रज्जू बाबू की पुण्यतिथि -9 अप्रैल-पर
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मुख्य धारा की हिन्दी पत्रकारिता
में राजेंद्र माथुर का नाम अत्यंत सम्मान
के साथ लिया जाता है।
वे अजातशत्रु थे।
जहां तक मैंने उन्हें समझा था,
वह संतुलित मन -मिजाज के थे।
उनके लेखन में नवीनता और ताजगी रहती थी।
देशहित में जो उचित समझते थे,वही लिखते थे।
अन्य किसी बात का उन पर कोई असर नहीं होता था।
उनकी एक ही उक्ति यहां पेश करना चाहूंगा जो आज
भी सर्वाधिक प्रासंगिक है।
व्यक्तिगत बातचीत में 1983 में उन्होंने मुझसे कहा था कि
‘‘इंदिरा जी के खिलाफ जितनी भी कड़ी खबर लाइए,मैं उसे जरुर छापूंगा।
पर इंदिरा जी में कई खूबियां भी हैं।
मैं उन खूबियों को भी छापूंगा।’’
राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका में कोविड -19 की जो वैक्सीन विकसित की जा रही है, उसे भारत को शुरुआती दौर में ही उपलब्ध कराया जाएगा।
क्योंकि पी.मोदी ने क्लोरोक्विन को लेकर मेरा अनुरोध माना।
-- राहुल कंवल
अन्य बातों के अलावा सांसद फंड ने वंशवाद-परिवारवाद
को आगे बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
अनेक चुनाव क्षेत्रों में अनेक राजनीतिक कार्यकत्र्ता, फंड के ठेकेदार भी हैं।
या यूं कहें कि फंड के ठेकेदार राजनीतिक कार्यकत्र्ता बन गए हैं।
जब अनेक सांसदों को इस रास्ते से तथाकथित ‘कार्यकत्र्ता’ मिल ही जाते हैं तो परंपरागत राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं की जरुरत ही क्या है ?
जब वास्तविक राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं की कमी हो जाएगी तो संासद के
टिकट के प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों की संख्या भी घट जाएगी।
फिर तो समय आने पर अपने वंश या परिजन को आगे बढ़ा देने में सांसदों को सुविधा हो जाएगी।
---सुरेंद्र किशोर -7 अप्रैल 2020
सांसद फंड के रहते राजनीति
व प्रशासन में शुचिता असंभव
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सुरेंद्र किशोर
कांग्रेसी नेता वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाली प्रशासनिक सुधार समिति ने सांसद क्षेत्र विकास निधि को हमेशा के लिए समाप्त कर देने की सन 2011 में ही सिफारिश कर दी थी।
उसी फंड को नरेंद्र मोदी सरकार ने जब विश्ेाष परिस्थिति में सिर्फ
दो साल के लिए स्थगित करने का निर्णय किया तो कांग्रेस ने इस निर्णय का विरोध कर दिया।
अनेक जानकार लोगों की राय रही है कि कोई भी सरकार यदि प्रशासनिक व राजनीतिक भ्रष्टाचार पर कारगर प्रहार करने की ठोस शुरूआत करना चाहती है तो उसे इस फंड को तो यथाशीघ्र समाप्त कर ही देना चाहिए।
पर, लगता है कि मोदी सरकार भी फंड -समर्थक सांसदों के दबाव में है।
यानी, क्या यह मान लिया जाए कि
‘‘मोदी है तो सब कुछ मुमकिन है, लेकिन सासंद फंड की समाप्ति के काम को छोड़कर ?!!!’’
हां, पर एक बात के लिए नरेंद्र मोदी को धन्यवाद !
उन्होंने सांसद फंड को सालाना 5 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 50 करोड़ रुपए कर देने की जोरदार मांग को अब तक स्वीकार नहीं किया है।
याद रहे कि कांग्रेस सांसद और लोक लेखा समिति के अध्यक्ष के.वी.थाॅमस ने कुछ साल पहले कहा था कि
‘‘विभिन्न दलों के सांसदगण जल्द ही प्रधान मंत्री
नरेंद्र मोदी से मिलेंगे।
अनेक सांसद यह चाहते हैं कि सांसद फंड की राशि को सालाना पांच करोड़ से बढ़ाकर 50 करोड़ रुपए कर दिया जाए।
दलीय सीमा से ऊपर उठकर सांसदगण यह मांग कर रहे हैं।’’
अब ताजा जानकारी तो यह है कि करीब आधा दर्जन सांसदों को छोड़कर कोई सांसद, फंड की समाप्ति नहीं चाह रहा है।
सांसद जो कहें,पर मेरी समझ से इस फंड की राशि को बढ़ा देने के मूल कारणों के पीछे कोई वाजिब तर्क नहीं है।
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इस फंड को लेकर बहुत परेशान करने वाली एक बात हो रही है।
वह यह कि इस फंड को खर्च करने के सिलसिले में अधिकतर आई.ए.एस.अफसरों का ईमान भी डोल जाता है।
हालांकि सबका नहीं।
उधर कई सांसदों ने भी ईमान को बचा रखा है।
नतीजतन देश के स्टील फे्रम यानी प्रशासन में जंग लग रहा है।
कहते हैं कि आई.ए.एस.के पास इतना पावर है कि वह चाहे तो देश को ‘स्वर्ग’ बना दे या ‘नर्क’ !!
राजनीतिक कार्यपालिका तो आती-जाती रहती है !
एक प्रमोटी आई.ए.एस. अफसर ने मुझे अस्सी के दशक में बताया था कि आई.ए.एस. यानी ‘‘इंडियन अवतार सर्विस’’ !
अवतार यानी धरती पर भगवान के अवतार !!
हालांकि उसने व्यंग्य में ही कहा था।
दरअसल प्रमोटी को डायरेक्ट वाले भाव कम ही देते है।
खैर, किसी डी.डी.सी.या कलक्टर का मन अपनी नौकरी के प्रारंभिक काल में ही यदि डोल जाएगा तो राज्य का मुख्य सचिव या देश का कैबिनेट सेके्रटी जब वह बनेगा तो उस
अफसर से नरेंद्र मोदी जैसा ईमानदार प्रधान मंत्री भी कत्र्तव्यनिष्ठा की उम्मीद कैसे और क्यों करेगा ?
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7 अप्रैल 20
दीया जलाओ कार्यक्रम का संकेत !
--सुरेंद्र किशोर-
कल के दीया जलाओ कार्यक्रम में जन -जन की सहभागिता के जरिए इस देश के आम लोगों ने एक बार फिर एक बड़ा संकेत दे दिया है।
वह संकेत यह है कि जब भी देश पर संकट आएगा, कुछ अपवादों को छोड़कर हम साथ-साथ हैं।
ऐसा ही जज्बा देश के लोगों ने सन 1962 और सन 1971 के युद्धों के समय भी दिखाया था।
जो लोग आज की एकजुटता को हिन्दू राष्ट्रवाद का नाम दे रहे हैं, वे या तो अनजान हैं या बेईमान।
या फिर राजनीति से प्रेरित हैं।
1971 के बंगलादेश युद्ध के समय जब दक्षिण भारत के एक कांग्रेस सदस्य ने संसद में इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’ कह दिया, तब जब ‘अंध हिन्दू राष्ट्रवाद’ नहीं हुआ
तो आज कैसे हो गया ?
किसी नेता को प्रधान मंत्री भी जनता ही बनाती है।
इस देश की अधिकतर जनता अपढ़ और अधपढ़ भले ही हो,पर विवेकवान जरुर है।
वह आम तौर पर सही राजनीतिक निर्णय करती रही है।
दीया जलाओ कार्यक्रम के जरिए यह भी साबित हो गया कि 1962 और 1971 वाले देशप्रेम का जज्बा आज भी बरकरार है।
यह कोई हिन्दू भावना नहीं है।
युद्ध की स्थिति में किसी भी देश में ऐसी भावना पैदा होती ही है।
पर वहां के लोग उसे ‘इसाई भावना’-अमरीका-,हान भावना -चीन-या ‘बौद्ध भावना’-जापान- नहीं कहते।
दीया जलाओ कार्यक्रम की व्यापक सफलता से मौजूदा सरकार को यह भी संकेत मिल गया कि कोरोना क्या है,इससे भी बड़े किसी संकट की घड़ी में हम सरकार के साथ रहेंगे चाहे मोदी की सरकार रहे या किसी और की।
देश के भीतर और बाहर जितने दुश्मन हमारे खिलाफ आज सक्रिय हैं ,उतने इससे पहले कभी नहीं थे।
इसलिए आने वाले दिनों में कोराना से भी किसी बड़े संकट के मुकाबले के लिए देश को हमेशा ही तैयार रहना ही होगा।
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--- 6 अप्रैल 2020
कहीं दीप जले, कहीं दिल
वाली मनोवृत्ति से ऊपर उठिए !
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इस देश के अनेक लोगों के लिए कोरोना वायरस से
अधिक बड़ी विपत्ति नरेंद्र मोदी है।
जनता कफ्र्यू, लाॅकडाउन और दीया ज्वलन कार्यक्रमों की सफलता के बाद अनेक लोग जल -भुन गए हैं।
साथ ही, लगता है कि यह बात भी अनेक लोगों को सालती रही कि कोरोना का प्रतिकूल असर भारत पर अन्य अनेक विकसित देशों की अपेक्षा कम पड़ा।
पर, मोदी विरोधियो, मोदी तो आपके ही कारण आया है।
यदि चाहिएगा तो आपके ही कारण चला भी जाएगा।
पर उसके लिए आपको अपनी कार्यनीति बदलनी पड़ेगी।
हालंाकि ऐसी उम्मीद तो नहीं है कि आपकी कार्य नीति बदलेगी।कोई संकेत भी नहीं है।
पर कोशिश कर के देखिए ! देश के लिए सही रहेगा।
आम लोगों के लिए मोदी का अभी कोई विकल्प दूर -दूर तक नजर नहीं आता।
आप उसे नीच, गंवार और न जाने क्या -क्या कहते रहिए।
कोई फर्क नहीं पड़ता।
बल्कि उन उक्तियों से उसके प्रति लोगों कीे सहानुभूति ही बढ़ती है।
अब यह जानिए कि आपके कारण कैसे मोदी आया।
दरअसल मतदाता भ्रष्टाचार-महा घोटालों आदि से ऊब गए थे।
भ्रष्टाचार के कोढ़ में मुस्लिम तुष्टिकरण की खाज ने मोदी को केंद्र की सत्ता में ला दिया।
ए.के.एंटोनी ने भी सन 2014 में अपनी रिपोर्ट
में यही कहा था।
2014 के लोक सभा चुनाव के बाद सोनिया गांधी ने एंटोनी से कहा था कि आप चुनाव में कांग्रेस की हार के कारणों पर रपट बनाइए।
एंटोनी ने रपट बनाई।
सोनिया जी को दे दी।
उसमें अन्य कारणों के साथ- साथ यह भी लिखा गया था कि मतदाताओं को, हमारी पार्टी अल्पसंख्यक की तरफ झुकी हुई लगी जिसका हमें नुकसान हुआ।
पर कांग्रेस हाईकमान ने एंटोनी की इस बात को नजरअंदाज कर दिया।
यह बात कुछ अन्य दलों पर भी लागू होती है।
एंटोनी ने जो बातें नहीं कही,महा घोटाले व वंशवाद वाली बातें ,वह सब भी मतदाता जानते ही थे।
आम मुसलमानों के लिए कांग्रेस ने जरुरी कल्याणकारी काम किए होते तो किसी को एतराज नहीं था।
पर वह और अन्य अनेक मोदी विरोधी दल व बुद्धिजीवी तो लगातार उनके बचाव व समर्थन में लगे रहे जो मुसलमानों के बीच के अतिवादी हैं।आज भी वही हो रहा है।
अब आखिर जले भुने लोगों को राहत कैसे मिलेगी ?
मैं उपाय बताता हूं।
मोदी विरोधी लोग ऐसी कोशिश करें ताकि मतदातागण आपको मोदी जमात की अपेक्षा कम भ्रष्ट मानने लगें।
साथ ही, आप अतिवादियों से दोस्ती छोड़कर देश को जेहादी खतरों से बचाने की कोशिश में लग जाएं।
इन खतरों से जूझने की यदि एकमात्र जिम्मेदारी मोदी जमात की ही रहेगी तो वोट भी उसी को मिलेंगे।
स्वतंत्र भारत का चुनावी इतिहास बताता है कि मतदाता हर बार बदतर को छोड़ कर बेहतर को
सत्ता में पहुंचा देते हैं।
अपवादों की बात और है।
‘बेस्ट’ यानी 24 कैरेट का सोना तो कोई
है नहीं- न मैं ,न आप, न कोई दल।
इसलिए कहीं दीप जले, कहीं दिल वाली मनोवृत्ति छोड़िए
और देश के प्रति सकारात्मक सोच में डूब जाइए।
शायद आपके लिए कोई राह निकल जाए।
प्रतिपक्ष मजबूत रहेगा तो लोकतंत्र भी पटरी पर रहेगा।
--- सुरेंद्र किशोर-6 अप्रैल 2020
धरती के भगवान को सलाम !
--सुरेंद्र किशोर --
देश के करीब 31 हजार चिकित्सकों ने भारत सरकार
से कहा है कि वे कोरोना महामारी से निपटने में सरकार
की मदद करना चाहते हैं।
कल के टाइम्स आॅफ इंडिया के अनुसार वरीय सरकारी पदाधिकारी ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।
इन चिकित्सकों में निजी चिकित्सक, सरकार तथा सेना के रिटायर चिकित्सक शामिल हैं।
जहां चिकित्सा के काम में जुटे चिकित्सकों की जान पर खतरा है,कुछ डाक्टरों की जानें भी गईं हैं,वैसे में 31 हजार चिकित्सकों का ताजा आॅफर भावुक कर देने वाला है।
यूं ही उन्हें ‘‘धरती का भगवान’’ नहीं कहा जाता है।
कोरोना महामारी की विपत्ति के इस अवसर पर पूरे चिकित्सा समुदाय ने जो सेवा भावना दिखाई है और दिखा रहे हैं,उससे एक बार फिर आम लोगों में
इस पेशा के प्रति आदर बढ़ा है।
इससे पहले पेशे के कतिपय लोगों में कुछ भटकावों के कारण जरुर कमी आई थी।
--5 अप्रैल , 2020