सोमवार, 1 जनवरी 2024

 


22 जनवरी, 24 को अयोध्या में राम 

मंदिर का शुभारंभ

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डा.राममनोहर लोहिया,रामायण मेला

और हुसेन की 150 ‘रामायण पेंटिंग्स’ 

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     सुरेंद्र किशोर

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आजादी के बाद जब डा.राममनोहर लोहिया देश को गरमाने 

के लिए निकले तो उन्हें एक बात देखकर अजीब लगा।

वह यह कि रामलीला में तो बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं किंतु हमारी सभाओं में कम ही लोग आते हैं।

संभवतः उसी के बाद उन्हें ‘रामायण मेला’ लगवाने का विचार आया।

उन्होंने लगवाया भी।

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मुझे याद नहीं कि किसी ने डा.लोहिया को कम्युनल नेता कहा हो।

दरअसल लोहिया की धर्म निरपेक्षता एकतरफा नहीं थी।

वे शब्द के सही अर्थों में धर्म निरपेक्ष थे।

हालांकि वे सामान्य नागरिक संहिता के पक्षधर थे।

यह कोई संयोग नहीं था कि लोहिया के आग्रह पर 1967 में देश की एकाधिक गैर कांगे्रसी राज्य सरकारों में जनंसघ और सी.पी.आई.के मंत्री एक साथ काम करने को तैयार हुए थे।

महीनों तक काम किया भी।

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लोहिया की चर्चित पेंटर मकबूल फिदा हुसेन (बाद में कुख्यात)से मुलाकात भी दिलचस्प थी।

एक फीचर एजेंसी के अनुसार,

लोहिया ने युवा मकबूल से कहा--

‘‘टाटा-बिड़ला के ड्राइंग रूम में लटकने वाली तस्वीरों से बाहर निकलो और ‘रामायण’ पेंट करो।

क्योंकि आर्ट गैलरी की तस्वीर लोग पतलून में हाथ डालकर देखते हैं।

लेकिन रामायण की तस्वीरों में लोग घुल-मिल जाते हैं।’’

 डा.लोहिया की बात युवा हुसेन को लग गयी।

(तब तक मकबूल में वह घृणित भावना नहीं पनपी थी जिसके कारण उसे कानून की गिरफ्त से भागकर विदेश में शरण लेनी पड़ी थी।अब वह इस दुनिया में नहीं है।)

संभवतः 1967 में लोहिया के निधन के बाद हुसेन को कायदे का कोई मार्ग दर्शक नहीं मिला होगा।)

हुसेन के बारे में तब एक कहावत थी--

‘‘जूता,छाता, लालटेन,

जय हुसेन,जय हुसेन।’’

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जूता,छाता,लालटेन वाला हुसेन वर्षों तक गांवों और शहरों की 

 राम लीलाओं के पात्रों पर गौर करता रहा।

इस तरह मकबूल फिदा हुसेन ने रामायण पर डेढ़ सौ पेंटिंग तैयार की।

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डा.लोहिया आज के तथाकथित सेक्युलर नेताओं की तरह नंहीं थे जो हिन्दू ग्रंथों की कुछ विसंगियों को तो जोर -जोर से प्रचारित  करते हैं ताकि उन्हें दूसरे धर्माें के अतिवादी लोगों के वोट आसानी से मिल जाएं,पर,दूसरे धर्मों के ग्रंथों की विसंगितयों के खिलाफ चंू तक करने की उन्हें हिम्मत नहीं होती।

इस देश में हाल के वर्षों में भाजपा के विस्तार का यह भी एक बड़ा कारण रहा है।

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22 जनवरी, 2024 को अयोध्या में राम मंदिर का शुभारंभ होने जा रहा है।

इस अवसर पर भी आज के अधिकतर लोहियावादियों का 

रवैया ‘‘वोट बैंक’’ की लिप्सा से ही पे्ररित है।

यह भी भाजपा के लिए अच्छी स्थिति है।

कल्पना कीजिए कि डा. लोहिया आज जीवित होते तो 22 जनवरी, 2024 को वह कहा रहते ?!

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 डा.लोहिया ने राम,कृष्ण और शिव पर अद्भुत बातें कहीं हैं।

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वह सब ‘‘राम,कृष्ण और शिव,नदियां साफ करो’’नामक पुस्तिका में दर्ज है।

उस पुस्तिका को पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग,आईटीएम यूनिवर्सिटी,ग्वालियर,मध्य प्रदेश ने फिर से प्रकाशित किया है।

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1 जनवरी 24



 


शनिवार, 30 दिसंबर 2023

 ‘‘मोदी सरकार के 10 वर्षों में प्रत्यक्ष कर 

संग्रह तीन गुना होने की उम्मीद’’

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आज के दैनिक ‘प्रभात खबर’ में इसी शीर्षक के अंतर्गत नई दिल्ली से एक खबर छपी है।

खबर एजेंसी की है,पर किसी अन्य अखबार में मैं नहीं देख पा रहा हूं।

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खबर के अनुसार प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के 10 वर्षों के कार्यकाल में व्यक्तिगत आयकर तथा काॅरपोरेट कर संग्रह में बड़ी वृद्धि हुई है।

चालू वित्तीय वर्ष के अंत मंे इसके 19 लाख करोड़ रुपए से अधिक होने की संभावना है।

वित्त वर्ष 2013-14 में 6.38 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2022-23 में 16.61 लाख करोड़ रुपए हो गया था।

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जानकार लोग बताते हैं कि आय बढ़ेगी तो विकास,कल्याण और आंतरिक -बाह्य सुरक्षा के काम बेहतर हांेगे।

काम हांेगे तो जनता खुश होगी।

जनता खुश होगी तो सरकार चुनाव जीतती जाएगी।

यानी, मोदी धार्मिक भावना उभार कर वोट नहीें ले रहे हंै बल्कि ठोस आर्थिक काम करके वोट ले रहे ंहंै।

याद रहे कि टैक्स चोरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई से राजस्व बढ़ता है।

वह कार्रवाई भरसक तेजी से बेलाग लपेट हो रही है।

उस कार्रवाई से दुखी कौन-कौन लोग हो रहे हैं ?

कौन लोग ‘‘पिता-पुकार’’ कर रहे हैं ?

यह सब यहां बताने की जरूरत नहीं है।

सब लोग जान रहे हैं।

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कहते हैं कि प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के 10 साल के कार्यकाल में करीब 20 लाख करोड़ रुपए के घोटाले हुए।

नीतीश कुमार जैसे इक्के -दुक्के नेताओं को छोड़कर गैर भाजपा दलों के अधिकतर शीर्ष नेतागण घोटालों के गंभीर आरोपों में कोर्ट व जांच एजेंसियों के चक्कर लगा रहे हैं।

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भ्रष्टाचार के आरोप में आने वाले हफ्तों में अनेक नेता लोग जेल जा सकते हैं।

भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाने और सजा होने पर वोट नहीं बढ़ते।हाल का इतिहास इसका सबूत है।

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 उससे पहले सन 1985 में तब के प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि हम दिल्ली से 100 पैसे भेजते हैं, किंतु गांवों तक उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं।

(यह सब एक दिन में नहीं हुआ था।आजादी के तत्काल बाद से ही लूट शुरू हो गयी थी।समय के साथ लूट बढ़ती गयी।

100 पैसे के घिसकर 15 पैसे होने में समय तो लगता ही है।

ध्यान में लाइए कि उस बीच हमारे देश को कौन-कौन ‘महारथि’ चला रहे थे ! किस तरह से चला रहे थे ! 

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एक तरफ घोटालों पर काबू करके कोई सरकार अपनी आय तीन गुनी बढ़ा लेती है।

दूसरी तरफ कोई सरकार 100 पैसे में से 85 पैसे छोटे-बड़े घोटालों को जाने-अनजाने समर्पित कर देती है।

जनता इन में से किसे पसंद करेगी ?

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कल्पना कीजिए कि एक किसान अपने पूर्वज की सौ एकड़ जमीन में से 85 एकड़ बेच कर ऐय्याशी कर लेता है।

दूसरा किसान अपनी मेहनत व उद्यम से कमा कर और अधिक जमीन खरीदता है और अपनी पुश्तैनी जमीन की अपेक्षा उससे तीन गुनी जमीन का मालिक बन जाता है।

लोगबाग किसे सफल किसान कहेंगे ?

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30 दिसंबर 23

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पुनश्चः

कई दशक पहले मैं पटना सचिवालय में वाणिज्य कर विभाग के मंत्री के पास बैठा था।

मैंने पूछा कि आपकी सरकार को इस मद में सिर्फ करीब 2 हजार करोड़ रुपए ही मिलते हैं जबकि आंध्र प्रदेश सरकार को 6 हजार करोड़ रुपए मिलते हैं।इतना अंतर क्यों ?

उस मंत्री ने ,जो मेरे पुराने परिचित रहे हैं,कहा कि यदि हमारा यह सचिवालय ठीक हो जाए तो एक हजार करोड़ रुपए की आय अगले साल से ही बढ़ जाएगी।

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शुक्रवार, 29 दिसंबर 2023

 बहु आयामी व्यक्तित्व के धनी पूर्व प्राचार्य व लेखक 

डा.विनोद कुमार सिंह की याद में स्मरण ग्रंथ प्रकाशित

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सुरेंद्र किशोर

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इस मृत्यु लोक से एक दिन तो सबको जाना है !

पर,ऐसा भी होता है कि कुछ लोग चले तो जाते हैं किंतु उनकी यादें नहीं जातीं।

छपरा के डा.विनोद कुमार सिंह वैसे ही कुछ लोगों में रहे हैं।

कई कालेजों के प्राचार्य रहे विनोद बाबू बहु आयामी व्यक्तित्व के धनी थे।

वे एकाधिक पुस्तकों के लेखक थे और एक जुझारू विश्वविद्यालय शिक्षक नेता भी।

वैचारिक दृढता और व्यक्तिगत ईमानदारी के साथ-साथ वे प्राचार्य के रूप में भी कठोर अनुशासन प्रिय थे।

मेरी नजर में वे ‘बहुत बड़े आदमी’ थे।

मैंने बौने लोगों को भी बड़े-बड़े पदों पर पहुंचते और भौतिक उपलब्धियां हासिल करते देखा है।

विनोद बाबू थोड़ा समझौता कर लेते तो देश के किसी भी

बड़े ‘मंच’ पर उन बौनों से बीस नजर आते।

विनोद बाबू का 28 दिसंबर 2020 को निधन हो गया।

ऐसे प्रेरणादायक व्यक्तित्व की स्मृति में डा.विनोद कुमार सिंह स्मरण ग्रंथ का प्रकाशन हुआ है।यह ग्रंथ नई पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक साबित होगा। 

ग्रंथ के संपादक द्वय हैं जाने माने लेखक प्रो.पृथ्वीराज सिंह और वरिष्ठ पत्रकार शिवानुग्रह नारायण सिंह।

करीब ढाई सौ पृष्ठों के इस संस्मरण ग्रंथ में विनोद बाबू पर मेरा भी एक संस्मरणात्मक लेख प्रकाशित हुआ है ।वह  मैंने उनके निधन के एक दिन बाद अपने फेसबुक वाॅल पर लिखा था।

वह लेख यहां प्रस्तुत है--

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याद रहेंगे शिक्षक नेता विनोद बाबू !

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बिहार विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष व महा 

सचिव रहे डा.विनोद कुमार सिंह का कल निधन हो गया।

वह 82 साल के थे।

शब्द के सही अर्थों में समाजवादी, दिवंगत विनोद बाबू 

को मैं दशकों से जानता था।

वैसे व्यक्ति इक्के -दुक्के ही मिलते हैं।

वे कई काॅलेजों के प्राचार्य रह चुके थे।

अच्छे शिक्षक और उतने ही अच्छे वक्ता भी थे।

   प्राचार्य के रूप में भी कठोर प्रशासक  थे।

  सीतामढ़ी के उस गोयनका काॅलेज के भी प्राचार्य रहे जहां दिवंगत केंद्रीय मंत्री डा.रघुवंश प्रसाद सिंह शिक्षक थे।

  विनोद बाबू जब भी पटना आते थे,मैं सब काम छोड़कर उनसे मिलने जाता था।

वे मुुजफ्फर पुर जिले के गायघाट के पूर्व विधायक (1977)विनोदानंद प्रसाद सिंह के कौटिल्य नगर स्थित आवास में ठहरते थे।

दोनों में अटूट दोस्ती थी। 

परस्पर सम्मान और स्नेह का भाव देखते बनता था।

 विनोदानंद जी के निधन के बाद वह मिलन स्थल नहीं रहा।

विनोद बाबू भी अस्वस्थ रहने लगे।

छपरा के अपने स्कूली सहपाठी सिद्धेश्वर तथा कुछ अन्य लोगों से विनोद बाबू का हालचाल मैं बीच -बीच में पूछता रहता था।

  पहले तो मैं उन्हें ही कभी -कभी फोन भी कर लिया करता था।

 पर जब पता चला कि उन्हें बोलने में दिक्कत होती है तो फोन करना छोड़ दिया।

उनके बारे में इतना ही कह सकता हूं कि यदि हम एक नगर में होते तो मैं सिर्फ उनकी बातें सुनने व कुछ सलाह मशविरा करने के लिए सप्ताह में दो-तीन  दिन तो उनके पास जरूर जाता।

वे अभिभावक की तरह थे।

  वे एक साथ बहुत कुछ थे।

समाजवादी,साहित्यकार,प्रभावशाली वक्ता ,शिक्षक नेता और दोस्तों के दोस्त। 

एक बार डा.नामवर सिंह ने भी उनकी सार्वजनिक रूप से  प्रशंसा की थी।

 स्वतंत्रता सेनानी दिवंगत त्रिगुणानंद सिंह के पुत्र विनोद बाबू सारण जिले के बनिया पुर प्रखंड के पिपरा रत्नाकर गांव के मूल निवासी थे।

बाद में छपरा के अपने आवास में रहते थे।

 कई पुस्तकों के लेखक विनोद बाबू का समाजवादी आंदोलन में बड़ा योगदान था।

जहां तक मेरी जानकारी है,यदि उन्होंने स्वाभिमान से थोड़ा समझौता किया होता तो वे राजनीति में भी किसी महत्वपूर्ण पद पर रहे होते।

  किंतु उन चीजों का उनके लिए कोई खास मतलब नहीं था।

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 विनोद बाबू ने एक बार किस तरह अपने मित्र के सम्मान की रक्षा के लिए पूरी किताब लिख डाली,उसका मैं गवाह हूं।

  काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान ने ऐतिहासिक शोध ग्रंथ माला के तहत दिल्ली विश्व विद्यालय के शिक्षक रहे विनोदानंद प्रसाद सिंह को शहीद सूरज नारायण सिंह पर किताब लिखने का भार सौंपा था।

कुछ अग्रिम भी मिला था।

विनोदानंद सिंह ने किताब पर कुछ सामग्री जुटा भी ली थी।

पर,इस बीच वे सख्त बीमार हो गए।

   अब उनके सामने धर्म संकट यह था कि किताब पूरी कैसे हो !

या फिर अग्रिम राशि लौटा दी जाए !

  विनोदानंद जी ने अपनी पीड़ा एक दिन विनोद बाबू को बताई।

 विनोद बाबू ने तुरंत उन्हें कह दिया कि मैं आपको इस धर्म -संकट से अभी मुक्त करता हूं।

 आपका यह अधूरा काम मैं पूरा कर दूंगा।

उन्होंने ‘मृत्यंुजय सूरज नारायण सिंह’  नाम से किताब लिख डाली।

सूरज बाबू पर संभवतः यह सबसे अच्छी किताब है।

--सुरेंद्र किशोर

29 दिसंबर 2020

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‘ज्ञानं भारः क्रिया विना’

डा.विनोद कुमार सिंह स्मृति ग्रंथ

सारव प्रकाशन,

बी.-12 प्रभुनाथ नगर

छपरा,

जिला-सारण

पिन-841302

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मो.-9102889054

 9102889260

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29 दिसंबर 23




 

  

      


गुरुवार, 28 दिसंबर 2023

 भूली-बिसरी यादें

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बिहार की चुनावी राजनीति मंे 

‘‘जोड़न’’ का महत्व

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जोड़न से ही तो दही जमता है

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सुरेंद्र किशोर

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जो इतिहास से नहीं सीखता,वह 

इतिहास दुहराने को अभिशप्त होता है।

‘भारत उदय’ के फील गुड में प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने

2004 में लोजपा और द्रमुक को अपने पास से भगा दिया था।

नतीजतन, केंद्र की सत्ता एक ऐसी सरकार के हाथों मेें चली गयी जिसने 

दस साल तक घोटालों -महा घोटालों की झरी लगा दी।

जेहादी-आतंकियों का भी मनोबल सातवें आसमान पर था।

(सीमावर्ती राज्य होने के कारण बिहार के बारे में भी कोई राजनीतिक या चुनावी फैसला फिलहाल आज की विशेष स्थिति में सोच-समझकर लेने की जरूरत है।) 

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तमिलनाडु

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सन 1999 लोस चनाव

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भाजपा और द्रमुक मिलकर चुनाव लड़े

राजग को कुल 39 में से 26 सीटें मिलीं।

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2004 लोस चुनाव

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भाजपा और अद्रमुक मिलकर लड़े।

राजग को कोई सीट नहीं मिली।

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भाजपा ने द्रमुक को क्यों छोड़ा ?

इसलिए कि जे.जयलालिता के नेतृत्व वाली 

अद्रमुक की राज्य सरकार ने सन 2002 में धर्मांतरण विरोधी कानून पास करा दिया।

(हालांकि बाद में उसे वापस भी कर लेना पड़ा था)

अतः भाजपा उस पर मोहित हो गयी।उसे साथी बना लिया।

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बिहार

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सन 1999 लोस चुनाव

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रामविलास पासवान तब राजग में थे।

राजग को बिहार में कुल 54 में से 41 सीटें मिलंीं। 

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रामविलास पासवान अटल सरकार में रेल मंत्री बने।

बाद में वाजपेयी ने पासवान को नाराज कर दिया।

वे राजग से अलग हो गये।

नतीजतन 2004 के लोक सभा चुनाव में राजग को बिहार में 40 में से सिर्फ 11 सीटें ही मिलीं।

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कारण--अटल बिहारी वाजपेयी ने पासवान से पहले रेल मंत्रालय ले लिया और संचार दे दिया।

फिर उनसे संचार लेकर प्रमोद महाजन को दे दिया।

पासवान ने नाराज होकर वाजपेयी मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

हालांकि पासवान ने अनुकूल राजनीतिक अवसर देख कर ही अपने इस्तीफे की तारीख तय की थी।

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पासवान को बिहार की राजनीति का ‘जोड़न’ कहा जाता था।

जोड़न के बिना दही नहीं जमता।

यह बिहार की राजनीति की विशेषता है।

सामाजिक समीकरण का ध्यान रखने की मजबूरी है।

अभी ‘जोड़न’ की भूमिका में कौन है ?

एक से अधिक हैं।

उम्मीद है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को बिहार के बाहर के किसी

जानकार व्यक्ति ने, जिसे बिहार की राजनीति की गहरी जानकारी हो,मौजूदा ‘जोड़न’के बारे में बता दिया होगा।

बिहार के किसी नेता से पूछिएगा तो वह अपनी सुविधानुसार कुछ भी बता दे सकता है।

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निष्कर्ष--

सन 2004 में यदि द्रमुक और लोजपा को अटल जी अपने साथ बनाए रखते तो कैसा रिजल्ट आता ?

आंकड़े खुद ही देख लीजिए।

याद रहे कि 2004 में भाजपा को लोक सभा की कुल 138 और कांग्रेेस को कुल 145 सीटें मिली थीं।

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लोजपा को भला कैसे साथ रखते ?

तब यह चर्चा थी कि अटल जी, प्रमोद महाजन को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे।

उधर प्रमोद महाजन संचार मंत्रालय ही चाहते थे।

उधर धर्मांतरण विरोधी कानून का तमिलनाडु के जन मानस पर कितना असर पड़ेगा,इसका पूर्वानुमान अटल जी नहीं कर सके।

फील गुड हावी जो था !!

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28 दिसंबर 23

   

  


मंगलवार, 26 दिसंबर 2023

 दिघवारा और नया गंाव के बीच ‘न्यू पटना’ 

बन तो रहा है, पर अव्यवस्थित ढंग से।

बिहार सरकार को चाहिए कि वह

व्यवस्थित विकास में निजी डेवलपर्स 

को अभी से मदद भी करे और नियंत्रित भी

अन्यथा,बाद में पछताना पड़ेगा  

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सुरेंद्र किशोर

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पत्नी ने कहा कि ‘‘ चलिए गांव,बीच रास्ते में आपको हाड़ी चाय और लिट्टी -चोखा खिलाऊंगी।

सड़क भी बहुत अच्छी बन गयी है।कोई दिक्कत नहीं होगी।’’

दरअसल आम तौर पर अब मैं कहीं जाता नहीं।

पर,पारिवारिक बंटवारे के बाद जमीन-जायदाद का हाल देखने और उसके बारे में कुछ योजना बनाने के लिए भी मेरा जाना जरूरी था।

मैं टाल रहा था।

खैर, वह दिन कल आ ही गया।

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कुछ दशक पहले गांव से पटना आने में लगभग पूरा दिन लग जाता था।स्टीमर से गंगा पार करना पड़ता था।

कल तो करीब सवा ग्यारह बजे दिन में हम पटना से निकले और करीब चार बजे शाम तक पटना लौट भी आये।दूरी 51 किलोमीटर।

निर्माणाधीन शेरपुर-दिघवारा 6 लेन गंगा ब्रिज के बन कर तैयार हो जाने के बाद तो मेरे गांव की दूरी काफी घट जाएगी।

इस यात्रा में मेरे पुत्र अमित भी साथ थे।

हमलोग जेपी सेतु पार कर आगे बढ़े और सोनपरु-छपरा रेल लाइन के उत्तर वाली सड़क यानी नेशनल हाईवे पकड़ ली।

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रेलवे लाइन के उत्तर स्थित एन.एच.के पास ही कहीं स्थानीय संासद राजीव प्रताप रूडी हवाई अड्डा चाहते हैं।

उसके लिए उन्होंने काफी प्रयास किया।

पर अभी तो नहीं हुआ,पर एक न एक दिन होगा।

वह इलाका उस लायक बन भी रहा है।

दूर-दूर फैले हरे -भरे खेतों के बीच से हम अच्छी सड़क पर गुजर रहे थे।सुखद अनुभव।बिहार का विकास हो रहा है भई,हुआ भी है।

जहां -तहां डेवलपर्स और बिल्डर्स उस इलाके को न्यू पटना का स्वरूप देने के काम में तेजी से लग गये हैं।जमीन की कीमत आसमान छू रही है।

हालांकि अभी ही सुव्यवस्थित विकास में राज्य सरकार का हस्तक्षेप नहीं होगा तो वह इलाका भी

बेतरतीब बसावट का नमूना बन जाएगा,साथ ही शासन के लिए सिरदर्द भी।

याद रहे कि मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि शेरपुर दिघवारा पुल बन जाने के बाद दिघवारा से नयागांव का इलाका न्यू पटना बन जाएगा।

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खैर, विकास के मामले में उस इलाके का कायापलट हो रहा है।

लालू प्रसाद के सौजन्य से उस इलाके में पहले से बेला 

(दरियापुर अंचल)में रेल पहिया कारखाना मौजूद है।

इन दिनों केंद्र और राज्य सरकार के कारण विकास को और गति मिल गयी है।

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अब आप आइए बेला के गोलू टी शाॅप पर जहां हाड़ी चाय बनती रहती है।

मिट्टी की हाड़ी की चाय हमने भी पी,साथ में लिट्टी और राबड़ी भी खाई।

लिट्टी ने तो मुझे प्रभावित नहीं किया,किंतु चाय और राबड़ी बेजोड़ थी।

मैंने अमित से कहा कि हाड़ी की तस्वीर ले लो।

मिट्टी की हाड़ी में पके भोज्य पदार्थ के फायदे जानने के लिए गुगुल गुरू से संपर्क किया--कई फायदे मिले।

गांव में बचपन में मेरे यहां मिट्टी की हाड़ी में ही दाल बनती थी।

वह स्वाद अब कहां ?

साथ में लोहे की कडाह़ी वाली सब्जी के लिए तरस जाता हूं।

अब भी छठ में खीर मिट्टी की हाड़ी में ही बनती है।

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अब हम पहुंचते हैं--अपने गांव यानी भरहापुर(मौजे-सखनौली,टोले भरहापुर, अंचल- दरियापुर, जिला-सारण।)

खान पुर -भरहापुर जुड़वा गांव दिघवारा -अमनौर स्टेट हाईवे पर अवस्थित है।

  शेरपुर -दिघवारा पुल गंगा से उत्तर जहां गिरेगा उससे करीब 3 किलोमीटर पर मेरा गांव है।

 गांव में मेरी जो भी जमीन है, वह सब पक्की सड़क पर है।अबाध बिजली की आपूत्र्ति सोने में सुहागा है। 2013 में पहली बार बिजली गयी।

  खानपुर-भरहापुर  बाजार दिन दूनी रात चैगुनी तरक्की कर रहा है।

काफी दुकानें हैं।कई तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं।

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बीच बाजार में हाईवे से सटे मेरे तीन भाइयों के परिवार की तीन बीघा पुश्तैनी जमीन अब भी खाली है।

बाएं-दाएं- सामने दुकानें हैं।सामने की दुकानों के ठीक पीछे इंटर काॅलेज है।

इस जमीन में से एक बीघा यानी पटना जिले का 25 कट्ठा मेरे हिस्से पड़ा है।

नीचे की तस्वीर उसी जमीन पर ली गई है।

खाली है।

फिलहाल खेती होती है।

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इलाके के मित्रों- परिचितों का दबाव रहा है कि उस जमीन पर कुछ भी निर्माण जल्दी कीजिए।

 इस यात्रा में भी यही सुनना पड़ा। 

मेरी राय है कि बड़ा स्कूल या अस्पताल या कोई अन्य चीज बने।

 जिससे सिर्फ मेरा ही लाभ न हो, बल्कि इलाके को भी रोजगार मिले ।  कम से कम स्वास्थ्य-शिक्षा के मामले में सबका कल्याण हो।

देखते हैं,कब तक क्या हो पाता है !

एडवांस लेकर दुकानें बना लेना तो आसान काम है।

पर उससे शिक्षा या स्वास्थ्य के क्षेत्र में वह सब नहीं हो पाएगा जो वहां की जरूरत और  चाह है।

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25 दिसयंबर 23


   

   


 


1972 के भारत-पाक समझौते के समय अटल बिहारी वाजपेयी 

को शिमला में जन सभा नहीं करने दिया था सरकार ने

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सुरेंद्र किशोर

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सन 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद 2 जुलाई 1972 को शिमला में दोनों देशों  के बीच समझौता हुआ।

इंदिरा सरकार को खबरदार करने के लिए जनसंघ अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी तब शिमला में मौजूद थे।

समझौते पर प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और पाक के राष्ट्रपति जुल्फीकार अली भुट्टो ने दस्तखत किए।

समझौते की शर्तों से जनसंघ अध्यक्ष अटल

बिहारी वाजपेयी संतुष्ट नहीं थे।

वे वहां जनसभा करना करना चाहते थे।

पर, उन्हें इजाजत नहीं मिली। 

वैसे शिमला समझौते के समय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष पीलू मोदी भी शिमला पहुंच गए थे।

  अटल जी चाहते थे कि इन्दिरा गांधी, जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ नरम  रुख नहीं अपनाएं।

 दूसरी ओर, वहां पीलू मोदी अपने दोस्त ‘जुल्फी’ के साथ के अपने पुराने दिन याद कर रहे थे।

साथ ही, यह घोषणा कर रहे थे कि मैं जुल्फी पर किताब लिखूंगा।

याद रहे कि दोनों छात्र जीवन में सहपाठी थे।

अगले साल पीलू मोदी की वह किताब आ भी गई।

उसका नाम है ‘जुल्फी माई फ्रंेड।’

 याद रहे कि अमरीका में पढ़ाई के दौरान जुल्फी और पीलू एक ही आवास में रहते थे।भारतीय सेना ने 1965 के युद्ध में जो उपलब्धि हासिल की,उसे भारत सरकार ने 1966 के ताशकंद समझौते में गंवा दिया था।

  उसके विरोध में तब के केंद्रीय मंत्री महावीर त्यागी ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।

  पूर्व सैनिक त्यागी का आरोप था कि हमने जीती हुई ऐसी जमीन पाकिस्तान को लौटा दी जिस रास्ते पाकिस्तानी हमलावर अक्सर कश्मीर को निशाना बनाते हैं।

कहा गया कि वह इस्तीफा लालबहादुर शास्त्री के रेल मंत्री पद से इस्तीफे से भी बड़ा था।

 ताशकंद की गलती न दुहराई जाए ,इस कोशिश में अटल जी लगे हुए थे।पर अंततः वे विफल ही रहे।

  हालांकि उससे पहले  अटल बिहारी वाजपेयी ने तब शिमला के जैन हाॅल में बैठक की।

प्रेस सम्मेलन भी किया।

उन्होंने तत्कालीन प्रधान मंत्री इन्दिरा गांधी से अपील की कि वे सैनिकों के बलिदान को न गवाएं।

पर ऐसा न हो सका। 

 2 जुलाई 1972 की रात में हुए समझौते के बाद अटल जी ने कहा कि हमारी सरकार ने पाकिस्तान  के सामने आत्म समर्पण कर दिया।क्योंकि दोनों देशों के बीच विद्यमान विवादों पर कोई समझौता न होने पर भी भारतीय सेना हटा लेने का निर्णय हो गया।कश्मीर समस्या तो सजीव बनी ही रहेगी।

युद्ध में हुई क्षति,विभाजन  के समय के कर्ज ,विस्थापितों की संपत्ति के मामले भी फिर टाल दिए गए।

इसके विपरीत राष्ट्रपति भुट्टो दो लक्ष्य लेकर वात्र्ता में शामिल हुए थे।

एक, युद्ध में खोए भूभाग की वापसी और दूसरा युद्धबंदियों की रिहाई।

दोनों में वे सफल रहे।

हालांकि विदेश मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह ने कहा कि पाकिस्तान 69 वर्ग मील भारतीय क्षेत्र खाली करेगा।

भारत 5139 वर्ग मील पाकिस्तानी इलाका खाली करेगा।

हमने उदारता का परिचय दिया है।

साथ ही यह तय हुआ कि अब दोनों देश अपने विवाद परस्पर बातचीत से हल करेंगे।

पर उधर चर्चा रही कि इंदिरा जी भुट्टो के सिर्फ मौखिक आश्वासनों पर ही मान गयीं।

  भुट्टो ने कहा था कि हम कश्मीर के बारे में बाद में ठोस कदम उठाएंगे।

पर पाकिस्तान लौट कर भुट्टो बदल गए।

याद रहे कि 1971 के बांग्ला देश युद्ध के बाद शिमला समझौता हुआ था।

पाकिस्तान के करीब 90 हजार युद्धबंदी भारत में थे।

उन्हें छुड़ाना भुट्टो का सबसे बड़ा उद्देश्य था।

इसको लेकर पाकिस्तान में वहां की सरकार की जनता फजीहत कर रही थी। 

 पर पीलू मोदी अपनी पुस्तक लायक सामग्री हासिल करने में सफल रहे।

उन्होंने टुकड़ों में अपने लंगोटिया यार ‘जुल्फी’ से कुल 11 घंटे तक बातचीत की।

दिल्ली लौटने के बाद पीलू मोदी ने भुट्टो के बारे में कई बातें बताईं।

पत्रकारों ने पीलू से भुट्टो के बारे में जो सवाल किए ,उनमें अधिकतर सवाल गैर राजनीतिक थे।

 पीलू के अनुसार शिमला शिखर वात्र्ता के बारे में उन दिनों किसी को यह पता नहीं चल रहा था कि भीतर क्या हो रहा है।

दोनों देशों के नेताओं ने शिमला से वापस जाने के बाद ही अपने मुंह खोले।

पीलू मोदी ने बताया कि भुट्टो बुद्धिमान, तीखा और जज्बाती इनसान है।तैश में आ जाने की उसकी पुरानी आदत है।

लेकिन वह दिल का बुरा नहीं है।

भुट्टो के सिर पर समाजवाद का भूत सवार है।

वह हमारी यानी स्वतंत्र पार्टी की नीतियों में विश्वास नहीं करता।

पर अमल हमारी नीतियों पर ही करता है।

मोदी ने कहा कि दोस्ती और राजनीति अलग -अलग पटरियां हैं। 11 घंटे की मुलाकात दो दोस्तों की बेमिसाल दास्तान है।

  उधर इंदिरा सरकार ने शिमला शिखर वात्र्ता के लिए आए पाकिस्तानी प्रतिनिधि मंडल को देखने के लिए जो भारतीय कथा फिल्में भेजी थीं,उन पर भी तब इस देश में विवाद उठा था।

वे फिल्में थीं-‘चैदहवीं का चांद’,‘मिर्जा गालिब’,‘पाकिजा’,‘साहब बीवी और गुलाम’ तथा  ‘मुगल ए आजम’।

भारत के कुछ लोगों ने तब सवाल किया था कि इस चयन का आधार क्या था ?

भारत की ‘प्रतिनिधि कथा फिल्में’ क्यों नहीं भेजी गयीं ?

 उधर वात्र्ता के समय अपने पिता के साथ आई बेनजीर भुट्टो जब शिमला की सड़कों पर भ्रमण करती थीं तो उसे देखने के लिए बड़ी भीड़ लग जाती थी।

एक दिन तो इंदिरा गांधी की भी सड़क पर संयोगवश बेनजीर से मुलाकात हो गयी।दोनों साथ-साथ घूमीं।

पीलू मोदी ने विनोदपूर्ण ढंग से कहा था कि यदि बेनजीर यहां से चुनाव लड़ जाए  तो यहां के मुख्य मंत्री वाई.एस.परमार को भी हरा देगी।

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20 दिसंबर 23

 

     


 यदाकदा

सुरेंद्र किशोर

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देश की विधायिकाओं का एजेंडा प्रतिपक्ष भी तय करे

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क्यों न इस देश में भी विधायिकाओं के हर सत्र के कुछ खास दिनों के एजेंडा प्रतिपक्ष तय करे ?

ब्रिटेन और कनाडा में यह परंपरा जारी है।

यदि यहां भी वैसा हो जाए तो शायद सदन के संचालन में उससे फर्क पड़े।

शोरगुल कम हो !

पता नहीं, हमारे संविधान निर्माताओं ने इस पर सोच-विचार किया था या नहीं।

पर,अब तो इसकी जरूरत लग रही है।

इस देश में संसद सहित विधान सभाओं और विधान परिषदों  में शांति बहाल रखना दिन प्रति दिन मुश्किल होता जा रहा है।

ऐसे में इस फार्मूले को अपनाने में क्या हर्ज है !

शायद उससे प्रतिपक्षी दलों को कुछ संतुष्टि मिले।

याद रहे कि ब्रिटिश संसद के हर सत्र के 20 दिन वहां के प्रतिपक्षी दल सदन की कार्यवाही का एजेंडा तय करते थे।

कनाडा में 22 दिन ऐसा होता है।

यदि एक से अधिक दल प्रतिपक्ष में हैं तो उतना समय उन दलों के बीच उनकी सदस्य संख्या के अनुपात बांट दिया जाता है।

हां,यदि प्रतिपक्ष के किसी मुद्दे पर सदन में मतदान होता है तो उसके नतीजों को स्वीकार करने के लिए सरकार बाध्य नहीं हेाती।

हाल में भी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि असली मुद्दों पर सदन में चर्चा नहीं हो रही है।

यदि उन्हें कुछ दिन मिल जाएं तो वे ‘‘असली मुद्दों’’ को एजेंडा बना सकंेगे।

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भाजपा पहल करे

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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा सांसदों से कहा है कि वे संयम बरतें और लोकतांत्रिक मानदंड के अनुसार व्यवहार करें।

अभी तो उनका इशारा संसद में शालीनता और संयम बरतने को लेकर हैं।

किंतु ऐसे निदेशों को विधान सभाओं और परिषदों में मौजूद भाजपा सदस्यों तक भी पहुंचाया जाना चाहिए।

यदि ऐसे निदेश का पालन हो सका तो देश की विधायिकाओं में अच्छी परंपरा की शुरूआत होगी।

जिन राज्यों में गैर भाजपा दलों की सरकारें हैं,क्या उन राज्यों की विधायिकाओं में भाजपा सदस्यगण अपने आचरण से आदर्श उपस्थित करेंगे ?

यदि ऐसा हुआ तो संसद के प्रतिपक्षी दलों से भी आदर्श पेश करने के लिए कहने का नैतिक हक भाजपा को हासिल होगा।

चूंकि भाजपा एक अनुशासित दल है,इसलिए वह इसकी शुरूआत कर सकती है।

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कैसे सुधरेगी बिहार की शिक्षा ! 

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बिहार के अतिरिक्त मुख्य सचिव के.के.पाठक राज्य के शिक्षा क्षेत्र में सुधारात्मक कार्य कर रहे हैं।

 उसका सकारात्मक असर है।

 आम जनता के.के.पाठक की इस पहल की सराहना कर रही है।मुख्य मंत्री नीतीश कुमार का भी संरक्षण श्री पाठक

को हासिल है।  

पर,कुछ खास हलकों में के.के.पाठक की पहल का तीखा विरोध हो रहा है।

ऐसे में क्या पाठक जी अभियान अधिक दिनों तक जारी रख पाएंगे ?

अपवादों को छोड़कर बिहार में शिक्षा-परीक्षा की आज जो दुर्दशा है,उसमें सुधार का काम अगली पीढ़ियों के लिए नहीं टाला जा सकता है।

 इन पंक्तियों का लेखक दशकों से देख रहा है कि किस तरह यहां की अच्छी शिक्षा व्यवस्था को धीरे धीरे बर्बाद कर दिया गया।

 कई तत्व जिम्मेदार रहे हैं।एक उच्चस्तरीय न्यायिक आयोग   

बने।दुर्दशा के कारणों को चिन्हित करे।सुधार के उपाय सुझाये।सरकार उन उपायों को लागू करे।

अन्यथा, अधिकतर शिक्षण संस्थान सिर्फ सर्टिफिकेट

बांटने के काउंटर भर बनकर रह जाएंगे।     

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तब और अब की कहानी

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साठ के दशक की बात है।

बिहार के औरंगाबाद जिले के एक क्षेत्र से विधायक ब्रजमोहन सिंह राज्यस्तरीय नेता से बातचीत कर रहे थे।

ब्रजमोहन सिंह ने कहा कि मैं इन दिनों क्षेत्र के विकास के काम में लगा था,इसलिए आपसे बीच में मिल नहीं सका था।

दिवंगत ब्रजमोहन बाबू ने इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि मुझे उम्मीद थी कि नेता जी मेरी तारीफ करेंगे।

पर,उल्टे उन्होंने कहा कि ज्यादा विकास वगैरह के काम में लगोगे तो अगली बार चुनाव नहीं जीत पाओगे।

क्योंकि सरकार से कितने गांवों का विकास करवा पाओगे ?

साधन इतना कम है कि कुछ ही गांव का करा पाओगे।

नतीजतन जिन गावों का नहीं होगा, उन गांवों के लोग तुमको अगली बार वोट नहीं देंगे।

आज यानी सन 2023 में स्थिति बदल चुकी है।

हर तरफ विकास व कल्याण के थोड़ा-बहुत काम हो रहे हैं।केंद्र और राज्य सरकारों के बीच होड़ है।

अन्य गांवों का भी यही हाल है।पर व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर मैं अपने गांव का हाल बताता हूं।

गांव के दक्षिण से उत्तर की ओर पक्की सड़क बन रही है।

पूरब से पश्चिम ओर सीमेंटी सड़क की योजना है।नदी में घाट बन रहा है।

कई साल पहले मेरे प्रयास से वहां कुछ विकासात्मक काम हुए थे।

पर,इन दिनों राज्य के सामान्य विकास के क्रम में मेरे पुश्तैनी गांव का भी विकास हो रहा है।

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और अंत में

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मध्य प्रदेश विधान सभा भवन से जवाहरलाल नेहरू का चि़त्र हटा दिया गया।

कुछ साल पहले जब कमलनाथ ने मुख्य मंत्री पद संभाला तो उन्होंने जेपी सेनानी पेंशन योजना बंद कर दी थी।यह सब चलता रहता है।

बिहार में ,जहां आंदोलन सर्वाधिक सघन था,जेपी सेनानी को अधिकत्तम हर माह 15 हजार रुपए मिलते हैं।मध्य प्रदेश में तब 25 हजार रुपए मिलते थे।

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21 दिसंबर 23