गुरुवार, 19 नवंबर 2020

 मेरे इस लेख का सुसंपादित अंश आज के दैनिक 

जागरण में प्रकाशित

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  विपरीत परिस्थितियों में बेहतर जीत

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--सुरेंद्र किशोर--

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  राजनीति के मोर्चे पर तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद राजग बिहार में अपनी सरकार बचाने में सफल रहा।

  किसी मुख्य मंत्री के नेतृत्व में लगातार चैथी बार चुनाव चुनाव जीतने का रिकाॅर्ड बिहार ने भी कायम कर ही लिया ।

इससे पहले ज्योति बसु ने लगातार पांच बार और नवीन पटनायक ने चार बार चुनाव जीता है।

  मुख्य मंत्री नीतीश कुमार की सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण यह रहा कि मतदाताओं ने नीतीश कुमार और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा व सेवा पर अपेक्षाकृृत अधिक भरोसा किया।

   कोविड महामारी और आर्थिक मंदी की पृष्ठभूमि में यह चुनाव हुआ।

 इस चुनाव में यदि बाहरी राजनीतिक झांसे और भीतरी असहयोग के तत्व सक्रिय नहीं होते तो राजग को बड़ी सफलता मिलती।

  यहां यह कहना एक हद तक सही है कि 

‘‘घर को आग लग गई घर के चिराग से।’’

  यहां आशय सिर्फ चिराग पासवान से ही नहीं है।

बल्कि कुछ अन्य ‘‘मोमबत्तियों’’ ने भी राजग को जहां -तहां  झुलसाया।

   राजग के कुछ परंपरागत मतदाताओं के एक हिस्से ने भी इस बार राजग का साथ नहीं दिया।

उनका गुस्सा जदयू यानी मुख्य मंत्री पर अधिक था।

क्योंकि कई बार नीतीश कुमार उनके अनुचित दबाव में नहीं आए। 

  इसके बावजूद यदि सफलता मिली तो उसका कारण यह रहा कि अति पिछड़ों व महिलाओं का राजग को भरपूर सहारा मिला।

  राजग के लिए इस चुनाव का एक दुखदायी प्रकरण यह रहा कि सवर्णों के बीच के कुछ परंपरागत राजग समर्थकों ने भी अघोषित कारणों से नीतीश कुमार को सबक सिखाने का भरसक प्रयास किया।

किंतु प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की राजग व नीतीश के पक्ष में मतदाताओं से भावनात्मक अपील ने बड़ी भूमिका निभाई।

  नीतीश कुमार के ‘अहंकारी’ होने का खूब प्रचार हुआ था।

पर चुनाव नतीजे ने बताया कि नीतीश कुमार आम लोगों के लिए अहंकारी कत्तई नहीं रहे।

जदयू का दावा रहा कि वे तो लगातार सेवक की ही भूमिका में रहे।

  कुछ प्रेक्षकों के अनुसार इस रिजल्ट ने यह भी बताया कि निरर्थक गप्प-गोष्ठी से दूर रहने वाले मुख्य मंत्री के लिए अहंकार शब्द का इजाद उन लोगों ने किया जिनके निहितस्वार्थों की पूत्र्ति नहीं हुईं।  

    यह सच है कि कुछ सार्वजनिक कामों को करने में नीतीश सरकार इस बीच विफल रही।

सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार व अपराध के मामलों में लोगबाग बेहतर की उम्मीद कर रहे थे।

वह नहीं हुआ।

फिर भी  अधिकतर लोगों ने मुख्य मंत्री की मंशा पर शक ंनहीं किया ।

   अधिकतर लोगों ने विकल्प को अधिक खराब माना।

  दो मामलों में राजनीतिक विरोधियों के पास भी नीतीश के खिलाफ कहने को कुछ नहीं था।

नीतीश कुमार पर आर्थिक गड़बड़ियों यानी जायज आय से अधिक धन संग्रह का कोई आरोप अब तक नहीं लगा है।

नीतीश ने कभी अपने रिश्तेदार,परिजन या वंशज को राजनीति में आगे नहीं किया।

  इन बुराइयों से भरी- पड़ी बिहार की राजनीति  नीतीश कुमार को एक विशेष स्थान देती है।

  चुनाव में इसका भी लाभ मिला अन्यथा जदयू को कुछ और अधिक चुनावी नुकसान हुआ होता।  

  जदयू को उम्मीद से कम सीटें मिलने का बड़ा कारण यह भी रहा कि निहितस्वाथियों ने संगठित होकर जदयू को खास तौर पर निशाना बनाया।

चुनाव प्रचार के बीच नीतीश कुमार ने एक बार कहा भी था कि शराब माफिया हमारे खिलाफ अभियान चला रहे हैं।

   अधिकतर लोगों को यह लगा है कि कमियां दूर करने और बेहतर काम करने की उम्मीद यदि किसी से की जा सकती है तो वह राजग सरकार से ही की जा सकती है । राजद सरकार से नहीं।

  मुख्य प्रतिपक्षी दल राजद को अभी यह साबित करना बाकी है कि वह भी शांतिप्रिय व विकासपसंद लोगों की उम्मीदों पर खरा उतर सकता है।

उसके पिछले खराब रिकाॅर्ड उसका अब भी पीछा कर रहे हैं।

हांलाकि राजद नेता तेजस्वी यादव ने खुद को पहले से बेहतर साबित करने की कोशिश जरूर की है।

इसमें एक हद वे सफल भी हुए हैं।

यानी राजद को एक बेहतर नेतृत्व मिल गया है।

इस चुनाव प्रचार के बीच में ही राजद ने अपने पोस्टरों से लालू प्रसाद और राबड़ी देवी की तस्वीरें हटवा दी थीं।

  बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने चुनाव के ठीक पहले अपनी व अपनी पार्टी व सरकार की पिछली गलतियों के लिए सार्वजनिक रूप से आम लोगों से माफी मांगी।

  साथ ही, राजद ने चुनाव नतीजों के बाद अनुचित नारेबाजी,हर्ष फायरिंग प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ अशिष्ट व्यवहार आदि नहीं करने का अपने कार्यकत्र्ताओं को सख्त निदेश दिया।

ऐसा इसलिए भी किया गया क्योंकि हाल में सोशल मीडिया पर अनेक राजद समर्थकों ने अशिष्टता की सारी हदें पार कर दी थी।

 चुनाव नतीजे बताते हैं कि बिहार के अधिकतर लोगों को अब भी 1990-2005 का ‘जंगल राज’ याद है।

  वैसे यह मानना पड़ेगा कि इस चुनाव में तेजस्वी यादव उम्मीद से बेहतर नेता के रूप में उभरे।

उन्होंने अधिकतर दफा जिम्मेदारी से बातें कीं।

यदि राजद के उदंड कार्यकत्र्ताओं को नियंत्रित करने का तेजस्वी का प्रयास जारी रहा तो राजद आने वाले दिनों में एक जिम्मेवार दल के रूप में उभर सकता है। 

किंतु चुनावी आश्वासन देने में वे एक जिम्मेदार नेता का सबूत नहीं दे सके।

  दस लाख सरकारी नौकरियां देने का निर्णय अपनी पहली ही कैबिनेट में कर देने के उनके वादे का वांछित असर मतदाताओं पर नहीं पड़ा।

  हां कुछ युवाओं पर जरूर पड़ा।

वैसे युवा विभिन्न सामाजिक समूहों से थे।

  यदि राजद अपने एम.वाई.यानी मुस्लिम-यादव वोट बैंक के बाहर से भी कुछ मत प्राप्त कर सका तो उसका एक कारण 10 लाख सरकारी नौकरियों का वादा भी था।

   पिछले साल राजद ने संसद में सवर्ण आरक्षण का विरोध कर दिया था।

नतीजतन गत लोक सभा चुनाव में राजद के कम से कम दो ऐसे सवर्ण उम्मीदवार हार गए जिनकी जीत की उम्मीद की जा रही थी।

  उस विरोध का असर एक हद तक इस विधान सभा चुनाव पर भी पड़ा।

असद्ददीन आवैसी के दल ने परोक्ष रूप से राजद को नुकसान पहुंचाया ।

 लोजपा के अलग होने का जो नुकसान हुआ,उसकी क्षतिपूत्र्ति एक हद तक  ओवैसी ने कर दी।

पूर्व मुख्य मंत्री जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी के दलों से  राजग को मदद मिली है।

पर दूसरी तरफ कांग्रेस से राजद को कम ही मदद मिली।

राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार राजद ने तालमेल में कांग्रेस को 70 सीटें देकर अदूरदर्शिता का परिचय दिया था।

कांग्रेस की अपनी ताकत के अनुपात में वह काफी ज्यादा था।

 आने वाले दिनों में बिहार राजग के साथ खासकर नीतीश कुमार के साथ चिराग पासवान कैसा संबंध रहेगा ?

यह तो बाद में पता चलेगा।

पर, यह बात भी जरूर साफ हुई कि चुनावी सफलता के लिए चिराग पासवान की लोजपा पर राजग की निर्भरता की कोई  मजबूरी अब नहीं रही।  

भाजपा नेतृत्व अपना यह वादा निभाएगा ही कि नीतीश कुमार ही मुख्य मंत्री बनेंगे भले जदयू को कम सीटें मिलें।

   कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि सामाजिक समीकरण के साथ -साथ बिहार में विकास व जन कल्याण के कामों का चुनाव पर सकारात्मक असर पड़ना अब भी जारी है।

  हाल के महीनों में राज्य भर में बिजली पहुंचा दी गई है।

राज्य के अधिकतर इलाकों के लिए बिजली एक सपने की तरह थी।

 किसानों, महिलाओं, छात्र-छात्राओं आदि के लिए जारी केंद्र व राज्य सरकार की अनेक योजनाएं भी चुनाव में काम कर र्गइं।

नल जल योजना में अनियमितताओं की खबरें जरूर आई हैं।

पर उस योजना में लूट मचाने वालों के खिलाफ हाल में बड़े पैमाने पर 

सरकार ने कार्रवाइयां की  हैं।

  पर,नई राज्य सरकार को

दो मोरचों पर अब पहले से अधिक सक्रियता दिखानी होगी।

 अपराध के मामले में लोगों को कुछ और निश्चिंतता चाहिए।

खासकर उद्योगपतियों को।

इसके लिए पुलिस प्रशासन को चुस्त व भ्रष्टाचारमुक्त करना होगा।

 कहने की जरूरत नहीं कि यह राज्य नेपाल की सीमा पर स्थित है।

इस दृष्टि से भी कानून-व्यवस्था में बेहतरी और भी जरूरी है।

 राष्ट्रद्रोही तत्वों का भारत-नेपाल की सीमा से अबाध आवाजाही को रोकने की चुनौती सामने है।

  साथ ही सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार को लेकर लोगों में नाराजगी देखी जाती है।

 उस दिशा में कुछ ठोस व कड़ा कदम उठाना होगा।

 नीतीश कुमार इस दिशा में कोशिश करते भी रहे हैं।

पर उसमें अन्य संबंधित पक्षों का सक्रिय व ठोस सहयोग भी जरूरी  है।

  हाल के वर्षों में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों की कमजोरियां सामने आई हैं।

इसके लिए कुछ हलकों में मौजूदा शासन को भी जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है।

 गरीबों तक यदि शिक्षा व स्वास्थ्य का लाभ पहुंचाना है,तो उस दिशा में

सरकार ही मदद कर सकती है न कि निजी क्षेत्र।

 उम्मीद है कि नई सरकार इस दिशा में पहले से बेहतर काम करेगी।

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12 नवंबर 20 

    


बुधवार, 18 नवंबर 2020

     आज मैंने सी.एन.बी.सी.आवाज चैनल 

पर राजनीतिक चर्चा सुनी।

  कांग्रेस की दशा-दिशा पर बहस थी।

उसके तथ्य या कथ्य पर तो मुझे कुछ नहीं कहना।

पर, डिबेट को संचालित करने की एंकर वाजपेयी जी की शैली मुझे अच्छी लगी।

अतिथियों की बातें मैं सुन सका।

समझ सका कि देश के शीर्ष चिंतक-विश्लेषक कांग्रेस के बारे में क्या राय रखते हैं।

   संभव है कि कुछ अन्य चैनल भी सी.एन.बी.सी.की तरह ही दर्शकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से निभा रहे हों।

 पर, इसके विपरीत अधिकतर चैनलों की हालत दयनीय व शर्मनाक है।

  वे बड़ी संख्या में बकबादी व बदतमीज अतिथियों को बुलाते हैं ।

 ऐसा ‘कुत्ता भुकाओ कार्यक्रम’ करते हैं कि किसी की बात न कोई सुन सकता है और न समझ सकता है।

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--सुरेंद्र किशोर--18 नवंबर 20


   भारतीय संविधान की मूल काॅपी में राम,कृष्ण,

शिव और बुद्ध आदि के चित्र अंकित हैं।

   पर हमारे शासकों ने बाद के संस्करणों से उन चित्रकांनों को संविधान की प्रतियों से निकाल बाहर कर दिया।

   इंडोनेशिया में 87 प्रतिशत मुस्लिम हैं।

उसके बावजूद उस देश की करेंसी नोट्स पर आज भी गणेश के चित्र होते हैं।

याद रहे कि इंडोनशियावासियों ने अपने हिन्दू पूर्वजों की संस्कृति को अपने यहां से समाप्त नहीं किया है।

किंतु हमारे देश के शासकगण........।

थोड़ा कहना अधिक समझना।

संविधान की मूल प्रति के एक पेज की स्कैन काॅपी यहां प्रस्तुत है।

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सुरेंद्र किशोर--13 नवंबर 20


 सवाल--सबसे कठिन काम कौन सा है ?

जवाब--अपने समकक्ष या जूनियर के अच्छे 

कामों की तारीफ करना।

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प्रश्न--सबसे आसान व सुखदायक काम कौन सा है ?

उत्तर--पीठ पीछे किसी की आलोचना या निन्दा करना।

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सवाल-सबसे मजेदार काम कौन सा है ?

जवाब--आपको यह बात जल्द से जल्द बता देना कि 

आपके बारे में कौन, कहां कैसी -कैसी शिकायतें कर रहा था।

हां,ध्यान रहे,सिर्फ शिकायतें बताना,तारीफ नहीं बताना।

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--सुरेंद्र किशोर-15 नवंबर 20 


शनिवार, 14 नवंबर 2020

 ओवैसी का बिहार में उभार

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    कांग्रेस नेता तारिक अनवर ने कहा है कि बिहार में असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी ए.आई.एम.आई.एम. का उभार शुभ संकेत नहीं है।

याद रहे कि उसे विधान सभा की पांच सीटें मिल गई हैं।

 अनवर साहब की बात सही है।

पर, सवाल है कि यह बात कहने का उन्हें कोई नैतिक अधिकार है क्या ?

जो दल  गत कर्नाटका विधान सभा चुनाव में एस.डी.पी.आई.से तालमेल कर चुका है ,उसे ओवैसी के खिलाफ बोलने का कोई   

नैतिक अधिकार नहीं है।

ओवैसी की पार्टी जितना अतिवादी है,उसकी अपेक्षा पी.एफ.आई.की राजनीतिक शाखा एस.डी.पी.आई.काफी अधिक अतिवादी है। 

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सुरेंद्र किशोर

कानोंकान

प्रभात खबर, पटना

13 नवंबर 20



गुरुवार, 12 नवंबर 2020

    संकट की घड़ी में फ्रांस का प्रतिपक्ष 

   वहां की मैक्रों सरकार के पूरी तरह साथ

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काश ! हमारे देश का प्रतिपक्ष भी वैसा ही होता !

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सुरेंद्र किशोर

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   अपने देश के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों के स्वर में अपना स्वर मिलाते हुए फ्रांस में प्रतिपक्ष की नेता मेरीन ली पेन 

ने पाकिस्तान और बंगला देश के आप्रवासियों के फ्रांस मंे  प्रवेश पर प्रतिबंध लगा देने की अपनी सरकार से मांग की है।

   याद रहे कि हाल में पाक और बंगलादेश में हुए फ्रांस विरोधी प्रदर्शनों में मैक्रों को सजा देने की मांग की गई।

उस देश के उत्पादों के बहिष्कार का निर्णय किया गया।

साथ ही, यह भी मांग की गई कि फ्रांस से राजनयिक संबंध तोड़ लिया जाए।

  सिर्फ फ्रंास ही नहीं, दुनिया के जिस किसी देश में भी ऐसा संकट आता है तो पक्ष-विपक्ष एक स्वर में बोलने लगते हैं।

भारत में भी जब विपक्ष में जिम्मेदार-समझदार-देशभक्त  नेता हुआ करते थे तो ऐसा ही होता था।

   पर आज  ?!!!

ऐसे संकट के समय में तो हमारे यहां के अधिकतर प्रतिपक्षी नेता हमारे दुश्मन देश के स्वर में स्वर मिलाने लगते हैं।

  ऐसे ही गुणों के कारण तो फ्रांस राफेल बनाता है और हम उसे खरीदने के लिए लालायित रहते हैं !

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फ्रांस में वाणी की स्वतंत्रता के नाम पर मुहम्मद साहब के कार्टून या चित्र प्रदर्शित करने का मैं खिलाफ हूं।

किसी की भावना से खिलवाड़ शांति के हक में नहीं है। 

हां,यदि फ्रांस में रह रहे जो आप्रवासी या शरणार्थी फं्रास के कानून का पालन करने को तैयार नहीं हैं तो उन्हें तत्काल उनके उस देश में पहुंचा देना चाहिए जहां से वे आए हैं। 

  भारत सहित दुनिया के अन्य देशों को भी कानून तोड़क शरणाथियों-घुसपैठियों के साथ ऐसा ही रुख अपनाने का पूरा अधिकर है।

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--सुरेंद्र किशोर-2 नवंबर 20 


मंगलवार, 10 नवंबर 2020

   ‘‘लगता है कि नरेंद्र मोदी अब भी गुजरात दंगे वाले सी.एम. हैं।’’

          --राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी

अब्दुल बारी को इंगित करते हुए

‘‘पता नहीं आप भी जिन्ना के सपूत तो नहीं बनना 

चाह रहे हैं ?’’

             --केंद्रीय मंत्री  गिरिराज सिंह 

--दैनिक भास्कर,पटना, 7 नवंबर 2020

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   मेरी समझ से इन दोनों नेताओं के बयान अतिशयोक्तिपूर्ण हैं।

राजनीति से प्रेरित हैं।

अपने -अपने वोट बैंक को खुश करने वाले बयान हैं।

तथ्य से इनका कोई संबंध नहीं है।

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यह सच है कि शाहीन बाग धरना के समय कुछ मुस्लिम नेताओं ने जरूर यह नारा लगाया था कि 

‘‘हमें जिन्ना वाली आजादी चाहिए।’’

कांग्रेस व कम्युनिस्ट दलांे के बड़े -बड़े नेताओं ने शाहीन बाग जाकर उन देशद्रोहियों को बढ़ावा भी दिया।

पर इसका मतलब यह नहीं कि जिसका भी मुस्लिम नाम है,वे सब जिन्ना के सपूत बनना चाहते हैं।

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दूसरी ओर, अब्दुल बारी सिद्दीकी के बयान से लगता है कि 

उन्होंने नरेंद्र मोदी को ‘‘दंगे का प्रतीक पुरुष’’ मान  लिया है।

 जबकि ऐसा नहीं है।

प्रतीक पुरुष बनने का हक तो उसी को है जिसके कारण दंगे में सर्वाधिक लोगों की जानें गईं हों।

इस देश के दंगों के पिछले आंकड़े मोदी को यह दर्जा नहीं देते।यह मोदी के साथ अन्याय है।

इस देश की बड़ी आबादी इस अन्याय का बदला लेते हुए मोदी को लगातार समर्थन देती जा रही है।

  यह दर्जा किसी और को मिलता है जिसके खिलाफ बोलना सिद्दिकी के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह है।

अभी तो उससे इनका चुनावी तालमेल भी है।

संभव होगा तो साथ सत्ता भी चलाएंगे।

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आंकड़े गवाह हैं।

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ऐसे संवेदनशील मामलों में आंकड़ों के साथ ही बातें करनी चाहिए।

साथ ही, जो लोग गोधरा में ट्रेन में 58 कार सेवकों के दहन कांड की निंदा नहीं करते,उन्हें बाद में  प्रतिक्रियास्वप हुए गुजरात दंगे के खिलाफ बोलने का भी कोई नैतिक अधिकार नहीं है।  

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 सन 2002 के गुजरात दंगे में अल्पसंख्यक समुदाय के 790 और बहुसंख्यक समुदाय के 254 लोग मरे थे।

गुजरात दंगे में दंगाई भीड़ को कंट्रोल करने की कोशिश में 

200 पुलिसकर्मी भी शहीद हुए थे।

गुजरात पुलिस ने दंगाइयों पर जो गोलियां चर्लाइं,उस कारण भी दर्जनों लोग मारे गए थे।

 गुजरात में दंगा शुरू होने से कितनी देर बाद पुलिस-सेना सड़कों पर थी ?

सिर्फ नौ जानें जाने के बाद ही वहां सेना सड़कों पर थी।

इसके विपरीत दिल्ली में 1984 में पुलिस व कांग्रेसियों के नेतृत्व में दो दिनों तक हत्यारों के गिरोह  सिखों का एकतरफा संहार करते रहे।

फिर भी जानबूझकर सेना नहीं बुलाई गई।

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जरा 1989 का भागल पुर दंगा याद कर लें

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  1989 के दंगे में भागलपुर में अल्पसंख्यक समुदाय के करीब 900 और बहुसंख्यक समुदाय के करीब 100 लोग मरे।

पुलिस की गोलियों से वहां कितने दंगाई मारे गए ?

मुझे तो नहीं मालूम।

किसी को मालूम हो तो जरुर बताएं।

 उल्टे पुलिस तो वहां भक्षक बनी रही।

एस.पी.की बदली रुकने के बाद ही अधिक जानें गईं।

दंगे में अकर्मण्यता के कारण पहले उनकी बदली हुई थी।

पर प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने बाद में बदली रोकने का आदेश दे दिया था।

जिस मुख्य मंत्री एस.एन.सिंह ने बदली का आदेश दिया था,वे मुंह ताकते रह गए।

हां, उनकी गलती यह जरूर थी कि उन्होंने तत्काल मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया।

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2002 के गुजरात व 1984 के दिल्ली सिख संहार की यादें

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 यह सही है कि गुजरात में पूर्व सांसद एहसान जाफरी के यहां से फोन शासन को जाता रहा ,पर उन्हें कोई मदद  नहीं मिली।

और , वे दंगाइयों के शिकार हो गए।

पर, दिल्ली में तो राष्ट्रपति जैल सिंह और यहां तक कि इंदिरा -संजय भक्त लेखक सरदार खुशवंत सिंह के त्राहिमाम संदेशों को भी प्रधान मंत्री राजीव गांधी व गृह मंत्री नर सिंह राव ने नजरअंदाज कर दिया था।

जैल सिंह व खुशवंत सिंह अपने -अपने रिश्तेदारों-मित्रों  को हत्यारी जमातों से बचाना चाहते थे।

वे भी नहीं बचा सके।

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मेरा सिर्फ यही कहना है कि जिसकी जितनी बड़ी गलती हो,उसी अनुपात मंे लोगों का उनके खिलाफ गुस्सा होना चाहिए।

पर, लगता है कि कुछ लोगों ने तो अपना सारा गुस्सा सिर्फ नरेंद्र मोदी के लिए ही बचा रखा है।

इसका राजनीतिक लाभ मोदी को मिलता रहा है।

लगता है कि आगे भी मिलता रहेगा।

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---सुरेंद्र किशोर-7 नवंबर 20