शनिवार, 6 जून 2020

जनता से कटे कुछ नेतागण ! 
अब भी वक्त है !! 
शैली बदलिए  !!!
लोकतंत्र में प्रतिपक्ष भी सत्ताधारी 
की तरह ही महत्वपूर्ण हैं। 
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1.-नोटबंदी सन 2016 के नवंबर में लागू की गई।
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2.-पूर्व वित्त मंत्री पी.चिदंबरम ने कहा कि नोटबंदी 
ने देश के 45 करोड़ लोगों की कमर तोड़ दी।
--प्रभात खबर-14 दिसंबर 2016
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दूसरी ओर, सत्ताधारी दल ने कहा कि कमर किन्हीं और की 
टूटी है, गरीबों की नहीं।
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3.-कुछ ही महीनों के बाद उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव हुए।
भाजपा को 403 में से 310 सीटें मिल गईं।
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4.-चिदंबरम के अनुसार यदि गरीबों की कमर टूटी थी तो यू.पी.के 
सिर्फ अमीरों ने भाजपा को 310 सीटें दिला दी  ?
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5.-दरअसल चिदंबरम व उनके दल के अनेक नेताओं ने जनता से कट 
जाने के कारण 
 नोटबंदी को लेकर गलत धारणा फैलाने की कोशिश की।
यह भी संभव है कि जानबूझ कर उन लोगों ने ऐसा किया।
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6.-यह कोई इकलौता उदाहरण नहीं रहा।
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7.-भारत सरकार ने जुलाई 2017 में जी.एस.टी.लागू की।
उस पर राहुल गांधी ने कहा कि यह ‘गब्बर सिंह टैक्स’ है।
यानी, यदि उनकी बातें सच होतीं तो व्यापारी वर्ग भाजपा से 
सख्त नाराज हो जाते--जिस तरह शोले फिल्म के खूंखार डाकू 
गब्बर को देखकर रामपुर
वासी कांप जाते थे।भगदड़ मच जाती थी।
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8.-पर, न तो ऐसा होना था और न हुआ।
व्यवसाय प्रधान राज्य गुजरात में कुछ ही माह बाद 
विधान सभा के चुनाव हुए।
उस चुनाव के बाद भी  भाजपा राज्य की सत्ता में बनी रही।
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9.-लगता है कि तीसरी बार भी प्रतिपक्ष का वैसा ही आकलन आ रहा है ।
यह सच है कि लाॅकडाउन के बाद देश के प्रवासी मजदूरों को अपार कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है।
अब राजग विरोधी दलों के कुछ नेतागण मजदूरों की इस विपत्ति में अपने लिए चुनावी भविष्य देख रहे हैं।
लगता है कि पिछली दो बार गलत हो जाने के बावजूद उसी तरह का गलत अनुमान इस बार भी लगाया जा रहा है।यानी उनके अनुसार  मजदूर राजग को अगले चुनाव में सबक सिखाएंगे।
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इस पर अभी क्या कहा जाए !
प्रतीक्षा कर लेने में क्या नुकसान है !!
 चुनावों के नतीजे बता देंगे कि किसका अनुमान सही है।
  ताजा सर्वेक्षण के नतीजे तो बता रहे हैं कि केंद्र सरकार ने कोरोना महामारी से उत्पन्न समस्याओं से जिस तरह निपटने का प्रयास किया,उससे देश के अधिकतर लोग संतुष्ट हैं।
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10-बिहार के उप मुख्य मंत्री सुशील कुमार मोदी ने भी कल कहा  कि समय से लाॅकडाउन के कारण देश के लाखों लोगों की जिंदगी बचाई जा सकी।
अमेरिका जैसे देश में एक लाख 7 हजार लोगों की कोरोना से जान गई ,वहीं भारत में अब तक 5829 मौतें हुईं।
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11.-और अंत में
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 विभिन्न देशों में कोरोना महामारी से ग्रस्त लोगों की कुल संख्या बताने 
और अन्य देशों के बीच श्रेणीकरण करने का तरीका सही नहीं है।
  इस संख्या को इस तरह बताया जाना चाहिए कि प्रति एक लाख की जनसंख्या पर किस देश में कितने लोग कोरोना ग्रस्त हुए।
 याद रहे कि अमेरिका की आबादी करीब 33 करोड़ है,तो वहीं भारत की एक अरब 31 करोड़।
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सुरेंद्र किशोर-4 जून 20 


संपूर्ण क्रांति दिवस
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‘‘आग तो तुम्हारी कुर्सियों के नीचे सुलग रही है।’’
     --जयप्रकाश नारायण, 5 जून, 1974
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बिहार आंदोलन के दौरान 5 जून, 1974 को पटना के गांधी 
मैदान से जयप्रकाश नारायण ने ‘संपूर्ण क्रांति’ 
का आह्वान करते हुए कहा था कि 
‘‘ यह संघर्ष केवल सीमित उद्देश्यों के लिए नहीं हो रहा है।
उद्देश्य दूरगामी हैं।
भारतीय लोकतंत्र को रीयल यानी  वास्तविक तथा सुदृढ़ बनाना है।
जनता का सच्चा राज कायम करना है।
समाज से अन्याय,शोषण आदि का अंत करना ,एक नैतिक ,सांस्कृतिक 
तथा शैक्षणिक क्रांति करना,नया बिहार बनाना और अंततोगत्वा नया 
भारत बनाना है।यह संपूर्ण क्रांति है।’’
  तब के शासकों की ओर इंगित करते हुए जेपी ने यह भी कहा कि 
‘‘किसी को कोई अधिकार नहीं है कि जयप्रकाश नारायण को लोकतंत्र की शिक्षा दे।
यह पुलिसवालों का देश है ?
यह जनता का देश है।
मेरा किसी व्यक्ति से झगड़ा नहीं है।
हमें तो नीतियों से झगड़ा है।
सिद्धांतों से झगड़ा है।
कार्यों से झगड़ा है।
चाहे वह कोई भी करे मैं विरोध  
करूंगा।
यह आंदोलन किसी के रोकने से ,जयप्रकाश नारायण के भी रोकने से,
 नहीं रुकने वाला है।
कुर्सियों पर बैठते हो !
आग तो तुम्हारी कुर्सियों के नीचे सुलग रही है।
यूनिवर्सिटी -काॅलेज एक वर्ष तक बंद रहेंगे।
सात जून से एसेम्बली के चारों गेटों पर सत्याग्रह होंगे।
अब नारा यह नहीं रहेगा कि ‘विधान सभा भंग करो।’
नारा रहेगा ‘विधान सभा भंग करेंगे।’
इस निकम्मी सरकार को हम चलने न दें।
जिस सरकार को हम मानते नहीं ,
जिसको हम हटाना चाहते हैं,
उसको हम टैक्स क्यों दें ?
हमें कर बंदी आंदोलन करना होगा।’’
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आज भी कुछ लोग तंज कसते हुए यह पूछते हैं कि जेपी आंदोलन ने 
देश को क्या दिया ?
उसका संक्षिप्त जवाब यह है कि जेपी ने इमरजेंसी से देश को मुक्ति दिलाई।
साथ ही, केंद्र में 1977 में मोरारजी देसाई को प्रधान मंत्री बनवाया।
बिहार में कर्पूरी ठाकुर मुख्य मंत्री बने।
कोई भी खुले दिल-ओ -दिमाग वाला व्यक्ति आसानी से इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई के बीच का अंतर समझ सकता है।
उसी तरह डा.जगन्नाथ मिश्र और कर्पूरी ठाकुर के बीच का अंतर समझना भी
कठिन नहीं है।
यानी, जेपी के अंादोलन के बाद दोनों जगहों में साफ -सुथरे नेतृत्व ने गद्दी संभाली।
देसाई और कर्पूरी पर भ्रष्टाचार व वंशवाद का कभी कोई आरोप नहीं लगा
जो भारतीय राजनीति की आजादी के बाद से ही सबसे बड़ी बुराइयां रहीं।
   1990 में सत्ता में आए कुछ नेताओं को जेपी से जोड़ कर जो लोग जेपी आंदोलन को बदनाम करना चाहते हैं, वे मूल बात भूल जाते हैं ।
  सन 1990 के सत्ताधारी लोग बोफर्स अभियान और मंडल आंदोलन के कारण सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे थे और वर्षों तक बने भी रहे ,न कि जेपी आंदोलन के कारण।
  हां, एक बात जरूर हुई।
जेपी आंदोलन 1974 में शुरू हुआ
और 1975 में ही इमरजेंसी लगा दी गई।
19 महीनों के लिए देश को जेल में बदल दिया गया।
इमरजेंसी में जेल में ही जेपी की किडनी खराब हो गई या कर दी गई।
यानी, जेपी को अपने अनुयायियों को संस्कारित करने का अवसर बहुत 
कम मिला।
हां,संघर्ष वाहिनी के कुछ सदस्य जेपी के अधिक  करीबी
थे।उनका संस्कार बेहतर था।
मूल आंदोलनकारी संगठन छात्र-युवा संघर्ष समिति के कुछ सदस्य भी संस्कारित थे,पर सभी नहीं।कई अनगढ़ थे।
 जेपी जेल में अस्वस्थ नहीं हुए होते तो 1977 के बाद भी अन्य युवकों को भी उसी तरह संस्कारित करते जैसा वे खुद थे।
संस्कारित मतलब--‘‘राजनीति सत्ता के लिए नहीं, सेवा के लिए होती है।’’
एक बात तो तय है कि खुद जेपी को सत्ता का कभी मोह नहीं रहा।
केंद्र में सत्ता में भागीदार बनाने  का आॅफर जवाहरलाल नेहरू ने जेपी को दिया था।
पर जेपी की कुछ कड़ी शत्र्तें थीं जिन्हें मान लेना नेहरू के लिए तब संभव नहीं था।
इसलिए बात नहीं बनी।
याद रहे कि नेहरू और जेपी के बीच स्नेहपूर्ण संबंध था।
उसी तरह का संबंध कमला नेहरू और प्रभावती जी के बीच था।
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--सुरेंद्र किशोर -- 5 जून 20 

शुक्रवार, 5 जून 2020


चुनावी खर्चे में कमी के लिए पार्टियां भरसक करें डिजिटल सभाएं--सुरेंद्र किशोर
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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सात जून को बिहार में ‘डिजिटल रैली’ करेंगे।
यानी, वे डिजिटल माध्यमों के जरिए प्रदेश के भाजपा कार्यकत्र्ताओं और आम लोगों को संबोधित करंेगे।
  प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ‘मन की बात’ ऐसे ही माध्यमों के जरिए लोगों तक पहुंचाते रहे हैं।
  इसी 3 जून को मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने पटना से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए मुजफ्फरपुर में स्थापित जार्ज फर्नांडिस की मूत्र्ति का अनावरण किया।
  कोरोना महामारी ने कुछ खास तरह की स्थिति पैदा कर दी है।
फिलहाल उसी में जीना है।
पर, इसे विपत्ति को वरदान बनाया जा सकता है।
 बिहार में विधान सभा चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है।
अक्तूबर-नवंबर में चुनाव होने हैं।
राजनीतिक समां बांधाने के लिए राजनीतिक दल हर बार 
बड़ी -बड़ी चुनावी सभाएं करते हैं।
उन पर बहुत सारे पैसे खर्च होते हैं।
  यदि चुनाव तक कोरोना की महामारी थम गई तो वही होगा जो पहले भी होता रहा है।
पर यदि नहीं थमी तो अनेक नेताओं व दलों को भरसक डिजिटल सभाओं से संतोष करना पड़ेगा।
जो कमी रहेगी,उसे राजनीतिक दलों के कार्यकत्र्तागण पूर्ण करेंगे।
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 डिजिटल सभाओं का क्यों
 न हो स्थायी प्रचलन !
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इस गरीब देश में आम सभाओं और चुनावी सभाओं का डिजिटल 
संस्करण विकसित होने लगे तो राजनीति पर हो रहे धुआंधार खर्चों 
में कमी आ सकती है।
वे पैसे गंभीर व ईमानदार राजनीतिक कार्यत्र्ताओं को जीवन निर्वाह भत्ता
 देने के काम आ सकते हैं।
 इससे संभवतः राजनीति में शुचिता लाई जा सकेगी।
आज तो अधिकतर राजनीतिक  कार्यकत्र्ताओं को  अपने जीवन 
निर्वाह के लिए 
‘‘तरह-तरह’’ के  काम करने पड़ते हैं।
या फिर किसी ‘‘उम्मीद’’ में उन्हें अपने घर का आटा गीला करना पड़ता है।
जो टिक नहीं पाते ,वे राजनीति को बीच में ही छोड़कर किसी अन्य 
काम में लग जाते हैं।
  अनेक कार्यकत्र्ताओं को राजनीति में बनाए रखने के लिए उन्हें  
सांसद-विधायक 
फंड की ठेकेदारी दिलवा दी जाती है।
ठेकेदार -सह - राजनीतिक कार्यकत्र्ता
राजनीति की बेहतर छवि पेश नहीं करते। 
  अनेक संासद-विधायकों का तर्क  है कि सांसद-विधायक 
फंड को बनाए रखने की मजबूरी है।
क्योंकि उसी से राजनीतिक 
कार्यकत्र्ताओं के गुजारे के लिए कुछ पैसे निकलते हैं।
  पर, बड़ी- बड़ी खर्चीली जन सभाओं और चुनावी सभाओं पर होने 
वाले खर्चे के पैसे बचाकर कार्यकत्र्ताओं को दिए जाएं तो क्या हर्ज है ?
इसलिए जो सभाएं डिजिटल माध्यमों से संभव हों,उनसे शुरूआत तो हो जाए!  
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 वृक्ष प्रतिरोपण बेहतर विकल्प 
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दिल्ली सरकार ने वृक्ष प्रतिरोपण नीति, 2020 तैयार की  है।
नीति के अनुसार यदि पेड़ों को 
काटना पड़ता है तो 
उनमें से 80 प्रतिशत पेड़ों का प्रत्यारोपण किया जाएगा।
इस नीति को जल्द दिल्ली के राज्य मंत्रिमंडल  से 
मंजूरी मिलने वाली है।
अभी यह आम नियम है कि एक पेड़ काटना हो तो उसके बदले दस पेड़
लगाने होंगे।
विकास योजनाओं के लिए पेड़ तो काटने ही पड़ते हैं।
वैसे नई नीति को लेकर विशेषज्ञों की अलग -अलग राय है।
प्रतिरोपण महंगा पड़ता है।
साथ ही, प्रतिरोपण के बाद पेड़ों के जीवित रहने का प्रतिशत कम रहता है।
वैसे कुल मिलाकर यह एक अच्छा विचार है।
 छोटे पेड़ों के प्रतिरोपण की स्थिति में उसके जीवित रहने की संभावना अधिक रहती है।
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भूली बिसरी याद
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 बिहार आंदोलन के दौरान  5 जून, 1974 को पटना के गांधी मैदान से सर्वोदय नेता जय प्रकाश नारायण ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान करते हुए कहा था कि 
‘‘ यह संघर्ष केवल सीमित उद्देश्यों के लिए नहीं हो रहा है।
उद्देश्य दूरगामी हैं।
भारतीय लोकतंत्र को रीयल यानी  वास्तविक तथा सुदृढ़ बनाना है।
जनता का सच्चा राज कायम करना है।
समाज से अन्याय,शोषण आदि का अंत करना ,एक नैतिक ,सांस्कृतिक  तथा शैक्षणिक क्रांति करना,नया बिहार बनाना और अंततोगत्वा नया भारत बनाना है।
यह संपूर्ण क्रांति है।’’
  तब के शासकों की ओर इंगित करते हुए जेपी ने यह भी कहा कि 
‘‘किसी को कोई अधिकार नहीं है कि जयप्रकाश नारायण को लोकतंत्र की शिक्षा दे।
यह पुलिसवालों का देश है ?
यह जनता का देश है।
मेरा किसी व्यक्ति से झगड़ा नहीं है।
हमें तो नीतियों से झगड़ा है।
सिद्धांतों से झगड़ा है।
कार्यों से झगड़ा है।
चाहे वह कोई भी करे मैं विरोध  
करूंगा।
यह आंदोलन किसी के रोकने से ,जयप्रकाश नारायण के भी रोकने से,
 नहीं रुकने वाला है।
कुर्सियों पर बैठते हो !
आग तो तुम्हारी कुर्सियों के नीचे सुलग रही है।
यूनिवर्सिटी -काॅलेज एक वर्ष तक बंद रहेंगे।
सात जून से एसेम्बली के चारों गेटों पर सत्याग्रह होंगे।
अब नारा यह नहीं रहेगा कि ‘विधान सभा भंग करो।’
नारा रहेगा ‘विधान सभा भंग करेंगे।’
इस निकम्मी सरकार को हम चलने न दें।
जिस सरकार को हम मानते नहीं ,
जिसको हम हटाना चाहते हैं,
उसको हम टैक्स क्यों दें ?
हमें कर बंदी आंदोलन करना होगा।’’
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और अंत में
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 फिल्मों में अश्लीलता अखरती है,खासकर भोजपुरी फिल्मों की।
मेरी टिप्पणी  सभी फिल्मों के बारे में नहीं है।पर अधिकतर के बारे में तो है।
उम्मीद थी कि अकेले भाजपा जब पूर्ण बहुमत के साथ केंद्र में सत्ता ग्रहण करेगी तो वह फिल्म सेंसर बोर्ड को ‘टाइट’ करेगी।
पर, निराशा हो रही है।
अरे भई, कम से कम दशकों पहले बने संेसर नियमों को तो लागू कराने का प्रबंध कीजिए।
बहुत पहले मैंने उन नियमों को पढ़ा था।
आज की अधिकतर फिल्में उन नियमों पर खरी नहीं उतरतीं।
क्या इस बीच उन नियमों को बदल दिया गया ?
भारतीयों के संस्कार तो आम तौर से नहीं बदले हैं !
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5 जून, 20 को प्रभात खबर,पटना में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक 
काॅलम कानोंकान से।  

मंगलवार, 2 जून 2020

दुर्घटनाएं रोकनी हांे तो अल्पवयस्कों को नदियों में अकेले न जाने दें गार्जियन -सुरेंद्र किशोर


यदि कोई अभिभावक अपनी अल्पवयस्क संतान को अपना वाहन
सड़कों पर चलाने के लिए दे देता है।
यदि संतान कोई दुर्घटना कर देती है ।
ता,े अभिभावक को तीन साल की सजा होगी।
सजा के इस प्रावधान के लिए मोटर व्हेकिल एक्ट में 
गत साल संशोधन किया गया।
  यह एक अच्छी खबर है।
 इसके साथ ही एक और कानून की जरूरत है।
स्नान करते समय एक साथ एक से अधिक अल्पवयस्क बच्चांे के नदी या तालाब में डूब जाने की खबरें आती रहती हैं।
आम तौर पर उन मृतकों के साथ उनके परिवार का कोई वरिष्ठ सदस्य उस समय नहीं होता है।
   ऐसे अभिभावकों के लिए भी सजा के प्रावधान की जरूरत है ।आखिर वे  अपनी वैसी संतान को नदियों में नहाने के लिए क्यों छोड़ देते हैं जिन्हें तैरने तक नहीं आता ?
हालांकि कई बार दुर्घटनाएं उनके साथ भी हो जाती हंै जिन्हें तैरने आता है।
  मान लिया कि कहीं ऐसी घटना हो गई ।
अब वहीं अनुपस्थित अभिभावकगण, जिन्होंने उन बच्चों को कुछ ही समय पहले तक भी कुछ भी करने के लिए छोड़ दिया था,घटना के बाद लाठी-डंडे के साथ पास की व्यस्त सड़क पर उतर जाते हैं।
वाहनों में तोड़फोड़ और हिंसा करने लगते हैं।
रोड जाम कर देते हैं।
राहगीरों की पिटाई करने लगते हैं।
सरकार से मुआवजा मांगने लगते हैं।
 ऐसा जागरूकता की कमी के कारण होता है।
वैसे लोगों में कानून का भय नहीं होता।
  यदि उन अभिभावकों के लिए भी कुछ सजा का प्रावधान हो
जाए तो शायद कुछ फर्क आएगा।  
   --ब्रिटेन में शरण लेने की कोशिश में माल्या--
 प्रत्यर्पण रोकने में जब लंदन कोर्ट ने मदद नहीं की तो विजय माल्या
अब ब्रिटेन में शरण लेने की कोशिश में हैं।
जानकार सूत्रों के अनुसार यदि शरण नहीं मिली तो वह ट्रिब्यूनल में
अपील कर सकते हैं।
उस प्रक्रिया में करीब 18 माह लग सकते हैं।
इससे पहले वे पिछले कुछ साल से लंदन की अदालतों में अपने भारत प्रत्यर्पण को रोकने की कोशिश करते रहे।
पर उन अदालतों ने उन्हें कोई मदद नहीं की।
इधर भारत सरकार उनकी किसी भी कीमत पर स्वदेश
 वापसी कराने 
पर अमादा है।
 उन पर भारतीय बैंकों का करीब 9 हजार करोड़ रुपए बाकी हैं।
 वे इस देश से भाग कर लंदन जा चुके हैं।
 ब्रिटिश सरकार ने किसी विदेशी को शरण देने की जो शत्र्त
रखी है,उनके दायरे में आर्थिक अपराधी नहीं आता।
हां,जाति या धर्म के आधार पर अपने देश में जिसका उत्पीड़न हो रहा हो,उसे वहां शरण दी जा सकती है।
शरण की कुछ अन्य शत्र्तें हैं जो संभवतः माल्या पूरी नहीं करते।
--माॅल से अलग होंगे रेस्त्रां !--
समस्या नई है तो समाधान भी नए ढंग से ही करना होगा।
करीब 20 साल पहले रेस्त्रां ने सड़कों से उठकर माॅल में अपनी जगह बनानी शुरू की।अब तो वैसे रेस्त्रां की संख्या काफी बढ़ चुकी है।
अच्छा-खासा धंधा भी हुआ।
पर कोरोना महामारी ने वहां भी बदलाव की नौबत ला दी है।
दरअसल लगता है कि लाॅकडाउन में माॅल सबसे बाद खुलेंगे।
अभी तो माॅल के साथ के रेस्त्रां भी बंद ही हैं।
  यदि रेस्त्रां एक बार फिर माॅल से निकल कर सड़कों के किनारे आ जाएं तो कैसा रहेगा ?
रेस्त्रां वाले समझ रहे हैं कि उससे वे फायदे में रहेंगे।
--पुण्य तिथि पर चरण सिंह की याद--
चैधरी चरण सिंह कहा करते थे कि यदि उद्योग को बढ़ावा देना हो तो पहले कृषि को बढ़ावा दो।
क्योंकि देश की देश की अधिकतर आबादी यानी कृषकों की आय जब तक नहीं बढ़ेगी, तब तक करखनिया माल खरीदेगा कौन ?
नहीं खरीदेगा तो कारखाने चलेंगे कैसे ?
  चरण सिंह इस बात के लिए कांग्रेस सरकार की आलोचना किया करते थे कि आजादी के बाद सरकार ने खेती की उपेक्षा की और उद्योगों को बढ़ावा दिया।
यह नीति देश के लिए अहितकारी साबित हुई।
यह अच्छी बात है कि कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने 
कृषि क्षेत्र के लिए एक समग्र नीति पेश की है।
यदि चरण सिंह आज हमारे बीच होते तो संभवतः उन्हें अच्छा लगता।
पूर्व प्रधान मंत्री चरण सिंह खुद को किसान नेता कहलाना पसंद करते थे,न कि जाट नेता।
वे चाहते थे कि किसानों के परिवारों के सदस्यों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिले। 
वे अपने मतदाताओं से सार्वजनिक तौर पर यह अपील करते थे कि
यदि जाट होने के कारण मुझे वोट दे रहे हो तो मत देना।
  चरण सिंह ने 1954 में प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिख कर एक सलाह दी थी।
उन्होंने लिखा था कि गजटेड नौकरियां पाने वालों के लिए अंतरजातीय शादियां जरूरी कर दी जानी चाहिए।
वे सहकारी खेती के खिलाफ थे।
      -- और अंत में--
कोरोना महामारी ने हमारे देश में सेवा क्षेत्र और ढांचागत विकास
की कमजोरियों को एक बार फिर उजागर कर दिया है।
उम्मीद है कि इस विपदा से निकलने के बाद हमारे छोटे-बड़े 
हुक्मरान बुनियादी क्षेत्रों के विकास पर अधिक ध्यान देंगे।
दे भी रहे हैं।
वैसे तो कोरोना जैसे राक्षस से मुकाबले में दुनिया के विकसित
देश भी हांफ रहे हैं।
पर हमें तो अभी अनेक बुनियादी काम भी करने हैं।
यानी,कड़ाई से टैक्स वसूलिए और 
उन पैसों से गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढांचा तैयार कीजिए।   
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कानोंकान-प्रभात खबर,पटना -29 मई 2020


भारतेंदु हरिश्चंद्र और खड्गविलास प्रेस

महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘सत्य हरिश्चंद्र’ नाटक पढ़ने से उनके जीवन में निर्णायक मोड़ आ गया। नई पीढ़ी के कम ही लोग जानते हैं कि इसके लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र की रचनाएं पटना के खड्ग विलास प्रेस में ही छपी थींं।अब वह प्रेस तो नहीं है,पर आधुनिक हिंदी को उस प्रेस का योग दान अद्भुत है।उन्नीसवीं सदी के उतरार्ध में पटना का वह प्रेस बिहार का गौरव था। उस प्रेस और प्रकाशन संस्था पर शोध करके डाक्टरेट की उपाधि हासिल करने वाले डा.धीरेंद्र नाथ सिंह लिखते हैं, ‘आधुनिक हिंदी साहित्य को उजागर करने में इस प्रेस के योगदान का ऐतिहासिक मूल्य है।’ दिवंगत डा.सिंह ने आधुनिक हिंदी के विकास में खड्ग विलास प्रेस के विशिष्ट अवदान का मूल्यांकन किया था। इस विषय पर बिहार राष्ट्र भाषा परिषद द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘आधुनिक हिंदी के विकास में खड्ग विलास प्रेस की भूमिका’ में डा.सिंह ने लिखा है कि ‘उत्तर प्रदेश के बलिया निवासी महाराजकुमार राम दीन सिंह ने सन् 1880 में पटना के बांकी पुर में खड्ग विलास प्रेस की स्थापना की थी।उन्होंने अपना जीवन शिक्षक के रूप में आरम्भ किया था तथा पाठ्य पुस्तकों और हिंदी पुस्तकों के अभाव ने उन्हें प्रकाशन व्यवसाय के लिए प्रेरित किया था।उन्होंने स्वयं पाठ्य पुस्तकें तैयार कीं और अन्य लोगों से पुस्तकें लिखवाईं।इन कृतियों का प्रकाशन खड्ग विलास प्रेस ने किया।भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र और उनके युग के लेखक यदि आधुनिक हिंदी साहित्य के निर्माता हैं तो निश्चय ही खड्ग विलास प्रेस और उसके संस्थापक को उनका एकमात्र प्रकाशक माना जाना उचित होगा।यदि महाराज कुमार राम दीन सिंह का सद्भाव और सहयोग न मिला होता तो भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन साहित्यकारों को अपनी रचनाओं के व्यवस्थित प्रकाशन का इतना अच्छा सुयोग नहीं मिला होता।’ ‘इस प्रकाशन संस्थान ने भारतेंदु हरिश्चंद्र,पंडित प्रताप नारायण मिश्र,पंडित अम्बिका दत्त व्यास,पंडित शीतला प्रसाद त्रिपाठी,भारतीय सिविल सेवा में हिंदी के प्रतिष्ठापक फ्रेडरिक पिंकाट,आधुनिक हिंदी खड़ी बोली के प्रथम महा काव्य प्रिय प्रवास के प्रणेता पंडित अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔंध’, पंडित दामोदर शास्त्ऱी सपे्र, लाल खड्ग बहादुर मल्ल, शिव नंदन सहाय प्रभृति साहित्यकारों को प्रकाशकीय संरक्षण प्रदान किया और उनकी कृतियों के प्रकाशन पर मुक्तहस्त से व्यय किया।’ ‘हिंदी भाषी प्रदेशों में सबसे पहले बिहार प्रदेश में सन् 1835 में हिंदी आंदोलन शुरू हुआ था।इस अनवरत प्रयास के फलस्वरूप सन् 1875 में बिहार में कचहरियों और स्कूलों में हिंदी प्रतिष्ठित हुई, किंतु पाठ्््य पुस्तकों का सर्वथा अभाव था।खड्ग विलास प्रेस ने विभिन्न विषयों में पाठ्य पुस्तकें तैयार करा कर इनका प्रकाशन किया।साहब प्रसाद सिंह,उमानाथ मिश्र,चण्डी प्रसाद सिंह,काली प्रसाद मिश्र,प्रेमन पांडेय प्रभृति लेखकों ने इस दिशा में सक्रिय रूप से सहयोग किया था।साहब प्रसाद सिंह की ‘भाषा सार’ नामक पुस्तक सन् 1884 से 1936 तक बिहार के स्कूलों और कालेजों में पढाई जाती रही। राम दीन सिंह का बचपन पटना जिले के तारण पुर गांव में बीता जहां उनके मामा का घर था।राम दीन सिंह के पुत्र सारंगधर सिंह भी एक बुद्धिजीवी राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी थे।वे सन् 1937 में डा.श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में बने मंत्रिमंडल में संसदीय सचिव थे।बाद में वे बिहार से संविधान सभा के सदस्य बने।उन्होंने 1952 से 1962 तक पटना को लोक सभा में प्रतिनिधित्व किया।रामदीन सिंह से भारतेंदु हरिश्चंद्र के आत्मीय संबंध की झलक उनके आपसी पत्र -व्यवहार से भी मिलती है। 23 सितंबर 1882 को भारतेंदु हरिश्चंद्र ने बाबू राम दीन सिंह को लिखा,‘आपका पत्र और तार मिला।आपने जैसा अनुग्रह इस समय किया,वह कहने के योग्य नहीं,चित्त ही साक्षी है।आज शनिवार की दोपहर है।अब तक बाबू साहब प्रसाद सिंह नहीं आए।शाम तक या रात तक शायद आवें।यद्यपि इस अवसर पर फिर आपको कुछ लिखना निरा झख मारना है किंतु अत्यंत कष्ट के कारण लिखता हूं।हो सके तो एक सौ और भेज दीजिए।जो काम कमबख्त दरपेश है नहीं निकलता और मैं यहां किसी से उसका जिक्र तक नहीं किया चाहता इसी से फिर निर्लज्ज होकर लिखा।किंतु जाने दीजिए,बहुत कष्ट हो तो नहीं।क्षमा। इसके पीछे जो नोटिस है मेरे अनुरोध से क्षत्रिय पत्रिका में छाप दीजिएगा। भवदीय,हरिश्चंद्र ।’ ‘सूचना ः मेरी बनाई वा अनुवादित वा संग्रह की हुई पुस्तकों को श्री बाबू राम दीन सिंह खड्ग विलास के स्वामी छाप सकते हैं जब तक जिन पुस्तकों को ये छापते रहें और किसी को अधिकार नहीं कि छापें।-हरिश्चंद्र।’ भारतेंदु ने एक बार फिर राम दीन सिंह को लिखा,‘मेरे एक मित्र ने मुझसे बड़ा विश्वासघात किया।मेरा कुछ रुपया कुछ कारण से उसके नाम से रहता था।वह बेइमान होकर मिरजा पुर चला गया।वरंच मैं इसी वास्ते विन्ध्याचल गया था।अब वह साफ इनकार कर गया।खैर दीवानी फौजदारी जो कुछ होगी वह देख ली जाएगी।अब गुप्त बात आपको लिखता हूं कि रुपए सब एक साथ हाथ से निकल जाने से मैं बहुत ही तंग हो गया हूं।’ प्रभात खबर (21-11-2008)

सोमवार, 1 जून 2020

रंगदारों-भ्रष्टों के लिए कंपनी की ओर से 27 लिफाफे !!

कई साल पहले की बात है। मैं झारखंड गया था। वहां एक सामाजिक समारोह में शामिल होना था। एक बड़ी निजी कंपनी के वरीय पदाधिकारी से मुलाकात हुई। पहले सुन रखा था कि वे कंपनी के संचालन को लेकर परेशान रहते हैं। 
उस दिन पूछा,‘अब क्या हाल है ?’

उन्होंने कहा कि ‘अब पूरी शांति है।’ कैसे ? उनका जवाब था, ‘‘पहले 27 लिफाफे हर महीने बनाने पड़ते थे। अब एक ही लिफाफे से काम चल जाता है।’’

‘‘वह कैसे ?’’ मेरा सवाल था।

पहले संबधित सरकारी विभागों के अफसरों, स्थानीय रंगदारों, और नेताओं के लिए कुल 27 लिफाफे बनते थे। लिफाफे लेने वालों का व्यवहार भी बड़ा खराब रहता था। पर अब सिर्फ माओवादियों को लेवी देनी पड़ती है। माओवादियों के संरक्षण में चले जाने के बाद बाकी 27 डर
के मारे अब गायब हो गए है। इसलिए शांति से हमारा काम चल रहा है।

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अब सवाल है कि देश में हर जगह तो माओवादी हैं नहीं जो निजी कंपनियों को ‘थोड़े में’ निश्चिंतता प्रदान कर देंगे ? ऐसा नहीं कि 27 लिफाफे सिर्फ झारखंड में ही तैयार करने पड़ते हैं।

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सुना है कि चीन से एक हजार कंपनियां भारत आएंगी। उन कंपनियों को हमारी सरकारें ‘27 के चक्कर’ से कैसे बचाएंगी ? यदि नहीं बचाएंगी तो वे कंपनियां कब तक यहां टिकेंगी ?

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सुरेंद्र किशोर, 1 जून 2020

1975 के जून में हुई थी देश को झकझोरने वाली कई घटनाएं




सुरेंद्र किशोर
सन् 1975 के जून में देश को झकझोरने वाली एक साथ एक से अधिक घटनाएं हुईं। उतनी बड़ी राजनीतिक घटनाएं कभी किसी एक महीने में इस देश में शायद ही उससे पहले हुई। 

सबसे प्रमुख राजनीतिक घटना 25 और 26 जून के बीच की रात में हुई । उस रात देश में आपातकाल लागू कर दिया गया। एक लाख से अधिक राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं तथा अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। उस महीने की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का लोकसभा का चुनाव अदालत ने खारिज कर दिया। किसी प्रधानमंत्री का चुनाव पहली बार खारिज हुआ।आपातकाल उस अदालती निर्णय का परिणाम बताया गया।

उसी महीने गुजरात विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी हार गयी। 12 जून को एक साथ तीन खबरें आईं। तीनों खबरें प्रधानमंत्री के लिए बुरी थीं। राजदूत डी.पी. धर का निधन, गुजरात में कांग्रेस की हार और इलाहाबाद हाईकोर्ट का प्रतिकूल निर्णय। दिवंगत धर इंदिरा जी के विश्वासपात्र  थे।

चुनाव कराने की मांग पर जोर डालने के लिए उससे पहले 1975 के अप्रैल में मोरारजी देसाई ने नई दिल्ली में अनशन किया था। उनकी मांग प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मान ली और चुनाव करा दिया गया। याद रहे कि गुजरात में एक साल से चुनाव टाला जा रहा था। वहां राष्ट्रपति शासन था। 9 फरवरी, 1974 तक चिमन भाई पटेल मुख्य थे। चुनाव के बाद जनता मोर्चा के नेता बाबू भाई पटेल मुख्यमंत्री बने।

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने जब इंदिरा गांधी का चुनाव खारिज कर दिया तो एक बड़े वकील ने टिप्पणी की कि इंदिरा गांधी पर ट्रैफिक रूल्स के उलंघन जैसा कसूर था।

इस निर्णय पर देश में राजनीतिक तहलका मच गया।

याद रहे कि 1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रायबरेली लोकसभा क्षेत्र में सोशलिस्ट नेता राज नारायण को हराया था। हाईकोर्ट ने चुनाव रद करने के दो कारण बताए थे। एक तो इंदिरा जी की चुनावी सभा के मंच का निर्माण सरकारी साधनों से किया गया था। दूसरा कारण गजटेड अफसर यशपाल कपूर को लेकर बना। अदालत के अनुसार इंदिरा गांधी ने चुनाव में यशपाल कपूर की मदद ली थी। यह साबित हो गया था।

उस निर्णय के बाद प्रधानमंत्री के पक्ष में देश में जहां—तहां नारे लगने लगे, नुक्कड़ सभाएं होने लगीं। उधर जय प्रकाश नारायण तथा प्रतिपक्षी दलों ने इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग शुरू कर दी। 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में इस सवाल पर जयप्रकाश नारायण की बड़ी सभा हुई। इस बीच इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सबसे बड़ी अदालत ने हाईकोर्ट के निर्णय को स्टे कर दिया, पर इंदिरा जी को लोकसभा के किसी मत विभाजन में भाग लेने से रोक दिया। यह प्रधानमंत्री के लिए यह अपमानजनक स्थिति थी।

उन्होंने 25 और 26 जून के बीच की रात में देश में आपातकाल घोषित कर देने की राष्ट्रपति से सिफारिश कर दी और राष्ट्रपति ने इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी। साथ ही जयप्रकाश नारायण सहित देश के करीब एक लाख से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। एक साथ इतनी बड़ी संख्या में राजनीतिक कर्मियों की गिरफ्तारी की वह आजाद भारत की पहली घटना थी।

आपातकाल लगाने के बाद प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संदेश में प्रतिपक्षी दलों के बारे में कहा कि ‘......बहुत दिनों से इन घटनाओं को हम अत्यधिक धैर्य से देखते रहे। अब हमें इनके नये कार्यक्रमों का पता चला है जिनसे सारे देश में सामान्य कार्य में बाधा डालने के उद्देय से कानून व व्यवस्था को चुनौती दी गयी है। क्या कोई भी सरकार जो सरकार है, देश के स्थायित्व को ऐसे खतरे में पड़ने दे सकती है? कुछ लोग हमारे सशस्त्र सैनिकों व पुलिस को विद्रोह के लिए उकसाने लगे हैं।’

आपातकाल के साथ प्रेस पर कठोर सेंसरशीप लगा दी गयी। प्रतिपक्ष की राजनीतिक गतिविधियां पूरी तरह ठप हो गयीं। आजाद भारत के लिए यह एक अजूबी घटना थी। किसी नेता के अनशन के दबाव पर किसी विधानसभा का चुनाव हो, वैसी अनूठी घटना भी जून 1975 में गुजरात में  हुई थी।