बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

परंपरागत दलों के लिए दिल्ली से कड़ा संदेश


दिल्ली चुनाव में ‘आप’ की नयी राजनीतिक शैली की जीत हुई है। जो राजनीतिक पंडित और नेतागण इसे नरेंद्र मोदी और किरण बेदी की हार बता रहे हैं, वे इसका सतही आकलन ही कर रहे हैं।

   जिस नरेंद्र मोदी ने गत दिसंबर में झारखंड और जम्मू-कश्मीर में पार्टी को जीत दिलाई, वे सिर्फ दो महीने के भीतर ही इतना अलोकप्रिय कैसे और किन कारणों से हो गए कि दिल्ली में भाजपा मात्र तीन सीटों पर सिमट गई ?

  मोदी अलोकप्रिय नहीं हुए, बल्कि लोकप्रियता में केजरीवाल उनपर भारी पड़ गए। दरअसल दिल्ली के अधिकतर मतदाताओं ने ‘आप’ के इस वायदे पर अधिक भरोसा किया कि वह भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाएगी और वी.वी.आई.पी. संस्कृति से दूर रहेगी।

 याद रहे कि अपने जन्मकाल से ही ‘आप’ ने अपने काम और व्यवहार से यह साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार के साथ उसकी शून्य सहनशीलता है। याद रहे कि  भ्रष्टाचार अनेक सरकारी सुविधाओं को आम लोगों तक पहुंचने से रोकता है।

  जो राजनीतिक पंडित ‘आप’ की भारी जीत के अन्य कारण गिना रहे हैं, उन्हें भ्रष्टाचार के वास्तविक कुपरिणामों का पता नहीं है।  

    लोकसभा चुनाव में यदि नरेंद्र मोदी राजग को भारी जीत दिला पाए तो उसका भी प्रमुख कारण यही था कि लोगबाग मनमोहन सरकार के महाघोटालों से चिंतित थे। हालांकि किसी चुनावी जीत या हार के कई कारण होते हैं। पर उनमें से कोई एक निर्णायक कारण होता है।

    दिल्ली सहित पूरे देश में ग्रासरूट स्तर पर भी लोगबाग पुलिस और प्रशासन के भारी भ्रष्टाचार से परेशान रहे हैं। चूंकि नरेंद्र मोदी की इन मामलों में साख बेहतर है,इसलिए उन्हें लोक सभा चुनाव में अधिकतर जनता का समर्थन मिला।

  2014 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की जगह ‘आप’ जैसी कोई साख वाली पार्टी होती तो शायद राजग की सरकार केंद्र में नहीं बन पाती। 

  स्वाभाविक ही था कि मनमोहन सरकार की कमीज से नरेंद्र मोदी की कमीज जनता को  काफी उजली लगी। गत दिसंबर में अब्दुल्ला परिवार और सोरेन परिवार की कमीजें मोदी की कमीज से अधिक उजली भला किसे लग सकती थी ? पर, यही बात दिल्ली में नहीं थी।

   अरविंद केजरीवाल के 49 दिनों के शासनकाल में दिल्ली के लोगों ने यह महसूस किया कि शासन के भ्रष्टाचार में चमत्कारिक रूप से कमी आ गई थी।

 पर  कई  माह पहले केंद्र में मोदी सरकार बन जाने के बावजूद दिल्ली के भाजपानीत म्युनिसिपल काॅरपोरशन के भ्रष्टाचार में आज भी कोई कमी नहीं आई।

 यहां तक कि केंद्र सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार की व्यापकता के अनुपात में मोदी सरकार उससे उतनी ही कठोरता से लड़ती नजर नहीं आई।

     भाजपा को दिल्ली में जिस तरह की हार का सामना करना पड़ा,वैसी ही हार उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य के विधानसभा चुनाव में भी झेलनी पड़ेगी, ऐसा नहीं लगता। क्योंकि जाहिरा तौर पर मुलायम परिवार की कमीज की अपेक्षा नरेंद्र मोदी की कमीज काफी उजली साबित होगी।

   हां, भाजपा ही नहीं, बल्कि देश के अन्य राजनीतिक दलों को भी तब चिंता करने की जरुरत जरुर पड़ेगी जब ‘आप’ दिल्ली सरकार में बेहतर काम करके देश के बाकी हिस्सों  में भी फैलने की कोशिश करेगी।
 क्योंकि ‘आप’ की राजनीतिक शैली अपनाने में परंपरागत दलों को काफी दिक्कतेें आएंगी।

 ‘आप’ मौजूदा राजनीति का विकल्प नहीं,बल्कि वैकल्पिक राजनीति खड़ी करने में विश्वास करती है। परंपरागत दलों के अस्तित्व के लिए  बेहतर तो यही होगा कि वे भी सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति जल्द से जल्द अपना लें।

  चुनावी चंदे के मामले में  ‘आप’ की तरह ही  पारदर्शिता अपना कर वे इसकी शुरुआत कर सकते हैं।

 साथ ही वे जातिवाद, परिवारवाद,संप्रदायवाद  और अन्य तरह के वोट बैंक की राजनीति छोड़कर आम जनता के हितों की चिंता करें,दिल्ली के चुनाव नतीजे का यही मुख्य संदेश है।


  (इस लेख का संपादित अंश 11 फरवरी 2015 के दैनिक भास्कर में प्रकाशित )   



मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

‘आप’ की राजनीतिक शैली और उसका राजनीति पर संभावित असर

भाजपा नेता डा. सुब्रह्मण्यन स्वामी ने आम आदमी पार्टी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें कही हंै। अरविंद केजरीवाल की तुलना नक्सलियों से करते हुए उन्होंने भविष्यवाणी की है कि यदि ‘आप’ को दिल्ली प्रदेश की सत्ता मिल भी गयी तो वह एक साल के भीतर सरकार से अलग हो जाएगी।

 स्वामी के अनुसार ‘केजरीवाल के सारे सहयोगियों का संबंध नक्सलियों से रहा है। वे सरकार नहीं चला सकते। आप देखेंगे कि वे समाप्त हो जाएंगे।’

 याद रहे कि अरविंद केजरीवाल ने मात्र 49 दिनों के बाद ही मुख्यमंत्री पद से 15 फरवरी 2014 को इस्तीफा दे दिया था। उस समय भी कुछ राजनीतिक पंडितों ने भविष्यवाणी की थी कि ‘आप’ अब समाप्त हो जाएगी। पर हुआ उसके विपरीत ।दिल्ली में ‘आप’ का वोट शेयर बढ़ता ही चला गया।

ओपियन पोल और एग्जिट पोल के नतीजों पर भरोसा करें तो ‘आप’ दिल्ली में एक बार फिर सरकार बनाएगी। आखिर दिल्ली की अधिकतर जनता ‘आप’ को इतना पसंद क्यों कर रही है?

क्यों भाजपा जैसी सुसंगठित पार्टी और नरेंद्र मोदी जैसे लोकप्रिय नेता को भी दरकिनार कर अधिकतर जनता  ‘आप’ को गले लगा रही है  ?

  जानकारों के अनुसार  इसका एकमात्र कारण यह  है कि ‘आप’ ने भ्रष्टाचार के प्रति लगातार शून्य सहनशीलता दिखाई है। यदि यही काम मोदी सरकार ने  आठ महीनों के कार्यकाल में किया होता तो ‘आप’ की चमक गायब हो गई होती।

 पर सरकार के भीतर जाकर संभवतः मोदी जी और बाहर से डा. स्वामी को लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ चैतरफा युद्ध छेड़ देना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है। दूसरी ओर ‘आप’ इस तर्क से सहमत नहीं दिखती।

 इस पृष्ठभूमि में डा.स्वामी की यह सोच उनकी खुद की कसौटियों पर तो तार्किक लगती है। उन्हें लगता है कि नक्सली मानसिकता वाली ‘आप’ को यदि सरकार चलाने का मौका मिलेगा तो उनकी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई जीत ही नहीं सकेगी । और, जब जीत नहीं सकेगी तोे वे भाग खड़े होंगे।

   इन्हीं परिस्थितियों में केजरीवाल ने मुख्य मंत्री पद छोड़ा था। जबकि पद छोड़ने की उनकी कोई मजबूरी नहीं थी। इस देश में अधिकतर जनता उस नेता या दल को अधिक पसंद करती है जो अपने सिद्धांतों के लिए गददी छोड़ने के लिए तैयार रहता है। अरविंद ने जब पद छोड़ा था तो उस समय तो उनके समर्थकों के एक हिस्से ने उन पर गुस्सा दिखाया था। पर जब अरविंद ने स्थिति स्पष्ट की तो वही जनता संतुष्ट हो गई। इतना ही नहीं ‘आप’ का जन समर्थन बढ़ गया। दरअसल अधिकतर जनता ने ‘आप’ की कथित रणनीतिक त्रुटियों को नजरअंदाज किया और उसकी अच्छी मंशा पर भरोसा किया।

     केजरीवाल जमात का उभार जन लोकपाल आंदोलन के गर्भ से हुआ था।जब वह आदोलन चल रहा था, उस समय ‘आप’ बनी भी नहीं थी। क्योंकि उसके नेताओं का उद्देश्य राजनीति में जाना नहीं था। वे लोग अन्ना हजारे के नेतृत्व में गैर राजनीतिक आंदोलन चला कर जन लोकपाल विधेयक पास करवाना चाहते थे।

  पर जनलोकपाल विधेयक के कड़े मसविदे को देख कर देश की मौजूदा राजनीतिक जमात ,खासकर मनमोहन सरकार के कान खड़े हो गए थे।

 यदि उस विधेयक को उसी स्वरूप में पास कर दिया गया होता तो इस देश के अनेक नेता जेल में होते और चालू राजनीति को अपना कायाकल्प कर देना पड़ता।पर इसके लिए आज भला कौन तैयार है ?

  इसीलिए अन्ना हजारे की सलाह से मन मोहन सरकार ने जिस स्वरूप में लोकपाल विधेयक बाद में पास किया ,वह ‘आप’ के अनुसार नख-दंत विहीन है।उनकी गिरफ्त तो कोई चूहा भी नहीं लाया जा सकेगा  जबकि भ्रष्टाचार के बड़े -बड़े भेडि़यों और घडि़यालों को उनकी सही जगह बताने की जरूरत आज महसूस करती है।

  जिस लोकपाल आंदोलन के कारण जनता ने 2013 में ‘आप’ को सत्ता दिलाई थी,यदि वही विधेयक पास नहीं कर पाई तो वह गद्दी पर क्यों बैठी रहती ? वादा करके भूल जाने वाले दलों की भीड़ में ‘आप’ अलग तरह की पार्टी दिखाई पड़ रही है। आप के जनसमर्थन के बढ़ने का एक बड़ा कारण यही है।

  यदि ‘आप’ को इस बार भी सत्ता मिलेगी तो वह जन लोकपाल या यूं कहिए कि जन लोकायुक्त विधेयक को भूल नहीं सकती। पर विधेयक का जो मसविदा ‘आप’ के पास है, उसे विधेयक के रुप में पेश करने से पहले पूर्वानुमति की जरुरत पड़ेगी। ऐसे कड़े कानून बनाने की पूर्वानुमति यह व्यवस्था देगी ? उम्मीद तो नहीं है।
  डा.स्वामी को तो यह साफ लगता है कि वह अनुमति नहीं मिलेगी।फिर यदि बनी तो क्या ‘आप’ की सरकार सिर्फ कुर्सी गरम करने के लिए कुर्सी पर बनी रहेगी  ?

  डा.स्वामी को लगता है कि ऐसा नहीं होगा,इसलिए तुनक कर आप सरकार फिर गददी छोड़ देगी।
  राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार यदि ऐसा हुआ तो उसका पूरे देश पर  असर पड़ेगा ।

कई राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि  पूरा देश वर्षों से भीषण सरकारी और गैर सरकारी भ्रष्टाचार से पीडि़त है। 1966-67 में डा.राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में देश में कुछ गैर कांग्रेसी दलों का जो साझा आंदोलन और चुनावी अभियान चला  था,वह मुख्यतः भ्रष्टाचार के खिलाफ ही था।

 1974-77 के  जेपी आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार था। बोफर्स तथा अन्य घोटाले के खिलाफ वी.पी.सिंह के नेतृत्व में 1987-89 में चले आंदोलन का मुख्य मुददा तो
सिर्फ भ्रष्टाचार था।पर इन आंदोलनों के बाद निजाम बदलने के बावजूद देश के हालात नहीं बदले।
इन में से किसी सरकार ने यह कह कर गद्दी नहीं छोड़ी थी कि चूंकि वे अपने आंदोलन के मुददे को सरकार में आकर लागू नहीं कर पा रहे हैं,इसलिए गद्दी छोड़ रहे हैं।यह काम सिर्फ ‘आप’  ने किया।

  यदि इस बार गद्दी मिलने पर देश की भ्रष्टाचार समर्थक शक्तियां एक बार  केजरीवाल को गददी छोड़ने को विवश कर देंगीं तो उसका राजनीतिक परिणाम  देश भर में प्रकट हो सकता है।‘आप’ देर -सवेर राष्ट्रीय पार्टी बन कर उभर सकती है।क्योंकि उसकी अच्छी मंशा के कायल देश भर के लोग  हो सकते हैं।

  याद रहे कि आप के 2013-14 के 49 दिनों के शासनकाल में दिल्ली में भ्रष्टाचार काफी हद तक थम गया था।ऐसा प्रभाव  अब तक मोदी सरकार नहीं दिखा पाई है।

  एग्जिट पोल के नतीजे बताते हैं कि इस बार भी ‘आप’ को सभी जातियों,वर्गो और समुदायों में से  उन लोगों के वोट मिले हैं जो भ्रष्टाचार को इस देश की सबसे बड़ी समस्या मानते हैं।

 ‘आप’ की अगली सफलता या विफलता दोनों ही स्थितियों में देश भर में एक खास तरह के
राजनीतिक ध्रुवीकरण की संभावना जाहिर की जा रही है।वह धु्रवीकरण भ्रष्टाचार समर्थक और भ्रष्टाचार विरोधी शक्तियों के बीच हो सकता है।यदि ऐसा हुआ तो इसके साथ यह भी अपने आप हो जाएगा कि जाति,समुदाय और संप्रदाय के आधार पर समाज को बांट कर वोट बटोरने वाले नेताओं को उनकी नानी याद आ जाएगी।

  ( इस लेख का संपादित अंश 10 फरवरी, 2015 के दैनिक भास्कर ,पटना में प्रकाशित )
   



बुधवार, 7 जनवरी 2015

बिहार में जनता परिवार के वोट की ताकत जीतेगी या नरेंद्र मोदी की साख ?

बिहार विधानसभा के अगले आम चुनाव में राजग जीतेगा या जदयू-राजद गठबंधन बाजी मारेगा ? इन दिनों राजनीतिक और गैर राजनीतिक हलकों में यही सवाल कौंध रहा है।

   इस सवाल का जवाब आसान नहीं है। वोट के आंकड़े जदयू - राजद के पक्ष में हंै तो कुछ दूसरी बातें राजग को ताकत पहुंचा रही हैं। देखना है कि ऊंट अंततः किस करवट बैठता है।

 अक्टूबर-नवंबर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में यदि राजद-जदयू ने बाजी मार ली तो इससे गैर भाजपा दलों का मनोबल देश भर में बढ़ जाएगा। पर, यदि जनता का फैसला इसके विपरीत हुआ तो नरेंद्र मोदी और भाजपा की आगे की राह भी आसान हो जाएगी।

    गत अप्रैल-मई में लोक सभा के चुनाव हुए थे। उसमें राजग को बिहार में कुल 40 में से 31 सीटें मिली थीं। पर मात्र तीन महीने बाद जब विधानसभा की दस सीटों पर उप चुनाव हुए तो उसमें राजग साठ प्रतिशत सीटें हार गया।

 यानी राजद-जदयू-कांग्रेस गठबंधन को 6 सीटें मिल गईं। पर उस बीच एक फर्क आ गया था। लोकसभा का चुनाव राजद और जदयू ने अलग -अलग लड़ा था। पर उपचुनाव में जदयू ने राजद और कांग्रेस से गठबंधन बना लिया था।

   लोकसभा चुनाव के मतों के आंकड़ों के विश्लेषण से भी जदयू और राजद का मनोबल बढ़ा है। लोकसभा की जिन सीटों पर राजग को  विजय मिली थी, उनमें से 19 सीटें उसे नहीं मिल पातीं, यदि तब राजद-जदयू का गठबंधन रहा होता। यानी 19 सीटों पर  राजद और जदयू के मतों को जोड़ दें तो वे राजग से अधिक थे।

   ताजा राजनीतिक घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि अब जनता परिवार एक साथ आने ही वाला है। इतना ही नहीं, जनता परिवार अन्य गैर भाजपा दलों से भी चुनावी तालमेल करने की कोशिश करेगा ही।

  यदि गैर राजग दलों का अपसी तालमेल हो गया तो सैद्धांतिक रूप से यह गठबंधन राज्य की अधिकतर जनता के समर्थन वाला गठबंधन माना जाएगा। पर बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। राजग अभी केंद्र में सत्ता में है। हाल के लगभग सभी विधानसभा चुनावों में भाजपा को उसकी वास्तविक परंपरागत राजनीतिक ताकत की अपेक्षा अधिक वोट मिले हैं।

अनेक लोग नरेंद्र मोदी को एक अच्छी मंशा वाला नेता मान रहे हैं। इस वोट में खुद नरेंद्र मोदी के अपने वोट भी हैं। एक अन्य तर्क भी भाजपा के पक्ष में है।

 वह यह कि मतदाताओं का एक वर्ग यह चाहता है कि जिसकी सरकार केंद्र में हो, उसी की सरकार राज्य में भी होनी चाहिए ताकि राज्य सरकार केंद्र से तालमेल करके राज्य का विकास कर सके।

 राजग को इस बात का भी फायदा मिल सकता है कि यदि टिकट के बंटवारे के समय राजद-जदयू-कांग्रेस-एनसीपी तथा अन्य दल आपस में  लडेंगे।
 क्योंकि अधिक दलों के एक साथ आ जाने के बाद किसी भी एक दल के लिए यह जरूरी हो जाएगा कि वह अपने दल के अनेक उम्मीदवारों के टिकट कड़ाई से काट दे। जिनके टिकट कटेंगे, उन में कई स्थानीय स्तर पर ताकतवर नेता होंगे।

उनके लिए दल बदल की गुंजाइश तो कम ही रहेगी, पर वे निर्दलीय उम्मीदवार बनकर अपने मूल दल के उम्मीदवार को परेशानी में डाल सकते हैं। अब देखना होगा कि इस आशंकित भगदड़ का कितना लाभ राजग को मिलता है।

 भाजपा को उम्मीद है कि सबसे बड़ा हंगामा तो राजद के वे दबंग नेता लोग करेंगे जिनके टिकट कटेंगे। इस बात पर भी सहमति बनाना कठिन होगा कि राजद कितनी सीटों पर लड़ेगा और जदयू कितनी सीटों पर !
  हालांकि विधानसभा का चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही राजद-जदयू लड़ेगा, इस पर सहमति बन चुकी है। ऐसा संकेत मिल रहा है। गत नवंबर में ही कांगे्रेस ने भी यह संकेत दे दिया था कि राजद नीतीश कुमार को गठबंधन का नेता मान ले।

   दूसरी ओर बिहार के चुनाव में भी राजग का नेतृत्व नरेंद्र मोदी ही करेंगे। भाजपा के पास जंगलराज की पुनरावृत्ति के खतरे का नारा है।
 भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने कहा है कि राजद के साथ जदयू के विलयन का लाभ भाजपा को मिलेगा। क्योंकि तब यह स्पष्ट हो जाएगा कि  जंगल राज -2 का आगमन होकर रहेगा। इस मिलन से नीतीश कुमार की राजनीतिक पूंजी समाप्त हो जाएगी।

  हालांकि यह खतरा गत अगस्त में हुए बिहार विधानसभा के उप चुनाव में राजद-जदयू को नुकसान नहीं पहंुचा सके थे। उधर नीतीश कुमार ने बार-बार बिहार की जनता से यह वादा किया है कि वे किसी भी कीमत पर कानून के राज से समझौता नहीं करेंगे।

   हालांकि गत अप्रैल में लोक सभा के चुनाव -प्रचार के दौरान नीतीश कुमार ने कहा था कि ‘लालू प्रसाद को राज्य को तबाह करने की महारत हासिल है।’ पर अब नीतीश कुमार लोगों को विश्वास दिलाना चाहते हें कि लालू प्रसाद समय के साथ बदल गए हैं।

 अंदरुनी सूत्रों से भी यह संकेत मिल रहा है कि लालू प्रसाद ने नीतीश कुमार को यह कह दिया है कि आपको ही बिहार संभालना है।
 यह बात अधिकतर लोग मानते हैं कि नीतीश कुमार का सुशासन और विकास का पिछला रिकाॅर्ड बहुत बढि़या है। देखना होगा कि अगले बिहार विधानसभा चुनाव में उस रिकाॅर्ड का कितना चुनावी लाभ जदयू-राजद को मिलता है। उधर नरेंद्र मोदी की साख भी तब कसौटी पर होगी ।        
   
   

सिर्फ इसी देश में सुरक्षा से ऊपर है राजनीति


 देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के मामलों में भी हमारे यहां की राजनीति आखिर इतनी बंटी हुई क्यों है ? कहीं आतंकी घटना या उस पर कार्रवाई हुई नहीं कि इस देश के नेतागण परस्पर विरोधी स्वर में बोलने लगते हैं।

 क्या किसी अन्य देश में ऐसा होता है ? शायद नहीं।

 क्या किसी ने कभी सुना कि अमेरिका के विश्व व्यापार केंद्र पर हमले को लेकर वहां के विरोधी दल ने सत्ताधारी नेताओं पर कोई आरोप लगाया ?
हां, उन दिनों भारत के कुछ कथित ढोंगी धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों ने यह  सवाल जरूर उठाया गया था कि 11 सितंबर 2001 को विश्व व्यापार केंद्र में कार्यरत सारे यहूदी कर्मचारी एक साथ छुट्टी पर क्यों थे ?

 हाल में पोरबंदर के पास पाकिस्तान की एक संदिग्ध नाव पर भारतीय कार्रवाई के बाद कांग्रेस ने सवाल खड़ा कर दिया है। हालांकि पेशेवर खोजबीनकत्र्ता जरूर कुछ संतुलित सवाल उठा सकते हैं। वह नाव मछुआरों की थी या आतंकियों की ?

उस पर मादक पदार्थों के तस्कर थे या उस नाव का उद्देश्य कुछ और था ?
  भारत के नेशनल टेकनिकल रिसर्च आॅर्गनाइजेशन के अनुसार उस नाव में सवार चार लोगों के पास स्नाइपर राइफले, अग्नि बम और गोला -बारुद थे।

  एक अन्य खबर के अनुसार उस नाव पर मादक पदार्थों के पाकिस्तानी तस्कर थे। पर, सवाल है कि पकड़े जाने की आशंका से तस्कर आत्महत्या कर लेते हैं ?

 आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी के बीच के गहरे रिश्ते को पूरी दुनिया जानती है, सिर्फ उन भारतीय नेताओं को छोड़कर जो भारत सरकार से सबूत मांग रहे हैं।

  इस माहौल में कई लोगों को मध्ययुग की याद आती है जब इस देश पर बाहरी लोगों द्वारा कब्जा करने के प्रयास में इसी देश के कुछ लोगों ने उन्हें मदद की थी।

  एक ब्रिटिश इतिहासकार प्रो. जे. आर. शेेली ने भी लिखा है कि हमने बेहतर नस्ल होने के कारण भारत को नहीं जीता, बल्कि खुद कुछ भारतीयों ने भारत को हमारे लिए जीत कर हमारी तश्तरी में परोस दिया।

  ठीक ही कहा गया है कि जो इतिहास से नहीं सीखता ,वह इतिहास को दुहराने को अभिशप्त होता है।यह कहावत भारत पर अधिक लागू होती है। हमारे यहां तो कुछ इतिहासकारों की यह भी शिकायत रही है कि यहां सच्चा व संपूर्ण इतिहास तो पढ़ाया ही नहीं जाता।

 26 नवंबर 2008 को पाकिस्तान से भेजे गए आतंकियों ने मुम्बई में  ताज होटल सहित दस स्थानों पर हमला करके सौ से अधिक निर्दोष लोगों को मार डाला।

उससे पहले दिल्ली के बाटला हाउस में आंतकियों ने पुलिस अफसर की हत्या कर दी। दोनों ही मामलों में अदालतों ने आतंकियों का सजाएं दीं। ये सजाएं जब हुईं तब देश में भाजपा की सरकार नहीं थी।

  पर मुम्बई हमले के बाद एक पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया था कि इस कांड में बाहरी नहीं बल्कि भीतरी तत्वों का ही हाथ है।

 बाटला हाउस मुठभेड़ पर  एक अन्य कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री ने आशंका जाहिर की थी कि वह मुठभेड़ नकली थी।

 इस पृष्ठभूमि में भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने ठीक ही कहा है कि आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई पर कांग्रेस के सवाल पाकिस्तान को आक्सीजन दे रहे हैं ।

 याद रहे कि पोरबंदर नौका कांड को लेकर कांग्रेस प्रवक्ता अजय कुमार ने सवाल उठाया है कि कोई सबूत नहीं है, फिर भी यह दावा कैसे कर सकते हैं कि आतंकी हमले को नाकाम कर दिया गया ?


साभार-दैनिक भास्कर पटना में 06 जनवरी 2015 को प्रकाशित

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

वन में कहां मिलेगी कुंडल की कस्तूरी !


‘कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढै वन माहिं।’ कांग्रेस की मौजूदा दुर्दशा पर 

कबीर की यह वाणी याद आती है।


  इस दुर्दशा का इलाज खुद नेहरु-इंदिरा परिवार के पूर्ववर्ती नेताओं की राजनीतिक व प्रशासनिक शैली में निहित है। कोई देखना चाहे तो देश और पार्टी के संविधान भी अच्छी राह दिखा सकते हैं। इससे भी काम नहीं चले तो कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व खुद से सवाल कर सकता है कि उसने आई.पी.सी. और सी.आर. पीसी की धाराओं को कितनी निष्पक्षता से जनहित में लागू होने दिया था ? 

  कांग्रेस की दुर्दशा के मुख्य कारण है कि उसके अधिकतर छोटे -बड़े नेताओं ने सरकारी तिजोरी के सदुपयोग के मामले में जवाहरलाल नेहरु की ईमानदारी का त्याग कर दिया। कठोर निर्णय के मामले में इंदिरा गांधी की राह छोड़ दी। राजीव गांधी की सहृदयता से भी कांग्रेस का कोई नाता नहीं रहा।

वोट के लिए शाही इमाम से मिलने वाली पार्टी के नेता राहुल गांधी अब पार्टी काॅडर से पूछ रहे हैं कि क्या कांग्रेस को हिन्दू विरोधी माना जा रहा है ? दर्द हाईकमान ने दिया, पर दवा कार्यकर्ताओं से मांगी जा रही है। बेचारे कार्यकर्ता और मध्यम दर्जे के नेतागण अब क्या बताएंगे जो आंख मूंद कर हाईकमान के हर निर्णय का समर्थन करने को बाध्य थे ?

क्या हाईकमान के खिलाफ एक शब्द उच्चारित करने की पहले उन्हें छूट थी ? कांग्रेस की दुर्दशा देखकर वैसे लोग भी दुःखी हैं जो कांग्रेस के समर्थक नहीं हैं, पर वे यह चाहते हैं कि देश में  अच्छी सरकार के साथ -साथ मजबूत और प्रामाणिक विपक्ष भी हो। पर कांग्रेस अब न तो मजबूत है और न ही प्रामाणिक। उसे ऐसा बने बिना उसका काम नहीं चलेगा।

 अधिकतर लोग यह मानते हैं कि लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत का अधिक श्रेय मनमोहन सरकार की विफलता को जाता है। उससे थोड़ा कम श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है।

पर, सत्ता में आने के बाद  मोदी  सरकार अपनी नकारात्मक ताकत को भी सकारात्मकता में बदलने पर उतारू है। यानी उसके एक से एक बेहतर कामों और नेक मंशा से लोगबाग और भी प्रभावित होते जा रहे हैं। यदि वह जारी रहा और कारगर भी हुआ तो कांग्रेस को कहीं पैर रखने की जगह नहीं मिलेगी।

इसके बावजूद कांग्रेस हाईकमान खुद के बदले कार्यकर्ताओं से पूछ रहा है। मानो गलती कार्यकर्ताओं ने ही की हो। हकीकत यह है कि खुद कांग्रेस हाईकमान और उसकी सरकार इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है। यानी हाईकमान खासकर सोनिया गांधी-राहुल गांधी को खुद की नीयत, नीति और रणनीति बदलनी होगी।

मनमोहन सरकार के घोटालों के खिलाफ अन्ना हजारे अभियान चला रहे थे तो एक मंत्री ने पलट कर यह कहा था कि ‘अन्ना हजारे नीचे से ऊपर तक भ्रष्ट हैं।’ जब एक बड़ा घोटाला सामने आया तो एक दूसरे मंत्री ने कहा कि ‘इसमें जीरो लाॅस हुआ है।’ इतना ही नहीं बड़े से बड़े घोटालेबाज तभी जेल गए जब अदालत ने हस्तक्षेप किया।

एक पक्ष का आतंकवादी गिरफ्तार होता था तो सत्ताधारी नेता कहते थे कि इस गिरफ्तारी से मुझे पूरी रात नींद नहीं आई। जबकि इस देश में गिरफ्तार तो दोनों पक्षों के अतिवादी होते रहे हैं !

मनमोहन सरकार के एक अन्य मंत्री ने कहा था कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ जारी मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष कोर्ट बनाने के प्रस्ताव पर विचार किया जाएगा। इन सब एकतरफा बातों और कामों से भाजपा को लाभ मिलना ही थां।इस स्थिति में सुधार कौन कर सकता है ? कांग्रेस कार्यकर्ता, नेता या खुद पार्टी हाई कमान ?

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

एकता ही नहीं, राजनीतिक चरित्र में बदलाव से कमाल कर सकता है जनता परिवार

जनता परिवार की एकता की गंभीर कोशिश जारी है। उम्मीद है कि एकता होकर रहेगी। पर सवाल है कि सिर्फ एकता से ही जनता परिवार देश में कोई राजनीतिक कमाल दिखा पाएगा ?

ऐसा लगता तो नहीं है। बल्कि उसे अपने चाल, चरित्र और चिंतन में भी बदलाव लाना होगा। साथ ही उसे भाजपा की केंद्र सरकार के अलोकप्रिय होने की प्रतीक्षा भी करनी पड़ेगी। उसके लिए जिस धैर्य की जरुरत है, क्या वह जनता परिवार के सदस्यों में है ?  

 वैसे एकता की दिशा में हाल की कुछ बातों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इससे एकता की कोशिश की गति तेज होगी।

 नीतीश कुमार और लालू प्रसाद की राजनीतिक दोस्ती बढ़ी है। नीतीश कुमार को लगता है कि लालू प्रसाद समय के साथ बदल रहे हैं। उधर लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव के बीच करीबी रिश्तेदारी की संभावना है। इससे दोनों दलों के बीच राजनीतिक रिश्ता भी काफी मजबूत होगा।
इन तीन नेताओं की एकता से जनता परिवार की एकता की ठोस नींव तैयार होगी। फिर जनता परिवार के अन्य सदस्यों के जुड़ने में कोई दिक्कत नहीं होगी।

   एकता की कोशिश का स्वागत करते हुए सीपीएम महासचिव प्रकाश करात ने कहा है कि भाजपा की बढ़ती ताकत का मुकाबला करने के लिए संसद में हम जनता परिवार से समन्वय बनाकर काम करेंगे।

  जनता परिवार के सदस्य 1977 और  1989 के चुनावों में भी एक हुए थे। तब के सत्ताधारी दल जनता में अलोकप्रिय हो चुके थे। एकता का लाभ उन्हें दोनों बार मिला था। इस बार की परिस्थिति बिलकुल अलग हैं। अभी सत्ताधारी दल लोकप्रियता के चरम पर है। इसलिए जनता परिवार के लिए राह अपेक्षाकृत कठिन है। अनुकूल चुनावी रिजल्ट पाने के लिए इस बार उसे कुछ अधिक ही प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है।

  पर राजनीति में प्रासंगिक बने रहने के लिए जल्द एक होने के अलावा और कोई उपाय भी तो नहीं है। जब दलों के बीच चुनावी एकता या विलयन की कोशिश होती है तो उन दलों के भीतर से ही अधिक विरोध होता है। इस बार भी हो रहा है।

 विरोध का मुख्य कारण पदों की कमी हो जाने का खतरा है। अपवादों को छोड़ दें तो आज कोई भी छोटा -बड़ा राजनीतिक कार्यकर्ता या नेता पद के बिना नहीं रहना चाहता। पर ऐसे विरोधों को नेतागण इस बार भी नजरअंदाज ही करेंगे।

   इसके अलावा बाधाएं बाहर से भी हैं। एक -दो अपवादों को छोड़ दें तो जनता परिवार के अधिकतर नेताओंं की सार्वजनिक छवि अच्छी नहीं है। जातीय वोट बैंंक का असर भी थोड़ा घटा है। उनकी जनता में स्वीकार्यता कम होती जा रही है। इसके मुकाबले कई कारणों से नरेंद्र मोदी और भाजपा के अनेक नेताओं की छवि बेहतर है।

  उधर एक बात और है। भाजपा के अधिकतर नेताओं की छवि के मुकाबले आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं की छवि बेहतर है।

  इसलिए कुछ राजनीतिक चिंतक ओर प्रेक्षक ‘आप’ को भाजपा का अगला विकल्प बता रहे हैं। दिल्ली विधानसभा का चुनाव होने वाला है।
यदि भाजपा के पक्ष में करीब- करीब देशव्यापी हवा के बावजूद दिल्ली विधानसभा चुनाव में ‘आप’ ने कोई कमाल दिखा दिया तो ‘आप’ को अनेक लोग सचमुच भाजपा के विकल्प के रूप में देखने लगेंगे।

  अंततः क्या होगा, यह तो भविष्य बताएगा। क्योंकि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नरेंद्र मोदी की सरकार अगले महीनों में कैसा काम करती है।

दूसरी ओर जनता परिवार के कुछ प्रमुख नेताओं को अपनी छवि यदि बेहतर बनानी है और जनता की नजरों में भाजपा से ख्ुाद को बेहतर साबित करना है तो उन्हें  अपनी कार्यशैली बदलनी होगी। इस मामले में बिहार से तो थोड़ा -बहुत अच्छे संकेत मिल रहे हैं। पर समस्या यू.पी. में अधिक है। ये दो प्रदेश जनता परिवार के मुख्य राजनीतिक गढ़ हैं।

 पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछले महीने कहा कि ‘हमने लालू जी से समझौता किया है, पर कानून से नहीं।’ याद रहे कि भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी का आरोप है कि लालू से मिलकर नीतीश कुमार आतंक राज लौटाना चाहते हैं। कुछ भाजपा नेता तो यह भी आरोप लगा रहे हैं कि बिहार में जंगल राज -2 कायम हो चुका है।

  पर राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति थोड़ी बिगड़ी जरूर है, पर वैसी अराजक स्थिति कत्तई नहीं हुई है जैसी लालू-राबड़ी राज में थी।

  राजद-जदयू के पास एक-एक मजबूत तर्क है। गत लोकसभा चुनाव में राजद-जदयू को मिले वोट भाजपा को मिले मतों से ज्यादा थे। साथ ही हाल के विधानसभा उपचुनाव में राजद-जदयू गठबंधन को भाजपा की अपेक्षा अधिक सीटें मिलीं।

हालांकि भाजपा गठबंधन के नेताओं के इस तर्क में भी दम है कि केंद्र से झगड़ा करने वाली सरकार बिहार में 2015 में बनेगी तो राज्य का विकास नहीं होगा।

  इन तर्क वितर्कों के साथ बिहार विधानसभा के अगले चुनाव में राजद-जदयू की ओर से साझा नेता कौन होगा, इस बात पर भी रिजल्ट बहुत हद तक निर्भर करेगा।

  पर ऐसी बेहतर स्थिति उत्तर प्रदेश की नहीं है। वहां से जो खबरें आती रहती हैं, उनके अनुसार वहां लगभग वैसी ही स्थिति है जैसी स्थिति लालू-राबड़ी राज में बिहार में थी। राजनीतिक संरक्षणप्राप्त इंजीनियर यादव सिंह के अभूतपूर्व  घोटाले ने तो रही -सही कसर भी पूरी कर दी है।

गत विधानसभा चुनावों में सपा को इसलिए सफलता मिली क्योंकि बसपा ने उम्मीदवार खड़ा नहीं कराया था। यानी यू.पी. में अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा की राह अधिक आसान लगती है।

   खैर जो हो, संकेत तो यही हैं कि जनता परिवार की एकता हो कर रहेगी। एकीकृत जनता परिवार निकट भविष्य में भले कोई बड़ी चुनावी सफलता हासिल नहीं कर सके, पर लगातार जन संघर्षों के जरिए वह देर सवेर अपने पुराने सुनहले दिन वापस ला सकते हैं। पर इसके लिए यह जरूरी है कि नरेंद्र मोदी की सरकार इस बीच उन वायदों को पूरा नहीं कर सके जो उसने गत लोकसभा चुनाव में किये थे। पर मोदी सरकार की आशंकित विफलता का लाभ उठाने के लिए जनता परिवार के अनेक प्रमुख नेताओं को अपने चाल, चरित्र और चिंतन में इस बीच भारी बदलाव करना होगा।

(2 दिसंबर 2014 के दैनिक भास्कर ,पटना में प्रकाशित) 

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

आशीष नंदी ने तो मांग ली, कांचा इलैया कब मांगेंगे माफी !

प्रसिद्ध सोशल साइंटिस्ट आशीष नंदी ने कमजोर वर्ग के लोगों  के खिलाफ अपनी आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए 24 नवंबर 2014  को सुप्रीम कोर्ट में  माफी मांग ली। पर, पोलिटिकल साइंटिस्ट कांचा इलैया कर्पूरी ठाकुर के खिलाफ की गई अपनी आपत्तिजनक  टिप्पणी के लिए कब माफी मांगेंगे ?

  बिहार विधान परिषद के पूर्व सभापति प्रो.जाबिर हुसेन ने यह सवाल 
उठाया है।प्रो.हुसेन का सवाल जायज लगता है।याद रहे कि कर्पूरी ठाकुर भी कमजोर वर्ग से ही आते थे।

  15 फरवरी 2013 को एक अखबार के साथ बातचीत में कांचा 
इलैया ने कहा था कि ‘लगभग निरक्षर हज्जाम कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्य मंत्री बन गए थे।’

दरअसल इलैया उस बातचीत में यह कह रहे थे कि पिछड़ों,दलितों और आदिवासियों में से दस प्रतिशत लोग भी अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण कर  लें तो भारत बदल जाएगा।’ 

  इस सिलसिले में उन्होंने कर्पूरी ठाकुर को लगभग निरक्षर हज्जाम बता दिया।संभवतःउन्हें लगता था कि अंग्रेजी जाने बगैर कर्पूरी ठाकुर कैसे ऊंचे पद तक पहुंच गए !

इससे कर्पूूरी ठाकुर के प्रशंसकों और उन्हें नजदीक से जानने वालों को गहरा धक्का लगा था।पर किसी ने इलैया पर केस नहीं किया।

  याद रहे कि कर्पूरी ठाकुर अंग्रेजी पढ़े-लिखे थे।वे  न सिर्फ अंग्रेजी  समझ सकते थे बल्कि वे अच्छी अंग्रेजी लिखते भी थे।उन्होंने अंग्रेजी राज में इंटर पास किया था।वे बी.ए.में पढ़ते थे जब गांधी जी से प्रभावित होकर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।

  जानकार लोग बताते हैं कि तब के मैट्रिक पास लोग भी अंग्रेजी अच्छी तरह लिखते और पढ़ते थे।क्योंकि उन दिनों परीक्षा में कदाचार की छूट नहीं रहती थी।

अंग्रेजी अखबारों के लिए अपने  प्रेस बयान उन्हें खुद लिखते हुए समकालीन लोगों ने कर्पूरी ठाकुर को देखा था।साथ ही उन्होंने बहुत स्वाध्याय भी किया था।

   दरअसल अनेक लोगों के दिलो दिमाग में अंग्रेजी को लेकर कर्पूरी ठाकुर की गलत छवि अंकित कर दी गई है।संभवतः कांचा इलैया भी उसी के शिकार रहे हैं।

  कर्पूरी ठाकुर 1967 में बिहार के उप मुख्य मंत्री ,वित्त मंत्री और शिक्षा मंत्री थे।तब डा.राम मनोहर लोहिया के निदेश पर मैट्रिक स्तर पर दिवंगत ठाकुर ने  अपनी सरकार से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करवा दी थी।
 इससे यह गलत संदेश गया कि ठाकुर ने अंग्रेजी की पढ़ाई ही खत्म करा दी।वे अंग्रेजी के खिलाफ थे।क्योंकि वे खुद अंग्रेजी नहीं जानते थे।

 हालांकि ऐसा नहीं था।सन 1967 की बिहार सरकार के उस निर्णय के अनुसार  सिर्फ हुआ यह था कि जो छात्र अंग्रेजी में फेल कर जाते थे,उन्हें भी मैट्रिक पास कर दिया जाता था,यदि वे अन्य विषयों में सफल हों।

डा.लोहिया का तर्क था कि अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण गरीब घरों और ग्रामीण पृष्ठभूमि के अनेक विद्यार्थी मैट्रिक पास नहीं कर पाते थे।तब पुलिस में भर्ती के लिए मैट्रिक पास होना जरुरी था।किसी पुलिस  कांस्टेबल को अपने काम के सिलसिले में बिहार में अंग्रेजी की कोई जरुरत नहीं पड़ती।साथ ही उन दिनों शादी के लिए अधिकतर लोग मैट्रिक पास दुल्हन ही खोजते थे।डा.लोहिया के जेहन में भी  ये बातें  थीं।वे सवाल करते थे कि  अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण  किसी कन्या की शादी अच्छे घर में होने से क्यों रोका जाए ?

साथ ही विदेशी भाषा के कारण किसी गरीब घर के नौजवान को सिपाही बनने से क्यों रोका जाना चाहिए ? 

  पर इस सबका  खामियाजा कर्पूरी ठाकुर को भुगतना पड़ा।अंग्रेजी को लेकर कर्पूरी ठाकुर की राज्य के भीतर और बाहर लगातार आलोचना होती रही।

कांचा इलैया कर्पूरी ठाकुर के खिलाफ जारी उसी दुष्प्रचार के शिकार हुए। उन्हें लगता था कि कोई निरक्षर नेता ही अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त कर सकता था।

    2013 में जयपुर  लिटरेचर फेस्टीवल में आशीष नंदी ने जब अपना विवादास्पद बयान दिया तो कांचा इलैया ने कहा  कि ‘उनका बयान खराब है।यह उनकी बौद्धिक गुंडागर्दी है।हालांकि उनकी मंशा सही थी।’

    आशीष नंदी ने जयपुर फेस्टिवल में कहा था कि सत्ता प्राप्त करने के बाद पिछड़े,दलित और आदिवासी अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक भ्रष्ट हो जाते हैं।इस आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद नंदी पर मानहानि के मुकदमे हुए।मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।कपिल सिबल उनके वकील थे।

अंततः बचने का कोई रास्ता नहीं देख कर इसी सोमवार को आशीष नंदी ने बिना शर्त मांफी मांग ली।

 जिस आशीष नंदंी पर कांचा ने बौद्धिक गुंडागर्दी का आरोप लगाया, उन्हें तो माफी मांगनी पड़ी ,पर, कांचा इलैया कर्पूरी ठाकुर को ‘निरक्षर हज्जाम’ कह कर साफ बच निकले।