Monday, September 8, 2008

राजनीति में परिवारवाद से आजाद भारत को भारी नुकसान

परिवारवाद की नींव 1959 में ही पड़ गई थी


परिवारवाद की बुराइयों से आज इस देष की राजनीति बुरी तरह कराह रही है। पिछले साठ साल में जिन कुछ प्रमुख बुराइयों ने इस देश की राजनीति और सत्तानीति को बुरी तरह क्षति पहुंचाई हैं,उनमें परिवारवाद का काफी ‘योगदान’ है। पर इसके ठोस कदम 1959 में ही पहली बार पड़ चुके थे जब इंदिरा गांधी को जवाहर लाल नेहरू की सहमति से कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया था। 

विडंबना यह है कि आजादी की लड़ाई के जो हीरो थे और जो जन-जन के नेता थे,वही जवाहर लाल नेहरू परिवारवाद का लोभ संवरण नहीं कर सके। जबकि उसी समय देश के कुछ अन्य नेताओं ने परिवारवाद का लोभ संवरण कर लिया। 

उदाहरण और भी हैं, पर फिलहाल बिहार से ही दो उदाहरण प्रस्तुत हंै। तब बिहार के मुख्यमंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंह थे। 1957 के आम चुनाव के समय की बात है। चंपारण जिले के कुछ कांग्रेसी नेताओं ने विधानसभा के टिकट के लिए डा. श्रीकृष्ण सिंह के पुत्र षिशव शंकर सिंह का नाम पेश कर दिया। श्रीकृष्ण सिंह ने एक क्षण देर किए बिना कह दिया कि तब मैं खुद चुनाव नहीं लड़ंूगा। इस पर वे कांग्रेसी नेता ठंडे पड़ गए। 

याद रहे कि मुख्यमंत्री के पुत्र के लिए तब विधानसभा की सिर्फ एक सीट का सवाल था न कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर उनको बिठाया जा रहा था।

यही काम कर्पूरी ठाकुर ने 1980 में किया था जब एक बड़े राष्ट्रीय समाजवादी नेता चाहते थे कि कर्पूरी जी के पुत्र विधानसभा का चुनाव लड़ें। इन दोनों नेताओं के पुत्र उनके निधन के बाद ही विधायक और मंत्री बन सके।

इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने के संबंध में स्तंत्रता सेनानी महावीर त्यागी और जवाहर लाल नेहरू के बीच तीखा पत्र-व्यवहार आंखें खोलने वाला है। इन पत्रों से साफ है कि खुद पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी को राजनीति में आगे बढ़ाना चाहते थे।बल्कि यह भी कि वह देर सवेर उनकी उत्तराधिकारी बन जाएं। वे बनीं भी। जो व्यक्ति 1959 में सत्ताधारी दल कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्षा बना दी गईं, उन्हें तार्किक परिणति के तौर पर अगली महत्वपूर्ण सीट पर जाना ही था। 

दरअसल कांग्रेस अध्यक्ष पद पर इसलिए बिठाया गया ताकि आगे प्रधान मंत्री बनाने की पृष्ठभूमि तैयार हो जाए। त्यागी के पत्र से यह साफ था कि जवाहर लाल नेहरू ने अपनी साख का इस्तेमाल करके ही अपनी बिटिया को आगे बढ़ाया। पार्टी की ओर से इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के लिए कोई स्वतःस्फूर्त आग्रह नहीं था। देश के एक महान स्वतंत्रता सेनानी के बारे में आजादी के साठवें साल में ऐसी निर्मम बातों की चर्चा करना वैसे तो ठीक नहीं लग रहा है। किंतु जब आज पूरे देश व राजनीति को परिवार वाद भारी नुकसान पहुंचा रहा है और यह सब इस नाम पर किया जा रहा है कि यह काम तो नेहरू ने शुरू किया था तो नेहरू के काम की एक बार फिर समीक्षा जरूरी है। वह भी आजादी के साठवें साल में तो और भी जरूरी है।क्योंकि कोई माने या न माने,देश एक बार फिर चैराहे पर खड़ा है।

 इस अवसर पर यह विचारणीय है कि नेहरू की एक छोटी सी गलती का जब यह देश इतना बड़ा खामियाजा भुगत रहा है तो आज के करीब करीब सभी प्रमुख दलों के नेतागण अपने निजी स्वार्थवश बेशर्मी के बड़ी बड़ी गलतियां कर रहे हैं, तो उनका कितना बड़ा खामियाजा अगली पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा। यह घ्यान देने की बात है कि नेहरू डा.श्रीकृष्ण सिंह की तरह यह क्यों नहीं नहीं कह सके कि यदि उनकी संतान को आगे बढ़ाया जाएगा तो ‘मैं राजनीति से अलग हो जाउंगा?’ 

इससे यह पता चलता है कि उनकी पार्टी के लोग इंदिरा गांधी को दिल से अध्यक्ष नहीं बना रहे थे बल्कि वे खुद परोक्ष रुप से बनवा रहे थे। चापलूसों को तो बस इशारा मिलना चाहिए।हां, तब और आज में यह फर्क जरूर आया है कि न तो अब महावीर त्यागी की तरह कोई नेता परिवारवाद के खिलाफ बेबाकी से आवाज उठा रहा है और न ही कोई नेता नेहरू जैसा उसे लोकतांत्रिक भावना से लेकर उसका जवाब दे रहा है।

जरा सोचिए कि बाल ठाकरे,लालू प्रसाद,मुलायम सिंह यादव और एम.करूणानिधि आदि के परिवारवाद के खिलाफ आवाज उठाकर कोई उनके दल में रह पाएगा ? पर स्व.त्यागी न सिर्फ पार्टी में रहे बल्कि बाद के वर्षों में जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडलों में भी बारी बारी से सदस्य रहे। 

अब जरा कुछ बातें महावीर त्यागी जी के बारे में। उनका जन्म 31 दिसंबर,1899 को उत्तर प्रदेश के एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे स्वतंत्रता सेनानी थे और बाद में संविधान सभा के सदस्य भी बने।वे न सिर्फ प्रोविजनल पार्लियामेंट के सदस्य थे बल्कि उन्होंने 1952,1957 और 1962 में देहरादून क्षेत्र से लोक सभा के लिए चुनाव भी जीता था। 

 आज के सत्तालोलुप नेताओं से अलग थे वे। उन्होंने 1966 में लाल बहादुर शास्त्री मंत्रिमंडल से सिर्फ इसलिए इस्तीफा दे दिया था क्योंकि वे ताशकंद समझौते के तहत जीते हुए इलाके हाजी पीर,कारगील और टिथवाल पाकिस्तान को लौटाने के खिलाफ थे। आज तो इस देश में ऐसे भी नेता हो गए हैं जो सत्ता के लिए देश के हित को जाने अनजाने भारी नुकसान पहुंचाने के लिए भी सदा तैयार रहते हैं।

 त्यागी किसी भी विषय पर अपनी बेबाक राय रखते थे। 1951-53 में जब त्यागीजी केंद्र में राजस्व व खर्च महकमे के मंत्री थे तो उन्होंने प्रधान मंत्री के खर्चे पर भी पूछताछ कर दी थी।ऐसे ही निष्पृह व्यक्ति नेहरू के परिवारवाद पर भी सवाल खड़ा कर सकते थे और उन्होंने किया भी।

 कल्पना कीजिए कि 1959 में कांग्रेस में न जाने कितने ऐसे नेता मौजूद थे जो त्याग, तपस्या और योग्यता में इंदिरा गांधी से काफी आगे थे और जिनको दरकिनार करके इंदिरा गांधी को अध्यक्ष बनाया गया।

इसीको कहते हैं परिवारवाद। 

 याद रहे कि उससे एक साल पहले यानी 1958 में ही इंदिरा गांधी को कांग्रेस कार्य समिति का सदस्य बना दिया गया था। पिछले दिनों जब प्रकाष सिंह बादल ने पंजाब में अपना मंत्रिमंडल बनाया तो उनके परिवार के चार सदस्य उसमें शमिल हो गए। 

यह भी खबर आई कि तमिलनाडु के मुख्य मंत्री एम.करूणानिधि ने अंतिम तौर पर अपने पुत्र स्टालिन को ही अपना उतराधिकारी बना दिया। कम्युनिस्ट दलों और भाजपा को छोड़कर इस देष के लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल परिवारवाद से ग्रस्त हैं।हालांकि भाजपा में भी राज्य स्तर पर इस बीमारी ने जड़ें जमानी शुरू कर दी हैं।राजस्थान इसका नमूना है।

परिवारवाद यह नहीं है कि किसी नेता का परिजन राजनीति में आए। परिवारवाद यह है कि किसी नेता का परिजन अपनी योग्यता और क्षमता के अनुपात से काफी अधिक उंचा पद प्राप्त कर ले।

 1997 में बिहार में राबड़ी देवी का मुख्य मंत्री बनना राजनीति में परिवारवाद का शर्मनाक नमूना था। पर इस देश की राजनीति वैसे भी इतनी बेर्म हो चुकी है कि उसे अब किसी बात पर शर्म नहीं आती। पर जिनसे शर्म की सबसे अधिक उम्मीद की जाती थी,उन्होंने क्या किया ,वह महावीर त्यागी को लिखे पत्र से साफ है। नेहरू ने लिखा कि ‘लेकिन मेरा यह भी ख्याल है कि बहुत तरह से उसका इस वक्त कांग्रेस अध्यक्ष बनना मुफीद भी हो सकता है।’ 

लालू प्रसाद यदि कहें कि यदि मैंने अपनी पत्नी को मुख्य मंत्री बनवाया तो नेहरू ने भी तो यही काम किया था तो लालू प्रसाद को कोई क्या जवाब देगा ? 

महावीर त्यागी कौन थे? आज की पीढ़ी ऐसे नेताओं के बारे में कम ही जानती है। क्योंकि अधिकतर मीडिया और नेताओं की प्राथमिकताएं भी अब बदल गई हैं।वे ऐसे लोगों के बारे में बताने के बदले कुछ दूसरे ही लोगों के बारे में दे को अधिक बता रहे हैं।

 जवाहर लाल नेहरू के नाम महावीर त्यागी का पत्र 16, क्विन विक्टोरिया रोड नई दिल्ली जनवरी 31 ,1959प्रिय जवाहर लाल जी, मैं जानता हूं कि इस चिट्ठी के बाद मेरा कांग्रेस में रहना कठिन हो जाएगा। पर अपने स्वभाव/स्पष्टवादिता/ को बेचकर कांग्रेस में रहा भी तो क्या? मेरी हैसियत उन जैसी हो जाएगी कि जो मैत्री का व्यवसाय करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास आपके लिए एक दोहा कह गए हैं:-

सचिव, वैद्य, गुरु तीनि जो, प्रिय बोलहि मय आष, राज, तनु, धर्म तीनि का, होय वेग ही नाष। जब किसी के चारों ओर खुषामद ही खुषामद होने लगती है, तो उस बेचारे को अपनी सूझ-बूझ और बुद्धि पर अटूट अंधविष्वास हो जाता है, यही कारण है कि आजकल आपके भाषणों में अधिकाधिक तीखापन झलक रहा है। विरोधी गलत भी हों तो क्या? प्रजातंत्र में उनका भी एक स्थान है। क्योंकि विरोधी मत द्वारा हम अपने विचारों की उचित जांच और छानबीन कर सकते हैं।

 यदि बुरा न मानो तो मैं आज आपको यह तहरीर देना चाहता हूं कि आपके दरबारियों ने केवल अपने निजी स्वार्थवष आपके चारों ओर खुषामद के इतने घनघोर बादल घेर दिये हैं कि आपकी दृष्टि धुंधला गयी है। और अब समय आ गया है कि आप इन चरण-चुंबकों से सचेत हो जाओ, वर्ना आपकी मान-मर्यादा, सरकार और पार्टी सबका ह्रास होने जा रहा है। जैसे कि मुगलों के जमाने में मंत्रिगण नवाबों के बच्चों को खिलाया करते थे, आज इसी तरह आपकी आरती उतारी जा रही है और आपके इन भक्तों ने इसी प्रकार आपकी भोली-भाली इंदु का नाम कांग्रेस प्रधान पद के लिए पेष किया है और षायद आपने आंख मींचकर इसे स्वीकार भी कर लिया है।

 इंदु मेरी बेटी के समान है, उसका नाम बढ़े, मान बढ़े इसकी मुझे खुषी है। पर उसके कारण आप पर किसी प्रकार का हर्फ़ आवे सो मुझे स्वीकार नहीं है। मैं नागपुर, हैदराबाद, मद्रास, मैसूर और केरल का भ्रमण करके अभी लौटा हूं। वहां के कांग्रेस वाले क्या टिप्पणी करते हैं आपको उसकी इत्तला नहीं है। इस ख़याल में मत रहना कि इंदु के प्रस्तावकों और समर्थकों में जो होड़ हो रही है (कि उनका नाम भी छप जाए) यह केवल इंदु के व्यक्तित्व के असर से है। सौ फीसदी यह आपको खुश करने के लिए किया जा रहा है। इतनी छोटी-सी बात को यदि आप नहीं समझ सकते तो मैं कहूंगा कि आपकी आंखों पर परदे पड़ गए हैं, परदे। 

मैं यह पत्र इतना कटु इसीलिए लिख रहा हूं कि आंख के परदे केवल फिटकरी से कटते हैं। फिटकरी तो बेचारी घिसकर गल-घुल जाती है। यह समझ लो कि अब कांग्रेस में पदलोलुपता और व्यक्तिवाद का ऐसा वातावरण छा गया है कि मुझे कोई दो ऐसे व्यक्ति बता दें कि जो मित्र हों और आपस में दिल खोलकर बातें कर सकते हों। इस बात को मान लो कि अब वह पुराना मुष्तरका सपना कि जिसमें हर रंग भरने वाले को हम हृदय से लगाते थे, टूटकर छिन्न- भिन्न हो चुका है। 

अब हमारी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं के सपने अलग-अलग हैं, और उन्हीं के पीछे हम दौड़ रहे हैं। इसी को व्यक्तिवाद कहते हैं। ऐसे वातावरण में भय, स्वार्थ और संदेह की मनोवृत्ति होना अनिवार्य है। आज जबकि षासन का ढांचा ढीला पड़ चुका है, रिष्वत और चोरबाजारी का बोलबाला है, साथियों में ‘वह काटा’, ‘वह मारा’ वाले पतंगबाजी के नारे लग रहे हैं, जबकि अधिकांष नेतागण मिनिस्ट्री और लोकसभा और विधान सभाओं की मेंबरी कर रहे हों, और केवल चार आने वाले साधारण सदस्य मंडलों में रह गए हों, ऐसे जर्जरित ढांचे को इंदु बेचारी कैसे संभाल सकेगी? अभी तक लोग आपको यह कहकर क्षमा कर देते थे कि बेचारा जवाहर लाल क्या करे, उसे सरकारी कामों से फुर्सत नहीं है। 

कांग्रेस ठीक करने की जिम्मेदारी ढेबर भाई की है। इंदु के चुने जाने से यह सुरक्षा-युक्ति भी हाथ से निकल जाएगी। लोग कांग्रेस संस्था को सरकार-पुत्री कहने लगेंगे। इसलिए मेरी राय है कि इंदु को कांग्रेस प्रधान चुने जाने से रोको। या फिर आप प्रधानमंत्री-पद से अलग होकर इंदु की मार्फत कांग्रेस का संगठन मजबूत कर लो। आपके बाहर आने से केंद्रीय सरकार वैसे तो कमजोर हो जाएगी, पर आपके द्वारा जनमत इतनी षक्ति प्राप्त कर लेगा कि प्रांतीय सरकारें भी आपके डर से ठीक-ठीक कार्य कर सकेंगी और कांग्रेस के साधारण कार्यकर्ताओं को आपसे बहुत बल मिलेगा।

 केंद्रीय षासन भी अधिक सचेत होगा। पार्लियामेंट्री कांगे्रस पार्टी भी, जो आज आपके बोझ से इतनी दब गयी है कि बावजूद कोषिषों के लोग स्वतंत्रतापूर्वक किसी भी विषय पर बहस करने को तैयार नहीं होते, आपके बाहर चले जाने से उसमें भी जान आ जाएगी। और षायद यही एक ढंग हो सके, जिससे बिना अधिक पैसा खर्च किए और बिना पूंजीपतियों से सहायता मांगे, कांग्रेस फिर से बहुमत से चुनी जाकर प्रांतीय और केंद्रीय षासन को संभाल ले।

नागपुर कांग्रेस ने जो समाजवाद की ओर कदम बढ़ाया है उससे कांग्रेस को बड़े-बड़े प्रभावषाली तबकों से मोर्चा लेना पड़ेगा। इसके लिए भी अभी से तैयारियां करनी चाहिए। मेरी आपसे अपील है कि आप कोई ढंग ऐसा निकालिए कि जिससे इस विलासिता और अकर्मन्यता के वातावरण से देष को निकालकर फिर से त्याग और जनसेवा की भावना जागृत कर सकें। 

गांधी जी के बनाए हुए उस पुराने वातावरण को बिगाड़ने की जिम्मेदारी भी हमारी ही है। इसलिए हमीं को उसे फिर से फैलाना होगा। यह काम कोरी दिल्ली की दलीलों से नहीं हो सकता। इसके लिए दिल की प्रेरणा चाहिए। माफ करना, मैंने अटरम-सटरम जो कलम से आया, लिख दिया है। पर बिना यह लिखे मुझे 15 दिन से नींद नहीं आ रही थी। अब इस पत्र को तकिए के नीचे रखकर दो-चार दिन सोऊंगा। ईष्वर आपको दीर्घायु दे। बंदा तो इस वातावरण में ज्यादा दिन टिक न सकेगा।
पं0 जवाहरलाल नेहरू आपकानई दिल्ली ह0 महावीर त्यागी

जवाहरलाल जी का उत्तरनिजीनं. 251 - पी एम एच -59 प्रधान मंत्री निवास,नई दिल्ली फरवरी 1, 1959
प्रिय महावीर, तुम्हारा 31 जनवरी का खत मुझे आज मिला। उसको मैंने गौर से पढ़ा। अपनी निसबत तो, जाहिर है, मेरे लिए मुषकिल है कोई माकूल राय रखना। कोई भी अपनी निसबत ठीक राय नहीं दे सकता। जाहिर है कि अगर मुझमें खूबियां हैं, तो कमजोरियां भी हैं, और षायद इस उमर में उनसे बरी न हो सकूं। हो सकता है कि मैं लोगों की बातों से धोके में पड़ जाता हंू और लोग खुली बात मुझसे नहीं करते। लेकिन शायद तुम्हारा यह कहना सही न हो कि मेरे पास दरबारी लोग आते हैं या रहते हैं।मेरे यहां कभी भी दरबार नहीं लगा,और न मैं इस ढंग को पसंद करता हंू। तुमने जो इंदिरा के बारे में लिखा है,उन पहलुओं पर मैंने काफी गौर किया है।मुझे तो ख्याल भी नहीं था कि उसका नाम कांग्रेस की अध्यक्षता के लिए पेष होगा।नाग पुर कांग्रेस के आखिरी दिन मैंने कुछ लोगों से सुना कि उसके नाम का चर्चा है,कुछ लोग दक्षिण के प्रदेषों से नाम पेष कर रहे हैं।उस रोज शाम को यह बात मेरे सामने पेष हुई।मुझसे अलग नहीं,बल्कि एक कमेटी में कही गई जिसमें हमारे कुछ नेता अलग अलग सूबों के मौजूद थे। मैं शुरू में खामोश रहा और सुनता रहा।फिर मैंने अपनी राय दी,जिसमें मैंने सब पहलुओं को सामने रखा और यह भी कहा कि यह न इंदु के लिए और मेरे लिए मुनासिब या इंसाफ की बात होगी कि उसका नाम पेष हो।इसके साथ मैंने यह भी कहा कि उसके चुने जाने से कुछ फायदे भी नजर आते हैं,खासकर नाग पुर कांग्रेस के फैसलों के बाद जबकि कुछ नई हवा की जरूरत है। मैंने मुनासिब न समझा कि मैं इस मामले में कुछ दखल दूं। मैं जानता था कि इंदिरा इससे परेषान होगी। फिर कुछ लोग इंदिरा के पास गए। मैंने बाद में सुना कि उसने जोरों से इनकार कर दिया। बहस हुई,उस पर काफी दबाव डाला गया। तब उसने कहा कि अगर सब लोग इतना जोर डालते हैं मुझ पर ,तो मेरे लिए मुष्किल हो जाता है इनकार करना हालांकि यह मेरे लिए बड़ी मुसीबत होगी। लोग उठ आए। कोई आध घंटे के बाद फिर वह परेषान होकर उनके पास गई और कहा कि मेरी तबियत इसको कबूल नहीं करती।फिर मुखतलिफ तरफ से दबाव पड़े,और आखिर में वह राजी हो गई। मैंने मुनासिब न समझा दखल देना। जो बातें तुमने लिखी हैं, वह जाहिर हैं। लेकिन मेरा यह भी ख्याल है कि बहुत तरह से उसका इस वक्त कांग्रेस अध्यक्ष बनना मुफीद भी हो सकता है। खतरे भी जाहिर हैं। जहां तक मुमकिन है इस सवाल पर कोषिष की सोचने की अपने रिष्ते वगैरह को भूलकर । तुमने लिखा है कि मेरी वजह से संसदीय पार्टी दबी रहती है और दिल खोलकर बोल नहीं सकती। इसकी निसबत मैं क्या करूं ? मैं चाहता हंू कि वह दिल खोलकर बोले और मैं भी दिल खोलकर बोलूं। हमारे सामने जो इस वक्त सवाल हैं ,उनपर सफाई से बातें होनी चाहिएं। और मैंने कोषिष की है कि हमारे साथी मेम्बरान राय दिया करें।तो क्या मुझे हक नहीं है कि मैं भी अपनी राय दूं उसी सफाई से ? हमारे सामने मुष्किल सवाल हैं।लेकिन मेरी राय में हिंदुस्तान का भविष्य अच्छा है।मैं उससे घबराता नहीं। तुम्हारा श्री महावीर त्यागी16,क्वीन विक्टोरिया रोड, जवाहर लाल नेहरू नई दिल्ली

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