बुधवार, 10 अप्रैल 2019

इलेक्शन रेफरेंस
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 बंगला देश मुक्ति के बाद दरभंगा में पहला चुनाव  
     --सुरेंद्र किशोर--  
30 जनवरी, 1972 को दरभंगा लोक सभा उप चुनाव के 
लिए वोट डाले गए थे।
उसमें विदेश व्यापार मंत्री ललित नारायण मिश्र विजयी हुए थे।
कई मामलों में वह अलग ढंग का चुनाव था।
बंगला देश मुक्ति के बाद वह देश का पहला चुनाव था।
ललित नारायण मिश्र ने मतदाताओं से अपील की थी कि  ‘मुझको  दिया गया वोट कांग्रेस की नीतियों को दिया गया मत है जिसमें बंगला देश मुक्ति भी शामिल है।’
उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी सोशलिस्ट पार्टी के राम सेवक यादव ने कहा था  कि ‘मुझे मिलने वाला मत, बराबरी और खुशहाली के लिए होगा।’
  प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने ललित बाबू के समर्थन में दरभंगा में जन सभा की थी।
 पूर्व सांसद रामसेवक यादव  उत्तर प्रदेश के मूल निवासी  थे।
रिजल्ट के बाद जार्ज फर्नांडिस ने कहा था कि ‘दरभंगा उप चुनाव में जितना खर्च हुआ,वह देश के चुनावी इतिहास का एक  रिकाॅर्ड है।’
राम सेवक यादव के पक्ष में चुनाव प्रचार के काम में पूर्व मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर जी जान से लगे थे।ललित बाबू को यह अच्छा नहीं लगा था कि बाहर से एक ‘खास’ उम्मीदवार लाकर सोशलिस्ट पार्टी ने चुनाव को तनावपूर्ण बना दिया।कांग्रेस इसको लेकर कर्पूरी ठाकुर से विशेष तौर से नाराज थी।
नतीजतन कुछ ही सप्ताह बाद हुए विधान सभा चुनाव में कांग्रेस ने कर्पूरी ठाकुर को पराजित करने की जी तोड़ कोशिश की थी।पर  सफल नहीं हो सकी।
कर्पूरी ठाकुर अपने पुराने चुनाव क्षेत्र ताज पुर से जीत कर 1972 में एक बार फिर विधान सभा में पहुंच गए । 
  पूर्व मुख्य मंत्री  विनोदानंद झा के निधन के कारण दरभंगा सीट खाली हुई थी।
 ललित बाबू को 2 लाख 67 हजार और राम सेवक यादव को 1 लाख 76 हजार मत मिले।  
पहली बार इसी चुनाव में  ऐसे मतपत्रों का इस्तेमाल किया गया जिसके साथ अधकटी जुड़ी हुई थी।उस पर मतदाता दस्तखत करते थे या अंगूठे का निशान देते थे।
@दैनिक भास्कर-पटना-10 अप्रैल 2019@ 

मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

अद्भुत प्रतिभा के धनी रहे गणितज्ञ डा.वशिष्ठ 
नारायण सिंह के जन्म दिन पर उनके बारे में 
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राजनीतिक खबरों की भरमार के बीच ‘प्रभात खबर’ ने 
डा.वशिष्ठ नारायण सिंह के बारे में आज नई पीढ़ी को अच्छी अच्छी-खासी जानकारी दी है।
 हमलोग तो अद्भुत प्रतिभा के धनी गणितज्ञ वशिष्ठ बाबू के जमाने के छात्र थे और उनसे मिले बिना भी उनसे प्रेरित होते थे।
उनके लिए पटना विश्व विद्यालय ने पहली बार नियम बदल कर जल्दी -जल्दी उन्हंे एम.एससी.करवा दी थी।
उन्होंने 1963 में हायर सेकेंड्री परीक्षा पास की थी।नेतरहाट स्कूल में पढ़ेे वशिष्ठ जी बिहार टाॅपर थे।
पर जब पटना साइंस काॅलेज में दाखिला लिया तो शिक्षकों ने पाया कि ये तो ऊंची कक्षाओं के विषयों में भी पारंगत हैं।
फिर इनको एम.एससी.कराने के लिए 5 साल का लंबा समय क्यों लगाया जाए।वे 1965 में ही एम.एससी.कर गए।1969 में तो उन्होंने  कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से पीएच.डी.कर ली।
उन्होंने कुछ समय के लिए नासा के लिए भी काम किया।
पर कुछ ही साल बाद उनके दिमाग के तंतु उलझ गए यानी वे सिजोफं्रेनिया के मरीज हो गए।
जिनके ज्ञान से नासा ने अंतरिक्ष मिशन को आगे बढ़ाया,वह अपने गांव में वर्षों से गुमनामी में जी रहे थे कि इस बीच ‘नोवा’ ने उनके  पटना में रहने की व्यवस्था कर दी।
नोवा के सहयोग से उनकी समय- समय पर स्वास्थ्य जांच भी होती रहती है।बीमारी से ग्रस्त इस जीनियस के सरकार बहुत काम नहीं आई,पर नोवा ने अपना मित्र धर्म निभाया।
 नोवा यानी नेतरहाट के पूर्ववर्ती छात्रों का संगठन।इसके सदस्य बड़े -बड़े पदों पर रहे हैं।
 यह नोवा भी एक अलग ढंग का संगठन है।इसके सदस्य ही ऐसे  हैं।
हाल में पटना में अवस्थित नोवा काॅलोनी जाने का अवसर मिला।उस सुव्यवस्थित काॅलोनी को देख कर उसके सदस्यों के 
व्यवस्थित व सुरूचिपूर्ण व्यक्तित्व की भी हल्की झलक मिली।
 बात उस समय की है जब मेरे पत्रकार मित्र इंद्रजीत प्रसाद सिंह पटना के दीघा-आशियाना रोड स्थित एक फ्लैट में रहते थे।
उन दिनों यानी  नब्बे के दशक में मैं लोहिया नगर में रहता था।वहां से आशियाना रोड की दूरी बहुत है।उधर अभी पूरी आबादी भी नहीं बसी थी। 
मैंने उनसे पूछा कि ‘ इतनी दूर क्यों आ गए ?
आपको शहर में आवास नहीं मिला ?’
उन्होंने बताया कि ‘मेरे मित्र अजय जी का यह फ्लैट है।वे  मुझसे किराया नहीं लेते।उनके ही आॅफर पर मैं यहां हूं।’
वे दोनों नेतरहाट स्कूल में साथ पढ़ते थे।
अजय जी पटना के मशहूर यूरोलाॅजिस्ट हैं।दोस्तपरस्त हैं।कुछ तो उनका पारिवारिक संस्कार है । बाकी नेतरहाट की मैत्री संस्कृति ।
वह मैत्री संस्कृति वशिष्ठ बाबू के मामले में भी ‘नेतरहाटियनों’ ने कायम रखी।अब तो नेतरहाट झारखंड में है।
उम्मीद है कि वहां के छात्रों के बीच पहले जैसी ही आपसी सद्भावना अब भी होगी।
याद रहे कि आजादी के तत्काल बाद स्थापित नेतरहाट के छात्र बोर्ड परीक्षा में दर्जनों बार राज्य टाॅपर हुए।खैर अब तो शिक्षा-परीक्षा की जो हालत पूरे देश की है,वही बिहार की भी है।
 खुदा खैर करे !!

अफसोस नहीं कि हमने महमूद गजनवी, तैमूर लंग और ईस्ट इंडिया कंपनी की लूट को नहीं देखा !
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तुर्क हमलावर महमूद गजनवी ने ग्यारहवीं सदी में कुछ साल के भीतर भारत को 17 बार लूटा था। 
 इस देश में ताजा आयकर छापामारियों की खबरें पढ़कर यह लगता है कि आज के भारत को अनेक स्थानीय महमूद -तैमूर एक ही समय में एक साथ मिल कर विभिन्न राज्यों में भारी लूट कर रहे हंै।
ऐसा नहीं कि जो पकड़े जा रहे हैं,सिर्फ वही लुटेरे हैं।
यह लूट तो लगभग सर्वदलीय व सर्वजातीय है।
 नेता यदि किसी राज्य में  सत्ता में हैं तो उनकी स्थानीय पुलिस, केंद्रीय जांच एजेंसी से ‘युद्ध’ भी कर रही हैं।
तैमूर लंग और ईस्ट इंडिया कंपनी आदि के निर्मम लुटेरों की भी कहानियां पढ़ी हैं।
शुक सागर में भी लिखा है कि कलियुग में राजा ही अपनी प्रजा को लूटेगा।
 अभी -अभी मध्य प्रदेश में आयकर छापों से संबंधित दो खबरें मैंने पोस्ट की हैं।ये खबरें अकेली नहीं हैं।न पहली बार आई हैं।न ही ऐसा जघन्य काम सिर्फ एक दल के लोग कर रहे हैं।
 ऐसी खबरें आए दिन छपती रहती हैं।कुछ दिन पहले पश्चिम बंगाल में छापेमारी की कोशिश हुई तो वहां की मुख्य मंत्री केंद्रीय जांच एजेंसियों के खिलाफ धरने पर बैठ गर्इं।
मध्य प्रदेश की पुलिस बनाम सी.आर.पीएफ.जंग हुई।ऐसा ही कुछ कर्नाटका में भी हुआ।
अभी तो गैर भाजपा दलों के नेताओं और उनके लगुए-भगुए के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियां कार्रवाई कर रही है।
मन मोहन राज में भाजपा से जुड़े रेड्डी बंधुओं पर ऐसी ही कार्रवाई हो रही थी।
कोई हर्ज नहीं।यदि बारी-बारी से ही कार्रवाई होनी है तो वही सही।पर हो तो।
 इन ताजा छापामारियों की खबरें पढ़कर आम लोगों को महमूद गजनवी,तैमूर लंग,ईस्ट इंडिया कंपनी तथा उस तरह के अन्य विदेशी लुटेरों की कहानियां याद आएंगी या नहीं ?
वे लोग तो भारत को सोने की चिडि़या जान कर लूटने आए थे।
 पर,आजादी के बाद जब एक बार फिर इसे सोने की चिडि़या बनाने की बारी आई तो हमारे ही हुक्मरानों ने इस देश की सार्वजनिक संपत्ति के साथ
क्या -क्या करना शुरू कर दिया था,
उसका एक नमूना खुद कांग्रेस अध्यक्ष के शब्दों में --
‘ सन 1963 में ही तत्कालीन कांग्रेस  अध्यक्ष डी.संजीवैया को  इन्दौर के अपने भाषण में यह कहना पड़ा  कि ‘वे कांग्रेसी जो 1947 में भिखारी थे, वे आज करोड़पति बन बैठे।’@ 1963 के एक करोड़ की कीमत आज कितनी होगी ?@
गुस्से में बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने  यह भी कहा था कि ‘झोपडि़यों का स्थान शाही महलों ने और कैदखानों का स्थान कारखानों ने ले लिया है।’ 
1971 के बाद तो लूट की गति तेज हो गयी।अपवादों को छोड़कर सरकारों में भ्रष्टाचार ने संस्थागत रूप ले लिया।
  1985 में राजीव गांधी ने कहा कि  100 सरकारी पैसों में से दलाल-बिचैलिए 85 पैसे लूट ले जाते हैं। पंद्रह पैसे ही लोगों तक पहुंच पाते हैं।
 साठ के दशक में अमरीकी प्रोफेसर पाॅल आर.ब्रास ने उत्तर प्रदेश में सरकार के काम काज के गहन अध्ययन के बाद लिखा कि सत्ताधारियों ने अपने स्वार्थवश भ्रष्टाचार को ऊपर से नीचे की ओर फैलाया।
  अब तो हाल यह है कि भ्रष्टाचार अब भीषण लूट में बदल चुका है।सर्वव्यापी,सर्वजातीय  और सर्वदलीय हो चुका है।
कई सांसद घूस मांगते स्टिंग आपरेशन में पकड़े जा रहे हैं।
कई धनपशु करोड़ों -अरबों खर्च कर संसद में पहुंच जा रहे हैं। 
हवाला रिश्वत घोटाले में प्रधान मंत्री ,मुख्य मंत्री ,केंद्रीय मंत्री स्तर के नेताओं के नाम आते हैं।मुख्य मंत्री जेल जा रहे हैं।
आजादी की लड़ाई के दिनों इसकी कल्पना तक नहीं थी।
कुछ अन्य जेल के रास्ते में हैं।फिर भी लालच जारी है।उन्हें जातीय-साम्प्रदायिक वोट बैंक व अपार धन,गंुडों  का सहारा है।देश में क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को लचर बना कर रखा गया है।
 कम्युनिस्ट सहित कोई भी पार्टी आज अपने सारे चंदे का हिसाब देने को तैयार नहीं है।कुछ का ही हिसाब देते हैं।
घोटाले - महा घोटाले एक तरफ  होते जा  रहे हैं, तो दूसरी तरफ उनमें से कई दबाए भी जाते  रहे हैं।बोफर्स,जैन हवाला,सहारा डायरी,बिड़ला डायरी  और टू जी घोटाले आदि इसके सबूत हैं।
 जिस देश के 20 करोड़ गरीब लोग रोज एक शाम भूखे रहने को अभिशप्त  हैं,उस देश के अनेक नेतागण करोड़ों में चुनावी टिकट बेच -खरीद रहे हैं।
अरबों रुपए चुनावों में खर्च हो रहे हैं।अधिक चुनाव यानी अधिक चंदे ! और अधिक लूट!
इसीलिए लोक सभा -विधान सभा चुनाव एक साथ करवाने को अधिकतर  नेता राजी नहीं हो रहे हंै।
 चुनाव के दिनों अधिकतर नेता इतनी बड़ी संख्या में  हेलीकाॅप्टर उडा़ते हैं जिन्हें  देख कर लगता ही नहीं कि वे एक ऐसे गरीब देश के नेता हैं जिस देश के अधिकतर सरकारी अस्पतालों में रूई और डेटाॅल तक के लिए पैसे नहीं हैं।
  यह सब कब तक चलेगा ?

इतिहास-क्या  सच ,क्या  झूठ
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1.-1975 में तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की 
समस्तीपुर में हत्या कर दी गयी।
बिहार पुलिस ने अरूण कुमार मिश्र और अरूण कुमार ठाकुर को गिरफ्तार किया।उन दोनों ने धारा -164 के तहत न्यायिक अधिकारी के समक्ष बयान दिया।कहा कि उसने बड़ी हस्ती के कहने पर मिश्र की हत्या की।
 हत्या के तार दिल्ली तक जुड़ते थे।
उस बयान के तुरंत बाद सी.बी.आई.निदेशक दौड़े -दौड़े समस्ती पुर पहुंचे ।उन्होंने बिहार सरकार की किसी सिफारिश के बिना ही केस के अनुसंधान की जिम्मेदारी संभाल ली।दोनों अरूण रिहा कर दिए गए।
उनके बदले आनंद मार्गियों को पकड़कर उन्हें लोअर कोर्ट से सजा दिलवा दी गई।
 डा.जगन्नाथ मिश्र और विजय कुमार मिश्र ने कोर्ट मंे बयान दिए कि ललित बाबू का  आनंदमार्गियों से कोई झगड़ा नहीं था। 
  अब आप ही बताइए कि सौ साल के बाद आने वाली पीढ़ी जब दोनों बातें पढ़ेगी तो किस नतीजे पर पहुंचेगी  ?
2.-करीब दस साल पहले समझौता एक्सप्रेस कांड हुआ।पुलिस ने अजमत अली नामक एक पाकिस्तानी नागरिक को पकड़ा।
उसने अपना गुनाह भी कबूल किया।
पर ऊपरी दबाव में अजमत को रिहा करके असीमानंद को पकड़ लिया गया।
कुछ लेखक कहते हैं कि अजमत दोषी है।कुछ अन्य लेखक कहते हैं कि असीमानंद।सौ साल बाद की हमारी पीढ़ी किस नतीजे पर पहुंचेगी ?
3.-मोतीलाल नेहरू पेपर्स के आधार पर कुछ लोग लिख रहे हैं कि भारत की राजनीति में वंशवाद की शुरूआत मोतीलाल ने की।उन्होंने गांधी को लगातार तीन पत्र लिख कर अपनी जगह अपने पुत्र को 1929 में कांग्रेस अध्यक्ष बनवा दिया।
पर एक लेखक की किताब के अनुसार भारत की राजनीति में वंशवाद की शुरूआत सिंधिया परिवार ने की।
अब सौ साल बाद की पीढ़ी किसे सच मानेगी ?
अंत में 
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ताजा इतिहास को लेकर तो विभिन्न लेखकों ने इतना कंफ्यूजन फैला रखा है।
कल्पना कीजिए कि मध्य काल के भारत का जो इतिहास उपलब्ध हैं,उसके साथ क्या-क्या किया गया होगा !!!

पटना के पास के गांव में जब मैंने अपना घर बनाया
तो एक अच्छी बात हुई।मुझे एक भी पेड़ नहीं काटना पड़ा।जबकि, आम के बगीचे के पास मेरा घर है।
फिर भी हमने अपने आवासीय परिसर में 21 पेड़ों के पौधे लगाए हैं।वे तेजी से बढ़ रहे हैं। 
इन में से एक गुलमोहर का पेड़ हाल की आंधी में गिर गया।
विकल्प पर विचार चल रहा है। 

सोमवार, 8 अप्रैल 2019

चुनावों के समय जेलों में जैमर की घटकती है कमी-सुरेन्द्र किशोर



यह शिकायत नई नहीं  है।दुर्दान्त अपराधी जेलों में बैठकर भी बाहर अपराध करवाते हैं।इसके अलावा वे चुनाव के दिनों में किसी खास उम्मीदवार को वोट देने के लिए मतदाताओं को धमकाते हैं।
 यह काम आम तौर पर मोबाइल फोन के जरिए होता है।
यदि जेलों में कारगर जैमर लगे होते तो मोबाइल फोन काम नहीं कर पाते।
 अपराधी जेलों से अपने प्रभाव क्षेत्रों के मतदाताओं को निदेशित करे और उसके अनुसार वोट पड़े तो फिर कम से कम वहां लोकतंत्र कहां रहा ?
बिहार सहित देश की विभिन्न सरकारों ने जेलों में जैमर लगाने की कई बार कोशिश की।
कई जेलों में जैमर लगाए भी गए।कुछ जेलों में वे काम भी कर रहे हैं।
पर  अधिकतर जेलों की  इस मामले में स्थिति दयनीय है।कहीं जैमर हैं नहीं।कहीं हैं  भी तो वे ठीक से काम नहीं कर रहे हैं।कुछ जगहों से शिकायत है कि संबंधित जैमर की तकनीकी पुरानी पड़ चुकी है।उसे अपडेट यानी अद्यतन नहीं किया जा रहा है।कुछ  मामलों में तो जानबूझकर जैमर को खराब कर दिया जाता है।
अनेक मामलों में जैमर की खरीद में घोटाले के कारण भी घटिया जैमर लगा दिए जाते हैं।
यदि कम से कम देश के सभी केंद्रीय कारागारों मंे आधुनिकत्तम तकनीक वाले उच्च गुणवत्ता के जैमर लगा दिए जाएं तो मतदाताओं को जेलों से धमकाने का काम नहीं हो पाएगा।इसके अन्य फायदे भी हैं।
      -उत्तराधिकारी वही जिसकी 
      पीठ पर सुप्रीमो का हाथ- 
 वंशवादी दलों का उत्तराधिकार कैसे तय होता है ?
दरअसल दलीय सुप्रीमो अपने जिस परिजन की पीठ पर हाथ रख दे,उसे ही उस दल के नेता व उसके वोटर स्वीकार कर लेते हैं।वंशवादी दलों का मुख्य जनाधार आम तौर पर जातीय होता है।
जातीय आधार को नेता के साथ बांधे रखना आासान भी होता है।
जहां आधार जातीय नहीं भी है,वहां के खास मतदातागण दलीय सुप्रीमो के साथ बंधे रहते हैं।
1980 में संजय गांधी के निधन के बाद इंदिरा गांधी ने मेनका गांधी के बदले राजीव गांधी को चुना जबकि तब मेनका, राजीव की अपेक्षा राजनीतिक रूप से अधिक समझदार थीं।
शिव सेना के सुप्रीमो बाल ठाकरे ने अपने पुत्र उद्धव ठाकरे को अपना उत्तराधिकारी बनाया जबकि भतीजे राज ठाकरे में अधिक तेजस्विता है।
शिव सैनिकों व वोटरों ने उद्धव को ही स्वीकार कर लिया क्योंकि बाल ठाकरे की यही इच्छा थी।
करूणानिधि को अपने पुत्र  अलागिरी और एम.के. स्टालिन के बीच चयन करना था।उन्होंने अपने बड़े पुत्र अलागिरी के दावे को नजरअंदाज करके छोटे पुत्र एम.के.स्टालिन को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत कर दिया।
करूणानिधि के निधन के बाद अलागिरी ने पार्टी पर दबाव बनाया,पर डी.एम.के. ने स्टालिन को ही अपना नेता माना क्योंकि करूणानिधि की यही इच्छा थी।  
 पार्टी के अलावा डी.एम.के. के वोट बैंक ने भी स्टालिन को ही स्वीकारा।
-1952 के चुनावी दृश्य की एक झलक-
रामवृक्ष बेनीपुरी ने 1952 के चुनाव पर वैसे तो विस्तार से लिखा है, पर फिलहाल उनमें से उनके कुछ वाक्य यहां प्रस्तुत हैं ।
‘कांग्रेस का समर्थन दो ही तबके कर रहे हैं-हिन्दुओं में वे लोग ,जो बड़े जमीन्दार हैं और अंग्रेजों के राज में अमन सभा में थे।इसी गांव को देखिए।यहां के जुल्मी जमीन्दार के तहसीलदार और अमले कांग्रेस के कार्यकत्र्ता बने हुए हैं और वे लाठी से हांक कर कांग्रेस को वोट दिलाना चाहते हैं।’
‘........भोर होते ही बाबू लोग गरीबों को घर -घर घूम कर धमकाने लगे कि तुम लोग वोट देने नहीं जाओ-यदि जाओगे तो देख लेना।बुरी से बुरी धमकियां -गन्दी से गन्दी गालियां।’ 
     --और अंत में-
हाल में एक नेता जी ने कैमरे पर यह फरमाया है कि ‘पिछले  लोक सभा चुनाव में हमारे दल के  छह उम्मीदवारों पर हमारे करीब 50 करोड़ रुपए खर्च हुए।’
कोई व्यक्ति यह अनुमान लगा सकता है कि उस अनुपात में वे विधान सभा के छत्तीस उम्मीदवारों पर भी अलग से 50 करोड़ रुपए खर्च करते रहे होंगे।
मान लीजिए कि लोक सभा और विधान सभा के चुनाव साथ -साथ होने लगें तो उस नेता जी के कितने पैसे बच जाएंगे ?
फिर भी इस देश के बड़े नेतागण फिर से एक साथ चुनाव कराने पर एकमत क्यों नहीं होते ?
@ -कानोंकान-प्रभात खबर-बिहार-5 अप्रैल 2019-से@ 
  
  

पाक विदेश मंत्री कुरैशी ने कहा है कि 16 अप्रैल और 20 अप्रैल के बीच भारत एक बार फिर पाकिस्तान पर हमला करेगा।
 ऐसा कहने का कुरैशी का उद्देश्य चाहे जो भी हो,पर सच यह है कि भारत जरूर हमला करेगा और जबर्दस्त हमला करेगा,पर तभी जब पाक दोबारा ‘फुलवामा’ करवाएगा।
यदि जेहादी लश्करों पर पाक सरकार का कोई वश चले तो 
वह फुलवामा दुहराने से रोक दे।हमला नहीं होगा।
यदि ‘लश्कर’ रुक गए तो मैं एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक के नाते कह सकता हूं कि भारत कभी अकारण हमला नहीं करेगा।
 एक रिटायर पाक जनरल को मैंने यह कहते सुना है कि आजादी के बाद चारों बार पाक ने ही भारत पर हमला किया न कि भारत ने पाक पर।