफी कष्ट उठाना पड़ा तो  वे लौट आये ।

   उन्हें हाॅकर, पानी पांड़े और ‘कूक’ के भी काम करने पड़े।

   वे पुलिस में भर्ती हो गये।

  सन् 1942 में महात्मा गांधी के आह्वान पर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गये।

  उन्होंने अपने कुछ साथी सिपाहियों को संगठित किया और आजादी के सिपाहियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। 

  तिवारी जी गिरफ्तार कर लिये गये।

 हजारीबाग जेल भेज दिये गये।

   जेल में उनकी जयप्रकाश नारायण से भेंट हुई।

  जेपी से प्रभावित होने की घटना के बारे में तिवारी जी ने एक बार इन पंक्तियों के लेखक को बताया था। उन्होंने कहा कि दूसरे बड़े नेता जेल में अलग खाना बनवाते थे ।

   पर, जेपी जेल में अपने साथियों के साथ ही खाते और रहते थे।

  इसी बात ने तिवारी जी को जेपी की ओर मुखातिब किया ।

   वे भी समाजवादी बन गये।

  आजादी के बाद सन् 1952 के चुनाव में ही तिवारी जी शाह पुर से समाजवादी विधायक बन गये।

  वे लगातार  सन 1972 के प्रारंभ तक विधायक रहे।

  सन् 1972 में वे हार गये। सन् 1977 में वे बक्सर से 

जनता पाटी के सांसद बने । 

  इस बीच वे सन् 1967 में महामाया प्रसाद सिंहा सरकार और सन् 1970 में कर्पूरी ठाकुर सरकार में वे पुलिस मंत्री थे।

  पुलिस मंत्री के रूप में उन्होंने बिहार पुलिसमेंस असोसियेशन को मान्यता दिलवाई।

   ऐसी मान्यता देने वाला बिहार पहला राज्य बना।

  तिवारी ने पुलिसकर्मियों की दयनीय सेवा शत्र्तों की ओर पहली बार लोगों का ध्यान खींचा।

  उनके प्रयासों से आम  सिपाहियों की स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ।

  पर अब भी सिपाहियों की हालत ठीक नहीं है।

  उनके काम के घंटे अधिक हैं।

 उनके लिए रहने की उचित व्यवस्था नहीं है ।

 और, डयूटी के समय उन्हें समुचित भोजन तक नहीं दिया जाता।

  कोई सरकार यदि सिपाहियों की सेवा शत्र्तें मानवीय बना दे तो वह तिवारी जी को श्रद्धांजलि होगी।

    वे आज के अधिकतर नेताओं से अलग थे।

  उनमें पद और पैसा के प्रति लोभ नहीं था।

  जिस तरह सन 1996 में ज्योति बसु को उनकी पार्टी ने प्रधान मंत्री नहीं बनने दिया,उसी तरह सन 1970 में रामानंद तिवारी को उनकी पार्टी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने मुख्य मंत्री नहीं बनने दिया।

  यानी यूं कहें कि पार्टी के कुछ नेताओं ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि खुद तिवारी जी ने मुख्य मंत्री बनने से इनकार कर दिया।

   उनसे कहा गया कि वे ऐसी सरकार के मुख्य मंत्री कैसे बनेंगे जिस सरकार में जनसंघ शामिल रहेगा ? बिहार विधान सभा के सदस्यों  का बहुमत तिवारी जी को मुख्य मंत्री बनाने के लिए तैयार था।

  तिवारी जी को राज भवन जाकर सिर्फ मुख्य मंत्री पद की शपथ लेनी थी।

   यानी, बारात सज गई थी,पर दूल्हा भाग चला।

  कारण सैद्धांतिक था।

    क्या सैद्धांतिक कारण से कोई मुख्य मंत्री पद छोड़ता है ?

  तिवारी जी के मुख्य मंत्री नहीं बनने के कारण दारोगा प्रसाद राय मुख्य मंत्री बन गये।

  

  पर जनसंघ को लेकर वह  बहाना भी बोगस था।

   संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने सन् 1967 में उसी जनसंघ के साथ बिहार में भी सरकार बनाई थी।

  फिर जब दारोगा प्रसाद राय की सरकार गिर गई तो उसी जनसंघ के ही साथ मिलकर संसोपा के ही कर्पूरी ठाकुर ने सरकार बना ली।

   यानी जनसंघ का बहाना सिर्फ तिवारी जी को मुख्य मंत्री पद तक पहुंचने से रोकने के लिए था।

  हालांकि तिवारी जी भी जब कर्पूरी ठाकुर मंत्रिमंडल में शामिल हो गये तो अनेक लोगो ंको आश्चर्य हुआ।

   इसको लेकर तिवारी जी की आलोचना हुई।

  पर इस बात को लेकर उनकी तारीफ जरूर हुई कि भले ही कारण जो भी रहा हो ,पर रामानंद तिवारी ने पास आए मुख्य मंत्री पद को ठुकरा दिया।

  आज जब ऐसे नेता नहीं पाये जाते तो यह सब देख कर तिवारी जी की याद आती है।

   रामानंद तिवारी के बारे में बिहार के पूर्व डी.जी.पी.,आर.आर.प्रसाद ने लिखा है,

  ‘फौज की नौकरी के बाद जब मैं बिहार काॅडर में आया तो मेरी उनसे फिर मुलाकात पटना में हुई।

  तब वे पुलिस मंत्री थे।

  मुझे याद है,उन्होंने कहा था,‘जो आदमी बेजुबान घरेलू पशु नहीं रखता है,वह पुलिस विभाग में अच्छा अफसर नहीं हो सकता है।

  क्योंकि यहां आरक्षी बेजुबान होता है।’

उन्होंने यह भी बताया था कि ब्रिटिश शासन के दौरान जिस पुलिस अफसर ने उन्हें सेवामुक्त किया था, उसे आज भी देख कर वे खड़े हो जाते हैं और उनकी इज्जत करते हैं।’

    ‘तिवारी जी ने कहा था कि  सामान्यतः पदाधिकारी आरक्षियों से ऐसा काम करवाते हैं जिनसे उनकी मान मर्यादा को ठेस पहुंचती है।

तिवारी जी यह भी कहते थे कि जो खतरा फौज में है,उससे अधिक खतरा पुलिस में है।

  क्योंकि फौज में तो पता होता है कि दुश्मन किधर है,पर पुलिस को नहीं मालूम कि किस गली में दुश्मन है।पुलिस को तो रोज ही जंग लड़नी पड़ती है।’

      तिवारी जी से संबंधित एक प्रकरण मुझे भी याद  है।

  सत्तर के दशक की बात है।

 पटना के आर.ब्लाॅक स्थित उनके आवास के बरामदे में समाजवादी  विधायक वीर सिंह बैठे थे।

  मैं भी वहां था।

  वीर सिंह एक खास आग्रह लेकर तिवारी जी के पास आये थे।

 वे चाहते थे कि रोगी महतो हत्याकांड के मुकदमे को तिवारी जी समाप्त करा दें।

  दरअसल साठ के दशक में चम्पारण के चनपटिया के एक बड़े व्यापारी के फार्म हाउस की जमीन पर तिवारी जी के नेतृृृृृृृत्व  में भूमि आंदोलन हुआ था।

  वह आंदोलन सच्चा था।

 समाजवादियों की मांग थी कि भूमिपतियों की जमीन गरीबों में बंटे।

  तिवारी जी उस जमीन पर जबरन हल चला रहे थे। उनके साथ कुछ अन्य कार्यकत्र्ता और गरीब लोग थे।

  भूमिपति के लठैतों ने हमला करके तिवारी जी को भी बुरी तरह घायल कर दिया।

  उस हमले में रोगी महतो नामक एक कार्यकत्र्ता की मौत हो गई।

  तिवारी को तब कई महीने तक अस्पताल में रहना पड़ा था।उसी केस को रफादफा करने के लिए वीर सिंह तिवारी जी के पास आये थे।

  अभियुक्त व्यापारी बहुत ही अधिक पैसे वाला था।वीर सिंह की बात सुन कर तिवारी जी सबके सामने रोने लगे।

   उन्होंने वीर सिंह से साफ -साफ कह दिया,

  ‘तुमको उस व्यापारी से मिल जाना है तो मिल जाओ।

पर मैं मरते दम तक शहीद रोगी महतो की लाश पर समझौता नहीं कर सकता।’

 तिवारी जी उस समय विधायक नहीं थे।उनके दल के विधायक राम बहादुर सिंह के नाम पर आवंटित सरकारी मकान में वे रहते थे।

 तिवारी जी गाय पालते थे।उसके दूध में से कुछ दूध वे बगल के मकान में रह रहे विधान पार्षद कुमार झा को बेचते थे। तिवारी जी के घर के खर्चे को उठाने में उस दूध से मिले पैसे का भी योगदान था।

  वैसी स्थिति में आज का कोई नेता क्या वही बात कहता जो बात तिवारी जी ने वीर सिंह से कही ?

  अनुमान लगा लीजिए कि वह मशहूर व्यापारी हत्या के एक मुकदमे से बचने के लिए कितनी बड़ी राशि खर्च कर सकता था।

 आजादी के बाद के वर्षों में मशहूर समाजवादी नेता  कर्पूरी ठाकुर और रामानंद तिवारी के बीच संबंध ठीकठाक ही था।

 पर बाद के वर्षों में बिगड़ गया।बिहार के इन दो दिग्गज समाजवादी नेताओं के बीच के पत्र व्यवहार को पढ़ना अपने आप में एक अनुभव है।

  तिवारी जी का  वह पत्र 14 जनवरी 1973 के दिनमान में छपा था।

 उसमें रामानंद तिवारी ने कर्पूरी ठाकुर को लिखा कि ‘मैं कभी सामंत नहीं रहा।परंतु एक कंगाल द्विज के घर मंे जन्म अवश्य लिया है जिसमें न मेरा कसूर है और न किसी और का।

  क्योंकि इस देश में जब तक वर्ण व्यवस्था रहेगी, तब तक हर कोई किसी न किसी जाति में पैदा होता रहेगा।

  परंतु मुझ कंगाल द्विज पर यह यह आक्रोश और द्वेष क्यों ?

   मैं जब से समाजवादी आंदोलन में आया,तब से मैंने यज्ञोपवीत निकाल दिया,चोटी काट दी।

  अपने छोटे बेटे का यज्ञोपवीत नहीं किया।

  परंपरा थी कि ब्राह्मण हल नहीं चलाता।

  मगर मैंने उस परंपरा को तोड़ कर हजारों लोगेां के सामने हल चलाकर अपने को शूद्र की श्रेणी में लाने का प्रयास किया।

  सारी द्विजवादी परंपराओं को छोड़ने के बाद भी यदि मेरे ऊपर द्विजवाद का आरोप लगाया जाये तो मैं क्या कर सकता हूं ?

  रामानंद तिवारी के उस पत्र से उनके व्यक्तित्व की एक महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आती है।

  इस पत्र से उस कशमकश का भी पता चलता है जो लोहियावादी समाजवादी आंदोलन में सवर्ण नेताओं और कार्यकत्र्ताओं के मन में था।

 यहां कर्पूरी ठाकुर और रामानंद तिवारी के बीच के विवाद पर कोई टिप्पणी नहीं की जा रही है।

  उस विवाद पर अलग से चर्चा हो सकती है।

 पर उस कशमकश की चर्चा प्रासंगिक है जो तिवारी जी जैसे जन्मना द्विज समाजवादियों के मन में था।

  इससे  उपजी पीड़ा की भी कल्पना की जा सकती है।

  इस तरह पीड़ित समाजवादी कार्यकत्र्ताओं को तो कांग्रेस में कोई सम्मानपूर्ण स्थान  भले नहीं मिलता,पर रामानंद तिवारी चाहते तो उन्हें कोई बड़ी जगह आसानी से मिल सकती थी।

  पर वे अपने विचारों की खातिर अपने जीवन की अंतिम बेला तक लड़ते-झगड़ते समाजवादियों के साथ ही रहे।

  वैसी परिस्थिति में आज का कोई पदलोभी नेता होता तो क्या करता,इस सवाल का जवाब  कठिन नहीं है। 

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    जार्ज फर्नांडिस के नाम पर कोई 

   ढंग का स्मारक क्यों नहीं ?

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      --सुरेंद्र किशोर--

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 भाजपा के राज्य सभा सदस्य व पूर्व केंद्रीय मंत्री

सुरेश प्रभु ने जार्ज फर्नांडिस के नाम पर किसी हवाई अड्डे का नामकरण करने की केंद्र सरकार से मंाग की है।

   पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री श्री प्रभु ने इस संबंध में मौजूदा नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी को चिट्ठी लिखी है।

  पता नहीं, इस पर केंद्र सरकार क्या फैसला करेगी !

पर, मेरा मानना है कि जार्ज जैसे नेता की स्मृति को बनाए रखना राजनीति की नई पीढ़ी के लिए और भी जरूरी है।

 हर व्यक्ति में कुछ कमियां हैं तो कुछ खूबियां भी ।

जिनमें अधिक खूबियां होती हैं,उन्हें हम अधिक याद करते हैं।

जार्ज के साथ मैंने वर्षों तक काम किया है।

मैं उनकी खूबियों को भी जानता हूं और कमियांे को भी।

उनमें कमियां नगण्य थीं।

इमर्जेंसी में जार्ज ने जिस तरह अपनी जान हथेली पर लेकर एक तानाशाह व निरंकुश शासक का मुकाबला किया,वह अतुलनीय है।

 जार्ज में जातीय-सांप्रदायिक-क्षेत्रीय भावना नहीं थी। 

जार्ज ने न तो अपने लिए कहीं कोई घर बनाया और न कोई संपत्ति एकत्र की।

जो भी आरोप उन पर लगा,उसमें वे सुप्रीम कोर्ट से निर्दोष 

करार दे दिए गए थे। 

  उन्होंने एक-दो राजनीतिक गलतियां जरूर कीं,पर वैसी गलतियां तो अधिकतर नेता करते रहे हैं।

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जार्ज फर्नांडिस की प्रामाणिक जीवनी हाल में आई है।

पर वह मराठी में है।

लेखक हैं मशहूर मराठी पत्रकार नीलू दामले।

 हिन्दी संस्करण भी आने की उम्मीद है।

जार्ज को अधिकतर लोग टुकड़ों में जानते हैं।

जीवनी हिन्दी में आ गई तो उससे हिन्दी भारत को भी जार्ज के संपूर्ण व्यक्तित्व -कृतित्व से परिचय हो जाएगा।

मजदूर आंदोलन में जार्ज की भूमिका बेहद सराहनीय रही ।

ऐस नेता का कोई ढंग का स्मारक न हो जिसने देश को दिया बहुत अधिक व लिया बहुत कम,तो इस पीढ़ी के नेताओं के लिए भी यह कोई अच्छी बात नहीं।

जबकि दूसरी ओर देश को सपरिवार लूटने वाले अनेक नेताओं के स्मारक जहां -तहां दिखाई पड़ते हैं।

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 21 मार्च 21


मंगलवार, 23 मार्च 2021

 डा.राममनोहर लोहिया के जन्म दिन (23 मार्च) पर

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   लोहिया के सपने और 

   आज की हकीकत

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  --सुरेंद्र किशोर--

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स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी चिंतक डा.राममनोहर लोहिया की कल्पना में आजाद भारत का स्वरूप कैसा था ?

1.- बंबई के मजदूर 12 हजार रुपए चंदा करके लोहिया के इलाज के लिए समय पर दिल्ली नहीं भेज सके।

यह 1967 की बात है।

तब लोहिया लोक सभा के सदस्य थे।

डा.लोहिया जर्मनी में अपने प्रोस्टेट का आॅपरेशन करवाना चाहते थे।

पैसे के अभाव में डा.लोहिया को नई दिल्ली के ही वेलिंगटन अस्पताल में ही आॅपरेशन कराना पड़ा।

सही इलाज नहीं होने के कारण लोहिया की मौत हो गई।

तब बिहार सहित कई राज्यों में लोहिया की पार्टी के नेता सरकार में शामिल थे।

किंतु लोहिया नहीं चाहते थे कि उन राज्यों से चंदा आए।

क्योंकि उससे हमारी सरकार की बदनामी हो सकती है।

सांसद रहने के बावजूद लोहिया के पास निजी कार नहीं थी।

कार न खरीदने व मेंटेन करने के संबंध में लोहिया का तर्क यह था कि ‘‘सांसद के रूप में उतनी आय मेरी नहीं है।’’ 

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लोहिया की चाह और आज की स्थिति--

स्वतंत्र भारत में महाराष्ट्र सरकार का एक मंत्री चाहता है कि उसके व उसके नेता के लिए वहां की पुलिस हर महीने 100 करोड़ रुपए की उगाही करे।

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2.-डा.लोहिया ने अपना कोई परिवार नहीं बसाया।

न ही घर बनाया।

वे चाहते थे कि राजनीतिक जीवन में जो आना चाहते हैं उन्हें अपना परिवार नहीं खड़ा करना चाहिए।

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आज की स्थिति 

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कल तेलांगना से एक शर्मनाक खबर आई।

उसे पढ़कर एक क्षण लगा कि हम आज भी राजतंत्र में ही जी रहे हैं।

खबर है कि वहां के मुख्य मंत्री चाहते हैं कि वे अपने पुत्र को 

उसके अगले जन्म दिन के अवसर पर अपना मुख्य मंत्री पद उपहार के रूप में दे दें।

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3.-डा.लोहिया राजनीति में वंशवाद के सख्त खिलाफ थे।

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आज की स्थिति

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भाजपा,जदयू और कम्युनिस्टों दलों जैसे थोड़ से दलों को छोड़कर लगभग सभी राजनीतिक दल बेशर्म ढंग से वंशवादी -परिवारवादी हो चुके हंै।

  यानी, परिवार के बिना उन दलों की कल्पना ही नहीं हो सकती।

अपवादों को छोड़कर जो दल वंशवादी -परिवारवादी हैं,उन पर भ्रष्टाचार के भी गंभीर आरोप हैं।

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4.-डा.लोहिया ने ‘जाति तोड़ो’ का नारा दिया था।

पिछड़ी जातियों के साथ-साथ वे अगली जातियों की महिलाओं को भी पिछड़ा ही मानते थे।

उनके लिए भी वे विशेष अवसर की जरूरत बताते थे।

डा.लोहिया के लगभग सारे निजी सचिव ब्राह्मण ही थे।

यानी, ऊंची जाति में उनके प्रति द्वेष नहीं था,सिर्फ नेहरू भक्तों को छोड़कर।

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आज क्या हो रहा है ?

देश भर में वोट के मुख्य आधार जातीय व सांप्रदायिक हैं।

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5-लोहिया सांप्रदायिक मामलों में संतुलित विचार रखते थे।

दोनों समुदायों के बीच के अतिवादियों के वे खिलाफ थे।

डा.लोहिया समान नागरिक कानून के पक्षधर थे।

 तब अटल बिहारी वाजपेयी कहा करते थे कि मुझे लोहियावादी मुसलमानों से मिलकर-बातकर करके बहुत खुशी होती है।

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पर आज क्या हो रहा है ?

आज लोहिया के नाम पर राजनीति करने वाले अधिकतर दल व लगभग सारे तथाकथित सेक्युलर दल व बुद्धिजीवीगण संघ परिवार की तो बात-बात में आलोचना करते हैं, किंतु दूसरी ओर वे उन अतिवादी मुस्लिम संगठनों को भी भरपूर बढ़ावा-समर्थन देते हैं,उनसे राजनीतिक तालमेल करते हैं जो सरेआम यह घोषणा करते हैं कि हम इस देश में हथियारों के बल पर इस्लामिक शासन कायम करना चाहते हैं।

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आदि आदि .............

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--23 मार्च 21


सोमवार, 22 मार्च 2021

 जैसा बोओगे,वैसा ही तो काटोगे !!!

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--सुरेंद्र किशोर--

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2 अप्रैल 1975

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कलकत्ता में जयप्रकाश नारायण पर चप्पल और पत्थरों की वर्षा होती रही।

कुछ हुड़दंगी जेपी की कार के ऊपर चढ़कर

उछल कूद मचाते रहे।

फिर भी बंगाल पुलिस मूक दर्शक बनी रही।

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16 अगस्त, 1990

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वाम मोर्चे के गुंडों ने ममता बनर्जी को इतना मारा कि उनके सिर में 16 टांके लगाने पड़े थे।

उस घटनास्थल पर भी बंगाल पुलिस मूक दर्शक बनी रही।

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2018-पंचायत चुनाव

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पश्चिम बंगाल में ग्राम पंचायतों के कुल 58,692 पदों में से 20,159 पदों के चुनाव के लिए किसी भी प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार को नामांकन पत्र भरने नहीं दिया गया।

तब बंगाल पुलिस ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ‘वंंिचत’ हो रहे उन उम्मीदवारों की कोई मदद नहीं की।

मूक दर्शक बनी रही।

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10 दिसंबर 2020

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भाजपा अध्यक्ष जे.पी नड्डा पर बंगाल में तृणमूल के बाहुबली हमलावर  करते रहे और बंगाल पुलिस मूक दर्शक बनी रही।

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बंगाल पुलिस के ऐसे ही ‘रिकार्ड’ को देखते हुए चुनाव आयोग ने निदेश दिया है कि मौजूदा विधान सभा चुनाव के दौरान बंगाल पुलिस कर्मी मतदान केंद्रों के सौ मीटर के दायरे में प्रवेश नहीं करेंगे।

इस निदेश पर तृणमूल कांग्रेस परेशान है।

परेशान होने से क्या होगा ?

विधान सभा चुनाव, पंचायत चुनाव तो है नहीं।

‘‘जैसा बोओगे, वैसा ही तो काटोगे !!!’’

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21 मार्च, 21


रविवार, 21 मार्च 2021

 



जैविक खेती के विस्तार के बिना न मिट्टी बचेगी,न मानवता !

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--सुरेंद्र किशोर--

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एक बड़ी खुश खबरी है।

सरकारी मदद से इस देश में जैविक खेती का विस्तार हो रहा है।जैविक उत्पाद की मांग भी बढ़ रही है।

 मांग इसी तरह बढ़ती गई तो जैविक उत्पादों की कीमतेें भी धीरे -धीरे घटेंगी।

यदि रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल 

धीरे- धीरे समाप्त नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब यहां की मिट्टी खेती लायक नहीं रह जाएगी।

दूसरी ओर, जानकार लोग बताते हैं कि कैंसर मरीजों की संख्या इतनी बढ़ जाएगी कि अस्पतालों के लिए उन मरीजों को संभालना असंभव हो जाएगा।  

पंजाब में उसके लक्षण अधिक दिखाई पड़ रहे हैं।

 जैविक खेती के मामले में देश के कुछ राज्य अच्छा कर रहे हैं।बिहार को इस दिशा में अभी बहुत कुछ करना है।

जैविक खेती को तेज गति से और अधिक बढ़ाने में बिहार सरकार की भूमिका अपेक्षित है।

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   पंजाब से सबक लेने की जरूरत

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 अधिक उपज के लोभ में पंजाब के किसान आम तौर पर अपने खेतों में प्रति हेक्टेयर 923 ग्राम रासायनिक कीटनाशक दवाएं डालते हैं।

जबकि राष्ट्रीय औसत 570 ग्राम है।

वहां काफी अधिक रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं के इस्तेमाल के कारण भूजल दूषित होता जा रहा है।पानी में आर्सेनिक बढ़ रहा है।

खेती के लिए भूजल का अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहा है।

इस कारण भूजल के साथ जमीन के भीतर से लवण भी ऊपर आकर खेती योग्य मिट्टी को अनुर्वर बना रहा है।

जल में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ने से पंजाब में कैंसर मरीजों की संख्या बढ़ रही है।

पंजाब के आंदोलनरत किसानों यानी आढ़तियों-मंडियों के बिचैलियों के लिए ये कोई समस्या नहीं हैं।उन्हें सिर्फ येन केन प्रकारेण अधिक उपज चाहिए ताकि अधिक मुनाफा हो सके।

 बिहार के गंगा तटीय इलाकों में भी इसी कारणवश जल जहरीला हो रहा है। 

  पंजाब की समस्या को देखते हुए कम से कम हम तो आने वाली विपत्ति से बचाव कर ही सकते हैं।

बिहार में अभी बेहतर स्थिति है।क्योंकि रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं के इस्तेमाल के मामले में हम पंजाब से बहुत पीछे हैं।

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   विधायिकाओं में मार्शल की उपयोगिता !

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संसद सहित इस देश की विधायिकाओं में कुछ दशक पहले तक यदाकदा मार्शल का उपयोग हुआ करता था।

हालांकि विधायिकाओं में आज की अपेक्षा तब अधिक शालीन व शिक्षित लोग चुनकर जाते थे।

तब हंगामा करने वाले कम ही सदस्य होते थे।

  किंतु आश्चर्य है कि जब संसद और अनेक विधान मंडलों में शोरगुल,हंगामा और अशालीनता बढ़ने लगी तौभी अब शायद ही कहीं मार्शल का उपयोग होता है !

आखिर मार्शल की बहाली व उनकी मौजूदगी का उद्देश्य और औचित्य क्या है !!

यह तो वैसा हुआ कि लोकतंत्र के संतरियों की मौजूदगी में ही रोज-रोज लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की रोज-रोज हत्या होती रहे।

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भूली बिसरी याद

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 सन 1997 में लोक सभा के भीतर ही बिहार के दो बाहुबली सांसदों ने आपस में हाथापाई कर ली थी।

ऐसी अभूतपूर्व व शर्मनाक घटना को सभी दलों के शीर्ष नेतृत्व ने गंभीरता से लिया।

संसद के दोनों सदनों ने करीब एक हफ्ते तक इस पर गंभीर चर्चा की।

अंत में सर्वसम्मत प्रस्ताव पास करके यह संकल्प किया गया कि हम इन बुराइयों से लड़ने के लिए काम करेंगे।

  पर,इस संकल्प को बाद में भुला दिया गया।

आज तो संसद और अधिकतर विधान सभाओं को आए दिन ‘हंगामा सभा’ में परिणत कर दिया जाता है।

बिहार भी उसका अपवाद नहीं है।

हंगामों के कारण नई पीढ़ी के दिल -ओ -दिमाग पर हमारे लोकतंत्र और उन नेताओं की कैसी छवि बनती है जो हंगामा -शेरगुल व अशिष्ट व्यवहार के लिए जाने जाते हैं ?

हालांकि अब भी कई जन प्रतिनिधि मौजूद हैं जो कभी सदन के ‘‘वेल’’ में नहीं जाते।

आज इस देश की विधायिकाओं में जो कुछ हो रहा है,उसे देखते हुए हंगामा शब्द बहुत हल्का पड़ता है।

पता नहीं कौन ‘‘स्टेट्समैन’’ इस स्थिति को कब 

बदल पाएगा ?नेता तो बदलने से रहे। 

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और अंत में

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सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत पहले फेज में 703 सांसदों ने (जिनमें लोक सभा व राज्य सभा के सदस्य शामिल थे) गांव विकास के लिए गोद लिए थे।

 अगले फेज यानी 2016-18 में

 गोद लिए गए गांवों की संख्या घटकर 547 हो गई।

तीसरे फेज में यह संख्या और भी घट गई।

सवाल है कि यह संख्या घट क्यों रही है ?

दरअसल इस योजना के लिए अलग से फंड का प्रावधान नहीं किया गया है।

 केंद्र सरकार जनता के कल्याण व विकास के लिए देश में करीब सवा सौ योजनाएं चलाती हैं।

जाहिर है कि इनमें से अनेक योजनाएं गांवों से संबंधित हैं।

 नरेंद्र मोदी सरकार ने कल्पना की थी कि उन्हीं योजनाओं के तहत गांवों का विकास किया जाए।

उस विकास की देखरेख खुद सांसद करें।

  पर, अपवादों को छोड़कर सांसद आदर्श ग्राम योजना लगभग विफल रही।

क्योंकि उन 125 योजनाओं में से अधिकतर योजनाओं के क्रियान्वयन का हाल भी असंतोषजनक रहा है।

 तो फिर चाहे आप आदर्श शब्द जोड़ दें किंतु नतीजा तो लगभग निराशाजनक ही रहेगा ।

केंद्र सरकार को चाहिए कि वह अपनी 125 योजनाओं के क्रियान्वयन की सफलता की जांच निष्पक्ष एजेंसी से पहले कराए।

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 कानोंकान-प्रभात खबर

19 मार्च 21