मंगलवार, 13 मार्च 2018

  जो आई.ए.एस.अफसर विजय माल्या या नीरव मोदी बनने की कोशिश में हैं,उनके लिए मेरी यह सलाह नहीं है।वे उस राह पर चलते रहें जिस  पर इन दिनों बिहार के भी कुछ आई.ए.एस. अफसर चल रहे हैं।संभव है कि उन्हें वह रास्ता जय ललिता, हर्षद मेहता और के. अरूमुगम तक ले जाएगा।
चारा घोटाले के आरोपित अरूमुगम कई जेल यात्राओं और मुकदमे के भारी खर्चे के कारण  गरीबी में मरे।
 हालांकि यह बात भी कह दूं कि जिस तरह नेताओं में कुछ ईमानदार लोग हैं,उसी तरह अफसरों में भी हैं।  
पर, जो अफसर अपने वेतन के पैसों से अपनी और परिजन की आवश्यक आवश्यकताएं भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं,उनके लिए एक पुराने आई.ए.एस.अफसर मार्गदर्शक बन सकते हैं।
कई दशक पहले की बात है।उन्होंने अपने सेवा काल के प्रारंभिक वर्षों में ही शहर के पास के गांव में जमीन खरीद ली।इसके लिए उन्होंने वित्तीय संस्थान से कर्ज लिया था।
तब वहां जमीन अत्यंत सस्ती थी।शहर फैलने लगा।शहर नगर बना।अब तो नगर महा नगर बन चुका है।
 फिर वही सस्ती जमीन सोने के भाव की हो गयी।बाद में उन्होंने उसे बेचनी शुरू की।शादी -पढ़ाई-गृह निर्माण व भविष्य के लिए कुछ बचत भी हो गयी।सेवा में अन्य लोगोंकी अपेक्षा ईमानदार बने रहने में उन्हें सुविधा हुई।
  इस फार्मूले को आज भी कुछ अन्य लोग अपना रहे हैं।
एक पत्रकार मित्र को जानता हूं।उन्होंने बीस साल पहले पटना के पास के एक गांव में 20 हजार रुपए कट्ठा जमीन खरीदी। छह कट्ठा।
अब उसका एम.वी.आर. करीब 10 लाख रुपए प्रति कट्ठा है।
उनकी जमीन नेशनल हाईवे में जाने वाली है।यदि गयी तो मुआवजा मिलेगा प्रति कट्ठा करीब 40 लाख रुपए।कुल कीमत होगी 2 करोड़ 40 लाख रुपए।
यदि नहीं गयी तो वैसे भी वहां तक अब महा नगर पहुंच ही रहा है।
कुछ ही समय  में बाजार भाव भी लगभग उतना ही हो जा सकता है।
  एक सामान्य परिवार की आवश्यक आवश्यकताओं की पूत्र्ति इतने पैसे से हो ही जाएगी।
आवश्यक जरूरत से लोभ और विलासिता की ओर सफर का रास्ता अनेक मामलों में जेल में जाकर खत्म होता है।खानदान की बदनामी अलग से।
 आई.ए.एस.अफसर की चर्चा इसलिए कि मुख्यतः उनकी  ईमानदारी पर  किसी सरकार की ईमानदारी निर्भर है।
 पर उनमें से अधिकतर का हाल गड़बड़ है।
एक पूर्व बैंक अधिकारी ने हाल में बताया कि एक सरकारी अफसर ने कई साल पहले अपने विभाग के 60 करोड़ रुपए हमारे बैंक में जमा करवाया तो तुरंत उसने कहा कि मेरा 60 लाख रुपया बनता है।वह अफसर दूसरे केस में  जेल जा चुका है।फिर जाने वाला है। 


आपातकाल में मैं मेघालय में था।
गारो हिल्स जिले के फुलबाड़ी में ।
राजनीति से अलग हट कर वहां का एक हाल 
बता रहा हूं।
उन दिनों उस छोटे बाजार में  अविभाजित शाहाबाद  जिले के कई लोग थे।यहां तक कि राजस्थान के एक शर्मा जी भी थे जिनसे  मैं परिचित हुआ था।
मेरे रिश्तेदार जिनके यहां मैं गया था,वे बड़े मेहनती थे।
उनकी कपड़े की छोटी सी दुकान थी।आस -पास के अन्य छोटे बाजारों में भी जाकर  वे कपड़े बेचते थे। एक पांडेय जी की अच्छी -खासी दुकान पहले से थी।पहले वह भी छोटी ही रही होगी।
शर्मा जी वहां के मेरे आवास के ठीक बगल में एक झोपड़ी में रहते थे।
अपना बत्र्तन खुद ही मांजते थे।खाना बनाते थे और 
काम पर निकल जाते थे।ऐसा करने में उन्हें कोई संकोच नहीं था।बाद में उन्होंने भी तरक्की की।
 मैं तो वहां कुछ ही महीने तक रहा ,पर बाद के वर्षों में  मुझे पता चला कि इस बीच मेरे रिश्तेदार की आय काफी बढ़ गयी।उस परिवार ने बस-ट्रक वगैरह खरीद लिये।
 शाहाबाद के  एक बनिया ने वहां छोटी सी दुकान से वहां शुरू की थी।उन्होंने भी समय के साथ काफी कमाई की।
मैं जिन दिनों मैं वहां था,उन्हीं दिनों वहां के मुख्य मंत्री के यहां कोई शादी थी।
 तब चर्चा थी कि उस छोटी जगह के उसी व्यापारी के यंहा से उपहार के रूप में एक फिएट कार दी गयी थी। 
  खैर बनिया लोगों के पास  तो व्यवसाय की परंपरागत बुद्धि रहती ही हैं।वे तो अपने पुश्तैनी गांवों में भी वह सब काम किसी संकोच के बिना करते रहते हैं।
पर बिहार के किसी  राजपूत, भूमिहार या ब्राह्मण को अपने पुश्तैनी गांव में रह कर आम तौर पर वैसी शुरूआत मंजूर नहीं होती।अपवादों की बात और है।
इसलिए उनलोगों ने अपने लोगों से दूर मेघालय जाकर अत्यंत छोटे पैमाने  से शुरू किया और वे बस-ट्रक तक पहुंच गए।
क्या बदले हुए समय के साथ जबकि कई जगह स्थानीयता पनप रही है, उन्हें अब अपने पुश्तैनी गांव में भी वैसे ही छोटे पैमाने पर शुरूआत नहीं करनी चाहिए ? मेरी तो राय है कि वे संकोच छोड़ें और अपनी ही धरती पर शुरू करके आगे बढ़े।वे बहुत आगे बढ़ेंगे।
इससे राज्य भी संपन्न होगा और वे खुद भी।
बिहार के ऐसे कुछ  नवोदित ग्रामीण बाजारों को जानता हूं जहां जमीन तो सवर्णों की है,पर उन पर दुकानें बनाकर मध्य जातियों के लोग अच्छा -खासा छोटा-बड़ा व्यवसाय कर रहे हैं।नतीजतन वे पहले से सुखी हैं।
 व्यवसाय को लेकर एक परंपरागत संकोच से ग्रस्त सवर्ण या तो अपनी बाजार की जमीन बेच रहे हैं या फिर  जिनके पास पैसे हैं,वे दुकानें बना कर भाड़ा पर लगा रहे हैं।भाड़ा से कितना मिलेगा ? उसमें कोई खास बढ़ोत्तरी तो होती नहीं।
  
         
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   मेरठ के अजय मित्तल की ‘दोमुंही बात’ शीर्षक के तहत ‘राष्ट्रीय सहारा’ में चिट्ठी छपी है।उसे यहां हू ब हू प्रस्तुत कर रहा हूं।
   ‘ अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर फिल्म पद्मावती के विरोधियों के खिलाफ शबाना आजमी और जावेद अख्तर ताल ठोक कर  मैदान में उतरे हुए हैं।
 दो साल पूर्व ईरानी फिल्म निर्माता माजिद मजीदी की बनाई ‘मोहम्मद ः मैसेेंजर आॅफ गाॅड’ भारत में प्रदर्शित की जाने वाली थी।
उसमें ए.आर..रहमान का संगीत था।
मुल्ला -मौलवियों तथा रूढि़वादियों ने उसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
उस समय अभिव्यक्ति की आजादी की पुकार न सिर्फ अनसुनी कर ,बल्कि ठोकर मार कर शबाना-जावेद ने ट्वीट किया था कि मुस्लिमों की भावनाएं आहत करने वाली फिल्म नहीं बनाई जानी चाहिए।’ 

  इस देश में एक हजार से अधिक ऐसे डिफाॅल्टर्स  हैं जिनमें से हर व्यक्ति के यहां सरकारी बैंकों के 50 करोड़ रुपए से अधिक राशि  बाकाया  है । जानबूझ कर वे कर्ज वापस नहीं कर रहे हैं।
  ऐसे लोगों के खिलाफ मोदी  सरकार ने कड़ी कार्रवाई का 
निर्णय किया है।
इस सिलसिले में उनके पासपोर्ट भी जब्त हो सकते हैं।
सरकार की मंशा है कि इनमें से कोई नीरव मोदी जैसा भगोड़ा न बनने पाए।
पर दिक्कत यह है कि सरकारें घोषणा पहले कर देती है और कार्रवाई बाद में।
नतीजतन कई बार पंछी को उड़ जाने का मौका मिल जाता है।
  अरे भई, बिना घोषा किए पहले तुरंत एक हजार लोगों के पासपोर्ट जब्त कर लेने में क्या दिक्कत थी ? उसके बाद ही पचास करोड़ी के बारे में कोई जानकारी जाहिर करते !  
  प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों संसद में ठीक ही कहा कि  यू. पी. ए. सरकार के दौरान कांग्रेस की मिली भगत से पूंजीपतियों को दिए गए 52 लाख करोड़ रुपए के बैंकों के कर्ज डूब गए।
कर्ज की अदायगी नहीं होने पर बैंकों का यह पैसा एन.पी.ए.में बदल गया।
ऐसे में तो मोदी सरकार को अब ऐसा फूलप्रूव इंतजाम करना चाहिए  ताकि किसी अन्य  बैंक लुटेरे को देश छोड़ कर भागने का अवसर न मिले।उम्मीद की जानी चाहिए कि वैसा इंतजाम अब होगा। 
  

सोमवार, 12 मार्च 2018

 यदि आपको अपनी पत्नी को खुश रखना हो तो उसके
 मायके  की कभी -कभी तारीफ कर दिया कीजिए।हां,यदि तारीफ नहीं कर सकते तो आलोचना तो भूल कर भी मत कीजिए अन्यथा अंजाम समझ लीजिए।
  उसी तरह यदि आपको अपने किसी मित्र को प्रसन्न रखना हो,और उनके दिवंगत पिता से आप परिचित रहे हों ,या उनके जीवन काल में एक बार भी मिल चुके हों तो कभी -कभी उनकी बड़ाई में दो शब्द बोल दिया कीजिए।
कोई पुत्र अपने पिता के जीवन काल में भले उनसे लड़ता -झगड़ता हो,पर उनके गुजर जाने के बाद उसे उनके गुण ही याद रहते हैं।अधिकतर मामलों मंे होता यह है कि पुत्र बाद में इस बात का अफसोस करता है कि उनके रहते मैं उनके महत्व को समझ नहीं सका।
 और हां, किसी की झूठी तारीफ भी नहीं करनी है।क्योंकि ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जिसमें कोई न कोई गुण न हो।बस आपको उसके गुणों का पता होना चाहिए।
दरअसल दोस्ती तो ऐसी धागा है जिस पर प्रेम का मांझा 
यदा -कदा चढ़ाते रहना पड़ता है।
  हां,राजनीतिक बहसों में इस बात का सदा ध्यान रखिए कि बहस आप भले हार जाइए, किंतु दोस्त मत हारिए।
मैं फेसबुक पर कभी अपने वैसे मित्रों की टिप्पणियों का जवाब नहीं देता जिनसे मैं असहमत होता हूं।



कल्याण सिंह की पोती की खर्चीली शादी की खबर पढ़कर मुझे कर्पूरी ठाकुर की पुत्री की शादी याद आ गयी।
1971 की बात है।
तब कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्य मंत्री थे।
उन्होंने दरभंगा जिला स्थित अपने गांव पितांैझिया में अपनी पुत्री की शादी की।उन्होंने अपने मंत्रिमंडल के किसी सदस्य तक को नहीं बुलाया था।
साथ ही उन्होंने मुख्य सचिव को सख्त दे निदेश दिया था कि मेरी पूर्व अनुमति के बिना सहरसा और दरभंगा हवाई अड्डे पर बिहार सरकार का कोई विमान नहीं उतरेगा।
कर्पूरी जी को लगा था कि अंतिम समय में सूचना मिल जाने पर शायद उनके मंत्री और अफसर वहां पहुंचने की कोशिश करें।
उससे पहले शादी तय करने के लिए कर्पूरी जी जब अपने 
भावी दामाद के गांव गए तो रांची से वे टैक्सी से उनके गांव गए थे।सरकारी गाड़ी से नहीं।
तब बिहार एक ही था।उधर कल्याण सिंह के यहां शादी पर जो भारी खर्च हुआ,उसके जरिए  देश के उन करोड़ों गरीबों के जले पर नमक छिड़का गया जो अपने लिए दोनों जून के लिए भोजन नहीं जुटा पाते।
क्या नरेंद्र मोदी अपने दल के सत्ताधारी नेताओं से अपील करेंगे कि वे शादियों में शामिल होने के लिए कम से कम सरकारी वाहनों का इस्तेमाल न करें ?  
@12 मार्च 2018@  


 2015 के  बिहार विधान सभा के चुनाव में भाजपा और जदयू को 
अलग -अलग मिले मतों को जोड़ दें तो वह 41 दशमलव 2 प्रतिशत होता है।
उसी चुनाव में राजद-कांग्रेस के मतों का प्रतिशत कुल 25 दशमलव 1 था।
बिहार के उप चुनावों में इन्हीं गठबंधनों के बीच इस बार मुख्य मुकाबला है।
  एक लोक सभा और दो विधान सभा चुनाव क्षेत्रों के चुनाव नतीजे आने हैं।
इनके नतीजे बताएंगे कि इन दलों के मतों में 2015 के बाद कितना फर्क आया है।
यह भी पता चलेगा कि लालू परिवार के खिलाफ कानूनी कार्रवाइयों पर मतदाताओं की कैसी प्रतिक्रियाएं है।राजद खास कर लालू प्रसाद के प्रति सहानुभूति बढ़ी है या घटी है ?
 इन तीनों क्षेत्रों में सांसद-विधायकों के निधन के कारण उप चुनाव हुए हैं।
सहानुभूति वोट का कैसा असर होता होता है,चुनाव नतीजे यह भी बताएंगे।याद रहे कि दिवंगत  जन प्रतिनिधियों के परिजन भी चुनाव मैदान में हैं।