बुधवार, 7 जनवरी 2015

सिर्फ इसी देश में सुरक्षा से ऊपर है राजनीति


 देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के मामलों में भी हमारे यहां की राजनीति आखिर इतनी बंटी हुई क्यों है ? कहीं आतंकी घटना या उस पर कार्रवाई हुई नहीं कि इस देश के नेतागण परस्पर विरोधी स्वर में बोलने लगते हैं।

 क्या किसी अन्य देश में ऐसा होता है ? शायद नहीं।

 क्या किसी ने कभी सुना कि अमेरिका के विश्व व्यापार केंद्र पर हमले को लेकर वहां के विरोधी दल ने सत्ताधारी नेताओं पर कोई आरोप लगाया ?
हां, उन दिनों भारत के कुछ कथित ढोंगी धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों ने यह  सवाल जरूर उठाया गया था कि 11 सितंबर 2001 को विश्व व्यापार केंद्र में कार्यरत सारे यहूदी कर्मचारी एक साथ छुट्टी पर क्यों थे ?

 हाल में पोरबंदर के पास पाकिस्तान की एक संदिग्ध नाव पर भारतीय कार्रवाई के बाद कांग्रेस ने सवाल खड़ा कर दिया है। हालांकि पेशेवर खोजबीनकत्र्ता जरूर कुछ संतुलित सवाल उठा सकते हैं। वह नाव मछुआरों की थी या आतंकियों की ?

उस पर मादक पदार्थों के तस्कर थे या उस नाव का उद्देश्य कुछ और था ?
  भारत के नेशनल टेकनिकल रिसर्च आॅर्गनाइजेशन के अनुसार उस नाव में सवार चार लोगों के पास स्नाइपर राइफले, अग्नि बम और गोला -बारुद थे।

  एक अन्य खबर के अनुसार उस नाव पर मादक पदार्थों के पाकिस्तानी तस्कर थे। पर, सवाल है कि पकड़े जाने की आशंका से तस्कर आत्महत्या कर लेते हैं ?

 आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी के बीच के गहरे रिश्ते को पूरी दुनिया जानती है, सिर्फ उन भारतीय नेताओं को छोड़कर जो भारत सरकार से सबूत मांग रहे हैं।

  इस माहौल में कई लोगों को मध्ययुग की याद आती है जब इस देश पर बाहरी लोगों द्वारा कब्जा करने के प्रयास में इसी देश के कुछ लोगों ने उन्हें मदद की थी।

  एक ब्रिटिश इतिहासकार प्रो. जे. आर. शेेली ने भी लिखा है कि हमने बेहतर नस्ल होने के कारण भारत को नहीं जीता, बल्कि खुद कुछ भारतीयों ने भारत को हमारे लिए जीत कर हमारी तश्तरी में परोस दिया।

  ठीक ही कहा गया है कि जो इतिहास से नहीं सीखता ,वह इतिहास को दुहराने को अभिशप्त होता है।यह कहावत भारत पर अधिक लागू होती है। हमारे यहां तो कुछ इतिहासकारों की यह भी शिकायत रही है कि यहां सच्चा व संपूर्ण इतिहास तो पढ़ाया ही नहीं जाता।

 26 नवंबर 2008 को पाकिस्तान से भेजे गए आतंकियों ने मुम्बई में  ताज होटल सहित दस स्थानों पर हमला करके सौ से अधिक निर्दोष लोगों को मार डाला।

उससे पहले दिल्ली के बाटला हाउस में आंतकियों ने पुलिस अफसर की हत्या कर दी। दोनों ही मामलों में अदालतों ने आतंकियों का सजाएं दीं। ये सजाएं जब हुईं तब देश में भाजपा की सरकार नहीं थी।

  पर मुम्बई हमले के बाद एक पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया था कि इस कांड में बाहरी नहीं बल्कि भीतरी तत्वों का ही हाथ है।

 बाटला हाउस मुठभेड़ पर  एक अन्य कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री ने आशंका जाहिर की थी कि वह मुठभेड़ नकली थी।

 इस पृष्ठभूमि में भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने ठीक ही कहा है कि आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई पर कांग्रेस के सवाल पाकिस्तान को आक्सीजन दे रहे हैं ।

 याद रहे कि पोरबंदर नौका कांड को लेकर कांग्रेस प्रवक्ता अजय कुमार ने सवाल उठाया है कि कोई सबूत नहीं है, फिर भी यह दावा कैसे कर सकते हैं कि आतंकी हमले को नाकाम कर दिया गया ?


साभार-दैनिक भास्कर पटना में 06 जनवरी 2015 को प्रकाशित

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

वन में कहां मिलेगी कुंडल की कस्तूरी !


‘कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढै वन माहिं।’ कांग्रेस की मौजूदा दुर्दशा पर 

कबीर की यह वाणी याद आती है।


  इस दुर्दशा का इलाज खुद नेहरु-इंदिरा परिवार के पूर्ववर्ती नेताओं की राजनीतिक व प्रशासनिक शैली में निहित है। कोई देखना चाहे तो देश और पार्टी के संविधान भी अच्छी राह दिखा सकते हैं। इससे भी काम नहीं चले तो कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व खुद से सवाल कर सकता है कि उसने आई.पी.सी. और सी.आर. पीसी की धाराओं को कितनी निष्पक्षता से जनहित में लागू होने दिया था ? 

  कांग्रेस की दुर्दशा के मुख्य कारण है कि उसके अधिकतर छोटे -बड़े नेताओं ने सरकारी तिजोरी के सदुपयोग के मामले में जवाहरलाल नेहरु की ईमानदारी का त्याग कर दिया। कठोर निर्णय के मामले में इंदिरा गांधी की राह छोड़ दी। राजीव गांधी की सहृदयता से भी कांग्रेस का कोई नाता नहीं रहा।

वोट के लिए शाही इमाम से मिलने वाली पार्टी के नेता राहुल गांधी अब पार्टी काॅडर से पूछ रहे हैं कि क्या कांग्रेस को हिन्दू विरोधी माना जा रहा है ? दर्द हाईकमान ने दिया, पर दवा कार्यकर्ताओं से मांगी जा रही है। बेचारे कार्यकर्ता और मध्यम दर्जे के नेतागण अब क्या बताएंगे जो आंख मूंद कर हाईकमान के हर निर्णय का समर्थन करने को बाध्य थे ?

क्या हाईकमान के खिलाफ एक शब्द उच्चारित करने की पहले उन्हें छूट थी ? कांग्रेस की दुर्दशा देखकर वैसे लोग भी दुःखी हैं जो कांग्रेस के समर्थक नहीं हैं, पर वे यह चाहते हैं कि देश में  अच्छी सरकार के साथ -साथ मजबूत और प्रामाणिक विपक्ष भी हो। पर कांग्रेस अब न तो मजबूत है और न ही प्रामाणिक। उसे ऐसा बने बिना उसका काम नहीं चलेगा।

 अधिकतर लोग यह मानते हैं कि लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत का अधिक श्रेय मनमोहन सरकार की विफलता को जाता है। उससे थोड़ा कम श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है।

पर, सत्ता में आने के बाद  मोदी  सरकार अपनी नकारात्मक ताकत को भी सकारात्मकता में बदलने पर उतारू है। यानी उसके एक से एक बेहतर कामों और नेक मंशा से लोगबाग और भी प्रभावित होते जा रहे हैं। यदि वह जारी रहा और कारगर भी हुआ तो कांग्रेस को कहीं पैर रखने की जगह नहीं मिलेगी।

इसके बावजूद कांग्रेस हाईकमान खुद के बदले कार्यकर्ताओं से पूछ रहा है। मानो गलती कार्यकर्ताओं ने ही की हो। हकीकत यह है कि खुद कांग्रेस हाईकमान और उसकी सरकार इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है। यानी हाईकमान खासकर सोनिया गांधी-राहुल गांधी को खुद की नीयत, नीति और रणनीति बदलनी होगी।

मनमोहन सरकार के घोटालों के खिलाफ अन्ना हजारे अभियान चला रहे थे तो एक मंत्री ने पलट कर यह कहा था कि ‘अन्ना हजारे नीचे से ऊपर तक भ्रष्ट हैं।’ जब एक बड़ा घोटाला सामने आया तो एक दूसरे मंत्री ने कहा कि ‘इसमें जीरो लाॅस हुआ है।’ इतना ही नहीं बड़े से बड़े घोटालेबाज तभी जेल गए जब अदालत ने हस्तक्षेप किया।

एक पक्ष का आतंकवादी गिरफ्तार होता था तो सत्ताधारी नेता कहते थे कि इस गिरफ्तारी से मुझे पूरी रात नींद नहीं आई। जबकि इस देश में गिरफ्तार तो दोनों पक्षों के अतिवादी होते रहे हैं !

मनमोहन सरकार के एक अन्य मंत्री ने कहा था कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ जारी मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष कोर्ट बनाने के प्रस्ताव पर विचार किया जाएगा। इन सब एकतरफा बातों और कामों से भाजपा को लाभ मिलना ही थां।इस स्थिति में सुधार कौन कर सकता है ? कांग्रेस कार्यकर्ता, नेता या खुद पार्टी हाई कमान ?

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

एकता ही नहीं, राजनीतिक चरित्र में बदलाव से कमाल कर सकता है जनता परिवार

जनता परिवार की एकता की गंभीर कोशिश जारी है। उम्मीद है कि एकता होकर रहेगी। पर सवाल है कि सिर्फ एकता से ही जनता परिवार देश में कोई राजनीतिक कमाल दिखा पाएगा ?

ऐसा लगता तो नहीं है। बल्कि उसे अपने चाल, चरित्र और चिंतन में भी बदलाव लाना होगा। साथ ही उसे भाजपा की केंद्र सरकार के अलोकप्रिय होने की प्रतीक्षा भी करनी पड़ेगी। उसके लिए जिस धैर्य की जरुरत है, क्या वह जनता परिवार के सदस्यों में है ?  

 वैसे एकता की दिशा में हाल की कुछ बातों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इससे एकता की कोशिश की गति तेज होगी।

 नीतीश कुमार और लालू प्रसाद की राजनीतिक दोस्ती बढ़ी है। नीतीश कुमार को लगता है कि लालू प्रसाद समय के साथ बदल रहे हैं। उधर लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव के बीच करीबी रिश्तेदारी की संभावना है। इससे दोनों दलों के बीच राजनीतिक रिश्ता भी काफी मजबूत होगा।
इन तीन नेताओं की एकता से जनता परिवार की एकता की ठोस नींव तैयार होगी। फिर जनता परिवार के अन्य सदस्यों के जुड़ने में कोई दिक्कत नहीं होगी।

   एकता की कोशिश का स्वागत करते हुए सीपीएम महासचिव प्रकाश करात ने कहा है कि भाजपा की बढ़ती ताकत का मुकाबला करने के लिए संसद में हम जनता परिवार से समन्वय बनाकर काम करेंगे।

  जनता परिवार के सदस्य 1977 और  1989 के चुनावों में भी एक हुए थे। तब के सत्ताधारी दल जनता में अलोकप्रिय हो चुके थे। एकता का लाभ उन्हें दोनों बार मिला था। इस बार की परिस्थिति बिलकुल अलग हैं। अभी सत्ताधारी दल लोकप्रियता के चरम पर है। इसलिए जनता परिवार के लिए राह अपेक्षाकृत कठिन है। अनुकूल चुनावी रिजल्ट पाने के लिए इस बार उसे कुछ अधिक ही प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है।

  पर राजनीति में प्रासंगिक बने रहने के लिए जल्द एक होने के अलावा और कोई उपाय भी तो नहीं है। जब दलों के बीच चुनावी एकता या विलयन की कोशिश होती है तो उन दलों के भीतर से ही अधिक विरोध होता है। इस बार भी हो रहा है।

 विरोध का मुख्य कारण पदों की कमी हो जाने का खतरा है। अपवादों को छोड़ दें तो आज कोई भी छोटा -बड़ा राजनीतिक कार्यकर्ता या नेता पद के बिना नहीं रहना चाहता। पर ऐसे विरोधों को नेतागण इस बार भी नजरअंदाज ही करेंगे।

   इसके अलावा बाधाएं बाहर से भी हैं। एक -दो अपवादों को छोड़ दें तो जनता परिवार के अधिकतर नेताओंं की सार्वजनिक छवि अच्छी नहीं है। जातीय वोट बैंंक का असर भी थोड़ा घटा है। उनकी जनता में स्वीकार्यता कम होती जा रही है। इसके मुकाबले कई कारणों से नरेंद्र मोदी और भाजपा के अनेक नेताओं की छवि बेहतर है।

  उधर एक बात और है। भाजपा के अधिकतर नेताओं की छवि के मुकाबले आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं की छवि बेहतर है।

  इसलिए कुछ राजनीतिक चिंतक ओर प्रेक्षक ‘आप’ को भाजपा का अगला विकल्प बता रहे हैं। दिल्ली विधानसभा का चुनाव होने वाला है।
यदि भाजपा के पक्ष में करीब- करीब देशव्यापी हवा के बावजूद दिल्ली विधानसभा चुनाव में ‘आप’ ने कोई कमाल दिखा दिया तो ‘आप’ को अनेक लोग सचमुच भाजपा के विकल्प के रूप में देखने लगेंगे।

  अंततः क्या होगा, यह तो भविष्य बताएगा। क्योंकि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नरेंद्र मोदी की सरकार अगले महीनों में कैसा काम करती है।

दूसरी ओर जनता परिवार के कुछ प्रमुख नेताओं को अपनी छवि यदि बेहतर बनानी है और जनता की नजरों में भाजपा से ख्ुाद को बेहतर साबित करना है तो उन्हें  अपनी कार्यशैली बदलनी होगी। इस मामले में बिहार से तो थोड़ा -बहुत अच्छे संकेत मिल रहे हैं। पर समस्या यू.पी. में अधिक है। ये दो प्रदेश जनता परिवार के मुख्य राजनीतिक गढ़ हैं।

 पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछले महीने कहा कि ‘हमने लालू जी से समझौता किया है, पर कानून से नहीं।’ याद रहे कि भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी का आरोप है कि लालू से मिलकर नीतीश कुमार आतंक राज लौटाना चाहते हैं। कुछ भाजपा नेता तो यह भी आरोप लगा रहे हैं कि बिहार में जंगल राज -2 कायम हो चुका है।

  पर राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति थोड़ी बिगड़ी जरूर है, पर वैसी अराजक स्थिति कत्तई नहीं हुई है जैसी लालू-राबड़ी राज में थी।

  राजद-जदयू के पास एक-एक मजबूत तर्क है। गत लोकसभा चुनाव में राजद-जदयू को मिले वोट भाजपा को मिले मतों से ज्यादा थे। साथ ही हाल के विधानसभा उपचुनाव में राजद-जदयू गठबंधन को भाजपा की अपेक्षा अधिक सीटें मिलीं।

हालांकि भाजपा गठबंधन के नेताओं के इस तर्क में भी दम है कि केंद्र से झगड़ा करने वाली सरकार बिहार में 2015 में बनेगी तो राज्य का विकास नहीं होगा।

  इन तर्क वितर्कों के साथ बिहार विधानसभा के अगले चुनाव में राजद-जदयू की ओर से साझा नेता कौन होगा, इस बात पर भी रिजल्ट बहुत हद तक निर्भर करेगा।

  पर ऐसी बेहतर स्थिति उत्तर प्रदेश की नहीं है। वहां से जो खबरें आती रहती हैं, उनके अनुसार वहां लगभग वैसी ही स्थिति है जैसी स्थिति लालू-राबड़ी राज में बिहार में थी। राजनीतिक संरक्षणप्राप्त इंजीनियर यादव सिंह के अभूतपूर्व  घोटाले ने तो रही -सही कसर भी पूरी कर दी है।

गत विधानसभा चुनावों में सपा को इसलिए सफलता मिली क्योंकि बसपा ने उम्मीदवार खड़ा नहीं कराया था। यानी यू.पी. में अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा की राह अधिक आसान लगती है।

   खैर जो हो, संकेत तो यही हैं कि जनता परिवार की एकता हो कर रहेगी। एकीकृत जनता परिवार निकट भविष्य में भले कोई बड़ी चुनावी सफलता हासिल नहीं कर सके, पर लगातार जन संघर्षों के जरिए वह देर सवेर अपने पुराने सुनहले दिन वापस ला सकते हैं। पर इसके लिए यह जरूरी है कि नरेंद्र मोदी की सरकार इस बीच उन वायदों को पूरा नहीं कर सके जो उसने गत लोकसभा चुनाव में किये थे। पर मोदी सरकार की आशंकित विफलता का लाभ उठाने के लिए जनता परिवार के अनेक प्रमुख नेताओं को अपने चाल, चरित्र और चिंतन में इस बीच भारी बदलाव करना होगा।

(2 दिसंबर 2014 के दैनिक भास्कर ,पटना में प्रकाशित) 

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

आशीष नंदी ने तो मांग ली, कांचा इलैया कब मांगेंगे माफी !

प्रसिद्ध सोशल साइंटिस्ट आशीष नंदी ने कमजोर वर्ग के लोगों  के खिलाफ अपनी आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए 24 नवंबर 2014  को सुप्रीम कोर्ट में  माफी मांग ली। पर, पोलिटिकल साइंटिस्ट कांचा इलैया कर्पूरी ठाकुर के खिलाफ की गई अपनी आपत्तिजनक  टिप्पणी के लिए कब माफी मांगेंगे ?

  बिहार विधान परिषद के पूर्व सभापति प्रो.जाबिर हुसेन ने यह सवाल 
उठाया है।प्रो.हुसेन का सवाल जायज लगता है।याद रहे कि कर्पूरी ठाकुर भी कमजोर वर्ग से ही आते थे।

  15 फरवरी 2013 को एक अखबार के साथ बातचीत में कांचा 
इलैया ने कहा था कि ‘लगभग निरक्षर हज्जाम कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्य मंत्री बन गए थे।’

दरअसल इलैया उस बातचीत में यह कह रहे थे कि पिछड़ों,दलितों और आदिवासियों में से दस प्रतिशत लोग भी अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण कर  लें तो भारत बदल जाएगा।’ 

  इस सिलसिले में उन्होंने कर्पूरी ठाकुर को लगभग निरक्षर हज्जाम बता दिया।संभवतःउन्हें लगता था कि अंग्रेजी जाने बगैर कर्पूरी ठाकुर कैसे ऊंचे पद तक पहुंच गए !

इससे कर्पूूरी ठाकुर के प्रशंसकों और उन्हें नजदीक से जानने वालों को गहरा धक्का लगा था।पर किसी ने इलैया पर केस नहीं किया।

  याद रहे कि कर्पूरी ठाकुर अंग्रेजी पढ़े-लिखे थे।वे  न सिर्फ अंग्रेजी  समझ सकते थे बल्कि वे अच्छी अंग्रेजी लिखते भी थे।उन्होंने अंग्रेजी राज में इंटर पास किया था।वे बी.ए.में पढ़ते थे जब गांधी जी से प्रभावित होकर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।

  जानकार लोग बताते हैं कि तब के मैट्रिक पास लोग भी अंग्रेजी अच्छी तरह लिखते और पढ़ते थे।क्योंकि उन दिनों परीक्षा में कदाचार की छूट नहीं रहती थी।

अंग्रेजी अखबारों के लिए अपने  प्रेस बयान उन्हें खुद लिखते हुए समकालीन लोगों ने कर्पूरी ठाकुर को देखा था।साथ ही उन्होंने बहुत स्वाध्याय भी किया था।

   दरअसल अनेक लोगों के दिलो दिमाग में अंग्रेजी को लेकर कर्पूरी ठाकुर की गलत छवि अंकित कर दी गई है।संभवतः कांचा इलैया भी उसी के शिकार रहे हैं।

  कर्पूरी ठाकुर 1967 में बिहार के उप मुख्य मंत्री ,वित्त मंत्री और शिक्षा मंत्री थे।तब डा.राम मनोहर लोहिया के निदेश पर मैट्रिक स्तर पर दिवंगत ठाकुर ने  अपनी सरकार से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करवा दी थी।
 इससे यह गलत संदेश गया कि ठाकुर ने अंग्रेजी की पढ़ाई ही खत्म करा दी।वे अंग्रेजी के खिलाफ थे।क्योंकि वे खुद अंग्रेजी नहीं जानते थे।

 हालांकि ऐसा नहीं था।सन 1967 की बिहार सरकार के उस निर्णय के अनुसार  सिर्फ हुआ यह था कि जो छात्र अंग्रेजी में फेल कर जाते थे,उन्हें भी मैट्रिक पास कर दिया जाता था,यदि वे अन्य विषयों में सफल हों।

डा.लोहिया का तर्क था कि अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण गरीब घरों और ग्रामीण पृष्ठभूमि के अनेक विद्यार्थी मैट्रिक पास नहीं कर पाते थे।तब पुलिस में भर्ती के लिए मैट्रिक पास होना जरुरी था।किसी पुलिस  कांस्टेबल को अपने काम के सिलसिले में बिहार में अंग्रेजी की कोई जरुरत नहीं पड़ती।साथ ही उन दिनों शादी के लिए अधिकतर लोग मैट्रिक पास दुल्हन ही खोजते थे।डा.लोहिया के जेहन में भी  ये बातें  थीं।वे सवाल करते थे कि  अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण  किसी कन्या की शादी अच्छे घर में होने से क्यों रोका जाए ?

साथ ही विदेशी भाषा के कारण किसी गरीब घर के नौजवान को सिपाही बनने से क्यों रोका जाना चाहिए ? 

  पर इस सबका  खामियाजा कर्पूरी ठाकुर को भुगतना पड़ा।अंग्रेजी को लेकर कर्पूरी ठाकुर की राज्य के भीतर और बाहर लगातार आलोचना होती रही।

कांचा इलैया कर्पूरी ठाकुर के खिलाफ जारी उसी दुष्प्रचार के शिकार हुए। उन्हें लगता था कि कोई निरक्षर नेता ही अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त कर सकता था।

    2013 में जयपुर  लिटरेचर फेस्टीवल में आशीष नंदी ने जब अपना विवादास्पद बयान दिया तो कांचा इलैया ने कहा  कि ‘उनका बयान खराब है।यह उनकी बौद्धिक गुंडागर्दी है।हालांकि उनकी मंशा सही थी।’

    आशीष नंदी ने जयपुर फेस्टिवल में कहा था कि सत्ता प्राप्त करने के बाद पिछड़े,दलित और आदिवासी अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक भ्रष्ट हो जाते हैं।इस आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद नंदी पर मानहानि के मुकदमे हुए।मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।कपिल सिबल उनके वकील थे।

अंततः बचने का कोई रास्ता नहीं देख कर इसी सोमवार को आशीष नंदी ने बिना शर्त मांफी मांग ली।

 जिस आशीष नंदंी पर कांचा ने बौद्धिक गुंडागर्दी का आरोप लगाया, उन्हें तो माफी मांगनी पड़ी ,पर, कांचा इलैया कर्पूरी ठाकुर को ‘निरक्षर हज्जाम’ कह कर साफ बच निकले।

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

जनता परिवार का महामोर्चा समय की जरुरत


एक तरफ कांग्रेस मुरझा रही है तो दूसरी ओर भाजपा का हौसला सातवें आसमान पर है। ऐसे में जनता परिवार का महामोर्चा आज के समय की  जरुरत थी। वह पूरी हुई।

स्वस्थ लोकतंत्र  के लिए भी यह जरुरी है कि विपक्ष भी मजबूत हो।

  मुलायम सिंह यादव के यहां जुटे नेताओं का मंसूबा तो विभिन्न दलों में बिखरे पूरे जनता परिवार को एक बार फिर एक दल में शामिल कर देने का है। साथ ही वे यह भी चाहते हैं कि सभी गैर भाजपा -गैर कांग्रेस दल मिलकर काम करें। यह ऊंचा लक्ष्य है। पर फिलहाल जो कुछ भी वे कर पाए हैं, उसे भी सही दिशा में सही कदम ही माना जाएगा।

याद रहे कि महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा की जीत ने जनता परिवार को एक साथ बैठने का मजबूर कर दिया है।

  एक और अच्छी बात यह हुई है कि जनता परिवार के नेताओं ने नीतीश कुमार को अपना प्रवक्ता बना कर मीडिया के सामने पेश किया है। संतुलित और समतल दिमाग के सुलझे हुए नेता की जनता परिवार कमी रही है। ऐसे में नीतीश कुमार उन्हें काम आएंगे।

   फिलहाल नीतीश कुमार ने जो मुददे उठाए हैं, वे विवादास्पद नहीं कहे जा सकते। इन मुद्दों के जरिए मोदी सरकार को घेरने में सुविधा भी होगी। घनघोर जातिवाद, एकतरफा धर्मनिरपेक्षता का ओवरडोज, परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण जनता परिवार के अनेक नेताओं का इकबाल हाल के वर्षों में काफी घटा है। राजनीति व सरकार में इन तत्वों, बुराइयों व मुद्दों को निरुत्साहित करने की जरुरत जनता परिवार के समझदार नेताओं को पड़ेगी ।तभी वे भाजपा व खास तौर पर नरेंद्र मोदी का कारगर मुकाबला कर पाएंगे। क्या ऐसा वे कर पाएंगे ?

सपा,राजद,इनेलोद,जदयू और जद (एस) के नेताओं की बैठक के बाद नीतीश कुमार ने मीडिया से जो कुछ कहा,उससे तो यह साफ लगा कि वे विवादास्पद मुद्दों को किनारे ही करना चाहते हैं।यह शुभ संकेत है।

   उपर्युक्त दलों के अधिकतर नेता कभी समाजवादी नामधारी पार्टी में रहे हैं। उनके आदर्श पुरुष गांधी, लोहिया और जय प्रकाश रहे हैं।

बुधवार को पटना में अपनी पार्टी की बैठक में नीतीश कुमार ने कहा भी था कि हमारी विचारधारा गांधी,लोहिया और जयप्रकाश नारायण के विचारों पर आधारित है। उम्मीद है कि महामोर्चा के लिए काम करते हुए नीतीश कुमार तथा जनता परिवार के अन्य नेतागण  इस बात को याद रखेंगे।

 राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार महामोर्चा को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी होगी कि कांग्रेस की किन कमजोरियों का लाभ उठा कर भाजपा या फिर कहिए नरेंद्र मोदी ने चुनावी सफलता पाई।

कांग्रेस की मुख्य कमजोरी यह रही कि उसके प्रथम परिवार में कोई भी कमी देखने की किसी स्तर के कांग्रेसकर्मियों को कोई इजाजत ही नहीं है। दूसरी कमी यह रही कि कांग्रेस की सरकारें आम तौर पर अन्य सरकारों से अधिक भ्रष्ट व अहंकारी रही।

अधिकतर मतदाताओं के अनुसार गत लोक सभा चुनाव में कांग्रेस की तीसरी और सबसे बड़ी गलती यह रही कि उसने एकतरफा व ढांेंगी धर्मनिरपेक्षता को मुख्य चुनावी मुददा बना दिया था।

  इन मुद्दों पर गांधी,लोहिया और जय प्रकाश नारायण के विचारों, कर्मो और जीवन शैली को महामोर्चा अपना सचमुच आदर्श माने तो उसे भाजपा सरकार का मुकाबला करने में सुविधा होगी। इस मामले में भारत का संविधान भी महामोर्चा के नेताओं के लिए बढि़या दिशा निदेशक का काम कर सकता है।

       
  
   

  

बुधवार, 12 नवंबर 2014

जनता परिवार का महामोर्चा समय की जरुरत

 एक तरफ कांग्रेस मुरझा रही है तो दूसरी ओर भाजपा का हौसला सातवें आसमान पर है। ऐसे में जनता परिवार का महामोर्चा आज के समय की  जरुरत थी। वह पूरी हुई।

स्वस्थ लोकतंत्र  के लिए भी यह जरुरी है कि विपक्ष भी मजबूत हो।
  मुलायम सिंह यादव के यहां जुटे नेताओं का मंसूबा तो विभिन्न दलों में बिखरे पूरे जनता परिवार को एक बार फिर एक दल में शामिल कर देने का है। साथ ही वे यह भी चाहते हैं कि सभी गैर भाजपा -गैर कांग्रेस दल मिलकर काम करें। यह ऊंचा लक्ष्य है। पर फिलहाल जो कुछ भी वे कर पाए हैं, उसे भी सही दिशा में सही कदम ही माना जाएगा।

याद रहे कि महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा की जीत ने जनता परिवार को एक साथ बैठने का मजबूर कर दिया है।

  एक और अच्छी बात यह हुई है कि जनता परिवार के नेताओं ने नीतीश कुमार को अपना प्रवक्ता बना कर मीडिया के सामने पेश किया है। संतुलित और समतल दिमाग के सुलझे हुए नेता की जनता परिवार कमी रही है। ऐसे में नीतीश कुमार उन्हें काम आएंगे।

   फिलहाल नीतीश कुमार ने जो मुददे उठाए हैं, वे विवादास्पद नहीं कहे जा सकते। इन मुद्दों के जरिए मोदी सरकार को घेरने में सुविधा भी होगी। घनघोर जातिवाद, एकतरफा धर्मनिरपेक्षता का ओवरडोज, परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण जनता परिवार के अनेक नेताओं का इकबाल हाल के वर्षों में काफी घटा है। राजनीति व सरकार में इन तत्वों, बुराइयों व मुद्दों को निरुत्साहित करने की जरुरत जनता परिवार के समझदार नेताओं को पड़ेगी ।तभी वे भाजपा व खास तौर पर नरेंद्र मोदी का कारगर मुकाबला कर पाएंगे। क्या ऐसा वे कर पाएंगे ?

सपा, राजद, इनेलोद, जदयू और जद (एस) के नेताओं की बैठक के बाद नीतीश कुमार ने मीडिया से जो कुछ कहा,उससे तो यह साफ लगा कि वे विवादास्पद मुद्दों को किनारे ही करना चाहते हैं।यह शुभ संकेत है।

   उपर्युक्त दलों के अधिकतर नेता कभी समाजवादी नामधारी पार्टी में रहे हैं। उनके आदर्श पुरुष गांधी, लोहिया और जय प्रकाश रहे हैं।

बुधवार को पटना में अपनी पार्टी की बैठक में नीतीश कुमार ने कहा भी था कि हमारी विचारधारा गांधी,लोहिया और जयप्रकाश नारायण के विचारों पर आधारित है। उम्मीद है कि महामोर्चा के लिए काम करते हुए नीतीश कुमार तथा जनता परिवार के अन्य नेतागण  इस बात को याद रखेंगे।
 राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार महामोर्चा को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी होगी कि कांग्रेस की किन कमजोरियों का लाभ उठा कर भाजपा या फिर कहिए नरेंद्र मोदी ने चुनावी सफलता पाई।

कांग्रेस की मुख्य कमजोरी यह रही कि उसके प्रथम परिवार में कोई भी कमी देखने की किसी स्तर के कांग्रेसकर्मियों को कोई इजाजत ही नहीं है। दूसरी कमी यह रही कि कांग्रेस की सरकारें आम तौर पर अन्य सरकारों से अधिक भ्रष्ट व अहंकारी रही।

अधिकतर मतदाताओं के अनुसार गत लोक सभा चुनाव में कांग्रेस की तीसरी और सबसे बड़ी गलती यह रही कि उसने एकतरफा व ढांेंगी धर्मनिरपेक्षता को मुख्य चुनावी मुददा बना दिया था।

  इन मुद्दों पर गांधी,लोहिया और जय प्रकाश नारायण के विचारों, कर्मो और जीवन शैली को महामोर्चा अपना सचमुच आदर्श माने तो उसे भाजपा सरकार का मुकाबला करने में सुविधा होगी। इस मामले में भारत का संविधान भी महामोर्चा के नेताओं के लिए बढि़या दिशा निदेशक का काम कर सकता है।
       
  
   

  

बुधवार, 10 सितंबर 2014

जल्दबाजी होगी कांगेेस के विलुप्त होने की भविष्यवाणी


 इस देश के कुछ भाजपाई चिंतक इन दिनों उत्सहित हैं। वे कांग्रेस की दुर्दशा देखकर खुश हैं। वे उसके विलुप्त होने की भी भविष्यवाणी करने लगे हैं। कांग्रेस के लोकसभा में मात्र 44 सीटों पर सिमट जाने के बाद उनकी ऐसी भविष्यवाणी स्वाभाविक ही है।

  पर समकालीन इतिहास बताता है कि वे खुशफहमी में लगते हैं। अब तक कांग्रेस की विफलताओं का लाभ प्रतिपक्ष और प्रतिपक्ष की विफलताओं का चुनावी लाभ कांग्रेस उठाती रही है। अगली बार भी ऐसा नहीं होगा, यह नहीं कहा जा सकता।

   निष्पक्ष राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार कांग्रेस का विलुप्त होना इस बात पर निर्भर करेगा कि नरेंद्र मोदी सरकार अगले छह महीने में कुल मिलाकर कैसा काम करती है। सिर्फ सौ दिनों में किसी सरकार के बारे में किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता है।

  छह महीने में मोदी की विफलता कांग्रेस की सफलता की राह तैयार करेगी। पर मोदी की सफलता कांग्रेस के लिए घातक साबित हो सकती है।

  1967 में देश के नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी दलों की सरकारें बन गई थीं। सात राज्यों में चुनाव के जरिए और अन्य दो राज्यों में दल-बदल के जरिए। तब की गैर कांग्रेसी सरकारों के शिल्पी थे समाजवादी नेता व चिंतक डाॅ. राम मनोहर लोहिया। उन्होंने कम्युनिस्ट और जनसंघ को न्यूनत्तम कार्यक्रम के आधार पर  एक साथ ला दिया था। यदि तब प्रतिपक्षी दलों में पूर्ण चुनावी एकता हो गई होती तो उसी समय केंद्र की सत्ता से कांग्रेस का एकाधिकार खत्म हो चुका होता।

  चुनाव के तत्काल बाद अपनी राज्य सरकारों से डाॅ. लोहिया ने कहा था कि छह महीने के भीतर जनहित में कुछ ऐसे चैंकाने वाले काम करो जिनसे जनता को तुम लोगों और कांग्रेस के बीच साफ -साफ अंतर दिख जाए। और वह कांग्रेेस को भूल जाए। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाओगे तो कांग्रेस दुबारा सत्ता में आ जाएगी क्योंकि वह एक माहिर पार्टी है।

   डाॅ. लोहिया की भविष्यवाणी सही साबित हुई। कांग्रेस वापस आ गई। क्योंकि मिलीजुली सरकारें अपेक्षाकृत ईमानदार होते हुए भी बेमतलब आपसी कलह में उलझकर बारी- बारी से जल्दी ही समाप्त हो गई।क्यों कि उनमें से अनेक  गैर कांग्रेसी नेताओं में  आलस्य,व्यक्तिगत कुंठा और सत्तालोलुपता  हावी हो गई थी।

    कांग्रेस को विलुप्त करना है तो नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा को डाॅ. लोहिया की वह भविष्यवाणी याद रखनी पड़ेगी। मोदी सरकार को छह महीने के भीतर ठोस नतीजे देने होंगे। लोगबाग कांग्रेस को तभी भूलेंगे जब मोदी सरकार जनहित के चैंकाने वाले कामों से लोगों को प्रभावित कर दे।

 मोदी सरकार के प्रारंभिक काम तो अधिकतर लोगों को अभी अच्छे लग रहे हैं। अच्छे कामों से अधिक उसकी अच्छी मंशा की सराहना हो रही है। खास कर भ्रष्टाचार व राजनीति के अपराधीकरण के मामले में मोदी सरकार के फैसले व घोषणाएं ठीक मानी जा रही हैं। सांप्रदायिक मामलों में अभी मोदी सरकार की निर्णायक परीक्षा होनी बाकी है।

 पर इसके अलावा भाजपा व सहयोगी दलों का जिस तरह का तानाबाना, कार्यशैली, जीवन शैली तथा राजनीतिक शैली रही है, उनसे कई तरह के अपशकुन भी हो रहे हैं।

 सवाल यह उठ रहा है कि क्या मोदी सरकार का यह प्रारंभिक टेम्पो बना रह सकेगा ?

 अगले छह महीने में कुछ अन्य बातें देखी जाएंगी। उस आधार पर मोदी सरकार को कसौटी पर कसा जाएगा। उसके बाद ही यह कहा जा सकेगा कि कांग्रेस विलुप्त होने की दिशा में आगे बढ़ेगी या दुबारा कमबैक करेगी।

    आपातकाल की पृष्ठभूमि में हुए 1977 के चुनाव में जब कांग्रेस उत्तर भारत से लगभग साफ हो गई थी तब भी कुछ लोग कांग्रेस के बारे में ऐसी ही भविष्यवाणी करने लगे थे। पर वह गलत साबित हुई। क्योंकि कांग्रेस विरोधी दलों की विफलता ने कांग्रेस को अगले चुनाव में चुनावी सफलता दिला दी।

   1977 के चुनाव के बाद बनी मोरारजी देसाई सरकार अच्छा काम कर रही थी। महंगाई और भ्रष्टाचार पर बहुत हद तक काबू था। अधिकतर जनता भी सरकार से खुश थी। पर जनता पार्टी के आंतरिक झगड़े और कुछ बड़े जनता नेताओं की पदाकांक्षा ने कांग्रेस की सत्ता में वापसी का रास्ता बना दिया।

 इसके लिए कांग्रेस की अच्छाई नहीं बल्कि जनता पार्टी सरकार की बुराई जिम्मेदार रही। तीन ही साल में इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बन गई। ऐसा नहीं था कि सत्ता में आने से पहले इंदिरा गांधी ने अपनी कार्यशैली बदल ली थी।

  यदि मोदी सरकार ने मोरारजी सरकार वाली गलती की तो इस बार भी  कांग्रेस ‘विलुप्त’ होने से साफ बच जाएगी! इसके लिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी को अपनी कार्यशैली भी बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वे बदल भी नहीं सकते। बदलने की उनकी क्षमता सीमित है।

     देश का लोकतांत्रिक इतिहास बताता है कि केंद्र और राज्य स्तर पर  कांग्रेस में घट -घटकर बढ़ जाने की अजीब सी ताकत मौजूद है। यह ताकत वह आम तौर कांग्रेसविरोधी दलों से ही हासिल करती रही है।

     वैसे भी कांग्रेस एक अखिल भारतीय पार्टी है। अखिल भारतीय होने से उसे विशेष ताकत मिलती है। भाजपा अभी उस प्रक्रिया में है। उसके पास नेहरु-इंदिरा परिवार के रूप में अवलंब लेने के लिए एक खंभा उपलब्ध है। वह खम्भा अपने केंद्र की ओर कांग्रेसी नेताओं व कार्यकर्ताओं को खींचता है।

     वैसे भाजपा के पास भी ऐसा खम्भा नागपुर में है। अन्य अधिकतर मध्यमार्गी दल तो परिवारवादी हैं। विचारधारा के आधार पर इस देश में जब राजनीति होती थी उस समय डाॅ. राम मनोहर लोहिया कभी समाजवादियों के लिए ऐसे ही खम्भा थे। अब तो समाजवादियोंे को पहचानना भी मुश्किल है।

     कुल मिलाकर आज स्थिति यह है कि भाजपा व मोदी सरकार कांग्रेस की चिंता करने के बदले अपने खुद के कामों की चिंता करें। यह भाजपा सरकारों पर निर्भर है कि वह एक पर एक जनहित में अपने चैंकाने वाले  कामों से लोगों को मजबूर करती है कि वे कांग्रेस को भूल जाएं या फिर अपने गलत कदमों के जरिए लोगों को बाध्य कर देती है कि वे कांग्रेस को वापस सत्ता में बुला लें।

      इस देश में अब तक तो यही हुआ कि अधिकतर लोगों ने कांग्रेस की गलतियों को नजरअंदाज भी किया है, पर गैर कांग्रेसी सरकारों के छोटे भटकावों को भी माफ नहीं किया है। क्योंकि लोग गैर कांग्रेसी दलों से कुछ अधिक ही उम्मीद रखते हैं।

(8 सितंबर 2014 के दैनिक जनसत्ता,नई दिल्ली में प्रकाशित)