सोमवार, 10 जून 2024

 इंडिया गठबंधन को सत्ता में आने से रोककर

यह देश भारी विपत्ति से बच गया !

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‘‘सी.बी.आई.-इ.डी. बंद होने चाहिए’’

----सपा नेता अखिलेश यादव

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इंडियन एक्सप्रेस --क्या इंडिया गठबंधन की सरकार दूरगामी परिणाम वाला ऐसा कदम उठाएगी ?

अखिलेश यादव--यह मेरा प्रस्ताव है।मैं इंडिया गठबंधन के समक्ष रखूंगा।

----इंडियन एक्सप्रेस -19 मई 2024

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सुरेंद्र किशोर

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कल्पना कीजिए कि गत लोक सभा चुनाव के बाद देश में ‘‘इंडिया गठबंधन’’ की सरकार बन गयी होती !

फिर क्या होता ?

सपा नेता अखिलेश यादव सी.बी.आई.-ई.डी.की समाप्ति का प्रस्ताव गठबंधन सरकार के सामने रखते।

सी.बी.आई.-ई.डी.से परेशान नेताओं से भरे इंडिया गठबंधन

का नेतृत्व सपा नेता के इस प्रस्ताव को मंजूर करता या नामंजूर ?

कांग्रेस के पिछले इतिहास को ध्यान में रखें तो यह कहा जा सकता है कि मंजूर कर लेता।चाहे बाद में उसका जो नतीजा होता।

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सी.बी.आई.--ई.डी.की अनुपस्थिति में इस देश के घोटालेबाज लोग सार्वजनिक संपत्ति के साथ कैसा सलूक करते ?

अब तक कैसा सलूक करते रहे हैं ?

जिन नेताओं पर सी.बी.आई.-ई.डी.घोटाले के मुकदमे चला रहे हैं , उन घोटालेबाजोें को अदालतंे आम तौर पर कोई राहत नहीं दे रही है।क्योंकि सबूत ठोस हैं।

वैसे भी कांग्रेस का तो अदालतों को भी निष्क्रिय कर देने का इतिहास है। 

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अखिलेश यादव की उपर्युक्त टिप्पणी 19 मई 2024 के अखबार में छपी थी।

यानी, अखिलेश यादव की मंशा जान लेने के बावजूद उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के एक बड़े हिस्से ने सपा को भारी विजय दिलाई।

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शुक्र है कि राजग को बहुमत मिल गया और मोदी प्रधान मंत्री बन गये।

 नहीं बने होते तो कल्पना कीजिए इंडिया गठबंधन वाले नेता लोग इस देश के साथ कैसा सलूक करते ?!

यानी, यह देश भारी विपत्ति से फिलहाल बच गया।

वैसे बिल्ली अब भी दरवाजे के पास छिपकर घर वालों के लापारवाह होने की प्रतीक्षा कर रही है ताकि दूध पी सके।

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सिर्फ दो नमूने

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आपातकाल में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने एक विधेयक तैयार किया था।उसमें यह प्रावधान किया गया था कि प्रधान मंत्री और लोक सभा के स्पीकर के खिलाफ सामान्य अदालतों में मुकदमा नहीं चलेगा।

उसके लिए ़िट्रब्यूनल बनेगा।उसे संसद से पास करवाना था।पर,बाद में कुछ कारणवश विचार बदल गया और उसे पास नहीं करवाया गया।

पर मानसिकता तो देखिए। 

यू.पी.में जब सपा की सरकार थी तो उसने उन जेहादियों के खिलाफ जारी मुकदमों को उठा लिया था जिन पर धारावाहिक विस्फोट करके अनेक लोगों की हत्या करने का आरोप था।यह और बात है कि हाईकोर्ट ने सपा सरकार के उस आदेश का खारिज करके मुकदमा चलवाया और कई जेहादियों को फांसी की सजा हुई।

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 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चुनाव कानून की दो धाराओं के उलंघन के आरोप में इंदिरा गांधी की लोक सभा की सदस्यता 12 जून 1975 को रद कर दी।

उसके बाद इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा दी।देश को खुले जेलखाने में बदल दिया।

शीर्ष अदालत तक को पालतू बना लिया गया।

जन प्रतिनिधित्व कानून की उन धाराओं को संसद से बदलवा  दिया गया जिनके उलंघन के आरोप में इंदिरा गंांधी की सदस्यता गयी थी।उस संशोधन को पिछली तारीख से लागू करा दिया।डरे हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन संशोधनों को मान लिया।आम तौर से कानून पिछली तारीख से लागू नहीं किये जाते।

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10 जून 24 



 संकेत हैं कि नरेंद्र मोदी प्रतिपक्षी नेताओं के खिलाफ जारी मुकदमों में कोई राहत देंगे नहीं।

फिर सत्ता और प्रतिपक्ष में सामान्य सबंध 

का सवाल ही नहीं उठता !

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सुरेंद्र किशोर

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नई सरकार के गठन के बाद यह  

सवाल उठ रहा है कि नरेंद्र मोदी के अगले कार्यकाल (2024-29)में प्रतिपक्ष से सत्ता पक्ष का संबंध सामान्य हो पाएगा या नहीं ?

   मुझे तो इसकी कोई उम्मीद नहीं लगती।

संकेत हैं कि

पहले की ही तरह प्रतिपक्ष संसद को चलने नहीं देगा।

संसद के बाहर कुछ प्रतिपक्षी नेतागण 

अपमानजनक बयानबाजियां करते रहेंगे।

साथ ही, मानहानि के मुकदमे भी झेलते रहेंगे।

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कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से प्रतिपक्ष का संबंध सामान्य क्यों और कैसे रहा था ?

मेरा जवाब है कि मोदी, अटल जी जितना ‘‘उदार’’ नहीं हैं।

क्योंकि वैसी उदारता पार्टी की छवि खराब करती है।

अटल जी ने नेहरू-गांधी परिवार को लाभ पहुंचाने के लिए चर्चित बोफोर्स मुकदमे को 2004 में एक तरह से दफना दिया था।

नरेंद्र मोदी सरकार अभी चल रहे किसी भी केस में प्रतिपक्ष की कोई मदद नहीं करेगी।फिर सामान्य संबंध कैसे कायम होगा ?

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सन 2004 में दिल्ली हाईकोर्ट ने बोफोर्स से संबंधित केस को समाप्त कर देने का आदेश दे दिया था।

   हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सी.बी.आई. ने सुप्रीम कोर्ट मंे अपील तक नहीं की।

ऐसा उच्चस्तरीय संकेत 

 पर हुआ।तब अटल जी प्रधान मंत्री थे।

 4 फरवरी 2004 के हाईकोर्ट के उस अदालती निर्णय के खिलाफ अपील की अनुमति अटल सरकार ने सी.बी.आई.को नहीं दी।

  उसके बाद 22 मई 2004 को केंद्र में मन मोहन सिंह की सरकार गठित हो गयी।फिर तो अपील का सवाल ही नहीं उठता था।

अब समझ में आया कि प्रतिपक्ष अटल जी की तारीफ इन दिनों कुछ अधिक ही क्यों करता है ?

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8 जून 24


 पद ठुकराना और स्वीकारना 

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सुरेंद्र किशोर

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एन.सी.पी. नेता प्रफुल्ल पटेल ने राज्य मंत्री पद अस्वीकार कर दिया।

खैर, उनकी मर्जी !!

पर,बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री चंद्रशेखर सिंह जब केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हुए तो उन्हें वहां राज्य मंत्री का ही दर्जा मिला था।

  हालांकि अस्सी के दशक में राज्य मंत्री का पद ठुकराते हुए भागवत झा आजाद राष्ट्रपति भवन से शपथ ग्रहण समारोह छोड़कर पैदल ही आवास लौट आये थे।

नब्बे के दशक में संयुक्त मोर्चा के सारे नेता वी.पी.सिंह के ड्राइंग रूम में बैठे रह गये,राजा साहब अपने घर के पिछले दरवाजे से निकल गये।

उन्हें एक बार फिर प्रधान मंत्री बनाने के लिए नेतागण उनके आवास गये थे।

  संयुक्त मोर्चा ने प्रधान मंत्री पद के लिए ज्योति बसु का नाम तय कर दिया था।पर सी.पी.एम.के पाॅलिट ब्यूरो ने उन्हें यह पद नहीं लेने दिया।

सी.पी.एम.के एक बड़े नेता ने बताया था कि ई,एम.एस.नम्बूदरीपाद आम तौर पर पाॅलिट ब्यूरो की बैठक में शामिल नहीं होते थे।पर ज्योति बसु को पी.एम.बनने से रोकने के लिए वे भी उस बैठक में शामिल हुए।

पर जब सोमनाथ चटर्जी को लोक सभा का स्पीकर बनाना हुआ तो पाॅलिट ब्यूरो ने विरोध नहीं किया।

बाद में ज्योति बसु ने कहा कि मुझे अवसर न देकर पार्टी ने गलती की थी।

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सत्तर के दशक में दारोगा प्रसाद राय और केदार पांडेय बारी- बारी से बिहार के मुख्य मंत्री रह चुके थे।पर बाद की कांग्रेसी सरकार के राज्य मंत्रिंडल में वे दोनों शामिल हुए।कैबिनेट मंत्री बने।

किसी ने दारोगा बाबू से पूछा,ऐसा आपने क्यों किया।

उन्होंने विनोद के लहजे से कहा ,मान लीजिए कि मुझे दिल्ली तुरंत जाना जरूरी है।मेल या एक्सप्रेस ट्रेन उपलब्ध नहीं है।तो क्या मैं पेसेंजर ट्रेन नहीं चला जाऊंगा ?

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और अंत में

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जदयू महा सचिव के.सी.त्यागी ने कहा है कि नीतीश कुमार को पी.एम.पद का आॅफर मिला था।ठुकरा दिया।

कांग्रेसी नेता ने इस दावे का खंडन किया है।

जदयू नेता संजय झा ने भी खंडन किया है।

 सवाल है कि जब ‘‘इंडिया’’ ब्लाॅक से नीतीश को उम्मीद थी,तब तो कांग्रेस ने उन्हें नेता नहीं बनाया।अब ‘‘कंगाल बैंक’’ का मैनेजर बनाने का आॅफर मिलने की बात हो रही है।

पहले भी नीतीश कुमार को उस पद की उम्मीद नहीं करनी चाहिए थी।

मद्रास के मुख्य मंत्री रहे के.कामराज की प्रतिष्ठा कई पूर्व प्रधान मंत्रियों से अधिक रही है।

मुख्य मंत्री पद से नीतीश को संतोष करना चाहिए।अब कानून-व्यवस्था ठीक करने व भ्रष्टाचार कम करने के काम पर ध्यान दें।ज्वलनशील तत्वों की बातों को नजरअंदाज करें तो नीतीश की छवि कुल मिलाकर अच्छी है सिर्फ दो ‘‘भटकावों’’ को छोड़कर।

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10 जून 24 


शनिवार, 8 जून 2024

 प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने 1969 में जब बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और प्रिवी पर्स समाप्त किया, तब उनकी पार्टी का लोक सभा में अपना बहुमत नहीं था

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सुरेंद्र किशोर

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 प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने 14 निजी 

बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया।

 पूर्व राजाओं के प्रिवी पर्स समाप्त कर दिए।

 तब उनकी पार्टी का लोकसभा में बहुमत नहीं था।कुछ अन्य दलों के सहारे वह सरकार चला रही थीं।

  दरअसल बड़े काम करने के लिए साहस और निष्ठा चाहिए।बहुमत तो जनहित के कामों से बढ़ता ही है। 

यह और बात है कि इंदिरा गांधी ने 1971 में

मिले पूर्ण बहुमत का सदुपयोग नहीं किया।

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   इन दिनों इस देश के महाभ्रष्ट लोगों और राष्ट्रद्रोहियों की बांछें खिली हुई हंै।

उन्हें लगता है कि अपना बहुमत न होने के कारण नरेंद्र मोदी, पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तरह समझौते करने को बाध्य होंगे।

  उन्हें यह भी लगता है कि उन्हें उससे राहत मिल जाएगी जिनके खिलाफ विभिन्न अदालतों में गंभीर आरोपों के तहत मुकदमे चल रहे हैं।

पर,मोदी सरकार की ओर से देश को यह संकेत मिल चुका है कि जोे काम पिछले 10 साल में हुए हैं, वह तो ट्रेलर मात्र था।

 पूरी फिल्म तो अब आने वाली है।

‘‘गरीबी हटाओ’’ के नाम पर इंदिरा गांधी की सरकार ने तब ऐसे कुछ अन्य काम भी किये थे।

और उससे मिली लोकप्रियता के आधार पर सन 1971 के लोक सभा चुनाव में उन्होंने पूर्ण बहुमत पा लिया था।यह और बात है कि तब इंदिरा ने देश को झांसा दिया था।देश की गरीबी मिटाने की जगह पुत्र के लिए मारूति कारखाना खेलवाने का फैसला किया।

  पर, नरेंद्र मोदी दूसरी ही मिट्टी के बने नेता लगते हैं।

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  अमरीकी समाजशास्त्री पाॅल आर. ब्रास ने सन् 1966 में ही यह लिख दिया था कि 

‘‘भारत में भीषण भ्रष्टाचार की शुरूआत आजादी के बाद के सत्ताधारी नेताओं ने ही कर दी थी।’’

पाॅल ने लिखा कि भ्रष्टाचार ऊपर से ही नीचे की ओर फैलाया गया।

 ब्रास ने उत्तर प्रदेश में रहकर भ्रष्टाचार की समस्या का गहन अध्ययन किया था।

  इस अध्ययन के बाद लिखी गयी  अपनी किताब ‘ फैक्सनल पाॅलिटिक्स इन एन इंडियन स्टेट: दी कांग्रेस पार्टी इन उत्तर प्रदेश ’ में वाशिंगटन विश्व विद्यालय के समाजशास्त्र के प्रोफेसर  ब्रास ने लिखा कि ‘कांग्रेसी मंत्रियों द्वारा अपने अनुचरों को आर्थिक लाभ द्वारा पुरस्कृत करना गुटबंदी को स्थायी बनाने का सबसे सबल साधन है।’ अपने शोध कार्य के सिलसिले में ब्रास ने उत्तर प्रदेश के दो सौ कांग्रेसी और गैर कांग्रेसी नेताओं और पत्रकारों से लंबी बातचीत की थी।

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यह सब जान-समझ कर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ ऊपर से कार्रवाई शुरू कर दी है।

अगले कार्यकाल में उन कार्रवाइयों को उनकी तार्किक परिणति तक पहुंचाना है।

यदि इस काम में मौजूदा सहयोगी दलों ने कोई बाधा पहुंचाई ,जिसकी उम्मीद नहीं है,तो उन्हें उसी तरह अगले चुनाव में नुकसान होगा जिस तरह का हश्र 1971 के चुनाव के बाद कुछ इंदिरा विरोधी दलों का हुआ था।

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और अंत में

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आज भी भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे की ओर जा रहा है।यानी ऊपर से प्ररित हो रहा है।

प्रधान मंत्री आॅफिस और केंद्रीय मंत्रिमंडल से तो इस काम के लिए नीचे प्रेरणा नहीं मिल रही है।

फिर कहां से मिली रही है ?

जांच कीजिए --क्या सांसद फंड की कमीशनखोरी से तो नहीं मिल रही है ?

अत्यंत थोड़े से अपवादों को छोड़कर सांसद फंड में खुलकर भारी कमीशनखोरी हो रही है।यह बात गांव -गांव के लोग जानते हैं।या तो सांसद फंड बंद करो या कमीशनखोरी।

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8 जून 24


शुक्रवार, 7 जून 2024

 जो इतिहास से नहीं सीखता,वह 

उसे दोहराने को अभिशप्त होता है।

क्या भारत एक बार फिर गुलामी के अपने 

इतिहास को दोहराने के कगार पर है ?

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दृश्य--1

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मध्य युग में जब मुस्लिम आक्रंाता इस देश को रौंद रहे थे तो मान सिंह जैसे शासक उसके पक्ष से खड़े थे।

(अपने परिवार की महिला के पृथ्वीराज चैहान द्वारा अपहरण के कारण)  

जयचंद जैसे शासक निष्क्रिय हो गये थे।

 महाराणा प्रताप जैसे देशभक्त अकबर का मुकाबला कर रहे थे।

(क्या आप आज यह नहीं देख पा रहे हैं कि राष्ट्रीय एकता-संप्रभुता पर आए खतरे के खिलाफ कुछ लोग तो लड़ रहे है।

कुछ अन्य लोग निष्क्रिय हैं और अन्य अनेक सत्तालोलुप लोग वोट बैंक के लिए राष्ट्र पर गंभीर खतरा पैदा कर रहे लोगों ं के साथ एकजुट हैं ?)

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इतिहास बताता है कि चितौड़ विजय के बाद तथाकथित अकबर महान ने 30 हजार हिन्दुओं को काट डाला।

हजारों स्त्रियों व बच्चियों ने बलात्कार से बचने के लिए अपने शरीर का जला (जौहर किया)लिया।

उस जीत पर अकबर ने कहा था कि ‘‘यह इस्लाम की जीत है।’’

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इसके बावजूद अस्सी के दशक में तब की केंद्रीय सरकार ने अकबर महान के सम्मान व गुणगान में सरकारी खर्चे पर राष्ट्रीय स्तर पर समारोह शुरू किया था।पर,दक्षिण भारत के विरोध के कारण उस समारोह को बीच में ही रोक देना पड़ा।

2006 में द इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस ने केंद्र सरकार को एक प्रस्ताव भेजा।प्रस्ताव था कि अकबर की 400 वां मृत्यु दिवस मनाया जाये।यह जानकारी सरकार ने राज्य सभा में दी थी।

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क्या आजादी के बाद नेहरू सरकार ने कभी महाराणा प्रताप या छत्रपति शिवाजी को इस तरह याद किया था ?

नहीं बल्कि ऐसा करने की मनाही की थी।

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    दृश्य--2

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उदारवादी ब्रिटिश इतिहासकार सर जे.आर.सिली (1834-1895)ने लिखा है कि ब्रिटिशर्स ने भारत को कैसे जीता।

मशहूर किताब ‘द एक्सपेंसन आॅफ इंगलैंड’ के लेखक सिली  की स्थापना थी कि 

‘‘हमने (यानी अंग्रेजों ने) नहीं जीता,बल्कि खुद भारतीयों ने ही भारत को जीत कर हमारे प्लेट पर रख दिया।’’

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मध्य युग में भी वीरता की कमी के कारण हम नहीं हारे।

बल्कि आधुनिक हथियारों की कमी और आपसी फूट के कारण हारे।याद रहे कि बाबर के पास तोपें थीं और राणा सांगा के पास तलवारें।

हमारे राजा अपने विदेशी दुश्मन की माफी को बार-बार स्वीकार कर उसे बख्श देते थे।

  पर, दुश्मन हमें एक बार भी नहीं बख्शता था।

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आजादी के तत्काल बाद के हमारे एकांगी ‘सेक्युलर’ हुक्मरानों ने यह सुनिश्चित किया कि ऐसा इतिहास लिखवाया जाए जिसमें हमारे देश के शूरमाओं के शौर्य और वीरता की चर्चा तक नहीं हो।

वे इस काम में सफल रहे।

उनका तर्क था कि इससे हिन्दुत्व पनपेगा।

यानी, उनकी मंशा थी कि भले दूसरा धर्म पनप जाए, किंतु हिन्दुत्व न पनपे।

यही थी अपने वोट बैंक की रक्षा की उनकी रणनीति।

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  दृश्य--3

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आज की स्थिति क्या है ?

आज इस देश में पाॅपुलर फं्रट आॅफ इंडिया नामक हथियारबंद जेहादी संगठन अति सक्रिय है जिसने अपने साहित्य (फुलवारीशरीफ,पटना में हुई छापामारी में वह साहित्य बरामद हुआ।)

में लिखा है कि हम हथियारों के बल सन 2047 तक भारत को इस्लामिक देश बना देंगे।

हालांकि उसने कहा है कि यदि इस देश के मुसलमानों में से 10 प्रतिशत लोग भी हमारे साथ हो जाएं तो हम जल्द ही सफल हो जाएंगे।

यानी, भारत के 90 प्रतिशत मुसलमान उसके साथ हथियारबंद होने को तैयार नहीं है।यह देश के लिए शुभ लक्षण है।

पर,इन दिनों अधिकतर मुस्लिम मतदातागण पी.एफ.आई.-एस.डी.पी.आई. के इशारे पर ही कुछ खास राजनीतिक दलों खासकर कांग्रेस को वोट दे रहे हैं।इस लोक सभा चुनाव में तो  यह बड़े पैमाने पर हुआ है।बसपा को इस बार मुस्लिम वोट एकदम नहीं मिला।

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  उसी वोट बैंक के लोभ में अधिकतर तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक दलों के नेताओं में से किसी के मुंह से पी.एफ.आई.के खिलाफ कभी एक शब्द का बयान भी आप न सुनेंगे और देखेंगे।

इससे उल्टी बात हो रही है।

जो दल,नेता या बुद्धिजीवी पी.एफ.आई.के एजेंडे की जानकारी लोगों को देते हैं,उनके बारे में कांग्रेस तथा कुछ अन्य दल व सेक्युलर बुद्धिजीवी  कहते हैं कि वे देश में नफरत फैला रहे हैं।

ऐसा सिर्फ भारत में ही संभव है।

इसीलिए तो यह देश सैकड़ों साल तक गुलाम रहा।

यह सब देख-जान-सुन कर आपको अब इस बात का अफसोस नहीं होना चाहिए कि आप मध्ययुग में पैदा नहीं हुए थे।

 वही सारे दृश्य दोहराए जा रहे हंै जो हमने किताबों में पढ़े हैं या दंतकथाओं में सुने हैं।

यदि पी.एफ.आई.सन 2047 में सफल हो गया तो गैर मुस्लिमों के लिए वह गुलामी ही तो होगी !!

जिन्हें स्थिति की गंभीरता को समझना हो वे समय रहते समझ जाएं अन्यथा--

तब पछताए होत का जब चिड़िया चुग जाए खेत !!!!

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7 जून 24


गुरुवार, 6 जून 2024

    ं

मोदित्व बचा रहेगा तो सत्ता फिर मिल सकती है। 

पर, यदि तात्कालिक गद्दी मोह के लिए मोदित्व से समझौता कर लिया तो फिर सत्ता

मिलने में काफी दिक्कत होगी।

सुरेंद्र किशोर

6 जून 24

  


रविवार, 2 जून 2024

 मेरी तस्वीर लगाकर जाली प्रोफाइल से कोई व्यक्ति लोगों के फेसबुक वाॅल पर मेरी तरफ से फंे्रड रिक्वेस्ट भेज रहा है।

कृपया उसे नजरअंदाज कर दीजिएगा।मित्र रत्नेश सिंह ने मुझे यह जानकारी दी है। 

मैं फंे्रड रिक्वेस्ट नहीं भेजता क्योंकि मेरा कोटा फुल हो चुका है।

----सुरेंद्र किशोर