मंगलवार, 29 जून 2021

    बम विस्फोटों पर मौन क्यों ?

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हाल के हफ्तों में पाकिस्तानी खुफिया संगठन की मदद से संचालित जेहादी तत्वों के कारण बिहार के चार स्थानों में भीषण बम विस्फोट हुए।

क्या किसी तथाकथित सेक्युलर दल के किसी नेता ने इन विस्फोटों की सार्वजनिक तौर पर निंदा की ?

 नहीं की।

वे पहले की ही तरह मौन रहे।

 पर, उनका यह मौन क्या कहता है ?

कुछ कहता जरूर है।

आम लोग भी उस मौन का मतलब आसानी से निकाल 

लेते हैं।

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 तथाकथित सेक्युलर दल यह आरोप लगाते रहे हैं कि भाजपा  

लोगों की धार्मिक भावना उभार कर वोट ले लेती है।

लेती होगी !

लेकिन आप क्या करते हैं ?

यदि सेक्युलर दलों ने इन विस्फोटों,पाक व आई.एस.आई.की निंदा की होती,तो भाजपा को कमजोर करने में उन्हें मदद मिलती।

 पर, उन्हें तो डर लगता है कि निंदा करने से उनका ‘वोट बैंक’ नाराज हो जाएगा।

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--सुरेंद्र किशोर

23 जून 21



    बम विस्फोटों पर मौन क्यों ?

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हाल के हफ्तों में पाकिस्तानी खुफिया संगठन की मदद से संचालित जेहादी तत्वों के कारण बिहार के चार स्थानों में भीषण बम विस्फोट हुए।

क्या किसी तथाकथित सेक्युलर दल के किसी नेता ने इन विस्फोटों की सार्वजनिक तौर पर निंदा की ?

 नहीं की।

वे पहले की ही तरह मौन रहे।

 पर, उनका यह मौन क्या कहता है ?

कुछ कहता जरूर है।

आम लोग भी उस मौन का मतलब आसानी से निकाल 

लेते हैं।

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 तथाकथित सेक्युलर दल यह आरोप लगाते रहे हैं कि भाजपा  

लोगों की धार्मिक भावना उभार कर वोट ले लेती है।

लेती होगी !

लेकिन आप क्या करते हैं ?

यदि सेक्युलर दलों ने इन विस्फोटों,पाक व आई.एस.आई.की निंदा की होती,तो भाजपा को कमजोर करने में उन्हें मदद मिलती।

 पर, उन्हें तो डर लगता है कि निंदा करने से उनका ‘वोट बैंक’ नाराज हो जाएगा।

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--सुरेंद्र किशोर

23 जून 21



 


दलबदल पर कारगर रोक के लिए कानून को कठोर बनाना जरूरी

--सुरेंद्र किशोर

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सन 1985 में दल बदल विरोधी कानून बना था।

इसका श्रेय तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी को मिला।

उस कानून से यह उम्मीद बंधी थी कि अब दल बदल नहीं होंगे।

पर दल बदल नहीं रुका।

बाद में इस कानून में संशोधन हुआ।

फिर भी दल बदल जारी रहा।

2016 से 2020 तक कांग्रेस के 42 प्रतिशत और भाजपा के करीब 4 प्रतिशत विधायकों ने पार्टी छोड़ी।

छोड़ने का उद्देश्य क्या रहा, यह जग जाहिर है।

  जब नेता और कार्यकत्र्ता का अपनी पार्टी से संबंध सिर्फ टिकटों का ही रह जाए तो दल बदल स्वाभाविक ही है।

कुछ दलों से फिर भी उसके कार्यकत्र्ताओं का नीति-सिद्धांत का संबंध रहा है।

पर, वह भी कम होता जा रहा है।

अनेक राजनीतिक दल भारी रकम लेकर चुनावी टिकट दे रहे हैं।

ऐसे में दल बदल कैसे रुकेगा ?

हां, एक नया प्रयोग किया जा सकता है।

दल बदल विरोधी कानून में ऐसा संशोधन हो जिससे किसी जन प्रतिनिधि के दल छोड़ते ही उसकी सदन की सदस्यता तुरंत चली जाए।

दो - तिहाई की सुविधा अब खत्म हो जानी चाहिए।

साथ ही, दल बदलुओं को आगामी उप चुनाव सहित अगले दो चुनावों में उम्मीदवार बनने से कानूनन रोक दिया जाए।

  पहले यह सुविधा दी गई थी कि यदि किसी दल के एक तिहाई सदस्य दल छोड़ें तो उनकी सदस्यता बनी रहेगी।

जब ऐसे प्रावधान के बावजूद दल बदल नहीं रुका तो दो-तिहाई वाली छूट दी गई।

फिर भी स्थिति नहीं सुधर रही।

  इसलिए अब कठोर संवैधानिक कदम उठाना ही पड़ेगा।

दल बदल लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोढ़ है।

इसका उन्मूलन होना ही चाहिए।

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कैमरे बताएंगे कि बर्बरता किधर से हुई

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कैसा रहेगा यदि ड्यूटी पर तैनात बिहार के पुलिस अफसरों की 

वर्दी में कैमरे लगे होंगे ?

कुछ राज्यों में ऐसा पहले से है।

खबर है कि बिहार सरकार को इस पर विचार करके 

कोई निर्णय करना है।

बिहार पुलिस की सलाह है कि उसे ऐसी सुविधा मिलनी चाहिए।

यदि ऐसी सुविधा मिली तो इसके एकाधिक फायदे होंगे।

अक्सर यह आरोप लगता है कि पुलिस ने निहत्थे लोगों 

पर बर्बर कार्रवाई की।

हर बार तो नहीं, किंतु कई बार सच कुछ और ही होता है।

पहले हिंसक या उपद्रवी  भीड़ पुलिस पर हमला कर देती है।

पुलिस प्रतिक्रियास्वरूप भीड़ को भगाने के लिए बल प्रयोग करती है।

कभी-कभी बल प्रयोग कुछ अधिक ही हो जाता है।

फिर उसकी जांच होती है।

यदि पुलिस अफसरों की वर्दियों में कैमरे लगे होंगे तो जांच से यह पता चल जाएगा कि हमले की पहल किस पक्ष ने की।

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जेल जाते ही अस्पताल में दाखिल

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 यदि आप प्रभावशाली हैं तो आपको जेल जाने से डरने की जरूरत नहीं।

जेल होते ही आपको किसी अच्छे अस्पताल में दाखिल करा दिया जा सकता है।

जेल जाने से पहले तक आप नार्मल ढंग से अपना सारा काम कर रहे थे।

किंतु जेल जाते ही आप कुछ गंभीर बीमारियों का बहाना बनाएंगे और 

हैसियत के अनुसार अस्पताल में शिफ्ट कर दिए जाएंगे।

यदि स्थानीय सरकार आपकी मुट्ठी में रही तब तो वह किसी बड़े बंगले को 

जेल घोषित कर देगी।

 इसे रोकने के लिए एक सुझाव प्रस्तुत है।

जिस व्यक्ति को पिछले तीन साल में कभी भी किसी अस्पताल में भरती कराने की नौबत नहीं आई थी ,शासन को चाहिए कि वह उस कैदी से अलग ढंग से व्यवहार करे।

उनकी बीमारी की राज्य के बाहर के विशेषज्ञ चिकित्सकों से जांच कराई जानी चाहिए।

उसके बाद ही शासन उन्हें अस्पताल या जेल भेजने का फैसला करे या कोर्ट से तंत्संबंधी आग्रह करे।

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 भूली-बिसरी याद

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आज ही के दिन सन 1975 में देश में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने 

आपातकाल लगाया था।

तब के प्रधान मंत्री सचिवालय 

के संयुक्त सचिव विशन टंडन ने तब लगभग रोज अपनी डायरी लिखी थी।

बाद में वह डायरी पुस्तक के रूप में दो खंड में छपी।

उसके बाद किसी ने टंडन साहब से डायरी लिखने का कारण पूछा गया था।उन्होंने बताया कि जब कभी सरकारी रिकाॅर्ड लोगों को उपलब्ध होंगे,उससे उस समय की घटनाओं और फैसलों की जानकारी होगी।

मेरा प्रयास इससे अलग है।

टंडन साहब ने कहा कि मैं उस वातावरण को चित्रित करना चाहता था,जिसमें लोक तंत्र और उसकी संस्थाओं को 

एक- एक कर ढहाया जा रहा था।

सरकारी फाइलों में यह जानकारी नहीं मिलती।’

 25 जून 1975 को  अपनी डायरी में उन्होंने लिखा,

‘‘शारदा (इंदिरा गांधी के मीडिया सलाहकार एच. वाई. शारदा प्रसाद) ने

बताया कि प्रधान मंत्री निवास पर पूरा कंट्रोल संजय (गांधी) ने ले लिया है।

28 जून को विशन टंडन ने लिखा कि कल रात मुझे बहुत देर तक नींद नहीं 

आई ।

मैं यही सोचता रहा कि इस देश में जन जीवन अब फिर स्वच्छंद  

व स्वाधीन हो सकेगा या नहीं।

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  और अंत में 

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पटना हाईकोर्ट ने 3 अगस्त, 2001 को बिहार सरकार से पूछा था कि राज्य के किन -किन गांवों में पांच मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं ?

तब की राज्य सरकार ने उसका क्या जवाब दिया,यह नहीं मालूम।

 किंतु जानने वाले जानते ही हैं कि बिहार के गांवों  की स्थिति कैसी रही थी। 

  ये मूलभूत सुविधाएं हैं-शुद्ध पेयजल, बिजली, प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य और स्वच्छता।

इस बीच बिजली की स्थिति सुधरी है।

जहां -तहां शुद्ध पेयजल

की व्यवस्था भी हुई है।

पर, लगता है कि बाकी तीन सुविधाएं अब भी भगवान भरोसे ही हंै।

वैसे मौजूदा राज्य सरकार को इन सुविधाओं का अद्यतन आंकड़ा तैयार करके लोगों को बताना चाहिए। 

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  कानोंकान,

प्रभात खबर,पटना

25 जून 21 


 


     देश अयोध्या की ओर !

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     --सुरेंद्र किशोर--

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हाल में मैंने सुना कि दैनिक हिन्दुस्तान, पटना में मेरे सहकर्मी रहे एक काबिल पत्रकार राम की नगरी में जा बसे,पटना का अपना फ्लैट बेच कर।

मैंने उनसे फोन से बातचीत की।

चूंकि मेरी पत्नी भी वहां बसने या यदाकदा वहां जाकर कुछ -कुछ दिनों के लिए रहने की इच्छा जाहिर कर रही हैं,इसलिए भी मैंने अपने पूर्व सहकर्मी से बातचीत की।

  खैर, यह तो भविष्य की योजना है।

पता नहीं, इस योजना पर राम की क्या इच्छा है ?!!

  यह भी पता चल रहा है कि देश भर से बहुत सारे लोग अब अयोध्या में बसना या फ्लैट या मकान खरीदना चाहते हैं।  

 बातचीत से लगा कि पत्नी के साथ अयोध्या में बस चुके मेरे मित्र वहां बहुत खुश हैं।

  स्वांतः सुखाय रघनाथा गाथा में मगन हैं।

उनके घर से निर्माणधीन राम लला मंदिर मात्र डेढ़ किलोमीटर पर जो है !

  मैंने वहां की जमीन की दर उनसे पूछी।

उन्होंने बताया कि जो जमीन हाल तक 30 लाख रुपए प्रति कट्ठा मिल रही थी, वह अब 60 लाख रुपए कट्ठा हो चुकी है।

कीमत बढ़ती ही जा रही है।

जमीन की कीमत बढ़ाने में बिहार के ‘धनवान’ लोगों का कुछ अधिक ही योगदान है।

खैर, ऐसे में कोई सामान्य आय वाला राम भक्त अयोध्या में कैसे बस सकेगा ?

  यह अच्छी खबर है कि योगी सरकार सरयू के किनारे 500 एकड़ क्षेत्र में ‘‘न्यू अयोध्या’’बसाने जा रही है।

इसके लिए राज्य सरकार ने निजी क्षेत्र की कंपनियों से भी अपील की है कि वे सी.एस.आर.फंड से न्यू अयोध्या के निर्माण में पैसे लगाएं।

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न्यू अयोध्या में ही बने या अन्यत्र बने, किंतु अल्प आय वर्ग के लिए एक कमरे का फ्लैट या मकान का निर्माण होना ही चाहिए। 

ताकि, टूटते परिवार के इस दौर में देश के कम आय वाले जो बुजुर्ग जहां -तहां  ओल्ड ऐज होम में शरण लेने को बाध्य हो रहे हैं, वे चाहें तो राम की नगरी में ही अपने आखिरी दिन गुजार लें।

  यदि सन 2022 में भी उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार फिर बन गई तब तो ये योजनाएं कार्यान्वित हो जाएंगी।

 अन्यथा, तो राम ही मालिक है !!

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साथ का चित्र पटना से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका ‘‘तुलसीदलम्’’ से साभार



  


रविवार, 27 जून 2021

      एक बिन मांगी सलाह जो मानी नहीं जाएगी !

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 अपवादों को छोड़ दें तो, सास अपनी बेटी की तो सौ गलतियां माफ कर देती है।

पर, अपनी पतोहू की एक भी गलती माफ नहीं करती।

पतोहू को 50 प्रतिशत गलतियांे को वह माफ करती जाए तो सास भी सुख चैन से रहेंगी और पतोहू भी।

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उसी तरह किसी परिवार में पति की 50 प्रतिशत और पत्नी की 50 प्रतिशत बातों-इच्छाओं का पालन होने लगे तो पारिवारिक कलह को काफी हद तक कम कर देने में मदद मिल जाएगी।

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--सुरेंद्र किशोर 

27 जून 21


सोमवार, 21 जून 2021

 



जैविक खेती को बढ़ावा देने की सरकारी पहल समय की जरूरत-सुरेंद्र किशोर

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 देश की 2 करोड़ 60 लाख एकड़ बंजर जमीन का पुनरोद्धार होने वाला है।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने पुनरोद्धार योजना पर काम करने के अपने निर्णय की घोषणा कर दी है।

  दूसरी ओर, बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने अधिकारियों को निदेशित किया है कि वे लोगों को जैविक खेती करने के लिए प्रेरित करें।

  यह अच्छी बात है कि हमारे हुक्मरानों ने एक बुनियादी समस्या के हल की ओर एक और ठोस कदम बढ़ाए हंै।

  याद रहे कि हमारी अर्थ व्यवस्था मुख्यतः खेती पर निर्भर है।

ताजा सर्वेक्षण के अनुसार इस देश की जी.डी.पी.में खेती का करीब 20 प्रतिशत योगदान है।

साथ ही, 60 प्रतिशत आबादी को कृषि में रोजगार मिला हुआ है।

  हमारे देश में कृषि को लेकर दो मुख्य समस्याएं रही हैं।

उर्वर जमीन को कैसे अनुर्वर होने से बचाया जाए ?

दूसरी समस्या बंजर जमीन को खेती योग्य बनाने की है।

उर्वर जमीन के अनुर्वर हो जाने की समस्या हरित क्रांति के साथ शुरू हुई।

 हरित क्रांति के जरिए अनाज की उपज तो बढ़ी, किंतु रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं के जहां तहां अतिशय इस्तेमाल से जमीन की उर्वरा शक्ति मरी।

पंजाब में यह समस्या सर्वाधिक है।

बिहार के गरीब व पिछड़ा प्रदेश होने का एक तरह से हमें लाभ मिला।

हमने रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं का कई अन्य राज्यों की अपेक्षा कम इस्तेमाल किया।

नतीजतन हमारी खेती बर्बाद होने से काफी हद तक बची रही।

  यदि मुख्य मंत्री की सलाह को लागू किया गया तो जैविक खाद का इस्तेमाल बढ़ेगा।

उससे न सिर्फ लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा होगी,बल्कि खेतों की उर्वरा शक्ति भी बढ़ेगी।  

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    आरोप गलत हो तो सजा मिले 

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राम मंदिर जमीन खरीद मामले में बड़ा आरोप सामने आया है।

आरोप घोटाले का है।

जब घोटाला हुआ है तो आरोप लगाने वालों को उसकी जांच के लिए अदालत की शरण लेनी चाहिए।

पर, अब तक की सूचना के अनुसार  वे अदालत नहीं जा रहे हैं।

खबर आ रही है कि मंदिर निर्माण से जुड़े लोग ही अदालत जा रहे हैं।

  वे मानहानि का मुकदमा करेंगे।

यदि ऐसा हुआ तो आरोप लगाने वालों को भी अवसर मिलेगा कि वे अपनी बात कोर्ट में साबित कर सकेंगे।

 ऐसी मुकदमेबाजी को लोकतांत्रिक कानूनी प्रक्रिया का अंग ही माना जाना चाहिए।

लेकिन ऐसे मुकदमों में अंततः सुलह-माफीनामा-समझौता हो जाया करता है।

इससे अनर्गल आरोप लगाने वाले एक बार फिर किसी दूसरे निराधार मामले को लेकर किसी पर कीचड़ उछाल देते हैं।

 इसके विपरीत यदि गलत आरोप लगाने वालों को सजा होती जाए तो ऐसे अन्य लोग हतोत्साहित होंगे।

यदि घोटाला करने वालों को सजा हो जाए तो वैसे लोग कोई अन्य घोटाला करने से पहले सौ बार सोचेंगे।

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सोशल मीडिया के इस्तेमाल में सावधानी 

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सोशल मीडिया पर कहीं से आई किसी भी अपुष्ट खबर को न तो शेयर करिए और न ही उसे फारवर्ड करिए।

 कुछ लोगों ने ऐसी असावधानी की और वे हाल में केस में फंस गए।

वैसे यह उनकी असावधानी है या शरारत वह तो जांच के बाद ही पता चलेगा।

पर, उन्हें अपने काम छोड़कर अब कोर्ट-कचहरी की दौड़ तो लगानी ही पड़ेगी।

एक सामान्य आपराधिक घटना

को सांप्रदायिक मोड़ देने के आरोप में उत्तर प्रदेश के लोनी बाॅर्डर कोतवाली पुलिस ने ट्विटर के साथ -साथ दो पत्रकारों,एक मीडिया संस्थान,एक लेखिका व एक प्रमुख दल के तीन नेताओं के खिलाफ केस दर्ज किया है।

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सर्प दंश दवा की उपलब्धता

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बिहार के उप मुख्य मंत्री तारकिशोर प्रसाद ने निदेश दिया है कि सर्प दंश व कुत्ते के काटने की दवा सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध कराई जाए।

उप मुख्य मंत्री का निदेश फिलहाल मुंगेर जिले के बारे में है।

उन्होंने कहा है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर दवाएं उपलब्ध हों।

 यह  एक मामूली किंतु बहुत ही जरूरी बात है।

इन दवाओें को राज्य के सभी सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

अक्सर यह सुना जाता है कि सर्प दंश की दवा कहीं नहीं मिल रही है।नतीजतन गरीब लोग झाड़ फंूक वालों की शरण में जाने को बाध्य होते हैं।

 इस तरह कई बार वे जान गंवा देते हैं। 

उम्मीद है कि उप मुख्य मंत्री के निदेश को कड़ाई से लागू किया जाएगा।   

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   राजद्रोह के मामलों में सतर्कता जरूरी

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केदारनाथ सिंह बनाम बिहार सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 20 जनवरी, 1962 को अपना ऐतिहासिक जजमेंट दिया था।

राजद्रोह के संबंध में लिखा गया वह जजमेंट आज भी लागू है।

सुप्रीम कोर्ट उस पर कायम है।

हाल के दिनों में राजद्रोह को लेकर कई जजमेंट हुए हैं।

ताजा निर्णयों को देखकर इस बात की जरूरत महूसस की जा रही  है कि सन 1962 के उस जजमेंट की काॅपी उन सब लोगों को उपलब्ध कराई जानी चाहिए जो लोग अपनी -अपनी जगह से इस देश में क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को कारगर बनाए रखने की कोशिश में लगे हुए रहते हैं।

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और अंत में

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कुछ दशक पहले की बात है।

राम विलास पासवान से एक खास सवाल पूछा गया।

वह सवाल था-आपने प्रतिस्पर्धी दल के  दबंग के खिलाफ अपनी ओर से भी दबंग उम्मीदवार को ही खड़ा 

क्यों कर दिया ?

राम विलास जी ने प्रति प्रश्न किया-‘‘क्या आप यह चाहते हैं कि हम बाघ के खिलाफ किसी बकरी को खड़ा कर दें ?’’

  ताजा खबर यह है कि लोजपा के दोनों धड़ों ने बिहार शाखा का प्रधान जिन्हें बनाया है,उन्हें कोई व्यक्ति थोड़ा भी कमजोर नहीं कह सकता।

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कानोंकान,

प्रभात खबर,

पटना

18 जून 21

  

  




    लोगों की लापरवाही तीसरी 

लहर को न्योता दे रही है।

  कुछ ही लोग कोविड अनुशासन 

का पालन कर रहे हैं।

  शाॅपिंग माॅल्स में भारी भीड़ जुट रही है।

मेट्रो में शारीरिक दूरी नहीं बरती जा रही। 

कृपया ऐसा कुछ न करें कि तीसरी 

लहर आ ही जाए।

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  ---डा.मोनिका लांगे

दैनिक जागरण

19 जून 21