मंगलवार, 13 अक्टूबर 2020

  मामला पी.एफ.के पैसे के ट्रांसफर का

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मेरी एक चिट्ठी के जवाब में पासवान जी 

ने मुझे लिखी थीं 6 चिट्ठियां

..................

उनसे पहले के श्रम मंत्री ने तो मेरी गुजारिश पर

कोई ध्यान ही नहीं दिया था

.......................................

  --सुरेंद्र किशोर-- 

..................................

पहली बार मैंने सन 1969 में राम विलास पासवान का नाम सुना था।

सिर्फ इसलिए नहीं कि वे संसोपा के विधायक बनकर पटना आए थे।

बल्कि इसलिए कि आते -आते वे संसोपा विधायक दल के नेता पद के उम्मीदवार बन गए थे।

1969 में बिहार विधान सभा का मध्यावधि चुनाव हुआ था।

उसमें संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के  50 से अधिक विधायक चुन कर आए थे।

 संसोपा विधायक दल के नेता पद का चुनाव हो रहा था।

 रामानंद तिवारी और धनिकलाल मंडल के अलावा राम विलास पासवान भी उम्मीदवार थे।

  आश्चर्य हुआ।

उस दल में तब नेताओं के वरीयता व कृतित्व पर अधिक ध्यान दिया जाता था।

स्वाभाविक ही था, पासवान जी बुरी तरह हारे।

तिवारी जी जीत गए।

पर पासवान जी लोगों की नजरों में जरूर आ गए।

  1977 में लोकसभा में शून्य काल का बेहतर इस्तेमाल करके जिस तरह देश भर की नजरों में पासवान जी आ गए,उससे पहले 1969 में नेता पद का चुनाव लड़कर  बिहार संसोपा  की नजरों में आ गए थे।

  1972 में उनके विधान सभा चुनाव हारने तक मैं उनसे नहीं मिला था।

पर 1972 वे खुद मेरे पास आए।

तब मैं एक राजनीतिक कार्यकत्र्ता के रूप में कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव था। 

  मैं कर्पूरी जी के पटना के वीरचंद पटेल पथ स्थित बंगले में ही रहता भी था।

वहां मेरा एक छोटा कमरा था।

राम विलास जी अक्सर मेरे पास आकर घंटांे बैठते थे।

उनकी दो बातें मुझे याद हैं।

एक तो वे गीत गाते थे।

दूसरी बात अधिक महत्वपूर्ण थी।

उन्होंने दक्षिण भारत के दलित नेता रामास्वामी नायकर की बातें खूब बताते थे।

  वे नायकर से प्रभावित लगे।

शालीन व्यवहार के धनी रामविलास जी दोस्तपरस्त व्यक्ति थे।

वे चाहते थे कि मैं अपने खास दोस्तों को क्या दे दूं !

 जब वे सांसद व केंद्र में मंत्री होने लगे तो उनसे मेरा संपर्क नहीं रहा।

तब तक यानी 1977 में मैं मुख्य धारा की पत्रकारिता में आ चुका था।

  वी.पी.सिंह मंत्रिमंडल के श्रम मंत्री के रूप में उनसे मुझे अपना एक काम कराना था।

दैनिक ‘आज’ से जब मैं 

जनसत्ता में गया तो पी.एफ.का मेरा पैसा नए खाते में लाख कोशिश के बावजूद ट्रांसफर नहीं हो रहा था।

पहले के श्रम मंत्री ने तो मुझे घास तक नहीं डाली।

जबकि मैं देश के एक ‘‘बोखार छोड़ाऊ’’

अखबार ‘जनसत्ता’ का बिहार संवाददाता था।वह मंत्री भी बिहार से ही थे।

नए श्रम मंत्री राम विलास पासवान को मैंने अपने पी.एफ.के संबंध में एक पत्र मामूली डाक से भेज दिया।

मैं इस द्विविधा में था कि शायद पत्र उन तक पहुंचे या नहीं पहुंचे !

  पर कमाल देखिए।

पत्र के पहुंचते ही पासवान जी ने मुझे तीन चिट्ठियां लिखीं।

सिर्फ यह सूचित करने के लिए कि आपका काम जल्द ही हो जाएगा।

एक पत्र मेरे पटना आॅफिस के पते पर।

दूसरा पत्र मेरे पटना आवास के पते पर।

तीसरा पत्र हमारे संपादक प्रभाष जोशी के केअर आॅफ में।

  काम तुरंत हो गया।

उसकी खबर व संदर्भ देते हुए फिर तीन पतों पर तीन चिट्ठियां उन्होंने भेजी।

उसी तरह पी.एफ.कार्यालय से भी मुझे उन्हीं तीन पतों पर अलग -अलग पत्र भिजवाए।

.............................

ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं कि मैं जनसत्ता मंें था।

श्रम मंत्री आम तौर अखबार वालों को बहुत भाव नहीं देते।

क्योंकि अनेक अखबार मालिक ही उनके कृपाकांक्षी होते हैं।

मैंने तब ही सुना था कि इंडियन एक्सप्रेस के प्रधान संपादक अरूण शौरी ने प्रधान मंत्री वी.पी.सिंह से यह कहा था कि आपके श्रम मंत्री यानी पासवान जी तो मुझे एप्वांटमेंट ही नहीं दे रहे हैं। 

...............................

पासवान जी जब रेल मंत्री बने तो उन्होंने मुझे मेरी पूर्व सहमति के बिना रेलवे की हिन्दी सलाहकार समिति का सदस्य बना दिया।

मैंने भारी मन से उन्हें अपना इस्तीफा भेज दिया।

  आभार प्रकट करते हुए उन्हें मैंने लिखा कि 1977 में मुख्य धारा की पत्रकारिता में आने के बाद ही मैंने यह तय कर लिया  कि जब तक पत्रकारिता में रहूंगा,कोई सरकारी समिति,पद या उपहार आदि स्वीकार नहीं करूंगा।

 ................................

राम विलास पासवान की ‘राजनीति’ तथा उनकी उपलब्धियों-विफलताओं की चर्चा करने का अवसर बाद में आएगा।

अभी इतना ही कहूंगा कि राजनीति में जो लोग हैं या आते रहते हैं,वे पासवान जी से शालीनता,विनम्रता सीखें,यदि उनमें इन गुणों की कमी है।

वे ऐसी सामाजिक पृष्ठभूमि से आते थे,जिसके सदस्य में उत्पीड़क लोगों के लिए गुस्सा स्वाभाविक है।

पर, मैंने देखा कि 1972 में जिसके मन में रामास्वामी नायकर

के प्रति आदर का भाव था,उस पासवान जी में बाद के वर्षों में किसी अन्य समुदाय के प्रति जलन-गुस्सा  का कोई भाव नहीं देखा गया। 

  साथ ही, नए लोग सदस्य बनने पर वे संसद या विधान सभा के ‘जीरो आॅवर’ और ‘आधे घंटे के डिबेट’ की सुविधाओं  का बेहतर इस्तेमाल करना सीखें।

......................

सुरेंद्र किशोर-9 अक्तूबर 20


 


 डा.लोहिया की पुण्य तिथि पर

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‘‘बिजली की तरह कौंधो और सूरज

 की तरह स्थायी हो जाओ’’

1967 की गैर कांग्रेसी सरकारों को यही 

संदेश दिया था

 डा.राम मनोहर लोहिया ने ।

 पर, ऐसा हो नहीं सका।

क्योंकि उनकी सरकारों को यह लगा कि 

यदि व्यापक जनहित में कोई चैंकाने वाला 

काम कर देंगे तो सरकार गिर भी सकती है।

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--सुरेंद्र किशोर--

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   --1--

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 डा.राम मनोहर लोहिया मशहूर स्वतंत्रता सेनानी व समाजवादी विचारक थे।

उनकी पौरूष ग्रंथि के आॅपरेशन के बाद अस्पताल की भारी बदइंतजामी रही।

वे सेप्टिसीमिया से पीड़ित हो गए। 

उसी कारण 12 अक्तूबर, 1967 को दिल्ली के वेलिंग्टन अस्पताल में उनका निधन हो गया।

बाद में विशेषज्ञों ने बताया कि उन्हें बचाया जा सकता था।

मोरारजी देसाई के शासनकाल में चिकित्सा में लापरवाही की जांच भी हुई।

पर,कहते हैं कि संबंधित दोषी चिकित्सक एक वी.वी.आई.पी.का काफी करीबी निकल गया।

परिणामस्वरूप उसे कुछ नहीं हुआ।

सघन जांच से पता चलता कि लोहिया डाक्टरों की लापारवाही से मरे या उन्हें जानबूझ कर 

मरने दिया गया ?

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   डा.लोहिया जर्मनी में अपना आपरेशन कराना चाहते थे।

जर्मनी के एक विश्व विद्यालय ने भाषण देने के लिए उन्हें बुलाया था।

जाने-आने का खर्च वह संस्थान दे रहा था।

 आॅपरेशन के लिए बारह हजार रुपए की जरूरत थी।

उन्होंने अपने दल के एक मजदूर नेता से कहा था कि  वह मजदूरों से चंदा लेकर रुपए का इंतजाम कर दे।

पर वह मजदूर नेता समय पर पैसे का बंदोबस्त नहीं कर सका।

इस कारण जल्दीबाजी में दिल्ली के ही वेलिग्टन अस्पताल में उन्हें भर्ती कराना पड़ा।

 उस समय कई प्रदेशों में ऐसी गैर सरकारी सरकारें बन चुकी थीं जिनमें लोहिया के दल के मंत्री थे।

 डा.लोहिया ने अपने दल द्वारा शासित प्रदेशों के अपने  नेताओं से कह रखा था कि वे मेरे इलाज के लिए कोई चंदा वसूली का काम नहीं करें।

इसमें सरकारी पद के दुरूपयोग का खतरा है।

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    --2-- 

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‘‘ दरअसल देखा जाए तो धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म है।

यह है बढ़िया धर्म और बढ़िया राजनीति की परिभाषा ।

  धर्म है अच्छाई को करना और अच्छाई की तारीफ करना और राजनीति है बुराई से लड़ना और बुराई की निन्दा करना।’’

                       ---डा.राम मनोहर लोहिया,

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    --3-- 

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डा.लोहिया कहा करते थे कि जिन्हें राजनीति में काम

करना है,उन्हें अपना परिवार खड़ा नहीं करना चाहिए।

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डा.लोहिया के इस कथन का महत्व आज बौद्धिक रूप से अनेक ईमानदार लोगों को आसानी से समझ में आ सकता है । आज लगभग पूरे देश की राजनीति को परिवारवाद-वंशवाद के जहर ने आज ग्रस लिया है।

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   --4--

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साठ के दशक की बात है।

रांची में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की बैठक हो रही थी।

किसी ने डा.लोहिया को बताया कि फलां कार्यकत्र्ता शराब बेचता है।

डा.लोहिया ने उसे बुलाकर पूछा।

उसने कहा कि मेरे भोजनालय में शराब भी बिकती है।

 इस पर लोहिया ने उससे कहा कि तुम शराब बेचोगे तो हमारी पार्टी में नहीं रह सकते।

  वह तुरंत अपने होटल गया।

शराब की बिक्री तुरंत बंद करवाई ।

 लौटकर लोहिया को यह सूचना दे दी।

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  ---5---

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डा.लोहिया ने 1967 में चुनाव के वक्त कह दिया कि देश में सामान्य नागरिक कानून लागू होना चाहिए।

खुद लोहिया एक ऐसे क्षेत्र से लोस चुनाव के उम्मीदवार थे जहां मुसलमानों की अच्छी- खासी आबादी थी।

उनके एक समाजवादी मित्र  ने उनसे कहा कि ‘‘डाक्टर साहब,आपने ऐसा बयान क्यों दे दिया ?

अब तो आप चुनाव हार जाएंगे।’’

इस पर लोहिया ने कहा मैं सिर्फ चुनाव जीतने के लिए  राजनीति में नहीं हूं।

देश बनाने के लिए हूं।

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  --6--

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जब लोहिया सांसद बने तो उनकी मित्र व मैनकाइंड पत्रिका की संपादक प्रो.रमा मित्र ने उनसे कहा कि अब आप कार खरीद लीजिए।

लोहिया ने उनसे कहा कि हिसाब लगाओ।

मेरा अभी टैक्सी का महीने का खर्च कितना है ?

कार खरीदने पर कितना खर्च आएगा ?

यदि पहले से कम खर्च आएगा तो कार खरीद लूंगा।

चूंकि खर्च ज्यादा आ रहा था,इसलिए लोहिया अंत अंत तक टैक्सी का ही इस्तेमाल करते रहे।

  लोहिया के बारे में 1967 की एक बात डा.खगेंद्र ठाकुर मुझे बताई थी।

खगेंद्र जी ने एक दिन भागलपुर बस स्टैंड पर लोहिया को देखा।

वे दिल्ली से ट्रेन से आए थे और दुमका वाली बस में सवार थे।

  पूछा तो बताया कि दुमका जा रहे हैं।वे अपने मित्र व मशहूर स्वतंत्रता सेनानी रामनंदन मिश्र से मिलने जा रहे थे।

 दरभंगा जिले के मूल निवासी मिश्र जी अपने पुत्र के साथ दुमका में रहते थे।

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याद रहे कि 1967 में बिहार में गैरकांग्रेसी सरकार थी।

डा.लोहिया के दल के कर्पूरी ठाकुर उप मुख्य मंत्री,वित्त मंत्री और शिक्षा मंत्री थे।

 किसी अन्य दल का शीर्षस्थ नेता क्या भागलपुर से दुमका बस से जाता ?!!  

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12 अक्तूबर 2020


  पिछले आम चुनाव में किसे जीत जाने की 

आप भविष्यवाणी कर रहे थे ?

उससे पहले के चुनावों में किसे जिता 

 रहे थे आप ?

और वास्तव में विजयी कौन हुआ ?

उसे आप याद कर लेंगे तो बिहार चुनाव को लेकर 

भविष्यवाणी करने से पहले आप दो बार जरूर 

सोचेंगे।

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कई आम चुनावों से मैं एक काम करता रहता हूं।

मतदान पूर्व रिजल्ट को लेकर भविष्यवाणियों को छिटपुट ढंग से अपनी डायरी में नोट कर लेता रहा हूं।

रिजल्ट के बाद उसे पढ़ता हूं।

सब तो नहीं,लेकिन अधिकतर पत्रकारों,बुद्धिजीवियों व विश्लेषणकत्र्ताओं की भविष्यवाणियों में एक खास पैटर्न देखा जाता है।

 खुद जैसा रिजल्ट वे चाहते हैं, सार्वजनिक रूप से यह भविष्य

वाणी कर देते हैं कि फलां दल या गठबंधन ही सत्ता में आ रहा है।

  इसमें राष्ट्रीय स्तर का एक नामी पत्रकार अपवाद है।

 कुछ और भी अपवाद होंगे,पर मैं उस खास पत्रकार की भविष्यवाणी को अक्सर सही पाता हूं।

वह पत्रकार जिस विचारधारा का है या उसका जिस तरफ खास कारणों से झुकाव रहता है,वह बात पूरा देश जानता है।

   पर आश्र्चजनक रूप से उसकी भविष्यवाणी का उसके झुकाव से कोई तालमेल नहीं होता।

  मैं बिहार चुनाव के रिजल्ट को लेकर भी उसके लेख की प्रतीक्षा कर रहा हूं।

   क्या बाकी लोगों में भी ऐसी वस्तुपरकता नहीं आ सकती ?

कुछ में तो चाहते हुए भी नहीं आ सकती।

उनकी अपनी- अपनी मजबूरियां है।

 पर जिनकी कोई मजबूरी नहीं है,उनके लिए बिहार चुनाव एक मौका है। 

इस अवसर पर वे अपनी साख बचा सकते हैं और कुछ अन्य लोग पहले से बिगड़ी अपनी साख में सकारात्मक सुधार भी  कर सकते हैं।

   वे लोग यदि पिछले चुनावों की अपनी भविष्यवाणियां याद कर लें तो उनमें ऐसा परिवत्र्तन आ सकता है ।

इससे लोग उन्हें अब अभियानी न कहकर वस्तुपरक कहेंगे।

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--सुरेंद्र किशोर--12 अक्तूबर 20 


शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

    सोशल मीडिया पर अपने राजनीतिक विरोधियों और असहमत लोगों को गंदी-गंदी गालियों देने के मामले में रोज-रोज नया रिकाॅर्ड कायम हो रहा है।

   इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ।

  क्या चुनाव आयोग या शासन तंत्र में ऐसा कोई है जो इस अपसंस्कृति वालों पर 

नकेल कस सके ?

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 ........सुरेंद्र किशोर--9 अक्तूबर 20 


शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

  मामला पी.एफ.के पैसे के ट्रांसफर का

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मेरी एक चिट्ठी के जवाब में पासवान जी 

ने मुझे लिखी थीं 6 चिट्ठियां

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उनसे पहले के श्रम मंत्री ने तो मेरी गुजारिश पर

कोई ध्यान ही नहीं दिया था

.......................................

  --सुरेंद्र किशोर-- 

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पहली बार मैंने सन 1969 में राम विलास पासवान का नाम सुना था।

सिर्फ इसलिए नहीं कि वे संसोपा के विधायक बनकर पटना आए थे।

बल्कि इसलिए कि आते -आते वे संसोपा विधायक दल के नेता पद के उम्मीदवार बन गए थे।

1969 में बिहार विधान सभा का मध्यावधि चुनाव हुआ था।

उसमें संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के  50 से अधिक विधायक चुन कर आए थे।

 संसोपा विधायक दल के नेता पद का चुनाव हो रहा था।

 रामानंद तिवारी और धनिकलाल मंडल के अलावा राम विलास पासवान भी उम्मीदवार थे।

  आश्चर्य हुआ।

उस दल में तब नेताओं के वरीयता व कृतित्व पर अधिक ध्यान दिया जाता था।

स्वाभाविक ही था, पासवान जी बुरी तरह हारे।

तिवारी जी जीत गए।

पर पासवान जी लोगों की नजरों में जरूर आ गए।

  1977 में लोकसभा में शून्य काल का बेहतर इस्तेमाल करके जिस तरह देश भर की नजरों में पासवान जी आ गए,उससे पहले 1969 में नेता पद का चुनाव लड़कर  बिहार संसोपा  की नजरों में आ गए थे।

  1972 में उनके विधान सभा चुनाव हारने तक मैं उनसे नहीं मिला था।

पर 1972 वे खुद मेरे पास आए।

तब मैं एक राजनीतिक कार्यकत्र्ता के रूप में कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव था। 

  मैं कर्पूरी जी के पटना के वीरचंद पटेल पथ स्थित बंगले में ही रहता भी था।

वहां मेरा एक छोटा कमरा था।

राम विलास जी अक्सर मेरे पास आकर घंटांे बैठते थे।

उनकी दो बातें मुझे याद हैं।

एक तो वे गीत गाते थे।

दूसरी बात अधिक महत्वपूर्ण थी।

उन्होंने दक्षिण भारत के दलित नेता रामास्वामी नायकर की बातें खूब बताते थे।

  वे नायकर से प्रभावित लगे।

शालीन व्यवहार के धनी रामविलास जी दोस्तपरस्त व्यक्ति थे।

वे चाहते थे कि मैं अपने खास दोस्तों को क्या दे दूं !

 जब वे सांसद व केंद्र में मंत्री होने लगे तो उनसे मेरा संपर्क नहीं रहा।

तब तक यानी 1977 में मैं मुख्य धारा की पत्रकारिता में आ चुका था।

  वी.पी.सिंह मंत्रिमंडल के श्रम मंत्री के रूप में उनसे मुझे अपना एक काम कराना था।

दैनिक ‘आज’ से जब मैं 

जनसत्ता में गया तो पी.एफ.का मेरा पैसा नए खाते में लाख कोशिश के बावजूद ट्रांसफर नहीं हो रहा था।

पहले के श्रम मंत्री ने तो मुझे घास तक नहीं डाली।

जबकि मैं देश के एक ‘‘बोखार छोड़ाऊ’’

अखबार ‘जनसत्ता’ का बिहार संवाददाता था।वह मंत्री भी बिहार से ही थे।

नए श्रम मंत्री राम विलास पासवान को मैंने अपने पी.एफ.के संबंध में एक पत्र मामूली डाक से भेज दिया।

मैं इस द्विविधा में था कि शायद पत्र उन तक पहुंचे या नहीं पहुंचे !

  पर कमाल देखिए।

पत्र के पहुंचते ही पासवान जी ने मुझे तीन चिट्ठियां लिखीं।

सिर्फ यह सूचित करने के लिए कि आपका काम जल्द ही हो जाएगा।

एक पत्र मेरे पटना आॅफिस के पते पर।

दूसरा पत्र मेरे पटना आवास के पते पर।

तीसरा पत्र हमारे संपादक प्रभाष जोशी के केअर आॅफ में।

  काम तुरंत हो गया।

उसकी खबर व संदर्भ देते हुए फिर तीन पतों पर तीन चिट्ठियां उन्होंने भेजी।

उसी तरह पी.एफ.कार्यालय से भी मुझे उन्हीं तीन पतों पर अलग -अलग पत्र भिजवाए।

.............................

ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं कि मैं जनसत्ता मंें था।

श्रम मंत्री आम तौर अखबार वालों को बहुत भाव नहीं देते।

क्योंकि अनेक अखबार मालिक ही उनके कृपाकांक्षी होते हैं।

मैंने तब ही सुना था कि इंडियन एक्सप्रेस के प्रधान संपादक अरूण शौरी ने प्रधान मंत्री वी.पी.सिंह से यह कहा था कि आपके श्रम मंत्री यानी पासवान जी तो मुझे एप्वांटमेंट ही नहीं दे रहे हैं। 

...............................

पासवान जी जब रेल मंत्री बने तो उन्होंने मुझे मेरी पूर्व सहमति के बिना रेलवे की हिन्दी सलाहकार समिति का सदस्य बना दिया।

मैंने भारी मन से उन्हें अपना इस्तीफा भेज दिया।

  आभार प्रकट करते हुए उन्हें मैंने लिखा कि 1977 में मुख्य धारा की पत्रकारिता में आने के बाद ही मैंने यह तय कर लिया  कि जब तक पत्रकारिता में रहूंगा,कोई सरकारी समिति,पद या उपहार आदि स्वीकार नहीं करूंगा।

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राम विलास पासवान की ‘राजनीति’ तथा उनकी उपलब्धियों-विफलताओं की चर्चा करने का अवसर बाद में आएगा।

अभी इतना ही कहूंगा कि राजनीति में जो लोग हैं या आते रहते हैं,वे पासवान जी से शालीनता,विनम्रता सीखें,यदि उनमें इन गुणों की कमी है।

वे ऐसी सामाजिक पृष्ठभूमि से आते थे,जिसके सदस्य में उत्पीड़क लोगों के लिए गुस्सा स्वाभाविक है।

पर, मैंने देखा कि 1972 में जिसके मन में रामास्वामी नायकर

के प्रति आदर का भाव था,उस पासवान जी में बाद के वर्षों में किसी अन्य समुदाय के प्रति जलन-गुस्सा  का कोई भाव नहीं देखा गया। 

  साथ ही, नए लोग सदस्य बनने पर वे संसद या विधान सभा के ‘जीरो आॅवर’ और ‘आधे घंटे के डिबेट’ की सुविधाओं  का बेहतर इस्तेमाल करना सीखें।

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सुरेंद्र किशोर-9 अक्तूबर 20


 


 जब मामलों को तार्किक अंजाम तक पहुंचने 

ही नहीं दिया जाएगा तो कैसे कहा जा 

सकता है कि किसी घोटाले में क्या मिला ?

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घोटाले से जुड़े सवालों का इंतजार

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  --सुरेंद्र किशोर--

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 आखिर 2 जी घोटाले में क्या मिला ?

लंबे इंतजार के बाद इस सवाल का जवाब मिलने की उम्मीद है।

क्योंकि बीते दिनों दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2 जी स्पैक्ट्रम आबंटन घोटाला मामले में पूर्व दूर संचार मंत्री ए.राजा और अन्य को बरी किए जाने के खिलाफ सी.बी.आई.और इडी की अपीलों पर दैनिक आधार पर सुनवाई करने का आदेश दिया।

( 5 अक्तूबर 2020 से सुनवाई शुरू भी हो चुकी है।)

  2- जी घोटाला केस में दिल्ली हाईकोर्ट को इस आरोप की जांच करनी है कि क्या सी.बी.आई.की विशेष अदालत ने दस्तावेजी सबूतों को नजरअंदाज किया और मौखिक गवाही पर भरोसा किया ?

   विशेष अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा-165 में  मिली शक्ति का उपयोग क्यों नहीं किया ?

  ध्यान रहे कि 2 जी स्पैट्रम घोटाले में दिल्ली स्थित सी.बी.आई.की विशेष अदालत ने 2017 में आरोपितों को जब दोषमुक्त कर दिया था, तो इस पर बहुत हैरानी जताई गई थी।

  क्योंकि इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया घोटाला मान कर 122 लाइसेंस रद कर दिए थे

  और जुर्माना भी लागाया था।

  किसी केस के बारे में सुप्रीम कोर्ट

और लोअर कोर्ट की समझ में इतना बड़ा फर्क क्यों आया ?

2 जी स्पैक्ट्रम घोटाला मुकदमे में ए.राजा और कनिमोझी को दोषमुक्त करते हुए  विशेष सी.बी.आई.अदालत ने 2017 में कहा था, कलाइनगर टी.वी.को कथित रिश्वत के रूप में शाहिद बलवा की कंपनी डी बी ग्रूप द्वारा 200 करोड़ रुपए देने के मामले में अभियोजन पक्ष ने किसी गवाह से जिरह तक नहीं की।

   कोई सवाल तक नहीं किया।

  याद रहे कि उस टी.वी.कंपनी का मालिकाना हक करूणानिधि परिवार से जुड़ा है।

   माना कि अभियोजन द्वारा कोई सवाल नहीं किया गया क्योंकि शायद मनमोहन सरकार के कार्यकाल में सी.बी.आई.के वकील को ऐसा करने की अनुमति नहीं रही होगी।

   पर अदालत के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम में ऐसे ही मौकों के लिए धारा-165 का प्रावधान किया गया है।

आखिर इस शक्ति का उपयोग क्यों नहीं किया गया ?

जबकि यह सूचना उपलब्ध थी कि इस घोटाले में 200 करोड़ रुपए की रिश्वत देने का आरोप लगा है।

  इस केस का यह सबसे प्रमुख सवाल है।

   उक्त धारा के अनुसार ‘‘न्यायाधीश सुसंगत तथ्यों का पता लगाने के लिए या उनका उचित सबूत प्राप्त करने के लिए किसी भी रूप में किसी भी समय किसी भी साक्षी या पक्षकार से किसी भी सुसंगत या विसंगत तथ्य के बारे में कोई भी प्रश्न जो वह चाहे पूछ सकेगा।

तथा किसी दस्तावेज या चीज को पेश करने का आदेश दे सकेगा।

 न तो पक्षकार और न उनके अभिकत्र्ता हकदार होंगे कि वे किसी भी ऐसे प्रश्न या आदेश के प्रति कोई आक्षेप करें।

  वे ऐसे किसी भी प्रश्न के प्रत्युत्तर में दिए गए किसी भी उत्तर पर किसी भी साक्षी की न्यायालय की इजाजत के बिना प्रति -परीक्षा करने के भी हकदार नहीं होंगे।’’

  2 -जी स्पैक्ट्रम घोटाला मुकदमे में ए .राजा और कनिमोझी को दोषमुक्त करते हुए विशेष जज की ओर से यह भी कहा गया था कि मैं पिछले सात साल से पूरी तन्मयता के साथ कोर्ट में सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक बैठा रहा।

और इंतजार करता रहा कि सी.बी.आई. कोई ठोस सबूत लेकर आएगी।

लेकिन ऐसा कुछ नहीं मिला जो आरोपितों के अपराध को साबित करता हो।

फिर चाहे वह ‘कट आॅफ डेट’ को फिक्स करने की बात हो या ‘‘पहले आओ, पहले पाओ नीति’’ के विरूपण का मामला हो।

ऐसी टिप्पणियों के बाद ही यह कहना शुरू किया गया कि इस मामले में तो कुछ था नहीं।

  इसी तरह बोफोर्स घोटाले के बारे में भी कांग्रेस के कई बड़े -छोटे नेताओं ने लगातार यही कहा कि बोफोर्स घोटाला मीडिया की उपज था।

आम तौर पर ऐसी बातें अधूरी जानकारी के आधार पर की जाती है,क्योंकि जब मामले को उनकी तार्किक परिणति तक पहंुचने ही नहीं दिया तो कैसे कहा जाए कि घोटाले में क्या मिला ?

  कम ही लोगों को मालूम है कि बोफोर्स मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

मामला विचाराधीन है।

  याद रहे कि 2005 में दिल्ली हाईकोर्ट ने  जब बोफोर्स कांड के आरोपितों को दोषमुक्त करार दे दिया तो तत्कालीन मनमोहन सरकार ने उस निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील तक नहीं की।

   प्रणव मुखर्जी ने तो यह तक कह दिया था कि चूंकि किसी अदालत ने इसे घोटाला नहीं कहा है,इसीलिए इसे आधिकारिक तौर पर घोटाला नहीं कहा जा सकता है।

  पर वकील अजय अग्रवाल की लोकहित याचिका पर जब कभी सुप्रीम कोर्ट विचार करेगा तो उसके सामने एक महत्वपूर्ण तथ्य आएगा।

उस पर उसे अपनी राय बनानी होगी। 

    दरअसल जिस मामले को निराधार मानकर दिल्ली हाई कोर्ट ने आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया था,उसी घोटाले में 

मिले दलाली के पैसों पर भारत सरकार के आयकर महकमे ने आयकर वसूले।

 याद रहे कि भारत सरकार के आयकर न्यायाधीकरण ने कहा था कि आक्तावियो क्वात्रोचि और विन चडढा को बोफोर्स की दलाली के 41 करोड़ रुपए मिले थे।

(याद रहे कि भारत सरकार ने दलाली पर काननून प्रतिबंध लगा रखा था।)

  दलाली के ये पैसे भारत सरकार के खजाने से ही दिए गए थे।

लिहाजा ऐसी आय पर भारत में उन पर टैक्स की देनदारी बनती है।

आयकर विभाग ने गत साल दक्षिण मुम्बई स्थित विन चड्ढा के फ्लैट को 12 करोड़ 2 लाख रुपए में नीलाम कर दिया ।

दूसरे दलाल क्वात्रोचि को तो दलाली के पैसे स्विस बैंक की लंदन शाखा से निकाल लेने की सुविधा तत्कालीन मन मोहन सरकार ने प्रदान की थी।

   जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट के सामने यह प्रश्न होगा कि जिस बोफोर्स सौदे में दलाली का आरोप प्रमाणित है,उसके आरोपितांे को दिल्ली हाईकोर्ट ने दोषमुक्त कैसे कर दिया ?

उम्मीद की जानी चाहिए कि ये दोनों मामले जल्द ही अपने अंजाम तक पहुंचेंगे और लोगों को इनसे जुड़े सवालों के जवाब मिल सकेंगे।

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8 दिसंबर 2020 के दैनिक जागरण में प्रकाशित    



    सीमावत्र्ती प्रदेश होने के कारण बिहार 

   के मतदाताओं की खास जिम्मेदारी

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    --सुरेंद्र किशोर-- 

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 बिहार जैसे संवेदनशील प्रदेश में चुनाव हो रहा है जो नेपाल की सीमा पर बसा है।

सीमा खुली हुई है।

   सीमावर्ती इलाकों के मतदाताओें को कुछ खास सावधानी बरतनी चाहिए।

या यूं कहिए कि अगली पीढ़ी की रक्षा के लिए बरतनी पड़ेगी।

   ऐसा न हो कि बिहार विधान सभा के लिए ऐसे-ऐसे  उम्मीदवार विजयी हो जाएं जो टुकड़े -टुकड़े गिरोह के मददगार हांे या उनसे सहानुभूति रखने वाले हों।

 या फिर निष्क्रिय रहने वाले हों।

 याद रहे कि कोरोना संकट से निकलने के बाद जब केंद्र सरकार सी.ए.ए. और एन.आर.सी.आदि पर काम करने लगेगी तो टुकड़े -टुकड़े गिरोह व उनके समर्थकगण एक बार फिर  सक्रिय हो जाएंगे। 

   भारत नेपाल सीमा से समय -समय पर ऐसे -ऐसे लोग ‘गुजरते’ रहे हैं जो इस देश की एकता-अखंडता के दुश्मन रहे हैं।

  1986 में खालिस्तानी नेता एस.एस.मान को बिहार-नेपाल सीमा पर गिरफ्तार किया गया था।

वह भारत छोड़ने की कोशिश कर रहा था।

  नब्बे के दशक में पुरूलिया आम्र्स ड्राॅप्स मामले के आरोपी को एक बिहारी नेता ने ही अपनी कार में नेपाल सीमा पार करा कर भगवा दिया था।

   2013 में इंडियन मुजाहिद्दीन के सह संयोजक यासिन भटकल को नेपाल सीमा पर ही पकड़ा गया था।

जब 2001 में सिमी पर प्रतिबंध लग गया तो सिमी के लोगांे ने ही इंडियन मुजाहिद्दीन,पी.एफ.आई. आदि का गठन किया।

सिमी का घोषित उद्येश्य हथियारों के बल पर भारत में इस्लामिक शासन कायम करना है।

  भारत को नुकसान पहुंचाने वाली जितनी देसी-विदेशी शक्तियां आज इस देश में सक्रिय हैं,उतनी पहले कभी नहीं थीं।

  इस देश को बर्बाद करने के लिए बाहर से अरबों रुपए आते रहे हैं।

  नेपाल की खुली सीमा ऐसे तत्वों के लिए बहुत अनुकूल पड़ती है।

इसलिए सीमा पर न सिर्फ ईमानदार अफसर तैनात हों बल्कि वहां जनता के भी ऐसे प्रतिनिधि चुने जाएं जो देशद्रोहियों की गतिविधियों को उजागर करंे न कि छिपाएं।या फिर ऐसी समस्या की ओर से आंखें न फेर लें।

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    --सुरेंद्र किशोर--8 अक्तूबर 20