Monday, September 29, 2008

गांधी के प्रति जेल में पटेल का मातृवत् स्नेह

सुरेंद्र किशोर महात्मा गांधी तथा सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे शीर्ष नेता भी अपने राजनीतिक सह कर्मियों के स्वास्थ्य व अन्य निजी समस्याओं का भी कितना ध्यान रखते थे,इसका पता उनके आपस के पत्र- व्यवहार व लेखों से चलता है। महात्मा गांधी की जेल में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जो सेवा की, उससे अभिभूत होकर गांधी जी ने उसे मातृवत् स्नेह करार दिया।इस संबंध में ़महात्मा गांधी ने 8 मई 1933 को लिखा कि ‘मेरे जीवन के महानतम सुखों में से एक था कि मुझे सरदार के साथ जेल में रहने का अवसर प्राप्त हुआ। मैं उनके अजेय साहस तथा देश के लिए अद्वितीय प्रेम के बारे में तो जानता था,लेकिन उनके साथ 16 महीने का लंबा समय बिताने का सौभाग्य पहले मुझे प्राप्त नहीं हुआ था।उनके अनुराग और प्रेम से मैं इतना अभिभूत हो गया कि मुझे अपनी प्रिय मां का स्मरण हो आया। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उनमें मातृवत् स्नेह जैसे गुण मौजूद हैं।यदि मैं थोड़ा सा भी अस्वस्थ होता तो वे हाजिर हो जाते और मेरी छोटी से छोटी आवश्यकता पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देते।उन्होंने और उनके सहयोगियों ने अपने बीच निश्चय किया कि वे मुझे कुछ भी कार्य नहीं करने देंगे।मैं आशा करता हूं कि सरकार मेरा विश्वास करेगी कि जब भी हमने राजनीतिक चर्चा की ,वह ऐसे व्यक्ति थे जो सरकार की मुश्किलों को महसूस करते थे।बारदोली और कैरा के किसानों की चिंता और कष्टों के प्रति वह कितना चिंतित रहते थे,यह मैं कभी नहीं भूलूंगा।’ सरदार वल्लभ भाई पटेल, जो आजादी के बाद देश के उप प्रधान मंत्री और गृह मंत्री बने थे,यह भी चाहते थे कि महात्मा गांधी यदि पूर्ण स्वस्थ नहीं हैं तो उन्हें अधिक श्रम नहीं करना चाहिए।यहां तक कि अपने हाथ से पत्र भी नहीं लिखना चाहिए।सरदार पटेल ने 5 जून 1933 को महात्मा गांधी को लिखा, ‘आदरणीय बापू, लगभग एक मास बाद मुझे आपका हस्तलेख देखने का सौभाग्य मिला।हम बहुत प्रसन्न हुए।हम दोनों ठीक हैं। चिंता करने का क्या फायदा, मेरी चिंता का कोई प्रभाव नहीं हो सकता।आपकी फिक्र करने को ईश्वर है।’ सरदार पटेल ने लिखा, ‘अपने हाथ से पत्र लिखने में जल्दीबाजी न करें। शरीर में ताकत आने दें। तब तक आप महादेव को लिखने का आदेश दें और आप केवल पत्रों पर हस्ताक्षर करें, इतना ही काफी है। वल्लभ भाई की शुभकामनाएं और प्रणाम।’ देखिए, सरदार पटेल की रोगग्रस्त नाक की समस्या पर महात्मा गांधी ने जेल से कैसा पत्र लिखा। मेजर भंडारी को 20 मार्च 1933 को गांधी जी ने लिखा,‘ प्रिय मेजर भंडारी, मैंने अनेक बार सरदार वल्लभ भाई पटेल की नाक की समस्या के बारे में आपको बताया।आप जानते हैं कि इस पर बात करने की उनकी अनिच्छा ही रहती है।लेकिन हमलोग जो इसके बारे में जानते हैं,आशंकित हैं।जब तक इसका दौरा समाप्त नहीं होता,वह तड़पते रहते हैं।आपने और मेजर मेहता ने जो इलाज सुझाए,सब नाकाम रहे।दौरे जल्दी -जल्दी पड़ रहे हैं और अधिक कष्टप्रद होते जा रहे हैं।गत शनिवार को सबसे भयंकर दौरा पड़ा। 30 घंटे से अधिक नाक बहती रही। आंखें खून जैसी लाल हो गई थीं।पूरे दिन उन्होंने कुछ नहीं खाया। सुबह केवल चाय पी और शाम को दूध,फल और उबली हुई सब्जियां खाई।वह अपना सामान्य भोजन नहीं ले पा रहे हैं।मैं महसूस करता हूं कि विशेषज्ञों द्वारा इनकी जांच कराने का समय आ गया है। भवदीय,एम।के.गांधी।’ गांधी जी उम्र जैसे -जैसे बढ़ रही थी,सरदार पटेल चाहने लगे थे कि उन्हें अनावश्यक तनाव व कार्याधिक्य से मुक्त ही रखा जाए।एक अक्तूबर 1935 को सरदार पटेल ने एक बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि ‘लोग मुझसे पूछते हैं कि गांधी जी कांग्रेस में कब वापस आएंगे,तो मैं उत्तर देता हूं कि महात्मा गांधी 67 वर्ष के हैं।हम उनसे कितनी अपेक्षाएं और रख सकते हैं ? अब हमें उनके अधूरे कार्य को पूरा करना चाहिए।’ निजी दुखों को भुला कर भी सरदार पटेल आजादी के लिए जेल यातना सह रहे थे। अक्तूबर , 1933 में सरदार पटेल के अपने भाई का निधन हो गया।तब सरदार नासिक सेंट्रल जेल में थे।बंबई के बहुत से लोगों की इच्छा थी कि दाह संस्कार में शामिल होने के लिए सरदार पेरोल पर जेल से बाहर आएं। पर, उन लोगों को जवाब देते हुए सरदार ने जेल से लिखा,‘जेल से बाहर आने की मांग करना न तो मुझे शोभा देता है और न ही राष्ट्र को।सत्याग्रही के लिए यह उचित नहीं है कि वह सरकार पर अनुचित दबाव डाले जिसमें ऐसी स्थिति से फायदा उठाया जाए।’
साभार प्रभात ख़बर १२ सितम्बर २००८

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