मंगलवार, 5 नवंबर 2019

क्या होता इस देश यदि सुप्रीम कोर्ट न होता ?
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क्या हाल होता इस देश का यदि सुप्रीम कोर्ट 
नहीं रहा होता ? !!!
हमलोग एक बार फिर पाषाण युग में जा चुके होते।
 वही जिंदा रहता जो सबसे ताकतवर होता  !!
1975-77 के आपातकाल में इंदिरा गांधी सरकार के एटाॅर्नी जनरल नीरेन डे ने सुप्रीम कोर्ट को बता दिया था कि यदि स्टेट किसी की जान भी ले ले तौभी उसके खिलाफ अदालत की शरण नहीं ली जा सकती।
एक लाख से अधिक नेताओं -कार्यकत्र्ताओं-बुद्धिजीवियों को जेलों में ठूंस कर उन्हें अदालत की शरण में जाने से भी सरकार ने वचित कर दिया था।
  4 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण पर सुनवाई करते हुए कहा  कि सरकारें नागरिकों के जीने के अधिकार का हनन कर रही है।
  चलिए सुप्रीम कोर्ट ने इमरजेंसी में तो मान लिया था कि इंदिरा सरकार को कानूनी प्रक्रिया के बिना भी किसी की जान ले लेने कव पूरा अधिकार है।
  कल सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘‘राज्य सरकारें लोगों को दिल्ली न आने की सलाह दे रही है।यह बर्दाष्त नहीं किया जाएगा।
सरकारों की जिम्मेवारी तय की जाएगी।
क्योंकि यह नागरिकों के जीने के अधिकार का हनन कर रही है।’’ 


70 हजार करोड़ के घोटालेबाजों के प्रति नरमी क्यों ?
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आरोप है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस-एन.सी.पी.के शासन 
काल में 70 हजार करोड़ रुपए का सिंचाई घोटाला हुआ था।
 आज के अंग्रेजी दैनिक हिन्दू के अनुसार जब भाजपा-शिवसेना राज में उसकी जांच शुरू हुई तो पता चला कि सिंचाई विभाग के वरीय पदाधिकारियों के खिलाफ 7 एफ.आई.आर.दर्ज करने की जरुरत है।
  उसके लिए जल संसाधन विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटी्र की अनुमति चाहिए।
पिं्रसिपल सेंक्रेट्री साहब गत साल अगस्त से ही अनुमति लटकाए हुए हैं।दे ही नहीं  रहे हैं।
  पर, सवाल यह भी है कि देवेंद्र फड़नविस सरकार आखिर क्या कर रही है ?वह किस मर्ज की दवा है ?
70 हजार करोड़ रुपए के घोटाले की जांच मंे भी 
इतनी सुस्ती ?
याद रहे कि जल संसाधन विभाग उन दिनों एन.सी.पी.नेता अजित पंवार के चार्ज में था। 
  यदि कोई खास अफसर अनुमति नहीं दे रहा है तो ऐसे अफसर को वहां तैनात क्यों नहीं करते जो जल्दी यह काम कर दे ?
क्या हरियाणा के अशोक खेमका और बिहार के के.के.पाठक जैसे अफसर महाराष्ट्र में नहीं हैं ?
   जब इस देश के घोटालेबाज सत्तासीन नेता घोटाला करने के लिए अफसर को बदल सकते हैं तो घोटालेबाजों को सजा दिलाने के लिए ऐसा क्यों नहीं हो सकता ?
याद रहे कि कई दशक पहले बिहार के एक सत्तासीन नेता ने अपने पुत्र को खान का पट्टा देने के लिए संबंधित जिले के डी.सी.,डी.एस.मुखोपाध्याय को वहां से हटा दिया और अपने अनुकूल अफसर को वहां बैठा दिया था।
  काम तुरंत हो गया।मुखोपाध्याय काम नहीं कर रहे थे।

    

सोमवार, 4 नवंबर 2019

3 नवंबर 2019 को जवाहरलाल नेहरू के सुनहले पक्ष की विस्तृत चर्चा करते हुए एक लेख पोस्ट किया था।
अब तक मात्र  21 ‘लाइक’ आए हैं।
नेहरू की सराहना करने पर ऐसा लगभग हर बार होता है।
पर यदि उनकी विफलताओं की चर्चा करता हूं तो बड़ी संख्या में ‘लाइक’ आते हैं।
ऐसा नहीं कि हमारी मित्र मंडली में सिर्फ एक ही विचारधारा के लोग हैं। 
ऐसा क्यों होता है ?


पश्चिम बंगाल के मुर्शीदाबाद जिले के पांच मजदूरों को
जेहादी आतंकियों ने कश्मीर में मार डाला।
मुख्य मंत्री  ममता बनर्जी ने जम्मू-कश्मीर की कानून व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार की खूब आलोचना की।
 पर, उनके पास उन आतंकियों के खिलाफ बोलने के लिए कोई शब्द नहीं था  जो वहां इस्लामिक शासन लागू करने के लिए लंबे समय से जेहादरत हैं।
  इस तरह ममता ने अपने राज्य के अपने वोट बैंक का पूरा ध्यान रखा।

शनिवार, 2 नवंबर 2019

बिन लादेन की तरह अमेरिका ने बगदादी के शव को भी समंदर में बहा दिया।
यह भारत में आतंकियों की अंतिम क्रिया की अनुमति से उलट है।
 इससे आतंकियों की कब्र जिहादियों के लिए खास बन जाती है
और मरा हुआ आतंकी जिंदा आतंकवादी से ज्यादा खतरनाक हो जाता है। 
                     ---ब्रह्म चेलानी, दैनिक जागरण

पाकिस्तान,बंगला देश और अफगानिस्तान में प्रताडि़त हिन्दुओं,सिखोें,जैनों, पारसियों और ईसाइयों को भारत की  नागरिकता देने का विधेयक लोक सभा में पारित हो चुका है।
अब राज्य सभा में पास होना है।
  कुछ समय पहले रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में बसाने के पक्ष में जोरदार आवाज उठाने वाले भारतीय नेताओं और बुद्धिजीवियों को नागरिकता कानून का समर्थन करते आपने सुना,पढ़ा या देखा ?आखिर क्यों ?  

अंग्रेजी में रिश्तों के लिए भी शब्दों का अभाव
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चाचा,
फूफा,
मामा,
मौसा,
चचिया ससुर 
और ममिया ससुर के लिए सिर्फ एक ही
 शब्द का इस्तेमाल होता है, 
यानी-- अंकल ।
यही हाल अंग्रेजी के आंटी शब्द का है।