शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

 मेरे बारे में खुशखबरी,

ईश्वर करे , आपके बारे में भी ऐसी ही 

खुशखबरी मिलती रहे !

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सुरेंद्र किशोर

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मैं हर साल अपनी विस्तृत पैथोलाॅजिकल जांच करवाता हूं।

ताजा जांच रिपोर्ट को देखकर एक बड़े डाक्टर ने अपनी राय दी--

‘‘रिपोर्ट बिल्कुल परफेक्ट है।

सिर्फ विटामिन -डी और बी -12 कम है।’’

डी नाॅर्मल करना मेरे बाएं हाथ का खेल है, 

डी ठीक करना दाएं हाथ का।

इसलिए फिकिर नाॅट !!

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सन 2005 रिपीट 2005 में मैं नियमित सेवा से रिटायर कर गया।

तब से लगातार काम कर रहा हूं।नौकरी के समय से कुछ अधिक ही काम।

थकता नहीं हूं।थोड़ा संयम जरूर रखता हूं।

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आप भी नियमित रूप से विस्तृत जांच कराते रहिए।

कोई रोग पल रहा होगा तो समय से पहले पकड़ में आ जाएगा और उसका इलाज भी हो जाएगा।

उदाहरण--किडनी का 70 प्रतिशत हिस्सा जब नष्ट हो चुका होता है,उसके बाद ही उस रोग का लक्षण प्रकट होता है।

उसके बाद तो जीवन खत्म !!

डायलिसिस पर कितने दिनों तक कोई रहेगा ?!

इसलिए यह मत कहिए कि मेरे शरीर में रोग का कोई लक्षण

 ही नहीं है तो जांच पर खर्च क्यों करूं ?

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18 अगस्त 26 


बुधवार, 19 अगस्त 2026

 18 अगस्त, 2026 के प्रभात खबर (पटना संस्करण) में प्रकाशित

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 12 टाउनशिप के लिए केंद्रीयकृत गुणवत्ता नियंत्रण प्रशाखा जरूरी 

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सुरेंद्र किशोर

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बिहार में प्रस्तावित 12 ग्रीन फील्ड सैटेलाइट टाउनशिप शहरी मेगा प्रोजेक्ट है।

इसके बन कर तैयार हो जाने के बाद यह एक युगांतरकारी योजना साबित होगी।

इसका श्रेय मौजूदा राज्य सरकार को मिलेगा।व्यवस्थित ढंग से बसने वाले इन शहरों में रहना अपने आप में एक सुखद अनुभव होगा।

यह टाउनशिप विकास का इंजन भी साबित होगा।इसी को ध्यान में रखकर इसकी योजना तैयार की जा रही है।

पर,एक समस्या भी है।निर्माण में गुणवत्ता की समस्या।

 12 टाउनशिप का गुणवत्तापूर्ण निर्माण सुनिश्चित किया ही जाना चाहिए।

गुणवत्ता नियंत्रण का काम तो इन दिनों और भी  कठिन हो गया है ,पर असंभव नहीं।  

 एक कत्र्तव्यनिष्ठ अफसर के नेतृत्व में गुणवत्ता नियंत्रण प्रशाखा की स्थापना होनी चाहिए।

प्रशाखा निरंतर सभी 12 टाउनशिप के गुणवत्तापूर्ण निर्माण को सुनिश्चत करे।बात साफ है।यदि राज्य सरकार गुणवत्ता बनाए रखेगी तो उसे यश मिलेगा।यदि गुणवत्ता नहीं रहेगी तो अपयश मिल सकता है।

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नक्सल आन्दोलन का चढ़ाव-उतार

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  बिहार सरकार के गृह विभाग द्वारा सन 1982 में राज्य में नक्सल आंदोलन पर तैयार विस्तृत नोट में कहा गया था कि नक्सल  समस्या सिर्फ कानून -व्यवस्था की ही समस्या नहीं है,बल्कि यह सामाजिक -आर्थिक समस्या भी है।

तब तक अविभाजित बिहार के मात्र 13 जिलों के 47 प्रखंडोें में नक्सली सक्रिय हुए थे।

पर, बाद के वर्षों में बिहार और झारखंड मेें नक्सलियों का फैलाव काफी बढ़ा।

इस बीच नक्सल आंदोलन में कई उतार -चढ़ाव भी आये।

 केंद्र और राज्य की मौजूदा सरकारों ने नक्सल आंदोलन को एक अलग नजर से देखा और तदनुसार उससे मुकाबला किया। 

इसी महीने बिहार सरकार ने यह सूचना दी कि बिहार अब नक्सल मुक्त हो चुका है।हाल तक राज्य के 22 जिले नक्सल प्रभावित थे।अब कोई जिला वैसा नहीं है।

आने वाले दिनों में यह बात सामने आएगी कि सचमुच नक्सल समस्या से बिहार मुक्त हुआ है या नहीं।पर इससे अलग नक्सल अभियान को लेकर उस विचारधारा को मानने वालों में भी समय- समय पर मतभेद उभरा है।

 चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन माओ त्से तुंग ने सन 1967 में उनसे मिलने गये नक्सली नेता कानू सान्याल व तीन अन्य से कहा था कि ‘‘यहां आपने जो भी सीखा,उसे भूल जाएं और अपने देश की स्थिति के अनुसार 

वहां काम करें।’’

कभी भूमिगत अभियान में शामिल रहे माले (लिबरेान)के दिवंगत महेंद्र प्रसाद सिंह बाद में चुनाव प्रक्रिया में शामिल हुए।तीन बार बगोदर से विधायक बने।जब उन्होंने देखा कि आम जनता घूसखोरी से परेशान है तो उन्होंने सत्याग्रह के जरिए जन दबाव बना कर सरकारी कर्मियों को घूस के पैसे जनता को लौटाने को विवश करना शुरू किया।इससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी।महंेद्र जी अपने जीवन काल में कभी चुनाव नहीं हारे।यह था देश और जनता की स्थिति के अनुसार काम करना।

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 फुटपाथों पर बेलगाम अतिक्रमण

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सुप्रीम कोर्ट ने गत जून में कहा कि सीमांकित फुटपाथों पर सुरक्षित रूप से चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-19 और 21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है।

सरकार का कत्र्तव्य है कि वह नागरिकों के लिए सुरक्षित पैदल मार्ग प्रदान करे।

  कुछ साल पहले पटना हाई कोर्ट ने अदालत में मौजूद पटना के एक थानेदार से पूछा-‘‘सड़कों पर अतिक्रमण करा कर रोज कितना कमा लेते हो ?’’

  यानी, अतिक्रमण एक मुनाफे का ध्ंाधा रहा है।इसके बावजूद अदालतें फुटपाथों पर से अतिक्रमण हटाने का सख्त आदेश सरकारों को नहीं दे पा रही है ?

यह समस्या देशव्यापी है।

  फिलहाल अदालत सरकार को यह निदेश दे सकती है कि वह राज्य पुलिस के बदले अर्ध सैनिक बल के सहयोग से फुटपाथों पर से अतिक्रमण हटाए।

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भूली-बिसरी यादें

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एक बार लोक सभा में कांग्रेस के भागवत झा आजाद ने कह दिया था कि ‘‘काबुल की सड़कों पर सिर्फ घोड़े ही नहीं होते,गधे भी होते हैं।’’

प्रतिपक्ष के अटल बिहारी वाजपेयी ने इस उक्ति पर एतराज किया और स्पीकर से कहा कि आप इस उक्ति को सदन की कार्यवाही से निकाल दें ।क्योंकि इससे पड़ोसी मित्र देश से संबंध बिगड़ सकते हैं।

 वाजपेयी की इस बात से सदन में हंसी फूट पड़ी।

हस्तक्षेप करते हुए भागवत झा आजाद ने कहा कि ‘‘चलिए आप कहते हैं तो बदल देता हूं।

मैं कह देता हूं कि बंबई की सड़कों पर घोड़े ही नहीं ,गधे भी होते हैं।

इससे पहले आजाद साहब ने अंग्रेजी में कहा था कि ‘‘मुझे अपना मंुह मत दीजिए,अपना कान दीजिए।’’

अटल जी ने कहा कि अभिव्यक्ति की यह भाषा उचित नहीं है।

इस पर आजाद जी ने कहा कि मेरा मतलब यह है कि ‘‘आप अपना मुंह बंद रखिए और अपने कान खुले रखें।’’   

 ( तब की अपेक्षा सदन में आज की चर्चा का स्तर देखिए और दुखी होइए।)

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और अंत में

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 सन 1962 में डा.राम मनोहर लोहिया ने प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खिलाफ चुनाव लड़ा।

किसी ने पूछा कि ऐसी जगह से क्यों लड़े जहां से आपकी हार तय थी ?

डा. लोहिया ने कहा कि पार्टी के प्रचार के लिए लड़ा।साथ ही ,चट्टान को मैं तोड़ तो नहीं सका,पर उसमें दरार जरूर डाल दी। फूलपुर लोक सभा चुनाव क्षेत्र के भीतर पांच विधान सभा चुनाव क्षेत्र पड़ते थे।उनमें से नेहरू तीन क्षेत्रों में और लोहिया दो क्षेत्रों में विजयी हुए।

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(अनियतकालीन काॅलम ‘यदाकदा’ से)



 


रविवार, 16 अगस्त 2026

 कितने लोगों को पसंद हैं राहुल गांधी 

की देह -भाषा और मौखिक भाषा ??

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सुरेंद्र किशोर

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राहुल गांधी की जो मौखिक भाषा है और उनकी जो देह भाषा है,वह 

देश देख रहा है।

संसद के भीतर या बाहर राहुल गांधी जिस तरह अपनी देह भाषा--मौखिक भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं,यदि किसी शालीन व्यक्ति के ड्राइंग रूम में जाकर वे वही सब करने लगें तो क्या वह शालीन व्यक्ति चाहेगा कि राहुल जी अगले दिन भी  उस व्यक्ति के घर जायें ?(यदि उस व्यक्ति को कांग्रेस का टिकट नहीं लेना हो तो।)

  जो लोग चाहेंगे कि राहुल जी घर के बाहर और भीतर,संसद के बाहर और भीतर  भी वही सब करते रहें,जो कुछ कर रहे हैं,

सिर्फ वैसे ही लोग राहुल को अगला प्रधान मंत्री देखना पसंद करंेेगे।

बाकी जनता ?

बाकी जनता कहेगी कि अपने आचरण से आप अपनी पार्टी को जिस तरह दिन प्रति दिन बर्बाद कर रहे हैं,वह करने का आपको पूरा अधिकार है,पर आपको इस देश के साथ छेड़छाड़ करने नहीं दिया जाएगा।

  इस देश को ‘‘केरल शैली का शासन’’ नहीं चाहिए।

(केरल में आज जो कुछ हो रहा है,वह बहुत चिंताजनक है,सारी बातें बाहर नहीं आ रही हैं।वहां के हिन्दू संगठन उद्वेलित हैं।विश्वास न हो तो गुगल की मदद लीजिए।)दूसरी ओर यू.पी.में तो कुछ मुस्लिम महिलाएं भी टी.वी.चैनलों पर कहती हैं कि बाबा के राज में हम अंधेरा होने के बाद भी घर से 

निकल कर सुरक्षित घर लौट सकती हैं।सन 2017 से पहले पहले ऐसा नहीं था।

बिहार में भी सन 2005 से पहले कोई व्यक्ति अंधेरा हो जाने के बाद सामान्य स्थिति में अपने घर से नहीं निकलता था।

पटना जंक्सन पर जब कोई व्यक्ति अंधेरा हो जाने के बाद कहीं बाहर से ट्रेन से पहुंचता था तो पटना स्थित अपने घर भयवश तत्काल नहीं चला जाता था।रात पटना स्टेशन पर ही गुजार देता था।अगली सुबह जाता था।   

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16 अगस्त 26


शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

 मैं जानता हूं कि मेरी बात कोई नहीं सुनेगा।

पर, चेतावनी देना मैं अपना नागरिक कत्र्तव्य समझता हूं।

कल यह तो कोई नहीं कहेगा कि पहले चेताया क्यों नहीं था ! 

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सुरेंद्र किशोर

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घर का ही बनाया खाइए।

अपनी जमीन हो तो घर का ही उपजाया खाइए।

बाकी तो कदम- कदम पर खतरा है--

डेग- डेग पर कैंसर है ।

सरकारें दूसरे कामों में व्यस्त हैं।

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समस्या की गंभीरता को देखते हुए सरकारों को चाहिए कि वे मिलावट को रोकने के लिए एक अलग विभाग बनाए।

जिस तरह बाहर के दुश्मनों को रोकने के लिए रक्षा मंत्रालय बनाया गया है।

मिलावट खोरों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान हो।

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12 अगस्त 26 


शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

 आपातकाल के काले दिन 

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बिशन टंडन की डायरी से

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23 जुलाई 1975

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...........प्रधान मंत्री का प्रजातंत्र बचाने का पाखंड झूठे प्रचार पर ही तो अधारित है।

शारदा (प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार एच.वाई.शारदा प्रसाद)का अन्तर व्यथित है।

पर,झूठे तर्क को उसके विभिन्न रूपों में उसे लिखना पड़ रहा है।

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हर महत्वपूर्ण नियुक्ति के लिए प्रधान मंत्री, संजय गांधी की राय लेती हैं।

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शारदा, जिस प्रकार संेसर का कार्य किया जा रहा है,उससे भी बहुत असंतुष्ट व खिन्न है।

उसका कहना है कि प्रधान मंत्री इस संबंध में कुछ उदारता दिखाने के पक्ष में हैं,पर संजय व अन्य लोग जो प्रधान मंत्री निवास से सब बातों पर नियंत्रण रख रहे हैं,कठोर संेसर के पक्ष में हैं।

पिछले रविवार को मंत्रि परिषद की बैठक में सेंसर आदि पर बातें हुईं।

उसमें प्रधान मंत्री ने कहा कि यदि प्रतिपक्ष संसद में वाक-आउट करे तो उसे समाचार पत्रों में छपने देना चाहिए।

  प्रायः सभी मंत्रियों की यही राय थी।

पर बाद में महल के सिपहसालारों का निर्णय दूसरा हुआ।

(आज जो लोग अक्सर गोदी मीडिया की बातें करते हैं,उन्हें यह पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देनी चाहिए।साथ ही, यह भी बताना चाहिए के आज के गांधी परिवार की मानसिकता इमरजेंसी की इंदिरा गांधी की मानसिकता से कितनी भिन्न है ?)

आज लोक सभा में मीसा का संशोधन प्रस्तुत किया गया।

मावलंकर ने उसका विरोध किया।

पर,होता क्या है इस विरोध से ?

..... कल के जगजीवन राम के भाषण का आकाशवाणी ने पूरा प्रसारण किया।उसके विपक्ष में जो कुछ कहा गया,वह बिलकुल नहीं बताया गया।

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आज (मशहूर वकील )पालकीवाला प्रधान मंत्री से मिले।

प्रधान मंत्री से पहले वे शेषन से मिले।

आजकल जो कुछ हो रहा है,उससे उन्हें (पालकीवाला को )बहुत क्लेश पहुंचा है।

उनकी राय है कि हमारा संविधान नष्ट हो गया।

 इस सबकी आवश्यकता नहीं थी।

बात करते- करते उनकी आंखें भर आईं।

भ्विष्य बड़ा अंधकारमय है।

पालकीवाला तो दो साल से यही कह रहे हैं कि हमारे संविधान को विकृत किया जा रहा है।

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(आई.ए.एस.अफसर बिशन टंडन आपातकाल में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के संयुक्त सचिव थे।

रिटायर होने के बाद टंडन साहब बिड़ला फाउंडेशन के निदेशक बने।मैं कुछ साल तक उस फाउंडेशन की ज्यूरी का मेम्बर था।--सुरेंद्र किशोर) 

 


 

 


शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

 बवानी इमली हत्याकांड

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अंग्रेजों ने सन 1858 में यू.पी. के 52 स्वतंत्रता सेनानियों को 

एक साथ इमली के पेड़ पर लटका कर फांसी दे दी थी।

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हमारे देश के किस इतिहासकार ने इस घटना का पूरा व्योरा

लिखा है ?

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सुरेंद्र किशोर

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अंग्रेजों ने 28 अप्रैल ,1858 को यू.पी.के फतेहपुर में ठाकुर जोधा सिंह 

सहित बावन स्वतंत्रता सेनानियों को इमली के पेड़ पर लटका कर 

फांसी दे दी थी।

एक महीने तक लाशें पेड़ पर ही लटकी रहीं।अंग्रेजों ने उन्हें 

उतारने नहीं दिया ताकि अंग्रेजों का दबदबा कायम रहे और 

भयवश उसके खिलाफ कोई सिर न उठा सके ।

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क्या इस घटना का जिक्र किसी पाठ्य पुस्तक में हुआ है ?

किस इतिहासकार ने अलग से इस पर विस्तार से लिखा है ?

 ऐसी जघन्य घटना दुनिया के इतिहास में अन्यत्र भी हुई है या

भारत में ही यह अनोखी घटना हुई--

यानी 52 लोगों को एक साथ पेड़ पर लटका कर फांसी देने 

की अनोखी घटना !

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31 जुलाई 26


बुधवार, 29 जुलाई 2026

 एक सामान्य नागरिक की सलाह

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देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की गरिमा कायम रखने 

के लिए संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण बंद हो।

क्योंकि संसदीय कार्य संचालन नियमावली का उलंघन 

करने वाले सदस्यों की संख्या अब काफी बढ़ गई है।

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सुरेंद्र किशोर

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बेहतर यह होगा कि संपादित करने के बाद ही एक दिन

 बाद ही कार्यवाही का टी.वी.पर प्रसारण हो।

या, एक दूसरा उपाय भी है।

संसद में सदस्य जो कुछ बोलते हैं,उसको लेकर कोर्ट में उन 

पर केस नहीं हो सकता।जब संसद में शालीन व नियम पालक

सदस्यों की संख्या अधिक थी,तब यह छूट दी गई थी।

  यदि सीधा प्रसारण जारी रखना हो तो उस छूट को यथाशीघ्र 

समाप्त कर दिया जाना चाहिए।

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29 जुलाई 26