शनिवार, 3 अगस्त 2024

 


मोदी या शाह किसी को जेल नहीं भेज सकते।

जेल भेजती हैं अदालतें !

इन दिनों के राजनीतिक विमर्श में

यह तथ्य ओझल है।

---------------------

सुरेंद्र किशोर 

--------------

4 अक्तूबर, 1977 को सी.बी.आई.ने गिरफ्तार पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को दिल्ली के एडीशनल चीफ मेट्रोपाॅलिटन मजिस्ट्रेट आर.दयाल की अदालत में पेश किया।

 कोर्ट ने अभियोजन पक्ष से पूछा --‘‘सबूत कहां है ?’’

सी.बी.आई. के वकील ने कहा --‘‘एकत्र किया जा रहा है।’’

आर.दयाल ने श्रीमती गांधी को तुरंत बिना शर्त रिहा कर देने का आदेश दे दिया।

----------------

गिरफ्तार इंदिरा गांधी के खिलाफ जब सी.बी.आई.(पहली नजर में सही लगने लायक )कोई सबूत पेश नहीं कर सकी तो अदालत ने उन्हें तुरंत बिना शर्त रिहा कर देने का आदेश दे दिया था।

-----------------

यदि आपके खिलाफ भी कोई सबूत नहीं है तो अदालत 

आपको पहले ही दिन रिहा कर देगी जिस तरह इंदिरा गांधी को रिहा कर दिया था।

यहां मैं यह नहीं कह रहा हूं कि इंदिरा गांधी निर्दोष थीं।उनके मामले में हुआ यह था कि ऊपरी निदेश पर सी.बी.आई.इंदिरा गांधी को जल्द से जल्द जेल भिजवाना चाहती थी। 

---------------

इसके विपरीत आज जैसे ही किसी नेता को अदालत जेल भेजती है,

प्रतिपक्षी दल आरोप लगाने लगते हंै कि मोदी-शाह ने बदले की भावना से जेल भेज दिया।

जबकि इंदिरा गांधी वाला उदाहरण सामने है।

  अदालत भी तभी किसी को जेल भेजती है, जब अभियोजन प़क्ष यानी पुलिस,सी.बी.आई.,ई.डी.या कोई अन्य एजेंसी प्रथम द्रष्ट्वा कुछ सबूत आरोपी के साथ-साथ कोर्ट में तत्काल पेश कर देती है।

  यानी,जांच एजेंसी किसी को गिरफ्तार करके सिर्फ कोर्ट में पेश कर सकती हैं,पर खुद जेल नहीं भेज सकती भले ऊपरी आदेश हो।

--------------

इस कानूनी प्रक्रिया की मौजूदगी के बावजूद यदि कोई नेता सार्वजनिक तौर पर यह आरोप लगाता है कि सरकार ने जांच एजेंसी का इस्तेमाल करके फलां नेता को गलत तरीके से बदले की भावना से जेल भेज दिया तो आप क्या कहेंगे ?

क्या वैसा कहना अदालत की अवमानना नहीं है ?

क्या अदालत की मंशा पर सवाल उठाना नहीं है ?

क्या यह कहा जा रहा है कि अदालत ने सरकार के साथ मिलकर गैरकानूनी तरीके से आरोपी के खिलाफ षड्यंत्र किया जबकि उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं थे ?

  इसको लेकर अदालत की मानहानि का मुकदमा चल सकता है या नहीं, इस बारे में कानून विद् यहां इस मंच पर अपनी राय दे सकते हैं।

-------------- 

3 अगस्त 24 


मंगलवार, 30 जुलाई 2024

 मोदी के तीसरी बार सत्ता में आ जाने के बाद 

भ्रष्ट और राष्ट्रद्रोही तत्व जरूर अब ‘‘भय के 

चक्रव्यूह’’ में फंस गये हैं।

--------------

वैसे यह ढीली-ढाली मोदी सरकार उनके खिलाफ कितना कठोर और कारगर शिकंजा कसने के उपाय कर पाएगी,यह तो अगले कुछ महीनों में ही पता चल पाएगा।

कहते हैं कि --‘‘उम्मीद पर दुनिया जिन्दा है।’’

--------------------

सुरेंद्र किशोर

-------------

लोक सभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी (कांग्रेस)ने कल सदन में कहा कि 

‘‘देश भय के चक्रव्यूह में फंस गया है।’’

क्या यह आरोप सही है ?

इसके जवाब में अलग -अलग तरह के लोग अलग -अलग तरह से चर्चा करेंगे।करने दीजिए।उनसे मुझे कोई एतराज नहीं।

-----------

पर,इस देश के लोगों का  एक हिस्सा ऐसा भी है जिसका मानना है कि मुख्यतः दो ही तरह के लोग अब कुछ अधिक ही भयभीत हो उठे हंै।

 क्योंकि उन्हें अब ‘‘माफी’’ की उम्मीद नहीं।

गत लोक सभा चुनाव के बाद वे कुछ अधिक ही भयभीत हो उठे हैं।

क्योंकि उन तत्वों को यह उम्मीद ही नहीं थी कि नरेंद्र मोदी तीसरी बार भी सत्ता में आ जाएंगे।

क्योंकि मोदी विरोधी देसी-विदेशी शक्तियों ने खास कर अरबपति जार्ज सोरेस ने पिछले लोक सभा चुनाव में अपनी ओर से यह पक्का ‘‘इंतजाम’’ कर दिया था कि मोदी सत्ता में न आ पायें।

ताकि, इस देश की बड़ी -बड़ी हस्तियों के खिलाफ गंभीर आरोप में जो मुकदमे चल रहे हैं,उन्हें रफा दफा किया जा सके।

साथ ही, एक अन्य तरह के तत्व यह उम्मीद कर रहे थे कि मोदी के सत्ता में न आने के बाद उनका धार्मिक लक्ष्य 2047 तक पूरा हो ही जाएगा।

ऐसे दो तत्वों का भयभीत होना स्वाभाविक ही है। 

---------------

अन्य कौन से अन्य तत्व कितना भयभीत हैं,यह तो आने वाले दिन ही बताएंगे।

लेकिन वे सांसद जरूर भयभीत लग रहे हैं जो संसद की कार्य संचालन नियमावली से काफी अलग हट कर सदन में अंट -शंट बके जा रहे हैं।

 इस क्रम में न तो वे स्पीकर की गरिमा का ध्यान रख रहे हैं और न ही खुद उन्हें इस बात का अंदाज  है कि वे क्या बोलना चाहते हैं और क्या बोल रहे हैं।

सदन का इतना अवमूल्यन इससे पहले कभी नहीं हुआ था।

आश्चर्य है कि प्रधान मंत्री और स्पीकर यह सब होने दे रहे हैं।

--------------------

यदि अवमूल्यन इसी रफ्तार से जारी रहा तो जनता राष्ट्र कवि रामधारी सिंह ‘‘दिनकर’’ की कविता को याद करके एक दिन सभी पक्षों को कोसेगी जो आज सदन के सदस्य हैं।ं

वह कविता है--

‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,

जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध ।’

------------------

30 जुलाई 24




 


शनिवार, 27 जुलाई 2024

 अमेरिका इजरायल से कह रहा है कि युद्ध बंद करो।

फिर भी इजरायल बंद नहीं कर रहा है।

क्योंकि इजरायल के प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू यह जान गये हैं कि यदि 

इजरायल, हमास को खत्म नहीं करेगा तो

एक दिन हमास, इजरायल को खत्म कर देगा।

..----------------

यूरोप के कुछ देशों जैसे ब्रिटेन,जर्मनी और फ्रांस में भी ऐसी ही स्थिति तैयार हो रही है।वहां जारी बम विस्फोटों व आगजनी-तोड़ फोड़ की ताजा घटनाओं से आप अनभिज्ञ नहीं होंगे,ऐसी उम्मीद है।वहां के अनेक मुस्लिम बहुल मुहल्लों से गैर मुस्लिम यानी मुख्यतः इसाइयों को भगाया जा रहा है।

पर,वे देश तो मानवाधिकार व शरणार्थियों के प्रति दया भाव वाले देश हंै।

इसलिए उनका भविष्य अनिश्चित है।

---------------

कमोबेश वही हाल भारत का है।

यहां जेहादी गण कुछ सेक्युलर दलों व ताकतों की मदद से इस देश में अपनी ताकत तेजी से बढ़ाते जा रहे हैं।

किसी दिन विस्फोटों की शुरूआत के लिए तैयार रहिए।

--------------

सुरेंद्र किशोर

27 जुलाई 24



बुधवार, 24 जुलाई 2024

 संसद में लगातार बवाल,हंगामे और अशिष्टता से 

राजनीति के प्रति नयी पीढ़ी की वितृष्णा बढ़ी

--------------------

संकेत हैं कि प्रतिपक्षी नेताओं के खिलाफ जारी 

भ्रष्टाचार के मुकदमों के निपटारे तक न तो सदन 

में शांति आएगी न ही सड़कों पर बवाल कम होगा

---------------------

सुरेंद्र किशोर

---------------------

प्रतिपक्षी दलों के नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों में जारी मुकदमे जब तक अपनी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच जाते,तब तक संसद और संसद के बाहर अभूतपूर्व हंगामे और बवाल होते रहेंगे।

 भारत की मौजूदा संसदीय प्रणाली और उसके बेतरतीब संचालन को लेकर पूरी दुनिया में लोग क्या सोचते होंगे,

उसकी जरा कल्पना कर देख लीजिए।

इस पर हमारी नयी पीढ़ी क्या सोच रही है,इस पर तो 

मीडिया को सर्वे कराना चाहिए।

----------------

इस विषम स्थिति में पीठासीन पदाधिकारियों और सत्ताधारी दलों की क्या जिम्मेदारी है ?

क्या वे संसद को हंगामा -सदन बनते देखते रहने के  

लिए अभिशप्त हैं ?

------------

कत्तई नहीं।

पीठासीन पदाधिकारियों के पास सदन की कार्य संचालन नियमावली की ताकत है।

उनके पास अखिल भारतीय पीठासीन पदाधिकारी सम्मेलनों की अनेक तत्संबंधी सिफारिशों का बल है।

भीतर मार्शल तैनात हैं और बाहर सी.आई.एस.एफ. के दस्ते संसद भवन की रखवाली कर रहे हैं।

-------------

मार्शलों को वेतन इसीलिए दिया जाता है ताकि 

जरूरत पड़ने पर उनसे काम भी लिया जाये।

यदि मोदी सरकार कहती है कि भ्रष्टाचारियों और देशद्रोहियों के प्रति शून्य सहनशीलता की हमारी नीति है तो रोज-रोज सदन की गरिमा नष्ट करने वालों के प्रति 

इतनी उदारता क्यों ?

नियम के खिलाफ आचरण करते पाए जाने पर सदस्यों को सदन से मार्शल के जरिए बाहर कीजिए।

दूसरे दिन यदि फिर वही सदस्य वैसा ही व्यवहार करता है तो उन्हें बाकी बैठकों से वंचित करिए।

--------------

पचास और साठ के दशकों में जिस गरिमापूर्ण ढंग से 

सदन की बैठकें हुआ करती थीं,उस गरिमा की पुनर्वापसी हो।

------------------

24 जुलाई 24 


  


शनिवार, 20 जुलाई 2024

 इन दिनों ब्रिटेन जल रहा हैं ।

उसे कौन जला रहा है ?

घुसपैठिए और शरणार्थीगण--

जिन्हें वहां के मिरजाफरों ने पाल-पोस कर मजबूत किया है।

उसी तरह की बारूद पर भारत भी बैठा है।

यहां भी वैसे ही संकेत समय-समय पर मिलते रहते हैं।लेकिन हमारी चमड़ी तो थोड़ी मोटी है।

ब्रिटेन तथा इसी तरह की यूरोप में हो रही और होने वाली घटनाओं पर नजर रखिए।

भारत पर भी आने वाले वैसे ही भीषण बल्कि उससे भी अधिक खतरनाक खतरों से बच सकते हो, बचने की कोशिश अभी से शुरू कर दो।अन्यथा.......????

----------------

सुरेंद्र किशोर

20 जुलाई 24


शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

 आवश्यकता आविष्कार की जननी 

------------------

अब हेलमेट सिर्फ पारदर्शी बनें।

हत्यारे,लुटेरे तथा अन्य तरह के अपराधी आम तौर अपारदर्शी हेलमेट पहनते हैं।

 सरकार को चाहिए कि वह हेलमेट निर्माताओं पर दबाव डालकर अब पारदर्शी हेलमेट का ही उत्पादन कराए।

इससे पुलिस का बोझ हल्का होगा।अपराध भी कम होंगे।

क्योंकि अनुसंधान कार्य आसान होगा।

-------------

आप कह सकते हैं कि पारदर्शी हेलमेट के पीछे चेहरे पर अपराधी फिर भी रुमाल बांध सकते हैं।

बांध सकते हैं।

किंतु उन्हें देखते ही पुलिस कौन कहे, राहगीर भी समझ जाएगा कि इनका इरादा बुरा है।

----------------

सुरेंद्र किशोर

14 जुलाई 24  


गुरुवार, 18 जुलाई 2024

 एक घटना के चलते मेरा सामान्य ज्ञान बढ़ा।

निजी क्षेत्र में सूद का रेट चल रहा है 4 प्रतिशत मासिक यानी 48 प्रतिशत सालाना।

  सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के सूद का रेट अधिकत्तम 10 या 11 प्रतिशत सालाना है।

एक तरफ 11 प्रतिशत सालाना तो दूसरी ओर 

 48 प्रतिशत सालाना।

-------------------

संदर्भ --बिहार के एक पूर्व मंत्री के सूदखोर

 पिता की निर्मम हत्या 

18 जुलाई 24