शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

आदर्शवादी पीढ़ी के एक संपादक का निधन


एक सौ एक बसंत देख चुके पारसनाथ सिंह संपादकों की उस पीढ़ी के थे जो  लगभग विलुप्त हो रही है। आज उनके गांव में उनका निधन हो गया। वर्षों तक उनके साथ काम करने के अनुभव के बाद मैं यह कह सकता हूं कि उन्होंने कभी अपनी जीवन शैली नहीं बदली। न ही पत्रकारिता के उन मूल्यों से समझौता किया जो उन्होंने अपने पूर्ववर्ती संपादकों  से सीखा था।

  बाबूराव विष्णु पराड़कर को अपना आदर्श मानने वाले पारस बाबू ने हमें विद्याव्यसनी और विनयी बनने का पाठ पढ़ाया। उत्तर प्रदेश और बिहार के तीन अखबारों के संपादक रहे पारसनाथ सिंह ने न तो कभी अपने पद का लाभ उठाया और न ही पत्रकारिता की धौंस जमाई।

हमेशा सीमित आर्थिक साधनों के जरिए ही परिवार चलाते और संतुष्ट रहते उन्हें देखा। उन्होंने अपनी संतानों को भी अच्छे संस्कार दिए। उनके दीर्घ जीवन का राज यह था कि उनका खाने -पीने में भी भारी संयम था। वे अक्सर पैदल चलते देखे जाते थे।
  ऐसा ही अनुशासन वे संपादन कार्यों में भी रखते थे। वे शब्दानुशासन और खबरों के शीर्षक में शालीनता के घोर पक्षधर थे। वे अपने  संवाददाताओं से कहा रहते थे कि वे छोटे-छोटे वाक्य लिखें। साथ ही  स्पष्टता और संक्षिप्तता का भी पूरा ध्यान रखें।

  वे अंग्रेजी की खबरों के हिन्दी अनुवाद को लेकर डेस्क से कहा करते थे कि शब्दानुवाद के बदले भावानुवाद करें। पटना जिले के पुनपुन के पास के तारणपुर के मूल निवासी पारस बाबू ने अपना अधिक समय वाराणसी और कानपुर में बिताया।

बाद में वे बारी-बारी से पटना के दो अखबारों के भी संपादक रहे। अपने जीवन के
अंतिम वर्षों में यह देखकर वे दुःखी रहते थे कि इन दिनों अधितर हिन्दी अखबारों में  शब्दानुशासन पर कम ही ध्यान दिया जाता है। कभी हिन्दी अखबार पढ़कर कई लोग अपनी हिन्दी सुधारते थे।


बुधवार, 16 सितंबर 2015

सवर्ण मुख्यमंत्री के सवाल पर भाजपा का रुख सैद्धांतिक या चुनावी मजबूरी


केंद्रीय राज्य मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा है कि राजग में से कोई भी सवर्ण नेता बिहार का मुख्यमंत्री नहीं बनेगा। गिरिराज सिंह का बयान सैद्धांतिक रूप से गलत है। पर, वह व्यावहारिक रूप से बिलकुल सही है। ऐसा बयान भाजपा के चुनावी हित में भी है।

 जदयू -राजद गठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तो नीतीश कुमार हैं। वह पिछड़ी जाति से आते हैं। पर अब राजग के एक नेता भी यह कह रहे हैं कि यदि राजग को बहुमत मिला तो कोई गैर सवर्ण नेता ही मुख्यमंत्री बनेगा। क्योंकि वे जानते हैं कि किसी सवर्ण को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके राजग सत्ता नहीं प्राप्त कर सकेगा।

   भाजपा का यह रुख सामाजिक न्याय के आंदोलन की निर्णायक जीत है। बिहार सामाजिक न्याय के आंदोलन की भूमि रही है। सबसे पहले समाजवादी विचारक डा.राम मनोहर लोहिया ने ‘पिछड़े पावें सौ में साठ’ का नारा दिया था। तब उन्हें कुछ लोगों ने जातिवादी तक करार दे दिया था।

पर गिरिराज सिंह के बयान से लगता है कि ऐसे मामले में इस देश की राजनीति में आम सहमति बनती जा  रही है। भाजपा इस मामले में कांग्रेस से अधिक चतुर साबित हो रही है। देश और पूरे समाज के लिए यह बेहतर होगा, यदि ऐसी आम सहमति दिल से बने न कि किसी चुनावी रणनीति के तहत।

  ऐसा नहीं है कि बिहार भाजपा में मुख्यमंत्री पद के लिए पिछड़े समुदाय से आने वाले योग्य नेता उपलब्ध नहीं हैं। हाल के वर्षों में उन्हें ऊंचे राजनीतिक पदों पर बिठाया भी जाता रहा है।

पर बिहार भाजपा के कुछ आतुर सवर्ण नेताओं की यह कोशिश रही है कि राजग को बहुमत मिले तो उन्हें ही मुख्यमंत्री पद पर बैठा दिया जाए।

  महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा में भाजपा के नये प्रयोग के बाद बिहार के कुछ सवर्ण नेताओं का मनोबल बढ़ा है। हाल के वर्षों में महाराष्ट्र में मराठा, हरियाणा में जाट और झारखंड में आदिवासी नेता ही मुख्यमंत्री बनते रहे। पर इन तीनों राज्यों में भाजपा ने इस परंपरा को इस बार तोड़ दिया। पर तब नरेंद्र मोदी की जनता में लोकप्रियता अधिक थी। तब पार्टी कोई भी राजनीतिक प्रयोग कर सकती थी। पर बिहार में राजग यह खतरा मोल नहीं ले सकता जहां जदयू-राजद के एक मजबूत गठबंधन से उसका सीधा मुकाबला है।

 इसीलिए गिरिराज सिंह की बात व्यावहारिक और सामयिक है। हालांकि सैद्धांतिक रूप से बात की जाए तो कोई यही कहेगा कि चुने हुए विधायक ही नेता पद का चुनाव करेंगे। पर गिरिराज ऐसा कहकर  अनुमान या अटकलों की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहते।

गुंजाइश रहने पर सामाजिक न्याय की शक्तियां पिछड़ों में यह प्रचार कर दंेगीं कि राजग को बहुमत देने का मतलब है कि एक बार फिर सवर्णों के हाथों में सत्ता सौंपना।
याद रहे कि बिहार में 1990 से गैर सवर्ण ही मुख्यमंत्री रहे हैं।

    लोकतंत्र में आदर्श स्थिति तो यह होनी चाहिए कि विजयी दल अपने बीच से सर्वाधिक योग्य और ईमानदार नेता को ही मुख्यमंत्री के पद पर बैठाए चाहे वह व्यक्ति किसी भी जाति या समुदाय का क्यों न हो ! पर यह तो आज एक सपना ही है।

 अब जरा व्यावहारिक धरातल पर बात की जाए। आज शासन-प्रशासन की स्थिति यह है कि कोई ईमानदार व्यक्ति भी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा हो तो भी शासन व सत्ताधारी राजनीति के लोग उस व्यक्ति की जाति के लोगों के प्रति सहानुभूति दिखाने लगते हैं। यदि शीर्ष पर बैठा पक्षपाती हो तब तो विकास की गंगा उस जाति की जटा में ही पहले समाती है।

   हर जाति या समुदाय के अधिकतर लोग इसलिए भी यह चाहते हैं कि उनकी ही जाति का व्यक्ति मुख्यमंत्री बने। अपवादों को छोड़ दें तो आजादी के बाद के  अनुभव भी यही बताते हैं। हालांकि अब तक जितने मुख्यमंत्री बने हैं, उनमें से कुछ के कार्यकाल में अच्छे काम अधिक हुए तो कुछ अन्य के शासनकाल में गलत काम अधिक। कुल मिलाकर असमान विकास हुआ और राज्य  पिछड़ा ही रह गया।

  पिछले  68 साल में से करीब 35 साल तक सवर्ण ही मुख्यमंत्री रहे। बाकी वर्षों में अल्पसंख्यक, पिछडे़ और दलित बारी-बारी से मुख्यमंत्री पद पर रहे। सवर्णों में से पांच ब्राह्मण, तीन राजपूत और दो कायस्थ मुख्यमंत्री बने।

  गैर सवर्णों में से एक अल्पसंख्यक, 4 यादव, तीन दलित और तीन पिछड़े मुख्यमंत्री बने। यानी राज्य की सभी प्रमुख जातियों से मुख्यमंत्री बने। इसके बावजूद समरुप विकास नहीं हो पाया ।

 पर आज कुछ पिछड़ा नेता यह आरोप लगाते हैं कि देश के अधिकांश संसाधनों पर उन सवर्ण लोगों का ही कब्जा है जिनकी आबादी सिर्फ दस प्रतिशत है। अपेक्षाकृत अधिक कालावधि में सवर्ण ही मुख्यमंत्री रहे जबकि पिछड़ों की आबादी 50 प्रतिशत से भी अधिक है।
  यह अच्छी बात है कि भाजपा के मन में पिछड़ों के प्रति प्रेम जगा है। बेहतर होगा कि बहुमत मिले तो भाजपा गैर सवर्णों में से ही किसी ईमानदार व योग्य व्यक्ति  को ही मुख्यमंत्री बनाए जो समाज के सभी समुदायों पर समान रुप से नजर रखे।

 वे ईमानदारी से काम भी करें। न्याय और विकास करे। साथ ही धन और अन्य संसाधनों का बंटवारा समरुप ढंग से कराने का प्रबंध करे। यदि ऐसा हुआ तो किसी पिछड़े नेता को यह आरोप लगाने का मौका नहीं मिलेगा कि 10 प्रतिशत लोगों ने देश के अधिकतर संसाधनों पर कब्जा कर रखा है।

 याद रहे कि बिहार में गैर सवर्णोे को भी 33 साल शासन चलाने का मौका अब तक मिल चुका है। उम्मीद की जानी चाहिए कि चाहे सत्ता में जो गठबंधन आए,
 पूरी आबादी के बीच जरूरत के अनुसार संसाधनों के समरुप बंटवारे के लिए वह सरकार काम करे।    

बुधवार, 27 मई 2015

बोफर्स सौदे के कई सवालों के जवाब बाकी हैं

चर्चित बोफर्स तोप सौदे में हुए घोटाले को लेकर कई सवाल अब भी अनुत्तरित रह गए हैं। 1986 में संपन्न इस सौदे को लेकर परस्पर विरोधी विचार यदा-कदा आते रहते हैं।आगे भी आते रहेंगे। इस मामले के जानकार लोगों के अनुसार सवाल इसलिए भी अनुत्तरित रह गए क्योंकि इस केस को उसकी तार्किक परिणति तक पहुंचने ही नहीं दिया गया। ऐसा राजनीतिक कारणों से किया गया।

  याद रहे कि इस घोटाले के कारण मलीन हुई कांग्रेस पार्टी को जनता ने 1989 के चुनाव में केंद्र की सत्ता से बाहर कर दिया था।

   इस मामले में एक रोचक मोड़ उस समय आया जब इस देश के आयकर न्यायाधीकरण ने जनवरी, 2011 में कहा कि बोफर्स तोप सौदे में क्वात्रोची और विन चड्ढ़ा को 41 करोड़ रुपए की रिश्वत दी गई थी। ऐसी आमदनी पर भारत में उन पर टैक्स की देनदारी बनती है।

  सवाल है कि न्यायाधिकरण के इस आदेश के बावजूद उन लोगों से टैक्स क्यों नहीं वसूला गया ?

 उपर्युक्त फैसले के बावजूद दिल्ली की सी.बी.आई. अदालत में सी.बी.आई. ने क्वोत्रोची के खिलाफ मामले को वापस लेने की अपील दायर कर दी ।
सी.बी.आई. ने कोर्ट से कहा कि इस केस की मेरिट को दरकिनार करके इस केस को वापस ले लेने की अनुमति दी जाए। 4 मार्च 2011 को सी.बी.आई कोर्ट ने केस वापस लेने की सी.बी.आई. की दलील मान भी ली।

 सी.बी.आई. ने केस की मेरिट को दरकिनार करते हुए इसे कोर्ट से वापस क्यों ले लिया ? 

याद रहे कि अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल मेंे सी.बी.आई. ने ही इस कांड के संबंध में अदालत में 22 अक्तूबर 1999 को आरोप पत्र दाखिल किया था।  उससे पहले वी.पी. सिंह के शासनकाल में 22 जनवरी 1990 को बोफर्स मामले में प्राथमिकी दायर की गई थी।

 1987 में इस घोटाले के प्रकाश में आने के बाद मीडिया में सबूतों के साथ इस घोटाले के बारे में प्रामाणिक खबरें छपती रहीं।इसके बावजूद तब की राजीव गांधी सरकार के कार्यकाल में इस संबंध में प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की गई ?

 24 मार्च, 1986 को स्वीडन की हथियार बनाने वाली कंपनी ए.बी. बोफर्स से इस आश्वासन के बाद सौदा हुआ था कि इसमें कोई बिचैलिया नहीं है।
बिचैलिए की खबर आने पर केस होना चाहिए था।  18 अप्रैल 1987 को स्वीडन रेडियो ने खबर दी कि इस सौदे में भारतीय नेताओं और आला सैन्य अफसरों को रिश्वत दी गई।

  क्या इस सनसनीखेज सौदे की सही जांच होने दी गई ? दरअसल सरकार बदलने के साथ जांच की दिशा भी बदलती गई।

आखिर ऐसा क्यों हुआ ?

इस भटकाव के कारण जब अदालतों को इस मामले की तह में नहीं जाने दिया  गया तो फिर यह आरोप लगाना कितना सही है कि बोफर्स मामले में  मीडिया ट्रायल किया गया ?

  बोफर्स तोप एक अच्छी तोप है। पर विशेषज्ञ बताते हैं कि सौदा तय करते समय उसके साथ प्रतियोगिता फ्रंास की सोफ्मा तोप से थी। कुछ विशेषज्ञों ने सोफ्मा को  बेहतर बताया था। पर सोफ्मा शायद दलाली नहीं देता था।

    किस तरह अलग -अलग दलों की केंद्र सरकारों ने इस मामले में अलग -अलग रुख अपनाया, उसका पहला उदाहरण चंद्रशेखर सरकार का रवैया था। वी.पी. सिंह की सरकार के गिरने के बाद कांग्रेेस की मदद से चंद्रशेखर के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी। इस मामले में उस सरकार की राय वी.पी. सिंह की सरकार की राय से बिलकुल उलट थी।

नरसिंह राव सरकार के एक मंत्री माधव सिंह सोलंकी को मंत्रिमंडल से क्यों हटना पड़ा ? क्या यह बात सही है कि सोलंकी ने बोफर्स मामले की जांच रुकवाने के लिए संबंधित देश के सत्ताधारी व्यक्ति को पत्र दिया था ? ऐसा उन्होंने किसके कहने पर किया ? क्या इतने उलझे मामले के बारे में रिपोर्ट करना मीडिया ट्रायल होता है ?

एक बड़ा सवाल यह भी है कि 1993 में केंद्र सरकार ने क्वात्रोची को इस देश से गैर कानूनी ढंग से क्यों भाग जाने दिया ? 1991 से 1996 तक पी.वी. नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे।

सवाल यह भी है कि 2006 में भारत सरकार  की किस हस्ती के इशारे पर ब्रिटेन में स्थित क्वात्रोची के उस खाते को डिफ्रीज कर  दिया गया जिसमें बोफर्स की दलाली का पैसे होने की खबर थी और उसे 2003 में भारत सरकार ने फ्रीज करवा दिया था ? याद रहे कि 2004 से 2014 तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे।

   जब बोफर्स घोटाले के मामले में खुद केंद्र सरकार का रवैया बदलता रहा और एक खास पार्टी की सरकार ने इस मामले को कोर्ट में हल नहीं होने दिया तो फिर आशंकाएं तो पैदा होंगी ही।कोई कितना भी कहे ,पर जो हाल बोफर्स जांच का किया गया ,उससे यह स्थिति बन गई है कि इतिहास  इस कांड की निष्पक्ष जांच पर बड़ा प्रश्न चिह्न उठाएगा ही। चाहे कोई इसे मीडिया ट्रायल कहे या कुछ और। अपने पापों और गलतियों पर पर्दा डालने के  लिए उल्टे मीडिया पर आरोप लगा देना इस देश की राजनीति के एक बड़े हिस्से की आदत सी हो गई है।    

  (दैनिक जनसत्ता के 27 मई 2015 के अंक में प्रकाशित)
   

गुरुवार, 21 मई 2015

दिल्ली की जंग का असर देश की राजनीति पर


जन लोकपाल विधेयक जब विधानसभा से पास नहीं होने दिया गया तो विरोधस्वरुप केजरीवाल ने 2014 में मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। दिल्ली की जनता ने केजरीवाल के प्रति अभूतपूर्व एकजुटता दिखाते हुए इस साल के चुनाव में कुल 70 में से 67 सीटें ‘आप’ को दे दी।

अब जब यह धारणा बन रही है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘आप’ के बेलौस युद्ध में केंद्र सरकार रोड़े अटका रही है तो इसका अगला राजनीतिक नतीजा क्या होगा ?

    राजनीतिक पे्रक्षकों के अनुसार यदि इस युद्ध में ‘आप’ सरकार शहीद हुई तो न सिर्फ भाजपा का राजनीतिक जलवा कुछ और कम हो जाएगा, बल्कि देश में अरविंद केजरीवाल का जन समर्थन बढ़ जाएगा।

 अनेक लोगों का यह मानना है कि नियमतः भले उप राज्यपाल को कुछ खास अधिकार मिले हुए हों, पर मुख्यमंत्री की मंशा सही है। वे भ्रष्टाचार से ईमानदारी से लड़ रहे हैं। उनको कम से कम उन लोगों का साथ मिलना चाहिए था जो भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते रहे हैं।

 पर साथ देने के बदले दिल्ली में ऐसी स्थिति बन गई है जहां के मुख्यमंत्री अपनी सरकार के मुख्य सचिव तक का खुद चयन नहीं कर सकते ।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ठीक ही कहा है कि ‘राज्य सरकार एक मुख्य सचिव नियुक्त नहीं कर सकती तो वह और क्या कर सकती है ? ’

    खुद मोदी सरकार गैरभाजपा शासित राज्यों में भी राज्यपाल नियुक्त करने से पहले संबंधित मुख्यमंत्री की सहमति ले लेती है। पर जब केजरीवाल को अपना मुख्य सचिव नहीं चुनने देती तो कई लोगों को केंद्र की मंशा पर शक होता है।

 खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकारी भ्रष्टाचार से परेशान रहे हैं। एक साल के शासन के बाद भी देश की अर्थव्यवस्था गतिशील नहीं दिख रही है तो इसका सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार है। दूसरी ओर यदि दिल्ली में एक सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठा रही है तो केंद्र सरकार को चाहिए था कि वह उसे इस काम में बढ़ावा दे।

  गत 14 फरवरी को शपथ ग्रहण के बाद केजरीवाल ने कहा था कि उनकी सरकार दिल्ली को भ्रष्टाचार मुक्त करेगी। क्या ‘आप’ का यह कसूर है कि वह अपना वादा नहीं भूल रही है ?

 18 मई को केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली सरकार में भ्रष्टाचार 70 से 80 प्रतिशत कम हो चुका है। क्या ऐसा दावा केंद्र की मोदी सरकार कर सकती है ?

ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री अपनी सरकार से भ्रष्टाचार हटाना नहीं चाहते हंै। पर वह भ्रष्टाचार का होमियोपैथी इलाज कर रहे हंै जबकि जरुरत सर्जरी की है। केंद्र सरकार की राजनीतिक कार्यपालिका स्तर पर तो  घोटाले की कोई सूचना अब तक नहीं मिली है। पर क्या यही बात प्रशासनिक कार्यपालिका के बारे में कही जा सकती है ?

  यह ध्यान देने की बात है कि केजरीवाल की लड़ाई प्रशासनिक कार्यपालिका से ही अधिक है। होना तो यह चाहिए था कि केंद्र सरकार देशहित में ‘आप’ सरकार से सहयोग करके यह तरीका सीखती कि वह कैसे 70-80 प्रतिशत भ्रष्टाचार कम कर पाई है। इसके बदले यह धारणा बन रही है कि केंद्र सरकार  ‘आप’ सरकार को  सत्ताच्युत करना चाहती है। सवाल है कि दिल्ली राज्य की सरकार से च्युत होने के बाद कहीं पूरे देश में केजरीवाल, भाजपा के लिए राजनीतिक खतरा न पैदा कर दे !

(21 मई 2015 के दैनिक भास्कर के पटना संस्करण में प्रकाशित)

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

परंपरागत दलों के लिए दिल्ली से कड़ा संदेश


दिल्ली चुनाव में ‘आप’ की नयी राजनीतिक शैली की जीत हुई है। जो राजनीतिक पंडित और नेतागण इसे नरेंद्र मोदी और किरण बेदी की हार बता रहे हैं, वे इसका सतही आकलन ही कर रहे हैं।

   जिस नरेंद्र मोदी ने गत दिसंबर में झारखंड और जम्मू-कश्मीर में पार्टी को जीत दिलाई, वे सिर्फ दो महीने के भीतर ही इतना अलोकप्रिय कैसे और किन कारणों से हो गए कि दिल्ली में भाजपा मात्र तीन सीटों पर सिमट गई ?

  मोदी अलोकप्रिय नहीं हुए, बल्कि लोकप्रियता में केजरीवाल उनपर भारी पड़ गए। दरअसल दिल्ली के अधिकतर मतदाताओं ने ‘आप’ के इस वायदे पर अधिक भरोसा किया कि वह भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाएगी और वी.वी.आई.पी. संस्कृति से दूर रहेगी।

 याद रहे कि अपने जन्मकाल से ही ‘आप’ ने अपने काम और व्यवहार से यह साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार के साथ उसकी शून्य सहनशीलता है। याद रहे कि  भ्रष्टाचार अनेक सरकारी सुविधाओं को आम लोगों तक पहुंचने से रोकता है।

  जो राजनीतिक पंडित ‘आप’ की भारी जीत के अन्य कारण गिना रहे हैं, उन्हें भ्रष्टाचार के वास्तविक कुपरिणामों का पता नहीं है।  

    लोकसभा चुनाव में यदि नरेंद्र मोदी राजग को भारी जीत दिला पाए तो उसका भी प्रमुख कारण यही था कि लोगबाग मनमोहन सरकार के महाघोटालों से चिंतित थे। हालांकि किसी चुनावी जीत या हार के कई कारण होते हैं। पर उनमें से कोई एक निर्णायक कारण होता है।

    दिल्ली सहित पूरे देश में ग्रासरूट स्तर पर भी लोगबाग पुलिस और प्रशासन के भारी भ्रष्टाचार से परेशान रहे हैं। चूंकि नरेंद्र मोदी की इन मामलों में साख बेहतर है,इसलिए उन्हें लोक सभा चुनाव में अधिकतर जनता का समर्थन मिला।

  2014 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की जगह ‘आप’ जैसी कोई साख वाली पार्टी होती तो शायद राजग की सरकार केंद्र में नहीं बन पाती। 

  स्वाभाविक ही था कि मनमोहन सरकार की कमीज से नरेंद्र मोदी की कमीज जनता को  काफी उजली लगी। गत दिसंबर में अब्दुल्ला परिवार और सोरेन परिवार की कमीजें मोदी की कमीज से अधिक उजली भला किसे लग सकती थी ? पर, यही बात दिल्ली में नहीं थी।

   अरविंद केजरीवाल के 49 दिनों के शासनकाल में दिल्ली के लोगों ने यह महसूस किया कि शासन के भ्रष्टाचार में चमत्कारिक रूप से कमी आ गई थी।

 पर  कई  माह पहले केंद्र में मोदी सरकार बन जाने के बावजूद दिल्ली के भाजपानीत म्युनिसिपल काॅरपोरशन के भ्रष्टाचार में आज भी कोई कमी नहीं आई।

 यहां तक कि केंद्र सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार की व्यापकता के अनुपात में मोदी सरकार उससे उतनी ही कठोरता से लड़ती नजर नहीं आई।

     भाजपा को दिल्ली में जिस तरह की हार का सामना करना पड़ा,वैसी ही हार उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य के विधानसभा चुनाव में भी झेलनी पड़ेगी, ऐसा नहीं लगता। क्योंकि जाहिरा तौर पर मुलायम परिवार की कमीज की अपेक्षा नरेंद्र मोदी की कमीज काफी उजली साबित होगी।

   हां, भाजपा ही नहीं, बल्कि देश के अन्य राजनीतिक दलों को भी तब चिंता करने की जरुरत जरुर पड़ेगी जब ‘आप’ दिल्ली सरकार में बेहतर काम करके देश के बाकी हिस्सों  में भी फैलने की कोशिश करेगी।
 क्योंकि ‘आप’ की राजनीतिक शैली अपनाने में परंपरागत दलों को काफी दिक्कतेें आएंगी।

 ‘आप’ मौजूदा राजनीति का विकल्प नहीं,बल्कि वैकल्पिक राजनीति खड़ी करने में विश्वास करती है। परंपरागत दलों के अस्तित्व के लिए  बेहतर तो यही होगा कि वे भी सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति जल्द से जल्द अपना लें।

  चुनावी चंदे के मामले में  ‘आप’ की तरह ही  पारदर्शिता अपना कर वे इसकी शुरुआत कर सकते हैं।

 साथ ही वे जातिवाद, परिवारवाद,संप्रदायवाद  और अन्य तरह के वोट बैंक की राजनीति छोड़कर आम जनता के हितों की चिंता करें,दिल्ली के चुनाव नतीजे का यही मुख्य संदेश है।


  (इस लेख का संपादित अंश 11 फरवरी 2015 के दैनिक भास्कर में प्रकाशित )   



मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

‘आप’ की राजनीतिक शैली और उसका राजनीति पर संभावित असर

भाजपा नेता डा. सुब्रह्मण्यन स्वामी ने आम आदमी पार्टी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें कही हंै। अरविंद केजरीवाल की तुलना नक्सलियों से करते हुए उन्होंने भविष्यवाणी की है कि यदि ‘आप’ को दिल्ली प्रदेश की सत्ता मिल भी गयी तो वह एक साल के भीतर सरकार से अलग हो जाएगी।

 स्वामी के अनुसार ‘केजरीवाल के सारे सहयोगियों का संबंध नक्सलियों से रहा है। वे सरकार नहीं चला सकते। आप देखेंगे कि वे समाप्त हो जाएंगे।’

 याद रहे कि अरविंद केजरीवाल ने मात्र 49 दिनों के बाद ही मुख्यमंत्री पद से 15 फरवरी 2014 को इस्तीफा दे दिया था। उस समय भी कुछ राजनीतिक पंडितों ने भविष्यवाणी की थी कि ‘आप’ अब समाप्त हो जाएगी। पर हुआ उसके विपरीत ।दिल्ली में ‘आप’ का वोट शेयर बढ़ता ही चला गया।

ओपियन पोल और एग्जिट पोल के नतीजों पर भरोसा करें तो ‘आप’ दिल्ली में एक बार फिर सरकार बनाएगी। आखिर दिल्ली की अधिकतर जनता ‘आप’ को इतना पसंद क्यों कर रही है?

क्यों भाजपा जैसी सुसंगठित पार्टी और नरेंद्र मोदी जैसे लोकप्रिय नेता को भी दरकिनार कर अधिकतर जनता  ‘आप’ को गले लगा रही है  ?

  जानकारों के अनुसार  इसका एकमात्र कारण यह  है कि ‘आप’ ने भ्रष्टाचार के प्रति लगातार शून्य सहनशीलता दिखाई है। यदि यही काम मोदी सरकार ने  आठ महीनों के कार्यकाल में किया होता तो ‘आप’ की चमक गायब हो गई होती।

 पर सरकार के भीतर जाकर संभवतः मोदी जी और बाहर से डा. स्वामी को लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ चैतरफा युद्ध छेड़ देना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है। दूसरी ओर ‘आप’ इस तर्क से सहमत नहीं दिखती।

 इस पृष्ठभूमि में डा.स्वामी की यह सोच उनकी खुद की कसौटियों पर तो तार्किक लगती है। उन्हें लगता है कि नक्सली मानसिकता वाली ‘आप’ को यदि सरकार चलाने का मौका मिलेगा तो उनकी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई जीत ही नहीं सकेगी । और, जब जीत नहीं सकेगी तोे वे भाग खड़े होंगे।

   इन्हीं परिस्थितियों में केजरीवाल ने मुख्य मंत्री पद छोड़ा था। जबकि पद छोड़ने की उनकी कोई मजबूरी नहीं थी। इस देश में अधिकतर जनता उस नेता या दल को अधिक पसंद करती है जो अपने सिद्धांतों के लिए गददी छोड़ने के लिए तैयार रहता है। अरविंद ने जब पद छोड़ा था तो उस समय तो उनके समर्थकों के एक हिस्से ने उन पर गुस्सा दिखाया था। पर जब अरविंद ने स्थिति स्पष्ट की तो वही जनता संतुष्ट हो गई। इतना ही नहीं ‘आप’ का जन समर्थन बढ़ गया। दरअसल अधिकतर जनता ने ‘आप’ की कथित रणनीतिक त्रुटियों को नजरअंदाज किया और उसकी अच्छी मंशा पर भरोसा किया।

     केजरीवाल जमात का उभार जन लोकपाल आंदोलन के गर्भ से हुआ था।जब वह आदोलन चल रहा था, उस समय ‘आप’ बनी भी नहीं थी। क्योंकि उसके नेताओं का उद्देश्य राजनीति में जाना नहीं था। वे लोग अन्ना हजारे के नेतृत्व में गैर राजनीतिक आंदोलन चला कर जन लोकपाल विधेयक पास करवाना चाहते थे।

  पर जनलोकपाल विधेयक के कड़े मसविदे को देख कर देश की मौजूदा राजनीतिक जमात ,खासकर मनमोहन सरकार के कान खड़े हो गए थे।

 यदि उस विधेयक को उसी स्वरूप में पास कर दिया गया होता तो इस देश के अनेक नेता जेल में होते और चालू राजनीति को अपना कायाकल्प कर देना पड़ता।पर इसके लिए आज भला कौन तैयार है ?

  इसीलिए अन्ना हजारे की सलाह से मन मोहन सरकार ने जिस स्वरूप में लोकपाल विधेयक बाद में पास किया ,वह ‘आप’ के अनुसार नख-दंत विहीन है।उनकी गिरफ्त तो कोई चूहा भी नहीं लाया जा सकेगा  जबकि भ्रष्टाचार के बड़े -बड़े भेडि़यों और घडि़यालों को उनकी सही जगह बताने की जरूरत आज महसूस करती है।

  जिस लोकपाल आंदोलन के कारण जनता ने 2013 में ‘आप’ को सत्ता दिलाई थी,यदि वही विधेयक पास नहीं कर पाई तो वह गद्दी पर क्यों बैठी रहती ? वादा करके भूल जाने वाले दलों की भीड़ में ‘आप’ अलग तरह की पार्टी दिखाई पड़ रही है। आप के जनसमर्थन के बढ़ने का एक बड़ा कारण यही है।

  यदि ‘आप’ को इस बार भी सत्ता मिलेगी तो वह जन लोकपाल या यूं कहिए कि जन लोकायुक्त विधेयक को भूल नहीं सकती। पर विधेयक का जो मसविदा ‘आप’ के पास है, उसे विधेयक के रुप में पेश करने से पहले पूर्वानुमति की जरुरत पड़ेगी। ऐसे कड़े कानून बनाने की पूर्वानुमति यह व्यवस्था देगी ? उम्मीद तो नहीं है।
  डा.स्वामी को तो यह साफ लगता है कि वह अनुमति नहीं मिलेगी।फिर यदि बनी तो क्या ‘आप’ की सरकार सिर्फ कुर्सी गरम करने के लिए कुर्सी पर बनी रहेगी  ?

  डा.स्वामी को लगता है कि ऐसा नहीं होगा,इसलिए तुनक कर आप सरकार फिर गददी छोड़ देगी।
  राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार यदि ऐसा हुआ तो उसका पूरे देश पर  असर पड़ेगा ।

कई राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि  पूरा देश वर्षों से भीषण सरकारी और गैर सरकारी भ्रष्टाचार से पीडि़त है। 1966-67 में डा.राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में देश में कुछ गैर कांग्रेसी दलों का जो साझा आंदोलन और चुनावी अभियान चला  था,वह मुख्यतः भ्रष्टाचार के खिलाफ ही था।

 1974-77 के  जेपी आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार था। बोफर्स तथा अन्य घोटाले के खिलाफ वी.पी.सिंह के नेतृत्व में 1987-89 में चले आंदोलन का मुख्य मुददा तो
सिर्फ भ्रष्टाचार था।पर इन आंदोलनों के बाद निजाम बदलने के बावजूद देश के हालात नहीं बदले।
इन में से किसी सरकार ने यह कह कर गद्दी नहीं छोड़ी थी कि चूंकि वे अपने आंदोलन के मुददे को सरकार में आकर लागू नहीं कर पा रहे हैं,इसलिए गद्दी छोड़ रहे हैं।यह काम सिर्फ ‘आप’  ने किया।

  यदि इस बार गद्दी मिलने पर देश की भ्रष्टाचार समर्थक शक्तियां एक बार  केजरीवाल को गददी छोड़ने को विवश कर देंगीं तो उसका राजनीतिक परिणाम  देश भर में प्रकट हो सकता है।‘आप’ देर -सवेर राष्ट्रीय पार्टी बन कर उभर सकती है।क्योंकि उसकी अच्छी मंशा के कायल देश भर के लोग  हो सकते हैं।

  याद रहे कि आप के 2013-14 के 49 दिनों के शासनकाल में दिल्ली में भ्रष्टाचार काफी हद तक थम गया था।ऐसा प्रभाव  अब तक मोदी सरकार नहीं दिखा पाई है।

  एग्जिट पोल के नतीजे बताते हैं कि इस बार भी ‘आप’ को सभी जातियों,वर्गो और समुदायों में से  उन लोगों के वोट मिले हैं जो भ्रष्टाचार को इस देश की सबसे बड़ी समस्या मानते हैं।

 ‘आप’ की अगली सफलता या विफलता दोनों ही स्थितियों में देश भर में एक खास तरह के
राजनीतिक ध्रुवीकरण की संभावना जाहिर की जा रही है।वह धु्रवीकरण भ्रष्टाचार समर्थक और भ्रष्टाचार विरोधी शक्तियों के बीच हो सकता है।यदि ऐसा हुआ तो इसके साथ यह भी अपने आप हो जाएगा कि जाति,समुदाय और संप्रदाय के आधार पर समाज को बांट कर वोट बटोरने वाले नेताओं को उनकी नानी याद आ जाएगी।

  ( इस लेख का संपादित अंश 10 फरवरी, 2015 के दैनिक भास्कर ,पटना में प्रकाशित )
   



बुधवार, 7 जनवरी 2015

बिहार में जनता परिवार के वोट की ताकत जीतेगी या नरेंद्र मोदी की साख ?

बिहार विधानसभा के अगले आम चुनाव में राजग जीतेगा या जदयू-राजद गठबंधन बाजी मारेगा ? इन दिनों राजनीतिक और गैर राजनीतिक हलकों में यही सवाल कौंध रहा है।

   इस सवाल का जवाब आसान नहीं है। वोट के आंकड़े जदयू - राजद के पक्ष में हंै तो कुछ दूसरी बातें राजग को ताकत पहुंचा रही हैं। देखना है कि ऊंट अंततः किस करवट बैठता है।

 अक्टूबर-नवंबर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में यदि राजद-जदयू ने बाजी मार ली तो इससे गैर भाजपा दलों का मनोबल देश भर में बढ़ जाएगा। पर, यदि जनता का फैसला इसके विपरीत हुआ तो नरेंद्र मोदी और भाजपा की आगे की राह भी आसान हो जाएगी।

    गत अप्रैल-मई में लोक सभा के चुनाव हुए थे। उसमें राजग को बिहार में कुल 40 में से 31 सीटें मिली थीं। पर मात्र तीन महीने बाद जब विधानसभा की दस सीटों पर उप चुनाव हुए तो उसमें राजग साठ प्रतिशत सीटें हार गया।

 यानी राजद-जदयू-कांग्रेस गठबंधन को 6 सीटें मिल गईं। पर उस बीच एक फर्क आ गया था। लोकसभा का चुनाव राजद और जदयू ने अलग -अलग लड़ा था। पर उपचुनाव में जदयू ने राजद और कांग्रेस से गठबंधन बना लिया था।

   लोकसभा चुनाव के मतों के आंकड़ों के विश्लेषण से भी जदयू और राजद का मनोबल बढ़ा है। लोकसभा की जिन सीटों पर राजग को  विजय मिली थी, उनमें से 19 सीटें उसे नहीं मिल पातीं, यदि तब राजद-जदयू का गठबंधन रहा होता। यानी 19 सीटों पर  राजद और जदयू के मतों को जोड़ दें तो वे राजग से अधिक थे।

   ताजा राजनीतिक घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि अब जनता परिवार एक साथ आने ही वाला है। इतना ही नहीं, जनता परिवार अन्य गैर भाजपा दलों से भी चुनावी तालमेल करने की कोशिश करेगा ही।

  यदि गैर राजग दलों का अपसी तालमेल हो गया तो सैद्धांतिक रूप से यह गठबंधन राज्य की अधिकतर जनता के समर्थन वाला गठबंधन माना जाएगा। पर बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। राजग अभी केंद्र में सत्ता में है। हाल के लगभग सभी विधानसभा चुनावों में भाजपा को उसकी वास्तविक परंपरागत राजनीतिक ताकत की अपेक्षा अधिक वोट मिले हैं।

अनेक लोग नरेंद्र मोदी को एक अच्छी मंशा वाला नेता मान रहे हैं। इस वोट में खुद नरेंद्र मोदी के अपने वोट भी हैं। एक अन्य तर्क भी भाजपा के पक्ष में है।

 वह यह कि मतदाताओं का एक वर्ग यह चाहता है कि जिसकी सरकार केंद्र में हो, उसी की सरकार राज्य में भी होनी चाहिए ताकि राज्य सरकार केंद्र से तालमेल करके राज्य का विकास कर सके।

 राजग को इस बात का भी फायदा मिल सकता है कि यदि टिकट के बंटवारे के समय राजद-जदयू-कांग्रेस-एनसीपी तथा अन्य दल आपस में  लडेंगे।
 क्योंकि अधिक दलों के एक साथ आ जाने के बाद किसी भी एक दल के लिए यह जरूरी हो जाएगा कि वह अपने दल के अनेक उम्मीदवारों के टिकट कड़ाई से काट दे। जिनके टिकट कटेंगे, उन में कई स्थानीय स्तर पर ताकतवर नेता होंगे।

उनके लिए दल बदल की गुंजाइश तो कम ही रहेगी, पर वे निर्दलीय उम्मीदवार बनकर अपने मूल दल के उम्मीदवार को परेशानी में डाल सकते हैं। अब देखना होगा कि इस आशंकित भगदड़ का कितना लाभ राजग को मिलता है।

 भाजपा को उम्मीद है कि सबसे बड़ा हंगामा तो राजद के वे दबंग नेता लोग करेंगे जिनके टिकट कटेंगे। इस बात पर भी सहमति बनाना कठिन होगा कि राजद कितनी सीटों पर लड़ेगा और जदयू कितनी सीटों पर !
  हालांकि विधानसभा का चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही राजद-जदयू लड़ेगा, इस पर सहमति बन चुकी है। ऐसा संकेत मिल रहा है। गत नवंबर में ही कांगे्रेस ने भी यह संकेत दे दिया था कि राजद नीतीश कुमार को गठबंधन का नेता मान ले।

   दूसरी ओर बिहार के चुनाव में भी राजग का नेतृत्व नरेंद्र मोदी ही करेंगे। भाजपा के पास जंगलराज की पुनरावृत्ति के खतरे का नारा है।
 भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने कहा है कि राजद के साथ जदयू के विलयन का लाभ भाजपा को मिलेगा। क्योंकि तब यह स्पष्ट हो जाएगा कि  जंगल राज -2 का आगमन होकर रहेगा। इस मिलन से नीतीश कुमार की राजनीतिक पूंजी समाप्त हो जाएगी।

  हालांकि यह खतरा गत अगस्त में हुए बिहार विधानसभा के उप चुनाव में राजद-जदयू को नुकसान नहीं पहंुचा सके थे। उधर नीतीश कुमार ने बार-बार बिहार की जनता से यह वादा किया है कि वे किसी भी कीमत पर कानून के राज से समझौता नहीं करेंगे।

   हालांकि गत अप्रैल में लोक सभा के चुनाव -प्रचार के दौरान नीतीश कुमार ने कहा था कि ‘लालू प्रसाद को राज्य को तबाह करने की महारत हासिल है।’ पर अब नीतीश कुमार लोगों को विश्वास दिलाना चाहते हें कि लालू प्रसाद समय के साथ बदल गए हैं।

 अंदरुनी सूत्रों से भी यह संकेत मिल रहा है कि लालू प्रसाद ने नीतीश कुमार को यह कह दिया है कि आपको ही बिहार संभालना है।
 यह बात अधिकतर लोग मानते हैं कि नीतीश कुमार का सुशासन और विकास का पिछला रिकाॅर्ड बहुत बढि़या है। देखना होगा कि अगले बिहार विधानसभा चुनाव में उस रिकाॅर्ड का कितना चुनावी लाभ जदयू-राजद को मिलता है। उधर नरेंद्र मोदी की साख भी तब कसौटी पर होगी ।