रवीन्द्र किशोर सिन्हा नहीं रहे
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पत्रकार,बिजनेसमैन,सांसद और दोस्तपरस्त
आर.के.सिन्हा को भावभीनी श्रद्धांजलि
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सुरेंद्र किशोर
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रवीन्द्र जी की शानदार पत्रकारिता से प्रभावित होकर उनके नाम का किशोर मैंने अपने नाम के साथ भी जोड़ लिया
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यह सत्तर के दशक की बात है।तब वे सर्चलाइट-प्रदीप और बाद में इलाहाबाद से प्रकाशित मासिक ‘‘माया’’ के लिए काम करते थे।बाद में वे बिजनेसमैन और राज्य सभा सदस्य बने।
1973-74 में मैं समाजवादियों की साप्ताहिक पत्रिका ‘जनता’
में सहायक संपादक के रूप में काम करता था।
मेरा नाम ‘जनता’ के प्रिंटलाइन में सुरेंद्र अकेला छपता था।
हमारे संपादक थे--समाजवादी पार्टी के एम.एल.सी.रेवतीकांत सिन्हा।
‘जनता’ का प्रकाशन जेपी ने शुरू किया था।उसके प्रथम संपादक थे स्वनामधन्य रामवृक्ष बेनीपुरी।
जब मैंने प्रिंटलाइन में अपना नाम सुरेंद्र किशोर किया तो रेवती बाबू ने मुझे समझाया--आप सुरेंद्र अकेला के नाम से देश
में जाने जाते हैं।नये नाम के प्रचार में बहुत समय लगेगा।
खैर, मैं तो रवीन्द्र किशोर से प्रभावित था।
मैंने अपना निर्णय नहीं बदला।
1977 के प्रारंभ में ही मैं दैनिक ‘आज’ के पटना ब्यूरो में शामिल हो गया था।
एक दिन इलाहाबाद के एक मशहूर साहित्यकार गुप्त जी पटना आकर मुझसे मिले।वे चर्चित मासिक ‘माया’ समूह से जुड़े हुए थे।
उन्होंने कहा कि हमारे यहां बिहार से एक जनसंघी लिखता है।उसे हटाकर हमलोग चाहते हैं कि आपसे लिखवाऊं।
मैंने कहा कि ‘‘वह जनसंघी’’ बहुत अच्छा लिखता है।
उतना अच्छा मैं नहीं लिख पाऊंगा।
‘माया’ वाले ने जिद की।कहा कि ‘आज’ अखबार से आपको बहुत अधिक पैसे मिलेंगे।
किंतु मैंने टाल दिया। वह जनसंघी रवीन्द्र किशोर ही थे।वैसे बता दूं कि उनकी खोजपूर्ण रपटों पर जनसंघ का कोई प्रभाव नहीं होता था।
तब तक भी रवींद्र जी से मेरा परिचय नहीं हुआ था।
किंतु दूर से उनको वाॅच जरूर करता रहा।
विभिन्न सीढ़ियां चढ़ते हुए रवीन्द्र किशोर उर्फ रवीन्द्र्र किशोर सिन्हा उर्फ आर.के.सिन्हा कहां पहुंचे थे,उसका पूरा विवरण इंडिया टूडे (हिन्दी) के पुराने अंक (30 नवंबर 2022)में पढ़िए।
संभवतः सन 2015 में देश के नामी पत्रकार-लेखक व जेपी आंदोलन के प्रथम मीसा बंदी राम बहादुर राय ने आर.के.सिन्हा को बताया कि आपसे ही प्रेरित होकर सुरेंद्र जी ने किशोर शब्द अपने नाम के साथ जोड़ा है।
तब सिन्हा साहब राज्य सभा के सदस्य थे।
एक दिन वे पटना से थोड़ी दूर स्थित गांव के मेरे आवास पर पहुंच गये।
मेरी लाइबे्ररी देखी तो रवीन्द्र किशोर जी ने कहा कि आपके परिसर में जमीन है ही।
आपकी लाइब्रेरी बड़ी होती जा रही है।कहिए तो मैं सांसद फंड से आपकी लाइब्रेरी के लिए एक उप भवन बनवा देता हूं।मैंने कहा कि यह मेरी निजी लाइब्रेरी है।सरकारी पैसे लगेंगे तो उस पर आम जनता का अधिकार बन जाएगा।मैं अपनी निजता भंग नहीं होने देना चाहता।
दिवंगत रवीन्द्र किशोर जी की अनेक उपलब्धियां रहीं ,पर दो बातों को लेकर मैं खास तौर पर उनसे प्रभावित रहा।
पैसे तो बहुत लोगों के पास होते हैं,पर आर.के.सिन्हा जिस उदारता से अपने जरूरतमंद दोस्तों पर खर्च करते थे,वैसा कम ही होता है।दूसरी बात, जैविक उत्पादन के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
वह अद्भुत व समयोचित काम है।
ऐसा करके वे अनेक लोगों को कैंसर से बचा रहे हैं।
आम लोग रासायनिक खाद -कीटनाशक दवाओं के जरिए उपजाए गए अनाजों के घातक प्रभाव से अनभिज्ञ हंै।
सिन्हा के ‘‘आद्या फूड’’ का मैं भी एक छोटा उपभोक्ता हूं।
वैसे काफी महंगा पड़ता है,पर मैं कैंसर को अपने पास फटकने से यथासंभव रोकना चाहता हूं।(सरकारों को चाहिए कि वे जैविक उत्पादों पर सब्सिडी दे।उससे होगा यह कि कैंसर के अस्पतालों पर सरकारी खर्च घटेगा।)
रवीन्द्र किशोर सिन्हा को भूल जाना संभव नहीं है।
मेरे लिए तो और भी नहीं क्योंकि उनका किशोर मेरे नाम से जुड़ चुका है।
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30 अक्तूबर 26
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