सोमवार, 31 जनवरी 2022

      कन्नड़ लेखक अनंतमूतर््िा तो पलट

      गए थे,क्या मुनव्वर 

     राणा भी पलटी मारेंगे  ?

  ’  ...........................................

       सुरेंद्र किशोर

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कन्नड़ लेखक डा.यू.आर.अनंतमूर्ति ने 19 सितंबर, 2013 को कहा था कि ‘यदि नरेंद्र मोदी प्रधान मंत्री बन जाएंगे तो मैं देश छोड़ दूंगा।’

  पर, अप्रैल 2014 आते -आते अनंतमूर्ति को जब यह लग गया कि मोदी सत्ता में आ ही जाएंगे तो उन्होंने अपने बयान में संशोधन कर लिया।

 उन्होंने कहा कि मैंने भावना में आकर वह बयान दे दिया था।

मैं देश नहीं छोड़ंूगा।

  हालांकि उन्होंने 2014 के मध्य में दुनिया ही छोड़ दिया।

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अनंत मूर्ति तो राजनीतिक विचारधारा की भावना के तहत मोदी के खिलाफ थे।

किंतु तालिबान के समर्थक मुनव्वर राणा तो धार्मिक भावना से ओतप्रोत लगते हैं।

वे योगी आदित्यनाथ के सख्त खिलाफ हैं।

मुनव्वर राणा ने कल दूसरी बार कहा कि यदि योगी फिर सत्ता में आ गए तो मैं यू.पी छोड़ दूंगा।

  अफगानिस्तान के तालिबानियों के सत्ता में आने पर खुशी मनाने वाले मुनव्वर राणा लगता है कि धार्मिक भावना से प्रेरित हैं।

  शायद वे अनंतमूर्ति की तरह अपना प्रण भंग नहीं करेंगे।

चुनाव रिजल्ट के बाद मुनव्वर साहब की खोज -खबर जरूर लीजिएगा।

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  30 जनवरी 22


 भारतीय संविधान का ‘‘पहला संशोधन’’ अघोषित था,

उसे आप संशोधन नंबर -जीरो कह सकते हैं।

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    सुरेंद्र किशोर

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भारतीय संविधान का पहला संशोधन अघोषित था।

वह संशोधन शब्दों का नहीं, बल्कि चित्राकंनों का था।  

   मशहूर चित्रकार नंदलाल बसु बिहार के ही थे।

उन्होंने ही संविधान की प्रथम काॅपी पर चित्रांकन किए थे।

अंग्रेजी -हिन्दी संस्करणों की प्रथम काॅपी मेरे सामने है।

  हाल का संस्करण भी मेरे पास है।

संविधान के मूल संस्करण में राम, कृष्ण, बुद्ध, गांधी,सुभाष चंद्र बोस आदि के चित्रांकन दर्ज हैं।

  ये चित्र हजार-हजार शब्दों के प्रतिनिधि चित्र थे।

वे चित्र एक तरह से भारत की आत्मा का भी प्रतिनिधित्व करते थे।

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वे चित्र संविधान निर्माताओं को प्रिय थे।

पर, बाद के शासकों को वह सब मंजूर नहीं था।

अतः बाद के संस्करणों से उन चित्रों को विलोपित कर दिया गया।

उसे विलोपित करने का निर्णय किसका था ?

जाहिर है कि प्रथम प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू का था।

दरअसल वे चित्र नेहरू के ‘‘आइडिया आॅफ इंडिया’’ से मेल नहीं खाते थे।

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26 जनवरी 22


रविवार, 30 जनवरी 2022

      कन्नड़ लेखक अनंतमूतर््िा तो पलट

      गए थे,क्या मुनव्वर 

     राणा भी पलटी मारेंगे  ?

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       सुरेंद्र किशोर

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कन्नड़ लेखक डा.यू.आर.अनंतमूर्ति ने 19 सितंबर, 2013 को कहा था कि ‘यदि नरेंद्र मोदी प्रधान मंत्री बन जाएंगे तो मैं देश छोड़ दूंगा।’

  पर, अप्रैल 2014 आते -आते अनंतमूर्ति को जब यह लग गया कि मोदी सत्ता में आ ही जाएंगे तो उन्होंने अपने बयान में संशोधन कर लिया।

 उन्होंने कहा कि मैंने भावना में आकर वह बयान दे दिया था।

मैं देश नहीं छोड़ंूगा।

  हालांकि उन्होंने 2014 के मध्य में दुनिया ही छोड़ दिया।

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अनंत मूर्ति तो राजनीतिक विचारधारा की भावना के तहत मोदी के खिलाफ थे।

किंतु तालिबान के समर्थक मुनव्वर राणा तो धार्मिक भावना से ओतप्रोत लगते हैं।

वे योगी आदित्यनाथ के सख्त खिलाफ हैं।

मुनव्वर राणा ने कल दूसरी बार कहा कि यदि योगी फिर सत्ता में आ गए तो मैं यू.पी छोड़ दूंगा।

  अफगानिस्तान के तालिबानियों के सत्ता में आने पर खुशी मनाने वाले मुनव्वर राणा लगता है कि धार्मिक भावना से प्रेरित हैं।

  शायद वे अनंतमूर्ति की तरह अपना प्रण भंग नहीं करेंगे।

चुनाव रिजल्ट के बाद मुनव्वर साहब की खोज -खबर जरूर लीजिएगा।

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  30 जनवरी 22


शनिवार, 29 जनवरी 2022

 आज कौन याद करता है 

डा.गोरखनाथ सिंह को !

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सुरेंद्र किशोर

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गोरख कहां है ?

यही सवाल प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू से किया था ब्रिटिश अर्थशास्त्री हिक्स ने।

  प्रधान मंत्री को गोरख यानी डा.गोरखनाथ सिंह के बारे में कुछ पता नहीं था।

 नेहरू जी को यह भी कैसे  पता होता  कि कैब्रिज के सेकेंड टाॅपर का यह सवाल अपने बैच के टाॅपर के बारे में था।

खैर, डा.गोरखनाथ सिंह के बारे में छात्र जीवन में ही अपने गांव और छपरा में मैंने सुन रखा था।

 वे बिहार के सारण जिले के मढ़ौरा के पास के एक गांव के मूल निवासी थे।

  जब मैं छात्र था तो एक दूसरे संदर्भ में गोरख बाबू का नाम सुनता रहता था।

जब किसी छात्र को यह कहा जाता था कि खैनी यानी तम्बाकू मत खाओ।

इससे दांत जल्दी टूट जाएंगे तो जानते हैं वह क्या जवाब देता था ?

वह कहता था कि यह बुद्धिवर्धिनी चूर्ण है।

इसे गोरख बाबू भी खाते थे।

  यह बात सही है कि गोरख बाबू तम्बाकू चूर्ण यानी खैनी खाते थे।

किंतु वे साथ- साथ एक विलक्षण प्रतिभा वाले अर्थशास्त्री भी थे।

  उन्हें जानने वाले बताते हैं कि उनकी छपने वाली एक किताब की पांडुलिपि को ही उनकी अशिक्षित पत्नी ने चूल्हे में झोंक दिया था।

उसमें नई थ्योरी लिखी गई थी।

  खैर,गोरख बाबू पटना काॅलेज के प्रिंसिपल थे।

मौजूदा ए.एन.सिन्हा समाज अध्ययन संस्थान के निदेशक थे और बिहार सरकार के डी.पी.आई.भी रहे थे।

 उनका साठ के दशक में निधन हो गया।

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पुनश्चः,गोरख बाबू के बारे में मुझे तो इतना ही मालूम है।

किन्हीं व्यक्ति कुछ और पता हो तो जरूर लिखें।

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फेसबुक वाॅल से

29 जनवरी 22

   


 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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गवर्नरों को यूनिवर्सिटीज के चांसलर बनाने की परंपरा पर पुनर्विचार जरूरी

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राज्यों के विश्व विद्यालयों का चांसलर कभी बहुत सोच-समझ कर संबंधित राज्यों के राज्यपालों को बनाया गया।

विश्व विद्यालय शिक्षा की स्वायतत्ता व गुणवत्ता बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया था।

कुछ दशकों तक तो सब कुछ ठीक ठाक चला।किंतु समय के साथ कई कारणों से स्थिति बिगड़ने लगी।

अब तो स्थिति बहुत खराब होती जा रही है।

केरल और पश्चिम बंगाल में स्थिति तो बहुत खराब हो चुकी है।

केरल के राज्यपाल ने वहां के मुख्य मंत्री से गत माह कहा कि काननू बदल कर आप खुद विश्व विद्यालयों के चांसलर भी बन जाइए।

  दूसरी ओर पश्चिम बंगाल से इससे भी खराब खबर आई है।

वहां के शिक्षा मंत्री ने हाल में कहा कि राज्य सरकार इस प्रस्ताव पर विचार कर रही है कि कानून बदल कर मुख्य मंत्री को ही विश्व विद्यालयों का चांसलर भी बना दिया जाए।

  बिहार की ताजा खबर भी कोई खुश करने वाली नहीं है।

  पटना राज भवन ने मुख्य सचिव को लिखा है कि चांसलर की अनुमति के बिना विश्व विद्यालय में विशेष निगरानी इकाई को सक्रिय क्यों किया गया ?

विशेष निगरानी इकाई भ्रष्टाचार निरोधक दस्ता है।

 कुछ अन्य राज्यों से भी यदाकदा ऐसी चिंताजनक खबरें आती 

रहती हैं।

इसके क्या कारण हैं ?

एक कारण तो यह है कि राज्य और केंद्र में अलग अलग दलों की सरकारें हैं।ऐसे में खूब ‘राजनीति’ होती है।

कुछ अन्य कारण भी हैं।

इसकी निष्पक्ष ढंग से जांच करा कर उसके निराकरण के उपाय किए जाने चाहिए।

  अन्यथा विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक माहौल पर प्रतिकूल असर पड़ता रहेगा। 

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अखिल भारतीय पर्यावरण सेवा 

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सुप्रीम कोर्ट ने एक साल पहले कहा था कि साफ पर्यावरण और शुद्ध जल लोगों के मौलिक अधिकार हैं।

अदालत ने नदियों के प्रदूषण और उससे लोगों पर पड़ने वाले वाले दुष्प्रभावों पर चिंता जताई थी।

एक साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस महीने पर्यावरण को लेकर एक बड़ी पहल की है।

 न्यायमूर्ति एस.के. कौल और एम एम सुदें्रश के पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या सरकार ‘‘अखिल भारतीय पर्यावरण प्रबंधन सेवा’’ गठित करने पर विचार करेगी ?

याद रहे टी आर एस सुब्रह्मण्यन समिति ने इस संबंध में केंद्र सरकार को अपनी सिफारिश दे दी है।

उसी के आधार पर पेश जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने गत उपर्युक्त सवाल किया।यदि पर्यावरण सेवा गठित हुई तो वह आई.ए.एस.और आई.पी.एस. की तरह ही होगी।

  इससे पहले नब्बे के दशक में सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को यह निदेश दिया था कि वह प्राथमिक से लेकर विश्व विद्यालय स्तर तक पर्यावरण विज्ञान को पृथक व अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाने का प्रबंध करें।

यानी,बिगड़ते पर्यावरण संतुलन की समस्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट हमेशा ही गंभीर रहा है।

  यदि अदालत की पहल से आॅल इंडिया पर्यावरण प्रबंधन सेवा का गठन हो जाए तो इस समस्या से पीड़ित जनता को राहत देने में सरकारों को भी सुविधा होगी। 

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बुद्धदेव बाबू लकीर के फकीर नहीं  

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भले पूर्व मुख्य मंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने पद्म पुरस्कार स्वीकार नहीं किया,किंतु भाजपा सरकार ने उन्हें इस सम्मान के लिए अकारण नहीं चुना था।

दरअसल मुख्य मंत्री के रूप में कई बार बुद्धदेव भट्टाचार्य साम्यवादी लीक से हटकर काम कर रहे थे।

  सार्वजनिक क्षेत्र के जिस ग्रेट ईस्टर्न होटल (कोलकाता)को

उनसे पहले के मुख्य मंत्री ज्योति बसु चाहते हुए भी नहीं बेच सके थे,उसे भट्टचार्य साहब के शासनकाल में बेच दिया गया।

वह होटल भारी घाटे में चल रहा था।

इसके बावजूद सी.पी.एम.का मजदूर संगठन ‘सीटू’ उसे बेचने का विरोध कर रहा था।

  भले बाद में भट्टाचार्य ने अपने बयान का खंडन कर दिया,पर एक बार बंगलादेशी घुसपैठियों को लेकर उनकी जुबान से सच्चाई निकल गई थी ।

उनका बयान आया कि घुसपैठियों के कारण प्रदेश के सात जिलों में सामान्य प्रशासन के लिए काम करना कठिन हो गया है।बाद में पार्टी के दबाव में आकर उन्होंने अपने उस बयान का खंडन कर दिया था।

 पर,उस बयान पर अनेक मुस्लिम संगठन सी.पी.एम. से नाराज हो गए थे।

 ममता बनर्जी न उस नाराजगी का भरपूर राजनीतिक व चुनावी लाभ उठा लिया।  

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  और अंत में 

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इस देश के हजारों एन जी ओ विदेशों से पैसे लेकर भारत में अपनी गतिविधियां चलाते रहे हैं।

इन में से कुछ संस्थाएं जनहित में अच्छा काम करती हैं।

किंतु अधिकतर गैर सरकारी संगठन .जिस उद्देश्य के लिए पैसे लाते हैं,उससे अलग कुछ दूसरे काम करते हैं।उनमें से कुछ काम तो देश विरोधी भी होते हैं।

   इधर भारत सरकार ने यह कोशिश की कि एन जी ओ यानी गैर सरकारी संगठन इस देश के कानून के तहत ही काम करें।जिस उद्देश्य से पैसे कहीं से वे लाते हैं,उसी काम में खर्च हों।

साथ ही, जो विदेशी संगठन आपको पैसे देते हैं,वे यह लिखकर दे दें कि वे आपको किस काम के लिए आर्थिक मदद कर रहे हैं।

  केंद्र सरकार की इन शत्र्तों को मानने से अधिकतर एन जी ओ ने इनकार कर दिया।

  क्या एन.जी.ओ. का यह रुख-रवैया सही है ?

कानून लागू करने की सरकार की कोशिश को विफल करने के लिए कुछ एन.जी.ओ.सुप्रीम कोर्ट गए थे।

पर अदालत ने उन्हें कोई राहत नहीं दी।रुख-रवैया सही होता तो अदालत से उन्हें झटका नहीं लगता।

जो एन जी ओ ठीक काम कर रहे हैं,उनकी सरकार से कोई शिकायत नहीं है।

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प्रभात खबर

पटना

28 जनवरी 22


गुरुवार, 27 जनवरी 2022

     शादी के लिए अखबारों मंे विज्ञापन 

     देने में कोई हर्ज नहीं

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     सुरेंद्र किशोर

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साठ-सत्तर के दशकों में मैं देखता था कि आसपास के गांवों के कुछ लोग भी यह जानकारी रखते थे कि किस गांव में किसका लड़का शादी के योग्य हो गया है।

   उसके अनुसार वे आने वाले ‘अगुआ’ यानी लड़की वालों  को गाइड कर देते थे।

  तब गांवों में सामाजिक बंधन आज की अपेक्षा अधिक मजबूत था।

  समय के साथ अनेक लोग शहरोन्मुख होते चले गए।

 पहले पढ़ने के लिए गए।

  बाद में नौकरी के लिए गए और उनमेें से अधिकतर वहीं बस गए।

 शहरों में तो सामाजिक बंधन वैसा है नहीं।

   कई मामलों में बगल वाला आदमी बगल वाले को नहीं जानता ।

या कम जानता है।

घुलने -मिलने का समय बहुत ही कम लोगों के पास है।

पैसे कमाने की ‘रैट रेस’़ में शामिल जो हैं।

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इस ‘बंधनहीन समाज’ से कई समस्याएं पैदा हो रही हैं।

‘अगुआ’ को ‘गाइड’ करने या योग्य वर बताने के लिए शहरों में अत्यंत कम ही लोगों के पास समय है।

  नतीजतन योग्य वर के यहां भी योग्य अगुआ नहीं पहंुच पा रहे हैं।

पहुंच रहे हैं तो कम संख्या में।

चयन के विकल्प कम होते जा हंै।

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इसकी कमी अखबारों के वैवाहिक विज्ञापन काॅलम पूरा करते हैं।

  कई लोग उस काॅलम की सेवा लेते हैं।

 पर, अब भी बहुत सारे अभिभावकगण इसे अपनी तौहीन मानते हैं।

अरे भई अभिभावको ।

शादी योग्य अपनी संतान के लिए देश-प्रदेश के बड़े -बड़े अखबारों में विज्ञापन दीजिए।

अपनी झूठी शान के चक्कर में अपनी संतान के साथ अन्याय मत कीजिए।

   पोस्ट बाॅक्स के जरिए सूचनाएं मंगवाइए।

कोई आपका नाम जानेगा भी नहीं।

  पर, आपको दर्जनों विकल्प मिल जाएंगे।

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मैंने जैसे ही सन 1963 मैट्रिक पास किया,जवार के लोग मेरे यहां अगुआ भेजने लगे।

मैंने दस साल अपनी शादी रोकी।

इस बीच निराश लौटने वाले कई जावारी लोग बाबू जी से नाराज हो गए।

खैर, बाद के दशकों में गांवों में भी पहले जैसी स्थिति नहीं रही।

  पर नगरों-महानगरों की स्थिति तो इस मामले में और भी खराब है।

किंतु कोई हर्ज नहीं।

अखबार तो हंै ही।

वे ‘‘संदेशवाहक’’ का काम सफलतापूर्वक कर रहे हैं। 

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सुरेंद्र किशोर

27 जनवरी 22


  


      सब दिन होत न एक सामाना !!!

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     सुरेंद्र किशोर

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हिन्दी राज्यों के कई बाहुबलियों -माफियाओं -भ्रष्टों के दुर्दिन चल रहे हैं।

कोई मुंठभेड़ में जान गंवा रहा है तो कोई जेल में ।

कोई जेल से निकलने के लिए छटपटा रहा है तो कोई जेल में सड़ रहा है।

कोई चुनाव लड़ने लायक नहीं रहा तो किन्हीं के महलों पर बुलडोजर चल रहे हैं।

  दरअसल जब ये लोग सत्ता में थे या सत्ता के करीब थे तो समझते थे कि कानून का कोई भी दफा कभी उन्हें छू नहीं पाएगा।

   पर, जब राजनीतिक स्थिति बदली तो उसी के साथ उनकी तकदीर भी बदल गयी।

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  आज जो सत्ता में हैं,उनमें से कई लोगों के लिए ये घटनाएं चेतावनी हैं।

  भले आप अपेक्षाकृत कम शातिर हों,

किंतु आपका भी लालची व बाहुबली चरित्र समय -समय सामने आता रहता है।

सांसद और विधायक फंड ने तो इस देश के 90 प्रतिशत जनप्रतिनिधियों के लोभी चरित्र को आम लोगों के समक्ष नंगा कर दिया है।

   संभल जाइए, आप जिस दल में हैं या जिसके सहचर हैं,वे भी हमेशा सत्ता में नहीं रहेंगे।

बुलडोजर और हथकड़ियां सिर्फ एक तरह की जमात के लिए नहीं बनी होती हैं।

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27 जनवरी 22