बिहार सरकार ने भ्रष्टाचार के मुकदमे का सामना कर रहे आई.ए.एस. अफसर एस.एस. वर्मा के आलिशान मकान को तो जब्त कर लिया, पर उस अफसर के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति केंद्र सरकार नहीं दे रही है। नतीजतन अभियोजन पक्ष शिव शंकर वर्मा के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र नहीं दाखिल कर पा रहा है। वर्मा के अलावा भी बिहार के दो अन्य आई.ए.एस. अफसरों के खिलाफ भी मुकदमा चलाने की अनुमति केंद्र से बिहार को नहीं मिल पा रही है जबकि इसके लिए बिहार सरकार ने कई बार केंद्र को पत्र लिखे हैं। एक अन्य खबर के अनुसार केंद्रीय सेवाओं की प्रथम श्रेणी के अफसरों से संबंधित ऐसे करीब तीन सौ मामले प्रधानमंत्री सचिवालय में लंबे समय से लंबित है। ऐसा अन्ना आंदोलन के दौर में भी हो रहा है।
1981 बैच के आई.ए.एस. अफसर शिव शंकर वर्मा बिहार सरकार में लघु सिंचाई सचिव थे। उन पर अवैध संपत्ति बनाने का आरोप है। बिहार सरकार की विशेष निगरानी इकाई ने 6 जुलाई, 2007 को वर्मा के आवास पर छापा मार कर करीब एक करोड़ पचास लाख रुपये की अवैध संपत्ति के सबूत इकट्ठे किये थे। बिहार विशेष अदालत कानून, 2010 के तहत वर्मा के खिलाफ विशेष अदालत में मुकदमा चल रहा है। विशेष अदालत ने 17 मार्च 2011 को वर्मा की संपत्ति जब्त करने का आदेश दिया। वर्मा ने अदालत से गुजारिश की थी कि पटना स्थित उस मकान को उन्हें ही किराए पर दे दिया जाए जिसे अदालत ने नामंजूर कर दिया। जब्त मकान की बाजार कीमत करीब पांच करोड़ रुपये बताई जा रही है।
एक अफसर इतने आलीशन मकान को भी किराए पर लेने को तैयार है। यह भी आश्चर्य की बात है। इससे उसकी अमीरी का पता चलता है। याद रहे कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि ऐसे जब्त मकानों में बच्चों के सरकारी स्कूल खाले जाएंगे।
पर ऐसे अफसरों को भी सजा दिलाने में केंद्र सरकार की अरूचि आश्चर्यजनक है। इतना ही नहीं, बिहार सरकार ने जब 2009 में बिहार विशेष अदालत अधिनियम, 2009 विधायिका से पास करवाकर केंद्र को भेजा तो उस पर भी राष्ट्रपति की मुहर दिलवाने में केंद्र सरकार ने एक साल लगा दिये। याद रहे कि उस कानून में मुकदमे की सुनवाई के दौरान भी आरोपित की अवैध संपत्ति को जब्त करने का आदश देने का कोर्ट को अधिकार मिल गया है। यह देश में अपने ढंग का नया व कारगर कानून है। हाल में केंद्र सरकार ने यह जरूर कहा है कि इस मामले में वह भी बिहार जैसा कानून बनवाना चाहती है। पर वर्मा पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं देने के काम से लगता है कि केंद्र सरकार का वायदा खोखला है।
इस बीच बिहार सरकार ने प्रथम श्रेणी के कई अन्य अफसरों के खिलाफ भी ऐसे ही मुकदमे विशेष अदालतों में दायर कर रखे हैं। ऐसे छह स्पेशल कोर्ट में बिहार में काम कर रहे हैं। उनकी अवैध संपत्ति जब्त करने की कोर्ट से अभियोजन पक्ष ने गुजारिश भी की है। इस पर कोर्ट का फैसला आने ही वाला है। पर फिर सवाल उठेगा कि क्या केंद्र सरकार उनके खिलाफ आरोप पत्र दायर करने की अनुमति देगी ?
बिहार के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण यह रहा है कि यहां के सरकारी पैसों में से अधिकंाश बिचौलिये खा जाते हैं। भ्रष्टाचार के आरोप में यहां दो -दो पूर्व मुख्यमंत्री और आधा दर्जन आई.ए.एस. अफसर जेल की हवा खा चुके हैं। पिछले बीस साल में कई मंत्रियों व विधायकों को भी जेल जाना पड़ा। पर यह बात महसूस की गई कि जेल गये आरोपित अपनी अकूत संपत्ति त्त के जरिए मुकदमे की गर्मी भी कई बार सह जाते हैं। वे महंगे वकील रखकर तथ्यों को तोड़ मरोड़ करके और अदालत के सामने गलत तथ्य पेश करके केस में अपने पक्ष में कई बार जजमंेट दिलवा देते है।
इसलिए हाल में नीतीश सरकार ने यह महसूस किया कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही उनकी अवैध संपत्ति जब्त कर ली जाए तो आरोपित गण कई मामलों में अपनी उस अपार संपत्ति का बेजा फायदा मुकदमा जीतने के लिए नहीं उठा पाएंगे। इसलिए बिहार विशेष अदालत कानून बना। केंद्र सरकार ऐसे मामलों में अभियोजन की समय पर अनुमति देकर ही गरीबों के धन को लूटने वालों को सजा दिलवा सकती है। क्या अन्ना आंदोलन के सघन होते जाने के बावजूद केंद्र सरकार एस.एस. वर्मा जैसे अफसरों का परोक्ष रूप से बचाव करती रहेगी? बिहार में कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं।
गुरुवार, 15 सितंबर 2011
दागी अफसरों को सजा दिलाने में केंद्र की दिलचस्पी नहीं
शनिवार, 10 सितंबर 2011
उपाधियों के खिलाफ थी संविधान सभा

भारतीय संविधान सभा ने 30 अप्रैल 1947 को यह प्रस्ताव स्वीकार किया था कि ‘यूनियन द्वारा कोई उपाधि नहीं दी जाएगी। यूनियन का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा। राज्य के अधीन किसी लाभप्रद या विश्वसनीय पद पर काम करने वाला कोई व्यक्ति बिना सरकार के सहमत हुए किसी विदेशी राज्य से किसी प्रकार का कोई उपहार, वेतन, पद या उपाधि स्वीकार नहीं करेगा। ’यह प्रस्ताव सरदार बल्लभ भाई पटेल ने रखा था।
पर, आज जो हमारा संविधान उपलब्ध है, उसमें उपाधियों से संबंंिधत अनुच्छेद -18 में लिखा हुआ है कि ‘सेना या विद्या संबंधित सम्मान के सिवाय और कोई उपाधि राज्य प्रदान नहीं करेगा। भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा।’
वे अलंकरण हैं भारत रत्न और पद्म पुरस्कार। बगल के देश पाकिस्तान में निशान-ए-पाकिस्तान वहां का सबसे बड़ा नागरिक अलंकरण है। वह हमारे देश के मोरारजी देसाई और दिलीप कुमार को भी मिला। हमने भारत रत्न मशहूर स्वतंत्रता सेनानी व पाकिस्तान के नागरिक खान अब्दुल गफार खान को भी दिया।
अंग्रेज शासक नाइटहुड, राय बहादुर और खान बहादुर जैसी उपाधियां देते थे। अब पद्म विभूषण और पद्म भूषण जैसे अलंकरण हैं। अंग्रेज आम तौर पर अपने समर्थकों को उपाधियां देते थे। भारत की सरकारें भी आम तौर पर अपनी ही विचारधारा के लोगों को अलंकृत करती हैं। अपवादों की बात और है।
संविधान सभा में श्रीप्रकाश ने कहा था कि यदि जनता किसी नेता को सम्मानित करना चाहती है तो वह कर सकती है। लेकिन हम इस घातक दुराचार उत्पन्न करने वाली प्रथा को मिटाना चाहते हैं जो व्यक्तियों को विवश करती है कि किसी सम्मान विशेष की प्राप्ति के लिए अधिकारियों से अनुग्रह भिक्षा मांगता फिरे।
आजादी के करीब 64 साल बाद इन दिनों पद्म पुरस्कारों की क्या स्थिति है? अपवादों को छोड़कर ये पुरस्कार आये दिन विवादों में रहते हैं।
कानूनन मनाही के बावजूद कई पुरस्कृत महानुभाव इन पुरस्कारों को अपने लेटर हेड, विजिटिंग कार्ड और नेम प्लेट में लिख लेते हैं। इन पुरस्कारों के लिए नामों के चयन में कई बार प्रतिभा, योग्यता, क्षमता और देश सेवा से इतर कारण होते हैं। कई बार लेन-देन की भी बातें सुनी जाती हैं। मोरारजी देसाई की सरकार ने 1977 में इन पुरस्कारों व अलंकरणों को बंद कर दिया था। पर बाद में इंदिरा जी के शासनकाल में दुबारा शुरू कर दिया गया।
संविधान सभा में सेठ गोविंद दास ने कहा था कि फ्रांस की क्रांति और रूस की क्रांति के बाद वहां पर जितनी उपाधियां थीं, वे तमाम वापस ले ली र्गइं। मैं सरदार जी से पूछना चाहता हूं कि क्या वे गुलामी के तमगों से लोगों का उद्धार नहीं करना चाहते ? मैं चाहता हूं कि जो भी उपाधि उनके पास हैं, वह भी वापस ले ली जाएं। इस समय के उपाधिधारी भी स्वतंत्र भारत में उसी प्रकार के व्यक्तियों की तरह रह सकेंगे जिस तरह अन्य व्यक्ति रहेंगे।
दरअसल सरकार के पक्ष में कोई विशेष काम कर देने के लिए या करने की उम्मीद में या फिर अपनी सल्तनत को मजबूती प्रदान करने के लिए अंग्रेज शासक कतिपय गणमान्य लोगों को राय बहादुर -खान बहादुर या फिर इस तरह की अन्य उपाधियां देते थे। भारतीय संविधान सभा के अधिकतर सदस्यों ने ऐसी उपाधियों के खिलाफ सख्त टिप्पणियां की थीं। सब तो नहीं, पर संभवतः अधिकतर ऐसे उपाधिधारकों ने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों का ही साथ दिया था।
यहां भी फणीश्वर नाथ रेणु का उदाहरण है जिन्होंने जेपी पर पुलिस लाठी प्रहार के खिलाफ 1974 में पद्मश्री का अलंकरण लौटा दिया था। उससे पहले जालियांवाला बाग नरसंहार के खिलाफ कवि गुरू रवींद्र नाथ टैगोर ने नाइटहुड की उपाधि लौटा दी थी जो उन्हें 1915 में मिली थी।
साथ ही, यह बात भी देखी गई कि अधिकतर लोगों ने नहीं लौटाई। न ही वे इतिहास के नाजुक मौकों पर स्वतंत्र चेतना के साथ कदम उठा पाए।
संविधान सभा के सदस्य इस बात से अवगत थे। इसीलिए वे आजाद भारत में ऐसे नागरिक चाहते थे जो किसी उपाधि के दबाव में आकर निर्णय नहीं करे। पर आज क्या हो रहा है? अनेक क्षेत्रों में जो गिरावटें बढ़ती जा रही हैं, उससे हमारे संविधान निर्माता परलोक में अपने सिर धुन रहे होंगे।
संविधान सभा में एम.आर. मसानी ने ठीक ही कहा था कि केवल पराधीन देशों में ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र कहे जाने वाले देशों में भी यह देखा गया है कि लेने वालों और देने वालों के लिए भी उपाधियां खतरनाक और दुराचरण का कारण बन जाती हैं। इसलिए देश भक्ति, आत्म सम्मान और सेवा भावना पर विश्वास रखते हुए बिना किसी प्रकार की उपाधियों के हम अपने काम करेंगे।
संबंधित प्रस्ताव पेश करते हुए सरदार पटेल ने कहा था कि विभिन्न कमेटियों में विचार विमर्श के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यूनियन द्वारा कोई उपाधि नहीं दी जाएगी।
बुधवार, 7 सितंबर 2011
एक वह भी जमाना था, एक यह भी जमाना है

बिहार में 18 मार्च 1974 को छात्रों और युवकों के नेतृत्व में एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ था। आंदोलन भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और गलत शिक्षा नीति के खिलाफ था। आंदोलन का नेेतृत्व बाद में जेपी ने संभाल लिया था। क्योंकि 18 मार्च को हुए ‘विधानसभा मार्च’ के दौरान हिंसा हो गई थी। जेपी तब तक आंदोलन से जुड़े नहीं थे। इस हिंसा पर जेपी ने बयान दिया था कि ‘हिंसा और आगजनी से क्रांति नहीं होती है।’ आंदोलन के अराजक होते देख कुछ समझदार युवा व छात्र जेपी से उनके कदमकुआं स्थित आवास पर मिले और उनसे नेतृत्व करने का आग्रह किया। जेपी ने आंदोलन को शांतिपूर्ण व अहिंसक बनाये रखने की शर्त रखी। छात्रों-युवकों ने शर्त मान ली। तत्पश्चात आंदोलन का एक नारा बना, ‘हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा।’
आंदोलन को दिशा देने के लिए बिहार छात्र संघर्ष संचालन समिति का गठन हुआ था। इस महत्वपूर्ण समिति के सदस्य थे-लालू प्रसाद, सुशील कुमार मोदी, राम बहादुर राय, वशिष्ठ नारायण सिंह, शिवानंद तिवारी, रघुनाथ गुप्त, मिथिलेश कुमार सिंह, राम जतन सिन्हा, नरेंद्र कुमार सिंह, भवेशचंद्र प्रसाद, नीतीश कुमार, विक्रम कुंवर, गोपाल शरण सिंह, अक्षय कुमार सिंह, विजय कुमार सिन्हा, रघुवंश नारायण सिंह, उदय कुमार सिन्हा, अरुण कुमार वर्मा, रवींद्र प्रसाद और अशोक कुमार सिंह।
आंदोलन के संचालन के लिए पटना के कदमकुआं में स्थापित कार्यालय को चलाने का भार पहले भवेश चंद्र प्रसाद को मिला और बाद में विजय कृष्ण को। समिति के सदस्यों में से राम बहादुर राय, अरुण कुमार वर्मा, उदय कुमार सिन्हा, रवींद्र प्रसाद, रघुवंश नारायण सिंह और अक्षय कुमार सिह को छोड़कर सभी छात्र व युवा नेता बाद के दिनों में समय- समय पर विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री बने। कोई सांसद बना तो कोई विधायक। कोई मंत्री बना तो कोई मुख्यमंत्री। इन दिनों भी नीतीश कुमार तो मुख्यमंत्री हैं और सुशील कुमार मोदी उप मुख्यमंत्री।
यह बात नहीं है कि ये सभी नेता जेपी आंदोलन के मंच से उतर कर सीधे सत्ता की कुर्सी पर चले गये। कुछ को तो बाद में भी संघर्ष करने पड़े। यहां यह सब इसलिए कहा जा रहा है कि आज अन्ना के आंदोलन से निकल कर आज के आंदोलनकारी कल सत्ता भी संभाल सकते हैं। आंदोलन नये नेतृत्व को उभारते हैं। जेपी आंदोलन में भी अनेक नये नेता उभरे थे। अन्ना आंदोलन में भी नये नेता उभर रहे हैं। इनमंे अरविंद केजरीवाल सबसे अधिक चमकते सितारे लग रहे हैं। जेपी आंदोलन को देखा जाए तो कुल मिलाकर उस आंदोलन से निकले नेताओं में आज सबसे चमकते सितारे नीतीश कुमार हैं। नीतीश कुमार खुद को लोहियावादी कहते हैं। नीतीश कुमार लोहियावादियों में भी सबसे चमकते सितारे साबित हो रहे हैं। यहां ऐसे ही लोहियावदियों की बात हो रही है जो सत्ता में पहुंचे। मधु लिमये जैसे लोहियावादी की नहीं। जेपी आंदोलन के दौरान छात्र संघर्ष संचालन समिति के अधिकतर सदस्य आंदोलन शुरू होने से पहले से ही किसी न किसी राजनीतिक दल व विचारधारा से बंधे हुए थे। शिवानंद तिवारी, रघुनाथ गुप्त और नरेंद्र कुमार सिंह लोहियावादी दल में थे। वशिष्ठ नारायण सिंह और मिथिलेश कुमार सिंह संगठन कांग्रेस के युवा संगठन से जुड़े थे। पर जब वे जेपी आंदोलन में थे तो उस समय वे दलीय बंधन में नहीं बंधे हुए थे। इस दृष्टि से अन्ना आंदोलन की स्थिति भिन्न है। अन्ना के साथ गैर दलीय तत्व अधिक हैं।
यहां तक कि आंदोलन के प्रारंभिक दिनों में छात्र-युवा आंदोलन के नेता राजनीतिक दलों के नेताओं को अपने सभा मंचों पर चढ़ने तक नहीं देते थे।
दरअसल जेपी आंदोलनकारियों का तर्क यह था कि 1967 से 1972 तक कुछ राज्यों में सत्ता में रह कर गैर कांग्रेसी दलों ने कांग्रेस की अपेक्षा खुद को बेहतर साबित नहीं किया। वे भी आम तौर पर व्यवस्था के अंग ही बन कर रह गये। इसीलिए इनको आंदोलन में साथ लेकर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। साथ ही इस छात्र-युवा आंदोलन को गैर दलीय बनाये रखने के फायदे होंगे। क्योंकि उसकी नैतिक धाक अधिक होगी। पर जब गफूर सरकार का बिहार में दमन शुरू हो गया तो जेपी आंदोलन में प्रतिपक्षी राजनीति के दल भी जुड़ गये। हालांकि गैर कांग्रेसी दलों के भीतर आंदोलन के पक्ष में विधायिका से इस्तीफा देने के सवाल पर भारी मतभेद था। जिस तरह आज अन्ना के जन लोकपाल विधेयक पर गैर कांग्रेसी दलों में भी मतभेद है। जेपी ने जब विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे देने को कहा तो कई विधायकों ने इस्तीफा देने से मना कर दिया था, जिनमें जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी, संगठन कांग्रेस के विधायक भी थे।
जेपी आंदोलन की संचालन समिति के कार्यालय सचिव भवेश चंद्र प्रसाद ने उन दिनों के अनुभव हाल में इन पंक्तियों के लेखक को इन शब्दों में सुनाये, ‘मेरे कार्यालय में गरीब लोग आते थे और आंदोलन फंड के लिए दो, चार या फिर पांच रुपये देते थे। और कहते थे कि हमारा नाम भले मत पहुंचाइए, पर यह पैसा जेपी तक जरूर पहुंचा दीजिएगा। ऐसा जन लगाव जेपी आंदोलन के प्रति था।’
एक अन्य कार्यालय सचिव विजय कृष्ण ने बताया कि आपातकाल के दिनों में फरारी के काल में अक्सर गरीब लोग ही हमें रात में रहने के लिए अपने घरों में शरण देते थे। अधिकतर अमीर मित्र लोग तो डरे रहते थे।
इन पंक्तियों के लेखक को आपातकाल में बड़ौदा डायनामाइट मुकदमे के सिलसिले में सी.बी.आई. बेचैनी से खोज रही थी। सी.बी.आई के अनुसार जार्ज फर्नाडिस, रेवीकांत सिन्हा और एम.एन. वाजपेयी के साथ मिलकर इन पंक्तियों के लेखक ने पटना में जुलाई 1975 में एक गुप्त बैठक की। उसमें यह षड्यत्र रचा गया कि देश भर में सरकारी संस्थानों को डायनामाइट से उड़ाना है। नतीजतन इन पंक्तियों के लेखक को फरार हो जाना पड़ा। रिश्तेदारों के यहां रहने का सवाल ही नहीं था। पटना सचिवालय में कार्यरत एक अल्पवेतन भोगी कर्मचारी के मंदिरी मुहल्ले में स्थित एक कमरे के घर में लंबे समय तक के लिए मुझे शरण मिली। सी.बी.आई. से बचने के लिए बाद में मेघालय भाग जाना पड़ा। वहां कांग्रेस की सरकार नहीं थी। आपातकाल का दमन नहीं था। वहां मेरे एक रिश्तेदार रहते थे जहां शरण मिली। इन पंक्तियों के लेखक का भी यही अनुभव यह रहा कि आम गरीब लोगों ने छिपने में अपेक्षाकृत अधिक मदद की जबकि तब भी निहितस्वार्थियों की ओर से यह कहा जा रहा था कि जेपी आंदोलन मध्यम वर्ग का आंदोलन है।
किस तरह वह किसी खास जाति या वर्ग का ही आंदोलन नहीं था, उसका एक उदाहरण उन दिनों सामने आते रहते थे। 1974 में जेपी आंदोलन के समय राज्य के कुछ इलाकों में चेचक का प्रकोप हो गया था। जयप्रकाश नारायण ने सार्वजनिक रूप से इस पर चिंता प्रकट की। फिर क्या था, पटना मेडिकल कालेज के छात्रों ने कुछ ही समय में राज्य के दस हजार लोगों को चेचक के टीके देने का काम पूरा कर दिया।
यह जेपी के प्रति सम्मान और उनके नेतृत्व में शुरू आंदोलन की गंभीरता का ही परिणाम था। अधिकतर लोगों को मालूम था कि जेपी का मुद्दा सही है और उनकी मंशा ईमानदार है। अन्ना के आंदोलन को देखकर जेपी आंदोलन की याद आना स्वाभाविक ही है।
इतना ही नहीं, जेपी के आहवान पर जब-जब पटना में सभा या आंदोलन का कोई कार्यक्रम बनता था तो राज्य भर से लोग आते थे। उनके खाने का प्रबंध किसी होटल या भंडारे से नहीं बल्कि आम लोगों के घरों से होता था। अनेक आम लोगों सहित इन पंक्तियों के लेखक के घर से भी अक्सर पूड़ी-भुजिया-आचार के पैकेट उन आंदोलनकारियों के लिए बनकर जाते थे।
जेपी बिहार आंदोलन के दौरान समय -समय पर घरों में थालियां बजाने और थोड़ी देर के लिए नियत समय पर बत्तियंा गुल कर देने का भी आहवान करते रहते थे। उस समय लगता था कि अधिकतर घरांे से आंदोलन की घंटियां बज रही हैं। उन कई घरों से भी थालियांें की आवाज आती थी, जिन्हें सक्रिय राजनीति से कोई मतलब नहीं था। उनमें से अधिकतर लोगों की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी नहीं थी। पर वे एक नेता की ओर विश्वास भरी नजरों से देख कर थे जो उनकी समस्याओं को लेकर 73 साल की आयु में भी आम जन की बेहतरी के लिए सड़कों पर निकल पड़ा था।
यह कहना गलत है कि आम लोगों की राजनीति में कोई रूचि नहीं है। दरअसल लोगबाग विश्वसनीयता खो चुके नेताओं और दलों में कोई खास रूचि नहीं रखते भले वे औपचारिकता के लिए हर बार किसी न किसी को वोट दे देते हैं। सामने बेहतर विकल्प के अभाव में कई बार और अधिकतर स्थानों में विवादास्पद उम्मीदवारों के पक्ष में ही उन्हें मुहर लगानी पड़ती है।
जेपी आंदोलन की घटनाएं बताती हैं और अन्ना आंदोलन की घटनाएं भी इस मामले में इस बात की पुनरावृति कर रही है कि यदि नेता प्रामाणिक हो तो बेहतर राजनीति की प्यासी जनता उस नेता की तरफ ख्ंिाची चली आती है।
भ्रष्टाचार और उससे उत्पन्न महंगाई की मार सबसे अधिक गरीब और निम्न मध्यवर्गीय जनता ही भुगतती हैं, इसलिए केले वाले केले और चने वाले कम कीमत पर या मुफ्त में चने आंदोलनकारियों को दे देते हैं।
जेपी आंदोलन में मशहूर साहित्यकार नागार्जुन भी सक्रिय थे। इन पंक्तियों का लेखक साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ का पटना संवाददाता था और नागार्जुन के नेतृत्व में यदा-कदा धरना, अनशन, प्रदर्शन में शामिल हुआ करता था। फटेहाल नागार्जुन को उन दिनों चंदे में जो भी छोटी राशि मिलती थी, उन सबको हम सबको चाय नाश्ता खिलाने -पिलाने में खर्च कर देते थे।
पटना की कुछ खास लिट्टी -समोसा की दुकान से बाबा लिट्टी और समोसा खरीदकर हमें खिलाते और खुद खाते थे। हमने देखा कि लिट्टी के दुकानदार बाबा को गर्मागर्म चीजें ही देते थे और पैसे में भी खास मुरव्वत करते थे। गरीब लिट्टी वाला समझता है कि बुढ़ापे तक फटेहाल रहा यह बाबा जरूर आम जनता की भलाई के लिए ही संघर्षरत है। यह और बात है कि बाबा आंदोलन के आखिरी दिनों में जेपी आंदोलन से अलग हो गये थे। हालांकि यहां बात की जा रही है कि एक फुटपाथी दुकानदार की एक आंदोलनकारी के प्रति भावना की और उसके प्रति एक खास तरह के लगाव की।
पर साधनों और मीडिया को ध्यान में रखा जाए तो अन्ना आंदोलन बेहतर स्थिति में है। जेपी के पास साधन कम थे। मीडिया का ऐसा विस्फोट तब नहीं हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का दबदबा बहुत था। अधिकतर मीडिया और व्यापारिक घराने इंदिरा जी से सहमते थे। आज वैसी स्थिति नहीं है। इसका लाभ अन्ना के आंदोलन को मिल रहा है। पर जेपी की नैतिक धाक अधिक थी।
रविवार, 4 सितंबर 2011
इमरजेंसी में जार्ज फर्नांडीस से मुलाकात
25 जून 1975 को जब आपातकाल लगा तो उस समय जार्ज फर्नांडीस उड़ीसा में थे। अपनी पोशाक बदल कर जुलाई में जार्ज पटना आये और तत्कालीन समाजवादी विधान पार्षद रेवतीकांत सिंहा के आर. ब्लाक स्थित सरकारी आवास में टिके। इन पंक्तियों का लेखक भी उनसे मिला जो उन दिनों जार्ज द्वारा संपादित चर्चित साप्ताहिक पत्रिका प्रतिपक्ष का पटना संवाददाता था। जार्ज दो तीन दिन पटना रह कर इलाहाबाद चले गये।
बाद में उन्होंने मध्य प्रदेश के प्रमुख समाजवादी नेता लाड़ली मोहन निगम को इस संदेश के साथ पटना भेजा कि वे मुझे और शिवानंद तिवारी को जल्द विमान से बंगलुरू लेकर आयें। शिवानंद जी तो उपलब्ध नहीं हुए। पर मैं निगम जी के साथ मुम्बई होते हुए बंगलुरू पहुंचा।
वहां जार्ज के साथ तय योजना के अनुसार राम बहादुर सिंह, शिवानंद तिवारी, विनोदानंद सिंह, राम अवधेश सिंह और डा. विनयन को लेकर मुझे कोलकाता पहुंचना था। पटना लौटने पर मैंने उपर्युक्त नेताओं की तलाश की। पर इनमें से कुछ जेल जा चुके थे या फिर गहरे भूमिगत हो चुके थे। सिर्फ डा. विनयन उपलब्ध थे। उनके साथ मैं धनबाद गया।
याद रहे कि आपातकाल में कांग्रेस विरोधी राजनीतिक नेताओं -कार्यकर्त्ताओं पर सरकार भारी आतंक ढा रही थी। राजनीतिककर्मियों के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाना तक कठिन था। भूमिगत जीवन जेल जीवन की अपेक्षा अधिक कष्टप्रद था।
धनबाद में समाजवादी लाल साहेब सिंह से पता चला कि राम अवधेश तो कोलकाता में ही हैं तो फिर हम कोलकाता गये। वहां जार्ज से हमारी मुलाकात हुई। पर वह मुलाकात सनसनीखेज थी।
जार्ज ने दक्षिण भारत के ही एक गैरराजनीतिक व्यक्ति का पता दिया था। उस व्यक्ति का नाम तीन अक्षरों का था। जार्ज ने कहा था कि इन तीन अक्षरों को कागज के तीन टुकड़ों पर अलग अलग लिखकर तीन पॉकेट में रख लीजिए ताकि गिरतार होने की स्थिति में पुलिस को यह पता नहीं चल सके कि किससे मिलने कहां जा रहे हो। यही किया गया। पार्क स्ट्रीट के एक बंगले में मुलाकात हुई। दक्षिण भारतीय सज्जन ने कह दिया था कि बंगले के मालिक के कमरे में जब भी बैठिए, उनसे हिंदी में बात नहीं कीजिए। अन्यथा उन्हें शक हो जाएगा कि आप मेरे अतिथि हैं भी या नहीं।
उस दक्षिण भारतीय सज्जन ने हमें जार्ज से मुलाकात करा दी। हम एक बड़े चर्च के अहाते में गये। जार्ज उस समय एक पादरी की पोशाक में थे। उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। चश्मा बदला हुआ था और हाथ में एक विदेशी लेखक की मोटी अंग्रेजी किताब थी। जार्ज, विनयन और मुझसे देर तक बातचीत करते रहे। फिर हम राम अवधेश की तलाश में उल्टा डांगा मुहल्ले की ओर चल दिये। वहीं की एक झोपड़ी में हम टिके भी थे। फुटपाथ पर स्थित नल पर नहाते थे और बगल की जलेबी-चाय दुकान में खाते-पीते थे।
उल्टा डांगा का वह पूरा इलाका बिहार के लोगांे ंसे भरा हुआ था। जार्ज के साथ टैक्सी में हम लोग वहां पहुंचे थे। हम जार्ज को उस चाय की दुकान पर ही छोड़ दिया और राम अवधेश की तलाश में उस झोपड़ी की ओर बढ़े। पर पता चला कि राम अवधेश जी भूमिगत कर्पूरी ठाकुर के साथ कोलकाता में ही कहीं और हैं।
चाय की दुकान पर बैठे जार्ज ने इस बीच चाय पी थी। जब हम लौटे और जार्ज चाय का पैसा देने लगे तो दुकानदार उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया आर कहा, हुजूर हम आपसे पैसा नहीं लेंगे। इस पर जार्ज घबरा गये। उन्हें लग गया कि वे पहचान लिये गये। अब गिरतारी में देर नहीं होगी। जार्ज को परेशान देखकर मैं भी पहले तो घबराया, पर मुझे बात समझने में देर नहीं लगी। मैंने कहा कि जार्ज साहब, चलिए मैं इन्हें बाद में पैसे दे दूंगा। मैं यहीं टिका हुआ हूं। फिर अत्यंत तेजी से हम टैक्सी की ओर बढ़े जो दूर हमारा इंतजार कर रही थी। फिर हमें बीच कहीं छोड़ते हुए अगली मुलाकात का वादा करके जार्ज कहीं और चले गये।
आपातकाल में जिस तरह जान हथेली पर लेकर जार्ज फर्नांडीस ने अपने उसूलों के लिए बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी, यदि मंत्री बनने के बाद भी वे उसी तरह अपने उसूलों पर पूरी तरह खरा उतरे होते तो समाजवादी आंदोलन आगे बढ़ जाता। अक्सर उन कार्यकर्त्ताओं के मन में यह बात आती रहती है जिन लोगों ने भी कभी अपनी जान हथेली पर रखकर उनके साथ काम किया था और जिन्होंने बाद में भी सरकार से कभी कुछ नहीं लिया।
याद रहे कि आपातकाल में जार्ज और उनके साथियों पर बड़ौदा डायनामाइट केस को लेकर मुकदमा चला। सी.बी.आई. का आरोप था कि पटना में जुलाई 1975 मेें जार्ज फर्नाडीस, रेवती कांत सिंह, महेंद्र नारायण वाजपेयी और इन पंक्तियों के लेखक यानी चार लोगों ने मिलकर एक राष्ट्रद्रोही षड्यंत्र किया। षड्यंत्र यह रचा गया कि डायनाइट से देश के महत्वपूर्ण संस्थानों को उड़ा देना है और देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर देनी है। सन 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार बनने पर यह केस उठा लिया गया।
बाद में उन्होंने मध्य प्रदेश के प्रमुख समाजवादी नेता लाड़ली मोहन निगम को इस संदेश के साथ पटना भेजा कि वे मुझे और शिवानंद तिवारी को जल्द विमान से बंगलुरू लेकर आयें। शिवानंद जी तो उपलब्ध नहीं हुए। पर मैं निगम जी के साथ मुम्बई होते हुए बंगलुरू पहुंचा।
वहां जार्ज के साथ तय योजना के अनुसार राम बहादुर सिंह, शिवानंद तिवारी, विनोदानंद सिंह, राम अवधेश सिंह और डा. विनयन को लेकर मुझे कोलकाता पहुंचना था। पटना लौटने पर मैंने उपर्युक्त नेताओं की तलाश की। पर इनमें से कुछ जेल जा चुके थे या फिर गहरे भूमिगत हो चुके थे। सिर्फ डा. विनयन उपलब्ध थे। उनके साथ मैं धनबाद गया।
याद रहे कि आपातकाल में कांग्रेस विरोधी राजनीतिक नेताओं -कार्यकर्त्ताओं पर सरकार भारी आतंक ढा रही थी। राजनीतिककर्मियों के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाना तक कठिन था। भूमिगत जीवन जेल जीवन की अपेक्षा अधिक कष्टप्रद था।
धनबाद में समाजवादी लाल साहेब सिंह से पता चला कि राम अवधेश तो कोलकाता में ही हैं तो फिर हम कोलकाता गये। वहां जार्ज से हमारी मुलाकात हुई। पर वह मुलाकात सनसनीखेज थी।
जार्ज ने दक्षिण भारत के ही एक गैरराजनीतिक व्यक्ति का पता दिया था। उस व्यक्ति का नाम तीन अक्षरों का था। जार्ज ने कहा था कि इन तीन अक्षरों को कागज के तीन टुकड़ों पर अलग अलग लिखकर तीन पॉकेट में रख लीजिए ताकि गिरतार होने की स्थिति में पुलिस को यह पता नहीं चल सके कि किससे मिलने कहां जा रहे हो। यही किया गया। पार्क स्ट्रीट के एक बंगले में मुलाकात हुई। दक्षिण भारतीय सज्जन ने कह दिया था कि बंगले के मालिक के कमरे में जब भी बैठिए, उनसे हिंदी में बात नहीं कीजिए। अन्यथा उन्हें शक हो जाएगा कि आप मेरे अतिथि हैं भी या नहीं।
उस दक्षिण भारतीय सज्जन ने हमें जार्ज से मुलाकात करा दी। हम एक बड़े चर्च के अहाते में गये। जार्ज उस समय एक पादरी की पोशाक में थे। उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। चश्मा बदला हुआ था और हाथ में एक विदेशी लेखक की मोटी अंग्रेजी किताब थी। जार्ज, विनयन और मुझसे देर तक बातचीत करते रहे। फिर हम राम अवधेश की तलाश में उल्टा डांगा मुहल्ले की ओर चल दिये। वहीं की एक झोपड़ी में हम टिके भी थे। फुटपाथ पर स्थित नल पर नहाते थे और बगल की जलेबी-चाय दुकान में खाते-पीते थे।
उल्टा डांगा का वह पूरा इलाका बिहार के लोगांे ंसे भरा हुआ था। जार्ज के साथ टैक्सी में हम लोग वहां पहुंचे थे। हम जार्ज को उस चाय की दुकान पर ही छोड़ दिया और राम अवधेश की तलाश में उस झोपड़ी की ओर बढ़े। पर पता चला कि राम अवधेश जी भूमिगत कर्पूरी ठाकुर के साथ कोलकाता में ही कहीं और हैं।
चाय की दुकान पर बैठे जार्ज ने इस बीच चाय पी थी। जब हम लौटे और जार्ज चाय का पैसा देने लगे तो दुकानदार उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया आर कहा, हुजूर हम आपसे पैसा नहीं लेंगे। इस पर जार्ज घबरा गये। उन्हें लग गया कि वे पहचान लिये गये। अब गिरतारी में देर नहीं होगी। जार्ज को परेशान देखकर मैं भी पहले तो घबराया, पर मुझे बात समझने में देर नहीं लगी। मैंने कहा कि जार्ज साहब, चलिए मैं इन्हें बाद में पैसे दे दूंगा। मैं यहीं टिका हुआ हूं। फिर अत्यंत तेजी से हम टैक्सी की ओर बढ़े जो दूर हमारा इंतजार कर रही थी। फिर हमें बीच कहीं छोड़ते हुए अगली मुलाकात का वादा करके जार्ज कहीं और चले गये।
आपातकाल में जिस तरह जान हथेली पर लेकर जार्ज फर्नांडीस ने अपने उसूलों के लिए बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी, यदि मंत्री बनने के बाद भी वे उसी तरह अपने उसूलों पर पूरी तरह खरा उतरे होते तो समाजवादी आंदोलन आगे बढ़ जाता। अक्सर उन कार्यकर्त्ताओं के मन में यह बात आती रहती है जिन लोगों ने भी कभी अपनी जान हथेली पर रखकर उनके साथ काम किया था और जिन्होंने बाद में भी सरकार से कभी कुछ नहीं लिया।
याद रहे कि आपातकाल में जार्ज और उनके साथियों पर बड़ौदा डायनामाइट केस को लेकर मुकदमा चला। सी.बी.आई. का आरोप था कि पटना में जुलाई 1975 मेें जार्ज फर्नाडीस, रेवती कांत सिंह, महेंद्र नारायण वाजपेयी और इन पंक्तियों के लेखक यानी चार लोगों ने मिलकर एक राष्ट्रद्रोही षड्यंत्र किया। षड्यंत्र यह रचा गया कि डायनाइट से देश के महत्वपूर्ण संस्थानों को उड़ा देना है और देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर देनी है। सन 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार बनने पर यह केस उठा लिया गया।
( प्रभात खबर से साभार )
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भूले बिसरे,
Bhule Bisre,
National Politics
रविवार, 28 अगस्त 2011
विफल नहीं होता भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन
अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ इस देश का यह चौथा बड़ा जन आंदोलन है। वैसे तो मिनी आंदोलन रोज-रोज जहां -तहां होते ही रहते हैं।
प्रथम आंदोलन के नायक समाजवादी नेता व विचारक डा. राम मनोहर लोहिया थे। दूसरे के नायक लोकनायक जय प्रकाश नारायण थे। तीसरा आंदोलन वी.पी. सिंह के नेतृत्व में लड़ा गया। चौथा आंदोलन अन्ना हजारे के नेतृत्व में इन दिनों लड़ा जा रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किया गया कोई आंदोलन इस मामले में विफल नहीं होता कि उससे अंततः उस आंदोलन के कारण भ्रष्टाचार समर्थक सत्ता देर-सवेर हट जाती है। पर यह बात भी है कि अगली सत्ता अपने ही पिछले आंदोलन के मुद्दे को लगभग भूल जाती है। पता नहीं इस मामले में इस बार क्या होगा।
इस गरीब देश के अधिकतर लोग सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं, उनको छोड़कर जो लोग भ्रष्टाचार से लाभान्वित हैं। हालांकि एक ही व्यक्ति अधिकार की अपनी सीट पर बैठकर तो रिश्वत ले रहा है, पर वही जब दूसरे दतर में अपने किसी काम के लिए जाता है, तो उसे भी घूस देनी पड़ती है।
कहने का अर्थ यह है कि भ्रष्टाचार से तो लोगबाग आजादी के बाद से ही निरंतर पीड़ित रहे हैं। पहले कम पीड़ित थे, अब अधिक हो रहे हैं। पर जब जब प्रामाणिक नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़ी होती है, तब तब आम जनता उसके पीछे उमड़ पड़ती है। चारों आंदोलनों में यही हुआ। इन आंदोलनों में एक समानता और भी है। ये सारे आंदोलन कांग्रेसी सत्ता के खिलाफ ही हुए। पर स्वार्थवश कांग्रेस ने इतिहास से अब तक नहीं सीखा।
डा. लोहिया एक प्रामाणिक नेता थे जो सिर्फ देश और जनता के बारे में ही सोचते थे। उनकी न तो निजी कार थी और न ही बैंक खाता। अविवाहित थे।
आजादी के बाद के चुनावों में अनेक प्रतिपक्षी दलों की उपस्थिति होती थी। उसका लाभ उठाकर 50 प्रतिशत से भी कम ही मत पाकर लगातार 20 साल तक कांग्रेस सत्ता में बनी रही। कांग्रेस ने जन समस्याओं की उपेक्षा की। भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार का बोलबाला बढ़ने लगा तो डा. लोहिया ने कुछ प्रतिपक्षी दलों को चुनाव के लिए एक किया। और नतीजतन 1967 में नौ राज्यों की सत्ता कांग्रेस के हाथों से निकल गई। लोकसभा में कांग्रेस का बहुमत घट गया। यदि कुछ और प्रतिपक्षी एकता हुई होती तो केंद्र की सत्ता से भी कांग्रेस का तभी सफाया हो गया होता। भ्रष्टाचार के मामले में इन नौ राज्यों की सरकारें पिछली कांग्रेसी सरकारों से बेहतर थीं। राजनीतिक महत्वाकांक्षा और बेमतलब के आंतरिक विवादों के कारण गैर कांग्रेसी सरकारें अल्पायु साबित हुईं।
बिहार में 1965-66 में तत्कालीन कांग्रेसी सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना गुस्सा था कि एक तत्कालीन सत्ताधारी नेता का नाम लेकर गांव-शहर मेें यह खुलआम नारा लगता था कि ‘गली -गली में शोर है और फलां नेता चोर है।’ गैर कांग्रेसी दलों की नाकामयाबी का लाभ उठाकर 1971-72 में दुबारा सत्ता में आकर कांग्रेस इस बार एकाधिकार, परिवारवाद और भ्रष्टाचार में लिप्त हो गई तो जेपी उठ खड़े हुए। दक्षिण को छोड़कर जेपी को पूरे देश का समर्थन मिला और इंदिरा गांधी जैसी महाबली नेता का पराजय हो गया। जिस तरह डा. लोहिया के असामयिक निधन के कारण प्रतिपक्ष खास कर समाजवादी आंदोलन दिशाहीन हो गया था, उसी तरह जेपी की किडनी खराब हो जाने के कारण जेपी जनता सरकार पर अंकुश नहीं रख सके। यानी एक अच्छे आंदोलन का सुपरिणाम सामने नहीं आ सका। हालांकि मोरारजी सरकार में भ्रष्टाचार कम था और मूल्य वृद्धि की रफतार बिलकुल काबू में थी। वी.पी. सिंह ने अपनी कुर्सी को खतरे में डाल कर राजीव गांधी से राजनीतिक लड़ाई मोल ली थी, इसलिए भी आम जनता के वे हीरो बने और भ्रष्टाचारविरोधी जनता की मदद से वे राजीव गांधी को सत्ता च्युत कर सके।
अन्ना हजारे को तो सत्ता की राजनीति से कोई मतलब ही नहीं है, इसलिए भी आज आम जनता का काफी समर्थन उन्हें मिल रहा है। उम्मीद की जा रही है कि उन्हें और भी अधिक जन समर्थन मिलेगा। सरकारी दमन और समय बीतने के साथ जन समर्थन बढ़ता है। आज के आधुनिक मीडिया ने भी अन्ना की बातों को अधिक से अधिक जनता तक पहुंचाने में मदद की है। ऐसी सुविधा इससे पहले के किसी आंदोलनकारी नेता को नहीं मिली थी।
यानी जनता तो भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में शामिल होने के लिए हमेशा ही तैयार बैठी रहती है, बस उसे प्रतीक्षा रहती है कि प्रामाणिक नेता के आगे आने की। डा. लोहिया, जे.पी., वी.पी. और अन्ना हजारे ऐसे ही प्रामाणिक नेता साबित हुए या फिर अधिकतर जनता ने उन्हें ऐसा माना।
लोहिया की सप्त क्रांति और जेपी की संपूर्ण क्रांति के तो उंचे लक्ष्य रहे हैं। पर आम जनता में तो फिलहाल सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टाचार से तत्काल मुक्ति की छटपटाहट है। वैसे भी गैर सरकारी भ्रष्टाचार सरकारी भ्रष्टाचार से ही प्रेरित-पोषित है। कई लोगों का मानना है कि इस गरीब देश की अन्य अधिकतर समस्याएं भी भ्रष्टाचार से ही उपजी हैं। इसीलिए जब अन्ना हजारे जैसी हस्ती भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए जन लोकपाल विधेयक लेकर सामने आती है तो जनता उमड़ पड़ती है। अभी न तो किसी और अंादोलन से इस आंदोलन की तुलना करने का कोई मतलब है न ही किसी अन्य आंदोलन से इसे बड़ा या छोटा दिखाने का कोई औचित्य है।
किसी आंदोलन को पर्याप्त जन समर्थन वाला आंदोलन मान लिया जाना चाहिए जिस आंदोलन के जरिए सरकार झुक जाए या फिर कोई भ्रष्टाचार समर्थक सरकार चुनाव के जरिए सत्ता से हट जाए।
जेपी आंदोलन ने अंततः केंद्र की सत्ता से इंदिरा गांधी को बाहर कर दिया था। वी.पी. सिंह के अभियान ने भी राजीव गांधी को सत्ताच्युत कर दिया। अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रति कें्रद सरकार का जो रुख है, उससे फिलहाल तो यही लगता है कि सन 2014 के लोक सभा के चुनाव के बाद केंद्र में कांग्रेसी सरकार तो नहीं ही रह पाएगी। क्योंकि जन लोकपाल विधेयक को लेकर तब तक दोनों पक्षों में हुमचा-हुमची होती रहेगी और इसके साथ जनता का जागरण भी। पहले की तरह ही एक बार फिर जगह जगह नये नेता उभरेंगे। भ्रष्टाचार और उससे उपजे काला धन पर काबू पाने की जो समस्या है, उसको लेकर इस देश के अधिकतर दलों व नेताओं को भारी कठिनाई है।सबके अपने अपने भ्रष्टाचार हैं। कोई व्यक्ति हथकड़ी गढ़ने के लिए अपने ही पैसों से लुहार को आखिर ऑर्डर क्यों और कैसे दे देगा ? अन्ना यही चाहते हैं।
जनता तो तैयार दिख रही है, तय तो अन्ना हजारे और उनकी टीम को करना है।उनकी कल्पना का जन लोकपाल कानून पास हो सकता है,पर यह काम अगली लोक सभा ही शायद कर सकेगी। मौजूदा लोक सभा के अधिकतर सदस्य जन लोकपाल के लिए कत्तई तैयार नहीं है। इस मामले में स्वाभाविक है कि अधिकतर मौजूदा कांग्रेसी सांसदों की हालत बदतर है। पर गैर कांग्रेसी दलों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है।
निहितस्वार्थी लोग तो चीजों को मिलाकर गड्मगड कर दे रहे हैं । जिस तरह कभी कहा जा रहा था कि इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया। उसी तरह आज कुछ लोग कह रहे हैं कि सांसद और संसद एक ही हैं। यदि अन्ना हजारे के आंदोलन के गर्भ से जनहितकारी नेतागण 2014 के लोक सभा चुनाव में जीत कर संसद में चले जाएं तो संसद का स्वरूप आज जैसा नहीं रहेगा। फिर जन लोकपाल जैेसे विेधयक के पास होने मंे कोई दिक्कत नहीं होगी। ऐसा संभव भी है ,यदि उम्मीदवारों के चयन में जेपी और वी.पी.के अधूरे कामों को पूरा कर दिया जाए।
दरअसल जेपी और वी.पी. और उनके निस्वार्थी सहयोगियों ने क्रमशः 1977 और 1989 में चुन -चुन कर देशप्रेमियों को टिकट दिये हेाते तो उनकी मंशा विफल नहीं होती।
याद रहे कि ऐसे ग्यारह सांसदों को देशप्रेमी नहीं कहा जा सकता जिन्हें 2008 में खुद लोक सभा ने प्रस्ताव पास कर के सदन की सदस्यता से निकाला था।उन पर प्रश्न पूछने के लिए रिश्वत लेने का आरोप साबित हो चुका था।यह एक स्टिंग आपरेशन का नतीजा था।उस दृश्य को टी.वी. पर देश ने देखा था। 1996 के झामुमो सांसद रिश्वत कांड की तरह पैसे लेकर सरकार बचाने वाले सांसदों के खिलाफ बोलकर कोई व्यक्ति कानून बनाने के मामले में संसद की सर्वोच्चता को चुनौती नहीं दे रहा होता है।वैसे भी न तो संसद सर्वोच्च है और न ही संविधान बल्कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च और सार्वभौम है जो संासदों का भी चयन करती है और उसी के प्रतिनिधि संविधान भी बनाते हैं।
अन्य आंदोलनों से इस अन्ना आंदोलन की इस मामले में समानता है कि कभी कोई जब जब कोई भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाता है तो उसी पर उल्टे तरह -तरह के लांछन लगा दिये जाते हैं। मान लिया कि वे लांछित हैं,उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने का कोई हक नहीं है। तो फिर लांछन लगाने वाले ही क्योें नहीं ऐसा कानून बना देते जिससे जनता को सर्वव्यापी भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाए ? पर उल्टे प्रधान मंत्री कहते हैं कि मेरे पास भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए जादू की कोई छड़ी नहीं है।अन्ना के साथ जन सैलाब इसलिए भी उमड़ रहा है क्योंकि जनता यह देख रही है कि भले रोकने के लिए कोई छड़ी नहीं है, पर कोई दूसरी छड़ी उनके पास जरूर है जो तब तक टू जी स्पैक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला और आदर्श घोटाले जैसे घोटाले कराने की छूट देती रहती है जब तक सुप्रीम कोर्ट कदम नहीं उठाता है।
भ्रष्टाचार विरोधी महिम में आम जनता की भारी सहभागिता को देखकर उन कुतर्कियों को शर्म करनी चाहिए जो इन दिनों अक्सर यह कहा करते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उपर से नहीं बल्कि नीचे से कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि जनता भी वोट के लिए पैसे मांगती है और अपराधियों को भी वेाट दे देती है। जनता को भ्रष्ट और अपराधी तत्वों से लाभ मिल होता तो जनता आज उल्टे अन्ना के खिलाफ आंदोलन करती। राजनीति में घुसाये गये भ्रष्ट और अपराधी तत्व तो भ्रष्ट नेताओं के लिए कवच का काम करते हैं। इसलिए अन्ना हजारे के आंदोलन के रास्ते में अवरोधक हर जगह फैले निहितस्वार्थी तत्व हैं जिनकी संख्या कम है हालांकि वे शक्तिशाली हैं। अगले चुनाव में वे तिनके की तरह उड़ जाएंगे।
प्रथम आंदोलन के नायक समाजवादी नेता व विचारक डा. राम मनोहर लोहिया थे। दूसरे के नायक लोकनायक जय प्रकाश नारायण थे। तीसरा आंदोलन वी.पी. सिंह के नेतृत्व में लड़ा गया। चौथा आंदोलन अन्ना हजारे के नेतृत्व में इन दिनों लड़ा जा रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किया गया कोई आंदोलन इस मामले में विफल नहीं होता कि उससे अंततः उस आंदोलन के कारण भ्रष्टाचार समर्थक सत्ता देर-सवेर हट जाती है। पर यह बात भी है कि अगली सत्ता अपने ही पिछले आंदोलन के मुद्दे को लगभग भूल जाती है। पता नहीं इस मामले में इस बार क्या होगा।
इस गरीब देश के अधिकतर लोग सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं, उनको छोड़कर जो लोग भ्रष्टाचार से लाभान्वित हैं। हालांकि एक ही व्यक्ति अधिकार की अपनी सीट पर बैठकर तो रिश्वत ले रहा है, पर वही जब दूसरे दतर में अपने किसी काम के लिए जाता है, तो उसे भी घूस देनी पड़ती है।
कहने का अर्थ यह है कि भ्रष्टाचार से तो लोगबाग आजादी के बाद से ही निरंतर पीड़ित रहे हैं। पहले कम पीड़ित थे, अब अधिक हो रहे हैं। पर जब जब प्रामाणिक नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़ी होती है, तब तब आम जनता उसके पीछे उमड़ पड़ती है। चारों आंदोलनों में यही हुआ। इन आंदोलनों में एक समानता और भी है। ये सारे आंदोलन कांग्रेसी सत्ता के खिलाफ ही हुए। पर स्वार्थवश कांग्रेस ने इतिहास से अब तक नहीं सीखा।
डा. लोहिया एक प्रामाणिक नेता थे जो सिर्फ देश और जनता के बारे में ही सोचते थे। उनकी न तो निजी कार थी और न ही बैंक खाता। अविवाहित थे।
आजादी के बाद के चुनावों में अनेक प्रतिपक्षी दलों की उपस्थिति होती थी। उसका लाभ उठाकर 50 प्रतिशत से भी कम ही मत पाकर लगातार 20 साल तक कांग्रेस सत्ता में बनी रही। कांग्रेस ने जन समस्याओं की उपेक्षा की। भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार का बोलबाला बढ़ने लगा तो डा. लोहिया ने कुछ प्रतिपक्षी दलों को चुनाव के लिए एक किया। और नतीजतन 1967 में नौ राज्यों की सत्ता कांग्रेस के हाथों से निकल गई। लोकसभा में कांग्रेस का बहुमत घट गया। यदि कुछ और प्रतिपक्षी एकता हुई होती तो केंद्र की सत्ता से भी कांग्रेस का तभी सफाया हो गया होता। भ्रष्टाचार के मामले में इन नौ राज्यों की सरकारें पिछली कांग्रेसी सरकारों से बेहतर थीं। राजनीतिक महत्वाकांक्षा और बेमतलब के आंतरिक विवादों के कारण गैर कांग्रेसी सरकारें अल्पायु साबित हुईं।
बिहार में 1965-66 में तत्कालीन कांग्रेसी सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना गुस्सा था कि एक तत्कालीन सत्ताधारी नेता का नाम लेकर गांव-शहर मेें यह खुलआम नारा लगता था कि ‘गली -गली में शोर है और फलां नेता चोर है।’ गैर कांग्रेसी दलों की नाकामयाबी का लाभ उठाकर 1971-72 में दुबारा सत्ता में आकर कांग्रेस इस बार एकाधिकार, परिवारवाद और भ्रष्टाचार में लिप्त हो गई तो जेपी उठ खड़े हुए। दक्षिण को छोड़कर जेपी को पूरे देश का समर्थन मिला और इंदिरा गांधी जैसी महाबली नेता का पराजय हो गया। जिस तरह डा. लोहिया के असामयिक निधन के कारण प्रतिपक्ष खास कर समाजवादी आंदोलन दिशाहीन हो गया था, उसी तरह जेपी की किडनी खराब हो जाने के कारण जेपी जनता सरकार पर अंकुश नहीं रख सके। यानी एक अच्छे आंदोलन का सुपरिणाम सामने नहीं आ सका। हालांकि मोरारजी सरकार में भ्रष्टाचार कम था और मूल्य वृद्धि की रफतार बिलकुल काबू में थी। वी.पी. सिंह ने अपनी कुर्सी को खतरे में डाल कर राजीव गांधी से राजनीतिक लड़ाई मोल ली थी, इसलिए भी आम जनता के वे हीरो बने और भ्रष्टाचारविरोधी जनता की मदद से वे राजीव गांधी को सत्ता च्युत कर सके।
अन्ना हजारे को तो सत्ता की राजनीति से कोई मतलब ही नहीं है, इसलिए भी आज आम जनता का काफी समर्थन उन्हें मिल रहा है। उम्मीद की जा रही है कि उन्हें और भी अधिक जन समर्थन मिलेगा। सरकारी दमन और समय बीतने के साथ जन समर्थन बढ़ता है। आज के आधुनिक मीडिया ने भी अन्ना की बातों को अधिक से अधिक जनता तक पहुंचाने में मदद की है। ऐसी सुविधा इससे पहले के किसी आंदोलनकारी नेता को नहीं मिली थी।
यानी जनता तो भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में शामिल होने के लिए हमेशा ही तैयार बैठी रहती है, बस उसे प्रतीक्षा रहती है कि प्रामाणिक नेता के आगे आने की। डा. लोहिया, जे.पी., वी.पी. और अन्ना हजारे ऐसे ही प्रामाणिक नेता साबित हुए या फिर अधिकतर जनता ने उन्हें ऐसा माना।
लोहिया की सप्त क्रांति और जेपी की संपूर्ण क्रांति के तो उंचे लक्ष्य रहे हैं। पर आम जनता में तो फिलहाल सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टाचार से तत्काल मुक्ति की छटपटाहट है। वैसे भी गैर सरकारी भ्रष्टाचार सरकारी भ्रष्टाचार से ही प्रेरित-पोषित है। कई लोगों का मानना है कि इस गरीब देश की अन्य अधिकतर समस्याएं भी भ्रष्टाचार से ही उपजी हैं। इसीलिए जब अन्ना हजारे जैसी हस्ती भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए जन लोकपाल विधेयक लेकर सामने आती है तो जनता उमड़ पड़ती है। अभी न तो किसी और अंादोलन से इस आंदोलन की तुलना करने का कोई मतलब है न ही किसी अन्य आंदोलन से इसे बड़ा या छोटा दिखाने का कोई औचित्य है।
किसी आंदोलन को पर्याप्त जन समर्थन वाला आंदोलन मान लिया जाना चाहिए जिस आंदोलन के जरिए सरकार झुक जाए या फिर कोई भ्रष्टाचार समर्थक सरकार चुनाव के जरिए सत्ता से हट जाए।
जेपी आंदोलन ने अंततः केंद्र की सत्ता से इंदिरा गांधी को बाहर कर दिया था। वी.पी. सिंह के अभियान ने भी राजीव गांधी को सत्ताच्युत कर दिया। अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रति कें्रद सरकार का जो रुख है, उससे फिलहाल तो यही लगता है कि सन 2014 के लोक सभा के चुनाव के बाद केंद्र में कांग्रेसी सरकार तो नहीं ही रह पाएगी। क्योंकि जन लोकपाल विधेयक को लेकर तब तक दोनों पक्षों में हुमचा-हुमची होती रहेगी और इसके साथ जनता का जागरण भी। पहले की तरह ही एक बार फिर जगह जगह नये नेता उभरेंगे। भ्रष्टाचार और उससे उपजे काला धन पर काबू पाने की जो समस्या है, उसको लेकर इस देश के अधिकतर दलों व नेताओं को भारी कठिनाई है।सबके अपने अपने भ्रष्टाचार हैं। कोई व्यक्ति हथकड़ी गढ़ने के लिए अपने ही पैसों से लुहार को आखिर ऑर्डर क्यों और कैसे दे देगा ? अन्ना यही चाहते हैं।
जनता तो तैयार दिख रही है, तय तो अन्ना हजारे और उनकी टीम को करना है।उनकी कल्पना का जन लोकपाल कानून पास हो सकता है,पर यह काम अगली लोक सभा ही शायद कर सकेगी। मौजूदा लोक सभा के अधिकतर सदस्य जन लोकपाल के लिए कत्तई तैयार नहीं है। इस मामले में स्वाभाविक है कि अधिकतर मौजूदा कांग्रेसी सांसदों की हालत बदतर है। पर गैर कांग्रेसी दलों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है।
निहितस्वार्थी लोग तो चीजों को मिलाकर गड्मगड कर दे रहे हैं । जिस तरह कभी कहा जा रहा था कि इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया। उसी तरह आज कुछ लोग कह रहे हैं कि सांसद और संसद एक ही हैं। यदि अन्ना हजारे के आंदोलन के गर्भ से जनहितकारी नेतागण 2014 के लोक सभा चुनाव में जीत कर संसद में चले जाएं तो संसद का स्वरूप आज जैसा नहीं रहेगा। फिर जन लोकपाल जैेसे विेधयक के पास होने मंे कोई दिक्कत नहीं होगी। ऐसा संभव भी है ,यदि उम्मीदवारों के चयन में जेपी और वी.पी.के अधूरे कामों को पूरा कर दिया जाए।
दरअसल जेपी और वी.पी. और उनके निस्वार्थी सहयोगियों ने क्रमशः 1977 और 1989 में चुन -चुन कर देशप्रेमियों को टिकट दिये हेाते तो उनकी मंशा विफल नहीं होती।
याद रहे कि ऐसे ग्यारह सांसदों को देशप्रेमी नहीं कहा जा सकता जिन्हें 2008 में खुद लोक सभा ने प्रस्ताव पास कर के सदन की सदस्यता से निकाला था।उन पर प्रश्न पूछने के लिए रिश्वत लेने का आरोप साबित हो चुका था।यह एक स्टिंग आपरेशन का नतीजा था।उस दृश्य को टी.वी. पर देश ने देखा था। 1996 के झामुमो सांसद रिश्वत कांड की तरह पैसे लेकर सरकार बचाने वाले सांसदों के खिलाफ बोलकर कोई व्यक्ति कानून बनाने के मामले में संसद की सर्वोच्चता को चुनौती नहीं दे रहा होता है।वैसे भी न तो संसद सर्वोच्च है और न ही संविधान बल्कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च और सार्वभौम है जो संासदों का भी चयन करती है और उसी के प्रतिनिधि संविधान भी बनाते हैं।
अन्य आंदोलनों से इस अन्ना आंदोलन की इस मामले में समानता है कि कभी कोई जब जब कोई भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाता है तो उसी पर उल्टे तरह -तरह के लांछन लगा दिये जाते हैं। मान लिया कि वे लांछित हैं,उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने का कोई हक नहीं है। तो फिर लांछन लगाने वाले ही क्योें नहीं ऐसा कानून बना देते जिससे जनता को सर्वव्यापी भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाए ? पर उल्टे प्रधान मंत्री कहते हैं कि मेरे पास भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए जादू की कोई छड़ी नहीं है।अन्ना के साथ जन सैलाब इसलिए भी उमड़ रहा है क्योंकि जनता यह देख रही है कि भले रोकने के लिए कोई छड़ी नहीं है, पर कोई दूसरी छड़ी उनके पास जरूर है जो तब तक टू जी स्पैक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला और आदर्श घोटाले जैसे घोटाले कराने की छूट देती रहती है जब तक सुप्रीम कोर्ट कदम नहीं उठाता है।
भ्रष्टाचार विरोधी महिम में आम जनता की भारी सहभागिता को देखकर उन कुतर्कियों को शर्म करनी चाहिए जो इन दिनों अक्सर यह कहा करते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उपर से नहीं बल्कि नीचे से कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि जनता भी वोट के लिए पैसे मांगती है और अपराधियों को भी वेाट दे देती है। जनता को भ्रष्ट और अपराधी तत्वों से लाभ मिल होता तो जनता आज उल्टे अन्ना के खिलाफ आंदोलन करती। राजनीति में घुसाये गये भ्रष्ट और अपराधी तत्व तो भ्रष्ट नेताओं के लिए कवच का काम करते हैं। इसलिए अन्ना हजारे के आंदोलन के रास्ते में अवरोधक हर जगह फैले निहितस्वार्थी तत्व हैं जिनकी संख्या कम है हालांकि वे शक्तिशाली हैं। अगले चुनाव में वे तिनके की तरह उड़ जाएंगे।
बुधवार, 17 अगस्त 2011
मामला सिर्फ अन्ना हजारे और सरकार के ही बीच का नहीं
सरकारांे और सत्ताधारी नेताओं ने इस देश में जब -जब ज्वलंत मुददों को दरकिनार करके उसके बदले मुददा उठाने वालों को ही अपना निशाना बनाया है,तब -तब अंततः सरकारों और दलों की हार ही हुई है।जेपी और वी.पी.सिंह के अभियानों के उदाहरण सामने हैं।पिछली गलतियों व अनुभवों को दरकिनार करके अब भी केंद्र सरकार भ्रष्टाचार के मुददे को नजरअंदाज करके अन्ना हजारे को ही निशाना बना रही है।देखना है कि इस दफा इस द्वंद्व की तार्किक परिणति क्या होती है !
यदि थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाए कि अन्ना के खिलाफ भी कुछ आरोप हैं।तो भी देशव्यापी भ्रष्टाचार का मुददा आज सिर्फ अन्ना टीम बनाम केंद्र सरकार के बीच का ही मामला तो नहीं है ।जन -जन को पीड़ित करने वाले सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचार का मुददा क्या मात्र स्वामी राम देव बनाम कांग्रेस के बीच का मामला है ? क्या यह साबित हो जाए कि आरोप लगाने वालों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप सही हैं तो देश में सर्व व्याप्त भ्रष्टाचार के विरोध का मुददा बेमतलब हो जाएगा ? कांग्रेस और केंद्र सरकार अन्ना-रामदेव को किसी तरह संतुष्ट कर भी दें तो भी एक कारगर लोकपाल की जरूरत समाप्त नहीं हो जाएगी ।
क्या कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी के नुकीले सवालों का उनके अनुसार संतोषप्रद जवाब अन्ना हजारे नहीं दे सकें तो आंदोलन टांय-टांय फिस्स हो जाएगा ? ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है।ताजा इतिहास भी यही बताता है।देश के जन मानस को देख कर लगता है कि किसी कारणवश अन्ना-राम देव के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दृश्य से अलग होने के बावजूद इस बार भी भ्रष्टाचार का मुददा शांत होने वाला नहीं है।यह मुददा किसी न किसी रूप में अपना रंग दिखा कर ही रहेगा।विभिन्न जनमत संग्रहों के नतीजे भी यही बताते हैं।
दरअसल इससे पहले भी कम से कम दो बार कांग्रेस पार्टी और सरकार ने भ्रष्टाचार केे मुददे को कुछ खास हस्तियों के बीच का ही मसला बनाने की विफल कोशिश की थी ।पर आम जनता ने इस मुददे को सही माना और बाद के आम चुनावों में कांग्रस को सबक सिखा ही दिया।ऐसा सन 1977 और सन 1989 में हो चुका है।पर लगता है कि कांग्रेस ने उन घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखा और एक बार फिर वह मुददों के बदले व्यक्तिगत प्रहारों पर उतर आई है।शनिवार को आयोजित कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी का हमलावर प्रेस कांफ्रंस इसका ताजा उदाहरण है।
एक तरफ अन्ना हजारे और स्वामी राम देव के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को देशव्यापी समर्थन मिल रहा है,दूसरी ओर केंद्र की कांग्रेस सरकार तथा पार्टी स्वामी राम देव और बाल कृष्ण को जेल भिजवाने और अन्ना को बदनाम करने का प्रयास कर रही है । सावंत आयोग की अन्ना विरोधी टिप्पणियां दिखाकर अन्ना से नैतिक सवाल कांग्रेस पूछ रही है।
दूसरी ओर आम जनता का एक बड़ा वर्ग यह चाहता है कि चाहे अन्ना हों या रामदेव ,जिस किसी पर भ्रष्टाचार के आरोप साबित हो जाएं ,उन्हें कानून की गिरफत में ले लिया जाए।पर यह कार्रवाई सिर्फ अन्ना-रामदेव तक ही सीमित नहीं रहे।यदि आज अन्ना-राम देव भ्रष्टाचार के आरोपमें जेल जाते भी हैं तो कोई अन्य नेता भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का नेतृत्व संभाल लेगा।पर किसी भी स्थिति में यह आंदोलन रुकने वाला नहीं है।इसका असर उससे पहले न भी दिखाई दे तो भी सन 2014 के लेाक सभा चुनाव में तो दिखाई पड़ ही जाएगा।तब तक जनता को यह स्पष्ट हो जाएगा कि भ्रष्टाचार के पक्ष में आखिर कौन खड़ा है और कौन खिलाफ में है।
an 1974 में जब जेपी ने बिहार में आंदोलन शुरू किया था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भुवनेश्वर की एक जन सभा में कहा कि ‘जो लोग पैसे वाले से मदद लेते हैं और उनसे रिश्ता जोड़े रहते हैं ,वे कैसे भ्रष्टाचार के बारे में बोलने का दुस्साहस करते हैं ?’गुजरात और बिहार की कुछ हिंसक वारदातों की चर्चा करते हुए उसके लिए प्रकारांतर से जय प्रकाश नारायण को जिम्मेदार ठहराते हुए इंदिरा गांधी ने यह भी कहा था कि ये लोग अबोध युवकों को राष्ट्रीय संपत्ति के विनाशके लिए उकसा रहे हैं।
जेपी एक तरफ राजनीति में एकाधिकारवाद और सरकार में ंभ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे थे और दूसरी ओर इंदिरा जी जेपी पर उसी तरह के आरेाप लगा रही थीं जिस तरह कांग्रेस की तरफ से आज मनीष तिवारी और सरकार की तरफ से कपिल सिब्बल अन्ना-रामदेव पर प्रति - आरोप लगा रहे हैं।क्या प्रति-आरोप से इंदिरा गांधी सन 1977 के चुनाव में पराजय से अपनी पार्टी को बचा पाईं ? क्या प्रति-आरोप में ं जनताने कोई दम पाया था ?
इसी तरह का प्रति -आरोप कांग्रेस के कुछ लेागों ने अस्सी के दशक में वी.पी.सिंह के पुत्र अजेय सिंह के नाम सेंट कींटस में फर्जी बैंक खाता खोल कर लगाया था। पर बोफर्स तोप सौदे के आरोप की पृष्ठभूमि में 1989 के लोक सभा चुनाव में राजीव गांधी की सरकार सत्ता से बाहर हो गई। तब भी अधिकतर जनता ने यह माना कि बोफर्स घोटाले पर राजीव गांधी की सफाई सही नहीं थी।भले शंकरानंद के नेतृत्व वाली जेपीसी और सी.बी.आई.ने बोफर्स के दलालों को साफ बचा लिया हो,पर केंद्रीय आयकर न्यायाधिकरण ने हाल में यानी इसी साल यह कह ही दिया कि क्वोत्रोची और एक अन्य व्यापारी ने बोफर्स दलाली के पैसों को स्विस बैंक की लंदन स्थित शाखा के अपने खातों में जमा किया था।
लगता है कि हाल के इतिहास से भी कुछ नहीं सीखने की कांग्रेस पार्टी और उसकी सरकार ने कसम खा ली है। अन्ना हजारे और स्वामी राम देव के आंदोलन में लग रहे पैसों पर सवाल उठाते हुए मनीष तिवारी कहते हैं कि ये पैसे कहां से आ रहे हैं,यह किसी को मालूम नहीं है।खोजी पत्रकारिता की इसमंे ंजरूरत है।
सन 1974 में ऐसे सवालों का जवाब जय प्रकाश ने इंदिरा गांधी को दिया था।जेपी ने तब एक प्रेस बयान में कहा था कि यदि इंदिरा जी के मापदंड को मापा जाए तो महात्मा गांधी ही सबसे भ्रष्ट व्यक्ति माने जाएंगे।क्योंकि गांधी के सभी सहयोगियों का पोषण उनके धनी प्रशंसकों द्वारा किया जाता था।जेपी ने इस पर यह भी कहा था कि मुझे आश्चर्य है कि कब तक इस देश के लोग अपने उच्चपदस्थ और शक्तिशाली व्यक्तियों के ऐसे उटपटांग बकवासों को सहन करते रहेंगे ?
याद रहे कि 1977 के चुनाव नतीजों ने बता दिया था कि जनता ऐसे उटपटांग बयानों को अंततः मौका मिलने पर सहन नहीं किया करती जिस तरह की बातें कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी आज कर रहे हैं। केंद्र सरकार और कांग्रेस को भ्रष्टाचार के आरोप के सबूत मिलते ही अन्ना और स्वामी को जेल भिजवाना चाहिए ।पर लगता है कि कांग्रेस और उनकी सरकार अन्ना -स्वामी राम देव से यह उम्मीद करती है कि तुम हमारे भ्रष्टाचार को सहन करो और हम तुम्हारे भ्रष्टाचार को नजरअंदाज कर रहे हैं।अन्यथा हम तुम्हंे नैतिक रूपसे कमजोर करके तुम्हारे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की हवा निकाल देंगे।यदि ऐसा ही संभव होता तो जेपी से जुड़े संगठनों के खिलाफ भ्रष्टाचार के कथित आरोपों की कुदाल आयोग से जांच करवा कर सन 1977 में चुनावी पराजय से इंदिरा सरकार बच जाती।दरअसल सबसे बड़ी बात यह है कि भ्रष्टाचार का सवाल आज सिर्फ नैतिकता का सवाल ही नहीं है,बल्कि रोजी-रोटी और राष्ट्र की सुरक्षा का भी सवाल है। यह सिर्फ कुछ परस्पर विरोधी हस्तियों के बीच का ही मामला कत्तई नहीं है। जो ऐसा मानेगा ,वह सन 2014 में सन 1977 और सन 1989 दोहराने को तैयार रहे।
साभार जनसत्ता)
रविवार, 20 मार्च 2011
बाबा राम देव पर डोरे डालने से पहले भाजपा अपनी पिछली गलतियों के लिए देश से माफी भी मांगे
केंद्र की सत्ता करीब आती देख भाजपा बाबा राम देव पर राजनीतिक डोरे डाल रही है। कांग्रेस को परेशानी में देख कर भाजपा समझ रही है कि ‘मेरी कमीज से तेरी कमीज यानी कांग्रेस की कमीज जब अधिक गंदी’ हो ही चुकी है, तो अगले चुनाव में कांग्रेस की सफलता संदिग्ध है। इसलिए भाजपा की समझ यह है कि यदि लोगों में लोकप्रियता पा रहे स्वामी रामदेव की थोड़ी मनुहार कर ली जाए तो एक बार फिर केंद्र की सत्ता उसे मिल सकती है। दिल्ली से आ रही खबरों के अनुसार हिमाचल के पूर्व मुख्य मंत्री शांता कुमार स्वामी राम देव के संपर्क में हैं। स्वामी राम देव की हाल की दिल्ली रैली में भाजपा सांसद बलवीर पुंज भी हाजिर थे।
पर क्या इतने ही से भाजपा का काम चल जाएगा ? राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार कत्तई नहीं। दरअसल एक बार फिर केंद्र की सत्ता पाने के लिए भाजपा को देश के सामने अपनी पिछली गलतियों के लिए माफी मांगनी चाहिए। सी.वी.सी. के रूप में विवादास्पद पी.जे. थाॅमस की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय के बाद खुद प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह ने भी अपनी जिम्मेदारी यानी गलती सार्वजनिक रूप से मानी है। यानी जिस गलती पर कोई सफाई नहीं दी जानी सकती, उसे स्वीकार करके जनता से माफी मांग लेने में ही नेताओं व दलों की अब भलाई है।भ्रष्टाचार व अपराधीकरण को लेकर अब जनता को कोई दल व नेता मूर्ख नहीं बना सकता ।
प्रायश्चित करने और रोने के लिए एक स्वामी के कंधे से बढ़िया भाजपा के लिए बेहतर स्थान और क्या हो सकता है ? याद रहे अब तक के संकेत यही है कि स्वामी राम देव को खुद अपने लिए सत्ता नहीं चाहिए।पर वैसे लोगों से ईमानदारी का विश्वास मिलना चाहिए जिन्हें लेकर रामदेव चलना चाहते हैं।बड़ा वह होता है जो अपनी गलतियां स्वीकार करके आगे उसे नहीं दुहराने का संकल्प करता है।राजनीति व दूसरे क्षेत्रों के घटिया लोग अपनी गलतियों व विफलताओं के लिए किसी और को ही कोसते रहते हैं।ऐसे लोग इतिहास के कूड़ेदान में एक दिन नजर आते हैं।
अनेक घोटालों की खबरों के बीच केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार दिनानुदिन ढीली पड़ती जा रही है और नैतिक दष्टि से प्रभावकारी सिविल सोसायटी में भी बढ़ते रोष की झलक सड़कों पर भी अब देखी जा रही है। भाजपा को आज यह लग रहा है कि इसका राजनीतिक व चुनावी लाभ अंततः उसे ही मिलेगा। शायद मिले भी। जेपी आंदोलन का भी चुनावी लाभ राजनीतिक दलों को ही मिला था।सन 1974 में शुरू हुआ जेपी का आंदोलन भी गैर दलीय ही था।पर जब क्रूर शासन की मार पड़ी तो गैर दलीय तत्व कमजोर पड़ने लगे।फिर तपे-तपाये दलीय नेताओं ने मार खाने व कष्ट सहने के लिए अपने कंधे आगे कर दिये थे।स्वामी रामदेव को भी इस उदाहरण को अपने सामने रख कर ही कोई निर्णायक राजनीतिक पहलकदमी करनी चाहिए। हां,उन्हें राजनीतिक दलों से सुधरने का वादा भी ले लेना चाहिए।
सन 1998 से 2004 के बीच के शासन काल में तथा उससे पहले भी भाजपा व उसके सहयोगी दलों ने भ्रष्टाचार व राजनीति के अपराधीकरण और कानून तोड़कों के खिलाफ काफी नरमी दिखाई थी ।सन 1997 में भाजपा के केंद्रीय नेतत्व ने यू.पी. के कल्याण सिंह मंत्रिमंडल में उस प्रदेश के लगभग सभी उन खूंखार अपराधियों व माफियाओं को शामिल कर लिया था जो विधायक थे।
भाजपा ने केंद्र में 1998 से 2004 तक लगातार छह साल तक शासन किया,पर उसने यह साबित कर दिया कि भ्रष्टाचार के मामले में भी वहं कांग्रेस से वह बिलकुल अलग नहीं है।नतीजतन सन 2004 के लोक सभा चुनाव में उसके वोट बैंक में इतना अधिक इजाफा नहीं हो सका था कि वह संकट में काम आ जाता।
घटनाएं बताती हैं कि भाजपा की चिंता का मुख्य विषय भीषण सरकारी भ्रष्टाचार व राजनीति का घोर अपराधीकरण नहीं है बल्कि अब भी भावनात्मक मुद्दे ही हैं। भावनात्मक मुद्दे ही अब भी उसके मर्म स्थल को बंेधते हैं।बदलती स्थिति में इस दल के भविष्य के लिए इसे अच्छा नहीं माना जा रहा है।क्योंकि भीषण सरकारी भ्रष्टाचार व अन्य तरह की शासनहीनता के खिलाफ जिस तरह अब इस देश के उच्चस्तरीय गैर राजनीतिक हलकों में भी गुस्सा व असंतोष बढ़ता जा रहा है कि सन 2014 में बनने वाली कोई भी अगली सरकार इसी तरह से देश को नहीं चला सकेगी जिस तरह आज सोनिया-मन मोहन की जोड़ी मजबूरी में या फिर लापारवाहीपूर्वक चला रही है।यही भाजपा सन 1998 से पहले जब केंद्र में प्रतिपक्ष में थी तो वह भ्रष्टाचार व अपराधीकरण पर काफी हो हल्ला करती रही थी।पर वह 1998 में सरकार में आने के बाद इन दो मुद्दों पर समझौतावादी ही साबित हुई।अब ऐसी गलती की पुनरावति यह देश सहन नहीं करेगा।
क्या भाजपाका केंद्रीय नेतृत्व अब भी बिहार की नीतीश सरकार की जिसमें भाजपा भी एक मजबूत सहयोगी है,राजनीतिक उपलब्धियों से भी कोई सबक नहीं लेगा जिसने भ्रष्टाचार व अपराधीकरण के खिलाफ .भरसक बेलाग कार्रवाइयां करके अपना जन समर्थन काफी बढ़ा लिया है।नीतीश सरकार ने बिहार में कोई सांप्रदायिक या फिर जातीय भावना उभार कर वोट नहीं लिया।बल्कि उसने अपराध व भ्रष्टाचार के खिलाफ हमले की ईमानदार कोशिश करके अपना जन समर्थन बढ़ाया।बिहार सहित पूरे देश की सबसे बड़ी समस्या भीषण सरकारी भ्रष्टाचार ही है।
इन दो समस्याओं पर कठोर रुख अपनाने के बदले अन्य भावनात्मक मुददे भाजपा उठाती रही।ऐसा नहीं कि बिहार में कोई स्वर्ग आ गया है।पर नीतीश कुमार ने अपने करीब पांच साल के क्रियाकलापों से जनता को यह जरूर विश्वास दिला दिया है कि वे भ्रष्टाचार व अपराध से कोई समझौता ं करने को तैयार नहीं हैं।क्या कर्नाटका की यदुरप्पा सरकार को लेकर भाजपा कोई ऐसा ही कदम नहीं उठा सकती ?
पर भाजपा ने अब तक अपने सत्ता काल में बार- बार यह साबित किया कि उसके लिए भ्रष्टाचार व अपराधीकरण ‘मर्मस्थल मुद्दे’ नहीं हैं। अपराधीकरण व भ्रष्टीकरण को लेकर यदि भाजपा ने किसी नेता के खिलाफ वैसी ही सख्त कार्रवाई की होती जैसी कार्रवाई उसने जसवंत सिंह के खिलाफ एक बार की थी तो आज भाजपा पर न तो यह आरोप लगता और न उसे लगातार दो लोक सभा चुनाव हारना पड़ता।उसे चुनाव दृश्य से अटल बिहारी वाजपेयी की अनुपस्थिति और दूसरी तरफ राहुल गांधी यानी नेहरू खानदान के एक सदस्य राहुल गांधी की मजबूत उपस्थिति का जितना चुनावी नुकसान हुआ,उसकी क्षतिपूत्र्ति भी हो गई होती।
अटल सरकार के समय भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को घूस लेते हुए कैमरे पर दिखाया गया था।इसके बावजूद बंगारू की पत्नी को भाजपा ने लोक सभा का चुनावी टिकट दे दिया था । जन विश्वास हासिल करने के लिए जरूरी है कि इन गलतियों के लिए भाजपा देश से माफी मांगे।
इतना ही नहीं । याद कीजिए सन् 2000 की वह घटना जब केंद्रीय सतर्कता आयुक्त एन बिट्ठल ने अटल सरकार के चार मंत्रियों की संपत्ति की जांच करने का निदेश सी.बी.आई.को दिया था।वे चारों चर्चित हवाला घोटाले के अभियुकत रह चुके थे।पर सुप्रीम कोर्ट ने ं कहा था कि सी.बी.आई.ने हवाला घोटाले की ठीक से जांच ही नहीं की।पर इसके विपरीत अटल सरकार ने आरोपितों केा बचाने के लिए सतर्कता आयोग को एक सदस्यीय की जगह तीन सदस्यीय बना दिया ताकि किसी अगले एन.बिटठल को भी किसी मंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं हो।क्या यह गलती हाल में पी.जे.थामस को सी.वी.सी बनाने की कांग्रेसी सरकार की गलती से कम थी ? क्या यह गलती माफी मांगने योग्य नहीं है ?
एक और गलत काम अटल सरकार ने तब किया जब सुप्रीम कोर्ट ने 2 मई 2002 को चुनाव आयोग से कहा कि वह उम्मीदवारों के बारे में दिशा निदेश जारी करे। दिशा निदेश यह कि उम्मीदवार अपने शपथ पत्र के साथ संपत्ति,आपराधिक रिकाॅर्ड व शैक्षणिक योग्यता का विवरण दंे।अटल सरकार ने इस निदेश को विफल करने के लिए जन प्रतिनिधित्व कानून में ही संशोधन कराने के लिए अध्यादेश जारी करा दिया।पर भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने इस संशोधन को ही रद कर दिया।
पर क्या इतने ही से भाजपा का काम चल जाएगा ? राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार कत्तई नहीं। दरअसल एक बार फिर केंद्र की सत्ता पाने के लिए भाजपा को देश के सामने अपनी पिछली गलतियों के लिए माफी मांगनी चाहिए। सी.वी.सी. के रूप में विवादास्पद पी.जे. थाॅमस की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय के बाद खुद प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह ने भी अपनी जिम्मेदारी यानी गलती सार्वजनिक रूप से मानी है। यानी जिस गलती पर कोई सफाई नहीं दी जानी सकती, उसे स्वीकार करके जनता से माफी मांग लेने में ही नेताओं व दलों की अब भलाई है।भ्रष्टाचार व अपराधीकरण को लेकर अब जनता को कोई दल व नेता मूर्ख नहीं बना सकता ।
प्रायश्चित करने और रोने के लिए एक स्वामी के कंधे से बढ़िया भाजपा के लिए बेहतर स्थान और क्या हो सकता है ? याद रहे अब तक के संकेत यही है कि स्वामी राम देव को खुद अपने लिए सत्ता नहीं चाहिए।पर वैसे लोगों से ईमानदारी का विश्वास मिलना चाहिए जिन्हें लेकर रामदेव चलना चाहते हैं।बड़ा वह होता है जो अपनी गलतियां स्वीकार करके आगे उसे नहीं दुहराने का संकल्प करता है।राजनीति व दूसरे क्षेत्रों के घटिया लोग अपनी गलतियों व विफलताओं के लिए किसी और को ही कोसते रहते हैं।ऐसे लोग इतिहास के कूड़ेदान में एक दिन नजर आते हैं।
अनेक घोटालों की खबरों के बीच केंद्र की कांग्रेसनीत सरकार दिनानुदिन ढीली पड़ती जा रही है और नैतिक दष्टि से प्रभावकारी सिविल सोसायटी में भी बढ़ते रोष की झलक सड़कों पर भी अब देखी जा रही है। भाजपा को आज यह लग रहा है कि इसका राजनीतिक व चुनावी लाभ अंततः उसे ही मिलेगा। शायद मिले भी। जेपी आंदोलन का भी चुनावी लाभ राजनीतिक दलों को ही मिला था।सन 1974 में शुरू हुआ जेपी का आंदोलन भी गैर दलीय ही था।पर जब क्रूर शासन की मार पड़ी तो गैर दलीय तत्व कमजोर पड़ने लगे।फिर तपे-तपाये दलीय नेताओं ने मार खाने व कष्ट सहने के लिए अपने कंधे आगे कर दिये थे।स्वामी रामदेव को भी इस उदाहरण को अपने सामने रख कर ही कोई निर्णायक राजनीतिक पहलकदमी करनी चाहिए। हां,उन्हें राजनीतिक दलों से सुधरने का वादा भी ले लेना चाहिए।
सन 1998 से 2004 के बीच के शासन काल में तथा उससे पहले भी भाजपा व उसके सहयोगी दलों ने भ्रष्टाचार व राजनीति के अपराधीकरण और कानून तोड़कों के खिलाफ काफी नरमी दिखाई थी ।सन 1997 में भाजपा के केंद्रीय नेतत्व ने यू.पी. के कल्याण सिंह मंत्रिमंडल में उस प्रदेश के लगभग सभी उन खूंखार अपराधियों व माफियाओं को शामिल कर लिया था जो विधायक थे।
भाजपा ने केंद्र में 1998 से 2004 तक लगातार छह साल तक शासन किया,पर उसने यह साबित कर दिया कि भ्रष्टाचार के मामले में भी वहं कांग्रेस से वह बिलकुल अलग नहीं है।नतीजतन सन 2004 के लोक सभा चुनाव में उसके वोट बैंक में इतना अधिक इजाफा नहीं हो सका था कि वह संकट में काम आ जाता।
घटनाएं बताती हैं कि भाजपा की चिंता का मुख्य विषय भीषण सरकारी भ्रष्टाचार व राजनीति का घोर अपराधीकरण नहीं है बल्कि अब भी भावनात्मक मुद्दे ही हैं। भावनात्मक मुद्दे ही अब भी उसके मर्म स्थल को बंेधते हैं।बदलती स्थिति में इस दल के भविष्य के लिए इसे अच्छा नहीं माना जा रहा है।क्योंकि भीषण सरकारी भ्रष्टाचार व अन्य तरह की शासनहीनता के खिलाफ जिस तरह अब इस देश के उच्चस्तरीय गैर राजनीतिक हलकों में भी गुस्सा व असंतोष बढ़ता जा रहा है कि सन 2014 में बनने वाली कोई भी अगली सरकार इसी तरह से देश को नहीं चला सकेगी जिस तरह आज सोनिया-मन मोहन की जोड़ी मजबूरी में या फिर लापारवाहीपूर्वक चला रही है।यही भाजपा सन 1998 से पहले जब केंद्र में प्रतिपक्ष में थी तो वह भ्रष्टाचार व अपराधीकरण पर काफी हो हल्ला करती रही थी।पर वह 1998 में सरकार में आने के बाद इन दो मुद्दों पर समझौतावादी ही साबित हुई।अब ऐसी गलती की पुनरावति यह देश सहन नहीं करेगा।
क्या भाजपाका केंद्रीय नेतृत्व अब भी बिहार की नीतीश सरकार की जिसमें भाजपा भी एक मजबूत सहयोगी है,राजनीतिक उपलब्धियों से भी कोई सबक नहीं लेगा जिसने भ्रष्टाचार व अपराधीकरण के खिलाफ .भरसक बेलाग कार्रवाइयां करके अपना जन समर्थन काफी बढ़ा लिया है।नीतीश सरकार ने बिहार में कोई सांप्रदायिक या फिर जातीय भावना उभार कर वोट नहीं लिया।बल्कि उसने अपराध व भ्रष्टाचार के खिलाफ हमले की ईमानदार कोशिश करके अपना जन समर्थन बढ़ाया।बिहार सहित पूरे देश की सबसे बड़ी समस्या भीषण सरकारी भ्रष्टाचार ही है।
इन दो समस्याओं पर कठोर रुख अपनाने के बदले अन्य भावनात्मक मुददे भाजपा उठाती रही।ऐसा नहीं कि बिहार में कोई स्वर्ग आ गया है।पर नीतीश कुमार ने अपने करीब पांच साल के क्रियाकलापों से जनता को यह जरूर विश्वास दिला दिया है कि वे भ्रष्टाचार व अपराध से कोई समझौता ं करने को तैयार नहीं हैं।क्या कर्नाटका की यदुरप्पा सरकार को लेकर भाजपा कोई ऐसा ही कदम नहीं उठा सकती ?
पर भाजपा ने अब तक अपने सत्ता काल में बार- बार यह साबित किया कि उसके लिए भ्रष्टाचार व अपराधीकरण ‘मर्मस्थल मुद्दे’ नहीं हैं। अपराधीकरण व भ्रष्टीकरण को लेकर यदि भाजपा ने किसी नेता के खिलाफ वैसी ही सख्त कार्रवाई की होती जैसी कार्रवाई उसने जसवंत सिंह के खिलाफ एक बार की थी तो आज भाजपा पर न तो यह आरोप लगता और न उसे लगातार दो लोक सभा चुनाव हारना पड़ता।उसे चुनाव दृश्य से अटल बिहारी वाजपेयी की अनुपस्थिति और दूसरी तरफ राहुल गांधी यानी नेहरू खानदान के एक सदस्य राहुल गांधी की मजबूत उपस्थिति का जितना चुनावी नुकसान हुआ,उसकी क्षतिपूत्र्ति भी हो गई होती।
अटल सरकार के समय भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को घूस लेते हुए कैमरे पर दिखाया गया था।इसके बावजूद बंगारू की पत्नी को भाजपा ने लोक सभा का चुनावी टिकट दे दिया था । जन विश्वास हासिल करने के लिए जरूरी है कि इन गलतियों के लिए भाजपा देश से माफी मांगे।
इतना ही नहीं । याद कीजिए सन् 2000 की वह घटना जब केंद्रीय सतर्कता आयुक्त एन बिट्ठल ने अटल सरकार के चार मंत्रियों की संपत्ति की जांच करने का निदेश सी.बी.आई.को दिया था।वे चारों चर्चित हवाला घोटाले के अभियुकत रह चुके थे।पर सुप्रीम कोर्ट ने ं कहा था कि सी.बी.आई.ने हवाला घोटाले की ठीक से जांच ही नहीं की।पर इसके विपरीत अटल सरकार ने आरोपितों केा बचाने के लिए सतर्कता आयोग को एक सदस्यीय की जगह तीन सदस्यीय बना दिया ताकि किसी अगले एन.बिटठल को भी किसी मंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं हो।क्या यह गलती हाल में पी.जे.थामस को सी.वी.सी बनाने की कांग्रेसी सरकार की गलती से कम थी ? क्या यह गलती माफी मांगने योग्य नहीं है ?
एक और गलत काम अटल सरकार ने तब किया जब सुप्रीम कोर्ट ने 2 मई 2002 को चुनाव आयोग से कहा कि वह उम्मीदवारों के बारे में दिशा निदेश जारी करे। दिशा निदेश यह कि उम्मीदवार अपने शपथ पत्र के साथ संपत्ति,आपराधिक रिकाॅर्ड व शैक्षणिक योग्यता का विवरण दंे।अटल सरकार ने इस निदेश को विफल करने के लिए जन प्रतिनिधित्व कानून में ही संशोधन कराने के लिए अध्यादेश जारी करा दिया।पर भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने इस संशोधन को ही रद कर दिया।
( 9 मार्च 2011 को प्रभात खबर पटना में प्रकाशित )
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