जब मामलों को तार्किक अंजाम तक पहुंचने
ही नहीं दिया जाएगा तो कैसे कहा जा
सकता है कि किसी घोटाले में क्या मिला ?
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घोटाले से जुड़े सवालों का इंतजार
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--सुरेंद्र किशोर--
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आखिर 2 जी घोटाले में क्या मिला ?
लंबे इंतजार के बाद इस सवाल का जवाब मिलने की उम्मीद है।
क्योंकि बीते दिनों दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2 जी स्पैक्ट्रम आबंटन घोटाला मामले में पूर्व दूर संचार मंत्री ए.राजा और अन्य को बरी किए जाने के खिलाफ सी.बी.आई.और इडी की अपीलों पर दैनिक आधार पर सुनवाई करने का आदेश दिया।
( 5 अक्तूबर 2020 से सुनवाई शुरू भी हो चुकी है।)
2- जी घोटाला केस में दिल्ली हाईकोर्ट को इस आरोप की जांच करनी है कि क्या सी.बी.आई.की विशेष अदालत ने दस्तावेजी सबूतों को नजरअंदाज किया और मौखिक गवाही पर भरोसा किया ?
विशेष अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा-165 में मिली शक्ति का उपयोग क्यों नहीं किया ?
ध्यान रहे कि 2 जी स्पैट्रम घोटाले में दिल्ली स्थित सी.बी.आई.की विशेष अदालत ने 2017 में आरोपितों को जब दोषमुक्त कर दिया था, तो इस पर बहुत हैरानी जताई गई थी।
क्योंकि इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया घोटाला मान कर 122 लाइसेंस रद कर दिए थे
और जुर्माना भी लागाया था।
किसी केस के बारे में सुप्रीम कोर्ट
और लोअर कोर्ट की समझ में इतना बड़ा फर्क क्यों आया ?
2 जी स्पैक्ट्रम घोटाला मुकदमे में ए.राजा और कनिमोझी को दोषमुक्त करते हुए विशेष सी.बी.आई.अदालत ने 2017 में कहा था, कलाइनगर टी.वी.को कथित रिश्वत के रूप में शाहिद बलवा की कंपनी डी बी ग्रूप द्वारा 200 करोड़ रुपए देने के मामले में अभियोजन पक्ष ने किसी गवाह से जिरह तक नहीं की।
कोई सवाल तक नहीं किया।
याद रहे कि उस टी.वी.कंपनी का मालिकाना हक करूणानिधि परिवार से जुड़ा है।
माना कि अभियोजन द्वारा कोई सवाल नहीं किया गया क्योंकि शायद मनमोहन सरकार के कार्यकाल में सी.बी.आई.के वकील को ऐसा करने की अनुमति नहीं रही होगी।
पर अदालत के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम में ऐसे ही मौकों के लिए धारा-165 का प्रावधान किया गया है।
आखिर इस शक्ति का उपयोग क्यों नहीं किया गया ?
जबकि यह सूचना उपलब्ध थी कि इस घोटाले में 200 करोड़ रुपए की रिश्वत देने का आरोप लगा है।
इस केस का यह सबसे प्रमुख सवाल है।
उक्त धारा के अनुसार ‘‘न्यायाधीश सुसंगत तथ्यों का पता लगाने के लिए या उनका उचित सबूत प्राप्त करने के लिए किसी भी रूप में किसी भी समय किसी भी साक्षी या पक्षकार से किसी भी सुसंगत या विसंगत तथ्य के बारे में कोई भी प्रश्न जो वह चाहे पूछ सकेगा।
तथा किसी दस्तावेज या चीज को पेश करने का आदेश दे सकेगा।
न तो पक्षकार और न उनके अभिकत्र्ता हकदार होंगे कि वे किसी भी ऐसे प्रश्न या आदेश के प्रति कोई आक्षेप करें।
वे ऐसे किसी भी प्रश्न के प्रत्युत्तर में दिए गए किसी भी उत्तर पर किसी भी साक्षी की न्यायालय की इजाजत के बिना प्रति -परीक्षा करने के भी हकदार नहीं होंगे।’’
2 -जी स्पैक्ट्रम घोटाला मुकदमे में ए .राजा और कनिमोझी को दोषमुक्त करते हुए विशेष जज की ओर से यह भी कहा गया था कि मैं पिछले सात साल से पूरी तन्मयता के साथ कोर्ट में सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक बैठा रहा।
और इंतजार करता रहा कि सी.बी.आई. कोई ठोस सबूत लेकर आएगी।
लेकिन ऐसा कुछ नहीं मिला जो आरोपितों के अपराध को साबित करता हो।
फिर चाहे वह ‘कट आॅफ डेट’ को फिक्स करने की बात हो या ‘‘पहले आओ, पहले पाओ नीति’’ के विरूपण का मामला हो।
ऐसी टिप्पणियों के बाद ही यह कहना शुरू किया गया कि इस मामले में तो कुछ था नहीं।
इसी तरह बोफोर्स घोटाले के बारे में भी कांग्रेस के कई बड़े -छोटे नेताओं ने लगातार यही कहा कि बोफोर्स घोटाला मीडिया की उपज था।
आम तौर पर ऐसी बातें अधूरी जानकारी के आधार पर की जाती है,क्योंकि जब मामले को उनकी तार्किक परिणति तक पहंुचने ही नहीं दिया तो कैसे कहा जाए कि घोटाले में क्या मिला ?
कम ही लोगों को मालूम है कि बोफोर्स मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
मामला विचाराधीन है।
याद रहे कि 2005 में दिल्ली हाईकोर्ट ने जब बोफोर्स कांड के आरोपितों को दोषमुक्त करार दे दिया तो तत्कालीन मनमोहन सरकार ने उस निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील तक नहीं की।
प्रणव मुखर्जी ने तो यह तक कह दिया था कि चूंकि किसी अदालत ने इसे घोटाला नहीं कहा है,इसीलिए इसे आधिकारिक तौर पर घोटाला नहीं कहा जा सकता है।
पर वकील अजय अग्रवाल की लोकहित याचिका पर जब कभी सुप्रीम कोर्ट विचार करेगा तो उसके सामने एक महत्वपूर्ण तथ्य आएगा।
उस पर उसे अपनी राय बनानी होगी।
दरअसल जिस मामले को निराधार मानकर दिल्ली हाई कोर्ट ने आरोपितों को दोषमुक्त कर दिया था,उसी घोटाले में
मिले दलाली के पैसों पर भारत सरकार के आयकर महकमे ने आयकर वसूले।
याद रहे कि भारत सरकार के आयकर न्यायाधीकरण ने कहा था कि आक्तावियो क्वात्रोचि और विन चडढा को बोफोर्स की दलाली के 41 करोड़ रुपए मिले थे।
(याद रहे कि भारत सरकार ने दलाली पर काननून प्रतिबंध लगा रखा था।)
दलाली के ये पैसे भारत सरकार के खजाने से ही दिए गए थे।
लिहाजा ऐसी आय पर भारत में उन पर टैक्स की देनदारी बनती है।
आयकर विभाग ने गत साल दक्षिण मुम्बई स्थित विन चड्ढा के फ्लैट को 12 करोड़ 2 लाख रुपए में नीलाम कर दिया ।
दूसरे दलाल क्वात्रोचि को तो दलाली के पैसे स्विस बैंक की लंदन शाखा से निकाल लेने की सुविधा तत्कालीन मन मोहन सरकार ने प्रदान की थी।
जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट के सामने यह प्रश्न होगा कि जिस बोफोर्स सौदे में दलाली का आरोप प्रमाणित है,उसके आरोपितांे को दिल्ली हाईकोर्ट ने दोषमुक्त कैसे कर दिया ?
उम्मीद की जानी चाहिए कि ये दोनों मामले जल्द ही अपने अंजाम तक पहुंचेंगे और लोगों को इनसे जुड़े सवालों के जवाब मिल सकेंगे।
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8 दिसंबर 2020 के दैनिक जागरण में प्रकाशित
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