मंगलवार, 9 जून 2020


‘‘फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग को एक खुले पत्र में मैंने लिखा है कि दिल्ली दंगों पर टिप्पणी से पहले कृपया वह उन तथ्यों को पुष्ट करें कि अर्बन नक्सल और जिहादी तत्वों की जुगलबंदी ने कैसे ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान माहौल बिगाड़ने की पटकथा बुनी थी।’’
                   --मोनिका अरोड़ा , वकील, सुप्रीम कोर्ट 
                       जून, 20


पुनरावलोकन-1
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इसी महीने 1975 में लागू हुई थी इमरजेंसी 
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8 जून, 1975
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‘‘तीन साल पहले तक जजों की नियुक्ति में इंटेलिजेंस ब्यूरो से कोई 
मतलब नहीं था।
पर, अब प्रधान मंत्री- इंदिरा गांधी -ने यह प्रथा चलाई है कि प्रस्तावित व्यक्तियों के राजनीतिक विचार व सहानुभूति जानने के लिए आई.बी.से पूछताछ जरूरी है।
दो साल पहले तक केवल सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और राज्य सरकार की संस्तुति पर्याप्त थी।
पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट में कई जजों की नियुक्तियां होनी हैं।
एक नाम पिछले साल भी विचाराधीन था।
पर अंत में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने उनका अनुमोदन इस आधार
 पर नहीं किया कि उनकी निष्ठा पर संदेह था।
आई.बी.की रपट में भी यही बात कही गई थी।
कानून मंत्री एच.आर.गोखले ने कहा कि जब तक प्रधान मंत्री की निर्वाचन याचिका पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती, तब तक वे मुख्य न्यायाधीश की बात नहीं टालना चाहते।
जो कुछ मुख्य न्यायाधीश कहें ,वही करना उचित होगा।
जो भी पक्ष इलाहाबाद हाईकोर्ट में हारेगा,सुप्रीम कोर्ट आएगा।’’
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--प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के संयुक्त 
सचिव बिशन टंडन की डायरी से ।

किसी प्रतिस्पर्धा के बिना
 ही गोल्ड मेडल पक्का  !!
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मैंने अपने गुरु से पूछा 
कि किस क्षेत्र में सबसे बढ़िया 
कैरियर बनने की संभावनाएं हैं
 तो उन्होंने कहा कि एक अच्छा 
इंसान बनने की कोशिश करो,
क्योंकि उसमें संभावनाएं अपार हैं 
और प्रतिस्पर्धा भी बहुत कम है।
           ---हर्ष गोयनका,
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     सामान्य शिक्षा को नहीं तो कम से कम 
     तकनीकी शिक्षा को तो कदाचार से बचा लो !
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 सन 1992 में कल्याण सिंह सरकार ने नकल विरोधी कानून बनाया।
मुलायम सिंह की सरकार ने 1994 में उस कानून को रद कर दिया।
दरअसल यू.पी.बोर्ड की परीक्षा में कदाचार पूरी तरह रोक देने के कारण कल्याण सिंह की सरकार 1993 के चुनाव में सत्ता से बाहर हो गई।
1992 में बाबरी ढांचा गिराने के कारण उत्पन्न भावना को भंजाने का चुनावी लाभ तक भाजपा को नहीं मिल सका था।
मुलायम सिंह यादव कदाचारी विद्यार्थियों व उनके अभिभावकों के ‘हीरो’ बन गए थे।
   यानी,मुझे यह लगने लगा है कि  चुनाव लड़ने वाली कोई भी सरकार आम परीक्षाओं में नकल नहीं रोक सकती।
उसके लिए शायद किसी तानाशाह शसक की जरूरत पड़ेगी।
या फिर कोई सरकार चुनाव जीतने के प्रथम साल से ही शिक्षा-परीक्षा माफियाओं पर नकल कसना शुरू कर दे तो शायद कुछ  बात बने।
  अपने ताजा पोस्ट में मैंने मेडिकल शिक्षा-परीक्षा को बेहतर बनाने की जरूरत बताई है।
कम से कम तकनीकी संस्थानों की हालत तो सुधरे !
  आज उद्योग जगत कहता है कि सिर्फ 27 प्रतिशत इंजीनियर ही ऐसे हैं जिन्हें नौकरी पर रखा जा सकता है।
 हमारे स्वास्थ्य की देखरेख करने वाले तो ठीकठाक पढ़ लिखकर निकलें।
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जब-जब शिक्षा -परीक्षा के ध्वस्त होने की बात होती है,तब -तब कई लोग अपनी -अपनी ‘सुविधा’ के अनुसार अपना ‘टारगेट’ तय करके आरोप का गोला दागने लगते हैं।
पर 1963 से इस संबंध में मैंने जो कुछ अपनी  आंखों से देखा है,उसे संक्षेप में शेयर करता हूं।
1.-राजनीति और प्रशासन में गिरावट के अनुपात में शिक्षा में भी गिरावट होनी ही थी।
हुई भी।
2.-पहले परीक्षाओं में ‘सामंतवाद’ था। 1967 से उसमें ‘समाजवाद’ आ गया।
3.-सरकारी नौकरियां देने के लिए कत्र्तव्यनिष्ठ उच्चपदस्थ अफसरों व सेना की देखरेख में उम्मीदवारों की कदाचारमुक्त प्रतियोगी परीक्षाएं हों।
छोटी -छोटी टुकड़ियों में सालों भर बड़े हाॅल में ऐसी परीक्षाएं होती रहें।
तभी सिर्फ योग्य लोग ही सेवाओं में आ सकेंगे।
अब भी योग्य लोग सेवा में हैं,पर कम संख्या में।
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1963 में मैं मैट्रिक की परीक्षा दे रहा था।
जिला स्कूल में केंद्र था।
उस जिले के सबसे अधिक प्रभावशाली सत्ताधारी नेता के परिवार के एक सदस्य के लिए चोरी की छूट थी।
केंद्र में किसी अन्य के लिए वह ‘सुविधा’ उपलब्ध नहीं थी।
   बाद में काॅलेज का अनुभव जानिए।
मैं बी.एससी.पार्ट वन की परीक्षा दे रहा था।
संयोग से उस काॅलेज के एक उच्च पदाधिकारी के पुत्र की सीट मेरे ही हाॅल में पड़ी थी।
नतीजतन पूरे हाॅल को चोरी की छूट थी।
उसी केंद्र में किसी अन्य हाॅल में कोई छूट नहीं थी।
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उन दिनों मेडिकल - इंजीनियरिंग काॅलेजों में माक्र्स के आधार पर दाखिला हो जाता था।
प्रैक्टिकल विषयों में कुल 20 में उन्नीस अंक मिल जाने पर कम तेज उम्मीदवार भी डाक्टर या इंजीनियर आसानी से बन जाते थे।
  संयोग से मेरा रूम मेट ही इन 250 रुपयों को इधर से उधर करता था।
न जाने कितनों को उसने डाक्टर-इंजीनियर बनवा दिया।
एक दिन मुझसे उसने पूछा, 
‘का हो सुरिंदर,तुमको भी नंबर चाहिए।
तुमको कुछ कम ही पैसे लगेंगे।’’
मैंने कहा कि मुझे कोई नौकरी नहीं करनी है।
मेरा वह रूम मेट खुद हाई स्कूल का शिक्षक बना।
एक दिन पटना शिक्षा बोर्ड आॅफिस के पास  संयोग से मिल गया था।
वैसे भी 200-250 रुपए मेरे लिए जुटाना तब मुश्किल था।
ऐसे गोरखधंघे के कारण ही माक्र्स के आधार पर दाखिला बाद में बंद हो गया।
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  1967 के चुनाव के बाद परीक्षाओं में धुंआधार चोरी शुरू हो गई।
कहा भी जाने लगा कि ‘चोरी में समाजवाद’ आ गया।
महामाया सरकार ने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की।
छात्रगण महामाया बाबू के ‘जिगर के टुकड़े’ जो थे ! 
के.बी.सहाय की सरकार को चुनाव में हराने में छात्रों की बड़ी भूमिका थी।
1967 के आम चुनाव से पहले बड़ा छात्र और जन आंदोलन हुआ था।
छात्रों पर भी जमकर पुलिस दमन हुआ था।
मैं भी तब एक छात्र कार्यकत्र्ता था।
मैंने खुद परीक्षा छोड़ दी थी क्योंकि आंदोलन के कारण मेरी तैयारी नहीं हो पाई थी।
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1972 में केदार पांडेय की सरकार ने नागमणि और आभाष चटर्जी जैसे कत्र्तव्यनिष्ठ अफसरों की मदद से परीक्षा में चोरी को बिलकुल समाप्त करवा दिया।
  पर सवाल है कि अगले ही साल से ही फिर चोरी किसने होने दी ?
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1996 में पटना हाईकोर्ट के सख्त आदेश और जिला जजों की निगरानी में मैट्रिक व इंटर परीक्षाआंे  में कदाचार पूरी तरह बंद कर दिया गया।
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पर, अगले ही साल से कदाचार फिर क्यों शुरू करवा दिया गया ?
किसने शुरू करवाया ?
क्या कदाचार की इस महामारी के लिए आप किसी एक दल एक सरकार या एक नेता या फिर किसी एक समूह को जिम्मेवार मान कर खुश हो जाना चाहते हैं ?
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--सुरेंद्र किशोर-7 जून 20   


सोमवार, 8 जून 2020

कोरोना मरीजों की संख्या की तुलना करने 
के लिए आबादी को आधार बनाइए
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आम तौर पर अखबार लिख रहे हैं कि कोरोना 
वायरस से सर्वाधिक 
पीड़ित देशों में भारत का कौन सा स्थान है।
उदाहरणार्थ, कल के एक अखबार का शीर्षक था--
‘‘भारत ने इटली को पीछे छोड़ा।’’
ऐसे शीर्षक सही स्थिति का बोध नहीं कराते।
क्योंकि इटली की आबादी करीब 6 करोड़ है तो 
भारत की करीब 131 करोड़।
  इस मामले में आज के दैनिक भास्कर ने
स्थिति स्पष्ट की है।
उसने देशों की आबादी को ध्यान में रखते हुए तुलनात्मक 
अध्ययन किया है।
भास्कर की एक खबर का उप शीर्षक है
‘‘भारत में दस लाख में सिर्फ 5 लोगों की मौत हुई है,
दुनिया का औसत 52 है।’’ 
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--सुरेंद्र किशोर - 8 जून 20

रविवार, 7 जून 2020

   दूरदर्शी कौन ? स्वप्नदर्शी कौन ??
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1.-1991 में पी.वी.नरसिंह राव -मन मोहन सिंह की जोड़ी ने
देश में आर्थिक सुधारीकरण की बड़े पैमाने पर शुरूआत की
थी।
राव-सिंह की सरकार कांग्रेस की ही सरकार थी।
पर, किसी ने तब भी यह सवाल नहीं पूछा कि जब राव-सिंह की 
जोड़ी ने सुधारीकरण किया तो उससे पहले बिगाड़ीकरण किसने 
किया था ?
वह कौन था ?
अनुमान लगाइए।
किसी का नाम लेने की जरुरत नहीं।
बस, इतना ही बता दीजिएगा कि ‘बिगाड़ीकरण’ करने वाला दूरदर्शी था या ‘सुधारीकरण’ करने वाला ?
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साठ के दशक में इस देश में ‘हरित क्रांति’ हुई।
 मैं किसान परिवार से ही आता हूं।
हम सबने बेहतर व पहले से अधिक फसल देखकर खुशियां मनाई थीं।
पर, धीरे- धीरे बात समझ में आने लगी थी।
 पहले के देसी गेहूं की रोटी में जो मिठास थी,वह बाद के 
विकसित गेहूं में नहीं रही।
एक बात और हुई।
 हरित क्रांति के लिए हमारी जमीन को भारी कीमत चुकानी पड़ी।
अधिकाधिक रासायनिक खाद - कीटनाशक दवाओं के कारण मिट्टी 
का स्वास्थ्य खराब होने लगा।उसका असर भूजल पर भी पड़ने लगा।
अनेक लोग कैंसर से जूझ रहे हैं। 
फिर भी दिल्ली के हमारे हुक्मरान ताना मारते थे।
कहते थे कि बिहार जैसे
पिछड़े राज्य में रासायनिक खाद की खपत अपेक्षाकृत कम है।
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कटु अनुभवों के बाद क्या स्थिति है !
   अब जैविक खेती पर जोर दिया जा रहा है।
हमारे पूर्व पत्रकार व पूर्व राज्य सभा सदस्य मित्र आर.के.सिन्हा ने हाल में कहा कि जिंदा रहने के लिए जैविक उत्पादों का सेवन कीजिए।
वे खुद करीब 50 एकड़ जमीन में जैविक खेती कर रहे हैं।
ऐसे अन्य हजारों लोगों ने रासायनिक खेती छोड़ दी है।
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अब बताइए कि खेतों में रासायनिक खाद-कीटनाशक यानी जहर पटा देने वाला दूरदर्शी था या आज जैविक खेती अपनाने वाला ?
याद रहे कि कटु अनुभवों के कारण जब अमेरिका में किसान जैविक खेती की ओर बढ़ रहे थे उन्हीं दिनों भारत में रासायनिक खेती का श्रीगणेश हो रहा था।
  हालांकि हमारे इलाके के कांग्रेसी विधायक व कट्टर गांधीवादी जगलाल चैधरी उन्हीं दिनों यानी साठ के दशक में ही गांवों में घूम -घूम कर यह कह रहे थे कि रासायनिक खाद का प्रयोग मत कीजिए।
यह मिट्टी के लिए खतरनाक है।
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सुरेंद्र किशोर--6 जून 20

   आज की पीढ़ी खोजती है नेहरू 
  युग पर लिखी मथाई की किताबें
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 ‘‘नेहरू युग -जानी अनजानी बातें’’ 
और ‘‘नेहरू के साथ तेरह वर्ष।’’
इन नामों से एम.ओ.मथाई ने दो किताबें लिखीं।
मूल किताबें अंग्रेजी में हैं।
मथाई 13 साल तक जवाहरलाल नेहरू के निजी सचिव थे।
नेहरू के बुलावे पर उनके निजी सचिव बने थे।
सत्तर के दशक में ये चर्चित व विस्फोटक किताबें आई थीं।
पर थोड़े ही दिनों के भीतर भारत सरकार ने उन पर प्रतिबंध लगा दिया।
वह इस देश में बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं है।
कुछ लोग आॅनलाइन मंगा कर पढ़ते हैं।
कुछ महीने पहले तक एक किताब की कीमत करीब 5 हजार रुपए पड़ती थी।
अब शायद सस्ती हुई है।
 इस तरह देश के अधिकतर लोग नेहरू युग की शासन शैली व जानी-अनजानी बातें जानने से वंचित रह गए हैं।
वह समय देश के पुनर्निर्माण का था।
मथाई ने साफ साफ लिखा है कि हमारे तब के शासकगण उस काम में गंभीर थे या कुछ दूसरे ही काम कर रहे थे।
उन्होंने लिखा है कि आजादी के तत्काल बाद से ही किस तरह भ्रष्टाचारियों को खुली छूट दे दी गई थी।
यह छूट सरकार के भीतर के कुछ लोगों को थी और बाहर के कुछ लोगों को भी।
   इन किताबों में सिर्फ नेहरू के बारे में ही बातें नहीं हैं,बल्कि तब के अधिकतर  बड़े नेताओं के बारे में ऐसी -ऐसी बातें हैं जो आपको अन्यत्र कहीं पढ़ने को नहीं मिलेंगी।
 यानी मध्यकालीन भारत के इतिहास की बहुत सारी बातें राजनीतिक कारणों से इतिहास में दर्ज नहीं होने नहीं दी गईं।
उसी तरह नेहरू युग की बहुत सारी बातें जब लिख दी गईं तो उन किताबों को ही प्रतिबंधित कर दिया गया।
यानी मध्यकालीन भारत और नेहरू युग के पूरे इतिहास से इस देश के लोग वंचित हो गए।
हम अधूरे इतिहास पर संतोष कर रहे हैं।
  जो समाज अपना सही व पूरा इतिहास नहीं जान पाता ,वह  इतिहास की गलतियों को दुहराने के लिए अभिशप्त होता  है।
क्या मथाई की पुस्तकों पर से प्रतिबंध हटाने के निर्णय पर केंद्र सरकार
पुनर्विचार नहीं कर सकती ?
कई लोग यह सवाल करते हैं।
क्या सिर्फ मध्ययुगीन इतिहास के गलत तथ्यों को ही सुधारा जाएगा ?
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कुछ लोग कहते हैं कि उन किताबों में बहुत सी आपत्तिजनक बातें लिखी गई हैं।
यहां तक कि उन किताबों के छपने के बाद खुशवंत सिंह ने गुस्से में कह दिया था कि मथाई को चैराहे पर कोड़े लगाए जाने चाहिए।
    दूसरी ओर, मेरी समझ से मथाई ने नेहरू युग की अच्छी-बुरी दोनों तरह की बातें लिख दी हैं।
अच्छी बातें तो इतिहास के सारे पात्र स्वीकार कर लेते हैं।
पर अपने खिलाफ की शिकायत भरी बातों पर वे सख्त नाराज हो जाते हैं।
भले वे बातें सच्ची हों। 
नेहरू के प्रति मथाई के मन में जितना  सम्मान था,वह उनकी  एक टिप्पणी से प्रकट होती है,
‘‘जार्ज फर्नांडिस नेहरू के जूते के फीते बांधने लायक योग्यता भी नहीं रखता।’’
याद रहे कि जार्ज ने तब नेहरू के खिलाफ एक बयान दिया था जिस पर मथाई नाराज थे।
---सुरेंद्र किशोर--6 जून 20