बुधवार, 7 सितंबर 2011

एक वह भी जमाना था, एक यह भी जमाना है



बिहार में 18 मार्च 1974 को छात्रों और युवकों के नेतृत्व में एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ था। आंदोलन भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और गलत शिक्षा नीति के खिलाफ था। आंदोलन का नेेतृत्व बाद में जेपी ने संभाल लिया था। क्योंकि 18 मार्च को हुए ‘विधानसभा मार्च’ के दौरान हिंसा हो गई थी। जेपी तब तक आंदोलन से जुड़े नहीं थे। इस हिंसा पर जेपी ने बयान दिया था कि ‘हिंसा और आगजनी से क्रांति नहीं होती है।’ आंदोलन के अराजक होते देख कुछ समझदार युवा व छात्र जेपी से उनके कदमकुआं स्थित आवास पर मिले और उनसे नेतृत्व करने का आग्रह किया। जेपी ने आंदोलन को शांतिपूर्ण व अहिंसक बनाये रखने की शर्त रखी। छात्रों-युवकों ने शर्त मान ली। तत्पश्चात आंदोलन का एक नारा बना, ‘हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा।’

आंदोलन को दिशा देने के लिए बिहार छात्र संघर्ष संचालन समिति का गठन हुआ था। इस महत्वपूर्ण समिति के सदस्य थे-लालू प्रसाद, सुशील कुमार मोदी, राम बहादुर राय, वशिष्ठ नारायण सिंह, शिवानंद तिवारी, रघुनाथ गुप्त, मिथिलेश कुमार सिंह, राम जतन सिन्हा, नरेंद्र कुमार सिंह, भवेशचंद्र प्रसाद, नीतीश कुमार, विक्रम कुंवर, गोपाल शरण सिंह, अक्षय कुमार सिंह, विजय कुमार सिन्हा, रघुवंश नारायण सिंह, उदय कुमार सिन्हा, अरुण कुमार वर्मा, रवींद्र प्रसाद और अशोक कुमार सिंह।

आंदोलन के संचालन के लिए पटना के कदमकुआं में स्थापित कार्यालय को चलाने का भार पहले भवेश चंद्र प्रसाद को मिला और बाद में विजय कृष्ण को। समिति के सदस्यों में से राम बहादुर राय, अरुण कुमार वर्मा, उदय कुमार सिन्हा, रवींद्र प्रसाद, रघुवंश नारायण सिंह और अक्षय कुमार सिह को छोड़कर सभी छात्र व युवा नेता बाद के दिनों में समय- समय पर विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री बने। कोई सांसद बना तो कोई विधायक। कोई मंत्री बना तो कोई मुख्यमंत्री। इन दिनों भी नीतीश कुमार तो मुख्यमंत्री हैं और सुशील कुमार मोदी उप मुख्यमंत्री।

यह बात नहीं है कि ये सभी नेता जेपी आंदोलन के मंच से उतर कर सीधे सत्ता की कुर्सी पर चले गये। कुछ को तो बाद में भी संघर्ष करने पड़े। यहां यह सब इसलिए कहा जा रहा है कि आज अन्ना के आंदोलन से निकल कर आज के आंदोलनकारी कल सत्ता भी संभाल सकते हैं। आंदोलन नये नेतृत्व को उभारते हैं। जेपी आंदोलन में भी अनेक नये नेता उभरे थे। अन्ना आंदोलन में भी नये नेता उभर रहे हैं। इनमंे अरविंद केजरीवाल सबसे अधिक चमकते सितारे लग रहे हैं। जेपी आंदोलन को देखा जाए तो कुल मिलाकर उस आंदोलन से निकले नेताओं में आज सबसे चमकते सितारे नीतीश कुमार हैं। नीतीश कुमार खुद को लोहियावादी कहते हैं। नीतीश कुमार लोहियावादियों में भी सबसे चमकते सितारे साबित हो रहे हैं। यहां ऐसे ही लोहियावदियों की बात हो रही है जो सत्ता में पहुंचे। मधु लिमये जैसे लोहियावादी की नहीं। जेपी आंदोलन के दौरान छात्र संघर्ष संचालन समिति के अधिकतर सदस्य आंदोलन शुरू होने से पहले से ही किसी न किसी राजनीतिक दल व विचारधारा से बंधे हुए थे। शिवानंद तिवारी, रघुनाथ गुप्त और नरेंद्र कुमार सिंह लोहियावादी दल में थे। वशिष्ठ नारायण सिंह और मिथिलेश कुमार सिंह संगठन कांग्रेस के युवा संगठन से जुड़े थे। पर जब वे जेपी आंदोलन में थे तो उस समय वे दलीय बंधन में नहीं बंधे हुए थे। इस दृष्टि से अन्ना आंदोलन की स्थिति भिन्न है। अन्ना के साथ गैर दलीय तत्व अधिक हैं।

यहां तक कि आंदोलन के प्रारंभिक दिनों में छात्र-युवा आंदोलन के नेता राजनीतिक दलों के नेताओं को अपने सभा मंचों पर चढ़ने तक नहीं देते थे।

दरअसल जेपी आंदोलनकारियों का तर्क यह था कि 1967 से 1972 तक कुछ राज्यों में सत्ता में रह कर गैर कांग्रेसी दलों ने कांग्रेस की अपेक्षा खुद को बेहतर साबित नहीं किया। वे भी आम तौर पर व्यवस्था के अंग ही बन कर रह गये। इसीलिए इनको आंदोलन में साथ लेकर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। साथ ही इस छात्र-युवा आंदोलन को गैर दलीय बनाये रखने के फायदे होंगे। क्योंकि उसकी नैतिक धाक अधिक होगी। पर जब गफूर सरकार का बिहार में दमन शुरू हो गया तो जेपी आंदोलन में प्रतिपक्षी राजनीति के दल भी जुड़ गये। हालांकि गैर कांग्रेसी दलों के भीतर आंदोलन के पक्ष में विधायिका से इस्तीफा देने के सवाल पर भारी मतभेद था। जिस तरह आज अन्ना के जन लोकपाल विधेयक पर गैर कांग्रेसी दलों में भी मतभेद है। जेपी ने जब विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे देने को कहा तो कई विधायकों ने इस्तीफा देने से मना कर दिया था, जिनमें जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी, संगठन कांग्रेस के विधायक भी थे।



जेपी आंदोलन की संचालन समिति के कार्यालय सचिव भवेश चंद्र प्रसाद ने उन दिनों के अनुभव हाल में इन पंक्तियों के लेखक को इन शब्दों में सुनाये, ‘मेरे कार्यालय में गरीब लोग आते थे और आंदोलन फंड के लिए दो, चार या फिर पांच रुपये देते थे। और कहते थे कि हमारा नाम भले मत पहुंचाइए, पर यह पैसा जेपी तक जरूर पहुंचा दीजिएगा। ऐसा जन लगाव जेपी आंदोलन के प्रति था।’




एक अन्य कार्यालय सचिव विजय कृष्ण ने बताया कि आपातकाल के दिनों में फरारी के काल में अक्सर गरीब लोग ही हमें रात में रहने के लिए अपने घरों में शरण देते थे। अधिकतर अमीर मित्र लोग तो डरे रहते थे।


इन पंक्तियों के लेखक को आपातकाल में बड़ौदा डायनामाइट मुकदमे के सिलसिले में सी.बी.आई. बेचैनी से खोज रही थी। सी.बी.आई के अनुसार जार्ज फर्नाडिस, रेवीकांत सिन्हा और एम.एन. वाजपेयी के साथ मिलकर इन पंक्तियों के लेखक ने पटना में जुलाई 1975 में एक गुप्त बैठक की। उसमें यह षड्यत्र रचा गया कि देश भर में सरकारी संस्थानों को डायनामाइट से उड़ाना है। नतीजतन इन पंक्तियों के लेखक को फरार हो जाना पड़ा। रिश्तेदारों के यहां रहने का सवाल ही नहीं था। पटना सचिवालय में कार्यरत एक अल्पवेतन भोगी कर्मचारी के मंदिरी मुहल्ले में स्थित एक कमरे के घर में लंबे समय तक के लिए मुझे शरण मिली। सी.बी.आई. से बचने के लिए बाद में मेघालय भाग जाना पड़ा। वहां कांग्रेस की सरकार नहीं थी। आपातकाल का दमन नहीं था। वहां मेरे एक रिश्तेदार रहते थे जहां शरण मिली। इन पंक्तियों के लेखक का भी यही अनुभव यह रहा कि आम गरीब लोगों ने छिपने में अपेक्षाकृत अधिक मदद की जबकि तब भी निहितस्वार्थियों की ओर से यह कहा जा रहा था कि जेपी आंदोलन मध्यम वर्ग का आंदोलन है।

किस तरह वह किसी खास जाति या वर्ग का ही आंदोलन नहीं था, उसका एक उदाहरण उन दिनों सामने आते रहते थे। 1974 में जेपी आंदोलन के समय राज्य के कुछ इलाकों में चेचक का प्रकोप हो गया था। जयप्रकाश नारायण ने सार्वजनिक रूप से इस पर चिंता प्रकट की। फिर क्या था, पटना मेडिकल कालेज के छात्रों ने कुछ ही समय में राज्य के दस हजार लोगों को चेचक के टीके देने का काम पूरा कर दिया।



यह जेपी के प्रति सम्मान और उनके नेतृत्व में शुरू आंदोलन की गंभीरता का ही परिणाम था। अधिकतर लोगों को मालूम था कि जेपी का मुद्दा सही है और उनकी मंशा ईमानदार है। अन्ना के आंदोलन को देखकर जेपी आंदोलन की याद आना स्वाभाविक ही है।



इतना ही नहीं, जेपी के आहवान पर जब-जब पटना में सभा या आंदोलन का कोई कार्यक्रम बनता था तो राज्य भर से लोग आते थे। उनके खाने का प्रबंध किसी होटल या भंडारे से नहीं बल्कि आम लोगों के घरों से होता था। अनेक आम लोगों सहित इन पंक्तियों के लेखक के घर से भी अक्सर पूड़ी-भुजिया-आचार के पैकेट उन आंदोलनकारियों के लिए बनकर जाते थे।

जेपी बिहार आंदोलन के दौरान समय -समय पर घरों में थालियां बजाने और थोड़ी देर के लिए नियत समय पर बत्तियंा गुल कर देने का भी आहवान करते रहते थे। उस समय लगता था कि अधिकतर घरांे से आंदोलन की घंटियां बज रही हैं। उन कई घरों से भी थालियांें की आवाज आती थी, जिन्हें सक्रिय राजनीति से कोई मतलब नहीं था। उनमें से अधिकतर लोगों की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी नहीं थी। पर वे एक नेता की ओर विश्वास भरी नजरों से देख कर थे जो उनकी समस्याओं को लेकर 73 साल की आयु में भी आम जन की बेहतरी के लिए सड़कों पर निकल पड़ा था।

यह कहना गलत है कि आम लोगों की राजनीति में कोई रूचि नहीं है। दरअसल लोगबाग विश्वसनीयता खो चुके नेताओं और दलों में कोई खास रूचि नहीं रखते भले वे औपचारिकता के लिए हर बार किसी न किसी को वोट दे देते हैं। सामने बेहतर विकल्प के अभाव में कई बार और अधिकतर स्थानों में विवादास्पद उम्मीदवारों के पक्ष में ही उन्हें मुहर लगानी पड़ती है।

जेपी आंदोलन की घटनाएं बताती हैं और अन्ना आंदोलन की घटनाएं भी इस मामले में इस बात की पुनरावृति कर रही है कि यदि नेता प्रामाणिक हो तो बेहतर राजनीति की प्यासी जनता उस नेता की तरफ ख्ंिाची चली आती है।

भ्रष्टाचार और उससे उत्पन्न महंगाई की मार सबसे अधिक गरीब और निम्न मध्यवर्गीय जनता ही भुगतती हैं, इसलिए केले वाले केले और चने वाले कम कीमत पर या मुफ्त में चने आंदोलनकारियों को दे देते हैं।

जेपी आंदोलन में मशहूर साहित्यकार नागार्जुन भी सक्रिय थे। इन पंक्तियों का लेखक साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ का पटना संवाददाता था और नागार्जुन के नेतृत्व में यदा-कदा धरना, अनशन, प्रदर्शन में शामिल हुआ करता था। फटेहाल नागार्जुन को उन दिनों चंदे में जो भी छोटी राशि मिलती थी, उन सबको हम सबको चाय नाश्ता खिलाने -पिलाने में खर्च कर देते थे।

पटना की कुछ खास लिट्टी -समोसा की दुकान से बाबा लिट्टी और समोसा खरीदकर हमें खिलाते और खुद खाते थे। हमने देखा कि लिट्टी के दुकानदार बाबा को गर्मागर्म चीजें ही देते थे और पैसे में भी खास मुरव्वत करते थे। गरीब लिट्टी वाला समझता है कि बुढ़ापे तक फटेहाल रहा यह बाबा जरूर आम जनता की भलाई के लिए ही संघर्षरत है। यह और बात है कि बाबा आंदोलन के आखिरी दिनों में जेपी आंदोलन से अलग हो गये थे। हालांकि यहां बात की जा रही है कि एक फुटपाथी दुकानदार की एक आंदोलनकारी के प्रति भावना की और उसके प्रति एक खास तरह के लगाव की।

पर साधनों और मीडिया को ध्यान में रखा जाए तो अन्ना आंदोलन बेहतर स्थिति में है। जेपी के पास साधन कम थे। मीडिया का ऐसा विस्फोट तब नहीं हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का दबदबा बहुत था। अधिकतर मीडिया और व्यापारिक घराने इंदिरा जी से सहमते थे। आज वैसी स्थिति नहीं है। इसका लाभ अन्ना के आंदोलन को मिल रहा है। पर जेपी की नैतिक धाक अधिक थी।


रविवार, 4 सितंबर 2011

इमरजेंसी में जार्ज फर्नांडीस से मुलाकात

25 जून 1975 को जब आपातकाल लगा तो उस समय जार्ज फर्नांडीस उड़ीसा में थे। अपनी पोशाक बदल कर जुलाई में जार्ज पटना आये और तत्कालीन समाजवादी विधान पार्षद रेवतीकांत सिंहा के आर. ब्लाक स्थित सरकारी आवास में टिके। इन पंक्तियों का लेखक भी उनसे मिला जो उन दिनों जार्ज द्वारा संपादित चर्चित साप्ताहिक पत्रिका प्रतिपक्ष का पटना संवाददाता था। जार्ज दो तीन दिन पटना रह कर इलाहाबाद चले गये।

बाद में उन्होंने मध्य प्रदेश के प्रमुख समाजवादी नेता लाड़ली मोहन निगम को इस संदेश के साथ पटना भेजा कि वे मुझे और शिवानंद तिवारी को जल्द विमान से बंगलुरू लेकर आयें। शिवानंद जी तो उपलब्ध नहीं हुए। पर मैं निगम जी के साथ मुम्बई होते हुए बंगलुरू पहुंचा।

वहां जार्ज के साथ तय योजना के अनुसार राम बहादुर सिंह, शिवानंद तिवारी, विनोदानंद सिंह, राम अवधेश सिंह और डा. विनयन को लेकर मुझे कोलकाता पहुंचना था। पटना लौटने पर मैंने उपर्युक्त नेताओं की तलाश की। पर इनमें से कुछ जेल जा चुके थे या फिर गहरे भूमिगत हो चुके थे। सिर्फ डा. विनयन उपलब्ध थे। उनके साथ मैं धनबाद गया।

याद रहे कि आपातकाल में कांग्रेस विरोधी राजनीतिक नेताओं -कार्यकर्त्ताओं पर सरकार भारी आतंक ढा रही थी। राजनीतिककर्मियों के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाना तक कठिन था। भूमिगत जीवन जेल जीवन की अपेक्षा अधिक कष्टप्रद था।

धनबाद में समाजवादी लाल साहेब सिंह से पता चला कि राम अवधेश तो कोलकाता में ही हैं तो फिर हम कोलकाता गये। वहां जार्ज से हमारी मुलाकात हुई। पर वह मुलाकात सनसनीखेज थी।

जार्ज ने दक्षिण भारत के ही एक गैरराजनीतिक व्यक्ति का पता दिया था। उस व्यक्ति का नाम तीन अक्षरों का था। जार्ज ने कहा था कि इन तीन अक्षरों को कागज के तीन टुकड़ों पर अलग अलग लिखकर तीन पॉकेट में रख लीजिए ताकि गिरतार होने की स्थिति में पुलिस को यह पता नहीं चल सके कि किससे मिलने कहां जा रहे हो। यही किया गया। पार्क स्ट्रीट के एक बंगले में मुलाकात हुई। दक्षिण भारतीय सज्जन ने कह दिया था कि बंगले के मालिक के कमरे में जब भी बैठिए, उनसे हिंदी में बात नहीं कीजिए। अन्यथा उन्हें शक हो जाएगा कि आप मेरे अतिथि हैं भी या नहीं।

उस दक्षिण भारतीय सज्जन ने हमें जार्ज से मुलाकात करा दी। हम एक बड़े चर्च के अहाते में गये। जार्ज उस समय एक पादरी की पोशाक में थे। उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। चश्मा बदला हुआ था और हाथ में एक विदेशी लेखक की मोटी अंग्रेजी किताब थी। जार्ज, विनयन और मुझसे देर तक बातचीत करते रहे। फिर हम राम अवधेश की तलाश में उल्टा डांगा मुहल्ले की ओर चल दिये। वहीं की एक झोपड़ी में हम टिके भी थे। फुटपाथ पर स्थित नल पर नहाते थे और बगल की जलेबी-चाय दुकान में खाते-पीते थे।

उल्टा डांगा का वह पूरा इलाका बिहार के लोगांे ंसे भरा हुआ था। जार्ज के साथ टैक्सी में हम लोग वहां पहुंचे थे। हम जार्ज को उस चाय की दुकान पर ही छोड़ दिया और राम अवधेश की तलाश में उस झोपड़ी की ओर बढ़े। पर पता चला कि राम अवधेश जी भूमिगत कर्पूरी ठाकुर के साथ कोलकाता में ही कहीं और हैं।

चाय की दुकान पर बैठे जार्ज ने इस बीच चाय पी थी। जब हम लौटे और जार्ज चाय का पैसा देने लगे तो दुकानदार उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया आर कहा, हुजूर हम आपसे पैसा नहीं लेंगे। इस पर जार्ज घबरा गये। उन्हें लग गया कि वे पहचान लिये गये। अब गिरतारी में देर नहीं होगी। जार्ज को परेशान देखकर मैं भी पहले तो घबराया, पर मुझे बात समझने में देर नहीं लगी। मैंने कहा कि जार्ज साहब, चलिए मैं इन्हें बाद में पैसे दे दूंगा। मैं यहीं टिका हुआ हूं। फिर अत्यंत तेजी से हम टैक्सी की ओर बढ़े जो दूर हमारा इंतजार कर रही थी। फिर हमें बीच कहीं छोड़ते हुए अगली मुलाकात का वादा करके जार्ज कहीं और चले गये।

आपातकाल में जिस तरह जान हथेली पर लेकर जार्ज फर्नांडीस ने अपने उसूलों के लिए बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी, यदि मंत्री बनने के बाद भी वे उसी तरह अपने उसूलों पर पूरी तरह खरा उतरे होते तो समाजवादी आंदोलन आगे बढ़ जाता। अक्सर उन कार्यकर्त्ताओं के मन में यह बात आती रहती है जिन लोगों ने भी कभी अपनी जान हथेली पर रखकर उनके साथ काम किया था और जिन्होंने बाद में भी सरकार से कभी कुछ नहीं लिया।

याद रहे कि आपातकाल में जार्ज और उनके साथियों पर बड़ौदा डायनामाइट केस को लेकर मुकदमा चला। सी.बी.आई. का आरोप था कि पटना में जुलाई 1975 मेें जार्ज फर्नाडीस, रेवती कांत सिंह, महेंद्र नारायण वाजपेयी और इन पंक्तियों के लेखक यानी चार लोगों ने मिलकर एक राष्ट्रद्रोही षड्यंत्र किया। षड्यंत्र यह रचा गया कि डायनाइट से देश के महत्वपूर्ण संस्थानों को उड़ा देना है और देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर देनी है। सन 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार बनने पर यह केस उठा लिया गया।


( प्रभात खबर से साभार )

रविवार, 28 अगस्त 2011

विफल नहीं होता भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन

अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ इस देश का यह चौथा बड़ा जन आंदोलन है। वैसे तो मिनी आंदोलन रोज-रोज जहां -तहां होते ही रहते हैं।

प्रथम आंदोलन के नायक समाजवादी नेता व विचारक डा. राम मनोहर लोहिया थे। दूसरे के नायक लोकनायक जय प्रकाश नारायण थे। तीसरा आंदोलन वी.पी. सिंह के नेतृत्व में लड़ा गया। चौथा आंदोलन अन्ना हजारे के नेतृत्व में इन दिनों लड़ा जा रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किया गया कोई आंदोलन इस मामले में विफल नहीं होता कि उससे अंततः उस आंदोलन के कारण भ्रष्टाचार समर्थक सत्ता देर-सवेर हट जाती है। पर यह बात भी है कि अगली सत्ता अपने ही पिछले आंदोलन के मुद्दे को लगभग भूल जाती है। पता नहीं इस मामले में इस बार क्या होगा।

इस गरीब देश के अधिकतर लोग सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं, उनको छोड़कर जो लोग भ्रष्टाचार से लाभान्वित हैं। हालांकि एक ही व्यक्ति अधिकार की अपनी सीट पर बैठकर तो रिश्वत ले रहा है, पर वही जब दूसरे दतर में अपने किसी काम के लिए जाता है, तो उसे भी घूस देनी पड़ती है।

कहने का अर्थ यह है कि भ्रष्टाचार से तो लोगबाग आजादी के बाद से ही निरंतर पीड़ित रहे हैं। पहले कम पीड़ित थे, अब अधिक हो रहे हैं। पर जब जब प्रामाणिक नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़ी होती है, तब तब आम जनता उसके पीछे उमड़ पड़ती है। चारों आंदोलनों में यही हुआ। इन आंदोलनों में एक समानता और भी है। ये सारे आंदोलन कांग्रेसी सत्ता के खिलाफ ही हुए। पर स्वार्थवश कांग्रेस ने इतिहास से अब तक नहीं सीखा।

डा. लोहिया एक प्रामाणिक नेता थे जो सिर्फ देश और जनता के बारे में ही सोचते थे। उनकी न तो निजी कार थी और न ही बैंक खाता। अविवाहित थे।

आजादी के बाद के चुनावों में अनेक प्रतिपक्षी दलों की उपस्थिति होती थी। उसका लाभ उठाकर 50 प्रतिशत से भी कम ही मत पाकर लगातार 20 साल तक कांग्रेस सत्ता में बनी रही। कांग्रेस ने जन समस्याओं की उपेक्षा की। भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार का बोलबाला बढ़ने लगा तो डा. लोहिया ने कुछ प्रतिपक्षी दलों को चुनाव के लिए एक किया। और नतीजतन 1967 में नौ राज्यों की सत्ता कांग्रेस के हाथों से निकल गई। लोकसभा में कांग्रेस का बहुमत घट गया। यदि कुछ और प्रतिपक्षी एकता हुई होती तो केंद्र की सत्ता से भी कांग्रेस का तभी सफाया हो गया होता। भ्रष्टाचार के मामले में इन नौ राज्यों की सरकारें पिछली कांग्रेसी सरकारों से बेहतर थीं। राजनीतिक महत्वाकांक्षा और बेमतलब के आंतरिक विवादों के कारण गैर कांग्रेसी सरकारें अल्पायु साबित हुईं।

बिहार में 1965-66 में तत्कालीन कांग्रेसी सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना गुस्सा था कि एक तत्कालीन सत्ताधारी नेता का नाम लेकर गांव-शहर मेें यह खुलआम नारा लगता था कि ‘गली -गली में शोर है और फलां नेता चोर है।’ गैर कांग्रेसी दलों की नाकामयाबी का लाभ उठाकर 1971-72 में दुबारा सत्ता में आकर कांग्रेस इस बार एकाधिकार, परिवारवाद और भ्रष्टाचार में लिप्त हो गई तो जेपी उठ खड़े हुए। दक्षिण को छोड़कर जेपी को पूरे देश का समर्थन मिला और इंदिरा गांधी जैसी महाबली नेता का पराजय हो गया। जिस तरह डा. लोहिया के असामयिक निधन के कारण प्रतिपक्ष खास कर समाजवादी आंदोलन दिशाहीन हो गया था, उसी तरह जेपी की किडनी खराब हो जाने के कारण जेपी जनता सरकार पर अंकुश नहीं रख सके। यानी एक अच्छे आंदोलन का सुपरिणाम सामने नहीं आ सका। हालांकि मोरारजी सरकार में भ्रष्टाचार कम था और मूल्य वृद्धि की रफतार बिलकुल काबू में थी। वी.पी. सिंह ने अपनी कुर्सी को खतरे में डाल कर राजीव गांधी से राजनीतिक लड़ाई मोल ली थी, इसलिए भी आम जनता के वे हीरो बने और भ्रष्टाचारविरोधी जनता की मदद से वे राजीव गांधी को सत्ता च्युत कर सके।

अन्ना हजारे को तो सत्ता की राजनीति से कोई मतलब ही नहीं है, इसलिए भी आज आम जनता का काफी समर्थन उन्हें मिल रहा है। उम्मीद की जा रही है कि उन्हें और भी अधिक जन समर्थन मिलेगा। सरकारी दमन और समय बीतने के साथ जन समर्थन बढ़ता है। आज के आधुनिक मीडिया ने भी अन्ना की बातों को अधिक से अधिक जनता तक पहुंचाने में मदद की है। ऐसी सुविधा इससे पहले के किसी आंदोलनकारी नेता को नहीं मिली थी।

यानी जनता तो भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में शामिल होने के लिए हमेशा ही तैयार बैठी रहती है, बस उसे प्रतीक्षा रहती है कि प्रामाणिक नेता के आगे आने की। डा. लोहिया, जे.पी., वी.पी. और अन्ना हजारे ऐसे ही प्रामाणिक नेता साबित हुए या फिर अधिकतर जनता ने उन्हें ऐसा माना।

लोहिया की सप्त क्रांति और जेपी की संपूर्ण क्रांति के तो उंचे लक्ष्य रहे हैं। पर आम जनता में तो फिलहाल सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टाचार से तत्काल मुक्ति की छटपटाहट है। वैसे भी गैर सरकारी भ्रष्टाचार सरकारी भ्रष्टाचार से ही प्रेरित-पोषित है। कई लोगों का मानना है कि इस गरीब देश की अन्य अधिकतर समस्याएं भी भ्रष्टाचार से ही उपजी हैं। इसीलिए जब अन्ना हजारे जैसी हस्ती भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए जन लोकपाल विधेयक लेकर सामने आती है तो जनता उमड़ पड़ती है। अभी न तो किसी और अंादोलन से इस आंदोलन की तुलना करने का कोई मतलब है न ही किसी अन्य आंदोलन से इसे बड़ा या छोटा दिखाने का कोई औचित्य है।

किसी आंदोलन को पर्याप्त जन समर्थन वाला आंदोलन मान लिया जाना चाहिए जिस आंदोलन के जरिए सरकार झुक जाए या फिर कोई भ्रष्टाचार समर्थक सरकार चुनाव के जरिए सत्ता से हट जाए।

जेपी आंदोलन ने अंततः केंद्र की सत्ता से इंदिरा गांधी को बाहर कर दिया था। वी.पी. सिंह के अभियान ने भी राजीव गांधी को सत्ताच्युत कर दिया। अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रति कें्रद सरकार का जो रुख है, उससे फिलहाल तो यही लगता है कि सन 2014 के लोक सभा के चुनाव के बाद केंद्र में कांग्रेसी सरकार तो नहीं ही रह पाएगी। क्योंकि जन लोकपाल विधेयक को लेकर तब तक दोनों पक्षों में हुमचा-हुमची होती रहेगी और इसके साथ जनता का जागरण भी। पहले की तरह ही एक बार फिर जगह जगह नये नेता उभरेंगे। भ्रष्टाचार और उससे उपजे काला धन पर काबू पाने की जो समस्या है, उसको लेकर इस देश के अधिकतर दलों व नेताओं को भारी कठिनाई है।सबके अपने अपने भ्रष्टाचार हैं। कोई व्यक्ति हथकड़ी गढ़ने के लिए अपने ही पैसों से लुहार को आखिर ऑर्डर क्यों और कैसे दे देगा ? अन्ना यही चाहते हैं।

जनता तो तैयार दिख रही है, तय तो अन्ना हजारे और उनकी टीम को करना है।उनकी कल्पना का जन लोकपाल कानून पास हो सकता है,पर यह काम अगली लोक सभा ही शायद कर सकेगी। मौजूदा लोक सभा के अधिकतर सदस्य जन लोकपाल के लिए कत्तई तैयार नहीं है। इस मामले में स्वाभाविक है कि अधिकतर मौजूदा कांग्रेसी सांसदों की हालत बदतर है। पर गैर कांग्रेसी दलों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है।

निहितस्वार्थी लोग तो चीजों को मिलाकर गड्मगड कर दे रहे हैं । जिस तरह कभी कहा जा रहा था कि इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया। उसी तरह आज कुछ लोग कह रहे हैं कि सांसद और संसद एक ही हैं। यदि अन्ना हजारे के आंदोलन के गर्भ से जनहितकारी नेतागण 2014 के लोक सभा चुनाव में जीत कर संसद में चले जाएं तो संसद का स्वरूप आज जैसा नहीं रहेगा। फिर जन लोकपाल जैेसे विेधयक के पास होने मंे कोई दिक्कत नहीं होगी। ऐसा संभव भी है ,यदि उम्मीदवारों के चयन में जेपी और वी.पी.के अधूरे कामों को पूरा कर दिया जाए।

दरअसल जेपी और वी.पी. और उनके निस्वार्थी सहयोगियों ने क्रमशः 1977 और 1989 में चुन -चुन कर देशप्रेमियों को टिकट दिये हेाते तो उनकी मंशा विफल नहीं होती।

याद रहे कि ऐसे ग्यारह सांसदों को देशप्रेमी नहीं कहा जा सकता जिन्हें 2008 में खुद लोक सभा ने प्रस्ताव पास कर के सदन की सदस्यता से निकाला था।उन पर प्रश्न पूछने के लिए रिश्वत लेने का आरोप साबित हो चुका था।यह एक स्टिंग आपरेशन का नतीजा था।उस दृश्य को टी.वी. पर देश ने देखा था। 1996 के झामुमो सांसद रिश्वत कांड की तरह पैसे लेकर सरकार बचाने वाले सांसदों के खिलाफ बोलकर कोई व्यक्ति कानून बनाने के मामले में संसद की सर्वोच्चता को चुनौती नहीं दे रहा होता है।वैसे भी न तो संसद सर्वोच्च है और न ही संविधान बल्कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च और सार्वभौम है जो संासदों का भी चयन करती है और उसी के प्रतिनिधि संविधान भी बनाते हैं।

अन्य आंदोलनों से इस अन्ना आंदोलन की इस मामले में समानता है कि कभी कोई जब जब कोई भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाता है तो उसी पर उल्टे तरह -तरह के लांछन लगा दिये जाते हैं। मान लिया कि वे लांछित हैं,उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने का कोई हक नहीं है। तो फिर लांछन लगाने वाले ही क्योें नहीं ऐसा कानून बना देते जिससे जनता को सर्वव्यापी भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाए ? पर उल्टे प्रधान मंत्री कहते हैं कि मेरे पास भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए जादू की कोई छड़ी नहीं है।अन्ना के साथ जन सैलाब इसलिए भी उमड़ रहा है क्योंकि जनता यह देख रही है कि भले रोकने के लिए कोई छड़ी नहीं है, पर कोई दूसरी छड़ी उनके पास जरूर है जो तब तक टू जी स्पैक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला और आदर्श घोटाले जैसे घोटाले कराने की छूट देती रहती है जब तक सुप्रीम कोर्ट कदम नहीं उठाता है।

भ्रष्टाचार विरोधी महिम में आम जनता की भारी सहभागिता को देखकर उन कुतर्कियों को शर्म करनी चाहिए जो इन दिनों अक्सर यह कहा करते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उपर से नहीं बल्कि नीचे से कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि जनता भी वोट के लिए पैसे मांगती है और अपराधियों को भी वेाट दे देती है। जनता को भ्रष्ट और अपराधी तत्वों से लाभ मिल होता तो जनता आज उल्टे अन्ना के खिलाफ आंदोलन करती। राजनीति में घुसाये गये भ्रष्ट और अपराधी तत्व तो भ्रष्ट नेताओं के लिए कवच का काम करते हैं। इसलिए अन्ना हजारे के आंदोलन के रास्ते में अवरोधक हर जगह फैले निहितस्वार्थी तत्व हैं जिनकी संख्या कम है हालांकि वे शक्तिशाली हैं। अगले चुनाव में वे तिनके की तरह उड़ जाएंगे।

बुधवार, 17 अगस्त 2011

मामला सिर्फ अन्ना हजारे और सरकार के ही बीच का नहीं




सरकारांे और सत्ताधारी नेताओं ने इस देश में जब -जब ज्वलंत मुददों को दरकिनार करके उसके बदले मुददा उठाने वालों को ही अपना निशाना बनाया है,तब -तब अंततः सरकारों और दलों की हार ही हुई है।जेपी और वी.पी.सिंह के अभियानों के उदाहरण सामने हैं।पिछली गलतियों व अनुभवों को दरकिनार करके अब भी केंद्र सरकार भ्रष्टाचार के मुददे को नजरअंदाज करके अन्ना हजारे को ही निशाना बना रही है।देखना है कि इस दफा इस द्वंद्व की तार्किक परिणति क्या होती है !



यदि थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाए कि अन्ना के खिलाफ भी कुछ आरोप हैं।तो भी देशव्यापी भ्रष्टाचार का मुददा आज सिर्फ अन्ना टीम बनाम केंद्र सरकार के बीच का ही मामला तो नहीं है ।जन -जन को पीड़ित करने वाले सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचार का मुददा क्या मात्र स्वामी राम देव बनाम कांग्रेस के बीच का मामला है ? क्या यह साबित हो जाए कि आरोप लगाने वालों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप सही हैं तो देश में सर्व व्याप्त भ्रष्टाचार के विरोध का मुददा बेमतलब हो जाएगा ? कांग्रेस और केंद्र सरकार अन्ना-रामदेव को किसी तरह संतुष्ट कर भी दें तो भी एक कारगर लोकपाल की जरूरत समाप्त नहीं हो जाएगी ।



क्या कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी के नुकीले सवालों का उनके अनुसार संतोषप्रद जवाब अन्ना हजारे नहीं दे सकें तो आंदोलन टांय-टांय फिस्स हो जाएगा ? ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है।ताजा इतिहास भी यही बताता है।देश के जन मानस को देख कर लगता है कि किसी कारणवश अन्ना-राम देव के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दृश्य से अलग होने के बावजूद इस बार भी भ्रष्टाचार का मुददा शांत होने वाला नहीं है।यह मुददा किसी न किसी रूप में अपना रंग दिखा कर ही रहेगा।विभिन्न जनमत संग्रहों के नतीजे भी यही बताते हैं।



दरअसल इससे पहले भी कम से कम दो बार कांग्रेस पार्टी और सरकार ने भ्रष्टाचार केे मुददे को कुछ खास हस्तियों के बीच का ही मसला बनाने की विफल कोशिश की थी ।पर आम जनता ने इस मुददे को सही माना और बाद के आम चुनावों में कांग्रस को सबक सिखा ही दिया।ऐसा सन 1977 और सन 1989 में हो चुका है।पर लगता है कि कांग्रेस ने उन घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखा और एक बार फिर वह मुददों के बदले व्यक्तिगत प्रहारों पर उतर आई है।शनिवार को आयोजित कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी का हमलावर प्रेस कांफ्रंस इसका ताजा उदाहरण है।



एक तरफ अन्ना हजारे और स्वामी राम देव के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को देशव्यापी समर्थन मिल रहा है,दूसरी ओर केंद्र की कांग्रेस सरकार तथा पार्टी स्वामी राम देव और बाल कृष्ण को जेल भिजवाने और अन्ना को बदनाम करने का प्रयास कर रही है । सावंत आयोग की अन्ना विरोधी टिप्पणियां दिखाकर अन्ना से नैतिक सवाल कांग्रेस पूछ रही है।



दूसरी ओर आम जनता का एक बड़ा वर्ग यह चाहता है कि चाहे अन्ना हों या रामदेव ,जिस किसी पर भ्रष्टाचार के आरोप साबित हो जाएं ,उन्हें कानून की गिरफत में ले लिया जाए।पर यह कार्रवाई सिर्फ अन्ना-रामदेव तक ही सीमित नहीं रहे।यदि आज अन्ना-राम देव भ्रष्टाचार के आरोपमें जेल जाते भी हैं तो कोई अन्य नेता भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का नेतृत्व संभाल लेगा।पर किसी भी स्थिति में यह आंदोलन रुकने वाला नहीं है।इसका असर उससे पहले न भी दिखाई दे तो भी सन 2014 के लेाक सभा चुनाव में तो दिखाई पड़ ही जाएगा।तब तक जनता को यह स्पष्ट हो जाएगा कि भ्रष्टाचार के पक्ष में आखिर कौन खड़ा है और कौन खिलाफ में है।



an 1974 में जब जेपी ने बिहार में आंदोलन शुरू किया था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भुवनेश्वर की एक जन सभा में कहा कि ‘जो लोग पैसे वाले से मदद लेते हैं और उनसे रिश्ता जोड़े रहते हैं ,वे कैसे भ्रष्टाचार के बारे में बोलने का दुस्साहस करते हैं ?’गुजरात और बिहार की कुछ हिंसक वारदातों की चर्चा करते हुए उसके लिए प्रकारांतर से जय प्रकाश नारायण को जिम्मेदार ठहराते हुए इंदिरा गांधी ने यह भी कहा था कि ये लोग अबोध युवकों को राष्ट्रीय संपत्ति के विनाशके लिए उकसा रहे हैं।



जेपी एक तरफ राजनीति में एकाधिकारवाद और सरकार में ंभ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे थे और दूसरी ओर इंदिरा जी जेपी पर उसी तरह के आरेाप लगा रही थीं जिस तरह कांग्रेस की तरफ से आज मनीष तिवारी और सरकार की तरफ से कपिल सिब्बल अन्ना-रामदेव पर प्रति - आरोप लगा रहे हैं।क्या प्रति-आरोप से इंदिरा गांधी सन 1977 के चुनाव में पराजय से अपनी पार्टी को बचा पाईं ? क्या प्रति-आरोप में ं जनताने कोई दम पाया था ?



इसी तरह का प्रति -आरोप कांग्रेस के कुछ लेागों ने अस्सी के दशक में वी.पी.सिंह के पुत्र अजेय सिंह के नाम सेंट कींटस में फर्जी बैंक खाता खोल कर लगाया था। पर बोफर्स तोप सौदे के आरोप की पृष्ठभूमि में 1989 के लोक सभा चुनाव में राजीव गांधी की सरकार सत्ता से बाहर हो गई। तब भी अधिकतर जनता ने यह माना कि बोफर्स घोटाले पर राजीव गांधी की सफाई सही नहीं थी।भले शंकरानंद के नेतृत्व वाली जेपीसी और सी.बी.आई.ने बोफर्स के दलालों को साफ बचा लिया हो,पर केंद्रीय आयकर न्यायाधिकरण ने हाल में यानी इसी साल यह कह ही दिया कि क्वोत्रोची और एक अन्य व्यापारी ने बोफर्स दलाली के पैसों को स्विस बैंक की लंदन स्थित शाखा के अपने खातों में जमा किया था।



लगता है कि हाल के इतिहास से भी कुछ नहीं सीखने की कांग्रेस पार्टी और उसकी सरकार ने कसम खा ली है। अन्ना हजारे और स्वामी राम देव के आंदोलन में लग रहे पैसों पर सवाल उठाते हुए मनीष तिवारी कहते हैं कि ये पैसे कहां से आ रहे हैं,यह किसी को मालूम नहीं है।खोजी पत्रकारिता की इसमंे ंजरूरत है।



सन 1974 में ऐसे सवालों का जवाब जय प्रकाश ने इंदिरा गांधी को दिया था।जेपी ने तब एक प्रेस बयान में कहा था कि यदि इंदिरा जी के मापदंड को मापा जाए तो महात्मा गांधी ही सबसे भ्रष्ट व्यक्ति माने जाएंगे।क्योंकि गांधी के सभी सहयोगियों का पोषण उनके धनी प्रशंसकों द्वारा किया जाता था।जेपी ने इस पर यह भी कहा था कि मुझे आश्चर्य है कि कब तक इस देश के लोग अपने उच्चपदस्थ और शक्तिशाली व्यक्तियों के ऐसे उटपटांग बकवासों को सहन करते रहेंगे ?



याद रहे कि 1977 के चुनाव नतीजों ने बता दिया था कि जनता ऐसे उटपटांग बयानों को अंततः मौका मिलने पर सहन नहीं किया करती जिस तरह की बातें कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी आज कर रहे हैं। केंद्र सरकार और कांग्रेस को भ्रष्टाचार के आरोप के सबूत मिलते ही अन्ना और स्वामी को जेल भिजवाना चाहिए ।पर लगता है कि कांग्रेस और उनकी सरकार अन्ना -स्वामी राम देव से यह उम्मीद करती है कि तुम हमारे भ्रष्टाचार को सहन करो और हम तुम्हारे भ्रष्टाचार को नजरअंदाज कर रहे हैं।अन्यथा हम तुम्हंे नैतिक रूपसे कमजोर करके तुम्हारे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की हवा निकाल देंगे।यदि ऐसा ही संभव होता तो जेपी से जुड़े संगठनों के खिलाफ भ्रष्टाचार के कथित आरोपों की कुदाल आयोग से जांच करवा कर सन 1977 में चुनावी पराजय से इंदिरा सरकार बच जाती।दरअसल सबसे बड़ी बात यह है कि भ्रष्टाचार का सवाल आज सिर्फ नैतिकता का सवाल ही नहीं है,बल्कि रोजी-रोटी और राष्ट्र की सुरक्षा का भी सवाल है। यह सिर्फ कुछ परस्पर विरोधी हस्तियों के बीच का ही मामला कत्तई नहीं है। जो ऐसा मानेगा ,वह सन 2014 में सन 1977 और सन 1989 दोहराने को तैयार रहे।




साभार जनसत्ता)

















रविवार, 20 मार्च 2011

बाबा राम देव पर डोरे डालने से पहले भाजपा अपनी पिछली गलतियों के लिए देश से माफी भी मांगे

केंद्र की सत्ता करीब आती देख भाजपा बाबा राम देव पर राजनीतिक डोरे डाल रही है। कांग्रेस को परेशानी में देख कर भाजपा समझ रही है कि ‘मेरी कमीज से तेरी कमीज यानी कांग्रेस की कमीज जब अधिक गंदी’ हो ही चुकी है, तो अगले चुनाव में कांग्रेस की सफलता संदिग्ध है। इसलिए भाजपा की समझ यह है कि यदि लोगों में लोकप्रियता पा रहे स्वामी रामदेव की थोड़ी मनुहार कर ली जाए तो एक बार फिर केंद्र की सत्ता उसे मिल सकती है। दिल्ली से आ रही खबरों के अनुसार हिमाचल के पूर्व मुख्य मंत्री शांता कुमार स्वामी राम देव के संपर्क में हैं। स्वामी राम देव की हाल की दिल्ली रैली में भाजपा सांसद बलवीर पुंज भी हाजिर थे।



पर क्या इतने ही से भाजपा का काम चल जाएगा ? राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार कत्तई नहीं। दरअसल एक बार फिर केंद्र की सत्ता पाने के लिए भाजपा को देश के सामने अपनी पिछली गलतियों के लिए माफी मांगनी चाहिए। सी.वी.सी. के रूप में विवादास्पद पी.जे. थाॅमस की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय के बाद खुद प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह ने भी अपनी जिम्मेदारी यानी गलती सार्वजनिक रूप से मानी है। यानी जिस गलती पर कोई सफाई नहीं दी जानी सकती, उसे स्वीकार करके जनता से माफी मांग लेने में ही नेताओं व दलों की अब भलाई है।भ्रष्टाचार व अपराधीकरण को लेकर अब जनता को कोई दल व नेता मूर्ख नहीं बना सकता ।


प्रायश्चित करने और रोने के लिए एक स्वामी के कंधे से बढ़िया भाजपा के लिए बेहतर स्थान और क्या हो सकता है ? याद रहे अब तक के संकेत यही है कि स्वामी राम देव को खुद अपने लिए सत्ता नहीं चाहिए।पर वैसे लोगों से ईमानदारी का विश्वास मिलना चाहिए जिन्हें लेकर रामदेव चलना चाहते हैं।बड़ा वह होता है जो अपनी गलतियां स्वीकार करके आगे उसे नहीं दुहराने का संकल्प करता है।राजनीति व दूसरे क्षेत्रों के घटिया लोग अपनी गलतियों व विफलताओं के लिए किसी और को ही कोसते रहते हैं।ऐसे लोग इतिहास के कूड़ेदान में एक दिन नजर आते हैं।


अनेक घोटालों की खबरों के बीच केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार दिनानुदिन ढीली पड़ती जा रही है और नैतिक दष्टि से प्रभावकारी सिविल सोसायटी में भी बढ़ते रोष की झलक सड़कों पर भी अब देखी जा रही है। भाजपा को आज यह लग रहा है कि इसका राजनीतिक व चुनावी लाभ अंततः उसे ही मिलेगा। शायद मिले भी। जेपी आंदोलन का भी चुनावी लाभ राजनीतिक दलों को ही मिला था।सन 1974 में शुरू हुआ जेपी का आंदोलन भी गैर दलीय ही था।पर जब क्रूर शासन की मार पड़ी तो गैर दलीय तत्व कमजोर पड़ने लगे।फिर तपे-तपाये दलीय नेताओं ने मार खाने व कष्ट सहने के लिए अपने कंधे आगे कर दिये थे।स्वामी रामदेव को भी इस उदाहरण को अपने सामने रख कर ही कोई निर्णायक राजनीतिक पहलकदमी करनी चाहिए। हां,उन्हें राजनीतिक दलों से सुधरने का वादा भी ले लेना चाहिए।


सन 1998 से 2004 के बीच के शासन काल में तथा उससे पहले भी भाजपा व उसके सहयोगी दलों ने भ्रष्टाचार व राजनीति के अपराधीकरण और कानून तोड़कों के खिलाफ काफी नरमी दिखाई थी ।सन 1997 में भाजपा के केंद्रीय नेतत्व ने यू.पी. के कल्याण सिंह मंत्रिमंडल में उस प्रदेश के लगभग सभी उन खूंखार अपराधियों व माफियाओं को शामिल कर लिया था जो विधायक थे।


भाजपा ने केंद्र में 1998 से 2004 तक लगातार छह साल तक शासन किया,पर उसने यह साबित कर दिया कि भ्रष्टाचार के मामले में भी वहं कांग्रेस से वह बिलकुल अलग नहीं है।नतीजतन सन 2004 के लोक सभा चुनाव में उसके वोट बैंक में इतना अधिक इजाफा नहीं हो सका था कि वह संकट में काम आ जाता।


घटनाएं बताती हैं कि भाजपा की चिंता का मुख्य विषय भीषण सरकारी भ्रष्टाचार व राजनीति का घोर अपराधीकरण नहीं है बल्कि अब भी भावनात्मक मुद्दे ही हैं। भावनात्मक मुद्दे ही अब भी उसके मर्म स्थल को बंेधते हैं।बदलती स्थिति में इस दल के भविष्य के लिए इसे अच्छा नहीं माना जा रहा है।क्योंकि भीषण सरकारी भ्रष्टाचार व अन्य तरह की शासनहीनता के खिलाफ जिस तरह अब इस देश के उच्चस्तरीय गैर राजनीतिक हलकों में भी गुस्सा व असंतोष बढ़ता जा रहा है कि सन 2014 में बनने वाली कोई भी अगली सरकार इसी तरह से देश को नहीं चला सकेगी जिस तरह आज सोनिया-मन मोहन की जोड़ी मजबूरी में या फिर लापारवाहीपूर्वक चला रही है।यही भाजपा सन 1998 से पहले जब केंद्र में प्रतिपक्ष में थी तो वह भ्रष्टाचार व अपराधीकरण पर काफी हो हल्ला करती रही थी।पर वह 1998 में सरकार में आने के बाद इन दो मुद्दों पर समझौतावादी ही साबित हुई।अब ऐसी गलती की पुनरावति यह देश सहन नहीं करेगा।


क्या भाजपाका केंद्रीय नेतृत्व अब भी बिहार की नीतीश सरकार की जिसमें भाजपा भी एक मजबूत सहयोगी है,राजनीतिक उपलब्धियों से भी कोई सबक नहीं लेगा जिसने भ्रष्टाचार व अपराधीकरण के खिलाफ .भरसक बेलाग कार्रवाइयां करके अपना जन समर्थन काफी बढ़ा लिया है।नीतीश सरकार ने बिहार में कोई सांप्रदायिक या फिर जातीय भावना उभार कर वोट नहीं लिया।बल्कि उसने अपराध व भ्रष्टाचार के खिलाफ हमले की ईमानदार कोशिश करके अपना जन समर्थन बढ़ाया।बिहार सहित पूरे देश की सबसे बड़ी समस्या भीषण सरकारी भ्रष्टाचार ही है।


इन दो समस्याओं पर कठोर रुख अपनाने के बदले अन्य भावनात्मक मुददे भाजपा उठाती रही।ऐसा नहीं कि बिहार में कोई स्वर्ग आ गया है।पर नीतीश कुमार ने अपने करीब पांच साल के क्रियाकलापों से जनता को यह जरूर विश्वास दिला दिया है कि वे भ्रष्टाचार व अपराध से कोई समझौता ं करने को तैयार नहीं हैं।क्या कर्नाटका की यदुरप्पा सरकार को लेकर भाजपा कोई ऐसा ही कदम नहीं उठा सकती ?


पर भाजपा ने अब तक अपने सत्ता काल में बार- बार यह साबित किया कि उसके लिए भ्रष्टाचार व अपराधीकरण ‘मर्मस्थल मुद्दे’ नहीं हैं। अपराधीकरण व भ्रष्टीकरण को लेकर यदि भाजपा ने किसी नेता के खिलाफ वैसी ही सख्त कार्रवाई की होती जैसी कार्रवाई उसने जसवंत सिंह के खिलाफ एक बार की थी तो आज भाजपा पर न तो यह आरोप लगता और न उसे लगातार दो लोक सभा चुनाव हारना पड़ता।उसे चुनाव दृश्य से अटल बिहारी वाजपेयी की अनुपस्थिति और दूसरी तरफ राहुल गांधी यानी नेहरू खानदान के एक सदस्य राहुल गांधी की मजबूत उपस्थिति का जितना चुनावी नुकसान हुआ,उसकी क्षतिपूत्र्ति भी हो गई होती।


अटल सरकार के समय भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को घूस लेते हुए कैमरे पर दिखाया गया था।इसके बावजूद बंगारू की पत्नी को भाजपा ने लोक सभा का चुनावी टिकट दे दिया था । जन विश्वास हासिल करने के लिए जरूरी है कि इन गलतियों के लिए भाजपा देश से माफी मांगे।


इतना ही नहीं । याद कीजिए सन् 2000 की वह घटना जब केंद्रीय सतर्कता आयुक्त एन बिट्ठल ने अटल सरकार के चार मंत्रियों की संपत्ति की जांच करने का निदेश सी.बी.आई.को दिया था।वे चारों चर्चित हवाला घोटाले के अभियुकत रह चुके थे।पर सुप्रीम कोर्ट ने ं कहा था कि सी.बी.आई.ने हवाला घोटाले की ठीक से जांच ही नहीं की।पर इसके विपरीत अटल सरकार ने आरोपितों केा बचाने के लिए सतर्कता आयोग को एक सदस्यीय की जगह तीन सदस्यीय बना दिया ताकि किसी अगले एन.बिटठल को भी किसी मंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं हो।क्या यह गलती हाल में पी.जे.थामस को सी.वी.सी बनाने की कांग्रेसी सरकार की गलती से कम थी ? क्या यह गलती माफी मांगने योग्य नहीं है ?


एक और गलत काम अटल सरकार ने तब किया जब सुप्रीम कोर्ट ने 2 मई 2002 को चुनाव आयोग से कहा कि वह उम्मीदवारों के बारे में दिशा निदेश जारी करे। दिशा निदेश यह कि उम्मीदवार अपने शपथ पत्र के साथ संपत्ति,आपराधिक रिकाॅर्ड व शैक्षणिक योग्यता का विवरण दंे।अटल सरकार ने इस निदेश को विफल करने के लिए जन प्रतिनिधित्व कानून में ही संशोधन कराने के लिए अध्यादेश जारी करा दिया।पर भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने इस संशोधन को ही रद कर दिया।


( 9 मार्च 2011 को प्रभात खबर पटना में प्रकाशित )

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

1998 से 2004 तक की अपनी गलतियों के लिए देश से पहले माफी क्यों नहीं मांग लेती भाजपा ?

भाजपा का इन दिनों हौसला बढ़ा हुआ है। अनेक घोटालों की खबरों के बीच केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार ढीली पड़ती जा रही है और नैतिक दष्टि से प्रभावकारी सिविल सोसायटी में भी बढ़ते रोष की झलक सड़कों पर भी अब देखी जा रही है। भाजपा को आज यह लग रहा है कि इसका राजनीतिक व चुनावी लाभ अंततः उसे ही मिलेगा। शायद मिले भी। जेपी आंदोलन का भी चुनावी लाभ राजनीतिक दलों को ही मिला था।



पर इस तरह का कोई लाभ प्राप्त करने की कोशिश से पहले भाजपा अपने पिछले शासन काल की अपनी गलतियों के लिए देश से माफी क्यों नहीं मांग लेती ? माफी नहीं मांगने के साथ-साथ उसे मतदाताओं से यह भी वायदा करना चाहिए कि दुबारा सत्ता में आने के बाद वह गलतियां नहीं दुहराएगी। यदि भाजपा ऐसा नहीं करती तो भले लोक सभा के अगले चुनाव में उसे एक बार फिर केंद्र की सत्ता मिल जाए, पर जन मानस पर उसकी नैतिक धाक नहीं जम सकती।


याद रहे कि 1998 से 2004 के बीच के शासन काल में तथा उससे पहले भी भाजपा व उसके सहयोगी दलों ने भ्रष्टाचार व राजनीति के अपराधीकरण और कानून तोड़कों के खिलाफ नरमी दिखाई थी और इसका खामियाजा उसे आज भी भुगतना पड़ रहा है।सन 1997 में भाजपा के केंद्रीय नेतत्व ने यू.पी. के कल्याण सिंह मंत्रिमंडल में उस प्रदेश के लगभग सभी उन खूंखार अपराधियों व माफियाओं को शामिल कर लिया था जो विधायक थे। किसी भी कीमत पर सत्ता में बने रहने के लिए ही भाजपा ने तब वैसा किया था। इस मुददे पर पूछे जाने पर एक बड़े भाजपा ने तब लखनउ में मीडिया से कहा था कि जनता ने उन्हें विधायक बना दिया था। हमने तो उन्हें सिर्फ मंत्री बनाया।


बिहार में जिस तरह इन दिनों सरकारी व राजनीतिक प्रयासों से धीरे -धीरे राजनीति से खूंखार अपराधियों व माफियाओं का असर कम किया जा रहा है ,उससे यह साफ है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति बलवती हो तो यह काम देश के अन्य हिस्सों में भी संभव है।भाजपा को देश से यह वायदा करना चाहिए कि वह राजनीति के अपराधीकरण को कम करने के लिए गंभीर प्रयास करेगी,जब वह केंद्र में एक बार फिर सत्ता में आएगी। पर जनता उसके इस वायदे पर भरोसा तब तक नहीं करेगी जब तक भाजपा उत्तर प्रदेश प्रकरण के लिए देश से माफी नहीं मांग लेती।


इस देश की ं कम्युनिस्ट पार्टी सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध करने की अपनी गलती के लिए देश से माफी मांग चुकी है।ऐसे कुछ अन्य उदाहरण भी मौजूद हैं।


भाजपा ने केंद्र में 1998 से 2004 तक लगातार छह साल तक शासन किया,पर उसने यह साबित कर दिया कि भ्रष्टाचार के मामले में भी वहं कांग्रेस से वह बिलकुल अलग नहीं है।नतीजतन सन 2004 के लोक सभा चुनाव में उसके वोट बैंक में इतना अधिक इजाफा नहीं हो सका था कि वह संकट में काम आ जाता। यहां तक कि भाजपा 2009 में अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक दृश्य से ओझल होने का झटका भी बर्दास्त नहीं कर सकी। याद रहे कि यह झटका मात्र तीन प्रतिशत मतों का ही था।याद रहे कि वाजपेयी की अनुपस्थिति और नेहरू-इंदिरा परिवार के राहुल गांधी की दमदार उपस्थिति के कारण भाजपा के करीब तीन प्रतिशत वोट कांग्रेस की तरफ चले गये और कांग्रेस दुबारा सत्ता में आ गई।


दूसरी ओर, नीतीश कुमार की राजनीतिक व प्रशासनिक शैली अपना कर बिहार भाजपा ने बिहार विधान सभा के हाल के चुनाव में भी अपना वोट बढ़ाया और सीटें भी। 2005 के बाद के बिहार के अन्य चुनाव नतीजे भी इसके सबूत हैं।हालांकि बिहार की शैली यानी नीतीश कुमार की शैली।पर सरकार में रहकर उसको समर्थन देने का लाभ जदयू के साथ -साथ भाजपा को भी मिल रहा है।नीतीश शैली का मतलब है भ्रष्टाचार व राजनीति के अपराधीकरण पर जोरदार सरकारी हमला।क्या भाजपा का केंद्रीय नेतत्व अपनी बिहार शाखाके नेताओं की शासन शैली से कुछ सीख सकेगी ?


घटनाएं बताती हैं कि भाजपा की चिंता का मुख्य विषय भीषण सरकारी भ्रष्टाचार व राजनीति का घोर अपराधीकरण नहीं है बल्कि अब भी भावनात्मक मुद्दे ही हैं। भावनात्मक मुद्दे ही अब भी उसके मर्म स्थल को बंेधते हैं।बदलती स्थिति में इस दल के भविष्य के लिए इसे अच्छा नहीं माना जा रहा है।क्योंकि भीषण सरकारी भ्रष्टाचार व अन्य तरह की शासनहीनता के खिलाफ जिस तरह अब इस देश के उच्चस्तरीय गैर राजनीतिक हलकों में भी गुस्सा व असंतोष बढ़ता जा रहा है कि सन 2014 में बनने वाली कोई भी
अगली सरकार इसी तरह से देश को नहीं चला सकेगी जिस तरह आज सोनिया-मन मोहन की जोड़ी लापारवाहीपूर्वक चला रही है।अब इस देश के बड़े बड़े उदयोगपति भी सरकार से सार्वजनिक रूप से यह अपील कर रहे हैं कि वह भ्रष्टाचार पर काबू पाए। इसी 30 जनवरी को सामाजिक संगठनों के आहवान पर देश के साठ शहरों में भ्रष्टाचार के खिलाफ रैलियां की गईं।इस अभियान का विस्तार हो सकता है।भाजपा को इस बदली स्थिति से
सबक लेनी चाहिए।याद रहे कि भाजपा 1998 से पहले जब केंद्र में प्रतिपक्ष में थी तो वह भ्रष्टाचार व अपराधीकरण पर काफी हो हल्ला करती रही थी।पर वह 1998 में सरकार में आने के बाद इन दो मुद्दों पर समझौतावादी ही साबित हुई।अब ऐसी गलती देश सहन नहीं करेगा।


क्या भाजपाका केंद्रीय नेतृत्व अब भी बिहार की नीतीश सरकार की जिसमें भाजपा भी एक मजबूत सहयोगी है,राजनीतिक उपलब्धियों से भी कोई सबक नहीं लेगा जिसने भ्रष्टाचार व अपराधीकरण के खिलाफ .भरसक बेलाग कार्रवाइयां करके अपना जन समर्थन काफी बढ़ा लिया है।नीतीश सरकार ने बिहार में कोई सांप्रदायिक या फिर जातीय भावना उभार कर वोट नहीं लिया।बल्कि उसने अपराध व भ्रष्टाचार के खिलाफ हमले की ईमानदार कोशिश करके अपना जन समर्थन बढ़ाया।बिहार सहित पूरे देश की सबसे बड़ी समस्या भीषण सरकारी भ्रष्टाचार ही है। उत्तर भारत के अनेक प्रांतों की दूसरी गंभीर समस्या राजनीति का अपराधीकरण व अपराध का राजनीतिकरण है।यदि केंद्र की अटल सरकार ने अपने छह साल के शासन काल में इन दो मुद्दों पर बेलाग फैसले किए होते तो राजग अटल बिहारी वाजपेयी की चुनावी दृश्य से अनुपस्थिति से इस बार हुई क्षति की भी पूत्र्ति कर लेता। सन् 2004 के चुनाव में तो राजग की पराजय का मुख्य कारण फीलगुड के अहंकार में आकर उसके द्वारा अपने पुराने घटक दलों को तिरस्कृत करना था।तिरस्कृत दलों में लोजपा व द्रमुक शामिल थे।


इन दो समस्याओं पर कठोर रुख अपनाने के बदले जिन्ना बनाम सरदार पटेल के भावनात्मक मुद्दे को लेकर जसवंत सिंह को दल से निकालना भाजपा का दिमागी दिवालियापन ही नजर आया । अब राम मंदिर विवाद जब उसे चुनाव में काम नहीं आ रहा है तो सरदार पटेल भाजपा को अगले चुनाव में कितना काम आएंगे ? हां,भ्रष्टाचार व अपराधीकरण पर निर्मम प्रहार जरूर काम आ सकता है।क्योंकि इन समस्याओं से समाज का हर वर्ग पीड़ित है।बिहार में इनका विरोध काम आ भी रहा है।याद रहे कि अपराध व भ्रष्टाचार के कारण देश का विकास बाधित है।यह बात अब अनेक लोग कहने लगे हैं।सरकारी धन आम जनता तक नहीं पहंुच पा रहा है।ऐसा नहीं कि बिहार में कोई स्वर्ग आ गया है।पर नीतीश कुमार ने अपने करीब पांच साल के क्रियाकलापों से जनता को यह जरूर विश्वास दिला दिया है कि वे भ्रष्टाचार व अपराध से कोई समझौता ं करने को तैयार नहीं हैं।क्या कर्नाटका की यदुरप्पा सरकार को लेकर भाजपा कोई ऐसा ही कदम नहीं उठा सकती ?


पर भाजपा ने अब तक अपने सत्ता काल में बार- बार यह साबित किया कि उसके लिए भ्रष्टाचार व अपराधीकरण ‘मर्मस्थल मुद्दे’ नहीं हैं। अपराधीकरण व भ्रष्टीकरण को लेकर यदि भाजपा ने किसी नेता के खिलाफ वैसी ही सख्त कार्रवाई की होती जैसी कार्रवाई उसने जसवंत सिंह के खिलाफ एक बार की थी तो आज भाजपा पर न तो यह आरोप लगता और न उसे लगातार दो लोक सभा चुनाव हारना पड़ता।उसे चुनाव दृश्य से अटल बिहारी वाजपेयी की अनुपस्थिति और दूसरी तरफ राहुल गांधी की मजबूत उपस्थिति का जितना चुनावी नुकसान हुआ,उसकी क्षतिपूत्र्ति भी हो गई होती।




भाजपा के लिए लाल चैक पर तिरंगा फहराना जरूरी लगता है,पर उसे यदुरप्पा पर कार्रवाई करना सही नहीं लगता।भाजपा के लिए सांप्रदायिक मुद्दे या फिर विभिन्न पक्षों में भावनाएं उभारने वाले मुददे और कुछ मंडलवादी दलों के लिए जातीय मुद्दे ही अब भी आसान लगते हैं।पर अब ये चुनावी हथियार कुंद होते जा रहे हैं।राजनीतिक स्थिति बदल रही है।इस बीच केंद्र की कांग्रेस नीत सरकार ने भ्रष्टाचार व कानूनी अराजकता के मामले में इतनी अधिक लापारवाहियां की हैं कि अब जनता का गुस्सा उबाल के बिंदु तक पहुंच रहा है और किसी नई सत्ताधारी जमात द्वारा की जाने वाली रफफूगिरी से भी काम नहीं चलने वाला है।


अटल सरकार के समय बंगारू लक्ष्मण को घूस लेते हुए कैमरे पर दिखाया गया था।दूसरी ओर एक मंत्री दिलीप सिंह जूदेव को लोगों ंने यह कहते हुए टी.वी.पर देखा था कि ‘पैसा खुदा तो नहीं,पर खुदा कसम , खुदा से कम भी नहीं।’इसके बावजूद बंगारू की पत्नी को भाजपा ने लोक सभा का चुनावी टिकट दे दिया था और दिलीप सिंह जूं देव के खिलाफ कोई कार्रवाई भी हुई,यह मालूम नहीं। जन विश्वास हासिल करने के लिए जरूरी है कि इन गलतियों के लिए भाजपा देश से माफी मांगे।


इतना ही नहीं । याद कीजिए सन् 2000 की वह घटना जब केंद्रीय सतर्कता आयुक्त एन बिट्ठल ने अटल सरकार के चार मंत्रियों की संपत्ति की जांच करने का निदेश सी.बी.आई.को दिया था।वे चारों चर्चित हवाला घोटाले के अभियुकत रह चुके थे।इन में से दो भाजपा के थे।बाद में हवाला कांड में वे बरी जरूर हो गये थे,पर सुप्रीम कोर्ट ने ं कहा था कि सी.बी.आई.ने हवाला घोटाले की ठीक से जांच ही नहीं की।यदि भाजपा ने अपने उन दो मंत्रियों पर सख्त कार्रवाई की हेाती तो जनता का उसमें विश्वास बढ़ता और भाजपा को 2004 में सत्ता से बाहर नहीं होना पड़ता।पर इसके विपरीत अटल सरकार ने आरोपितों केा बचाने के लिए सतर्कता आयोग को एक सदस्यीय की जगह तीन सदस्यीय बना दिया ताकि किसी अगले एन.बिटठल को भी किसी मंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं हो।क्या यह गलती हाल में पी.जे.थामस को सी.वी.सी बनाने की कांग्रेसी सरकार की गलती से कम थी ? क्या यह गलती माफी मांगने योग्य नहीं है ?



एक और गलत काम अटल सरकार ने तब किया जब सुप्रीम कोर्ट ने 2 मई 2002 को चुनाव आयोग से कहा कि वह उम्मीदवारों के बारे में दिशा निदेश जारी करे।दिशा निदेश यह कि उम्मीदवार अपने शपथ पत्र के साथ संपत्ति,आपराधिक रिकाॅर्ड व शैक्षणिक योग्यता का विवरण दंे।अटल सरकार ने इस निदेश को विफल करने के लिए जन प्रतिनिधित्व कानून में ही संशोधन कराने के लिए अध्यादेश जारी करा दिया।पर भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने इस संशोधन को ही रद कर दिया।नतीजतन आज हम उम्मीदवारों के जो विवरण हासिल कर लेते हैं,वह भाजपा की इच्छा के विरूद्ध ही हासिल कर पाते हैं।क्या भाजपा ने इस के लिए कभी देश के सामने अफसोस जाहिर किया ?


यानी कांग्रेस के बदले केंद्र सरकार की गददी पर बैठने का हौसला बांधने वाली भाजपा पहले खुद को पार्टी विथ अ डिफरेंस तो साबित करें।


ऐसा करने पर किसी भी दल को राजनीतिक व चुनावी लाभ मिलेगा,भाजपा तो एक बड़ी पार्टी है।बिहार का ताजा इतिहास इस बात का सबूत देश के सामने पेश कर रहा है।भाजपा अब भी पार्टी विथ अ डिफेंस होती तो आर.एस.एस.के प्रधान मोहन भागवत को गत साल यह सलाह नहीं देना पड़ती कि ‘भाजपा खुद को एक बार फिर ‘पार्टी विथ अ डिफरेंस’ के तौर पर पेश करे।’


(1 फरवरी, 2011 को जनसत्ता में प्रकाशित)

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

बिहार ऐसे पा रहा है नक्सली समस्या पर काबू

देश की नक्सली समस्या और उसके समाधान के उपायों को समझने के लिए यहां प्रस्तुत एक आंकड़ा महत्वपूर्ण है। सन 2004 से 2008 तक पूरे देश मंे नक्सली हिंसा में हर साल औसतन करीब 500 नागरिक मारे गये। सन 2009 में यह संख्या बढ़ कर 591 हो गई। इस साल के जून तक 325 नागरिक मारे जा चुके हैं। दूसरी ओर, बिहार में नक्सली हिंसा में 2001 से 2004 तक कुल 668 लोग मारे गये थे। पर सन 2006 से 2009 तक नक्सली हिंसा में मृतकों की संख्या घटकर 160 रह गई। ऐसा आखिर कैसे और क्यों हुआ ? आखिर क्यों बिहार में नक्सलियों की मारक क्षमता घट रही है जबकि देश के कई अन्य हिस्सों में बढ़ रही है ? जबकि पांच -छह साल पहले बिहार में नक्सली बनाम निजी सेनाओं द्वारा जारी हिंसा-प्रतिहिंसा में आए दिन बड़े- बड़े नरसंहार होते रहते थे। बिहार के कुछ जघन्य व चर्चित नरसंहारों के स्थलों के नाम तो पूरे देश के अखबार पढ़ने वालों को संभवतः याद भी हो गये होंगे। दलेल चक बघौरा, बारा, सेनारी, मियांपुर, अरवल, लक्ष्मणपुर बाथे जैसे स्थानों के नाम अब बीते दिनों के दुःस्वप्न ही रह गये हैं जहां गत दो -तीन दशकों में बड़े -बड़े नरसंहार हुए थे। उन प्रत्येक नरसंहार में मृतकों की संख्या दर्जनों में थी। यह संयोग या दैव योग नहीं है कि बिहार मंे नक्सलियों की मारक क्षमता गत चार पांच साल में काफी घटी है। इसके लिए राज्य सरकार ने संगठित उपाय किए हैं। यदि ऐेसे ही उपाय अन्य नक्सल पीड़ित प्रदेश करें तो वहां भी बिहार जैसी सफलता मिल सकती है। बिहार में भी अभी पूरी सफलता नहीं मिली है। पूरी सफलता के लिए केंद्र सरकार को राजनीति से उपर उठकर बिहार को भरपूर आर्थिक मदद करनी होगी। साथ ही, बिहार शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार के स्तर को कड़ाई से घटाना होगा ताकि विकास व कल्याण योजनाओं के लाभ गरीबों को मिल सकें। दरअसल बिहार में नीतीश सरकार ने 2005 में सत्ता संभालने के साथ ही नक्सली समस्या पर काबू पाने के लिए समेकित उपाय शुरू कर दिए थे। राज्य सरकार ने अपने ही प्रदेश के पुराने अनुभवों का भी लाभ उठाया। राज्य सरकार ने यह बात अच्छी तरह समझ ली है कि सिर्फ पुलिसिया कार्रवाइयों से इस पर काबू नहीं पाया जा सकता है। जानकार सूत्रों के अनुसार राज्य सरकार ने नक्सली आंदोलन से जुड़े विभिन्न प्रकार के तत्वों की पहचान करके उनके अनुकूल उपाय किए तभी जाकर नक्सलियों की मारक क्षमता घटी। दरअसल नक्सली समस्या के पांच प्रमुख तत्व व कारक हैं। पहला तत्व है मार्क्सवादी -लेनिनवादी-माओवादी विचारों से लैस वे थोड़े से लोग जिन्हें काबू में लाना काफी मुश्किल काम है। हां, उन्हें आम लोगों से अलग -थलग जरूर किया जा सकता है। ऐसे लोगों की मूल ताकत वे गरीब व उपेक्षित लोग ही हैं जिन्हें सरकारों ने भगवान भरोसे उनके हाल पर छोड़ रखा है। आजादी का कोई लाभ उन्हें अब तक नहीं मिला है। जहां लाभ मिलने लगा है, वहां स्थिति बदल रही है। यह दूसरा तत्व है। किसी भी सरकार के लिए यह एक बड़ी समस्या है कि किस तरह समावेशी विकास करके इन गरीबों को माओवादी विचारकों व कार्यकर्ताओं की गिरफ्त से अलग किया जाए। इस आंदोलन में एक तीसरे प्रकार के लोग भी हैं जो यह समझते हैं कि किसी भी तरह की जघन्य हिंसा कर देने के बावजूद कानून के हाथ उन तक नहीं पहुंचेंगे। जमीन को लेकर जारी विवादों के कारण भी नक्सली मजबूत हुए हैं। यह चौथा तत्व व कारक है। पांचवां तत्व है भीषण सरकारी भ्रष्टाचार। इन पांच तरह के तत्वों को ध्यान में रखते हुए नीतीश सरकार ने विभिन्न कानूनी व प्रशासनिक उपाय किए हैं। नक्सलियों की बिहार में मारक क्षमता घटने का यही कारण है। राज्य का आर्थिक विकास हो तो रहा है। पर अधूरा। सरकारी व राजनीतिक भ्रष्टाचार विकास में बाधक हैं। यदि समावेशी विकास कार्यों को जनता तक संपक्तता यानी सेचुरेशन की हद नहीं पहुंचाया गया तो नक्सली समस्या से मिली राहत क्षणिक साबित हो सकती है। अब जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर है कि वह राजनीति छोड़कर बिहार जैसे राज्यों की भरपूर आर्थिक मदद करे जो राज्य नक्सली समस्या से वास्तव में जूझ रहे हैं व एक हद तक सफलता भी पा रहे हैं। नीतीश सरकार ने विचारों से लैस उन थोड़े से लोगों के लिए बल प्रयोग का रास्ता अपनाया है जो बंदूक के बल पर राजसत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं। पर गरीबों को नक्सलियों से काटने के लिए गत पौने पांच साल में बिहार में आम विकास के व्यापक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। ताजा आंकड़े के अनुसार बिहार की विकास दर इन दिनों देश में लगभग सर्वाधिक है। पर, यह भी नाकाफी हैं। केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने गत अप्रैल में संसद में कहा कि यदि राज्य सरकारें, केंद्र सरकार के साथ मिल कर काम करें तो तीन साल के अंदर नक्सलियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। बिहार के मुत्तलिक समस्या यह है कि केंद्र सरकार बिहार सरकार की भरपूर कौन कहे, वाजिब मदद भी नहीं कर रही है, ऐसी शिकायत मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने की है। नीतीश कुमार को ऐसा कहने का हक भी है क्योंकि नक्सली समस्या पर काबू पाने में भी बिहार ने हाल में देश को राह दिखाई है। अधिक दिन नहीं हुए जब केंद्र सरकार ने अन्य राज्यों से कहा था कि वे भी ‘आपकी सरकार आपके द्वार’ कार्यक्रम चलाकर नक्सली समस्या पर काबू पाए क्योंकि इस कार्यक्रम को बिहार में सफलता मिल रही है। बिहार में जारी इस कार्यक्रम का उद्देश्य चुने हुए खास इलाके में विकास को संपक्तता की हद तक पहुंचाना है। पर सभी गांवों में ऐसे विकास के लिए पर्याप्त साधन चाहिए जो केंद्र ही मुहैया करा सकता है। प्रधानमंत्री मन मोहन सिंह ने गत 21 अप्रैल 2010 को कहा था कि माओवादी हिंसा आंतरिेक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि ‘हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिन इलाकों में इस आतंकवाद ने पैर पसारा है, उनमें से ज्यादातर विकास के लिहाज से पिछड़े हैं।’ प्रधान मंत्री सिविल सेवा दिवस पर आयोजित समारोह में बोल रहे थे।’ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमण सिंह ने गत साल अगस्त मंे कहा कि नक्सलवाद की समस्या को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाना चाहिए। इस पष्ठभूमि में केंद्र की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। पर केंद्रीय राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने इसी 14 जुलाई, 2010 को पटना में कहा कि यदि बिहार में हमारी सरकार बनी तो बिहार को विशेष ‘सम्मान’ का दर्जा मिलेगा। इस सम्मान शब्द का अर्थ केंद्रीय आर्थिक मदद के रूप में लगाया गया। यानी कांग्रेस की सरकार नहीं बनेगी तो क्या बिहार पहले की तरह ही केंद्र द्वारा उपेक्षित रहेगा? यहां यह सवाल भी पूछा जा रहा है।ऐसे में कैसे होगा इस नक्सली समस्या का पूर्ण उन्मूलन जो प्रधानमंत्री के अनुसार आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है? यह बात भी याद रखने की है कि बिहार नेपाल सीमा के पास ही है। नीतीश सरकार के कार्यकाल में त्वरित अदालतों के जरिए करीब 48 हजार अपराधी लोगों यानी आरोपितों को निचली अदालतों से सजाएं दिलवाई जा चुकी है। इनमें नक्सल हिंसा-प्रतिहिंसा से जुड़े आरोपी भी हैं। इन सजाओं के भय से वैसे नक्सली या फिर नक्सल विरोधी सेनाओं के लोग डर गये हैं जो किसी तरह की सजाओं से डरते हैं। इसलिए उनलोगों ने मारकाट कम कर दी है। जमीन को लेकर जारी झगड़ों को स्थानीय स्तर पर तुरंत सुलझाने के लिए भी संस्थागत प्रशासनिक उपाय मौजूदा राज्य सरकार ने किए हैं। इसके लिए कानून भी बनाया गया है। पर उसका लाभ अभी बाद में मिलेगा।पर सरकारी भ्रष्टाचार पर काबू पाने की जिम्मेदारी नीतीश सरकार की जरूर है। आखिर इस नक्सली समस्या ने समय बीतने के साथ इतना विकराल रूप धारण ही कैसे कर लिया ? इसकी वस्तुपरक पड़ताल किए बिना इस पर काबू पाने में भी कठिनाइयां आएंगी। पहले के नक्सलियों और अब के माओवादियों के इस देश में फलने-फूलने के कई कारण रहे हैं। कई कारणों के मिले जुले असर के कारण ही माओवादी आज ताकतवर हो चुके हैं। गरीबी, विस्थापन, अर्ध सामंती समाज -व्यवस्था और कानून -व्यवस्था की लचर स्थिति के मिले जुले कुप्रभाव को कम करने से ही इस समस्या पर काबू पाया जा सकेगा, ऐसा अनेक प्रेक्षक मानते हैं। कम करने का यह प्रयोग बिहार में एक सीमा तक हो रहा है और वह एक हद तक सफल भी रहा है। हालांकि ऐसे प्रयोग को देश भर में और भी सघन, व्यापक, ठोस व प्रामाणिक बनाने की जरूरत है। ऐसे उपायों को और सघन व प्रामाणिक बनाने की क्षमता बिहार सरकार में भी फिलहाल नजर नहीं आती क्योंकि बिहार के प्रशासन व राजनीति में भी भ्रष्टाचार व निहित स्वार्थ बहुत अधिक हैं जो प्रयासों के बावजूद कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ हाल में बने एक कारगर कानून को अभी अपना रंग दिखाना अभी बाकी है। हालांकि अभियोजन पक्ष ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में धराए राज्य के दस बड़े अफसरों की करोड़ों की संपत्ति जब्त करने की गुजारिश कोर्ट से कर दी है। यदि जब्त हो गई तो उसका असर अन्य भ्रष्ट अफसरों पर पड़ेगा। याद रहे कि नक्सली आंदोलन भले सन 1967 में बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ, पर बाद के वर्षों में एक समय बिहार में इसका सर्वाधिक असर था। आंध्र प्रदेश तथा अन्य राज्यों में तो वह बिहार के बाद ही फैला। हालांकि करीब बीस -पच्चीस साल पहले भी बिहार में जब तत्कालीन सरकार ने कम से कम दो स्थानों पर नक्सली नर संहारों के मूल कारणों को समाप्त कर दिया तो वहां भी बाद के वर्षों में नक्सलियों का असर कम हो गया था। वे स्थान हैं औरंगाबाद जिले के दलेल चक - बघौरा और आसपास के इलाके तथा अरवल मुख्य बाजार। याद रहे कि अरवल में 1986 में पुलिस ने नक्सलियों की सभा पर अंधाधुंध गोलियां चलाकर 21 लोगों को मार दिया था। उधर 1987 में औरंगाबाद जिले के दलेल चक बघौरा में माओवादियों ने 54 किसानों की सामूहिक हत्याएं कर दी थीं।
सरकार के भ्रष्ट कारिंदों व हदबंदी से अधिक गैर कानूनी तरीके से जमीन रखने वाले अन्यायी लोगों ने अनेक मामलों में गरीबों को नक्सलियों की शरण में जाने के लिए बाध्य कर दिया। बिहार के कई उदाहरण मौजूद हैं जहां -जहां देर से ही सही प्रशासन व सरकार ने गरीबों की सुधि ली, वहां -वहां से नक्सलियों के तम्बू उखड़़ गये।
यदि बिहार में सख्त व सभी पक्षों को मान्य बटाईदारी कानून बन जाता तो नक्सली समस्या से निजात पाने में राज्य सरकार को कुछ और भी सुविधा हो जाती। पर चुनाव लड़ने वाली किसी पार्टी के लिए यह काम अब असंभव नहीं तो कठिन जरूर हो गया है। योजना आयोग के पूर्व सचिव एन.सी. सक्सेना ने गत 18 अप्रैल को कहा कि ‘बिहार के मगध क्षेत्र में 30 प्रतिशत बटाईदार हैं। जाहिर है कि सरकार की सब्सिडी योजना का उन्हें कोई फायदा नहीं मिलता।’ हालांकि नक्सली समस्या के पीछे बटाईदारी समस्या का कम ही हाथ है। समस्याएं और भी हैं और गहरी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी गत 16 फरवरी 2010 को कहा कि ‘केवल हथियारों का सहारा लेने के बजाए सरकार को विकास कार्य तेज करना चाहिए।’
जून, 2006 में बिहार में भूमि सुधार आयोग बना। रिटायर आई.ए.एस., डी. बंदोपाध्याय उसके अध्यक्ष थे। आयोग ने अपनी रपट राज्य सरकार को दी। उस रपट में अन्य बातों के अलावा बटाईदारों को कारगर हक देने की सिफारिश है। गत साल जुलाई में नीतीश सरकार के एक मंत्री ने यह बयान दे दिया कि इसे लागू करने पर बिहार सरकार विचार कर रही है। फिर क्या था ! जमीन वालों की जमात नाराज हो गई और सितंबर में हुए उप चुनावों में राजग उम्मीदवारों को बुरी तरह हरा दिया। 18 विधान सभा क्षेत्रों में से 13 सीटों पर राजग हार गया। अब यह बात तय है कि नीतीश सरकार इसे लागू नहीं करेगी। यदि नीतीश सरकार अगले विधानसभा चुनाव के बाद फिर से सत्ता में आ भी जाए तोभी उसे वह लागू नहीं करेगी, ऐसा संकेत मिल रहा है। क्योंकि इस मुददे पर नीतीश सरकार काफी डर गई है। पर प्रतिपक्षी दल जमीन वालों को इस भावी बटाईदारी कानून का भय दिखा कर राजग के खिलाफ हवा बनाने की कोशिश जरूर कर रहे हैं। पता नहंीं अगले बिहार विधानसभा चुनाव में इसका क्या नतीजा होगा। इससे इस मामले की संवेदनशीलता और फिर इसकी गंभीरता का पता चलता है। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि इससे यह भी पता चलता है कि इस समस्या को हल करना कितना जरूरी है। पर कई अन्य लोग इस स्थापना से सहमत नहीं हैं। पश्चिम बंगाल में इस भूमि आयोग को जो सफलता मिली, उससे श्री बंदोपाध्याय को एक खास तरह की विश्वसनीयता मिली हुई है। तब बंगाल में नक्सली आंदोलन ठंडा पड़ा था। पर जब गरीबों के विकास व कल्याण के दूसरे काम वाम सरकार ने नहीं किए तो नक्सली फिर पनप गये। बंदोपाध्याय ने भी कहा था कि बिहार की भूमि समस्या पश्चिम बंगाल की समस्या से बिल्कुल अलग हैं। बिहार की भूमि समस्या अधिक जटिल है। इसीलिए उन्होंने भूमि हदबंदी, चकबंदी, भूमि अभिलेख , बटाईदारी, अतिक्रमण, भूदान में प्राप्त जमीन के वितरण की समस्याओं पर अपनी रपट दी। बंगाल का कथित क्रांतिकारी बटाईदारी कानून जब नक्सलियों को पनपने से अंततः नहीं रोक सका तो बिहार में बंदोपाध्याय रपट कैसी क्रांति कर देगी,यह देखना दिलचस्प होगा।याद रहे कि बंगाल में बंटाईदारी कानून कुछ ही दिनों तक नक्सलियों को उभरने से रोक सका था।असल काम तो हर जगह आम विकास का अधिक होना चाहिए था जो देश में काफी कम हो रहा है। बिहार में करीब सत्तर प्रतिशत लोग खेती और उससे जुड़े धंधे पर निर्भर करते हैं।खेती को लेकर अनेक समस्याएं हैं।खेती के विकास से राज्य का विकास भी जुड़ा हुआ है।खेती से जुड़े लोगों की आमदनी बढ़ाए बिना राज्य में उद्योगों के विकास की कल्पना भी फिजूल है। सत्तर प्रतिशत लोगों की आय नहीं बढ़ेगी तो छोटे बड़े कारखानों से उत्पादित माल खरीदेंगे कितने लोग ? जनवरी, 2007 में नीतीश कुमार की सरकार ने पटना में एक शानदार ग्लोबल मीट कराया। इस मीट में बाहर से आए लोगों से राज्य में उद्योग लगाने की अपील की गईं।उद्योग लगाने के लिए लोगों को आमंत्रित करना भी जरूरी है।पर, क्या घोड़े के आगे तांगे को लगाया जाएगा ? खेती में आय बढ़ेगी तभी उनकी क्रय शक्ति बढ़ेगी और तभी किसान अपने परिवार के सदस्यों की जरूरतों के अनुसार सामान खरीदेगा जो कारखानों में पैदा होते हैं। अभी गांवों की बहुत बड़ी आबादी अपने बच्चों के लिए जरूरत के मुताबिक जूते,कपड़े,स्लेट,कागज, कलम, पेंसिल आदि भी नहीं खरीद पाती। खेती के विकास में सबसे बड़ी बाधा यह है कि खेती लायक जमीन का बहुत बड़ा हिस्सा उनके पास है जो खुद खेती नहीं करते।ऐसी स्थिति में खेती के साथ भारी लापारवाही होती है।कुछ खेत ऐसे ही बंजर छोड़ दिए जाते हैं।खेती में सिंचाई का उचित प्रबंध नहीं रहने के कारण भी खेती से आय कम है। खेती की पैदावार को बाजारों तक आसानी से पहुंचाने के लिए बिहार में अच्छी सड़कों की पिछले वर्षों में भारी कमी रही है।अब जरूर बन रही हैं।पर उन सड़कों की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं।खेती योग्य जमीन का असमान बंटवारा भी अविकास का एक बड़ा कारण है।एक मोटे अनुमान के अनुसार बिहार में अब भी करीब सवा लाख ऐसे भूमिपति हैं जिनके पास औसतन 45 एकड़ या उससे अधिक जमीन है। अस्सी भूमिपतियों के पास 500 से 2000 एकड़ जमीन अब भी है।याद रहे कि बिहार में भूमि हदबंदी की अधिकतम सीमा 15 एकड़ से 45 एकड़ तक ही है।यानी सिंचाईयुक्त जमीन 15 एकड़ और अन्य 45 एकड़।पर इस कानून का राज्य भर में भारी उलंघन हो रहा है।जो गलती जमींदारी उन्मूलन के समय हुई,उसका खामियाजा राज्य अब तक भुगत रहा है।भूमि सुधार कानून तो बने ,पर उनका उलंघन भी बड़े पैमाने पर हुआ।उलंघन में राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यपालिका का एक हिस्सा भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सहयोगी रहा है।ऐसा स्वार्थवश हुआ।राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यपालिका के सदस्यों का आमतौर पर बड़ा हिस्सा आजादी के बाद भूमिपति परिवारों से ही आया।बिहार में नक्सलियों को अपनी जड़ें जमाने का जो मौका मिला,उसका यह सब कारण रहा है।यानी नक्सली समस्या भूमि समस्या से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। नक्सलियों ने साठ के दशक में जिन तीन प्रमुख मांगों को लेकर बिहार के गरीबों को संगठित किया,उनमें भूमिपतियों से हदबंदी से फाजिल जमीन को छीनने का एजेंडा मुख्य रहा।दूसरी लड़ाई गैर मजरूआ जमीन को दबंगों के हाथों से निकाल कर उन्हें जरूरतमंद गरीब लोगों में वितरित करने के लिए थी।वे ही उनके असली कानूनी हकदार भी हैं।तीसरी मांग यह होती रही कि सरकार ने खेतिहर मजदूरों के लिए जो न्यूनत्तम मजदूरी तय की है,उसे लागू किया जाए।ये तीनों काम खुद सरकारी मशीनरी को करने चाहिए थे।इन्हें करने के लिए राज्य सरकार ने प्रखंड से लेकर राज्य मुख्यालय तक कर्मचारियों और अफसरों की भारी फौज भी खड़ी कर रखी है।उस पर तनख्वाह के रूप में सरकार भारी खर्च भी करती है।पर उसका इच्छित लाभ नहीं होता। परिणामस्वरूप जहां तहां नर संहार होते रहे हैं।इन नर संहारों में अधिक गरीब लोग ही मारे जाते हैं।औरंगाबाद जिले के दलेलचक बघौरा में माओवादी कम्युनिस्ट केंद्र के हथियारबंद गिरोह ने 1987 में 41 लोगों की हत्या कर दी। गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार 54 लोग मारे गए।कई लोग घायल हुए थे।घायलों में से कुछ लोगों की बाद में मौत हो गई।इससे पहले दलेल चक के आसपास के परसडीह,दरमिया,आंजन और छोटकी छेछानी में हत्याएं हुई थीं।यानी नरसंहारों की श्रृंखला बनी थी।दलेल चक बघौरा हत्याकांड तो अंतिम कड़ी था।दलेल चक बघौरा कांड को अंजाम देने वालों ने घटनास्थल पर नारा लगाया था कि ‘छोटकी छेछानी का बदला ले लिया।’ इन हत्याकांडों की जड़ में जमीन विवाद ही था।जमीन विवाद को समय पर हल करने में सरकारी विफलता के कारण ही इतने लोगों की जानें गईं।ऐसे उदाहरण राज्य में और भी हैं।पर भूमि सुधार कानून को लागू करने में सरकारी विफलता का सबसे बड़ा उदाहरण यही है। औरंगा बाद जिले के मदन पुर प्रखंड के सलुपरा मठ की जमीन को लेकर खून खराबा हुआ। बगल के गया जिले के जानी बिगहा मठ के महंत ही इस सलुपरा मठ की संपत्ति के मालिक थे। सलुपरा मठ के पास कुल 117 एकड़ जमीन थी। मठ की वह जमीन हदबंदी से फाजिल थी। कानून से बचने के लिए ही जानी पुर मठ के महंत ने अपने एक चेले के नाम सलुपरा मठ की जमीन लिख दी।यह काम उसने गैर कानूनी तरीके से किया।सलुपरा मठ की जमीन वहां के गरीब और पिछड़ी जातियों के लोग बटाई पर जोतते थे।इन गरीबों को उम्मीद थी कि एक न एक दिन जानी बिगहा का महंत इन गरीबों के नाम वह जमीन लिख देगा।महंत तो कभी सलुपरा मठ की जमीन पर जाता भी नहीं था। इस बीच महंत के चेले ने सलुपरा मठ की जमीन में से सत्रह एकड़ जमीन एक दबंग नेता के नाम बेच दी।अब जानी पुर का महंत यह कहने लगा कि उस जमीन को उस नेता के नाम बेचने का अधिकार उसके चेले को था ही नहीं।जानी पुर का महंत बाद में यह चाहने लगा कि सलुपरा मठ की जमीन उससे सरकार ले ले और उसे गरीबों में बांट दे।उधर नेता जी यह कहने लगे कि उन्होंने वह जमीन कानूनी तरीके से ही खरीदी है। यानी यह जमीन विवाद में पड़ गई।मामला राजस्व बोर्ड के विचारार्थ चला गया।राजस्व बोर्ड को भी चाहिए था कि वह मामले का शीघ्र निपटारा कर दे।पर उसने नहीं किया।उधर नेता जी ने उस जमीन पर अपना कब्जा करना चाहा जिसे उन्होंने खरीद लिया था।सलुपरा मठ की जमीन से बटाईदार बेदखल होने लगे।बटाईदारों ने पहले प्रशासन के यहां गुहार लगाई।पर प्रशासन ने अपनी आदत का यहां भी परिचय दिया।फिर बटाईदारों ने माओवादियों की शरण ली।एम.सी.सी.ने उन बटाईदारों की मदद की।नेता जी ने उस जमीन पर अपने एक आदमी को तैनात कर रखा था।माओवादियों ने उसकी हत्या कर दी। नेता जी के एक और मददगार की हत्या कर दी गई। इसके जवाब में नेता जी के लोगों ने बगल के गांव परस डीह में छह लोगों की हत्या कर दी।मृतकों में एम.सी.सी.के दो कार्यकर्ता भी थे। उन पर आरोप था कि इन लोगों ने नेता जी के उस आदमी की हत्या की थी।ये सब होता रहा और प्रशासन सोया रहा।परस डीह का बदला लेने के लिए माओवादियों के नेतृत्व में गरीबों ने दरमिया के ग्यारह राजपूतों की हत्या कर दी।इस पर तत्कालीन मुख्य मंत्री बिंदेश्वरी दुबे दरमिया पहुंच गए।उन्होंने घोषणा की कि अब ‘दरमिया’ नहीं होने दिया जाएगा।औरंगा बाद जिले में एम.सी.सी.के सफाए के लिए टास्क फोर्स लगाया गया।जिले के तेरह प्रमुख नक्सलियों की गिरफ्तारी के लिए इनाम की घोषणा की गई।जिले में सशस़्त्र पुलिस बल की सात कंपनियां तैनात की गईं। उधर नक्सलियों ने अपने समर्थकों को समझाया कि मुख्य मंत्री दरमिया तो गए,पर वे परसडीह नहीं गए।नक्सलियों ने पर्चा छपवाया और बंटवाया,‘परस डीह होता रहे और दरमिया नहीं हो,यह कत्तई नहीं होगा।’औरंगा बाद की खुफिया पुलिस ने यह रपट दी कि सलुपरा मठ की जमीन को लेकर ये सब हत्याएं हो रही हैं। जिले के एस.पी.ने पर्यवेक्षण रपट में लिखा कि उस खास नेता जी की जीप का इस्तेमाल परस डीह हत्याकांड में हुआ।पर नेता जी ने अपनी अग्रिम जमानत के लिए जब जिला अदालत में अर्जी लगाई तो उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक कारणों से उन्हें इस केस में फंसाया गया।दरमिया नर संहार के बदला लेते हुए छोटकी छेछानी में एक और नर संहार कर दिया गया।छोटकी छेछानी कांड के प्रतिशोध में माओवादियों ने 29 मई 1987 की रात में दलेल चक बघौरा के 4 1 राजपूतों की हत्या कर दी। इस कांड की गूंज पूरे देश में सुनी गई।इसके बाद ही राज्य सरकार ने सलुपरा मठ की जमीन को भूमिहीनों में बंटवाया।तब जाकर वहां नर संहार रुका।पर उसके पहले नहीं।जमीन के बंटवारे के बाद उस इलाके में इस तरह की हिंसा-प्रतिहिंसा की घटना नहीं ंहुई।जिन भूमिहीनों को सलुपरा मठ की जमीन मिल गई,उन्हें अब माओवादियों के कॉडर बने रहने की जरूरत ही कहां थी ? जमीन विवाद के मामले में औरंगा बाद जिले का शुरू से बुरा हाल रहा है।सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस जिले में 30 सितंबर,1986 तक 4445 एकड़ जमीन हदबंदी से फाजिल घोषित की गई थी।किंतु इनमें से सिर्फ 1438 एकड़ जमीन का ही भूमिहीनों में वितरण हो पाया था।नक्सली समस्या के गहराते जाने के बावजूद राज्य सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।जब नर संहार तेज हुआ तभी सलुपरा मठ की जमीन बांटी गई।औरंगा बाद जिले का यह मामला तो नमूना मात्र है।पूरे राज्य में राज्य सरकार ने भूमि समस्याओं को इसी तरह लटकाया।तब नक्सलियों के बारे में अस्सी के दशक की तत्कालीन राज्य सरकार की राय थी कि वे चोर डकैत से अलग नहीं हैं। ऐसा ही वाकया सन् 1986 में अरवल में हुआ था।अरवल भी औरंगाबाद से बहुत दूर नहीं है।तब नक्सलियों के फं्रट संगठन एम.के.एस.एस.के नेत्त्व में जुटी भीड़ पर पुलिस ने अरवल में धुंआधार फायरिंग की थी।पुलिस दल का नेत्त्व खुद एस.पी. सी.आर.कासवान कर रहे थे।पुलिस की गोलियों से गरीब लोग मारे गए।गरीब लोग अरवल में स्थित गैर मजरूआ जमीन के एक टुकड़े पर अपना कानूनी हक चाहते थे।जमीन गरीब भूमिहीनों की झोपड़ियों के पास ही थी।बल्कि उनके घर के नाले का पानी भी उसी जमीन पर गिरता था।नहर और झोपड़ी के बीच वह जमीन थी। वे गरीब पकौड़ी बनाकर अरवल बाजार में बेचते थे और अपना जीविकोपार्जन करते थे।वह जमीन उनके लिए बहुत जरूरी थी।जहानाबाद के तब के कर्तव्यनिष्ठ एस.डी.ओ. व्यासजी मिश्र ने उन भूमिहीनों के नाम वह जमीन आवंटित कर दी थी।पर बाद के अफसरों ने उसी जमीन को रिश्वत लेकर एक धनी व्यक्ति के नाम कर दिया। एक ऐसे परिवार के नाम भ्रष्ट अफसरों ने जमीन बंदोबस्त कर दी जिस परिवार में इंजीनियर तथा दूसरे अफसर थे।उस परिवार का बड़ा पक्का मकान इन पंक्तियों के लेखक ने अरवल में देखा था।उसके पास अपनी काफी जमीन भी थी।उस धनी व्यक्ति ने उस जमीन पर जबरन चहारदिवारी खड़ी कर दी तो भूमिहीनों से उसका झगड़ा बढ़ गया।प्रशासन से निराश गरीबों ने मजदूर किसान संग्राम समिति से मदद मांगी।यह संगठन नक्सली संगठन सी.पी.आई./एम.एल.-पार्टी यूनिटी/से जुड़ा हुआ था।बाद में पार्टी यूनिटी और एम.सी.सी.का पीपुल्स वार में विलयन हो गया और संगठन का नया नाम पड़ा,भाकपा/माओवादी/। समिति ने इस प्रशासनिक अन्याय के खिलाफ अरवल में एक जन सभा की।समिति की सभा पर एस.पी.सी.आर.कासवान के निदेश पर पुलिस ने नाहक गोलियां चलाईं और करीब दो दर्जन लोगों को मार डाला।।वहां के कलक्टर अशोक कुमार सिंह ने घटनास्थल के निरीक्षण के बाद गोलीकांड को गैर जरूरी बताया था।फिर भी सरकार ने कासवान के खिलाफ कार्रवाई नहीं की।भूमि समस्या के प्रति सरकार के रूख का इससे साफ पता चलता है।हां,अरवल में जिस भूमि विवाद के चलते नर संहार हुआ था,उस भूमि को राज्य सरकार ने उन्हीं गरीबों में वितरित कर दिया जिन्हें व्यास जी ने पहले एलाट किया था।नतीजतन अब वहां नरसंहार की कोई और घटना नहीं हुई।यानी दलेल चक बघौरा की जमीन विवाद को जिस तरह राज्य सरकार ने बाद में मजबूर होकर सुलझाया,ऐसा ही काम देश की विभिन्न सरकारें अन्य स्थानों में अभियान चला कर पहले ही कर दिया करे तो माओवादियों को कमजोर करने में ठोस मदद सरकारों को मिल जाएगी। श् अरवल और दलेल चक बघौरा जैसी घटनाएं बताती हैं कि पहले से ही मौजूद भूमि सुधार कानूनों को लागू करने के लिए कितनी प्रशासनिक तत्परता की जरूरत है।इन्हें लागू करने से तनावों को दूर किया जा सकता है और नर संहारों को रोका जा सकता है।इन्हें लागू करने के लिए किसी भूमि सुधार आयोग की रपट के इंतजार की जरूरत ही नहीं है।बस राजनीतिक कार्यपालिका में राजनीतिक इच्छा शक्ति चाहिए।क्या वह इच्छा शक्ति है ? छत्तीस गढ़ तथा कुछ अन्य प्रदेशों के आदिवासियों की समस्याएं कुछ दूसरी होंगी।जिन बिंदुओं पर वे प्रशासन से निराश होकर माअेावादियों के पास जा रहे हैं ,उन समस्याओं को हल करके माओवादियों का कमजोर किया जा सकता है।हालांकि ये प्रशासनिक उपाय बल प्रयोग के अलावा और साथ साथ ही होने चाहिए। ऐसा न हो कि राजस्व तथा अन्य विभागों की गलतियों का खामियाजा पुलिस व केंद्रीय बल को ही लगातार भुगतना पडे।नक्सली हिंसा में पुलिसकर्मी ही अधिक मारे जाते हैं।क्योंकि घटनास्थल पर तो उसे ही जाना पड़ता है।चाहे अपराध रोकने के लिए या फिर अपराधहो जाने के बाद।गलती करने वाला संबंधित राजस्व,वन तथा अन्य विभागों के अधिकारी व कर्मचारी तो अनेक मामलों में रिश्वत के पैसों से ऐश कर रहे होते हैं। बिहार सरकार ने 1982 के अपने एक नोट में कहा था कि ‘नक्सली समस्या सामाजिक आर्थिक समस्या है।इसे सिर्फ पुलिस बल से समाप्त नहीं किया जा सकता।’ भूमि हदबंदी से फाजिल जमीन को भूमिपतियों से छीनकर गरीबों में बांटने के काम में थोड़ी बहुत जोर जबर्दस्ती करनी पड़ सकती है।पर पुलिस के लिए वह काम हथियारबंद नक्सलियों से लड़ने की अपेक्षा सस्ता ही पड़ेगा।गैर मजरूआ जमीन को गलत कब्जे से निकालने के लिए भी पुलिस को बल लगाना चाहिए।साथ ही यदि हदबंदी की सीमा कम कर दी जाए तो लाखों एकड़ जमीन निकाल कर गरीबों में बांटी जा सकती है।इससे गरीब लोगों को हिंसा, अपराध और देशद्रोह की राह पर जाने से काफी हद तक रोका जा सकता है।हालांकि ऐसा नहीं है कि सिर्फ गरीब लोग ही इन रास्तों पर जाते हैं।एक बात और।एक विशेषज्ञ ने काफी पहले यह कहा था कि यदि बिहार में जमीन का सही रिकार्ड तैयार हो जाए तो मिनी क्रांति हो जाएगी।इस काम को करने के लिए भी किसी आयोग की रपट के इंतजार की जरूरत नहीं है।आयोग की रपट आ जाने पर भी उसे लागू करने के लिए भी सही रिकार्ड तैयार करना ही होगा।क्या पहले से ही बने भूमि सुधार कानूनों को लागू करने के लिए किसी आयोग की सिफारिशों की प्रतीक्षा करने की जरूरत है ? आदिवासी इलाकों में गरीबी व शोषण की समस्या पर एक सामाजिक कार्यकर्त्ता लक्ष्मी प्रसाद शुक्ल के लंबे नोट के कुछ हिस्से को यहां उधत करना मौजूं होगा।इससे नक्सली समस्या को हल करने की दिशा मंे सरजमीन से एक रोशनी मिल सकती है।वे लिखते हैं,‘उग्रवाद के विकास के कुछ प्रमुख कारण निम्न लिखित हैं1, सामंती महाजनी और वन विभाग के शोषण उत्पीड़न की क्रूर और अमानवीय परंपरा।2.पुलिस प्रशासन की संवेदन शून्यता,शोषकों-उत्पीड़कों की तरफदारी और विरोध और प्रतिरोध की आवाज का दमन।3.लोकतांत्रिक आंदेालनों की निरर्थकता।4.प्रतिनिधि सभाओं में क्षेत्र की आम जनता की समस्याओं के एहसास का अभाव।5.जीविका के साधनों का अभाव तथा आम लोगों की बेरोजगारी और फटेहाली।6.शिक्षा का अभाव और अत्यंत पिछड़ी मानसिकता।7.यातायात सुविधाओं और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव।8.अधिकारियों, ब्लाक अंचल द्वारा संचालित रोजगार योजनाओं की राशि,आत्म समर्पित सामंतों-महाजनों तथा केंद्रु पत्ता ठेकेदारों और वन विभाग से नक्सलियों को मिलने वाली भारी धन राशि।9.हथियारबंद दस्तों का विकास और पुलिस प्रशासन का भ्रष्टाचार तथा निकम्मापन। नक्सली समस्या के समाधान के सिलसिले में अनेक विशेषज्ञ समय समय पर उसका हल सुझाते रहते हैं।पर इस देश के जो मौजूदा हालात हैं,उनमें उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती।अधिकतर नेता और दल अपनी -अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार हल सुझाते हैं और सत्ता में आने पर उपाय करते हैं।पर मोटा -मोटी यही उपाय नजर आता है कि देश में वास्तव में यथासंभव कानून का शासन लागू हो।वह सबके लिए समान हो।सरकारी धन को भरसक गरीबों तक पहुंचने देने में जो भी तत्व बाधक हों, उनके खिलाफ जारी मुकदमों को राजनीतिक कारणों से कमजोर नहीं किया जाए।नक्सलियों से अपने चुनाव जीतने के लिए बातचीत की जाए और बाद में उन्हें खत्म करने की घोषणा की जाए ,कई नेताओं और दलों द्वारा समय समय पर अपनाया गया यह दोहरा मापदंड नहीं चलेगा।भ्रष्टाचार और हिंसा के अपराधी कत्तई नहीं बख्शे जाएं।अरवल व दलेल चक बघौरा के नरसंहारों की घटनाओं से नसीहत लेकर राजस्व महकमा और पुलिस थानोें को नियम कानून के पालन के लिए बाध्य किया जाए।नीतीश कुमार सरकार के हाल के उपायों पर ध्यान दिया जाए।विस्थापितों और भीषण गरीबी व भुखमरी की समस्या से जूझ रहे लोगों को कटटर माओवादियों की गिरफत में जाने व उनकी फौज के सिपाही बनने से येन केण प्रकारेण रोका जाए।क्या यह सब करने के लिए इस देश की पक्ष-विपक्ष की राजनीति में पर्याप्त राजनीतिक इच्छा शक्ति मौजूद है ? पता नहीं।

/इस लेख के संपादित अंश जनसत्ता के ं 17 ,18 और 19 जुलाई 2010 के अंकों में प्रकाशित/