शुक्रवार, 31 मार्च 2017

जहां कोर्ट-सेना निष्पक्ष, वहां हिंदू राष्ट्र का कोई खतरा नहीं

जिन लोगों ने राजनीतिक स्वार्थ और वैचारिक-रणनीतिक जकड़न के कारण भाजपा को सत्ता में आने से रोकने की वास्तविक कोशिश नहीं की, वही लोग आज यह शोर मचा रहे हैं कि संघ परिवार देश में हिंदू राष्ट्र-राज्य कायम करना चाहता है। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह शोर तेज हो गया है। कुछ लोगों को आपातकाल की पुनरावृत्ति की भी आशंका हैं।

शायद उनके इस शोर में भी कोई स्वार्थ छिपा हुआ है। क्योंकि अब भी वे ऐसा कोई ठोस काम नहीं कर रहे हैं जिनसे भाजपा कमजोर हो। सिर्फ वोट बैंक और घिसे-पिटे नारों से ही काम चला लेना चाहते हैं।

धर्म निरपेक्ष देश को हिंदू राष्ट्र-राज्य में परिणत करने में आने वाली बाधाओं पर पहले चर्चा कर ली जाए।
भारतीय संविधान के मूल ढांचे को बदले बिना यहां किसी तरह का धार्मिक शासन कायम नहीं किया जा सकता।
क्या यह संभव है ?

24 अप्रैल 1973 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस.एम. सिकरी की अध्यक्षता में 13 सदस्यीय संविधान पीठ ने ऐतिहासिक जजमेंट दिया था। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मुकदमे में पीठ ने कहा था कि ‘भारतीय संविधान के अंतर्गत संसद ‘सुप्रीम’ नहीं है। संसद संविधान के बुनियादी ढांचे और विशेषताओं को बदल नहीं सकती।’

जो नरेंद्र मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट की इच्छा के बगैर न्यायाधीशों की बहाली तक नहीं कर पाती, वह हिंदू राष्ट्र कैसे स्थापित करेगी ? उसकी ऐसी किसी मंशा के संकेत भी नहीं हैं।

क्या ऐसे किसी दुःसाहसी कदम में सरकार को सेना का साथ मिलेगा? सेना धर्म निरपेक्ष और अराजनीतिक है।
दरअसल ऐसे शोर मचाने वाले कुछ लोग तो अपने वैचारिक खोखलेपन और रणनीतिक जकड़ता को बरकरार रखना चाहते हैं ताकि  उनके विचार समय पार साबित न होने पाए।

इस श्रेणी के राजनीतिक कर्मी हिंदू राष्ट्र राज्य का शोर मचाकर वोट बैंक को मजबूत भी रखना चाहते हैं।
हालांकि वे भूल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कुछ मुस्लिम महिलाओं ने भी भाजपा को वोट दिए क्योंकि भाजपा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वह तीन तलाक के खिलाफ है। उधर शाहबानो केस में कांग्रेस सरकार ने क्या किया था?
   


ऐसे किया जा सकता है भाजपा को कमजोर


जिन कारणों से भाजपा केंद्र और उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई है, उन कारणों को दूर किया जाए तो भाजपा कमजोर हो ही सकती है। पर क्या गैर भाजपा दल इस बात के लिए तैयार हैं ? क्या उन्हें अपनी हार का असली कारण कभी समझ में आएगा भी ? पता नहीं।

गैर राजग दलों को 2014 के लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद ही चेत जाना चाहिए था। कांग्रेस के पास तो ए.के. एंटोनी की एक हद तक  वस्तुपरक रिपोर्ट भी थी जिसमें हार का कारण बताया गया था।

पर, लगता है कि उन लोगों ने उत्तर प्रदेश के ताजा चुनाव नतीजे से भी सबक नहीं लिया।

शायद सबक लेना ही नहीं चाहते। यदि उनका रुख-रवैया ऐसा ही रहेगा तो उन्हें आने वाले दिनों में और भी चुनावी पराजयों का सामना करना पड़ सकता है। स्थानीय कारणों से पंजाब जैसी छिटपुट जीत से इठलाते रहेंगे तो और मात खाते रहेंगे।

भाजपा की जीत के निष्पक्ष राजनीतिक पंडित तीन मुख्य कारण बताते हैं।

पहला कारण अधिकतर भाजपा विरोधी दल और उनकी सरकारें भीषण भ्रष्टाचार में डूबी रही हैं। अपवादों की बात और है। जबकि इस गरीब देश के लोग भष्टाचार से काफी पीड़ित हैं। भ्रष्टाचार से विकास-कल्याण कार्यों की गति धीमी होती है। बढ़ती आबादी के बीच लोगों को सुखी-संपन्न बनाने की बात कौन कहे, खिलाने-पिलाने के लिए भी सरकार के पास कोई ठोस नीतियां नहीं हैं। उधर अधिकतर नेताओं की अमीरी बढ़ती जा रही है। असंतोष बढ़ रहा है।

दूसरा कारण वंशवाद है और तीसरा कारण अल्पसंख्यकों की तुष्टिकरण है।

कई जगह अयोग्य वंशज वैसे ही शासन-दल चला रहे हैं जैसे लर्नर लाइसेंस लेकर कोई एक्सप्रेसवे पर गाड़ी चलाए।

यदि गैर राजग शासित राज्यों में गरीब अल्पसंख्यकों के आर्थिक-शैक्षणिक बेहतरी के लिए ठोस काम हुए होते तो उससे कुल मिलाकर देश का ही भला होता।

पर, दरअसल वोटलोलुप दलों ने उनके बीच के वैसे तत्वों के तुष्टिकरण में ही अपनी शक्ति लगा रखी है जो राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय जेहादी तत्वों के प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थक रहे हैं।

इसके अनेक उदाहरण समय-समय पर मिलते रहते हैं।

ऐसे दलों को जेहादी तत्वों की इस देश में सक्रियता कोई समस्या नहीं लगती। बल्कि कुछ नेतागण आतंकी हमलों के समय ऐसे-ऐसे बयान देते हैं जिनसे कई लोगों को यह लगता है कि वे भूमिगत आतंकियों के सतह पर सक्रिय चेहरे हैं। गैर भाजपा दलों के ऐसे ही कारनामों का फायदा भाजपा उठा लेती है। उसे नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह के वोट मिलते हैं।

यदि अब से भी गैर भाजपा दल, जिन्हें ढोंगी धर्म निरपेक्ष दल भी कहा जाता है, अपनी उपर्युक्त गलतियों को सुधार लें तो भाजपा कमजोर होती चली जाएगी।

क्या उनमें खुद को सुधारने की ताकत बची भी है ?

दरअसल इस देश की आम जनता सब बात समझती है। सभी दलों की अच्छाइयों और कमजोरियों को भी। आम जनता आम तौर पर धर्म निरपेक्ष स्वभाव की है। अपवादों की बात और है।

वह हिन्दुत्व की सत्ता कायम करने के लिए भाजपा को वोट नहीं देती। इस सवाल पर भाजपा उन्हें गुमराह भी नहीं कर सकती। यह और बात है कि भाजपा और संघ परिवार में कुछ तत्व ऐसे जरूर हैं जो इस देश में हिन्दुत्व का एजेंडा लागू करना चाहते हैं। पर वैसे तत्व निर्णायक नहीं हैं।

कभी होंगे भी नहीं। अधिकतर जनता की यह समझ बनती जा रही है कि भाजपा ही जेहादी तत्वों से इस देश को बचा सकती है। यह भी कि भाजपा अपेक्षाकृत कम भ्रष्ट है। वंशवाद भाजपा में भी है। पर उसमें यह गुंजाइश नहीं है कि कोई नेता पुत्र सिर्फ इसीलिए प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ं बन जाए क्योंकि वह किसी खास नेता का पुत्र है। यानी जब बाजार में बेहतर माल उपलब्ध हों तो लोग बदतर क्यों खरीदेंगे?



आजम खान को दर किनार करना जरूरी

खबर है कि आजम खान सपा से दु‘खी हैं। स्वाभाविक ही है। यदि उनकी इच्छा रही हो कि वे विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता बनें तो इसमें कोई अस्वाभाविक बात भी नहीं है। वरीय हैं। समझदार हैं। पर वाचाल भी तो हैं।
बताया जाता है कि सपा की हार का एक कारण उनका बड़बोलापन भी रहा है। कल्पना कीजिए कि आजम खान विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता होते।
सदन में अक्सर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और आजम खान में नोंक-झोंक होती। कोई भी अंदाज लगा सकता है कि बहस में गर्मी बढ़ने पर दोनों कैसे-कैसे शब्दों का इस्तेमाल करते ! उससे समाज में तनाव बढ़ता। बढ़ने पर नुकसान किसे होता? सपा को होता।
शायद सपा के शीर्ष नेता इस बात को पहले ही समझ गए होंगे। इसीलिए आजम खान को प्रतिपक्ष का नेता नहीं बनाया। हालांकि संभव है कि न बनाने का कोई और भी कारण रहा हो।

और अंत में


राजनीतिक कर्मियों और विश्लेषकों के लिए एक अच्छी बात है। वह यह कि हमारे बीच डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे नेता उपलब्ध हैं। वह अपनी पार्टी की ‘असली लाइन’ से समय-समय पर लोगों को अवगत कराते रहते हैं। इससे अन्य दलों के नेताओं को अपनी राजनीतिक लाइन तय करने में सुविधा होती है।
देखना है कि रघुवंश बाबू के ताजा बयान के बाद जदयू कब अपनी राजनीतिक लाइन तय करता है! याद रहे कि राजद नेता का ताजा बयान यह है कि दो सांसदों वाले नेता को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भला कैसे बनाया जा सकता है !


(प्रभात खबर : बिहार के 31 मार्च 2017 के अंक में प्रकाशित)




सोमवार, 13 मार्च 2017

नेक इरादों की प्रचंड जीत

इस देश में जब -जब किसी दल या नेता ने यह दिखाया कि  वह भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक जंग कर रहा है तो उसे मतदाताआंे ने जात-पांत से ऊपर उठकर वोट दिये। याद रहे कि भ्रष्टाचार कम होने के साथ गरीबी भी घटेगी।

कभी भ्रष्टाचार के साथ तानाशाही का तत्व जुड़ा तो कभी अपराध का। हां, यदि कभी पिछड़ा-दलित आरक्षण पर खतरा आया तो इन वर्गों के लोगों ने अन्य तत्वों को नजरअंदाज किया।

इस बार भाजपा ने यह भी प्रदर्शित किया कि वह देश की एकता-अखंडता को बचाने के लिए भी अन्य दलों की अपेक्षा अधिक समर्पित है। फिर क्या था! वही रिजल्ट होना था जो इस बार उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में  हुआ।

पंजाब में भी जनादेश मुख्यतः भ्रष्टाचार के ही खिलाफ था। अकाली सरकार के भ्रष्टाचार से लोग पीडि़त थे। भाजपा या नरेंद्र मोदी वहां निर्णायक स्थिति में नहीं थे। ‘आप’ को लोगों ने अधिक गंभीरता से नहीं लिया। अरविंद केजरीवाल एक ईमानदार और कर्मठ नेता जरूर हैं, पर उन्हें एक जिम्मेदार और प्रौढ़ नेता के रूप में उभरना अभी बाकी है।

देश में नोटबंदी का विरोध और राष्ट्र विरोधी तत्वों का यदाकदा प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन कुछ खास दलों व नेताओं को महंगा पड़ा।
उत्तर प्रदेश में जातिवाद, अपराध, परिवारवाद  और एकतरफा- -असंतुलित धर्म निरपेक्षता सपा के लिए घातक साबित हुए।
 याद रहे कि जिस नोटबंदी को कुछ राजनीतिक दल देश के लिए घातक मान रहे थे, उसे अधिकतर मतदाताओं ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के अभियान का एक हिस्सा माना।

 इससे यह भी साबित हुआ कि कुछ दल आम जनता से कितना कट चुके हैं। या फिर स्वार्थ में डूबे हुए हैं।

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लोगों ने इसलिए भी विश्वास किया क्योंकि करीब तीन साल के प्रधानमंत्रित्व काल में उनके खिलाफ प्रतिपक्ष को  भ्रष्टाचरण का कोई सबूत नहीं मिला। साथ ही लोगों में यह भी धारणा बनी कि उन्हांेने केंद्रीय मंत्रिमंडल को घोटालों से मुक्त रखा।

वह अफसरों के स्तर से भ्रष्टाचार की समाप्ति की कोशिश में भी लगे हुए हैं। ऐसी अच्छी मंशा वाले प्रधानमंत्री यदि उत्तर प्रदेश जाकर कोई आश्वासन देता है तो लोग उस पर विश्वास करेंगे ही।

 ऐसा पहली बार नहीं हुआ है।

1977 में इस देश के मतदाताओं ने जेपी यानी जय प्रकाश नारायण पर विश्वास करके जनता पार्टी को केंद्र में सत्ता में लाया था। याद रहे कि जेपी भ्रष्टाचार व तानाशाही के खिलाफ आंदोलन के प्रतीक बने थे।

लोगों को यह लगा था कि वह देश के लिए कष्ट सह रहे हैं। उन्हें खुद गद्दी पर नहीं बैठना है। यह और बात है कि जनता पार्टी की सरकार ने जेपी और आम लोगों की उम्मीदों को पूरा नहीं किया।

‘गरीबी हटाओ’ का नारा देकर 1971 में लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत पाई इंदिरा गांधी भी बाद में गरीबों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरी थीं।

पर उससे पहले उन्होंने 1969 में जब गरीबी हटाओ का नारा देकर 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था तो गरीबों को लगा था कि यह काम वह गरीबों के भले के लिए ही कर रही हैं। इंदिरा सरकार ने तब राजाओं के प्रिवी पर्स और  विशेषाधिकार समाप्त किये थे।

तत्कालीन सरकार ने यह दिखाया कि ये काम अमीरों से छीनकर गरीबों में बांटने की कोशिश में क्रम में हो रहे हंै।
ताजा नोटबंदी पर भी गरीबों ने यह समझा कि धनपतियों से कालाधन छीना जा रहा है। पर कुछ राजनीतिक दल जनता की इस समझ को समझ नहीं सके।

1987-89 के बोफर्स तोप घोटाले ने राजीव गांधी की सरकार को अपदस्थ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इससे साबित हुआ था कि आम लोग सरकारी भ्रष्टाचार को कितना बुरा मानते हैं।

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी गत के पीछे मनमोहन सरकार के महाघोटालों का सबसे बड़ा हाथ था। कांग्रेस की अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीति ने आग में घी का काम किया था।

सन 1952 के चुनाव में अधिकतर लोगों ने उसी पार्टी को वोट दिये जिसने आजादी दिलाने में मुख्य भूमिका निभाई थी। यानी कांग्रेस। सन 1962 तक यही होता रहा। पुराने पुण्य प्रताप से कांग्रेस जीतती रही। पर जब कांग्रेसी सरकारें सत्ता के एकाधिकार के मद में अनर्थ करने लगीं और सरकारी भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ने लगा तो 1967 के चुनाव के बाद नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बन गईं।

1974 में इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ जेपी आंदोलन  एकाधिकारवाद, जातिवाद, परिवारवाद और भ्रष्टाचारवाद के खिलाफ था। आंदोलन को दबाने के लिए आपातकाल लगाया गया। अधिकतर लोगों ने जातपात से ऊपर उठकर 1977 में कांग्रेस को हरा दिया।

अधिकतर मतदाताओं ने जातपांत से ऊपर उठकर 1984 के लोकसभा चुनाव में भी ‘मिस्टर क्लीन’ यानी राजीव गांधी के दल को जिताया। हालांकि उस चुनाव पर इंदिरा गांधी की हत्या के कारण कांग्रेस खासकर राजीव के प्रति उपजी सहानुभति का तत्व भी हावी था।

उससे पहले कांग्रेस महासचिव के रूप में राजीव गांधी ने देश के तीन वैसे कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को पद से हटवाया था जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। उससे लगा था कि राजीव भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। यह और बात है कि राजीव से भी लोगों की उम्मीदें पूरी नहीं हुईं।
क्या गैर भाजपा दल उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे से कोई सबक लेंगे ?

या फिर अन्य स्थानीय कारणों से दूसरी छोटी-मोटी चुनावी जीत में ही मगन रह कर अपनी पुरानी राह पर चलते रहेंगे ?
जानकार सूत्रों के अनुसार अभी मोदी सरकार आम लोगों के भले के लिए कुछ अन्य ऐसे काम भी करने वाली है जिनसे प्रतिपक्ष के और भी पस्त होने की संभावना है।

  उत्तर प्रदेश के चुनाव  के बाद केंद्र सरकार बेनामी संपत्ति के खिलाफ बड़ा अभियान चलाने का मन बना रही है। संशोधित बेनामी कानून गत साल पास भी हो चुका है। महिला आरक्षण विधेयक पास हो सकता है। इस तरह के चैंकाने वाले कुछ अन्य काम भी हो सकते हैं।

यह आम राय है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत दरअसल मोदी की ईमानदार मंशा की जीत है। ऐसी जीत के बाद भाजपा और राजग के भीतर के मोदी विरोधी तत्वों के भी होश  ठिकाने आ सकते हैं। इससे केंद्र सरकार के उन प्रशासनिक अधिकारियों के भी सही राह पर आने की संभावना है जो  मोदी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में दिल से साथ नहीं दे रहे हैं।

  नरेंद्र मोदी सरकार ने यदि महिला आरक्षण विधेयक पास करा दिया और बेनामी संपत्ति वालों के खिलाफ कारगर कार्रवाई शुरू करा दी तो 2019 का लोकसभा चुनाव नतीजा भी तय हो जाएगा। उससे पहले देश में दलीय समीकरण बदल सकते हैं।

उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे उन कुछ राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए संभवतः अंतिम चेतावनी है जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव नतीजों से कुछ नहीं सीखा। दरअसल वे दल
जातिवाद, भीषण भ्रष्टाचार, वंशवाद और वोट बैंक के तुष्टिकरण के काम में मगन रहे हैं। उन्हें यह सबक ले लेना चाहिए कि अधिकतर लोग अब स्वच्छ प्रशासन चाहते हैं और ऐसा कोई काम पसंद नहीें कर रहे हैं जो देश की एकता अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाला हो।

गैर भाजपा दलों के जो नेता यह कह रहे हैं कि भाजपा ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके चुनाव जीता है, उन्हें अब भी  भीषण भ्रष्टाचार, जातिवाद और वंशवाद की बुराइयों से तोबा करने की कोई जरूरत महसूस नहीं हो रही है। ऐसी सोच उनके भविष्य के लिए खतरनाक है।

यदि चुनाव पर ध्रुवीकरण के सीमित असर को मान भी लिया जाए तो उन नेताओं को आत्ममंथन करना चाहिए कि इस काम में उनका खुद का कितना योगदान रहा है!


(इस लेख का संपादित अंश दैनिक जागरण के 13 मार्च 2017 के अंक में प्रकाशित)

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

निगरानी ब्यूरो पहल करके भ्रष्टाचार पर हमले क्यों नहीं करता !

बिहार निगरानी अन्वेषण ब्यूरो खुद अपनी पहल पर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करता ? पहले तो करता था।

पुराने जानकार लोग बताते हैं कि निगरानी ब्यूरो के जब भी कोई ईमानदार अफसर प्रधान बने, उड़न दस्ते सक्रिय हो जाते थे। बिना किसी शिकायत के दस्ते छापामारी करते रहते थे।

अब क्या हो गया ? अब तो जो केस उसे सौंपे जाते हैं, उसी को ब्यूरो देखता है। यदि अपनी पहल पर निगरानी ब्यूरो कार्रवाई करता तो बिहार कर्मचारी चयन आयोग में जो कुछ हुआ,वह सब नहीं होता।

पहले ही रोक लग जाती।

 बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के अभूतपूर्व और शर्मनाक घोटालों का पर्दाफाश तभी हो सका जब एक टीवी चैनल ने ‘प्रोटिकल गर्ल’  की योग्यता-क्षमता का पर्दाफाश किया।जिस लड़की को बोर्ड ने पूरे राज्य का  टाॅपर बना दिया था,उसे पालिटिकल साइंस के स्पेलिंग और उच्चारण भी मालूम नहीं थे।

 राज्य सरकार का यह तर्क सही हो सकता है कि बोर्ड के तब के अध्यक्ष की ललाट पर यह नहीं लिखा हुआ था कि वह घोटालेबाज है।पर क्या कर्मचारी चयन आयोग के कत्र्ताधत्र्ता के कारनामों के बारे में भी सरकार को  कोई पूर्व सूचना नहीं थी ?

  याद रहे कि इससे पहले भी गड़बडि़यों के कारण एक से अधिक बार आयोग की परीक्षाएं रद करनी पड़ी थीं।तभी राज्य सरकार क्यों नहीं जग गयी ?  इस पर सरकार का यह तर्क हो सकता है कि सरकार के पास और भी बहुत सारे काम होते हैं। तब सवाल यह है कि निगरानी अन्वेषण ब्यूरो को सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के अनुपात में सशक्त और प्रो एक्टिव क्यों नहीं बनाया जा सकता है ?

एक समय था जब गैर सरकारी व्यक्ति को भ्रष्टाचार निरोधक संगठन का प्रधान बनाया जाता था। संभवतः वह प्रयोग विफल रहा।पर किसी टाइम-टेस्टेड ईमानदार पूर्व उच्चाधिकारी को तो यह काम सौंपा ही जा सकता है।

बिहार में कुछ रिटायर आई.ए.एस. और आई.पी.एस. अफसरों की चर्चा होती रहती है जिन्होंने सरकार में रहते हुए कभी भी रिश्वतखोरी को बढ़ावा नहीं दिया।

 कम से कम ऐसे लोगों को शिक्षा और परीक्षा वाले सरकारी संगठनों के सर्वोच्च पदों पर तो बिठाकर स्थिति को सुधारने की कोशिश की ही जा सकती है।


   प्रधान मंत्री भी अफसरों के भ्रष्टाचार से दुःखी  

मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कई साल पहले लोगों से यह अपील की थी कि वे भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ स्टिंग आपरेशन चलाएं। इस पर बिहार प्रशासनिक सेवा संघ ने सख्त एतराज किया था। उस एतराज से ही यह साबित हो गया था कि अफसर अपनी शैली बदलना नहीं चाहते।यही रवैया पूरे देश के अधिकतर अफसरों का भी है। दिल्ली से भी यह खबर मिलती रहती है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी भी
महत्वपूर्ण पदों पर काबिज कुछ बड़े अफसरों के भ्रष्टाचार से दुःखी रहते हैं।मोदी ने अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों को ‘वेतन पर काम करने की आदत’ लगा दी, पर अफसरों की  आदतें बदलने में विफल रहे।

मोदी मंत्रिमंडल के सदस्य जल की मछली की तरह कुछ पानी पी जा रहे होंगे तो बात कुछ और है।हालांकि वैसी  खबर अभी आम नहीं हुई है।घोटाले और महा घोटाले की खबर नहीं है जैसी खबरें मन मोहन सरकार के दौर में आती रहती थीं।

 पर सवाल  है कि व्यक्तिगत ईमानदारी के लिए चर्चित नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार जैसे नेता भी  भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक क्यों नहीं कर  सकते ?

दरअसल  गददी पर बैठे नेताओं को उनके कुछ शुभचिंतक यह सलाह देने लगते हैं कि ऐसा कोई खतरा मोल मत लीजिए जिससे गददी पर ही खतरा आ जाए।

क्योंकि आपको शासन में रहकर देश-प्रदेश के हित में अभी और भी बहुत  सारे महत्वपूर्ण काम करने हैं।
पर वे नहीं जानते कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक से अधिक महत्वपूर्ण काम आज कुछ और नहीं है।

   अरविंद केजरीवाल ने अपने 49 दिन के प्रथम  कार्यकाल में जब यह दिखा दिया कि भ्रष्टाचार के प्रति उनकी शून्य सहनशीलता है तो अगले चुनाव में दिल्ली की जनता ने ‘आप’ को सत्तर में से 67 सीटें दे दीं।
  जानकार लोग बताते हैं कि यदि नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार से लड़ते हुए सरकार गंवा भी दें तो अगले लोक सभा चुनाव में उन्हें जनता इतनी सीटें दे देगी जिससे वे हर क्षेत्र के भ्रष्टाचारियों को ठंडा करने की ताकत पा लेंगे।
यही बात किसी मुख्य मंत्री पर भी लागू होती है।

बिहार कर्मचारी चयन आयोग के शर्मनाक घोटालों को देखकर यही कहा जा सकता है कि जल्द कुछ कड़े कदम उठाने  की सख्त जरूरत है।अन्यथा देर हो जाएगी।

जिस राज्य व देश के लाखों प्रतिभाशाली और गरीब युवजन इस नतीजे पर पहुंच जाएंगे कि यहां हर पद बिकाऊ है, तो वहां कुछ भी अशुभ हो सकता है।

इस आशंका को निर्मूल करने की कूबत नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार में मौजूद है, ऐसा अनेक लोगों को लगता है।बस हनुमान को उनकी शक्ति का एहसास कराने की जरूरत है।


  ट्रम्प आखिर कैसे करें आतंकियों से अमेरिका की रक्षा 

 दुनिया के जो  लोग अपने देश को भारत की तरह धर्मशाला नहीं बनाना चाहते हैं, उन्हें  अमेरिका के राष्ट्रपति की तरह सोचने का पूरा हक है। पर डोनाल्ड ट्रम्प थोड़ा अतिवादी लगते  हैं।पर आखिर अमेरिका के लोगों ने उन्हें ही चुना है।परिस्थितियों के अनुसार भारत सहित कोई भी देश अलग-अलग स्वभाव का नेता चुनता है।

 अमेरिकी जनता ने ट्रम्प के अतिवाद को  पसंद करके ही तो उन्हें चुना है।आज दुनिया की स्थिति ही कुछ वैसी बना दी गयी है।खबर है कि कुछ अन्य देशों की जनता भी  इस मामले में अमेरिका की राह पर है।

 पर  खुद ट्रम्प को अब एक जिम्मेदार नेता के रूप में व्यवहार करना चाहिए। कुछ देशों के लोगों को अमेरिका प्रवेश से  रोकने से पहले उन्हें अंतरराष्ट्रीय फोरम पर अपनी आंतरिक सुरक्षा की  समस्या रखनी चाहिए थी।
उधर जिन लोगों को ट्रम्प की इस रोक पर एतराज है,उन्हें इस बात का वैकल्पिक उपाय बताना चाहिए कि आखिर किसी देश का शासक अपने नागरिकों को  आतंकी हमले से कैसे बचाये।यदि आप ट्रम्प की सिर्फ आलोचना करेंगे और उपाय नहीं सुझाएंगे तो आपकी मंशा पर अनेक लोगों को शक होगा।


   आतंकवाद पर भारत में गंभीरता की कमी

घुसपैठियों ने भारत को धर्मशाला समझ रखा है।बाहरी और भीतरी तत्वों की मदद से कई तरफ से विदेशी नागरिक भारत में प्रवेश करके बसते जा रहे हैं। उनमें से कुछ शरणार्थी जरूर हैं,पर अधिकतर अतिक्रमणकारी है।

उनमें कई आतंकी तत्वों को पनाह भी दे रहे हैं। पर वोट के लिए हमारे देश के अनेक नेता व दल उन घुसपैठियों के लिए राशन कार्ड का प्रबंध कर  रहे हैं और मतदाता सूची में उनके नाम दर्ज करवा रहे हैं।

इस मामले में पश्चिम बंगाल और असम की स्थिति बहुत  खराब रही है। खबर है कि बंगाल में तो एक और कश्मीर पल रहा है। कुछ तथाकथित सेक्युलर दल भाजपा के बड़े विरोधी है। ठीक ही है। विरोध होना भी चाहिए।पर क्या ऐसी राष्ट्रद्रोही गतिविधियों का विरोध करने का
काम सिर्फ भाजपा का है ? यदि यह काम सिर्फ उसी के जिम्मे आप छोड़ देंगे तो भाजपा जनता में और मजबूत होगी।

अब बताइए कि जाने-अनजाने भाजपा के मददगार आप बन रहे हैं या नहीं? देश की एकता-अखंडता की रक्षा करने की जिम्मेदारी हमारे संविधान ने सभी नागरिकों पर सौंपी है।


    और अंत में 

व्यापमं घोटाले की तरह का है ताजा बिहार कर्मचारी चयन आयोग घोटाला। इस घोटाले के आरोपी सचिव परमेश्वर राम हाल में एस.आई.टी.के सामने थे। पूछताछ हो रही थी। पर परमेश्वर के जवाब में एक अजीब हेंकड़ी और ऐंठ थी। कोई डर-भय नहीं। साफ लगता था कि परमेश्वर को किन्हीं बड़ी हस्तियों का संरक्षण मिला हुआ है।



शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

तीन बार से अधिक दलबदल पर कम्प्यूटर ही कर दे नामांकन रिजेक्ट

जब-जब चुनाव निकट आता है, तो कुछ बातें खुलकर सामने आने लगती हैं। यह कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था एक साथ कितने बड़े-बड़े खतरे झेल रही है। यह खतरा मुख्यतः चुनावी भ्रष्टाचार, परिवारवाद, दलबदल और घोर सांप्रदायिक तत्वों से है। कुछ खतरे और भी हैं।

पर चुनाव समाप्त होने के साथ ही लोगबाग इन खतरों को भूल जाते हैं।

नेता भला क्यों याद रखेंगे? उनका उनमें निहितस्वार्थ जो है। जो कुछ नेता याद रखते भी हैं, उन्हें राजनीति की मुख्य धारा कुछ सकारात्मक करने से रोक देती है। जबकि हर चुनाव के साथ यह खतरा बढ़ता ही जा रहा है। कुछ खतरे तो साफ दिखाई पड़ते हैं। पर कुछ अन्य भीतर-भीतर पल रहे हैं।

 अगले कुछ साल तक यदि ऐसा ही चलता रहा तो उस लोकतंत्र की छवि पूरी तरह धूमिल और अराजक हो जाएगी जिसकी शुरुआत 1952 में यहां हुई थी।

 अराजक स्थिति के बीच इस बात की भी आशंका है कि किसी दिन कोई तानाशाह बचे-खुचे लोकतंत्र को पूरी तरह नष्ट ही न कर दे! कुछ दूसरे देशों में ऐसा हो चुका है।

    उत्तर प्रदेश और पंजाब सहित पांच राज्य विधानसभाओं के चुनाव हो रहे हैं। इनमें से दो प्रमुख राज्यों के विभिन्न दलों के कुछ खास नेतागण कई मामलों में बेशर्मी की हद पार कर रहे हैं।  वे लोग संविधान निर्माताओं की आत्मा को चोट पहुंचा रहे हैं।
फिलहाल दलबदल के मामले को देखें। राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो इसका हल आसान है।
 वैसे भी चुनाव सुधार की दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताजा पहल सराहनीय है। पर यह अभी पहल विचार और बोली के स्तर पर ही अधिक है। सवाल है कि उनकी सरकार उसे कब कार्यरूप देगी?
  कल्पना कीजिए कि किसी दिन देश की सारी लोकसभा व विधानसभा सीटों पर वही लोग चुनाव लड़ें और जीतें जिनके पूर्वज जनप्रतिनिधि रहे हों ! जो आदतन दल बदलू हों, जिनका माफियाओं से संबंध हो। जिन्होंने  नाजायज तरीके से अकूत संपत्ति एकत्र कर ली हो। जो भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हों और न्यायिक प्रक्रिया जिनके सामने फेल हो।
 इन समस्याओं से निपटने के लिए कहीं से शुरुआत तो करनी ही पड़ेगी। पहले कदम के तहत दल बदल कानून में ऐसा संशोधन होना चाहिए  ताकि कोई व्यक्ति तीसरी बार दल बदले तो वह चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जाए।
  सबसे बड़ी पार्टी भाजपा इसकी पहल करके कमाल कर सकती है।
पहली बार केंद्र में एक ऐसी सरकार बनी है जिसकी मंशा बेहतर लग रही है। उसके पास बहुमत भी पर्याप्त है।
राजनीतिक व प्रशसनिक दिशा भी कुल मिलाकर ठीकठाक ही है।
पर आश्चर्य है कि चुनाव सुधार करने और उच्चस्तरीय प्रशासनिक भ्रष्टाचार समाप्त करने की दिशा में ठोस पहल क्यों नहीं हो रही है ?
शायद मोदी जी खंूखार भ्रष्टों और ताकतवर निहितस्वार्थियों पर निर्णायक हमला करने से डर रहे हैं। सरकार गिरने का डर है क्या ?
डरते रहने वालों की सरकारें और पहले गिर जाती हैं। निडर होकर सर्जिकल स्ट्राइक करने पर सरकार की आयु लंबी हो जाती है। सन 1969 की इंदिरा गांधी इसका उदाहरण है। 1969 में उनके दल का लोकसभा में बहुमत नहीं रह गया था। पर बैंक राष्ट्रीयकरण और राजाओं के प्रिवी पर्स की समाप्ति के बाद हुए चुनाव में उन्हें लोस में बहुमत मिल गया।
कहावत है कि एक गलती भगवान भी माफ कर देता है। पर एक ही गलती। यानी एक से अधिक की माफी को भगवान भी गैर जरूरी मानता है। पर आज एक ही नेता को कितनी बार दल बदल की अनुमति दलीय सुप्रीमो देंगे ? याद रहे कि अपवादों को छोड़ दें तो दल बदल घटिया स्वार्थों की पूर्ति के लिए ही हो रहे हैं। ऐसे नेताओं की अब कमी नहीं है कि एक ही नेता अब तक पांच -छह बार दल बदल कर चुके हैं।
 चुनाव के लिए नामंाकन पत्र दाखिल करते के साथ ही कम्प्यूटर ऐसे उम्मीदवारों का नामांकन रिजेक्ट कर सकता है जो उससे पहले भी दो बार  अलग-अलग दलों के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हंांे।
यदि ऐसा कानून बना और कम्प्यूटर में प्रोग्रामिंग हुई तो कोई नेता अपने पूरे जीवन काल में दो बार से अधिक दल बदल नहीं कर सकेगा।
यदि सरकार सुधार करना चाहे तो उपाय तो बहुत हंै। न करने के बहाने अनेक हैं। कानून में ऐसे संशोधन की पहल करते ही भाजपा व मोदी की लोकप्रिता का ग्राफ और ऊपर चला जाएगा।


बोल ही नहीं, दल बदल के भी घृणित उदाहरण

साक्षी महाराज अपने कु-बोल ही नहीं बल्कि दल बदल के भी निंदनीय  उदाहरण हैं। उनके बोल अक्सर संविधान के प्रावधानों और भावनाओं के खिलाफ होते हैं। हालांकि इस देश में साक्षी ऐसे  अकेले नेता नहीं हैं। हर रंग की साम्प्रदायिक राजनीति में एक ‘साक्षी’ मौजूद  हंै। वे एक दूसरे से राजनीतिक टाॅनिक पाते रहते हैं। दोनों पर समान प्रहार जरूरी है।

साक्षी महाराज पहले सपा से राज्यसभा सदस्य थे। संासद फंड में से घूस लेने के आरोप मंे कुछ साल पहले उनकी सदस्यता चली गयी थी।

अब साक्षी भाजपा से लोकसभा सांसद हैं। ऐसे नेताओं को नीति -सिद्धांत से कुछ लेना देना नहीं होता है।


चुनावी खर्च बढ़ाओगे तो बदनामी होगी ही 

 चुनाव में काले धन के इस्तेमाल को लेकर वैसे नेताओं की भी बदनामी होती रहती है जिन्होंने अपनी व्यक्तिगत संपत्ति बढ़ाने के लिए राजनीति या सत्ता का कभी इस्तेमाल नहीं किया।

आजकल नरेंद्र मोदी का नाम ‘सहारा’ वालों से पैसे लेने के आरोप के तहत आ रहा है।

 पूरी सच्चाई जांच के बाद ही आ पाएगी। पर अभी मान भी लें कि उन्हें पैसे दिए गए तो भी संकेत यही है कि उन पैसों का इस्तेमाल चुनावी खर्चे में ही किया गया होगा। निजी संपत्ति बढ़ाने के लिए नहीं। राजनीति से  बाहर का कोई निष्पक्ष व्यक्ति नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत ईमानदारी पर शक नहीं करता।

पर सवाल है कि गत लोकसभा चुनाव के समय मोदी जी अपने सभा मंचों पर ही लाखों-करोड़ों रुपए क्यों खर्च कर रहे थे ? उनके दल के अनेक छोटे- बड़े नेता भी चार्टर विमान से यात्रा क्यों कर रहे थे ?

क्या वी.पी.सिंह इसी तरह के अनाप शनाप खर्च करके प्रधानमंत्री बने थे ?

कर्पूरी ठाकुर ने तो कभी हेलीकाॅप्टर से चुनाव प्रचार नहीं किया। फिर भी वे दो बार मुख्यमंत्री और एक बार उप मुख्यमंत्री बने। जबकि उन दिनों बिहार का क्षेत्रफल आज से बड़ा था।


महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य 

महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल की कहानी पूरे देश की कहानी है। आज तो नेता के गिरफ्तार होते ही उन्हें किसी अस्पताल में जगह दे दी जाती है। क्योंकि वे बीमार हो जाने का बहाना तुरंत बना लेेतेे हैं।
अपवाद की बात और है। इस मामले में फिल्म अभिनेता ऐसे नेताओं से अभिनय सीख सकते हैं।

  आम लोगों का इस सिस्टम पर गुस्सा बढ़ जाता है जब यह पता चलता है कि नेता जी को न तो उससे पहले कभी किसी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था और न ही जेल से वापस आने के बाद।

  पर ऐसे ही एक मामले में महाराष्ट्र के एक डाक्टर अदालत की नाराजगी का सामना कर रहे हैं। चर्चित नेता छगन भुजबल विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में हैं। अदालत ने उन्हें कुछ घंटोें के लिए अस्पताल जाने की अनुमति दी थी।

पर कुछ घंटे उनके लिए महीना बन गये। ऐसा मुम्बई के एक अस्पताल के डीन और जेल अधिकारी की साठगांठ से हुआ। भुजबल के प्रभाव के कारण ऐसा हुआ।

कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करते हुए ऐसा किया गया। डीन साहब अदालत की मर्जी के खिलाफ काम करने का मामला झेल रहे हैं।


और अंत में

  ईश्वर ने दो कान और दो आखें दी हैं। पर मुंह एक ही दिया है। यानी आदेश है कि जितना बोलिए, उसकी अपेक्षा पहले दुगुना सुनिए और देखिए। यानी चीजों को परखिए।पर हमारे अधिकतर नेता क्या करते हैं ? ईश्वर के अघोषित आदेश का रोज ही उलंघन करते हैं।
( प्रभात खबर के 20 जनवरी 2017 के अंक में प्रकाशित )

 
 

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

जैन से सहारा तक डायरियों का नतीजा सिफर ही रहा है

सहारा समूह पर छापे के दौरान मिली एक डायरी इस समय देश भर में चर्चा का केंद्र है। लेकिन क्या इस डायरी में दर्ज सूची का हाल भी वही होने वाला है जो पहले की सूचियों का हुआ ?

नब्बे के दशक में चंदे की एक ऐसी ही सूची जैन हवाला डायरी में मिली थी।

  हवाला घोटाले की वह  सूची तो  आखिरकार दबा ही दी  गयी।

अब देखते हैं कि सहारा सूची का क्या होता है ! जब किसी सूची में अनेक दलों के बड़े-बड़े नेताओं के नाम होते हंै तो उसके अंततः दब जाने की ही आशंका रहती है। बिहार का चारा घोटाला भी एक हद तक सर्वदलीय और बहुपक्षीय प्रेरित घोटाला ही था।उस घोटाले की जांच के सिलसिले में भी एक सूची मिली थी।उस सूची में करीब चार दर्जन पत्रकारों के नाम भी थे। 

चलिए चारा घोटाले में कुछ लोगों को निचली अदालतों से  सजाएं होने लगीं हैं।पर चारा घोटाला के मामलों को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने और वहां अंतिम फैसला होने में अभी वर्षों लगेंगे।

  इस देश में व्हिसिल ब्लोअर  एक सूची से दूसरी सूची की ओर दौड़ रहे हैं।इस बीच एक से बढ़कर एक सूची सामने आती रहती है।

 भला सिस्टम से कोई कितना और कैसे लड़ सकता है ! तब जबकि सिस्टम में ही घुन लग गया हो !
  व्हिसिल ब्लोअर विनीत नारायण हवाला मामले को उसकी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचा सके।अब देखना है कि सहारा डायरी मामले में  प्रशांत भूषण को कितनी सफलता मिलती है ! पर एक बात जरूर है।अदालती फैसला आने से पहले जागरूक मीडिया के कारण असली बातें लोगों तक पहुंच ही जाती हैं।आजकल तो सोशल मीडिया भी ताकतवर होता जा रहा है जो कुछ भटकावों के बावजूद कमाल कर रहा है।सकारात्मक बात यह है कि  विनीत नारायण और प्रशांत भूषण जैसे बहादुर लोग उपलब्ध हैं।सिस्टम से  लड़ने का जोखिम उठाना भी बहुत बड़ी बात है।यहां तक कि हवाला डायरी मामले में भी विनीत नारायण के अलावा भी कुछ लोगों ने सराहनीय भूमिकाएं  निभाई थीं।

 सहारा सूची का क्या हश्र होगा,यह तो बाद की बात है।इस अवसर पर पहले जैन हवाला कांड का हश्र देख लेना मौजूं होगा।उससे आगे का संकेत मिल सकता है।

  1991 की बात है।उन दिनों भी देश में  आतंकी घटनाएं हो रही  थीं।

दिल्ली पुलिस ने जे.एन.यू. के एक छात्र शहाबुददीन गोरी को जामा मस्जिद इलाके से पकड़ा।उस पर आरोप था कि वह कश्मीरी आतंकियों को पैसे पहुंचाता था।पैसे हवाला के जरिए बाहर से आते थे।गोरी के यहां से जैन बंधुओं का सुराग मिला।

मामला सी.बी.आई.को सौंपा गया। सी.बी.आई. ने दिल्ली के साकेत में एस.के. जैन बंधुओं के यहां  छापा मारा।वहां भारी रकम के अलावा सनसनीखेज डायरी भी मिली।उससे पता चला कि इन हवाला कारोबारियों ने देश के विभिन्न दलों के करीब 115 बड़े नेताओं और अफसरों को कुल मिलाकर 64 करोड़ रुपए दिये।

उन नेताओं में  पूर्व प्रधान मंत्री ,पूर्व व वत्र्तमान केंद्रीय मंत्री, पूर्व मुख्य मंत्री तथा अन्य प्रमुख नेता शामिल थे ।
 उनमें से सिर्फ शरद यादव ने यह स्वीकार किया कि उन्हें जैन से 5 लाख रुपए मिले थे।क्या जैन बंधुओं के पैसे  सिर्फ शरद यादव के लिए थे  ?
ऐसा कत्तई नहीं था।

   पैसे लेने वाले अन्य नेताओं ने इस आरोप को साजिश बताया। विनीत नारायण की जान पर खतरा भी आया।उन्हें धमकियां मिल रही थीं।याद रहे कि विनीत  इस मामले को अदालत ले गए थे।आरोपित नेता गण इतने ताकतवर थे कि इस बीच उन नेताओं के प्रभाव में आकर एक बहुत बड़े वकील ने विनीत का साथ छोड़ दिया।
हालांकि ‘दान’ लेने वालों के नाम अखबारांें में छपे।लोकलाज से मुख्यतः लालकृष्ण आडवाणी और तीन केंद्रीय मंत्रियों ने अपने पदों से इस्तीफा भी दिया।

विदेश राज्य मंत्री सलमान खुर्शीद ने तब यह स्वीकार किया कि  चुनाव फंड में पारदर्शिता न होने के कारण हवाला कांड होते हैं।

 पर सवाल है कि खुर्शीद और उनकी पार्टी बाद  में अनेक वर्षों तक सत्ता में रहे।क्यों नहीं पारदर्शिता लाने की कोशिश की ?

जैन हवाला रिश्वत कांड का यह मामला जब अदालत में पहुंचने वाला था तो जांच एजेंसी सी.बी.आई पर भारी दबाव पड़ा।जब सत्ताधारी दल और मुख्य प्रतिपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं पर आरोप हों तो ‘सरकारी तोता’ यानी सी.बी.आई.आखिर कर भी क्या सकती है ?

  पर आरोपितों को इतने से संतोष नहीं हुआ।उनमें से किसी ने सुप्रीम कोर्ट पर भी दबाव डलवाया।यह सब ऐसे कांड में हुआ जिस कांड में आतंकवाद का तत्व भी जुड़ा हुआ था।यानी जैन बंधुओं ने संभवतः इसलिए भी देश के लगभग सभी प्रभावशाली नेताओं और अफसरों को रिश्वत दी ताकि कश्मीरी आतंकवादियों को पैसे पहुंचाते रहने में उन्हें कोई बाधा नहीं आए।चिंताजनक बात यह है कि  आतंकवाद के प्रति हमारे अधिकतर हुंक्मरानों का ऐसा ही रवैया रहा है।हालांकि यह भी कहा गया कि कुछ नेताओं के पैसे उनकी काली कमाई के थे। 

   ताजा सहारा डायरी के अनुसार लाभुकों की दमदार सूची देखकर यह अंदाज लगाया जा सकता है कि इनके साथ जांच एजेंसियां कैसा सलूक करेंगी ! भूतकाल के अनुभव अच्छे नहीं हैं।

  आगे का अंदाजा न्यायमूत्र्ति जे.एस.वर्मा की पिछली टिप्पणी से लगाया जा सकता है।

14 जुलाई 1997 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जे.एस.वर्मा ने अदालत में कहा था कि हवाला कांड को दबाने के लिए हम पर लगातार दबाव पड़ रहा है।

हालांकि उन्हें दबाव में आने की जरूरत ही नहीं पड़ी।सी.बी.आई.ने ही इस कांड की ठीक से जांच  नहीं की।वर्मा ने बाद में सी.बी.आई.तथा अन्य जांच एजेंसियों के प्रति अपनी नाराजगी भी दर्ज कराई।

(इस लेख का संपादित अंश वेबसाइट हिंदी फस्र्ट पोस्ट के 23 दिसंबर 2016 के अंक में प्रकाशित )
       

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

मिनी युद्ध है नोटबंदी और काले धन के खिलाफ अभियान


शुरू में तो ऐसा नहीं लग रहा था । पर जैसे -जैसे नोटबंदी अभियान आगे बढ़ा तो लगने लगा कि यह तो मिनी युद्ध है। काले धन की काली ताकत के खिलाफ सरकार का युद्ध ! काफी ताकतवर साबित हो रही हैं ये काली ताकतें।

 इन काली शक्तियों को देश के प्रभु वर्ग का पूरा समर्थन मिला हुआ है। किसी तरह के युद्ध में दोतरफा क्षति होती ही है। नोटबंदी में भी यही हो रहा है। युद्ध में निर्दोष लोग भी मरते हैं और परेशान होते हैं।

 जब बेनामी संपत्ति पर बड़े पैमाने पर सरकारी हमले शुरू होंगे तो युद्ध भीषण रूप धारण कर सकता है।

  काली ताकतों की शक्ति तो देखिए! एक तरफ आम लोग कतारों में एक-दो हजार रुपए के लिए तरसते रहे तो दूसरी ओर काली ताकतों ने बैंकों के पिछले दरवाजों से करीब एक लाख करोड़ रुपये के अपने काले धन को सफेद बना लिया। यह रकम और बढ़ेगी।

 काले धन को सफेद करते हुए कुछ प्रमुख राजनीतिक दलों के कुछ नेता भी स्टिंग आपरेशन में कैमरों पर धरे गये।

 बैंकों के छोटे-बड़े कर्मचारियों की साठगांठ के बिना तो यह संभव ही नहीं था। ऐसे ही बैंक अफसरों और नेताओं की साठगांठ से बैंकों के लाखों करोड़ रुपए एन.पी.ए. बना दिये गये हैं।.

   रिजर्व बैंक ने बैंकों को निदेश दिया है कि वे सीसीटीवी रेकाॅर्डिंग को संभाल कर रखें। इस निदेश के बदले रिकाॅर्डिंग को तत्काल जब्त करना चाहिए था। क्योंकि जो बैंककर्मी काउंटर पर लगी कतार को तरसता छोड़ पिछले दरवाजे से काले धन का सफेद कर सकता है, वह अपने बचाव में सीसीटीवी की रिकाॅर्डिंग को भी सफेद करा सकता है।




देश में भुखमरी के बीच भ्रष्टों की चांदी
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि भ्रष्टाचार ने देश के विकास को रोक रखा है। यह आधा सच है। पूरा सच  है कि एक तरफ तो 40 प्रतिशत अन्न बर्बाद हो जाता है और दूसरी ओर करीब 20 करोड़ लोग हर शाम बिना भोजन के सो जाते हैं। अब भी एक तिहाई लोग गरीब हैंे। एड्स, मलेरिया और टीबी से कुल मिलाकर जितने लोग मरते हैं, उतने ही लोग भूख और कुपोषण से भी मर जाते हैं। देश के अधिकतर प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों में मरहम पट्टी तक के लिए रूई तक नहीं है। क्योंकि सरकारों के पास पैसे नहीं है। जितने पैसे हैं भी, उनमें से अधिकांश सरकारी-गैर सरकारी बिचैलिए हड़प लेते हैं। जरूरत के अनुसार न तो स्कूल बन रहे हैं और न ही अस्पताल। अदालत भवनों का भी यही हाल है।

 प्रभावशाली लोगों ने सरकारी  बैंकों से कर्ज लेकर करीब 7 लाख करोड़ रुपए पचा लिये हैं। उन लुटेरों के नाम तक जाहिर करने की हिम्मत किसी सरकार में नहीं है। वही काली ताकत नोटबंदी अभियान को भी विफल करने के काम में लगी हुई है।.

 ऐसे भ्रष्ट लोगों को अनेक नेताओं, सरकारी अफसरों और अन्य लोगों का समर्थन हासिल है। नोटबंदी पर कुछ नेताओं की बौखलाहट उसी का प्रतीक है। जिस नेता पर भ्रष्टाचार के जितने गंभीर आरोप हैं, वे उतने ही अधिक बौखला गए हैं।

  एन एन वोहरा कमेटी ने देश के लुटेरा गिरोहों की उपस्थिति की ओर इशारा किया था। इस गिरोह में अपराधी तत्व, माफिया सिंडिकेट, भ्रष्ट नेता, सरकारी अफसर, ड्रग कारोबारी और हवाला कारोबारी शामिल हैं। नीरा राडिया टेप पर भरोसा करें तो उस गिरोह में अब मीडिया के भी कुछ प्रभावशाली लोग शामिल हो चुके हैं।




क्यों है यह मिनी युद्ध 
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 स्वाभाविक ही है कि ऐसी ताकतवर काली जनद्रोही शक्तियों के खिलाफ जब कोई छोटी कार्रवाई भी होगी तो वे पूरी तरह बौखला जाएंगे। नोटबंदी छोटी कार्रवाई है। शुरुआती कार्रवाई। नारों से हटकर यदि इस देश के गरीबों को उनका हक दिलाना है तो काली शक्तियों के खिलाफ जनसमर्थन के बल पर सरकार को मिनी क्या पूर्ण युद्ध लड़ना होगा। अभी केंद्र सरकार लड़ भी रही है। वह हार जाएगी तो जनता लड़ेगी।

 क्योंकि इस ‘युद्ध’ के सिलसिले में काली ताकतों के असली कारनामों का पता लोगों को लग जाएगा। इससे जनता का गुस्सा और बढ़ेगा।

 वैसे कारनामों का पता लगना शुरू भी हो गया है। इसलिए बैंकों और एटीएम के सामने लंबी और उबाऊ कतारों में घंटों खड़े होने के बावजूद कई लोग मीडिया को बता रहे हैं कि भले हमें तकलीफ हो रही है, पर नोटबंदी का फैसला सही है।




ऐसे-वैसे दलों के कैसे-कैसे नेता !
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समाजवादी पार्टी ने पूर्व सांसद अतीक अहमद को उत्तर प्रदेश विधान सभा का उम्मीदवार घोषित किया है। इस बीच उन पर आरोप लगा है कि उन्होंने अपने हथियारबंद समर्थकों के साथ इलाहाबाद के एक शिक्षण संस्थान में घुस कर वहां के स्टाफ के साथ मारपीट करवाई। इस सिलसिले में अतीक पर डकैती का मुकदमा कायम हुआ है।

 उधर मध्य प्रदेश के एक भाजपा विधायक पर आरोप लगा है कि उन्होंने शराब के नशे में धुत्त होकर एक सामाजिक समारोह में अपने आग्नेयास्त्र से धुआंधार फायरिंग की। फायरिंग करते समय वे लड़खड़ा रहे थे।

  इधर पटना में भाजपा नेता सुशील मोदी ने आरोप लगाया कि फर्जीवाड़ा के आरोप में एक जदयू विधायक की पत्नी फरार हैं। उधर जदयू के प्रवक्ता संजय सिंह का आरोप है कि भाजपा के 53 विधायकों में से 34 पर आपराधिक मुकदमे हैं। दिल्ली के एक वकील के यहां जब भारी मात्रा में कालाधन पकड़ा गया तो पता चला कि एक पूर्व केंद्रीय मंत्री का भी उसमें हिस्सा है।

कर्नाटक के आबकारी मंत्री को सेक्स स्कैंडल के आरोप में इस्तीफा देना पड़ा। रांची की अदालत ने झारखंड सरकार के एक पूर्व मंत्री को आय से अधिक संपत्ति एकत्र करने के आरोप में पांच साल की कैद की सजा सुनाई। नोटबंदी के दौरान तीन प्रमुख दलों के नेता भी काला धन को सफेद करते कैमरे पर पकड़े जा चुके हैं।

 केंद्रीय राज्य मंत्री किरण रिजिजू आरोपों के घेरे में हैं तो भाजपा के अनुसार अगस्ता हेलिकाॅप्टर खरीद घोटाले में एक राजनीतिक परिवार को रिश्वत मिली है।

 राहुल गांधी ने आरोप दुहराया है कि यदि वह प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का खुलासा कर दें तो भूकम्प आ जाएगा।

 इस बीच नरेंद्र मोदी ने अपना यह संकल्प दुहराया है कि सिस्टम से भ्रष्टाचार मिटाना मेरी प्राथमिकता है।
उपर्युक्त सारी खबरें इसी सप्ताह की हैं। ऐसी खबरें पहले भी आती रही हैं। इस देश में आखिर क्या हो रहा है ? विभिन्न दलों के नेताओं के परस्पर विरोधी बयानों से साफ है कि सिस्टम पर जन विरोधी और लालची तत्व पूरी तरह हावी हैं। ऐसे ही तत्व राजनीति और सत्तानीति को गहरे प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे निहितस्वाथियों से सिस्टम को मुक्त करने के लिए कुछ लोग ‘मिनी युद्ध’ की जरूरत महसूस कर रहे हैं।




सारे बैंककर्मी एक जैसे नहीं
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  यह सच है कि कुछ बैंककर्मियों की मदद से ही  अनेक धंधेबाजों ने अपने काले धन सफेद किये। साथ ही अधिकतर बैंककर्मियों ने तो इस बीच रात दिन ग्राहकों की सेवा की है।

 गांवों से मिल रही खबरों के अनुसार अनेक लोग नोटबंदी के फैसले के कारण पहले से ही केंद्र सरकार से खुश है। अब जब बारी-बारी से भ्रष्ट बैंककर्मियों की गिरफ्तारी हो रही है तो वे और खुश हैं।उन्हें समाज के उन अन्य  बड़े धन पशुओं की भी गिरफ्तारी का इंतजार है जिनके धन बैंककर्मी सफेद कर रहे हैं। उन गिरफ्तारियों के बाद तो आम लोग और भी गदगद होंगे।

 लोगबाग यह देख रहे हैं कि एक तरफ आम लोग हजार-दो हजार रुपए के लिए तरस रहे हैं तो दूसरी ओर इस देश के कुछ भ्रष्ट लोग करोड़ों-अरबों में खेल रहे हैं।



और अंत में
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ताजा खबर के अनुसार बिहार के मेडिकल कालेजों के एमबीबीएस के 145 छात्र फस्र्ट इयर की फाइनल परीक्षा में फेल कर गये। कुछ साल पहले यह खबर आई थी कि पटना मेडिकल कालेज के प्रथम वर्ष के आधे छात्र फाइनल परीक्षा में फेल कर गये थे।

ये खबरें यह साफ बता रही हैं कि मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में व्यापक धांधली हो रही है। कैसे-कैसे  डाक्टर तैयार कर रही है सरकार ?


( 16 दिसंबर, 2016 के प्रभात खबर के बिहार संस्करण में प्रकाशित)
 




शनिवार, 10 दिसंबर 2016

भूपेंद्र अबोध को हार्दिक श्रद्धांजलि



एक बार मैंने यूंही भूपेंद्र अबोध से पूछ दिया था कि आखिर मनोहर श्याम जोशी आपको और प्रभाष जोशी मुझे इतना प्यार क्यों करते हैं ?

अबोध जी ने बिना देर किए कहा कि ‘जोशी लोग बड़े उदार होते हैं।’ बाद में जब नवीन जोशी का भी स्नेह मुझे मिला तो अबोध जी की बात मुझे और भी सही लगने लगी।

 मनोहर श्याम जोशी जब साप्ताहिक हिंदुस्तान के संपादक थे तो दिलीप कुमार ने इंटरव्यू देना मंजूर किया था। जोशी जी ने बिहार से भूपेंद्र अबोध को ही इस काम के लिए बंबई भेजा था। अबोध जी की प्रतिभा पर ऐसा विश्वास था मनोहर श्याम जोशी का। अबोध जी ने तो फिल्मी दुनिया की बहुत सी रपटें लिखीं। पटना में स्वामी दादा फिल्म की कहानी को लेकर जब केस हुआ था तो देवानंद ने कल्पना कार्तिक के भाई को पटना जाकर भूपेंद्र अबोध से मिलने को कहा था।

  पर अबोध जी का रचना संसार सिर्फ फिल्मी क्षेत्र ही नहीं था। टेलीफोन एक्सचेंज की साधारण नौकरी और बड़े परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी के बावजूद उन्होंने कविता -कहानी के साथ-साथ कथा रिपोर्ताज भी खूब लिखे।

  महेंद्र मिसिर और नक्षत्र मालाकार पर अबोध जी की खोजपूर्ण रपट मुझे याद हंै। संभवतः किन्हीं बड़ी हस्तियों के लिए वे ‘घोस्ट राइटिंग’ भी करते थे। उनके साथ बातचीत में इसका संकेत भी मुझे मिला था। हालांकि वे इसका खुलासा नहीं करते थे। लगता है कि परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी उठाने के लिए उन्हें यह सब करना पड़ता था। क्षमता से अधिक मेहनत।

इलाहाबाद के मित्र प्रकाशन की पत्रिकाओं के लिए भी उन्होंने जम कर लेखन किया।

 अबोध जी नये पत्रकारों के लिए मार्ग दर्शक भी थे। मैं भी उनके साथ लंबी बैठकी करता था और कुछ सीखता था। हम दोनों की बैठकी के बीच एक ही बाधा थी उनकी चेन स्मोकिंग की लत। अतिशय सिगरेट ने उनके शरीर को जर्जर बना दिया था। ऐसे बहुमूल्य जीवन को अपने लिए नहीं तो कम से कम समाज के लिए अपने स्वास्थ्य को बचाकर रखना चाहिए।

अब अबोध जी हमारे बीच नहीं रहे। खैर उनकी निशानी के रूप में उनकी बहुत सारी रचनाएं और उनका प्रतिभाशाली कार्टूनिस्ट पुत्र पवन हमलोगों के बीच है। योग्य पिता के योग्य पुत्र।
पवन जैसा कार्टूनिस्ट विरले हैं।

एक से अधिक लोगों ने मुझे बताया कि हिंदुस्तान के प्रति उनके आकर्षण का सबसे बड़ा कारण पवन के कार्टून हंै।

नंद किशोर नवल ने 2007 में लिखा था कि ‘मनोहर श्याम जोशी ने भूपेंद्र अबोध की प्रतिभा को पहचाना था जिससे वे साप्ताहिक हिंदुस्तान के अनिवार्य लेखक हो गए थे। वे मूलतः कवि और कथाकार थे। अखबारी और सामयिक लेखन उनके लिए उपयुक्त क्षेत्र नहीं था। लेकिन जब वे उस तरफ मुड़े तो वहां भी अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा का चमत्कार दिखाया।’