शनिवार, 3 जनवरी 2026

 कैसे -कैसे नोबल विजेता ?

ऐसे -ऐसे नोबल विजेता !

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सुरेंद्र किशोर

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बांग्ला देश के नोबल विजेता मुहम्मद यूनुस (2006 के नोबल विजेता)के कारनामों से आप अच्छी तरह परिचित हो ही चुके हैं।

अब नोबल विजेता द्वय अमत्र्य सेन और अभिजीत बनर्जी से भी परिचित हो जाइए।

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अभिजीत बनर्जी (2019 का नोबल विजेता)

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 ‘‘चाहे यह भ्रष्टाचार का विरोध हो या भ्रष्ट के रूप में देखे जाने का भय,शायद भ्रष्टाचार अर्थ -व्यवस्था के पहियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण था, इसे काट दिया गया है।

मेरे कई व्यापारिक मित्र मुझे बताते हैं निर्णय लेेने की गति धीमी हो गई है।.............’

--नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी,

हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान टाइम्स

23 अक्तूबर 2019

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यह कोई संयोग नहीं है कि बनर्जी राहुल गांधी के

करीबी रहे हैं।

अभिजीत बनर्जी ने ही राहुल गांधी को ‘‘न्याय योजना’’ शुरू करने की सलाह दी थी। 

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अमत्र्य सेन(1998 के नोबल विजेता)

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नोबल विजेता अमत्र्य सेन ने जनवरी, 2023 में कहा था कि ममता बनर्जी प्रधान मंत्री पद के लिए योग्य उम्मीदवार हैं।यह सुनकर ममता बनर्जी ने कहा कि उनकी इच्छा मेरे लिए आदेश है।

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नोबल विजेता के ऐसा कहने का कारण

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 मुख्य मंत्री ममता बनर्जी यह भी कह चुकी हैं कि ‘‘विश्व भारती भूमि नाजायज कब्जा प्रकरण’’ मामले में मैं अमत्र्य सेन के साथ हूं।

याद रहे कि विश्व विद्यालय की 13 डिसमिल जमीन पर अवैध कब्जा का आरोप लगाते हुए गत 20 अप्रैल, 23 को विश्व भारती विवि ने जमीन खाली करने के लिए अमत्र्य सेन से कहा था।   

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याद रहे कि डायनामाइट के आविष्कारक अल्फ्रेंड नोबल ने नोबल पुरस्कार की स्थापना की थी।वे स्वीडेन के निवासी थे।

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1.-मुहम्मद यूनुस ने शेख हसीना के धर्म निरपेक्ष बांग्ला देश में डायनामाइट लगाया।

2.-अभिजीत बनर्जी ने नरेंद्र मोदी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में डायनामाइट लगाने की कोशिश की।

3.-अमत्र्य सेन ने जमीन पर अवैध कब्जा कर विश्व विद्यालय जैसे पवित्र स्थान की पवित्रता में डायनामाइट लगा दिया। 

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26 दिसंबर 25

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पुनश्चः

ध्यान रहे कि अमत्र्य सेन ने सी.ए.ए.का भी विरोध किया था।यानी इस मामले में वे भारत के जेहादियों के साथ थे।पी.एफ.आई.ने सी.ए.ए.के विरोध में दंगे किये थे। 

इससे पहले दुनिया की कई ऐसी राजनीतिक हस्तियों को भी शांति का नोबल पुरस्कार मिल गया था जिन पर आरोप लगा कि वे तो शंति को डायनामाइट लगाने का काम भी कर रहे थे। 

             

  

 


 अपने बहाने देश के लाखों पी.एफ.पेंशनधारियों

 की पीड़ा का प्रकटीकरण

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सुरेंद्र किशोर

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मेरी पी.एफ.पेंशन राशि जो सन 2005 में तय हुई,

वह राशि आज भी उतनी ही (1231 रुपए)

मुझे अनवरत मिल रही है।उसमें एक रुपए 

की भी कटौती नहीं की भारत सरकार ने।

क्या उसकी यह कम कृपा है मुझ पर ?!!

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मेरी पक्की आय 1231 रुपए मासिक ही है।यह पी.एफ.एफ.पेंशन

 योजना के तहत मुझे उपलब्ध है।

इसके अलावा अखबारों में लेख लिखकर या यदाकदा पुस्तक लेखन से 

कमाता हूं।

मैं केंद्र सरकार, पी.एफ.के कंेद्रीय न्यासी बोर्ड, केंद्रीय श्रम 

व वित्त मंत्रालय का आभारी हूं जिसने

इस 1231 रुपए की राशि में कभी कोई कटौती नहीं की।हां,यदि 

अवमूल्यन के कारण 2005 में 1231 रुपए की जितनी क्रय शक्ति थी,वह घट गई 

है तो इसमें केंद्र सरकार का भला क्या कसूर ?!

मुझे पेंशन 2005 से मिलती है।इस पेंशन योजना में बढ़ोत्तरी का 

कोई प्रावधान ही नहीं है।जिसने महंगी को ध्यान में नहीं रखा,बढ़ोत्तरी का प्रावधान नहीं किया,

उसका दिमाग कितना क्रूर होगा,उसकी कल्पना कर लीजिए।

यह योजना प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिंह राव के शासन काल में 

शुरू हुई।यह संयोग नहीं है कि राव साहब ने ही सांसद क्षेत्र 

विकास फंड शुरू किया।उस फंड के बारे में केंद्रीय मंत्री जीतनराम 

मांझी ने हाल ही में बयान दिया है कि सभी एम.पी.-विधायक इस फंड 

में कमीशन लेते हैं।नरसिंह राव कितने दूरदृष्टि वाले नेता थे !!

अपने पेशेवालों का भला कर गये।

दूसरी ओर नरसिंह राव सरकार,जिसके वित्त मंत्री मनमोहन सिंह थे,यह 

 सरकार मानती थी कि कुछ लाख रिटायर कर्मचारियों को 

दिव्य भारतीय अपरिग्रही परंपरा के अनुसार अपने पर खर्च 

समय बीतने के साथ घटाते जाना चाहिए।या प्राचीन संतों की तरह वन में 

जाकर कंद-मूल खाकर गुजारा करना चाहिए।

यदि राव साहब सेवानिवृतों पर ही खर्च कर देते तो एक से एक घोटालों के जरिए 

अपने लोगों को उपकृत करने के लिए पैसे बेचारे कहां से आते ?

उनका अपना भी परिवार बहुत बड़ा था।उसकी भी राक्षसी साॅरी ‘‘राजसी इच्छाएं’’ थीं।

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पी.एफ.पेंशन में वृद्धि के लिए सन 2011 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य व 

बिहार सरकार के पूर्व मंत्री डा.शकील उज्जमा अंसारी ने तब के केंद्रीय श्रम एवं 

रोजगार मंत्री मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखा था।

खरगे साहब ने एक रूटीन टाइप का जवाब दे दिया।

राज्य सभा के उप सभापति पद पर आसीन होने से पहले सदस्य के रूप में 

हरिवंश जी ने मेरे नाम का जिक्र करते हुए राज्य सभा में इस पेंशन में बढ़ोत्तरी 

की जरूरत के लिए जोरदार आवाज उठाई थी।

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पी.एफ.पेंशनर्स संघ के लोग इस संबंध में तो वर्षों से बढ़ोत्तरी के लिए 

संगठित रूप से आवाज उठाते रहे हैं।

पर नरेंद्र मोदी सरकार भी शायद यह चाहती है कि इस अनोखी पेंशन योजना 

का नाम गिन्नी बुक आॅफ वल्र्ड रिकाॅर्ड में शामिल हो जाये।शायद दुनिया की 

यह एक मात्र पेंशन योजना है जिसमें महंगी का ध्यान रखते हुए बढ़ोत्तरी का कोई 

प्रावधान ही नहीं है।ऐसा सिर्फ ऋषियों के देश भारत में ही

संभव है।

किसी ने मुझे बताया कि यदि आप ओड़िशा या तीन अन्य राज्यों में से किसी राज्य के मूल निवासी 

होते तो आपको पद्मश्री अवार्डी होने के नाते हर माह 30 हजार रुपए (ओड़िशा)का मानदेय मिल जाता।

  पर, यह भी पता चला कि बिहार के किसी पद्मश्री अवार्डी ने ऐसे ही मानदेय के लिए उप मुख्य मंत्री विजय कुमार सिन्हा से आग्रह किया था।उस पर सिन्हा साहब ने कहा कि पद्मश्री अवार्डी लोगों की निजी आय बहुत है।

जहां तक मेरी जानकारी है,कुछ लोगों के बारे में यह बात सच है।

पर जिस तरह के अभावग्रस्त लोगों को भी मोदी सरकार ने पद्म अवार्ड देना शुरू किया है,वैसे में विजय बाबू की बात अनेक अवार्डी पर लागू नहीं होती।

सन 2025 में बिहार के समाज सेवी सह पत्रकार भीम सिंह भवेश को पद्म सम्मान मिला।

भवेश जी की पक्की आय सिर्फ 3 हजार रुपए मासिक है।

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खैर,इन सब मामलों को मैं ज्यादा तुल नहीं देता।मैंने अपने लिए सन 1965 से ही निजी लाइब्रेरी खड़ी करनी शुरू कर दी थी।मैं जानता था कि पत्रकारिता का जीवन आर्थिक रूप से कोई संतोष देने वाला नहीं होगा।इसलिए रिटायर होने पर स्वतंत्र पत्रकार के रूप में लेखन करना होगा जो मैं कर रहा हूं।

उससे मेरी आय अच्छी-खासी हैं।क्योंकि मेरे पास जो लाइब्रेरी सह सदंर्भालाय है,उसमें 30 आलमारियों में सामग्री भरी पड़ी है।विषयवार कटिंग्स के सैकड़ों लिफाफे चार आलमारियों में भरे हुए हंै।संदर्भालय-पुस्तकालय-पत्रिका -लय के कारण 

लिखने में तथ्यों की भूल होने की गुंजाइश बहुत ही कम रहती है।इसलिए अखबार अब भी मुझे छापते हंै।

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पर, यह सब तभी तक,जब तक हाथ-पैर-आंखें सक्रिय हैं।यदि अंग काम देना बंद कर देंगे तो क्या होगा ??

तब तो ईश्वर ही सहारा होगा--सरकारें तो अपने दूसरे जरूरी-गैर जरूरी कामों मगन रही हैं और रहेंगी भी। 

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2 जनवरी 2025

    


मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

 बिहार में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान

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उप मुख्य मंत्री की पहल से लोग खुश

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रिसर्च के अनुसार आजादी के बाद भ्रष्टाचार ऊपर से ही शुरू हुआ था,इसलिए खत्म भी ऊपर से ही करना होगा

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सुरेंद्र किशोर

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तब की बात है जब नीतीश कुमार नये- नये मुख्य मंत्री बने थे।

सरकारी दफ्तरों में व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार की खबरों से मुख्य मंत्री नाराज हो गये।

मुख्य मंत्री ने घोषणा की कि अब सरकारी आॅफिसेज में स्टिंग्स आॅपरेशन चलाया जाएगा और भ्रष्टों को रंगे हाथ पकड़ा जाएगा।

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फिर क्या था !

बिहार प्रशासनिक सेवा संघ के पदाधिकारियों ने प्रेस कांफ्रंेस करके राज्य सरकार को चुनौती दे दी ।कहा--स्टिग्स आॅपरेशन होगा तो हमलोग हड़ताल कर देंगे।

इस पर नीतीश कुमार ने अपने कदम पीछे हटा लिया।क्योंकि उन्हें अन्य अनेक अच्छे काम करने थे।इस तनाव में नहीं पड़े।

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अब उप मुख्य मंत्री सह राजस्व मंत्री विजयकुमार सिन्हा ने चेतावनी दी है कि जो अफसर गलत करेगा, उन पर कार्रवाई होगी।

एक बार फिर अफसर नाराज हो गये हैं।

कहा है कि अफसरों के प्रति उप मुख्य मंत्री की भाषा अमर्यादित है।अपनी भाषा में सुधार नहीं करेंगे तो हम आंदोलन करेंगे।

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देखना है,इस बार कौन जीतता है।

सरकारी आॅफिसेज में व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार से आम जनता बुरी तरह पीड़ित है।इन पंक्तियों का लेखक भी रिश्वतखोरों से बुरी तरह पीड़ित हो चुका है।इसलिए जनता विजय बाबू की बातों से खुश है।उसे उम्मीद है कि शायद इस बार उसे राहत मिले।

हालांकि यह बहुत मुश्किल काम है।क्योंकि पूरे कुएं में भांग पड़ चुकी है।

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   राजस्व सेवा के सदस्यों का यह कहना सही है कि सिर्फ राजस्व अफसरों  के खिलाफ ही क्यों ?

अन्य सेवाओं के लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई हो जो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं।

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केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने इसी 21 दिसबर को कहा कि  ‘‘हर सांसद और विधायक अपने फंड में से 10 प्रतिशत कमीशन 

लेता है।’’

मांझी का बयान अखबारों में प्रमुखता से छपा।फिर भी उस बयान के खिलाफ तो किसी सत्ताधारी या प्रतिपक्षी जन प्रतिनिधि ने एक शब्द का उच्चारण तक नहीं किया।क्यों ?

उन लोगों को छूट क्यों ?

सिर्फ राजस्व कर्मचारियों पर ही कार्रवाई क्यों ?

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सन 1967 में मैं छपरा में रहता था।महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा की सरकार बिहार में बनी।

उस सरकार में लगभग सारे मंत्री कट्टर ईमानदार थे।सरकार बनते ही घूसखारों में भय व्याप्त गया।यहां तक कि अदालतों के पेशेकारों ने भी पेशी लेनी बंद कर दी थी।

पर महामाया सरकार के कुछ मंत्रियों की छोटी-मोटी कमजोरियों की खबरें बाहर आने लगीं तो मेरे देखते -देखते छपरा कोर्ट के पेशकरों ने भी फिर से घूस लेना शुरू कर दिया।

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दरअसल सफाई यदि ऊपर से होगी तो कारगर होगी।स्थायी होगी।

अन्यथा ईष्र्या -द्वेष फैलेगा और किसी भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का कोई नतीजा नहीं निकलेगा।

आज इस देश में सरकारी भ्रष्टाचार के कारण घुसपैठियों-राष्ट्रद्रोहियों को काफी बल मिल रहा है।

यानी भ्रष्टाचार राष्ट्रद्रोह को बढ़ा रहा है।इसलिए भ्रष्टाचार के लिए भी फांसी की सजा का प्रावधान होना चाहिए।क्योंकि राष्ट्रद्रोह के लिए भी तो फांसी की सजा का प्रावधान है।

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अमरीकी समाजशास्त्री पाॅल आर. ब्रास ने सन् 1966 में ही यह लिख दिया था कि 

‘भारत में भीषण भ्रष्टाचार की शुरूआत आजादी के बाद के सत्ताधारी नेताओं 

ने ही कर दी थी।’

उससे पहले ब्रास ने उत्तर प्रदेश में रह कर भ्रष्टाचार की समस्या का गहन अध्ययन किया था।

  इस अध्ययन के बाद लिखी गयी  अपनी किताब ‘ फैक्सनल पाॅलिटिक्स इन एन इंडियन स्टेट: दी कांग्रेस पार्टी इन उत्तर प्रदेश ’ में वाशिंगटन विश्व विद्यालय के समाजशास्त्र के प्रोफेसर  ब्रास ने लिखा कि ‘कांग्रेसी मंत्रियों द्वारा अपने अनुचरों को आर्थिक लाभ द्वारा पुरस्कृत करना गुटबंदी को स्थायी बनाने का सबसे सबल साधन है।’ अपने शोध कार्य के सिलसिले में ब्रास ने उत्तर प्रदेश के दो सौ कांग्रेसी और गैर कांग्रेसी नेताओं और पत्रकारों से लंबी बातचीत की थी।

  ध्यान रहे कि आजादी के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार सहित कई राज्यों के कांग्रेस संगठनों और सरकारों में गुटबंदी तेज हो गयी थी।हालांकि थोड़ी -बहुत गुटबंदी पहले से भी थी।

  कौटिल्य ने ‘अर्थशास्त्र’ में लिखा है कि ‘राजा को कोई भी ऐसा कृत्य नहीं करना चाहिए जिससे जनता में गरीबी, लालच और अनमनापन पैदा हो।लालची लोग स्वेच्छा से दुश्मन की तरफ हो जाते हैं।’

 भारत के बारे में चीन में यह कहावत है कि ‘भारत सरकार अपने बजट के पैसों को एक ऐसे लोटे में रखती है जिसकी पेंदी में अनेक छेद होते हैं।’

  प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का 15 अगस्त 2014 का वह वायदा भी कसौटी पर है जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘हम न खुद खाएंगे और न ही किसी को खाने देंगे।’ हालांकि इस मामले में उन्हें एक हद तक सफलता जरूर मिली है,पर अभी उनकी सरकार के लिए इस दिशा में बहुत कुछ करना बाकी है।

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सोमवार, 22 दिसंबर 2025

 


सरकारी भ्रष्टाचार के लिए रावणी अमृत कुंड 

है एम.पी.-विधायक फंड का भ्रष्टाचार 

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जीतन राम मांझी ने यह कह कर एम.पी.-विधायक फंड की समाप्ति का औचित्य सिद्ध कर दिया कि मैंने 40 लाख कमीशन लिया

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सुरेंद्र किशोर

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केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया है कि सालाना पांच करोड़ रुपए के सांसद फंड में से सांसद को 10 प्रतिशत कमीशन मिलता है।

उन्होंने यह भी कहा कि हर सांसद-विधायक कमीशन लेते हैं।मैंने इसी कमीशन राशि में से पार्टी को 40 लाख रुपए दिये।

(मांझी जी,आपने यह कह कर देश-प्रदेश का बहुत भला किया है।लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को सब कुछ मालूम होना ही चाहिए।वह भी सबूत के साथ।मेरी तरफ से आपके साहस के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।)

   मांझी जी का यह बयान आज एक से अधिक 

 अखबारों में छपा है।अब वे इसका खंडन भी नहीं कर सकते।

पर,मेरा मानना है कि इस स्वीकारोक्ति के साथ ही मांझी जी ने इस फंड की समाप्ति का अनिवार्य कत्र्तव्य अघोषित रूप से नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के दरवाजे पर पहुंचा दिया है।वे इसे पूरा करें।

चूंकि मोदी-नीतीश व्यक्तिगत रूप से खुद अत्यंत ईमानदार शासक हैं,इसलिए उनसे यह उम्मीद तो की ही जा सकती है।

अब प्रधान मंत्री -मुख्य मंत्री पर यह निर्भर करता है कि भ्रष्टाचार के इस ‘‘रावणी अमृत कुंड’’ पर वे वाण चलाते हैं या नहीं।या दबाव में आ जाते हैं।

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मेरा मानना है कि आज अत्यंत थोड़े अपवादों को छोड़कर केंद्र और राज्य सरकारों के दफ्तरों में जो व्यापक भ्रष्टाचार व्याप्त है,उसको जारी रखने व बढ़ाते जाने की प्रेरणा सरकारी सेवकों को एम.पी.-विधायक फंड में जारी भ्रष्टाचार से ही मिल रही है।

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जो जन प्रतिनिधि सेवा के लिए राजनीति में जाते हैं,यदि वे ही आदर्श उपस्थित नहीं करेंगे तो नौकरी के लिए आने वालों से आप उम्मीद कैसे करेंगे ?

नतीजतन आज अत्यंत थोड़े अपवादों को छोड़कर बिहार सहित पूरे देश में घूस के बिना कोई सरकारी काम नहीं होता।वैसे सांसदों में भी कुछ इक्के-दुक्के अपवाद हैं जो कमीशन नहीं लेते।

पर,अपवादों से देश नहीं चलता।

इस फंड की समाप्ति की शुरूआत करके मोदी-नीतीश सरकारी सेवकों से ईमानदार होने की उम्मीद कर सकते हैं।हर क्षेत्र में आज भी ईमानदार मौजूद हैं,पर दाल में नमक के बराबर ही।

  कुछ साल पहले दैनिक ‘‘प्रभात खबर’’ में मेरे ही लिखने के बाद नीतीश सरकार ने विधायक फंड को समाप्त कर दिया था।उस कैबिनेट की बैठक के तत्काल बाद नीतीश कुमार और तब के उप मुख्य मंत्री सुशील मोदी ने बारी बारी से मुझे फोन करके बताया था कि आपने जो लिखा,वह हमने कर दिया। पर,बाद में मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने दबाव में आकर उस फंड को  फिर से चालू कर दिया।दरअसल फंड के ठेकेदार अधिकतर संासदों-विधायकों के लिए पार्टी कार्यकर्ता का भी काम करते हैं।अधिकतर सांसद -विधायक यह चाहते हैं कि उनके परिवार का ही कोई व्यक्ति उनके बाद उनकी जगह ले।यदि उनके क्षेत्र का कोई कार्यकर्ता चमक गया तो वह टिकट का दावेदार बन सकता है।ठेकेदार दावेदार नहीं होगा।

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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ साल पहले सांसदों से राय ली थी कि सांसद फंड का क्या किया जाये ?

दो-चार संासदों को छोड़कर किसी ने इसे समाप्त करने के पक्ष में राय नहीं दी।

इसलिए मोदी जी भी डर गये।लगा कि खत्म करने पर कुछ सांसद विद्रोह न कर दें।

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बिहार विधान सभा चुनाव के बाद अब महाराष्ट्र-अरुणाचल  के स्थानीय निकाय के चुनावों में भी भाजपा गठबंधन

को भारी जीत मिली है।

सन 2024 से शुरू बांग्ला देश की हिन्दू विरोधी हिंसा और भारत के तथाकथित सेक्युलर दलों की ओर से जारी  मतदाता सूची पुनरीक्षण के विरोध के बाद अब मोदी के नेतृत्व वाला गठबंधन कोई चुनाव नहीं हार रहा है।झारखंड ही अपवाद रहा।आगे भी नहीं हारेगा राजग।

क्योंकि लोग समझ गये हैं कि पुनरीक्षण का विरोध का मतलब जेहादियों का समर्थन।इस देश को पाक-बांग्ला देश बनाने की पृष्ठभूमि।

ऐसे में फंड के लिए मोदी -नीतीश से विद्रेाह भला कौन सांसद-विधायक करेगा ?

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इसलिए मोदी जी-नीतीश जी, किसी फंड समर्थक सांसद -विधायक के

विरोध की परवाह किए बिना इसे शीघ्र समाप्त करिए।

इस फंड को प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिंह राव ने सांसदों को ‘‘अपने स्तर पर’’(संदर्भ--हर्षद मेहता रिश्वत कांड) ला देने के लिए ही नब्बे के दशक में इसे शुरू किया था।राव पर आरोप लगा था कि उन्होंने शेयर घोटालेबाज हर्षद मेहता से एक 

करोड़ रुपए रिश्वत ली।

उनकी जब भारी बदनामी हुई तो उन्होंने तय किया कि सांसदों के लिए सालाना विकास फंड के रूप में एक करोेड़ रुपए दे दिए जाएं।उस समय सरकारी कमीशन का रेट 20 प्रतिशत था।

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22 दिसंबर 25      

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इस देश की संसदीय राजनीति की प्रतिष्ठा बचानी है तो दो में से एक ही रास्ता है।

1-या तो सांसद-विधायक फंड को समाप्त कीजिए

या 2--जीतनराम मांझी से यह सबूत मांगिए कि सभी सांसदों-विधायकों पर आरोप लगाने का आपका आधार क्या है ?मानहानि का मुकदमा आप पर क्यों नहीं किया जाये ?

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रविवार, 21 दिसंबर 2025

 अब भी समय है,चेत जाइए

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अपनी रक्षा करनी है तो बांग्ला देशी-रोहिंग्या घुसपैठियों के समर्थकों को और एसआईआर के विरोधियों को चुनावों में चुन -चुन कर हराइए

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सुरेंद्र किशोर

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अन्यथा, बांग्ला देश में आज जो कुछ हो रहा है,वह सब कल भारत की मुख्य भूमि पर भी संभव है।उसकी तैयारी में ‘‘वे लोग’’ यहां भी भीतर-भीतर लगे हुए हैं।भारत के भीतर के जेहादीगण, स्काउट एंड गाइड के नाम पर निजी सेना तैयार कर रहे हैं।प्रतिबंधित इस्लामिक संगठन पी.एफ.आई.हथियारबंद दस्ते तैयार कर रहा है।उसका लक्ष्य है सन 2047 तक भारत को इस्लामिक देश बना देेने का।

  इस देश के एक बड़े राजनीतिक दल का पीएफआई-एसडीपीआई से चुनावी तालमेल रहता है।

तेलांगना के कांग्रेसी मुख्य मंत्री यह घोषणा कर चुके हैं--‘‘कांग्रेस मतलब मुस्लिम और मुस्लिम मतलब कांग्रेस।’’

यानी,भारत के भीतर के भी संकेत खतरनाक हैं

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आज बांग्ला देश में 

वही सब हो रहा है जो सब मध्य युग में इस देश में हुआ था।

जो सब ढाई दशक पहले कश्मीर में हुआ जहां से लाखों हिन्दू भगा दिये गये थे।उन्हें हिंसा, बलात्कार व जघन्य जेहादी अत्याचार-अनाचार सहने पड़े थे।कोई उन्हें बचाने नहीं गया।  

एक अपुष्ट सूचना के अनुसार पश्चिम बंगाल के कुल 37 हजार 945 गांवों में से करीब 8000 गांवों से गैर मुस्लिम भगाए जा चुके हैं।

उन्हें कितनी पीड़ा देकर भगाया गया होगा,वह सब लिखने तक की हिम्मत वहां किसी को नहीं रही।

बांग्ला देश में सन 1901 में हिन्दुओं की जनसंख्या 33 प्रतिशत थी।सन 2022 में 7.95 प्रतिशत रह गई।घटती ही जा रही है।

भारत के कुल 800 जिलों में से आजादी के बाद 200 जिलों में हिन्दू अब अल्पसंख्यक हो चुके हैं।

इस देश में नब्बे हिन्दुओं के बीच 10 मुस्लिम सुरक्षित रहते हैं।पर नब्बे मुसलमानों के बीच 10 हिन्दू सुरक्षित नहीं रहते।जमीन मकान बेच कर उन्हें भाग जाना पड़ता है।इसके अनेक उदाहरण हैं।  

जो राजनीतिक दल और अन्य लोग यह चाहते हैं कि मतदाता सूची गहन पुनरीक्षण का काम न हो,घुसपैठिए इस देश से न निकाले जाएं,वे वोट के लिए जाने-अनजाने अंततः वही नौबत यहां लाने के प्रयास में लगे हैं  जो कुछ आज बांग्ला देश में हो रहा है,वह सब कल पूरे भारत में हो।बांग्ला देश की जघन्य घटनाओं को भारत के लोग भी अपने टी.वी.सेटों पर देख ही रहे हैं।यह संयोग नहीं है कि आज की खबर के अनुसार जेहादी समर्थक राजनीतिक दल महाराष्ट्र के स्थानीय चुनाव में हार गये।यह अच्छा संकेत है कि शेख हसीना के अपदस्थ होने के बाद बांग्ला देश में हिन्दुओं को जिस तरह वहां के जेहादियों ने प्रताड़ित किया,उसे देखकर भारत के मतदाता गण झारखंड के अपवाद को छोड़कर जेहादी समर्थक दलों को लगातार पराजित करते जा रहे हैं।बिहार उसका ताजा उदाहरण रहा।इन दलों के सफाये के बाद ही केंद्र सरकार सही ढंग से इस देश में फैले जेहादियों से निपट सकेगी।

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आम व शांतिप्रिय लोगों से अपील है कि आप लोग जेहादी तत्वों के समर्थक नेताओं ,दलों को जल्द से जल्द पहचान लीजिए अन्यथा एक दिन आपको और हमको भाग कर शरण पाने के लिए दुनिया में कहीं जगह भी नहीं मिलेगी।क्या यह कोई मामूली बात है कि इस देश के एक मुस्लिम बहुल जिले में बाबर के नाम पर मस्जिद बन रही है ?

मस्जिद बनाइए।पर बाबर को एक बार फिर दृश्य में लाने का उद्देश्य क्या है ? जेहादियों के लिए एक प्रेरणा स्त्रोत तैयार करना।

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डा.जाकिर नाइक को यूट्यूब पर यह कहते हुए आप सुन सकते हैं कि अब भारत में हिन्दुआंे की आबादी 80 प्रतिशत से घटकर 60 प्रतिशत रह गई है।

जेहादी लोग स्थानीय मान सिंहों और जयचंदों की मदद से हिन्दुओं की संख्या घटाते जा रहे हैं और घुसपैठ करा कर व आबादी बढ़ा कर तथा अन्य तरीकों से मुसलमनों की संख्या बढ़ाते जा रहे हैं।

याद रहे कि मध्य युग में जयचंद ने तटस्थ रह कर जेहादियों की मदद की और मान सिंह अकबर का सेनापति बनकर उसे मदद की।

पर,मुहम्मद गोरी की सेना ने पृथ्वीराज चैहान को मारने के बाद जयचंद को भी मार डाला था।यदि जेहादी हावी हुए तो आज के जयचंद भी नहीं बचेंगे।

इन दोनों तरह के तत्व आज भी भारत में उसी तरह की भूमिका में हैं।

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21 दिसंबर 25

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पुनश्चः

कई दशक पहले जब कांग्रेस-प्रतिपक्ष के देशभक्त नेताओं ने प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू से कहा कि चीन आगे बढ़ता जा रहा है।हम पर खतरा है।कुछ कीजिए।

उसके जवाब में नेहरू व उनके भक्तों ने भी उन्हें एक तरह से पागल ही कहा था।पर जब 1962 में चीन ने हमारी हजारों वर्गमील जमीन पर कब्जा कर लिया तो नेहरू उस शोक में अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सके।

आज तो इस देश और सनातन के जीवित रहने या नहीं रहने का सवाल है।

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शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

 संदर्भ-आई.ए.एस.संतोष वर्मा की ब्राह्मणों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी

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हर जाति में अच्छे-बुरे लोग होते हैं।

आलोचना व्यक्ति की करिए, जाति की नहीं

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सुरेंद्र किशोर

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आज मैं यहां ब्राह्मण के खिलाफ अभद्र टिप्पणियों की चर्चा करूंगा।क्योंकि हाल में मध्य प्रदेश के एक आई.ए.एस.अफसर ने अभद्र टिप्पणी की है जो पूरी तरह अस्वीकार है।

  मैं ब्राह्मण नहीं हूं किंतु मैं ब्राह्मणों का प्रशंसक हूं।अपने निजी अनुभवों के आधार पर मैं यह बात कह रहा हूं।मैंने ब्राह्मणों से न सिर्फ बहुत कुछ सीखा है,बल्कि पाया भी है।

 ऐसा नहीं है कि अन्य जातियों के लोगों से मैंने नहीं सीखा।किंतु पत्रकारिता में ब्राह्मण अधिक हैं,इसलिए मेरा अनुभव अधिक है।

ऐसा नहीं है कि ब्राहमण सिर्फ पत्रकारिता में ही अधिक हैं।

  पूर्व प्रधान मंत्री वी.पी.सिंह ने पत्रकार राम बहादुर राय को बताया था कि आजादी की लड़ाई में उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक ब्राह्मण शामिल हुए थे।

  मेरा पारिवारिक संस्कार यह था कि हम लोग ब्राह्मण को ‘‘ब्राह्मण देवता’’ कहते थे।

गो ब्राह्मण की रक्षा करने की जो बात कही गई थी,वह अकारण नहीं था।

भारत की देसी गाय मंे जो औषधीय गुण पाया जाता है,वैसा गुण किसी अन्य 

नस्ल की गाय में नहीं पाया जाता।

वही स्थिति गंगा नदी का है जिसके जल में औषधीय गुण पाया जाता है।

किंतु आजादी के तत्काल बाद वाली तथाकथित सेक्युलर सरकार ने गंगा और गाय के साथ जो किया,वह जग जाहिर है।

खैर,


  

   ख्कििसी जाति खास कर ब्राह्मण के खिलाफ 


1.-त्रेता युग में इस धरा के ब्राह्मणों ने स्वजातीय किंतु मर्यादाहीन 

रावण की जगह मर्यादा पुरूषोत्तम राम का साथ दिया था।

यह भी रही है ब्राहमणों की दिव्य परंपरा ।

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2.- इस घोर कलियुग का भी एक उदाहरण पेश है।

 स्वजातीय पत्रकारों की जोरदार पैरवियों को ठुकरा कर प्रभाष जोशी

ने मुझे 1983 में ‘जनसत्ता’ में रखा।

 पटना के एक्सप्रेस आॅफिस को एकाधिक संदेश भेज कर उन्होंने पटना

से मुझे दिल्ली बुलवाया था।

मेरा पहले से उनसे कोई परिचय तक नहीं था।

सिर्फ वे मेरा काम जानते थे।

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3.-1977 में जब मैंने पटना में दैनिक ‘आज’ ज्वाइन किया तो ब्यूरो 

प्रमुख पारसनाथ सिंह ने मुझे एक मंत्र दिया।

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता ब्राह्मणों के स्वभाव के अनुकूल पेशा हैं।

ब्राह्मण विनयी और विद्या व्यसनी होते हैं।

यदि आपको इस पेशे में बेहतर करना है तो ये दो गुण अपनाइए।

मैंने इसकी कोशिश की।

मुझे लाभ हुआ।

4.-कैरियर के बाद के वर्षों में इस देश के जिन आधा दर्जन प्रधान संपादकांे ने इस गैर ब्राह्मण को यानी मुझे संपादक बनाने की कोशिश की,उनमें चार ब्राह्मण ही थे।

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मैंने यह सब आज क्यों लिखा ?

थोड़ा लिखना, बहुत समझना !

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शनिवार, 29 नवंबर 2025

 ‘मौके पर चैका’ लगाइए

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सम्राट चैधरी-विजय सिन्हा को इतिहास ने अच्छा मौका दिया है,उसका फायदा उठाइए,जनता को राहत पहुंचाइए।

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सुरेंद्र किशोर

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इतिहास ने बिहार के दोनों उप मुख्य मंत्रियों को आम जनता के बीच अत्यधिक लोकप्रिय बनने का अवसर दे दिया है।ऐसा अवसर कम ही लोगों को मिलता है।

देखना है कि उस अवसर का भरपूर लाभ सम्राट चैधरी और विजय कुमार सिन्हा उठाते हैं या नहीं।

वैसे मानना पड़ेगा कि सम्राट चैधरी की शुरूआत अच्छी है।पर उसे और तेजी से आगे बढ़ाने की जरूरत है।

अभी निकट भविष्य में बिहार में कोई चुनाव भी नहीं है।इसलिए निहितस्वार्थियों की परवाह करने की जरूरत नहीं है।

‘‘योगी माॅडल’’को अपना कर बिहार में अपराधियों -माफियाओं की सही ढंग से ठुकाई होती रहे तो जनता जंगल राज की कभी वापसी नहीं होने देगी।जनता गद् गद् रहेगी।

राज्य में उद्योगपति निवेश भी अधिक करेंगे।

अंचल अधिकारी राजस्व विभाग के

तहत आते हैं।आज बिहार की आम जनता अधिकतर अंचल कार्यालयों की भीषण घूसखोरी से बुरी तरह पीड़ित है।सब जानते हैं कि उसके लिए सिर्फ अंचल अधिकारी ही दोषी नहीं है।पहले रावण का अमृत कुंड को वाण से सुखाइए।

मुख्य मंत्री नीतीश कुमार से तालमेल बैठा कर यदि उप मुख्य मंत्री विजय कुमार सिन्हा अंचल कार्यालयों की घूसखोरी से लोगों को राहत दिला सकें तो हर जाति- बिरादरी के लोग विजय बाबू का गुणगान करेंगे।

यू.पी.की मुस्लिम महिलाओं को भी टी.वी.चैनलों पर यह कहते हुए सुना जाता है कि योगी बाबा के राज में हम महिलाएं रात के अंधरे में भी सड़कों पर निकल सकती हैं।योगी जी के सत्ता में आने से पहले ऐसा नहीं था।

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नेताओं को मौका मिला तो उसका लाभ उन लोगों ने जनहित में कैसे उठाया,उसके सबसे बड़े उदाहरण नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार हैं।

 मोदी जी जब गुजरात में शासन चला रहे थे,उन्हीं दिनों देश के विभिन्न कोनों से आवाज उठने लगी थी कि ‘‘मोदी का प्रधान मंत्री बनाओ।’’जनता ने पहले कहा,पार्टी ने पी.एम.का उम्मीदवार उन्हें बाद में बनाया।

मोदी के प्रधान मंत्री बनने से पहले की बात है। राम जेठमलानी रजत शर्मा के ‘‘आप की अदालत’’ कार्यक्रम में बोल रहे थे।

 जेठमलानी कह रहे थे कि मैं देश में जहां कहीं भी जाता हूं लोग मुझसे पूछते हैं कि मोदी को प्रधान मंत्री कब बना रहे हो ?

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नीतीश कुमार ने ईमानदारी,विजन और मेहनत से इतने अच्छे काम बिहार में किए जितना अच्छा काम पहले कभी नहीं हुआ था।इसलिए नीतीश के राजनीतिक विरोधी भी कहते हैं कि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है।इसे ही कहते हैं--सफल राजनीतिक जीवन।

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कांग्रेस ने वी.पी.सिंह को पहले मुख्य मंत्री बनाया।फिर केंद्र में मंत्री बनाया।

बोफोर्स सहित भ्रष्टाचार के ऐसे -ऐसे मामलों का उन्होंने भंडाफोड़ किया कि कांग्रेस छोड़ने के बाद जनता मांग करने लगी--वी.पी.को प्रधान मंत्री बनाओ।

बने भी।

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इस तरह जिन्होंने भी ‘‘मौके पर चैका’’ लगाया,वे जनता के हीरो बन गये।आप भी बन ही सकते हैं।

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27 नवंबर 25