मंगलवार, 10 जनवरी 2023

     आज का चिंतन

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‘‘त्रिदोष मुक्त’’ राजनीति के लिए काम करें

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       ---सुरेंद्र किशोर--

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राजनीति से वैसे नेताओं और कार्यकर्ताओं का विलोप होता

जा रहा है जो ‘‘त्रि-दोष रोग’’ से ग्रस्त नहीं हैं।

त्रि-दोष यानी,

1.-भ्रष्टाचार,

2.-परिवारवाद 

3.-जातीय-धार्मिक वोट बैंक की सौदागरी

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  इस माहौल में भी कुछ नेता ऐसे मौजूद व सक्रिय हैं जो इस त्रिदोष से लगभग मुक्त हैं।

चाहे वे जिस किसी दल के हों,जिस किसी विचारधारा के हों,उनकी मदद होनी चाहिए।

अन्यथा, देर-सबेर,एक न एक दिन हमारा लोकतंत्र भारी खतरे में पड़ जाएगा।

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पुनश्चः

  यदि बाल ठाकरे परिवार ने उद्धव ठाकरे के बदले राज ठाकरे को आगे बढ़ाया होता ,उधर नेहरू-गांधी परिवार राहुल गांधी के बदले वरुण गांधी को आगे बढ़ाता, तो क्रमशः शिवसेना और कांग्रेस की स्थिति आज की अपेक्षा बेहतर रहती।

4 मई, 1981 को इंदिरा गांधी ने अपनी वसीयत में अन्य बातों के अलावा यह भी लिखा कि

 ‘‘मैं यह देखकर खुश हूं कि राजीव और सोनिया ,वरुण को उतना ही प्यार करते हैं जितना अपने बच्चों को।

  मुझे पक्का भरोसा है कि जहां तक संभव होगा,वो हर तरह से वरुण के हितों की रक्षा करेंगे।’’

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10 जनवरी 23 


       हिन्दी दिवस पर विशेष आग्रह

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     सुरेंद्र किशोर

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 भारत के संविधान के अनुच्छेद-357(2) में यह प्रावधान किया गया है कि 

‘‘राज्य के विधान मंडल की शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद द्वारा अथवा राष्ट्रपति या खंड -1 के उप खंड (क)में निर्दिष्ट अन्य प्राधिकारी  द्वारा बनाई गई ऐसी विधि जिसे संसद अथवा राष्ट्रपति या ऐसा अन्य प्राधिकारी अनुच्छेद-356 के अधीन की गई उद्घोषण के अभाव में बनाने के लिए सक्षम नहीं होता,उद्घोषणा के प्रवर्तन में न रहने के पश्चात एक वर्ष की अवधि के अवसान पर,अक्षमता की मात्रा तक ,उन बातों के सिवाय जिन्हें उक्त अवधि के अवसान के पहले किया गया है या करने का लोप किया गया है प्रभावहीन हो जाएगी यदि वे उपबंध जो प्रभावहीन हो जाएंगे ,सक्षम विधान मंडल के अधिनियम द्वारा पहले ही निरसित या उपांतरणों के सहित या उनके बिना पुनः अधिनियमित नहीं कर दिए जाते हैं।’’

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ऊपर लिखा वाक्य 135 शब्दों का है।

यह भारतीय संविधान के अधिकृत हिन्दी अनुवाद से उधृत किया गया है।

मेरे लिए तो इस हिन्दी अनुवाद की अपेक्षा इसकी मूल यानी अंग्रेजी वाक्य को समझना 

अधिक आसान है।

क्योंकि मुझे थोड़ी -बहुत अंग्रेजी आती है।

किंतु यदि कोई हिन्दी भाषी, जिसे अंग्रेजी नहीं आती, इसे पढ़कर समझना चाहेगा,तो क्या वह समझ पाएगा ? 

मुझे तो नहीं लगता।

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संविधान के हर अनुच्छेद का अनुवाद इसी तरह लंबे वाक्यों में क्लिष्ट हिन्दी के साथ किया गया है।

  यानी, सामान्य हिन्दी भाषा भाषियों के लिए संविधान को पढ़ना-समझना ‘‘मना’’ है।

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इस लिए आज ‘हिन्दी दिवस’ के अवसर पर मेरी यह अपील है कि बेहतर समझदारी के लिए संविधान का समझ में आ जाने वाला हिन्दी अनुवाद करवाया जाना चाहिए।

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इतना ही नहीं,आई.पी.सी.,सीआर.पी.सी.तथा अन्य कानूनी किताबों का भी हिन्दी अनुवाद इसी तरह हुआ है।

दरअसल,लंबे-लंबे वाक्य अंग्रेजी के स्वभाव में है।

   हिन्दी में छोटे-छोटे वाक्य और भरसक आम बोलचाल में आने वाले शब्द लिखने पर सराहना मिलती है।उसकी उपयोगिता भी बढ़ती है।

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10 जनवरी 23


शनिवार, 7 जनवरी 2023

 हाल ही में एक संभ्रांत महिला ने मुझे बताया कि 

‘‘मेरी एक सहेली ने कहा कि तुम भाग्यशालिनी हो क्योंकि तुम्हारी बेटी भी है।’’

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सुरेंद्र किशोर

4 जनवरी 23

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पुनश्चः-अब आप इस उक्ति का निहितार्थ समझिए और बताइए।

उन्होंने तो इस एक वाक्य से अधिक मुझे कुछ नहीं बताया था।

मैंने पूछा भी नहीं।


शुक्रवार, 6 जनवरी 2023

    इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता

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      सुरेंद्र किशोर

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‘इंडियन एक्सप्रेस’ अब भी एक जीवंत अखबार है।

उसे मैं रोज सुबह पढ़े बिना नहीं रह सकता।

अब तो वह पटना से भी छपता है।

एक्सप्रेस अपनी पेशेवर गरिमा बनाए हुए है।

हालांकि रामनाथ जी गोयनका-अरूण शौरी के जमाने वाली बात नहीं।वैसे भी वह दौर ही अलग था।

  पर,यही बात मैं आज के ‘जनसत्ता’ के बारे में नहीं कह सकता।

मैंने 1983 से 2001 तक ‘जनसत्ता’ में काम किया।

जनसत्ता को मैंने अपना ‘बेस्ट’ दिया।

जनसत्ता ने भी मुझे बहुत कुछ दिया।

इसलिए मैं ‘जनसत्ता’ से आज भी एक विशेष तरह का लगाव महसूस करता हूं।

जनसत्ता की जीवंतता में कमी के लिए उसके आज के संपादक नहीं बल्कि प्रबंधन अधिक जिम्मेदार हैं।

  यदि एक्सप्रेस की खास खबरें जनसत्ता को आज भी उपलब्ध होने लगें तो इस अखबार में भी तेवर आ जाएगा।

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प्रभाष जोशी के जमाने में भी एक्सप्रेस वाले अपनी खास खबरें जनसत्ता से शेयर करना नहीं चाहते थे।

किंतु प्रभाष जी ने उच्चत्तम स्तर से कहलवा कर एक्सप्रेस की खबरें हासिल करने का प्रावधान करा दिया था।

यह काम आज भी क्यों नहीं हो सकता ?

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एक्सप्रेस वालों को यह समझना चाहिए कि आपकी खबरें जनसत्ता में छप जाने से एक्सप्रेस के ग्राहक को जनसत्ता अपनी ओर नहीं खींच लेगा।

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अंग्रेजी अखबार के एक मशहूर कार्टूनिस्ट यह नहीं चाहते थे कि उनके कार्टून उस अखबार समूह के भाषाई संस्करण में छपे।

उससे वे अपनी तौहीन मानते थे।

उम्मीद है कि एक्सप्रेस में यह भावना नहीं होगी।

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  6 जनवरी 23

 


     टी.वी.चैनलों के बारे में दो शब्द

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        सुरेंद्र किशोर

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 कोई यदि मुझसे पूछे कि निजी इलेक्टा्रॅनिक मीडिया का कौन सा कार्यक्रम

 आपको अच्छा लगता है ?

कोई एक कार्यक्रम ?

मैं कहूंगा-- ‘आप की अदालत।’

 और सबसे खराब ?

मेरा जवाब होगा--किसी चैनल पर आठ या दस......... को एक साथ बैठा दिए जाएं 

और उन्हें झांव-झांव और कांव -कांव करने के लिए आपस में भिड़ा दिया जाए।

ऐसे में अधिकतर ‘अतिथियों’ की अधिकांश बातें दर्शक-श्रोता नहीं सुन पाते।

 रजत शर्मा की स्क्रीन पर और स्क्रीन से बाहर भी शालीन आवाज सुनना अच्छा लगता है,

इसलिए भी।

‘आप की अदालत’ के शुरूआती दिनों में वे मुझे भी अपनी शालीन आवाज में कभी-कभी फोन किया करते थे।

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सन 2014 के लोस चुनाव से ठीक पहले अर्नब गोस्वामी ने राहुल गांधी का एक लंबा इंटरव्यू लिया था।

तब तक अर्नब अच्छा-खासा रिसर्च करते थे-टिम सेबेस्टीयन(बी.बी.सी.) की झलक मिलती थी।

 मेरा अनुमान है कि उस एक इंटरव्यू मात्र से कांग्रेस व राहुल जी का काफी राजनीतिक और चुनावी नुकसान हो गया होगा।

अब तो अपना नुकसान करने के लिए खुद राहुल जी ही काफी हैं।

 अर्नब ने अब अपनी भूमिका बदल ली है।

पेशेवर पत्रकार से अभियानी पत्रकार तक का सफर !

खैर, उनकी नई भूमिका से मुझे कोई शिकायत नहीं।

जिस तरह मुझे रविश कुमार से भी कोई शिकायत है।

दोनों अपने -अपने काम में लगे रहें !!

मेरी शुभकामनाएं !

एक इच्छा जरूर रहती है कि अर्नब हो, या रविश वे जो भी सामग्री पेश करें,

वह रिसर्च करके करें और जो तथ्यपूर्ण हो-भले वह एकतरफा हो।

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 इतना ही कह सकता हूं कि इलेक्ट्रानिक मीडिया जैसे सशक्त माध्यम का इससे बेहतर इस्तेमाल हो सकता था।

कुछ अपवादों को छोड़कर सोशल मीडिया तो अराजक हो चुका है।

उससे कोई उम्मीद नहीं बनती।

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आज भी दूरदर्शन इस देश का वास्तविक प्रतिनिधि है,एक बात को छोड़कर।

वह यह कि बेचारा सरकार की कमियों और घोटालों की चर्चा नहीं कर सकता।

हाल में एक अच्छी बात मैंने देखी कि दूरदर्शन रिकाॅर्ड करने के बाद उसे संपादित करके ही स्क्रीन पर कोई डिबेट भेजता है।

संसद टी.वी.को भी लाइव डिबेट नहीं दिखाना चाहिए।

लाइव दिखाने की परंपरा शुरू होने के बाद पीठासीन अधिकारियों को एक बड़े अधिकार से अघोषित तौर पर ‘‘वंचित’’ कर दिया गया है।

वह यह कि वे किसी सांसद, मंत्री या प्रधान मंत्री की अवांछित टिप्पणी को कार्यवाही से निकाल सकते हैं।

अरे भई, जब दुनिया ने पहले ही देख-सुन ही लिया तो बाद में उसे कार्यवाही से निकाल कर आप 

क्या कर लेंगे ?

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5 जनवरी 23






मंगलवार, 3 जनवरी 2023

  सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी को सही ठहराया

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‘‘नोट बंदी से उच्च और मध्य वर्ग का भ्रष्टाचार सामने आ गया था’’

--- इकोनोमिक एंड पाॅलिटिकल वीकली

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सुरेंद्र किशोर

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नरेंद्र मोदी सरकार ने 8 नवंबर, 2016 को 500 और 1000 रुपए के नोट को चलन से बाहर कर दिया।

 आज सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी।

पर,आम लोगों ने तो नोटबंदी के तत्काल बाद ही उसका समर्थन कर दिया था।

2017 में उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में जनता ने भाजपा को सत्ता में ला दिया।

उससे ठीक पहले और नोटबंदी के तत्काल बाद हुए अनेक उप चुनावों में भी भाजपा की जीत हुई।

  किंतु पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने तब कहा था कि ‘‘नोटबंदी संगठित लूट है।’’

याद रहे कि काला धन,कर चोरी और आतंकी फंडिंग के खिलाफ कार्रवाई तहत प्रधान मंत्री मोदी ने नोटबंदी की थी।

 राहुल गांधी ने तब कहा कि नोटबंदी से गरीब तबाह हो गए हैं।

राहुल ने यह भी कहा कि नोटबंदी से 99 प्रतिशत ईमानदार जनता पर बमबारी हुई है।

कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने इसे तुगलकी फैसला बताया।

पूर्व वित मंत्री पी.चिदम्बरम ने कहा कि नोटबंदी बड़ा घोटाला है।

  शिवसेना के मुख पत्र ‘सामना’ ने लिख मारा कि नोटबंदी देश पर परमाणु बम गिराने जैसा है।

शिवसेना ने कहा कि 10 हजार साल में सबसे बदतर सरकार नरेंद्र मोदी की मौजूदा सरकार है।

 शरद यादव ने जहां नोटबंदी का विरोध किया,वहीं मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने नोटबंदी का समर्थन किया।तब नीतीश महागठबंधन सरकार के मुख्य मंत्री थे।

दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ‘‘काले धन के पुजारी नोटबंदी के खिलाफ हैं।काला धन गरीबी हटाने में सबसे बड़ी बाधा है।बेईमानों के बारे सीधे जानकारी मिल रही है।’’

नवंबर, 2016 के मध्य में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार 82 प्रतिशत लोगों की नजर में नोटबंदी का फैसला सही था।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस पर तीखा हमला करते हुए कहा था कि प्रधान मंत्री ने एक रात में ही भ्रष्ट तरीके से कमाए कांग्रेस के 12 लाख करोड़ रुपए को रद्दी में बदल दिया।

 इकोनोमिक एंड पाॅलिटिकल वीकली के संपादक परंजाॅय गुहा ठकुरता ने लिखा कि नोटबंदी से उच्च और मध्य वर्ग का भ्रष्टाचार सामने आ गया है।

उन दिनों यह आम चर्चा थी कि जिस नेता या दल के पास अधिक काला धन है,वह उतनी ही कठोरता से नोटबंदी का विरोध कर रहा है।

दूसरी ओर, रांची से खबर आई थी कि नक्सलियों के खातों में 55 करोड़ रुपए पाए गए।

कश्मीर में पत्थरबाजों की संख्या कम हुई।

केंद्र सरकार ने उम्मीद जताई कि नोटबंदी से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी और दाऊद इब्राहिम का जाल टूटेगा।

मायावती और मुलायम सिंह यादव ने कहा कि यह आर्थिक आपातकाल है।

 नोटबंदी का विरोध करते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि मोदी सरकार जनता को भिखारी बना रही है।

मुख्य मंत्री अखिलेश यादव ने कहा था कि बुद्धिजीवी कहते हैं कि काले धन का अर्थ शास्त्र बहुत मजबूत होता हैं

कई बार यह मंदी में बचाने के काम भी आता है।

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ऊपर वर्णित टिप्पणियों की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले को पढ़ें !

( चित्र में- प्रधान मंत्री की 96 वर्षीया मां हीराबेन ने बैंक में लाइन लगकर अपने नोट बदलवाए थे।)

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2 जनवरी 23


     


सोमवार, 2 जनवरी 2023

 


विधायिकाओं की बैठकों में शांति बहाल करने की भाजपा करे पहल  

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सुरेंद्र किशोर

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  अलग-अलग की बातचीत में हर दल के जिम्मेवार नेता यह कहते रहे हैं कि संसद और विधान सभाओं की बैठकें शांतिपूर्वक चलनी चाहिए।

पर,कोई नेता इसे संभव बनाने के लिए सामूहिक रूप से कारगर पहल करने को तैयार नहीं होता।

ऐसे में सत्ताधारी दल भाजपा पर ऐसी पहल करने की जिम्मेदारी बनती है।

जो राजनीतिक माहौल आज है,उसमें भाजपा सदन की गरिमा बढ़ाने के लिए प्रतिपक्षी दलों को राजी नहीं कर सकती। 

किंतु खुद पहल तो कर ही सकती है।

 जिन राज्यों में भाजपा प्रतिपक्ष में है,वहां की विधान सभाओं की बैठकों में शांति की पहल वह चाहे तो कर ही सकती है।

आज स्थिति यह है कि संसद में तो भाजपा चाहती है कि प्रतिपक्षी दल हंगामों के जरिए सदन की गरिमा न गिराएं।

पर, खुद भाजपा उन राज्य विधान सभाओं की बैठकों में क्या करती है ?

वह वहां खूब हंगामा करती है।

भाजपा राज्य विधान सभाओं में वैसी ही गरिमा कायम करे जिस तरह की गरिमा पचास और साठ के दशकों में देश की विधायिकाओं में बनी रहती थी। 

यदि यह संभव हुआ तो सत्ताधारी भाजपा को संसद में आए दिन हंगामा करने वाले सदस्यों को टोकने के लिए नैतिक बल हासिल हो जाएगा।

फिर भी यदि संसद में प्रतिपक्षी दल हंगामा करते रहेंगे तो वे जनता के बीच कसूरवार माने जाएंगे।

इसका राजनीतिक लाभ भाजपा को मिल सकता है।

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 सदन में अराजकता से चिंता

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राज्य सभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने गत माह 

बड़ी पीड़ा के साथ सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य सभा में अस्त -व्यस्तता देखकर पूरा देश हम लोगों पर हंस रहा है।

राज्य सभा सदस्य कोई स्कूली बच्चे नहीं हैं।जब सभापति की कोशिशों 

के बावजूद सदन में शांति नहीं लौटी तो उन्होंने कहा कि हम लोग बहुत ही गलत उदाहरण पेश कर रहे हैं।

  सभापति धनखड़ प्रथम पीठासीन पदाधिकारी नहीं हैं जो सदन में शांति लाने की कोशिश कर रहे हैं।दशकों से ऐसी कोशिश होती रही है।

किंतु स्थिति सुधरने की जगह बिगड़ती जा रही है।संसद में अराजकता के खिलाफ सन 1997 में करीब एक हफ्ते तक दोनों सदनों में भावपूर्ण चर्चाएं हुई थीं।शालीनता कायम करने के लिए सर्वसम्मत प्रस्ताव भी पास किया गया।पर उसका भी कोई नतीजा नहीं निकला।

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 गुठली का भी दाम

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खबर है कि भारत सरकार अगले तीन साल में देश के गावों में करीब दो लाख प्राथमिक डेयरी स्थापित करने जा रही है।

इससे न सिर्फ दूध का उत्पादन बढ़ेगा बल्कि खेती के लिए गोबर भी अधिक उपलब्ध होगा।

उससे जैविक खेती का विस्तार हो सकता है।

  इन दिनों तो रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं के धुआंधार इस्तेमाल से दो तरह की समस्याएं पैदा हो रही हंै। एक तो मिट्टी की गुणवत्ता पर विपरीत असर पड़ रहा है।दूसरे अनाज में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ रही है।इससे कैंसर का फैलाव हो रहा है।

इस पृष्ठभूमि में दूध के उत्पादन को बढ़ाने से दोहरा लाभ होगा।

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 घटता-बढ़ता चुनावी चंदा

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सन 2007 से 2012 तक कांग्रेस को व्यापारिक घरानों से 1662 करोड़ रुपए चंदा के रूप में मिले थे।

भाजपा को तब 852 करोड़ रुपए मिले।

लोक सभा में तब कांग्रेस की 206 सीटें थीं।भाजपा की सीटों की तब संख्या 116 थी।

2017-18 में भाजपा को 2977 करोड़ रुपए मिले।

कांग्रेस को 777 करोड़ रुपए मिले।

इस अवधि में लोक सभा में भाजपा के 282 सदस्य थे।

कांग्रेस की सीटें घटकर 44 रह गई थी।

दरअसल चंदा देने वाली हस्तियां विभिन्न दलों की राजनीतिक ताकत के अनुपात में ही चंदा देती हैं।

यह सिलसिला दशकों से चला आ रहा है।

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 भूली-बिसरी याद

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   इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जगमोहनलाल सिन्हा का नाम कौन नहीं जानता ?

किंतु यह बात कम ही लोग जानते हैं कि वे

 गरिमा,निष्पक्षता और निर्भीकता के प्रतीक थे।

उन्होंने 1975 में जब प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की लोक सभा सदस्यता रद की तो वे चर्चित हो गए।

मुकदमे की सुनवाई के दौरान इंदिरा गांधी न्यायालय में हाजिर हुई थीं।उस वक्त भी न्यायाधीश सिन्हा ने न सिर्फ न्यायालय कक्ष की गरिमा बनाए रखी बल्कि अपनी और प्रधान मंत्री की भी।प्रधान मंत्री को कुर्सी दी गई थी।

जगमोहन लाल सिंहा सन् 1982 में रिटायर हुए।

सन 2008 में उनका निधन हो गया।अवकाश ग्रहण करने के बाद उन्होेंने कोई पद स्वीकार ही नहीं किया।

 यहां तक सन 1977 की मोरारजी सरकार के विधि मंत्री उनका हिमाचल प्रदेश तबादला करना चाहते थे ताकि सिन्हा साहब मुख्य न्यायाधीश बन सकें।

क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश बनने की उनके लिए कोई गुंजाइश नहीं थी।

किंतु सिन्हा ने तबादला स्वीकार नहीं किया।

चर्चा थी कि उन्हें राज्यपाल पद का आॅफर दिया गया था।उस पर उनकी प्रतिक्रिया थी कि किताबें पढ़ने और अपनी बागवानी में बढ़ते हुए पौधों को देखने में जो सुख मिलता है,वह किसी अन्य काम में नहीं मिलेगा।यानी, जज हो तो जगमोहन लाल सिन्हा जैसा। 

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और अंत में

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राजनीतिक क्षेत्र में पक्ष-विपक्ष के बीच जारी कटु 

संवादों को देख-सुनकर बशीर बद्र की यह रचना

एक बार फिर पेश करना जरूरी लगता है।

‘दुश्मनी जम कर करो लेकिन इतनी गुंजाइश रहे, 

जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।’

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‘कानोंकान’

प्रभात खबर

पटना

2 जनवरी 23