शुक्रवार, 30 अगस्त 2024

       

      एक निवेदन अपने असहमतों से

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         सुरेंद्र किशोर

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 मेरे कुछ पोस्ट पर कुछ लोगों की इन दिनों बड़ी शिकायतें रहती हैं।

चूंकि वे भी बुद्धिजीवी ही हैं,इसलिए गाली-गलौज तो नहीं करते,पर मेरी मंशा पर सवाल जरूर उठाते रहते हैं।

  यदि वे मुझसे स्वस्थ बहस करना चाहते हैं तो उन्हें चााहिए कि वे मेरे तथ्यों को गलत साबित करें और मेरे तर्कों और निष्कर्षों का तार्किक ढंग से खंडन करें।

  पर, वे वैसा नहीं करेंगे,कर भी नहीं पाएंगे, यह मैं जानता हूं।क्योंकि उनमें से अनेक के विचार ठहर गये हैं।

इसलिए मैं उन्हें ‘अन फे्रंड’ कर देता हूं।क्योंकि उनसे बहस में पड़ने का मेरे पास समय भी नहीं है।

मुझसे असहमत लोगों से निवेदन है --आप खुश रहिए, मस्त रहिए, जिस विचार धारा में आप जी रहे हैं,उसमें ही बने रहिए।

मैं तो आपसे यह सवाल नहीं करता कि आप उस खास विचार धारा में क्यों पड़े हुए हैं ?

 मैं आपकी मंशा पर भी शक नहीं करता। मैं आपका अभिभावक नहीं हूं।

इसलिए आप भी किसी का अभिभावक बनने की कोशिश न करें,यही शिष्टता है।

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  मैं हमेशा कहता हूं कि अच्छे नेताओं और शासकों का यह कत्र्तव्य है कि वे देश, काल, पात्र की मौजूदा जरूरतों के अनुसार अपनी काल बाह्य नीतियों -रणनीतियों से बाहर निकलें ।अन्यथा, न तो देश बचेगा और न ही आपका नेतृत्व।

इस मामले में मैं इस देश के सिर्फ दो और दो विदेश के उदाहरण देता हूं।

डा.राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण ने समय -समय पर और देश की जरूरतों के अनुसार  

(भगवा धारी !)जनसंघ से सहयोग किया और लिया था।

इतना ही नही, डा.लोहिया को तो इस बात पर भी अफसोस रहा कि उनके समाजवादी सहकमियों ने उनके निदेश के बावजूद सन 1963 में जौनपुर जाकर जनसंघ के दीनदयाल उपाध्याय के चुनाव में उनकी मदद नहीं की।वहां लोस का उप चुनाव हो रहा था।उपाध्याय जी हार गये थे।क्योंकि उन्होंने ब्राह्मणवाद नहीं किया। 

  ध्यान रहे कि सिर्फ देश की तात्कालिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ही दोनों महान नेताओं ने लीक से हटकर भी वैसे कदम उठाये थे।

  न तो समाजवादी, सर्वोदयी, भूदानी नेता जेपी को खुद सत्ता में आना था और न ही कट्टर समाजवादी लोहिया को।(आज भी देश के समक्ष कुछ अत्यंत कठिन समस्याएं और कुछ कठोर प्रश्न उपस्थित हैं।)

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सन 1967 में डा.लोहिया के ही प्रयास से जनसंघ,सी.पी.आई.और संयुक्त समाजवादी पार्टी के नेतागण एक साथ महामाया प्रसाद सिन्हा की बिहार सरकार में मंत्री थे।याद रखिए--उस सरकार में सी.पी.आई.के चंद्रशेखर सिंह और इंद्रदीप सिंहा कैबिनेट और तेज नारायण झा राज्य मंत्री थे।तब यू.पी. में भी उपर्युक्त तीनों दल एक साथ कैबिनेट में थे।

(दूसरी ओर ,मशहूर लेखक रशीद किदवई ने दैनिक भास्कर --17 मार्च 24--में लिखा है कि ‘‘समाजवादी विचारधारावाली पार्टियों और आर.एस.एस.नियंत्रित जनसंघ सहित मध्यमार्गी दक्षिणपंथी ताकतों के द्वारा गठबंधन की राजनीति में एक नया प्रयोग था।’’ उस संदर्भ में रशीद साहब सी.पी.आई.की चर्चा करना भूल गये।पता नहीं क्यों, जबकि देश की राजनीति की अभूतपूर्व घटना यही थी कि सी.पी.आई. और जनंसघ दोनों एकाधिक राज्यों के एक ही मंत्रिमंडल में मंत्री बने थे।)

जेपी आंदोलन (1974-77) में अ.भा.वि.प.के लोग भी शामिल थे।

1977 के चुनाव के बाद जो सरकारें केंद्र व राज्यों में बनीं,उनमें जनसंघ घटक के भी नेतागण मंत्री और मुख्य मंत्री बने थे।

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इसके बावजूद किसी ने यह आरोप नहीं लगाया कि समाजवादी लोहिया और जेपी भगवाधारी बन गये।

दरअसल इन दो महान नेताओं ने देश की तात्कालिक जरूरतों के अनुसार ही अपनी पिछली रणनीति बदली और उन्हें सफलता भी मिली।

उन लोगों को देश को विचारधारा से ऊपर रखा।

दरअसल विचारधारा देश के लिए होती है न कि देश विचारधारा के लिए।

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अब आप आज के रूस और चीन पर नजर दौड़ाइए।

 सन 1985 में ही एक चीनी पत्रकार ने लिख दिया था कि ‘‘आज का चीन बस पूंजीवाद का इस्तेमाल समाजवाद को सुदृढ़ करने के लिए कर रहा है।’’

एक चीनी शासक ने यह भी कहा है कि हम समाजवाद की रक्षा के लिए पूंजीवाद अपना रहे हैं।

  पर,भारत के कम्युनिस्टों की पब्लिक सेक्टर के बारे में क्या राय रही है ?

दरअसल वे यह बात समझ ही नहीं पाए हैं कि पब्लिक सेक्टर की सफलता के लिए भ्रष्ट और काहिल स्टाफ की जरूरत नहीं होती।

  कम्युनिस्टों के बारे में यह माना जाता रहा है कि वे धर्म निरपेक्ष होते हैं।सही भी है बशर्ते यह विचारधारा देश को नुकसान न पहुंचाए। (दरअसल ‘‘भाजपा को सत्ता से बाहर रखने ’’के बहाने कम्युनिस्ट लोग इस देश की भ्रष्टत्तम राजनीति से हाथ मिलाते रहते हैं,उन्हें ताकत पहुंचाते रहते हैं, जबकि कम्युनिस्टों में अधिकतर नेतागण खंुद ईमानदार होते हैं।इस गलत रणनीति के कारण न तो वे भाजपा को सत्ता में आने से रोक सके न ही अपना अस्तित्व ही बचा पा रहे हैं।)

 तदनुसार जब चीन की सरकार ने देखा कि उसकी अंध धर्म निरपेक्षता देश को खंडित कर देगी तो उसने उसके बदले राष्ट्रवाद अपनाया।(भारत में इसके विपरीत हो रहा है।)

 उसने चीन के दो करोड़ उइगर मुसलमानों के बीच के जेहादियों की अभूतपूर्व प्रताड़ना शुरू कर दी।

अब भी जारी है।उस प्रताड़ना के खिलाफ भारत के कोई प्रगतिशील बुद्धिजीवी या कम्युनिस्ट चीन के खिलाफ कभी कुछ नहीं बोलते।

जबकि यहां की ऐसी छोटी -छोटी घटनाओं पर भी शोर मचाने लगते हैं।यह उनके खिलाफ जाता है।

(उनमें से अधिकतर भारत को खोखला कर रहे जेहादियों से गलबहियंा करते हैं।शाहीन बाग में भी वे उनके साथ ही थे।)

दरअसल उइगर मुसलमान हथियारों के बल पर चीन के शिंगजियांग प्रांत में इस्लामिक जेहाद करने के काम में लगे थे।लगता है कि अब वहां के उइगर मुसलमान जेहाद भूल गये हैं।

भारत में भी पी.एफ.आई.तथा इस तरह के अन्य संगठन जेहाद के काम में गंभीरता से लगे हुए हैं।पर,भारत के कम्युनिस्ट उनका विरोध नहीं करते।

 ऐसे ही कारणों से पश्चिम बंगाल से माकपा साफ हो गयी और अब केरल में भी उनकी स्थिति डंावाडोल हो रही है।

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कभी पब्लिक सेक्टर के लिए जाना जाता था सोवियत संघ।

पर, बाद के वर्षों में जब रूस के हुक्मरानों ने देखा कि अब निजीकरण करना होगा तो वे उसी राह पर चल दिए।ऐसे बदलाव के नतीजतन ही रूस और चीन में कम्युनिस्ट पार्टी भी बची हुई है और कम्युनिस्टों की सरकारें भी चाहे आज स्वरूप जो भी हो।

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पर,हमारे यहां की कई ऐसी जमातों को यह पता ही नहीं चल रहा है कि भारत की आज की विषम समस्याएं कौन-कौन सी हैं और उनका क्या इलाज है ?या फिर वे ईमानदारी से सोच नहीं रहे हैं।जो लोग सोच भी रहे हैं,उन्हें बदनाम करने में वे लोग लगे हुए हैं।या कोई और बात है ?

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28 अगस्त 24 



  इस देश में आत्म रक्षा दल और स्वयंसेवी 

जमात की जरूरत इसलिए भी है 

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सुरेंद्र किशोर

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इन दिनों रेलवे लाइनों पर छोटे -बड़े पत्थर रख कर

या अन्य तरह के अवरोधक खड़ा करके टे्रन दुर्घटनाएं कराने के काम में जेहादी तत्व बड़े पैमाने पर लगे हुए हैं।

पाकिस्तान परस्त देसी-विदेशी इस्लामिक जेहादी इस तरीके से आए दिन रेल गाड़ियां उलट रहे हैं।लोग मर रहे हैं,घायल हो रहे हैं।उन जेहादियों के लिए इस बात का कोई महत्व नहीं है कि उस ट्रेन में भाजपाई बैठे हैं या उनसे सहानुभति रखने वाले वोट लोलुप नेता या उनके परिजन।

    इस देश में रेलवे लाइन की कुल लंबाई लगभग सवा लाख किलोमीटर से भी अधिक है।

इतनी लंबी रेलवे लाइन की रखवाली करने के काम में कितने अधिक रेलवे स्टाफ व सुरक्षाकर्मियों की जरूरत होगी ?

क्या उतने अधिक स्टाफ कोई सरकार बहाल कर सकती है ?

नहीं।

जब भी बाढ़,भूकम्प,तूफान आदि की समस्या आती है तो बड़े पैमाने पर स्वयंसेवी दल अपने सरंजाम के साथ सक्रिय हो जाते हैं।

पर,जिस अनुपात में रेलवे लाइनों पर जेहादियों से खतरा उपस्थित हो गया है और जितनी बड़ी संख्या में दुघर्टनाएं कराई जा रही हंै,वैसे में संगठित आत्म रक्षा दलों और स्वयं सेवी जमातों की जरूरत होगी।उन्हें अपने अपने इलाकों में रेल लाइनों की रखवाली का भार दिया जा सकता है।

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देसी-विदेशी जेहादी गण पूरी दुनिया में अब काफी जल्दीबाजी में हैं, न सिर्फ भारत में बल्कि यूरोप और इजरायल में भी।

(विश्वास न हो तो गुगल पर यूरोप के अखबार पढ़ लीजिए।)

भारत में सक्रिय प्रतिबंधित संगठन पी.एफ.आई.ने तो सन 2047 तक हथियारों के बल पर

भारत को इस्लामिक देश बना देने का लक्ष्य निर्धारित कर ही दिया है।

  इस विपत्ति के क्षण में भी भारत पहले की ही तरह विभाजित है मतलब मध्य युग और ब्रिटिश काल की तरह ही।

इस देश के कुछ राजनीतिक और गैर राजनीतिक तत्वों को लगता है कि वे बांग्ला देश की तरह ही यहां भी तख्ता उलटवा कर अपने मुकदमों से बरी हो जाएंगे और फिर से गद्दी भी पा लेंगे।

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जो लोग यह कह रहे हैं कि यहां के मुसलमान, भाजपा-संघ के कारण परेशान हैं तो फिर ब्रिटेन,जर्मनी और फ्रांस में कौन सा भाजपा-संघ है ?

इजरायल में इस तरह की क्या समस्या है ?

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यानी कुल मिलाकर स्थिति यह है कि हमें समय से पहले चेत जाने की जरूरत है।

इस बीच यह अच्छी बात है कि प्रतिबंधित जेहादी संगठन

पी.एफ.आई.ने कहा है कि यदि भारत के 10 प्रतिशत मुसलमान भी हमारा साथ दे दें तो हम जल्द ही भारत में इस्लामिक शासन ला देंगे।

यानी दस प्रतिशत भी अभी उनके साथ नहीं हैं।किंतु रेल गाड़ियां उलटने या इस तरह की हिंसक कार्रवाईयों के लिए तो 9 प्रतिशत भी काफी साबित होंगे।

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30 जनवरी 1985 को बिहार विधान सभा में कर्पूरी ठाकुर ने कहा था कि ‘‘बूथ लुटेरों और जान लेने की कोशिश करने वालों का मुकाबला करने के लिए हथियार उठाना पड़े तो भी वह गलत नहीं होगा।कानूनन जायज है।

इसलिए आम्र्स लाइसेंस का प्रावधान बिहार सरकार खत्म कर दे । इस बात की छूट दे दे कि जिनके पास पैसे हों वे आग्नेयास्त्र खरीद लें।’’

आज जब कुछ लोग हथियारों के बल पर इस पूरे देश पर कब्जा करने के लिए सक्रिय है तो देशभक्त सरकार व राष्ट्रभक्त लोगों को क्या-क्या करना चाहिए ?

इस समस्या की चिंता करने वालों को गालियां देनी चाहिए ?

उनकी मंशा पर शक करना चाहिए ?

 शुतुरमुर्ग की भूमिका निभानी चाहिए ?

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30 अगस्त 24


बुधवार, 28 अगस्त 2024

 क्या हम तीसरी बार भी 

बंटेंगे भी और कटेंगे भी ?!

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योगी जी,आपकी चेतावनी सुनने वाले नहीं हैं वे।

जब मध्य युग में नहीं सुने,ब्रिटिश काल में नहीं 

सुने तो आज कैसे सुन लेंगे ?ं!

यदि सुन लें तो देश बच जाएगा ।

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      सुरेंद्र किशोर

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योगी जी, यदि नहीं सुनेंगे तो आप ही जैसे नेताओं को देश और लोगों को बचाने का कोई दूसरा उपाय करना पड़ेगा। वह भी जल्द ही करना पड़ेगा।क्योंकि खतरा तेजी से बढ़ता जा रहा है।

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एक उपाय यहां पेश है-मंदिरों की आय से देश भर में बड़े पैमाने पर

आत्म सुरक्षा या आत्म बलिदानी दस्ते बनवाइए।

साथ ही,देश के सभी मंदिरों पर से सरकारी कब्जे को हटवाइए।उनसे हो रही भारी आय को इसी काम में लगाइए।

क्योंकि अन्य धर्मों के पूजा स्थलों पर सरकारी कब्जा नहीं है।

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उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने कल आगरा में कहा कि 

‘‘राष्ट्र से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता है।

यह तब होगा जब हम एक रहेंगे।

हम बटंेगे तो कटेंगे।’’

मुख्य मंत्री ने यह भी कहा कि ‘‘बांग्ला देश देख रहे हो न,क्या हो रहा है।

ऐसी गलती यहां नहीं होनी चाहिए।

हम एक रहेंगे तो सुरक्षित रहेंगे।’’  

  योगी जी ने समयोचित बातें कही हैं।

आज इसीलिए योगी देश के सर्वाधिक लोकप्रिय मुख्य मंत्री हैं।

इंडिया टूडे ं(4 सितंबर 2024)के ताजा सर्वे (देश का मिजाज) की चर्चा करूं।

उसके तहत योगी जी के बारे में देश भर के (सिर्फ उत्तर प्रदेश के नहीं)एक लाख 36 हजार 463 मतदाताओं से राय पूछी गई।

उनमें से 46 दशमलव 30 प्रतिशत लोगों ने मुख्य मंत्री के रूप में योगी को देश में पहले स्थान पर रखा।

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क्योंकि लोगों का मानना है कि यू.पी.की जो मुख्य समस्याएं हैं,उन्हें योगी जी अच्छी तरह समझते हैं और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारी खतरा उठाकर भी उनके निदान की गंभीर कोशिश में लगे रहते हैं।

काश ! विभिन्न राज्यों के अन्य सत्ताधारी नेता भी ऐसा ही करते !

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खैर, अब मुख्य बात पर आते हैं।

 हम कब नहीं बंटे थे ?!

ब्रिटिश इतिहासकार सर जे.आर.सिली (1834-1895)ने लिखा है कि ब्रिटिशर्स ने भारत को कैसे जीता।

मशहूर किताब ‘‘द एक्सपेंसन आॅफ इंगलैंड’’ के लेखक सिली  की स्थापना थी कि 

‘‘हमने (यानी अंग्रेजों ने) नहीं जीता,बल्कि खुद भारतीयों ने ही भारत को जीतकर हमारे प्लेट पर रख दिया।’’

पुस्तक की सिर्फ एक पंक्ति यहां प्रस्तुत है--

‘‘भारत को जीतने की दिशा में जिस समय हमने पहली सफलता प्राप्त की थी,उसी समय हमने अमेरिका में बसी अपनी जाति के तीस लाख लोगों को ,जिन्होंने इंगलैंड के ताज के प्रति अपनी भक्ति को उतार फेंका था,अनुशासन के तहत लाने में पूरी तरह विफलता का मुंह देखा था।’’

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यानी,ब्रिटिश काल में भी हम बंटे हुए ही थे।

इस बात के बावजूद हम ब्रिटिश काल में भी बंटे रहे कि उससे पहले के मुस्लिम शासकों ने यहां की बहुसंख्यक आबादी के साथ लगभग वैसा ही सलूक किया जैसा सलूक आज बांग्ला देश के जेहादी तत्व वहां के अल्पसंख्यकों के साथ कर रहे हैं।

हम तब भी बंटे थे।राणा प्रताप एक तरफ थे तो मान सिंह दूसरी तरफ।अधिकतर आम लोगों को भी यह पढ़ा दिया गया था--‘‘को नृप होहिं हमें का हानि ?’’

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आज इस देश के बहुसंख्यक समाज के जो लोग बांग्ला देशियों और रोहिंग्याओं के समर्थक दलों की मदद कर रहे हैं,उन्हें वोट दे रहे हैं,वे लोग वही पुरानी गलती दोहरा रहे हैं।

इस गलती का नतीजा भी पहले जैसा ही खतरनाक होगा।

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इसलिए हमारे राष्ट्र की रक्षा हमारी गैर राजनीतिक सेना,अर्ध सैनिक बल और राज्यों की पुलिस तो करेगी ही।

पर,उनकी संख्या पर्याप्त साबित नहीं होगी।

इनके अलावा आत्म बलिदानी लोगों की बड़ी फौज भी तैयार करनी पड़ेगी।वे गांव -गांव में फैलेंगे।

  जिस तरह निजी सुरक्षा संगठनों को काम करने की अनुमति सरकार देती है,उसी तरह ‘‘आत्म बलिदानी दस्तें’’ तैयार करने वालों को सरकार मान्यता दे ही सकती है।

हमारे आधुनिक कानून के किताब में भी यह दर्ज है कि हमें आत्म रक्षा के लिए हमलावर पर आक्रमण करने का कानूनी अधिकार हासिल है।

आत्म बलिदानी दस्तों को मंदिरों की भारी आय से प्रशिक्षित किया जा सकता है।

चाहे तो सरकार ‘‘देश सुरक्षा कर’’ लगा सकती है।उसके जरिए आए पैसों से हम अपनी सेना,अर्धसैनिक बल और पुलिस की संख्या बढ़ा सकते हैं।आधुनिक हथियारों से वे लैस हों।

यह सब तैयारी अभी से नहीं होगी तो हम अचानक बड़ी भारी मुसीबत में फंस सकते हैं।

फिर तो योगी जी की चेतावनी निरर्थक जाएगी कि ‘‘बंटेंगे तो कटेंगे।’’

जिस तरह की तैयारी दूसरे देसी-विदेशी भारत द्रोही पक्ष की ओर से इस देश को बर्बाद करने के लिए हो रही है,उसके अनुपात में ही और उससे कहीं अधिक मजबूत तैयारी हमारी भी होनी चाहिए।

तभी हम इस मिश्रित संस्कृति वाले लोकतांत्रिक देश को मौजूदा स्वरूप में बचा सकेंगे जहां संविधान का शासन चलता है।

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27 अगस्त 24



सोमवार, 26 अगस्त 2024

 भारत को कृष्ण की गीता के 

नये संस्करण की जरूरत ?!

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सुरेंद्र किशोर

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भारत आज विषम स्थिति से गुजर रहा है।

यदि भगवान कृष्ण आज होते तो वे इस देश 

के वासियों को क्या उपदेश देते ?

उन्हें कैसी- कैसी हिदायतंे देते ?

कुछ अनुमान आप भी लगाइए।

आपको तो पता ही होगा कि उन्होंने

द्वापर में अर्जुन से क्या -क्या कहा था।

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26 अगस्त 24


रविवार, 25 अगस्त 2024

 केंद्रीय मंत्रि परिषद--1973 और 2023 का फर्क !

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गत 50 साल में सामाजिक समीकरण की दृष्टि से

मंत्रि परिषद की बनावट में कितना फर्क आया ?

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सुरेंद्र किशोर

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 नरेंद्र मोदी मंत्रि परिषद (2023)और इंदिरा गांधी मंत्रि 

परिषद (1973)के सदस्यों की सूची यहां पेश है।

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इन दोनों मंत्रि परिषदों में से किस में सामाजिक न्याय का अधिक ध्यान रखा गया है और किसमें अपेक्षाकृत कम ?

यह निर्णय आप पर ही छोड़ता हूं।क्योंकि सभी मंत्रियों की सामाजिक पृष्ठभूमि की जानकारी मुझे नहीं है।

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केंद्रीय मंत्रि परिषद-(सन 2023)

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1.-नरेंद्र मोदी-प्रधान मंत्री

2.-राजनाथ सिंह

3.-अमित शाह

4.-नितिन गडकरी

5.-निर्मला सीतारमण

6.-एस.जय शंकर

7.-अर्जुन मुंडा

8.-स्मृति जुबिन इरानी

9.-पीयूष गोयल

10-धर्मेंद्र प्रधान

11.-प्रहलाद जोशी

12.-नारायण तातू राणे

13.-सर्वानन्द सोनोवाल

14.-डा.वीरेद्र कुमार

15.-गिरिराज सिंह

16.-ज्योतिरादित्य एम.सिंधिया

17.-अश्विनी वैष्णव

18.-पशुपति कुमार पारस

19.-गजेंद्र सिंह शेखावत 

20.-किरेन रिजिजु

21.-राज कुमार सिंह

22.-हरदीप सिंह पुरी

23.-मनसुख मांडविया

24.-भूपेंद्र यादव

25.-डा.महेंद्र नाथ पांडेय

26.-परषोत्तम रूपाला

27.-जी.किशन रेड्डी

28.-अनुराग सिंह ठाकुर

29.-राव इन्द्रजीत सिंह

30.-डा.जितेंद्र सिंह

31.-अर्जुन राम मेघवाल

32.-श्रीपद येस्सो नाइक

33.-फग्गन सिंह कुलस्ते

34.-अश्विनी कुमार चैबे

35.-जनरल बी.के.सिंह

36.-कृष्ण पाल

37.-दानवे रावसाहेब दादाराव

38.-रामदास आठवाले

39.-साध्वी निरंजन ज्योति

40.-डा.संजीव कुमार बालयान

41.-नित्यानंद रय

42-पंकज चैधरी 

43.-अनुप्रिया सिंह पटेल

44.-डा.सत्यपाल सिंह बघेल

45.-राजीव चंद्रशेखर

46.-सुश्री शोभा करांदलाजे

47.-भानु प्रताप सिंह वर्मा

48.-श्रीमती दर्शना विक्रम जरदोश

49.-वी.मुरलीधरन

50.-श्रीमती मीनाक्षी लेखी

51.-रामेश्वर तेली

52.-कैलाश चैधरी

53.-अन्नपूर्णा देवी

54.-ए.नारायण स्वामी

55.-कौशल किशोर

56.-अजय भट्ट

57.-बी.एल.वर्मा

58.-अजय कुमार मिश्र

59-देवू सिंह चैहान

60.-भगवंत खूबा

61.-कपिल मोरेश्वर पाटिल

62.-प्रतिमा भौमिक

63.-सुभाष सरकार

64.-डा.भागवत किशन राव कराड

65.-डा.राजकुमार रंजन सिंह

66.-डा.भारती प्रवीण पवार

67.-विश्वेश्वर टुडू

68-शांतनु ठाकुर

69.-डा.मंुजपरा महेंद्र भाई

70.-जाॅन बर्ला

71.-डा.एल.मुरुगन

72.-निसिथ प्रामाणिक 

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केंद्रीय मंत्रि परिषद--(सन 1973)

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1.-श्रीमती इंदिरा गांधी--प्रधान मंत्री

2.-उमाशंकर दीक्षित

3.-राम निवास मिर्धा

4.-कृष्ण चंद्र पंत

5.-एफ.एच.मोहसिन

6.-फखरूद्दीन अली अहमद

7.-अन्ना साहब शिंदे 

8.-शेर सिंह

9.-वाई.बी.चव्हाण

10.-के.आर. गणेश

11.-अरविंद नेतम

12.-जगजीवन राम

13.-जानकी बल्लभ पटनायक

14.-विद्या चरण शुक्ल

15.-स्वर्ण सिंह

16.-सुरेंद्र पाल सिंह

17.-डी.पी.धर

18.-मोहन धारिया

19.-एच.आर.गोखले

20-नीतिराज सिंह चैधरी

21.-डी.आर.चव्हाण 

22.-वेदव्रत बरूआ

23.-मोहन कुमार मंगलम्

24.-सुबोध हंसदा

25.-टी.ए.पै

26.-सुखदेव प्रसाद

27.-सिद्धेश्वर प्रसाद

28.-राज बहादुर

29.-एम.बी.राणा

30.-कर्ण सिंह

31.-श्रीमती सरोजिनी महिषी

32.-सी.सुब्रह्मण्यम

33.-प्रणव कुमार मुखर्जी

34.-जियाउर रहमान

35.-भोला पासवान शास्त्री

36.-ओम मेहता

37.-के.रघुरमैया

38-बी.शंकरानंद

39.-केदारनाथ सिंह

40.-देवकांत बरुआ

41.-दिलबीर सिंह

42.-ललित नारायण मिश्र

43-मोहम्मद शफी कुरैशी

44.-हेमवती नन्दन बहुगुणा

45.-जगन्नाथ पहाड़िया

46.-आर.के खाडिलकर

47.-ए.के.किस्कू

48.-कोंडाजी बासप्पा

49.-नुरुल हसन

50.-सुशीला रोहतगी

51.-डी.पी.यादव

52.-शाहनवाज खान

53.-रघुनाथ रेड्डी

54.-जी.बेंकटस्वामी

55.-डी.पी.चट्टोपाध्याय

56.-ए.सी.जार्ज

57.-के.एल.राव

58.-बाल गोविन्द वर्मा

59.-इंद्र कुमार गुजराल

60.-धर्मवीर सिन्हा

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25 अगस्त 24




 (पुरुष) डाक्टर को धरती का भगवान कहा जाता है।

फिर तो महिला चिकित्सक धरती की देवी कैसे नहीं है ?।

किसी देवी के साथ ऐसा सलूक ?!!

कहते हैं कि डायन भी एक घर बख्श देती है।

पर,राक्षस ??

वह तो किसी को नहीं बख्शता।

पर,लगता है कि हमारे सुप्रीम कोर्ट ने उन राक्षसों के 

कानूनी तरीके से सफाये का रास्ता साफ कर दिया है।

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साथ ही, एक बात और लगती है।

वह यह कि कभी देश को दिशा देने वाले बंगाल के भद्र लोक का विवेक ताजा घटना के बाद एक बार फिर जग रहा है।

‘‘ममता -मोह’’ कम होने के संकेत साफ हैं।

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क्या एक और ‘‘नन्दी ग्राम’’??

पता नहीं !

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सुरेंद्र किशोर

24 अगस्त 24



















 

शनिवार, 24 अगस्त 2024

 रांची के अलकायदा माॅड्यूल से संकेत साफ

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आत्म रक्षा के लिए आम लोगों को आंग्नेयास्त्रों के 

लाइसेंस देने में राष्ट्रवादी राज्य सरकारें उदारता दिखाएं।

अन्यथा, बाद में पछताना पड़ेगा यदि खुर्शीद-मणिशंकर

 की धमकी इस देश में भी अचानक लागू हो गयी !!

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        सुरेंद्र किशोर

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इस देश को दहलाने की कोशिश में लगे अल कायदा के जेहादियों की गतिविधियों की खबरें कल रांची से आई थी।

  उसी तरह की खबर आज के अखबारों में भी आई है।

इन खबरों के आए कई घंटे बीत गये।किंतु किसी तथाकथित सेक्युलर दल या नेता ने ऐसे भीषण व डरावने राष्ट्रविरोधी षड्यंत्र पर अब तक चिंता प्रकट नहीं की है।

भला वे अपने वोट बैंक की कीमत पर ऐसा क्यों करेंगे ?!

उल्टे कुछ दिन पहले कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद और मणिशंकर अय्यर यह धमकी दे चुके हैं कि बांग्ला देश भारत में भी दोहराया जा सकता है।

अब यह कल्पना कठिन नहीं है कि कैसी- कैसी शक्तियों के बल पर ‘‘दोहराने’’ की वे धमकी दे रहे हैं !!

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कुछ साल पहले इस देश के एक तथाकथित सेक्युलर मुख्य मंत्री के राज्य में जेहादियों के स्लीपर सेल की मौजूदगी के बारे में एक अंग्रेजी अखबार में सनसनीखेज खबर छपी थी।

जिस संवाददाता ने वह खबर लिखी थी,उसे मुख्य मंत्री ने बुलाया और कहा कि ऐसी खबरें मत छापिए।

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  संवाददाता ने मुझसे बाद में कहा कि कैसा मुख्य मंत्री है यह ?

यह तो जेहादियों के स्लीपर सेल के फलने-फूलने में मदद कर रहा है।

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भारत के अनेक वोट लोलुप नेताओं की ऐसी ही सांठगांठ वाली या शुतुरमुर्ग वाली मानसिकता रही है।ऐसे स्लीपर सेल किस राज्य में नहीं है ?

पचास के दशक को याद करिए।

तिब्बत पर कब्जा करने के बाद चीन भारत की भूमि पर जब कब्जा करने लगा तो भारतीय संसद में आवाज उठी।

प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि उस जमीन पर तो घास का तिनका भी नहीं उगता।यानी मेरे काम का नहीं !

उसके बाद चीन ने सोवियत संघ की पूर्व सहमति से 1962 में हम पर हमला किया और हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर लिया।

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रांची में अल कायदा के जिस आंतकी माॅड्यूल का अब पता चल गया है,यदि उसके बाद भी हमारी सरकारें नेहरू की तरह सोयी रही तो हम बहुत बड़े खतरे में पड़ जाएंगे।

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ऐसे में उन राज्य सरकारों से, जो मुस्लिम वोट पर आश्रित नहीं हैं,अपील है कि वे उदारतापूर्वक लोगों को आग्नेयास्त्रों के लाइसेंस दें।

हां, वैसे लोगों को ही दें जिनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं चल रहा है।

 ‘‘बांग्ला देश’’की पुनरावृति की स्थिति में सेना-पुलिस तो अपना काम करेगी ही,जो इस देश में अब बहुत मजबूत हो चुकी है ,पर आम लोगों को भी वैसी आपात स्थिति में प्राण और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए सक्रिय होना होगा।‘‘प्रतिष्ठा’’ का मतलब आप समझ ही गये होंगे।

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 जो नेता व दल रंाची के आतंकी माॅड्यूल पर चुप हैं,वे उस आशंकित आपात स्थिति में क्या व कैसी भूमिका निभाएंगे,उसकी कल्पना आप आसानी से कर ही सकते हैं।

  सन 1962 के चीनी हमले के समय सी.पी.आई.के एक बड़े हिस्से ने कहा था कि चीन ने हम पर नहीं बल्कि भारत ने ही चीन पर हमला किया।

उसी आधार पर सी.पी.आई. 1964 में टूट गई और चीनपंथी सी.पी.एम.बनी।

चीन ने तब अपने पक्ष में जो पुस्तक तैयार की थी,उसे चीन पंथी भारतीय कम्युनिस्टों ने यहां के  लोगों के बीच खूब बटवाया।वह पुस्तक मेरे पास अब भी है।ऐसे लोगों की अब भी कमी नहीं है,इस देश में।बल्कि अब अधिक हैं।

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आज भी जब इस्लामिक जेहादी यहां कोई हिंसक कार्रवाई करते हैं तो कुछ खास दलों के नेतागण आरोप लगाते हैं कि यह सब भाजपा-आर एस एस के कारण हो रहा है जिसने सांप्रदायिक माहौल बना रखा है।

अब वे इस सवाल का जवाब नहीं देते कि बांग्ला देश में न तो भाजपा है और न ही आर.एस.एस.।

ब्रिटेन सहित दुनिया के अन्य कई देशों में भी जेहादी लोग भारी हिंसा कर रहे हैं तो वहां किस भाजपा या संघ से वे लड़ रहे हैं ?

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24 अगस्त 24