गुरुवार, 1 मई 2025

 इजरायल समझ गया है कि हमास का 

यदि खात्मा नहीं होगा तो एक दिन 

इजरायल का ही खात्मा हो जाएगा !

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समय आ गया है कि भारत भी समय रहते 

अपने लिए यही सबक ग्रहण कर ले 

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सुरेंद्र किशोर

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7 अक्तूबर, 2023 को हमास ने इजरायल के भीतर घुसकर हमला किया और करीब 12 सौ निर्दोष इजरायली और विदेशी नागरिकांे को मार डाला। 250 लोगों को बंधक बना लिया।

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यह हमला उसी तरह का था जिस तरह 26 नवंबर, 2008 को 

पाकिस्तानी जेहादी संगठन ने मुम्बई पर हमला करके 20 सुरक्षाकर्मियों सहित 174 भारतीयों और 26 विदेशियों को मार डाला। करीब 300 लोगों को घायल कर दिया।

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7 अक्तूबर, 23 की घटना पर इजरायल की प्रतिक्रिया--

इजरायल ने कठोर प्रति -प्रहार शुरू कर दिया जो अब भी जारी है।साथ ही, 

प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के आॅफिस ने अक्तूबर, 2023 में ही यह कह दिया कि हमास के पूरी तरह खात्मे के साथ ही 

हमारा हमला रुकेगा।रोकने के लिए इजरायल किसी देश की सलाह नहीं मान रहा है।

 इजरायल यह जानता है कि 

यदि उसने हमास तथा अन्य जेहादी तत्वों को माफ कर दिया तो एक दिन खुद इजरायल बर्बाद हो जाएगा।

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भारत की प्रतिक्रिया-

2008 में मनमोहन सिंह सरकार ने कोई प्रति-प्रहार नहीं किया।क्योंकि वैसा करने पर कांग्रेस को यह भय था कि 2009 के लोक सभा चुनाव में मुस्लिम वोट उसे नहीं मिलेंगे।

इतना नहीं ,कुछ कांग्रेस नेताओं ने उन हमलावर जेहादियों 

का बचाव भी किया।

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गत साल जब जेहादी तत्वों ने बांग्ला देश में तख्ता पलट किया तो कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद और मणी शंकर अय्यर ने कहा कि जो कुछ बांगला देश में हुआ है,वैसा भारत में भी हो सकता है।

देर से ही सही,पर पहलगाम में वैसी घटना हो ही गई।

इसी 22 अप्रैल को पहलगाम में जेहादियों ने हमला कर धर्म पूछ-पूछ कर 26 निरपराध हिन्दुओं को मार डाला।

इसी तरह की हिंसा के बल पर जेहादी लोेग पूरी दुनिया में इस्लामिक शासन कायम करना चाहते हैं।इसके लिए वे भारत सहित अनेक देशों में पूरी दुनिया में सक्रिय हैं।पर,भारत के तथाकथित सेक्युलरों के लिए यह कोई समस्या ही नहीं है।

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पर,इस बार भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है और कड़ा रुख अपनाया है।कदम भी उठाए हैं।

मोदी ने कहा है कि ‘‘आतंकियों की बची-खुची जमीन को भी मिट्टी में मिलाने का समय आ गया है।’’

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आर.एस.एस.प्रमुख मोहन भागवत ने भी 26 अप्रैल, 25 को कहा कि ‘‘राजा का कत्र्तव्य है प्रजा की रक्षा करना।’’

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पर,यह काम आसान नहीं है और न ही जल्द संपन्न हो जाने वाला काम है।

क्योंकि पाकिस्तान तथा दुनिया के जेहादियों के ,जिसमें भारत भी हैं,जीवन का एकमात्र लक्ष्य है दुनिया भर में इस्लाम का शासन कायम करना चाहे उसका जो भी नतीजा हो।

मध्य युग में भी मुगल आक्रांता भारत पहुंचकर अपने सैनिकों से कहते थे कि काफिरों से युद्ध करके शहीद होगे तो जन्नत में जाओगे।विजयी होगे तो राज करोगे।

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अब वैसे कुछ लोगों के बयान पढ़िए--

प्रतिबंधित जेहादी संगठन सिमी के अहमदाबाद जोनल सेके्रट्री साजिद मंसूरी ने कहा था कि भारत में जब भी हम सत्ता में आएंगे,मंदिरों को ध्वस्त कर देंगे और वहां मस्जिद बनाएंगे।

---टाइम्स आॅफ इंडिया--30 सितंबर 2001

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9 अप्रैल 2008 के हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार सिमी के संस्थापक सदस्य सफदर नागौरी ने

कहा था कि हमारा लक्ष्य जेहाद के जरिए भारत में इस्लामिक शासन कायम करने का है।

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सिमी ,इंडियन मुजाहिद्दीन तथा इसी तरह के कुछ अन्य जेहादी संगठनों ने मिलकर पाॅपुलर फंट्र आॅफ इंडिया बना लिया है।उसका राजनीतिक संगठन है--एस.डी.पी.आई.।

प्रतिबंधित पी.एफ.आई.कातिलों के अनेक हथियारबंद दस्ते तैयार कर रहा है।उसका लक्ष्य है--2047 तक भारत को इस्लामिक देश बना देने का।पी.एफ.आई.कहता है कि जिस दिन मुसलमानों में से दस प्रतिशत लोग भी हमारे साथ जुड़ जाएंगे,उस दिन हम अपना लक्ष्य पूरा कर लेंगे।(भारत के जो राजनीतिक दल,पत्रकार और बुद्धिजीवी पी.एफ.आई.के हिंसक कारनामों की आलोचना तक नहीं करते,वे आशंकित गृह युद्ध के समय किधर रहेंगे,उनके बारे में अनुमान अभी से लगा लीजिए।)

खबर है कि ऐसे ही संगठनों के बल पर राहुल-प्रियंका नायनाड (केरल)से चुनाव जीतते रहे हैं।क्या पी.एफ.आई.-एस.डी.पी.आई. के खिलाफ कभी किसी कांग्रेसी नेता का कोई बयान आपने कहीं पढ़ा या सुना है ?) 

  क्या हामिद अंसारी(पूर्व उप राष्ट्रपति व कांग्रेस नेता ) और कांग्रेस का सेक्युलरिज्म,पी.एफ.आई.के सेक्युलरिज्म से मेल खाता है ?

  यदि ऐसा नहीं है तो हामिद अंसारी पी.एफ.आई.की महिला शाखा के समारोह में शामिल होने के लिए 23 सितंबर, 2017 में कोझीकोड क्यों गए थे ?

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25 अप्रैल, 2025 को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने यह स्वीकार किया कि पश्चिमी देशों के लिए हम अपने यहां आतंकवादी संगठनों को समर्थन,प्रशिक्षण और वित्त पोषण करने का गंदा काम करते रहे हैं।

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17 जनवरी, 2023 को पाकिस्तान के प्रधान मंत्री शहबाज शरीफ ने कहा था कि भारत के साथ हम तीन युद्ध लड़े ।इससे हमें कंगाली मिली है।

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पहलगाम की घटना पर पाक प्रधान मंत्री शरीफ ने 26 अप्रैल 25 को कहा कि पहलगाम हमले की किसी भी तटस्थ और पारदर्शी जांच के लिए हम तैयार हैं।

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और अंत में 

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दरअसल किसी एक घटना की जांच व दोषियों की सजा दे देने से इस व्यापक समस्या का हल नहीं होगा।

पहले समस्या की जड़ तक पहुंचिए और उस समस्या का समाधान कीजिए,यदि हल चाहते हैं तो।

समस्या है--पाकिस्तान के मदरसों का पाठ्यक्रम।अनेक लोग बताते रहते हैं कि आपके मदरसे आतंक के कारखाने बन चुके हैं।

नतीजा यह है कि पाक की अधिकांश जनता आटा और जेहाद के बीच आटा नहीं बल्कि जेहाद का चयन करती है।

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यदि पाकिस्तान सचमुच शांति और सह अस्तित्व चाहता है तो अपने मदरसों के पाठ्यक्रमों के औचित्य और वास्तविकता की जांच दुनिया के कुछ तटस्थ शिक्षा विदों की टीम से कराए।यदि तटस्थ जांचकर्ता आपके मदरसों को आतंक की फैक्ट्री नहीं मानेंगे तो कोई बात नहीं।यदि मानेंगे तो उसमें परिवर्तन कीजिए।

अन्यथा आपकी बाकी बातों का कोई मतलब नहीं है।

पता नहीं आने वाले दिनों में न जाने कितने लोग मिट्टी में मिलेंगे !!

क्योंकि संकेत बताते रहे हैं कि बांग्लादेश व भारत की हाल की कुछ वीभत्स घटनाओं के कारण भारत के जन मानस में पविर्तन आ रहा है।

एक तरफा धर्मनिरपेक्षता और नकली समाजवाद की अफीम के नशे की आदत से भारत के अधिकतर लोग अब तेजी से बाहर निकलने लगे हैं।

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1 मई 25   




 


सोमवार, 28 अप्रैल 2025

 भारत अब अपना भविष्य चुन ले !

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इतिहास से सीखना है या मध्य 

युग का इतिहास दोहराना है ?

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सुरेंद्र किशोर

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1-श्रीराम ने आड़ में छिपकर बालि को मारा था।

यदि वे वैसा नहीं करते तो नतीजा क्या होता ?!

2.-कर्ण के रथ का पहिया जब जमीन में धंस गया था 

तो श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि यही मौका है ,अभी इसे मार दो।

यदि अर्जुन ने श्रीकृष्ण के आदेश का पालन नहीं किया होता तो क्या होता ?

3.- भीष्म और द्रोणाचार्य को कैसे मारा गया ?

यदि इन्हें नहीं मारा जाता तो क्या होता ?

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(लगता है कि मोसाद ने राम-कृष्ण की कहानियां पढ़ी होगी।इसीलिए अनेक दुर्दांत दुश्मनों के बावजूद इजरायल अब भी जिंदा है।लेकिन हम ही अपना इतिहास भूल गये। 

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नतीजतन

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गजनवी ने भारत पर जब आक्रमण किया तो उसने अपनी सेना के आगे गायों का झुंड तैनात कर दिया था।

हिन्दू सेना गोवध से मुकर गई।

फिर उसका नतीजा क्या हुआ ?

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पृथ्वीराज चैहान ने पहली बार जब गोरी को हराया तो गोरी माफी मांग कर छूट गया।

गोरी ने बाद मंे हमला कर के चैहान का सफाया कर दिया।उसकी सेना ने जयचंद और संयोगिता को भी नहीं बख्शा।

गोरी के यहां काफिरों के लिए माफी का कोई प्रावधान ही नहीं था।वैसे चैहान ने माफी मांगी भी नहीं थी।

यानी,पहली बार माफ कर देने का नतीजा क्या हुआ ?

सब जानते हंै।

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अब आज क्या होने वाला है--देखते जाइए-

हमारे हुक्मरान राम-कृष्ण की राह पर चलते हैं या

  गोरी-गजनी काल वाली ऐतिहासिक गलतियांें को दोहराते   हैं !

अमरीकी राजनीतिक वैज्ञानिक सैम्युअल पी. हंटिग्टन

(1927-2008) ने कहा था कि ‘‘शीत युद्धोत्तर संसार में लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान, संघर्षों का मुख्य कारण बनेगी।’’आज भारत ही नहीं बल्कि

दुनिया के बड़े हिस्से में हंटिंगटन की भविष्यवाणी चरितार्थ हो रही है।पर भारत के ‘‘हिन्दू नामधारी अर्ध जेहादी तत्व’’ यह प्रचार कर रहे हैं कि हिन्दुओं के अत्याचार के कारण ही यहां मुस्लिम आक्रामकता बढ़ी है।

 वे इस बात का जवाब नहीं देते थे कि चीन जैसे सेक्युलर देश में 2 करोड़ मुसलमान क्यों जेहाद पर उतारू हैं ?

मध्य युग में विदेशी मुस्लिम हमलवार कहां के हिन्दुओं के अत्याचार से पीड़ित होकर भारत आकर युद्ध करने लगे थे ?

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पुनश्चः

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फ्रांसिसी इतिहासकार बर्नियर ने लिखा है कि महाराजा जसवंत सिंह जब युद्ध में हार कर अपने किले के गेट पर वापस पहुंचे तो उनकी पत्नी ने किले का दरवाजा बंद करवा दिया।

उसने पति की हार से खुद को अपमानित महसूस किया था।

अपने राज घराने की परंपरा को ध्यान में रखते हुए वह चाहती थी कि पति या तो जीत कर आएं या युद्ध भूमि में ही शहीद हो जाएं।जसवंत सिंह लौटे और शहीद हो गये।संभवतः महारानी, मशहूर चित्तौड़ परिवार की बेटी थी। 

याद रहे कि चितौड़ राज घरानों की महिलाओं ने पराजय के बाद खुद को जला लिया था।

 क्योंकि उन्हें आशंका रहती थी कि वैसे आक्रांता मृत शरीर के साथ भी कुकृत्य कर सकते थे।ऐसा ही उनका इतिहास था।

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आज भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में जेहादी चरम  सक्रिय हैं।

सिर्फ इजरायल और चीन उन्हें माकूल जवाब दे रहे हंै।

आज भारत के सामने बहुत बड़ी समस्या है।वह यह कि भारत के भीतर धीरे-धीरे बाहरी-भीतरी जेहादियों के हाथों यह देश अपनी जमीन और आबादी खोता जाएं (मुर्शिदाबाद इसका ताजा उदाहरण है।)या ‘‘अब नहीं तो कभी नहीं’’ की रणनीति के तहत नौ-या छह कर लिया जाये।

  (मुख्य मंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अपने शासनकाल में कहा था कि राज्य के सात जिलों में सामान्य प्रशासन चलाना हमारे लिए मुश्किल हो गया है।ताजा खबर है कि अब उन जिलों की संख्या बढ़कर नौ हो गयी है।मुर्शिदाबाद वैसा ही एक जिला है।)

चीन के श्ंिागजियांग प्रांत के जेहादी उइगर मुसलमानों को सुधारने के लिए वहां की सरकार उन्हें अभूतपूर्व पीड़ा दे रही है।फिर भी उस पर कोई नहीं कह रहा है कि उइगर मुसलमान किसी अन्याय-अत्याचार से ऊब कर वहां विद्रोह पर उतारू हैं।सच तो यह है कि उन्हें भी पूरी दुनिया में इस्लाम का शासन चाहिए,इसीलिए वे वहां भी सक्रिय हैं।

पर,भारत मंे एक बहुत बड़ी गैर मुस्लिम जमात है जो हर जेहादी  हिंसा के लिए उल्टे हिन्दुओं को दोषी ठहरा देती है।

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और अंत में

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यदि पाकिस्तान ने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किया तो भारत को थोड़ा नुकसान जरूर होगा।पर उसकी प्रतिक्रिया में भारत क्या करेगा ?

चुप बैठेगा ?बिलकुल नहीं।

फिर पाकिस्तान का क्या होगा ?

(नोट-मुझे यह कड़ा पोस्ट क्यों लिखना पड़ा ?क्योंकि मुझे 

अपने वंशजों के भविष्य की चिंता है।साथ ही, मुझे कोई चुनाव तो लड़ना नहीं !

  मैं इतिहास का विद्यार्थी रहा हूं।साथ ही,उसके अलावा भी बहुत कुछ पढ़ता रहता हूं।पूरी दुनिया का दृश्य मेरी आंखों के सामने है।इसलिए मुझे जेहादियों की मानसिकता और उनके लक्ष्य का पूरा-पूरा पता है।)

भारत में आज यदि नरेंद्र मोदी का शासन नहीं होता तो न जाने कितने और मुर्शिदाबाद यहां अब तक बन गये होते।

न जाने कितने लाख लोगों का आंतरिक पलायन हो चुका होता।

ब्रिटेन के कमजोर शासन के कारण आज वहां के मोहल्ला दर मोहल्ला पर जेहादियों का कब्जा होता जा रहा है।ब्रिटेन के सात नगरों के मेयर अब मुस्लिम हैं।

ब्रिटेन की गैर मुस्लिम बच्चियों के साथ हो रहे कुकर्म की चिंता अमेरिका के एलन मस्क को करना पड़ रहा है,न कि मुस्लिम वोट लोलुप प्रधान मंत्री स्टार्मर को।

  जिस तरह भारत के राजाओं -बादशाहों के बीच डिवाइड एंड रूल करके भारत पर ब्रिटिशरों ने कब्जा किया था,

( ब्रिटिश इतिहासकार सर जे.आर.सिली ने यह बात अपनी किताब में दर्ज की है )उसका बदला घुसपैठ करके व शरणार्थी बन कर तथा लेबर पार्टी और कंजरवेटिव पार्टी के मतभेद का फायदा उठाकर बाहरी मुस्लिम लोग ब्रिटेन की राजनीति-सत्ता पर कब्जा करते जा रहे हैं।

भारत में भी लेबर और कंजरवेटिव की प्रतिमूर्ति मौजूद हैं जो वही काम यहां कर रहे हैं।ऐसे ही माहौल में श्रीकृण को गीता मंे अर्जुन से यह कहते पढ़ा जा सकता है-- हे अर्जुन युद्ध करो !

लखनऊ के अर्जुन ने कहा था--माफियाओं को मिट्टी में मिला दूंगा।काफी हद तक वह काम हो गया।

अब हस्तिानापुर का अर्जुन जेहादियों से कह रहा है--मिट्टी में मिला दूंगा।पता नहीं, इसे कार्य रूप कब दिया जाएगा ?

लोग कहते हैं बड़े अर्जुन पर भी भरोसा रखो।

अधीर मत बनो।

एक बार फिर कह दूं--मुझे अपने वंशजों की चिंता है।

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28 अपैल 25


रविवार, 27 अप्रैल 2025

 अपनी पहली पुस्तक पूरी कर लेेने के बाद अपनी 

संस्मरणात्मक(राजनीतिक जीवन और पत्रकारिता 

काल के संस्मरण) पुस्तक की तैयारी में लगा हूं।

उसकी एक झलक यहां पेश है--

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निर्भीक पत्रकारिता यानी तलवार 

की धार पर चलना

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सुरेंद्र किशोर

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बिहार से एक केंद्रीय मंत्री के बारे में मैंने कुछ लिखा था।

उन्हें बहुत खराब लगा।मेरी बात झूठी होती तो वे मानहानि का केस कर सकते थे।पर,उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाया।

उनके एक आदमी ने मुझे फोन किया और कहा--

‘‘जिस तरह हमने रियाज अजीमाबादी (ब्लिट्ज संवाददाताता)को रेप केस में फंसाया था,

तुम्हें भी फंसा दूंगा।’’

उसके बाद मेरी पत्नी को भी फोन किया।

कहा कि मुझे मालूम है कि आपके बच्चे कहां पढ़ने जाते हैं।आपको भी मैं उठवा लूंगा।

मेरी पत्नी बोल्ड है।बोली --गाड़ी लेकर आ जाइए,मैं तब तक तैयार हो जाती हूं।

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धमकियां तो हमें मिलती रहती थी,पर रेप की धमकी पर मैं सचमुच डर गया।

क्यांेकि रेप के आरोप को अधिकतर लोग सच मानने के लिए तैयार बैठे रहते हैं।

मैंने डी.जी.पी को पत्र लिखा।धमकी का पूरा विवरण लिखा।जांच और कार्रवाई की मांग की।

डी.जी.पी.ने कार्रवाई शुरू भी कर दी।आरोपी घबरा गया।

पुलिस से भागने लगा।

मुख्य मंत्री तक बात पहुंची।

मुख्य मंत्री ने डी.जी.पी.को समझा दिया--अरे, वह झूठ लिखता रहता है।

इस केस को खत्म कीजिए।

केस खत्म हो गया।मुख्य मंत्री मेरे स्वजातीय ही थे।

पर,उन्हें अपनी गद्दी प्यारी थी।

जाति और गद्दी में चुनना हो तो नेता क्या चुनेंगे ?

फिर पत्रकार क्या होता है ?

उसकी औकात ही क्या है ?

अस्सी के दशक  के एक मुख्य मंत्री पत्रकारों के बारे में कहा करते थे-‘‘दो कौड़ी के लोग !’’

मेरे मामले में भी एक वरीय पत्रकार के साथ हो रहे अपराध की चिंता मुख्य मंत्री को कत्तई नहीं थी।

क्योंकि वह केंद्रीय मंत्री प्रधान मंत्री का बहुत करीबी था।मुख्य मंत्री को लगा होगा कि 

वह मेरी कुर्सी हिला सकता है।

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27 अप्रैल 25

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पुनश्चः

बेचारा रियाज अजीमाबादी !

मेरा दोस्त भी था।अब इस दुनिया में नहीं रहा।

बाद में तो इंडियन एक्सप्रेस के पटना आॅफिस में सर्कुलेशन का काम देखता था।उन दिनों मैं जनसत्ता में था।

जब उस पर रेप केस हुआ होगा,तब उसके परिवार व खुद उसको कितनी पीड़ा हुई होगी ?

मुझसे उम्र में छोटा था।जब वह इस दुनिया से उठा तो उस समय उसकी उम्र बहुत नहीं थी।क्या रेप केस की पीड़ा ने भी उसकी आयु कम कर दी थी ?

पता नहीं।

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27 अपैल 25


 

 

 


शनिवार, 26 अप्रैल 2025

    पहलगाम के परिणाम !?

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भारतीय कश्मीर के कुछ जेहादियों में तो 

सुधार परिलक्षित,क्या पाक और उसके 

भारतीय पिट्ठू भी सुधरेंगे ?

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सुरेंद्र किशोर

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35 साल में पहली बार-पहलगाम आतंकी हमले के विरोध में जम्मू -कश्मीर में ऐतिहासिक बंद

    ----दैनिक भास्कर--24 अप्रैल 25

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पाक के रक्षा मंत्री ने स्वीकारा--दशकों से 

आतंकवाद को हम दे रहे हैं समर्थन

       --दैनिक जागरण--26 अपैल 25

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पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने यह भी कहा कि आतंकी संगठनों के पोषण और प्रशिक्षण का ‘गंदा काम’ 30 सालों से अमेरिका और पश्चिमी देशों के इशारे पर हमने 

किया है।

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पहलगाम के जेहादी कत्लेआम के बाद कुछ फर्क दिखाई 

पड़ने लगे हंै।क्या ये स्थायी भी साबित होंगे ?

 फर्क पर एक नजर

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1.-पाकिस्तान में पहले से उठने लगा था एक सवाल--

 आटा या जेहाद ?

2.-पाक को मिल रहे विदेशी पैसों के स्त्रोत सूखने लगे थे। 

3.-इधर जम्मू कश्मीर में मोदी सरकार के कारण राजनीतिक-प्रशासनिक स्थिति कुछ बदली है।

4.-कश्मीर में पत्थर चलाने वालों के लिए अब बाहरी पैसे 

उपलब्ध नहीं रहे।

 5.-जम्मू कश्मीर में अपेक्षाकृत शांति के कारण पर्यटकों की संख्या बढ़ी।पर्यटकों से इस राज्य को हर साल करीब 25 हजार करोड़ रुपए का राजस्व मिलने लगा।

लोगों की आय बढ़ी।

नतीजतन जम्मू कश्मीर के जेहादी तत्व कमजोर पड़ने लगे।

पर,बाहरी जेहादी फिर भी सक्रिय।कुछ भीतरी जेहादी भी।पर आम कामकाजी लोग बढ़ते पर्यटन उद्योग से खुश हैं।

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नतीजतन

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पहलगाम में हुए आतंकी हमले के विरोध में 35 साल में पहली बार जम्मू कश्मीर में ऐतिहासिक बंद रहा।यह एक सकारात्मक 

विकास है।

अधिकतर कश्मीरियों के इसी बदले हुए रुख को देखते हुए भारत के प्रतिपक्षी राजनीतिक दलों ने भी पहलगाम जेहादी हिंसा की निन्दा की।अन्यथा कुछ उल्टी सीधी बातें करते।

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नरेंद्र मोदी सरकार अब पाकिस्तान नामक मरीज का स्थायी इलाज करना चाहती है।यदि भारत सरकार ने देर-सवेर सिंधु नदी पर बांध का निर्माण कर पाकिस्तान को पानी के लिए बूंद- बूंद तरसा दिया तब क्या होगा ?

पाक ने धमकी दी कि वैसी स्थिति में युद्ध होगा (और हमारे पास परमाणु बम हंै।)

यदि पाक ने भारत पर बम गिराया तो भारत के कुछ इलाकों को जरूर  नुकसान पहुंच सकता है।पर उसके बाद ?

भारत पाक के साथ क्या करेगा ?

 अपने परमाणु बमों के जरिए पाक को दुनिया के नक्शे से भारत गायब कर सकता है।क्योंकि नरेंद्र मोदी और मन

मोहन सिंह की सरकारों में काफी फर्क है। 

26 नवंबर 2008 को मुम्बई में पाक आतंकियों ने हमला करके 174 लोगों को मार डाला था। करीब 300 लोगों को घायल कर दिया।उसके बावजूद तब की कांग्रेस सरकार ने पाक के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। क्योंकि उसे डर था कि वैसा कुछ करने पर आगामी लोक सभा चुनाव (2009)में कांग्रेस को मुस्लिम वोट नहीं मिलेंगे।

याद रहे कि मोदी सरकार को वैसी कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है।पहलगाम में 27 निर्दोष लोगों की कायरतापूर्वक निर्मम हत्या के बाद मोदी के रौद्र रुप और उनकी सरकार के ठोस कदमों से देश की आम जनता काफी खुश नजर आ रही है।

याद कीजिए। 2008 में जब बंबई में 174 लोगों को कसाब व कसाइयों ने मार डाला था तो उस समय तब के प्रधान मंत्री के चेहरे के कैसे हाव-भाव थे ?

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26 अपैल 25

 


मंगलवार, 22 अप्रैल 2025

 


वीर कंुवर सिंह विजयोत्सव दिवस(23 अप्रैल) 

की पूर्व संध्या पर

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स्वतंत्रता सेनानी पंडित सुंदरलाल की चर्चित पुस्तक ‘‘भारत में अंग्रेजी राज’’( द्वितीय खंड) पर आधारित इस प्रस्तुत विवरण में आप ही गिन लीजिए कि अंग्रेज,वीर कुंवर सिंह से कितनी बार हारे थे !

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सुरेंद्र किशोर

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पहले पढ़िए 23 अप्रैल के युद्ध में पराजित अंग्रेज सेना

के अफसर की रोमांचक व्यथा-कथा

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 उस अंग्रेज सैनिक अफसर के शब्दों में,

‘‘वास्तव में, इसके बाद जो कुछ हुआ,उसे लिखते हुए मुझे अत्यंत लज्जा आती है।

  लड़ाई का मैदान छोड़कर हमने जंगल में भागना शुरू किया।

शत्रु हमें बराबर पीछे से पीटता रहा।

हमारे सिपाही प्यास से मर रहे थे।

एक निकृष्ट गंदे छोेटे से पोखर को देखकर वे उसकी तरफ लपके।

 इतने में कुंवर सिंह के सवारों ने हमें पीछे से आ दबाया।

 इसके बाद हमारी जिल्लत की कोई हद न थी।

हमारी विपत्ति चरम सीमा को पहुंच गई।

हम में से किसी में शर्म तक न रही।

जहां जिसको कुशल दिखाई दी,वह उसी ओर भागा।

अफसरों की आज्ञाओं की किसी ने परवाह नहीं की।

व्यवस्था और कवायद का अंत हो गया।

चारों ओर आहों, श्रापों और रोने के सिवा कुछ सुनाई न देता था।

 मार्ग में अंग्रेजों के गिरोह के गिरोह मरे।

किसी को दवा मिल सकना असंभव था।

 क्योंकि हमारे अस्पतालों पर कुंवर सिंह ने पहले ही कब्जा कर लिया था।

 कुछ वहीं गिर कर मर गए ।

बाकी को शत्रु ने काट डाला।

हमारे कहार डोलियां रख -रख कर भाग गए।

सब घबराए हुए थे,सब डरे हुए थे।

सोलह हाथियों पर हमारे घायल साथी लदे हुए थे।

 स्वयं जनरल लीगै्रण्ड की छाती में एक गोली लगी और वह मर गया।

  हमारे सिपाही अपनी जान लेकर पांच मील से ऊपर दौड़ चुके थे।

उनमें अब बंदूक उठाने तक की शक्ति न रह गई थी।

 सिखों को वहां की धूप की आदत थी।

उन्होंने हमसे हथियार छीन लिए और हमसे आगे भाग गए।

गोरों का किसी ने साथ न दिया।

  199 गोरों में से 80 इस भयंकर संहार से जिन्दा बच सके।

हमारा इस जंगल में जाना ऐसा ही हुआ,जैसा पशुओं का कसाईखाने में जाना।

हम वहां केवल वध के लिए गए थे।’’

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इतिहास लेखक व्हाइट ने भी लिखा है कि 

‘‘इस अवसर पर अंग्रेजों ने पूरी और बुरी से बुरी हार खाई।’’

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  इससे पहले के युद्धों में अंग्रेजों 

  की लगातार पराजय के विवरण पेश है--

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ईस्ट इंडिया कंपनी की फौजें कई युद्धों में जिस भारतीय राजा से हार गयी थी ,उस राजा का नाम था बाबू वीर कुंवर सिंह।

वीर कुंवर सिंह की याद में बिहार में बड़े पैमाने पर 23 अप्रैल को विजयोत्सव मनाया जाता है।

बिहार के जगदीशपुर के कंुवर सिंह जब अंग्रेजों से लड़ रहे थे, तब उनकी उम्र 80 साल थी।

यह बात 1857 की है।

  याद रहे कि भोजपुर जिले के जगदीशपुर नामक पुरानी राजपूत रियासत के प्रधान  को सम्राट् शाहजहां ने राजा की उपाधि दी थी।

  मशहूर पुस्तक ‘‘भारत में अंग्रेजी राज’’के यशस्वी लेखक पंडित सुंदरलाल ने उन युद्धों का विस्तार से विवरण लिखा है।

  (अंग्रेजों के शासनकाल में ही यह पुस्तक लिखी गई थी।अंग्रेज सरकार ने इस किताब पर सन 1929 में प्रतिबंध लगा दिया था।गांधी जी की अपील पर 1937 में प्रतिबंध हटा दिया गया।मेरे पास उपलब्ध संस्करण को भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने प्रकाशित किया है।)

लेखक के अनुसार ‘जगदीश पुर के राजा कुंवर सिंह आसपास के इलाके में अत्यंत सर्वप्रिय थे।

 कुवंर सिंह बिहार के क्रांतिकारियों के प्रमुख नेता और सन 57 के सबसे ज्वलंत व्यक्तियों में थे।

  जिस समय दानापुर की क्रांतिकारी सेना जगदीशपुर पहुंची, बूढ़े कुंवर सिंह ने तुरंत अपने महल से निकल कर शस्त्र उठाकर इस सेना का नेतृत्व संभाला।

 कुंवर सिंह इस सेना सहित आरा पहुंचे।

 बिहार में 1857 का संगठन अवध और दिल्ली जैसा तो न था,फिर भी उस प्रांत में क्रांति के कई बड़े -बड़े केंद्र थे।

 पटना में जबर्दस्त केंद्र था जिसकी शाखाएं चारों ओर फैली  थीं।

पटना के क्रांतिकारियों के मुख्य नेता पीर अली को अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया।

 पीर अली की मृत्यु के बाद दानापुर की देशी पलटनों ने स्वाधीनता का एलान कर दिया।

ये पलटनें जगदीश पुर की ओर बढ़ीं।

बूढ़े कुंवर सिंह आरा पहुंचे।

उन्होंने आरा में अंग्रेजी खजाने पर कब्जा कर लिया।

जेलखाने के कैदी रिहा कर दिए गए।

अंग्रेजी दफ्तरों को गिराकर बराबर कर दिया गया।

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     आरा के बाग का संग्राम

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    29 जुलाई को दानापुर के कप्तान डनवर के अधीन करीब 300 गोरे सिपाही और 100 सिख सैनिक आरा की ओर मदद के लिए चले।

आरा के निकट एक आम का बाग था।कुंवर सिंह ने अपने कुछ आदमी आम के वृक्षों की टहनियों में छिपा रखे थे।

रात का समय था।

जिस समय सेना ठीक वृक्षों के नीचे पहुंची,अंधेरे में ऊपर से गोलियां बरसनी शुरू हो गयीं।

सुबह तक 415 सैनिकों में से सिर्फ 50 जिंदा बचकर दाना पुर लौटे।

डनवर भी मारा गया था।

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बीबी गंज का संग्राम

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इसके बाद मेजर आयर एक बड़ी सेना और तोपों सहित आरा किले में घिरे अंग्रेजों की सहायता के लिए बढ़ा।

2 अगस्त को आरा के बीबी गंज में आयर और कुंवर सिंह की सेनाओं के बीच संग्राम हुआ।

इस बार आयर विजयी हुआ।

उसने 14 अगस्त को जगदीश पुर के महल पर भी कब्जा कर लिया।

कुंवर सिंह 12 सौ सैनिकों व अपने महल की स्त्रियों को साथ लेकर जगदीश पुर से निकल गए।

उन्होंने दूसरे स्थान पर जाकर अंग्रेजों के साथ अपना बल आजमाने का निश्चय किया।

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   मिलमैन की पराजय

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  18 मार्च, 1858 को दूसरे क्रांतिकारियों के साथ कुंवर सिंह आजमगढ़ से 25 मील दूर अतरौलिया में डेरा डाला। 

मिलमैन के नेतृत्व में अंग्रेज सेना ने 22 मार्च 1858 को कुंवर सिंह से मुकाबला किया।मिलमैन हार कर भाग गया।

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    डेम्स की पराजय

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28 मार्च को कर्नल डेम्स के नेतृत्व में एक बड़ी सेना ने कुंवर सिंह पर हमला किया।

इस युद्ध में भी कुंवर सिंह विजयी रहे।

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   लार्ड केनिंग की घबराहट

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कुंवर सिंह ने आजमगढ़ पर कब्जा किया।

किले को दूसरों के लिए छोड़कर कुंवर सिंह बनारस की तरफ बढ़े।

लार्ड केनिंग उस समय इलाहाबाद में था।

इतिहासकार मालेसन लिखता है कि बनारस पर कुंवर सिंह की चढ़ाई की खबर सुन कर कैनिंग घबरा गया।

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लार्ड मार्क की पराजय

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  उन दिनों कंुवर सिंह जगदीश पुर से 100 मील दूर  बनारस के उत्तर थे।

लखनऊ से भागे कई क्रांतिकारी कुंवर सिंह की सेना में आ मिले।

लार्ड कैनिंग ने लार्ड मारकर को सेना और तोपों के साथ कुंवर ंिसंह से लड़ने के लिए भेजा।

6 अप्रैल को लार्ड मारकर की सेना और कुंवर सिंह की सेना में संग्राम हुआ।

किसी ने उस युद्ध का विवरण इन शब्दों में लिखा है,‘

उस दिन 81 साल का बूढ़ा कुंवर सिंह अपने सफेद घोड़े पर सवार ठीक घमासान लड़ाई के अंदर बिजली की तरह इधर से उधर लपकता हुआ दिखाई दे रहा था।’

अंततः लार्ड मारकर हार गया।

उसे अपनी तोपों सहित पीछे हटना पड़ा।

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लगर्ड की पराजय

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कुंवर सिंह की अगली लड़ाई सेनापति लगर्ड के नेतृत्व वाली सेना से हुई।

कई अंग्रेज अफसर व सैनिक मारे गए।

कंपनी की सेना पीछे हट गयी।

कुंवर सिंह गंगा नदी की तरफ बढ़े।वे जगदीश पुर लौटना चाहते थे।

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डगलस की पराजय

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एक अन्य सेनापति डगलस के अधीन सेना कुंवर सिंह से लड़ने के लिए आगे बढ़ी।

नघई नामक गांव के निकट डगलस और कुंवर सिंह की सेनाओं में संग्राम हुआ।

अंततः डगलस हार गया।

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कुंवर सिंह गंगा की तरफ बढ़े

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कुंवर सिंह अपनी सेना के साथ गंगा की ओर बढ़े।

कुंवर सिंह गंगा पार करने लगे।बीच गंगा में थे।

अंग्रेजी सेना ने उनका पीछा किया।

एक अंग्रेज सैनिक ने गोली चलाई।गोली  कुंवर सिंह को लगी।

गोली दाहिनी कलाई में लगी।

विष फैल जाने के डर से कुंवर सिंह ने बाएं हाथ से तलवार खींच कर अपने दाहिने हाथ को कुहनी पर से काट कर गंगा में फेंक दिया।

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जगदीश पुर में प्रवेश

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22 अप्रैल को कंुवर सिंह ने वापस जगदीश पुर में प्रवेश किया।

आरा की  अंग्रेजी सेना 23 अप्रैल को लीग्रंैड के अधीन जगदीश पुर पर हमला किया।

इस युद्ध में भी कुंवर सिंह विजयी रहे।

पर घायल कुंवर सिंह की 26 अप्रैल, 1858 को मृत्यु हो गयी।

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कुंवर सिंह का चरित्र

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इतिहास लेख के अनुसार ,

कुंवर सिंह का व्यक्तिगत चरित्र अत्यंत पवित्र था।

उनका जीवन परहेजकारी का था।

उनके राज में कोई मनुष्य इस डर से कि कुंवर सिंह देख न लंे, खुले तौर पर तंबाकू तक नहीं पीता था।

उनकी सारी प्रजा उनका बड़ा आदर करती थी और उनसे प्रेम करती थी।

युद्ध कौशल में वे अपने समय में अद्वितीय थे।

इतिहास लेखक होम्स ने लिखा है कि ‘‘उस बूढ़े राजपूत की,जो ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध इतनी बहादुरी और आन से लड़ा, 26 अप्रैल, 1858 को मृत्यु हुई।’’

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22 अप्रैल 25


 आज के दैनिक जागरण में मुर्शिदाबाद के बारे में एक खबर छपी है।उसका शीर्षक है--

‘‘मुर्शिदाबाद के दंगाइयों ने महिलाओं से कहा कि 

वे अपनी बेटियों को दुष्कर्म के लिए भेज दें।’’

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      सुरेंद्र किशोर

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  19 जनवरी, 1990 को कश्मीर में मस्जिदों के लाउड स्पीकरों के जरिए यह एलान किया गया--‘‘कश्मीरी पंडित काफिर हैं।उन्हें कश्मीर छोड़ना होगा।धर्म परिवर्तन या मरने के लिए तैयार हो जाओ।

जिन्हें कश्मीर छोड़ना है,वे अपनी महिलाओं को यहीं छोड़ कर जाएं।’’

ध्यान रहे कि करीब एक लाख हिन्दुओं ने उसके बाद कश्मीर छोड़ दिया।

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राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया राहटकर ने मुर्शिदाबाद की ताजा घटना के बारे में हैरान करने वाली जानकारी दी।बताया कि कुछ महिलाओं से तो दंगाइयों ने यहां तक कहा कि वह अपनी बेटियों को दुष्कर्म के लिए भेज दें।

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चर्चित और मशहूर यू ट्यूबर मनीष कश्यप ने यह खबर दी है कि बिहार के किशनगंज और अररिया में यादवों की संख्या घट रही हैं

किशनगंज में यादव 14 प्रतिशत से घटकर 6 प्रतिशत रह गये हैं और अररिया में 12 प्रतिशत से घट कर 8 प्रतिशत रह गये।

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यानी,कश्मीर,मुर्शिदाबाद और किशनगंज होते हुए कब बिहार की मुख्य भूमि में यह मुगलयुगीन महा संकट पहुंच जाएगा,कुछ कहा नहीं जा सकता।

किसी दिन कोई आपके घर आए और कहे कि अपनी बेटी दे दो,तो आपको यही इच्छा होगी कि उसे गोली मार दी जाए।लेकिन आप सबके पास हथियार तो है नहीं।फिर क्या होगा ?

वही होगा जैसा कश्मीर ,मुर्शिदाबाद और बांग्ला देश में हो रहा है।मध्य युग में भी यही हुआ था।

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घातक हमले के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के लिए हमारे देश में कानून मौजूद है।

भारतीय न्याय संहिता की धारा-44 में दृष्टांत के रूप में यह लिखा हुआ है,ध्यान से पढ़ लें--

‘‘क पर भीड़ द्वारा आक्रमण किया जाता है,जो भीड़ उसकी हत्या करने का प्रयत्न करती है।वह उस भीड़ पर गोली चलाये बिना प्राइवेट प्रतिरक्षा के अपने अधिकार का प्रयोग कार्य साधक के रूप में नहीं कर सकता और वह भीड़ में मिले हुए छोटे -छोटे बालको को अपहानि करने की जोखिम उठाए बिना  गोली नहीं चला सकता।

  यदि वह इस प्रकार गोली चलाने से उन बालकों में से किसी बालक को अपहानि करे तो क कोई अपराध नहीं करता।’’

  यह तो ठीक है कि आत्म रक्षा के लिए कानूनी प्रावधान उपलब्ध है।पर गोली चलाने के लिए गोली-बंदूक भी तो चाहिए।आज कितने लोगों के पास कारगर हथियार है ?

सरकार जल्दी राइफल -बंदूक का लाइसेंस देती ही नहीं।

नई परिस्थिति में सरकार कम से कम संवदेनशील इलाकों के लोगों को उदारतापूर्वक आग्नेयास्त्र का लाइसेंस दे या फिर कानून की किताब से इस धारा--44 को हटा दे।

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सभ्यताओं का संघर्ष तेज

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नब्बे के दशक में अमरीकी राजनीतिक वैज्ञानिक सैमुएल पी.हंटिंगटन की एक किताब आई थी।

उसका नाम है  ‘‘सभ्यताओं का संघर्ष’’।

उस पुस्तक के जरिए लेखक ने यह कहा था कि 

‘‘शीत युद्धोत्तर संसार में लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान ही संघर्षों का मुख्य कारण होगी।’’

भारत और यूरोप सहित दुनिया के अनेक देशों में वैसा संघर्ष इन दिनों जारी है जिसकी कल्पना हंटिंगटन ने की थी।हाल के वर्षों में वैसा संघर्ष भारत में तो काफी सघन और तेज हो चुका है।

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और अंत में

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कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को मुर्शिदाबाद जाना चाहिए था।नहीं गये । वहां जाने से उनके एकमात्र मुस्लिम 

 वोट बैंक के भी नाराज हो जाने का उन्हें खतरा महसूस हुआ होगा।उसके बदले कांग्रेस अध्यक्ष कल बक्सर(बिहार)में थे।

  टाइम्स आॅफ इंडिया ने कांग्रेस अध्यक्ष की यात्रा की जो खबर बनाई,उसका शीर्षक है--बक्सर में कांग्रेस अध्यक्ष का खाली कुर्सियों ने स्वागत किया।

कांग्रेस ही नहीं, किसी भी दल का अब कोई राजनीतिक भविष्य नहीं रहेगा जो मुर्शिदाबाद जैसी जघन्य घटनाओं का विरोध नहीं करेगा। मनीष कश्यप की खबर की सच्चाई की राजद जांच करे ,कोई कार्रवाई करे अन्यथा वोट बैंक खिसकते देर नहीं लगती।कभी कांग्रेस का मुख्य वोट बैंक ब्राह्मण वोट था।

अब क्या हाल है ?

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मंगलवार, 15 अप्रैल 2025

 कमजोर पंखोें से ऊंची 

उडान इसलिए !

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जिन दलों के सत्ता में आने की उम्मीद नहीं है,वे भी अधिक से अधिक सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करना चाहते हैं।

ऐसा इसलिए कि कम से कम टिकट के बदले उम्मीदवारों से 

भारी चंदा मिल सके।

वे पैसे ‘‘सूखे दिनों में’’ दल के या नेता के काम आएंगे।

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याद रहे कि बिहार के एक मजबूत दल ने सन 2020 के विधान सभा चुनाव का टिकट 50 लाख से 1 करोड़ रुपए तक चंदा लेकर दिया।

 वत्र्तमान के लिए एक करोड़ और पूर्व के लिए 50 लाख रुपए।

तब एक पूर्व विधायक से मैंने पूछा था-- चुनाव लड़ रहे हैं ?

उसने कहा था कि मेरे पास 50 लाख होते तो मैं जरुर लड़ता।

अपुष्ट खबर है कि इस बार उस दल ने रेट बढ़ाकर दुगुना कर दिया है।अन्य कुछ दलों का भी यही हाल है। 

महंगी का असर जो है !

सितंबर आते -आते शायद तीन गुना हो जाए !