सोमवार, 4 नवंबर 2013

मोदी के भाषण-लेखक की योग्यता पर सवाल !



बिहार में भी नरेंद्र मोदी ने अपने दल के लिए हवा जरुर बना दी है, पर, राहुल गांधी को लगातार राजनीतिक मात देते लग रहे मोदी अपने पटना भाषण के तथ्योें को लेकर नीतीश कुमार से मात खा गये।

  जाहिर है कि बिहार में उनका मुकाबला किसी पप्पू से नहीं है। 27 अक्तूबर की पटना की हंुकार रैली में नरेंद्र मोदी का भाषण जोरदार रहा। उन्होंने अपने मुग्ध श्रोताओं को उन्होंने खूब रिझाया। पर, जब 29 अक्तूबर को नीतीश कुमार ने जदयू के राजगीर शिविर में नरेंद्र मोदी के आरोपों का सिलसिलेवार जवाब दिया तो अनेक लोगों को यह लगा कि नरेंद्र मोदी को अपना भाषण लेखक बदल लेना चाहिए।

नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के भाषणों के राजनीतिक पक्षों को नजरअंदाज भी कर दें तो तथ्यों की दृष्टि से नरेंद्र मोदी एक साथ पप्पू और फेंकू दोनों लगे।

एक ऐसा नेता जिसे आज बड़ी संख्या में श्रोता मिल रहे हैं, और जो प्रधानमंत्री पद का गंभीर उम्मीदवार है, उसे अपने भाषणों के तथ्यों की पहले सावधानीपूर्वक जांच कर लेनी चाहिए। क्योंकि नरेंद्र मोदी को नीतीश कुमार ही नहीं बल्कि पूरा देश आज सुन रहा है।

  अब मोदी और नीतीश के ताजा भाषणों पर एक नजर डाल ली जाए। नीतीश कुमार ने राजगीर में कहा कि ‘मैं टी.वी. देख रहा था। चंद्रगुप्त को गुप्त वंश का कहा गया जबकि चंद्रगुप्त मौर्य वंश के संस्थापक थे। तक्षशिला को भी बिहार में ही बता दिया गया जबकि वह पाकिस्तान में है।

सिकंदर को गंगा किनारे पहुंचा दिया गया जबकि सिकंदर तो सतलज के पास से ही भाग गया था।’
   अब पढि़ए कि नरेंद्र मोदी ने अपने पटना भाषण में क्या कहा था। मोदी ने बिहार की गौरव गाथा सुनाते हुए कहा कि ‘अगर रामायण काल को याद करें तो माता सीता की याद आती है। महाभारत काल की याद करें तो कर्ण की याद आती है। गुप्तकाल में चंद्रगुप्त की राजनीति प्रेरणा देती है। नालंदा की बात करें तो विक्रमशिला और तक्षशिला की याद आती है।’

   तथ्यों की भूल के अलावा नरेंद्र मोदी ने पटना के अपने जोशीले भाषण में एक सांस्कृतिक गलती भी कर दी। उन्होंने न सिर्फ भगवान कृष्ण को एक जाति विशेष के साथ जोड़ दिया बल्कि उन्होंने चुनावी राजनीति में जातीय पुट भी दे दिया।

   इस संबंध में उन्होंने दिलचस्प मोदी -लालू संवाद का विवरण भी जनसभा में पेश किया। नरेंद्र मोदी ने कहा कि लालू प्रसाद मुझे गाली देने का कोई मौका नहीं छोड़ते। कहते थे कि मोदी को पी.एम. बनने नहीं दूंगा। लालू जी का एक्सीडेंट हो गया। मैंने लालू जी को फोन किया। उनका हालचाल पूछा। मैंने मीडिया को नहीं बताया। मैंने सोचा पर्सनल बात है, इसको मीडिया को क्यों बताया जाये। पर लालू जी ने मीडिया को बुलाया। मीडिया से उन्होंने कहा कि मैं जिसे गाली देता हूं, देखो वो मुझे फोन करता है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मोदी ने कहा कि ‘लालू जी,यदुवंश के राजा द्वारिका में ही बसे थे। आपको कुछ हो जाए तो हमारी चिंता स्वाभाविक है। मैं द्वारिका से आशीर्वाद लेकर आया हूं। अब आपके यदुवंशी समाज की चिंता का जिम्मा मैं लेता हूं। कृष्ण के काम को अब हम सब मिलकर करेंगे।’

  मोदी की इस जातिवादी टिप्पणी पर नीतीश कुमार ने मंंगलवार को कहा कि ‘रैली में खुलेआम जाति का नाम लिया गया। कृष्ण तो सबके भगवान हैं। लेकिन उन्हें भी जाति में बांध दिया गया।’

  मोदी और नीतीश की बातों से एक और बात निकलती है। दरअसल कृष्ण को यादवों के साथ जोड़ देने के बाद क्षत्रिय भगवान श्रीराम और ब्राह्मण भगवान परशुराम पर दावा कर सकते हैं। कुछ अन्य जातियां किन्हीं अन्य भगवान पर अपना दावा ठोक सकती हैं। यदि इस बात को कोई और आगे बढ़ाया जाएगा तो एक दिन कोई सनकी यह भी कह सकता है कि चूंकि हम ऊंची जाति के हैं, इसलिए मेरा भगवान तेरे भगवान से ऊंचा है। इस मुददे पर आपसी संघर्ष भी हो सकता है।फिर भाजपा की हिन्दू एकता का क्या होगा ? हाल ही में  भाजपा नेता  डा.सुब्रहमण्यम स्वामी ने कहा है कि हम चाहते हैं कि हिन्दुओं मेंें एकता कायम हो और मुस्लिम समुदाय में अनेकता हो। ऐसे में डा. स्वामी नरेंद्र मोदी को अब कैसी सलाह देंगे ?

   यदि नरेंद्र मोदी द्वारा विवादास्पद बातंें नहीं बोली जातीं तोभी पटना में भाजपा की हुंकार रैली सकारात्मक संदेश दे जाती।

  नरेंद्र मोदी ने सांप्रदायिक सद्भाव और एकता की ठोस बात पटना रैली में कही।उन्होंने गरीब हिन्दुओं से सवाल किया कि क्या आप गरीबी से लड़ना चाहते हो या  मुसलमानों से ? उसी तरह उन्होंने गरीब मुसलमानों ये यह सवाल किया कि आप गरीबी से लड़ना चाहते हो या हिन्दुओं से ?

  इतना ही नहीं, सभा स्थल पर यहां तक कि मंच के आसपास हो रहे बम विस्फोटों के बीच भी हुंकार रैली में मंच से कोई उत्तेजक बातें नहीं कही गई। बल्कि बम विस्फोटों से भीड़ का ध्यान हटाने की ही सफल चेष्टा की गई। नरेंद्र मोदी सहित सभी भाजपा मंचासीन नेताओं ने अत्यंत उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में भी अभूतपूर्व संयम बरता। इसका भी भाजपा के पक्ष में सकरात्मक संदेश गया।मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने भी भाजपा नेताओं के इस संयम की सार्वजनिक रुप से सराहना की। पर यही संयम नरेंद्र मोदी के भाषण में भी देखी जाती तो वह प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार के व्यक्तित्व के अनुकूल होती।



राजा जी के अनुसार पटेल पी.एम.होते तो अच्छा होता


सरदार पटेल के जन्म दिन पर विशेष ( 31 अक्तूबर ) 


  राज गोपालाचारी ने सरदार पटेल के निधन के दो दशक बाद यह लिखा था कि यदि आजादी के बाद सरदार पटेल इस देश के प्रधानमंत्री और जवाहर लाल नेहरु विदेश मंत्री बने होते तो देश के लिए बेहतर होता।

 आजाद भारत के पहले गवर्नर जनरल राज गोपालाचारी उर्फ राजाजी ने इस बात के बावजूद यह बात लिखी कि जवाहर लाल नेहरु उन्हें यानी राजाजी को देश के प्रथम राष्ट्रपति बनवाना चाहते थे। पर सरदार पटेल राजेंद्र बाबू के पक्ष में थे ,इसलिए राजाजी नहीं बन सके।

  खुद की बनिस्पत देश के हित के बारे में अधिक सोचने वाले राजा जी का यह विचार आज के नेताओं के लिए सीख है। राजाजी चाहते थे कि उनके राजनीतिक विरोधी भी यदि योग्य हैं तो प्रधानमंत्री वही बनते तो देश के लिए अच्छा होता।

 उधर किस तरह राजा जी के मामले में जवाहर लाल नेहरु और सरदार पटेल के बीच कड़ी रस्साकसी चली थी, वह विवरण जानना दिलचस्प होगा।

       ‘यूं तो मैं जानता हूं कि राज गोपालाचारी का नाम उनके सन् 1942 के आंदोलन का विरोध करने के कारण, कांग्रेस वालों को बहुत अच्छा नहीं लगेगा, पर यदि विदेशी खिड़की से झांका जाए तो राजाजी का व्यक्तित्व बहुत ऊंचा है। उन्होंने गवर्नर जनरल के रूप में बहुत कुछ नाम कमाया है।’ 

कांग्रेस विधान पार्टी की बैठक में 1949 में जवाहर लाल नेहरू ने राजगोपालाचारी को देश का प्रथम राष्ट्रपति बनाने के लिए उपर्युक्त शब्दों में अपनी बात रखी थी। बैठक आरंभ होते ही जवाहर लाल जी ने कहा कि ‘राजेंद्र बाबू ने अपना नाम वापस ले लिया है और यह बड़े गौरव की बात इतिहास में जाएगी कि हमने प्रथम राष्ट्रपति को निर्विरोध चुन लिया।’ यह विवरण महावीर त्यागी की चर्चित पुस्तक ‘आजादी का आंदोलनःहंसते हुए आंसू’ में दर्ज है। त्यागी केंद्र में मंत्री भी रहे थे।

  महावीर त्यागी ने बैठक के बारे मंे लिखा कि जब जवाहर लाल जी ने राजा जी के नाम का प्रस्ताव किया तो हमारी टोली के सदस्यों ने खड़े होकर जवाहर लाल जी के इस प्रस्ताव का विरोध कर दिया। पहले जस्पत राय कपूर बोले। फिर राम नाथ गोयनका ने बड़े गुस्से से चिल्ला कर कहा कि हमें यह बताइए कि हम राष्ट्रपति कांग्रेस वालों के लिए चुन रहे हैं या उनके विरोधियों के लिए? जब आप अपने मुंह से मान रहे हो कि राजाजी का नाम कांग्रेस वालों को पसंद नहीं आयेगा तो हम क्या कांग्रेसी नहीं हैं ? मैंने भी विरोध करते हुए कहा कि जवाहर लाल जी आपको यह क्या आदत पड़ गई है कि आप हमेशा विदेशी खिड़कियों में से झांकते हैं। फतेहपुर सिकरी के बुलंद दरवाजे में से देखो तो आप जानोगे कि राजेंद्र बाबू का व्यक्तित्व आसमान के बराबर ऊंचा है। इसी तरह सबने विरोध किया। 

बालकृष्ण शर्मा नवीन ने कहा कि मैं प्रस्ताव करता हूं कि यह प्रश्न जवाहर भाई के ऊपर छोड़ दिया जाए। इस पर एक सदस्य ने यह संशोधन पेश किया कि जवाहर लाल जी और सरदार पटेल दोनों मिलकर निर्णय लें। बस सबने ताली बजा दी।

  महावीर त्यागी के अनुसार ,अगले दिन सरदार पटेल ने बताया कि हम लोगों के जाते ही जवाहर लाल और वे एक कमरे में सलाह करने के लिए जा बैठे। जवाहर लाल जी ने कहा कि मेरी राय में तो यह अच्छा ही हुआ कि पार्टी ने यह सवाल हमारे ऊपर छोड़ दिया। राजेंद्र बाबू तो उम्मीदवार हैं नहीं। इसलिए हमें अपना निर्णय राज गोपालाचारी के पक्ष में दे देना चाहिए।

इसपर सरदार ने कहा कि प्रस्ताव के शब्दों के अनुसार हमें पार्टी की आवाज के अनुसार फैसला देना है। अपनी आवाज के अनुसार नहीं। पार्टी के अधिकतर लोग राजेंद्र बाबू को चाहते हैं। हमें अपनी राय नहीं बतानी, वह तो सबको पता है। हमको पंच फैसला देना है। क्या आपकी राय में बहुमत राजाजी को स्वीकार करेगा? इसको सुनकर जवाहर लालजी ने धीरे से कहा तो आप फैसला सुना दो कि हम दोनों की राय में राजेंद्र बाबू को ही राष्ट्रपति चुना जाना चाहिए। इस तरह राजेंद्र बाबू चुन लिये गये।

पर इससे पहले एक दिलचस्प किंतु प्रेरणादायक प्रकरण भी हुआ। इससे जवाहर लाल जी के तब के लोकतांत्रिक मिजाज और राजेंद्र बाबू सत्ता के प्रति निर्मोही रुख का पता चलता है।

  याद रहे कि कांग्रेस विधान पार्टी की बैठक में जवाहर लाल जी ने यहां तक कह दिया था कि यदि आप लोग राजा जी को राष्ट्रपति नहीं बनाएंगे तो आपको अपनी पार्टी का नया नेता भी चुनना होगा। जवाहर लाल जी पार्र्टी के नेता थे और प्रधानमंत्री भी।

पर अधिकतर सदस्य जब इस धमकी में भी नहीं आए तो जवाहर लाल जी राजेंद्र बाबू के यहां चले गये। उन्होंने राजेंद्र बाबू से पूछा कि क्या आप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं ? उन्होंने कहा कि मैं किसी पद का उम्मीदवार नहीं हूं। इस पर जवाहर लाल जी ने कहा कि राजेंद्र बाबू आपसे मेरी अपील है कि आप राजा जी को निर्विरोध चुना जाने दो। राजेंद्र बाबू के अनुसार ‘इस पर मैं लाजवाब हो गया और उनके कहे अनुसार यह लिख कर दे दिया कि राज गोपालाचारी के राष्ट्रपति चुने जाने पर मुझे कोई एतराज नहीं है और मैं इसका उम्मीदवार नहीं हूं।’

इसपर बाद में जब सरदार पटेल और राजेंद्र बाबू के समर्थकों ने राजेंद्र बाबू के सामने गुस्सा जाहिर किया तो राजेंद्र बाबू दोनों हाथों से सिर थाम कर बैठ गये और कहा कि गांधीवादी होते हुए मेरे लिए यह कैसे संभव था कि मैं बच्चों की तरह  पद के लिए जिद करता ?

   तब राजेंद्र बाबू के समर्थकों ने कहा कि एक बात हो सकती है। आप जवाहर लाल जी को एक पत्र लिख दें। आप लिखें कि मैं अपनी बात पर कायम हूं। पर पार्टी के साथियों से बिना परामर्श किये मैंने अपना नाम वापस लिया है। इसलिए मेरी प्रार्थना है कि आप पार्टी के प्रमुख सदस्यों को बुलाकर समझा दें कि वे मेरे वापस हो जाने पर चुनाव निर्विरोध हो जाने दें। उन्होंने तुरंत चिट्ठी लिख दी।

(जनसत्ता ः 31 अक्तूबर 2013)   
   

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

बड़े जतन किए,पर नहीं बच पाए बड़बोले लालू

   सी.बी.आइ. की कठोर जांच -प्रक्रिया और बाद में अदालती कार्रवाइयों से बचने के लिए लालू प्रसाद ने पिछले 17 वर्षों में बहुत हाथ -पांव मारे। कभी किसी को धमकाया तो कभी प्रलोभन दिया। कभी किसी से पैरवी की और करवाई तो कभी  दबाव डलवाया।

  केस से बचने के लिए कभी अपने आवास पर महीनों तक विघ्ननाशक यज्ञ करवाया तो साथ ही देश के मशहूर तीर्थ स्थलों व सिद्ध शक्तिपीठों की अनेक यात्राएं कीं। लालू प्रसाद इस केस के सिलसिले में जब भी अदालत में जाते थे, उससे पहले पूजा पाठ करते थे, मछली के दर्शन करते थे। दही खाकर निकलते थे। इस बार भी रांची अदालत जाने से पहले उन्होंने वह सब किया और साथ ही अपनी प्रिय गाय के भी दर्शन किये।
    पर उनका कोई उपाय काम नहीं आया। अंततः अदालत ने उन्हें दोषी ठहरा ही दिया।

  आज की अपनी स्थिति के लिए खुद लालू प्रसाद ही जिम्मेवार हैं। सन 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू प्रसाद सार्वजनिक रूप से कहा करते थे कि ‘मैं खुद ही कानून बनाता हूं और तोड़ता हूं।’

 उनकी यही प्रवृति हाल तक भी सामने आती रहती थी। मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने जब कोई आपराधिक मामला आता है तो वह अक्सर यह कह दिया करते हैं कि ‘कानून अपना काम करेगा।’

 इसके जवाब में नीतीश का मजाक उड़ाते हुए लालू प्रसाद ने कई बार सार्वजनिक रुप से कहा कि ‘जब कानून ही अपना काम करेगा तो आप किस काम के मुख्यमंत्री बने हुए है ?’

यानी लालू प्रसाद जब मुख्यमंत्री थे तो वे खुद को सदा कानून से ऊपर समझते थे। उनके कई काम भी वैसे ही होते थे। उन्हीं कामों में यह चारा घोटाला भी शामिल है। पर अंत में कानून के गिरफ्त में वे आ ही गये।

  मंडल आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुए 1991 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद को बिहार की गरीब व पिछड़ी जनता ने अभूतपूर्व जन समर्थन दिया था। पर उन्होंने लगातार उस समर्थन का दुरुपयोग ही किया।

  एक बात का उल्लेख यहां विशेष तौर पर जरुरी है। यदि चारा घोटाले की जांच प्रक्रिया पर पटना हाईकोर्ट की निगरानी नहीं होती तो इस केस को तार्किक परिणति तक पहुंचाना संभव नहीं होता। क्योंकि चारा घोटाला न सिर्फ सर्वदलीय बल्कि सर्वपक्षीय भ्रष्टाचार का नमूना है। डा.यू.एन.विश्वास जैसे ईमानदार और निडर सी.बी.आइ. अफसर इस घोटाले की जांच टीम के अगुआ नहीं होते तो भी यह नतीजा शायद सामने नहीं आता क्योंकि राजनीति से जुड़े चारा घोटालेबाज लोग  कभी केंद्र और राज्य सरकार प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से चलाते थे।

चारा घोटालेबाजों ने रिश्वत के बल पर मीडिया के एक हिस्से सहित इस लोकतांत्रिक देश के सिस्टम के लगभग सारे अंगों के संबंधित लोगों को खरीद रखा था। सी.बी.आइ. जांच का आदेश देते हुए पटना हाईकोर्ट ने 1996 में ही कह दिया था कि उच्चस्तरीय साजिश के बिना इतना बड़ा घोटाला संभव ही नहीं था।

      1996 में जब सी.बी.आइ. ने लालू प्रसाद पर शिकंजा कसना शुरु किया तो लालू प्रसाद ने उससे बचने के लिए बहुत हाथ पैर मारे। तब लालू प्रसाद बिहार की राजनीति के महाबली नेता और मुख्यमंत्री थे। खुद को कानून की गिरफ्त से बचाने के लिए किसी की चिरौरी की और किसी की भावना उभारने की कोशिश की तो किसी को बुरी तरह धमकाया। उनके कई उदंड समर्थकों ने तो इस दिशा में  हद ही कर दी।

    कमल पासवान उन दिनों लालू प्रसाद के दल के प्रादेशिक अध्यक्ष थे। उन्होंने 29 सितंबर 1996 को सार्वजनिक रुप से यह धमकी दी कि ‘यदि लालू प्रसाद के चरित्र हनन की कार्रवाई की गई तो देश में खूनी क्रांति होगी और धरती लाल कर दी जाएगी।’

पासवान ने यह भी कहा कि जो लोग यह समझते हैं कि मैं सी.बी.आइ. को धमकाने के लिए ऐसा बयान दे रहा हूं तो वे भ्रम में हैं। हमें सी.बी.आइ. पर पूरा विश्वास है। पर जांच कार्य आगे बढ़ा तो लालू समर्थकों का सी.बी.आइ. पर से विश्वास उठ गया। 1997 में एक दिन पटना के व्यस्त डाक बंगला चौराहे पर आम लोग यह देख कर हैरान रह गये कि लालू समर्थक प्रमुख नेतागण एक नंग धड़ंग बच्चे से जमीन पर पड़े दो पुतलों पर सरेआम पेशाब करवा रहे हैं और बगल खड़े वे लोग हंस रहे हैं। वे पुतले सी.बी.आइ. के जांच अधिकारी डा. यू.एन. विश्वास और भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी केे थे।

   बाद में पुतलों को जला दिया गया। एक अन्य अवसर पर लालू प्रसाद के दल के नेताओं ने पटना राज भवन के सामने यू.एन. विश्वास के पुतले को जलाने से पहले तलवार से काटा। ऐसा करके उन लोगों ने सी.बी.आइ. के कर्त्तव्यनिष्ठ अफसर डा. विश्वास को आतंकित करने की कोशिश की।

  इतना नहीं। लालू प्रसाद ने पता लगा लिया कि डा. विश्वास, जो जांच कार्य में घोटालेबाजों के साथ कोई रहम करने को तैयार नहीं थे, दरअसल बौद्ध हैं। उन्होंने यह भी पता लगा लिया कि उन्होंने किस बौद्ध गुरु से दीक्षा ली है। वह बौद्ध गुरु थे राष्ट्रपाल महाथेरो। लालू प्रसाद ने यू.एन. विश्वास पर प्रभाव डालने के उद्देश्य से बोधगया स्थित उस बौद्ध गुरु राष्ट्रपाल महाथेरो को 1996 के अक्तूबर में फोन किया।

मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने उनसे कहा कि ‘भंते जी, आपके चेला ने हमें झूठमूठ बोल कर फंसा दिया है। प्लीज आप जल्दी कुछ कीजिए। मैं अभी बहुत दिक्कत में हूं।’

   पर राष्ट्रपाल महाथेरो ने मुख्यमंत्री से साफ -साफ कह दिया कि डा. विश्वास की जो गतिविधियां धर्म से संबंधित नहीं हैं, उनसे मेरा कोई सरोकार नहीं है। इस जवाब से लालू प्रसाद को झटका लगा था।

   उसके बाद लालू ने दूसरा रास्ता अपनाया। तब जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद ही थे। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौडा को 10 जनवरी 1997 को पत्र लिखा। याद रहे कि देवगौडा़ भी जनता दल में ही थे। लालू ने लिखा कि वे डा. यू.एन. विश्वास को चारा घोटाले के जांच कार्य से हटा दें। याद रहे कि डा.विश्वास सी.बी.आइ. के पूर्वी क्षेत्र के संयुक्त निदेशक की हैसियत से चारा घोटाले की जांच कार्य को निदेशित कर रहे थे। विश्वास को पटना हाईकोर्ट ने कह रखा था कि आपको जांच कार्य में कोई कठिनाई हो तो हमें सूचित करें।

   31 जनवरी 1997 को पटना के कदमकुआं से गांधी मैदान तक लालू समर्थकों ने सोंटा मार्च /यानी लाठी मार्च/ निकाला। मार्च में शामिल जद कार्यकर्ता उत्तेजक नारे लगा रहे थे। प्रतिपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि सोंटा मार्च सी.बी.आइ. तथा उन लोगों को आतंकित करने के लिए निकाला गया था जिनकी जनहित याचिकाओं पर हाईकोर्ट ने जांच का भार सी.बी.आइ. को सौंपा था।

   2 मई 1997 को अपने आवास पर प्रेस कांफ्रेंस में लालू प्रसाद ने यहां तक कह दिया कि सी.बी.आइ. अमेरीकी खुफिया एजेंसी सी.आइ.ए. की तरह है। सी.बी.आइ.यहां के राजनेताओं की हत्या भी करवा सकती है। अपने समर्थकों की भावना उभारने की लालू प्रसाद की यह एक और कोशिश थी।

    18 मई 1997 को पटना के मिलर स्कूल के मैदान में आयोजित एक समारोह में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने कहा कि राज रहता है तो चेहरे पर मुस्कराहट रहती है। जिस दिन हमारा राज चला जाएगा, उस दिन गरीबों को पता चल जाएगा। उस दिन गरीबों पर सामंती शक्तियां कहर ढाहेंगीं। इसलिए राज को बचाने के लिए दलितों, पिछड़ों और गरीबों को खुद ही आगे आना होगा।

   मीडिया पर जम कर बरसते हुए लालू प्रसाद ने कहा कि सारा अखबार पूंजीपतियों का है। वे लोग पिछले डेढ़ साल से मेरे खिलाफ अभियान चला रहे हैं।

इस लेख का संपादित अंश जनसत्ता के 1 अक्तूबर 2013 के अंक में प्रकाशित/

चारा घोटाला जांच के हीरो डा. यू.एन.विश्वास


     लातिनी अमरीकी विद्रोही चे. ग्वेवारा को अपना आदर्श मानने वाले सी.बी.आइ. अफसर डा. यू.एन. विश्वास चारा घोटाला -जांच -कार्य के हीरो रहे। इस सजा की खबर से उन्हें भारी संतोष मिला होगा। हालांकि उन्होंने भले ही कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया है।

     डा.विश्वास की देखरेख में सी.बी.आइ. ने इस मामले में ऐसा मजबूत केस बनाया था कि घोटालेबाज सजा से बच नहीं पा रहे हैं। देश के बड़े से बड़े वकील आरोपितों के काम नहीं आये। जांच कार्य के दौरान भी वे पटना में पत्रकारों से यह कहा करते थे कि यह एक मजबूत केस साबित होगा।
ऐसा ही हुआ भी।

   चर्चित चारा घोटाले की जांच का भार यदि डा. यू.एन. विश्वास जैसे ईमानदार और निडर अफसर को नहीं मिला होता तो इस महाघोटाले की जांच के काम को उसकी तार्किक परिणति तक पहुंचाया नहीं जा सकता था।

   सी.बी.आइ. का कोई भी अन्य अधिकारी बाहरी और भीतरी तमाम दबावों के बीच वह काम कर पाता जिसे उपेन विश्वास ने बखूबी अंजाम दिया? शायद नहीं।

   हालांकि यह बात भी विश्वास के पक्ष में रही कि पटना हाईकोर्ट ने विश्वास की भरपूर मदद की। इन पंक्तियों के लेखक ने एक संवाददाता के रूप में चारा घोटाले के जांच- कार्य का नेतृत्व करते डा. विश्वास को करीब से देखा था।

  एक बार सी.बी.आइ. के संयुक्त निदेशक /पूर्वी क्षेत्र/ डा. विश्वास ने पटना में पत्रकारों के एक छोटे समूह को बताया था कि मैं कलकत्ता छोड़ते समय हर बार अपनी पत्नी को यह कह कर आता हूं कि ‘शायद मैं इस बार नहीं लौट पाऊंगा।’

  उनकी यह बात कोई बनावटी नहीं थी। जांच के दौरान उन्हें पटना में तरह -तरह के प्रलोभन और धमकियां मिल रहे थे। तीस जून 1997 को विश्वास ने पटना हाईकोर्ट से कहा था कि ‘हमारे अफसरों को जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं, इसलिए राजनीति से जुड़े आरोपितों को गिरफ्तार करना संभव नहीं हो पा रहा है।’  याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पटना हाईकोर्ट चारा घोटाले की जांच की निगरानी कर रहा था।

पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एस.एन. झा और न्यायमूर्ति एस.जे. मुखोपाध्याय के खंडपीठ ने डा. विश्वास को कदम -कदम पर संरक्षण दिया।

     डा. विश्वास को लगातार धमकियां मिल रही थीं। उन्हें कहा जा रहा था कि वे कुछ खास नेताओं को जांच के दायरे से बाहर रखें। सी.बी.आइ. का मुख्यालय भी यह नहीं चाहता था कि इस घोटाले में लालू प्रसाद को  आरोपित किया जाये। डा. विश्वास के नीचे के कुछ अफसर भी उनको सहयोग नहीं दे रहे थे।
इसको लेकर सी.बी.आइ. मुख्यालय और डा. विश्वास के बीच करीब दो महीने तक तनाव रहा। सी.बी.आइ. मुख्यालय पर तत्कालीन प्रधानमंत्री गुजराल का दबाव था। गुजराल की मिलीजुली सरकार लालू प्रसाद के दल के समर्थन से चल रही थी। इधर डा. विश्वास के नेतृत्व में जारी जांच से सी.बी.आइ. के सामने यह बात सामने आ रही थी कि मुख्यमंत्री लालू प्रसाद की घोटालेबाजों से सांठगांठ है। तत्कालीन सी.बी.आइ. निदेशक जोंिगंदर सिंह ने अपनी पुस्तक में यह बात स्वीकारी है कि लालू प्रसाद को बचाने के लिए उनपर प्रधानमंत्री का दबाव था।
 
   जब घोटालेबाजों ने देखा कि डा. विश्वास को प्रभावित नहीं किया जा सकता है तो इस अफसर को तरह- तरह से परेशान किया जाने लगा। डा.विश्वास के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की गई। चारा घोटाले की जांच के बारे में यू.एन. विश्वास द्वारा तैयार प्रगति   प्रतिवेदन को हाईकोर्ट में दाखिल करने से  पहले ही उनके अधीनस्थ अफसर ने उसके निष्कर्षों को बदल दिया था। ऐसा उसने सी.बी.आइ. मुख्यालय के निदेश पर किया था।

  इसकी सूचना विश्वास ने हाईकोर्ट को दी। इस पर हाईकोर्ट ने विश्वास को संरक्षण प्रदान किया। हाईकोर्ट ने कहा कि डा.विश्वास अपनी रपट किसी अन्य अफसर को दिखाये बिना इस अदालत में दाखिल करेंगे।

   इस बीच डा.विश्वास को विधायिका  के विशेषाधिकार हनन का आरोप झेलना पड़ा। बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों में कुछ सत्ताधारी विधायकों व मंत्रियों ने  डा.विश्वास की तीखी आलोचना कीं और उनकी मंशा पर शक किया।

  यानी चारों ओर से दबाव व जान पर खतरे के बीच डा. विश्वास ने चारा घोटाले की सही जांच करके ऐसे आरोप पत्र तैयार करवाये कि अधिकतर घोटालेबाजों को अदालत ने सजा दी। अभी तो सजा देने की प्रक्रिया जारी है।
खुद लालू प्रसाद व जगन्नाथ मिश्र के खिलाफ कई अन्य केस सुनवाई की प्रक्रिया में हैं।

   चर्चित चारा घोटाला केस के जरिए डा. यू.एन. विश्वास ने बिहार में नब्बे के दशक में हलचल मचा दी थी। इस केस में डा. विश्वास के साहसपूर्ण कार्यों ने बिहार से अंततः जंगल राज की समाप्ति में परोक्ष रूप से ही सही, पर शुरुआती भूमिका निभाई। अब सी.बी.आई. के वही रिटायर अफसर  बंगाल विधानसभा का चुनाव लड़कर वहां मंत्री बने हैं। पश्चिम बंगाल में उनकी जीत के पीछे ममता बनर्जी की लोकप्रियता के साथ -साथ बिहार में किये गये उनके कामों का भी असर रहा।

   डा. यू.एन. विश्वास एक ऐसा नाम है जिससे अखबार पढ़ने वाला बिहार का करीब- करीब हर व्यक्ति अवगत है। जांच के दिनों विश्वास की चर्चा बिहार के घर -घर में होती थी।

   जांच के दौरान पटना में डा. विश्वास को बुलेटप्रूफ गाड़ी में चलना पड़ता था।  पर डा. विश्वास ने चारा घोटाले की ऐसी पक्की जांच की और कराई कि जनता एक बड़े हिस्से को भी यह भरोसा हो गया कि कुछ नेताओं की शह पर ही सरकारी खजाने को बेरहमी से लूटा गया था। अंततः रांची की अदालत ने भी उन आरोपों को सही पाया। चारा घोटाले की जांच शुरु होते ही  लालू प्रसाद तथा कुछ खास अन्य नेताओं का राजनीतिक अवसान भी शुरू हो गया था।

   पटना हाई कोर्ट ने सन 1996 में यह आदेश दिया था कि चारा घोटाले की जांच सी.बी.आई. करे क्योंकि यह उच्चस्तरीय साजिश के तहत हुआ है। उन दिनों 1968 बैच के आई.पी.एस. अफसर डा. विश्वास सी.बी.आई. के पूर्वी क्षेत्र के संयुक्त निदेशक थे। चारा घोटाले के कागज पत्र देखने के बाद ही उन्हें लग गया था कि यह एक जघन्य पाप व अपराध है जो मूक पशुओं के खिलाफ किया गया है। पशुओं के हक को छीन कर दरअसल पिछड़ों और आदिवासियों को गरीबी से उबारने के सरकारी कार्यक्रम को धक्का पहंुचाया गया जबकि लालू की सरकार पिछड़ों के वोट से  ही बनी थी।

   इस घोटाले में करीब -करीब सभी दलों के अनेक छोटे-बड़े नेता शामिल थे। दरअसल घोटालेबाज अनेक नेताओं सहित समाज के प्रभु वर्ग के एक बड़े हिस्से पर पैसे बरसा रहे थे।

    जाहिर है कि जांच शुरु होने पर विश्वास पर कितना बड़ा खतरा था। डा.विश्वास ने 12 जनवरी 1997 को ही यह कह दिया था कि ‘मैं  अपनी निजी सुरक्षा की परवाह किये बिना चारा घोटाले की जांच को अंजाम तक पहुंचाउंगा।’

यही काम उन्होंने किया भी। चारा घोटाले का केस इतना पोख्ता बनाया गया है कि कुछ आई.ए.एस. अफसर भी सजा से बच नहीं सके हैं। कुछ साल पहले एक सजायाफ्ता आई.ए.एस. अफसर ने मीडिया से कहा था कि मैं तो इस केस में बर्बाद ही हो गया।

डा.विश्वास ने उन दिनों पटना में मीडिया से खुद ही कहा था कि वह लैटिन अमरीकी क्रांतिकारी चे ग्वेवारा को अपना आदर्श मानते हैं। विश्वास ने ममता बनर्जी के दल में शामिल होना इसलिए भी स्वीकार किया क्योंकि डा. विश्वास को यह विश्वास था कि ममता बनर्जी ईमानदार नेत्री हैं।

पर माकपा नेताओं के बारे में विश्वास की राय दूसरी ही है। डा.विश्वास बताते हैं कि वाम शासन के शुरुआती दौर में उन्होंने कुछ ईमानदार आई.पी.एस. अफसरों के नाम ज्योति बसु को दिये थे ताकि वे उन्हें महत्वपूर्ण जगहों पर तैनात कर सकें। पहले तो ज्योति बसु ऐसा करने के लिए राजी थे। पर बाद में उन्होंने माकपा नेताओं की सलाह पर ऐसे अफसरों को ही महत्वपूर्ण पदों पर तैनात कर दिया जिनमें से अधिकतर बेईमान थे।
 
एक अन्य घटना की चर्चा विश्वास पटना में करते थे। यह बात उस समय की है कि जब सिद्धार्थ शंकर राय पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री थे। आसनसोन में सांप्रदायिक दंगा हो गया जहां विश्वास एस.पी थे। मुख्यमंत्री ने विश्वास से पूछा कि आप दंगा रोकने में विफल क्योें हो गये ?

इस युवा एस.पी. ने कहा कि कांग्रेस के श्रमिक नेतागण ही इसके लिए जिम्मेदार हैं और सत्ताधारी दल उनके खिलाफ कड़ाई करने से पुलिस को रोक रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस तरह के कठिन पदों पर तो आपको नहीं रहना चाहिए। इस पर विश्वास ने कहा कि ‘सर, मैं 24 घंटे में यहां से हटने को तैयार हूं।’

  विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य के लिए बड़े से बड़ा शक्तिशाली व्यक्ति का सामना करने को तैयार रहने वाले डा. विश्वास के ही वश में था कि वह चारा घोटाले की जांच सही ढंग से कर सके और बड़े नेताओं को भी अदालत से सजा दिलवाने लायक केस तैयार करा सके।

बिहार में नमो बनेंगे अति पिछड़ा ?


  क्या अगले लोकसभा चुनाव के समय बिहार में नरेंद्र मोदी के नाम पर अति पिछड़ा कार्ड खेला जाएगा ? क्या उसके बिना नमो का काम बिहार में नहीं चलेगा ? बिहार की राजनीति में जातीय कार्ड खेले जाने की पुरानी परंपरा रही है। ऐसे तो यह बीमारी पूरे देश में है, पर बिहार में कुछ अधिक ही है।

        बिहार के कुछ भाजपा नेताओं के हाल के बयानों को ध्यान में रखें तो शायद नरेंद्र मोदी को इस रूप में भी बिहार में पेश किया जाने वाला है। नरेंद्र मोदी के कुछ खास गुणों और विशेषताओं के कारण संघ व भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है। पर बिहार भाजपा के कुछ नेताओं को यह लगता है कि  मात्र उन गुणों और विशेषताओं से बिहार मंे उनका चुनावी काम नहीं चलेगा।

नरेंद्र मोदी के अति पिछड़ा होने का प्रचार भी बिहार में करना पड़ेगा। इस मुद्दे पर खुद नरेंद्र मोदी की राय अभी सामने नहीं आई है। विराट हिंदू एकता की बात करने वाले भाजपा के सहमना संगठनों की राय भी आनी बाकी है। पर, लगता है कि बिहार भाजपा के कुछ नेता नमो को लोकसभा चुनाव के समय बिहार में इस नये रूप में पेश करके ही मानेंगे। वे ऐसा पहले से भी  कर  रहे हैं। यदि खुद नमो की सहमति से अंततः ऐसा हुआ तो यह सवाल उठेगा कि क्या इससे नरेंद्र मोदी के हिंदू हृदय सम्राट की छवि को धक्का नहीं लगेगा ?

    जो हो , नीतीश विरोध के अतिरेक के चक्कर में राज्य के कुछ भाजपा नेता नमो  को उप जातीय चौखटे में कैद कर देना चाहते हैं ताकि नीतीश कुमार को राजनीतिक दृष्टि से नुकसान पहुंचाया जा सके।

  याद रहे कि अति पिछड़ा वोट बैंक जदयू का सबसे बड़ा वोट बैंक है। कुछ बिहारी भाजपा नेतागण पिछले कुछ महीनों से बिहार में यह प्रचार कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी गुजरात की अति पिछड़ी घांची जाति से आते हैं। इस जाति के लोग कपास से तेल निकालने का काम करते हैं। वे अपने भाषणों व प्रेस बयानों के जरिए बिहार की अति पिछड़ी जातियों के मतदाताओं को पहले से ही यह संदेश दे रहे हैं कि आपकी जाति का एक नेता पहली बार इस देश का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है। इसलिए आप लोग उनका समर्थन करें।

   अब जबकि शुक्रवार को अंततः नरेंद्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बजाप्ता घोषित कर दिया गया तो यह प्रचार और भी तेज हो सकता है। बिहार में अति पिछड़ी जातियों की  आबादी कुल आबादी में करीब 32 प्रतिशत है। यह आंकड़ा 1931 की जनगणना पर आधारित है। तब ओडिसा भी बिहार का हिस्सा था। इस देश में जातीय आधार पर जनगणना अंतिम बार 1931 में हुई थी।

   जिस तरह यादव मतों पर लालू प्रसाद का लगभग एकाधिकार सा बन चुका  है, उसी तरह जदयू को अति पिछड़ी जातियों के अधिकतर मतदाता वोट देते रहे हैं। याद रहे कि लालू प्रसाद के राजद को अल्पसंख्यकों का अधिकांश मत मिलता रहा है। बिहार में यादव और मुसलमानों की मिलीजुली आबादी करीब 28 प्रतिशत है। हाल के वर्षों में जदयू ने अल्पसंख्यक मतों में जरूर सेंध लगाई है। नीतीश कुमार के वोट बैंक में महादलित, पिछड़े मुसलमान और महिला मतदाता भी शामिल हैं।

  नीतीश कुमार खुद कुर्मी जाति से आते हैं। इसलिए स्वाभाविक ही है कि अधिकतर कुर्मी वोट जदयू को मिले। बिहार में जिस जाति के मुख्यमंत्री होते हैं, उस जाति के अधिकतर वोट आम तौर पर मुख्यमंत्री के दल को मिलते हैं।:

   हाल के महीनों में राजद ने बिहार में कुछ राजनीतिक बढ़त हासिल की है। हाल में हुए महाराजगंज लोकसभा उपचुनाव में राजद ने जदयू को बड़े अंतर से हराया था। कई कारणों से महाराजगंज जदयू के लिए एक प्रतिकूल चुनाव क्षेत्र रहा  है। सन 2009 के आम चुनाव में भी वहां से राजद के ही उम्मीदवार विजयी हुए थे। इस विपरीत राजनीतिक परिस्थिति के बावजूद जदयू के उम्मीदवार को महाराजगंज उप चुनाव में दो लाख 44 हजार मत मिले थे। यानी प्रति विधानसभा क्षेत्र में करीब 41 हजार मत। इतने मतों में अति पिछड़े, पसमांदा मुस्लिम, महादलित और महिलाओं के मत शामिल थे।

भाजपा के साथ इन दिनों बिहार में सवर्णों की सहानुभति देखी जा रही है। परंपरागत ढंग से व्यावसायिक समुदाय भाजपा के साथ रहा है। जातीय वोट बैंक वाले बिहार में नमो की हिंदुत्व छवि का भी थोड़ा लाभ मिल रहा है। पर मनमोहन सरकार के लुंजपंुज शासन के मुकाबले नमो को कुछ बढ़त मिल सकती है। इसका अधिक लाभ नहीं मिलेगा क्योंकि बिहार में नीतीश का शासन भी एक बेहतर शासन ही माना जाता रहा है।

नमो के पक्ष में कुछ हवा बिहार में भी है, पर वह हवा चुनाव नतीजों को कितना प्रभावित कर पाएगी, यह अनिश्चित है। खुद बिहार भाजपा के कुछ नेताओं को भी यह नहीं लगता कि वह नमो की मात्र परंपरागत छवि से ही बिहार में निर्णायक जीत हासिल कर सकती है। इसलिए अति पिछड़ा कार्ड खेला जा रहा है। भाजपा जदयू के अति पिछड़ा वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है। इसलिए नमो को जातीय नेता के रूप में भी पेश किया जा रहा है।

   नीतीश सरकार ने अति पिछड़ों के लिए पंचायतों में 20 प्रतिशत सीटें रिजर्व की हैं। उसने महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत सीटें रिजर्व की। उनके लिए राज्य सरकार ने कुछ अन्य काम भी किये हैं। पंचायतों में अति पिछड़ों के लिए हुए आरक्षण का नुकसान खुद कुर्मी जाति को भी हुआ था जिस जाति पिछड़ी जाति से खुद नीतीश कुमार भी आते हैं। इससे यह संदेश गया कि नीतीश ने अपनी जाति को राजनीतिक नुकसान पहंुचा कर भी कमजोर वर्ग को लाभ पहुंचाया। इससे उनका अति पिछड़ा वोट बैंक ठोस हुआ।

  क्या अति पिछड़ों या किसी समुदाय के लिए ठोस काम करने के कारण वोट बैंक बनता है या उस जाति में सिर्फ पैदा होने के कारण ? अगले लोकसभा चुनाव में इस सवाल का जवाब एक बार फिर मिलेगा।

शनिवार, 28 सितंबर 2013

बरकरार रखी गई दागी नेताओं को बचाने की परंपरा

  शायद नयी पीढ़ी को मालूम नहीं हो कि देश मेंं 1975 में इमरजेंसी क्यों लगायी गयी थी। इसलिए उसकी एक बार फिर चर्चा जरुरी है। दरअसल तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की लोकसभा की सदस्यता बचाने के लिए तब लोकतंत्र का गला घोंटा गया था।

  जिस दल की सरकार अपनी प्रधानमंत्री की सदस्यता बचाने के लिए देश पर इमरजेंसी  थोप सकती है, उसने यदि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को धत्ता बताने के लिए 24 सितंबर को अध्यादेश को मंजूरी दे दी तो इसमें कोई आश्चर्य की बात ंनहीं है। आज तो अनेक लोगों की सदस्यता बचाने की उसे जरुरत है। यानी उस दल ने परंपरा कायम  रखी है। यदि 1975 में ही प्रतिपक्ष का आज की तरह पतन हो चुका होता तो इंदिरा गांधी को इमरजेंसी लगाने की भी तब कोई जरुरत नहीं पड़ती।

  केंद्र सरकार के मौजूदा कदम को सर्वदलीय सहमति तो गत एक अगस्त को ही  मिल चुकी थी। बस प्रतिपक्ष का एक हिस्सा आज विरोध इस बात पर कर रहा है कि  अध्यादेश लाने की जल्दीबाजी क्यों दिखाई जा रही है। इसे संसद के रास्ते ही आना चाहिए था। रशीद मसूद और लालू प्रसाद प्रतिपक्ष के होते तो उतना विरोध भी नहीं होता।

याद रहे कि गत 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दो साल से अधिक की  (लोअर कोर्ट से भी) सजा हो जाने पर सांसदों और विधायकों की सदस्यता  तत्काल प्रभाव से समाप्त हो जाएगी।

  अपराधियों व भ्रष्टाचारियों से भरी आज की राजनीति की मुख्य धारा इस निर्णय पर तत्काल हरकत में आ गयी। इस पर एक अगस्त को सर्वदलीय बैठक बुला ली गयी।

 बैठक में तुरंत सर्वदलीय सहमति भी बन गई कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पलटने के उपाय किये जाएं। पहले तो सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर कर दी गई। साथ ही फैसले को पलटने के लिए संबंधित कानून में परिवर्तन के लिए संसद में विधेयक पेश कर दिया गया। पर संसद उसे पास किये बिना ही अन्य कारणों से स्थगित हो गई। इधर 4 सितंबर को सर्वोच्च अदालत ने सरकार की पुनर्विचार याचिका को  नामंजूर कर दिया। इसके बाद अध्यादेश का रास्ता अपनाया गया। इस बात का तनिक ध्यान तक नहीं रखा गया कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त राय है।

     याद रहे कि 1975 और आज में फर्क यही आया है कि अधिकतर प्रतिपक्षी दल व उनके नेतागण भी ऐसे जन विरोधी उपायों के समर्थक बन चुके हंै। राजनीति के अपराधीकरण व भ्रष्टीकरण का खामियाजा अंततः देश की करोड़ों जनता को ही तो भुगतना पड़ता है। जब राजनीति, सरकार व प्रशासन की गंगोत्री ही अपवित्र हो जाती है तो उसका मारक  असर पुलिस थानों व ब्लाॅक दफतरों तक पर पड़ता है।

  याद रहे कि 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जग मोहन लाल सिंहा ने राय बरेली से इंदिरा गांधी का लोकसभा का चुनाव रद कर दिया था। उन पर चुनाव में भ्रष्ट तरीके अपनाने का आरोप साबित हो चुका था। इंदिरा गांधी पर संबंधित कानून की जिन धाराओं को तोड़ने का आरोप था, उन धाराओं में आपातकाल में अनुकूल संशोधन कर दिया गया। संशोधित कानून के तहत जब सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय को पलटने के सिवा सुप्रीम कोर्ट के सामने कोई चारा नहीं था।

    इंदिरा गांधी पर आरोप के बारे में देश के तब के एक शीर्ष  वकील ने  कहा था कि उन पर आरोप ट्राफिक नियम भंग करने जैसे ही मामूली थे। इसके बावजूद तब के प्रतिपक्षी राजनीतिक दलों  और जय प्रकाश नारायण ने प्रधान मंत्री से इस्तीफा मांगा था।

  पर आज की मुख्य धारा की लगभग समग्र राजनीति ऐसे सजायाफ्ता अपराधियों को भी संसद और विधायिकाओं में शोभा बढ़ाने की सुविधा देने पर अमादा है जिन पर जघन्य हत्या, बलात्कार, भीषण भ्रष्टाचार  तथा इस तरह के अन्य जघन्य अपराधों के तहत मुकदमे रहे हैं। कल्पना कीजिए कि इंदिरा गांधी की सदस्यता बचाने के लिए तब कोई सर्वदलीय बैठक और उसमें सहमति संभव थी ?

     कत्तई नहीं। क्योंकि तब राजनीति आज की तरह नहीं थी। हालांकि उसमें गंदगी आनी शुरु जरुर हो गई थी। पर आज तो पूरे कुएं में ही भांग पड़ चुकी है। लगभग सभी दलोंे में लालू प्रसाद और रशीद मसूद मौजूद हैं जिन्हें बचाना है।

  आज इस बात के बावजूद यह हो रहा है कि देश की संसद और विधायिकाओं में ऐसे सदस्यों  की संख्या चुनाव दर चुनाव  बढ़ती जा रही है जिन पर भ्रष्टाचार व अपराध के गंभीर आरोप हैं। लोकसभा के सन  2004 के चुनाव की अपेक्षा 2009 के चुनाव में संसद में ऐसे सदस्यों की संख्या में 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई तो विधायिकाओं में इस अवधि में करीब 31 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

यदि यह रफतार जारी रही, और संकेत हैं कि जारी रहेगी ही,तो वह दिन दूर नहीं जब देश की सरकारों के कैबिनेट में  खूंखार अपराधियों व वारेन हेस्टिंग की तरह के आर्थिक लुटेरों का बहुमत हो जाएगा।

   कतिपय एन.जी.ओ.,कुछ संविधान व कानून प्रेमी हस्तियां ,सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग इस स्थिति से चिंतित जरुर है। संभव है कि सुप्रीम कोर्ट एक बार फिर अपने किसी अगले निर्णय के जरिए मौजूदा अध्यादेश के पक्षधर सरकार की इस मंशा पर पानी फेर दे। अब तो संविधानप्रिय जनता की नजरें सुप्रीम कोर्ट की ओर ही है।

  2002 में केंद्र की तत्कालीन राजग सरकार ने भी सर्वदलीय सहमति से इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के लिए संसद से  कानून बनवाया था।पर,सुप्रीम कोर्ट ने उसे रद कर दिया।सुप्रीम कोर्ट के उस कदम के कारण ही हम आज उम्मीदवारों के आपराधिक रिकार्ड,उनकी संपत्ति का व्योरा और शैक्षणिक योग्यता जान पाते हैं।

  जो राजनीति 2002 में अपने नेताओं व सदस्यों के खिलाफ जारी गंभीर मुकदमों के विवरण तक को भी जनता से छिपाये रखना चाहती थी,वह सजा हो जाने के बावजूद सदस्यता गंवाने देना आज कैसे मंजूर करती  ?

   आज इस देश की मुख्य धारा की राजनीति को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि  अपराध, भ्रष्टाचार,परिवारवाद,जातिवाद और वोट बैंक की राजनीति से हमारा लोकतंत्र कितना लहूलुहान होता जा रहा  है।उसे तो पैसे से सत्ता और सत्ता से पैसा चाहिए।

   इसी बिगड़ती स्थिति को देखते हुए वोहरा समिति, एम.एन.वेंकटचलैया आयोग, द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग, विधि आयोग और चुनाव आयोग ने राजनीति से अपराधियों व भ्रष्टाचारियों को निकाल बाहर करने के लिए समय -समय पर अनेक सिफारिशें कीं। वोहरा कमेटी की रपट 1993 में आई थी। तभी उस पर काम करना चाहिए था। पर 1993 के बाद की विभिन्न सरकारों ने उन सिफारिशों को आलमारियों में बंद कर उनमें मजबूत ताले लगा दिये। पता नहीं हमारे राजनीतिक कर्णधार इस देश को कहां ले जा रहे हैं या ले जाना चाहते हैं ?

   आज की राजनीतिक पार्टी अपने फंड के अज्ञात स्त्रोत के बारे में जनता को कोई सूचना देने को भी तैयार नहीं है जबकि कांग्रेस ने यह घोषणा की है कि  2004 और 2012 के बीच ज्ञात स्त्रोत से उसे मात्र 226 करोड़ और अज्ञात स्त्रोत से 1951 करोड़ रुपये मिले। यही हाल भाजपा का भी है।

   झामुमो सांसद रिश्वत प्रकरण में अदालत ने घूसखोरों को सजा देने में अपनी लाचारी दिखाते हुए कहा था कि संसद ही यह कानून बना सकती है ताकि रिश्वत लेकर सदन के  भीतर वोट करने वाले को सजा दी जा सके। पर संसद ने ऐसा कोई कानून  नहीं बनाया। यदि बना दिया  होता तो न्यूक्लियर डील के समय केंद्र सरकार गिरने से  कैसे बच पाती ? ऐसी परिस्थितियों में आगे भी इसी तरह सरकारों को बचाने की आज की राजनीति की मंशा है।

   न तो सरकार सी.बी.आइ. नामक तोते को पिजड़े से बाहर करने को तैयार है और न ही कारगर लोकायुक्त कानून बनाने के लिए। यदि सी.बी.आइ. को निष्पक्ष बना दिया जाएगा तो मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं को क्लीन चीट कौन देगा ?

  प्रकाश सिंह मामले में पुलिस सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट के निदेश का पालन करने को कोई सरकार तैयार नहीं है।यदि सुधार हो जाएगा तो मुजफ्फरनगर में दंगे के दंगाइयों  को थाने से ही कैसे छोड़ा जा सकेगा ? दंगाइयों के घरों में  एक तरफा छापामारी कैसे संभव होगी ?

 यानी देश कहीं जाए, इससे हमारे अधिकतर हुक्मरानों को आज कोई मतलब नहीं है।दुनिया का कोई अन्य देश लोकतांत्रिक ढंग से चुने गये अपने ही नेताओं से इतना अधिक पीडि़त है,ऐसा कोई उदाहरण अब तक नहीं मिला है।किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि इस दुःश्चक्र से इस गरीब देश को निकालने के उपाय क्या हैं ?

(इस लेख का संपादित अंश 26 सितंबर 2013 के जनसत्ता में प्रकाशित)   

बुधवार, 28 अगस्त 2013

क्यों कराना पड़ा 1971 में लोकसभा का मध्यावधि चुनाव

इस देश में लोकसभा का पहला मध्यावधि चुनाव क्यों कराना पड़ा था? मध्यावधि चुनाव 1971 में हुआ। सन् 1969 में कांग्रेस के महाविभाजन को इसका सबसे बड़ा कारण बताया गया। इस विभाजन के साथ ही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सत्तारूढ़ दल का संसद में बहुमत समाप्त हो चुका था। पर, वह तो सी.पी.आई. तथा कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों की मदद से चल ही रही थी।

तब इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा देते हुए आरोप लगाया था कि इस काम में संगठन कांग्रेस के नेतागण बाधक हैं। कांग्रेस के विभाजन को यह कहकर औचित्य प्रदान करने की कोशिश की गई। क्या उन्होंने गरीबी हटाओ के अपने नारे को कार्यरूप देने के लिए मध्यावधि चुनाव देश पर थोपा ?

 यदि सन् 1971 के चुनाव में पूर्ण बहुमत पा लेने के बाद उन्होंने सचमुच गरीबी हटाने की दिशा में कोई ठोस काम किया होता तो यह तर्क माना जा सकता था। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ कि इस देश से गरीबी वास्तव में हटती। फिर क्यों मध्यावधि चुनाव थोपा गया ? दरअसल केंद्र सरकार के कभी भी गिर जाने के भय से वह चुनाव कराया गया था।

  सन् 1971 के मध्यावधि चुनाव के ठीक पहले देश में हो रही राजनीतिक घटनाओं पर गौर करें तो पता चलेगा कि तब कई राज्यों के मंत्रिमंडल आए दिन गिर रहे थे। इंदिरा गांधी को लगा कि कहीं उनकी सरकार भी किसी समय गिर न जाए! वे वामपंथियों से मुक्ति भी चाहती थीं। एक बार कंेंद्र सरकार गिर जाती तो राजनीतिक व प्रशासनिक पहल इंदिरा गांधी के हाथों से निकल जातीं। यह उनके लिए काफी असुविधाजनक होता।

    लोकसभा के मध्यावधि चुनाव के साथ एक और गड़बड़ी हो गई। सन् 1967 तक लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक ही साथ होते थे। इससे सरकारों, दलों और उम्मीदवारों को कम खर्चे लगते थे। सन् 1971 के बाद ये चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे। इससे खर्चे काफी बढ़ गए। इस कारण राजनीति में काला धन की आमद भी बढ़ गई। दरअसल सन् 1967 और 1970 के बीच उत्तर प्रदेश में पांच और बिहार में विभिन्न दलों के आठ मंत्रिमंडल बने। अन्य कुछ राज्यों में भी ऐसी ही अस्थिरता रही।


इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली नई कांग्रेस को यह जरूरी लगा कि जल्दी यानी नियत समय से एक साल पहले ही लोस का मध्यावधि चुनाव कराकर पूर्ण बहुमत पा लिया जाए।

 उस चुनाव को लेकर पूरी दुनिया में भारी उत्सुकता थी। विदेशी मीडिया में इस बात को लेकर अनुमान लगाए जा रहे थे कि पता नहीं भारत इस चुनाव के बाद किधर जाएगा। उन दिनों दुनिया अमेरिका और सोवियत संघ के दो ध्रुवों के बीच बंटी हुई थी।

ब्रितानी अखबार न्यू स्टेट्समैन ने तब लिखा कि ‘हिम्मत से किंतु शांतिपूर्वक श्रीमती गांधी ने लोकसभा भंग कर दी। भारत में यह पहली बार हुआ है। सत्ताच्युत होने का खतरा न होते हुए भी उनकी सरकार को बहुमत प्राप्त नहीं था और इस स्थिति में वह असंतुष्ट थीं। लगातार चैथी बार अच्छी वर्षा होने के बावजूद कुछ आर्थिक विवशताएं भी थीं।......अब तक के तमाम चुनावों के मुद्दे बहुत ही अस्पष्ट रहे और चुनाव घोषणा पत्रों का उद्देश्य सबको खुश करना रहा है। इस बार स्थिति भिन्न होगी। समान मुद्दों की तह में कुछ ठोस मुद्दे होंगे जो कुछ दलों को वामपंथी और कुछ को दक्षिणपंथी सिद्ध करेंगे।’

  अमेरिकी अखबार क्रिश्चेन सायंस माॅनिटर ने लिखा कि ‘श्रीमती गांधी एक साल से अधिक अर्सा पूर्व कांग्रेस विभाजन के बाद से अल्पमत की सरकार का नेतृत्व कर रही हैं। संसद में कोई भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पास कराने से पहले उन्हें परंपरावादी मास्को समर्थक कम्युनिस्ट पार्टी और क्षेत्रीय राजनीतिक गुटों का समर्थन प्राप्त करना पड़ता था। इसी असंतोषकारी स्थिति से तंग आकर प्रधानमंत्री कई हफ्तों तक सोचती रहीं कि चुनाव कराया जाए या नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से कि पूर्व राजाओं के विशेषाधिकारों को खत्म करने का उनका निर्णय गैर संवैधानिक है, श्रीमती गांधी की सोच खत्म हो गई।’

  न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा कि ‘वर्तमान भारतीय राजनीति की एक विडंबना यह है कि नई दिल्ली द्वारा बहुप्रचाारित हरित क्रांति वास्तव में उन ग्रामीण क्षेत्रों में असंतोष फैला रही है, जहां इसने सामाजिक और आर्थिक विषमता को बढ़ावा दिया है। श्रीमती गांधी की सधी हुई राजनीतिक चालें अब तक तो प्रतिपक्ष को डगमगाती रही है। लेकिन उनके विरोध में संगठित होने का प्रतिपक्ष का हौसला भी बढ़ता रहा है। यदि श्रीमती गांधी का पासा सही गिरा तो भारत अधिक परिपुष्ट राजनीतिक स्थायित्व और संयत वामपंथी सत्ता के अधीन अधिक गतिशील विकास के नये युग में प्रवेश करेगा। अगर नई कांग्रेस आगामी चुनाव में यथेष्ट बहुमत प्राप्त न कर सकी तो भारतीय राजनीति की वर्तमान विभाजक प्रवृतियां इस उपमहाद्वीप के लिए भारी खतरा उत्पन्न करेगी।’  
(प्रभात खबर में प्रकाशित)