सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

बाते हाथी पाइए,बाते हाथी पांव

मध्य युग की यह कहावत  आज भी दूसरे रुप में लागू होती है। दरबार में अच्छी बातें बोलने पर तब इनाम में हाथी भी  मिल जाता था।गलत  बोलने पर कई बार हाथी के पांव से कुचलवा दिया जाता  था।

 चुनाव के मौसम मेें  जनता के दरबार में अनेक नेताओं के बोल, कुबोल हो गए हैं। ऐसे कुबोल का जवाब मतदातागण वोट की चोट से देते हैं।उस चोट को हाथी का पांव मान लीजिए।

 हाल में एक बड़ी हस्ती ने आरक्षण-व्यवस्था के पुनरीक्षण  की जरुरत बता दी।दूसरे पक्ष के एक  नेता ने फरमाया कि  हिंदू भी कभी गोमांस खाते थे।  ये बातेें पहली बार नहीं कही गईं ।पर अभी  गलत समय पर कही गई।
  अब इसका खामियाजा ऐसी बात कहने वालों को भुगतना पड़ सकता है।क्योंकि बिहार में  आरक्षण और गोमंास बहुत ही नाजुक मुददे रहे हंै।

 हिंदुओं के गोमांस खाने की सूचना देने वाले नेता जी के बारे में भी मतदाताओं के एक वर्ग में अच्छी धारणा नहीं बनी है। हमारे पूर्वज ने ठीक ही कहा था कि  ‘सत्य बोलिए, प्रिय बोलिए, पर अप्रिय सत्य मत बोलिए।’

नाच न जाने आंगन टेढ़ा

   केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने लोगों से ठीक ही कहा है कि ‘हम लोग यह कह कर नहीं बच सकते कि बयान तोड़-मरोड़ कर पेश कर दिया गया।हमें बोलते समय सावधान रहना होगा।’

  इसके साथ ही उन्हें  यह सलाह भी देनी चाहिए थी कि जिस विषय पर आपका बोलना जरुरी नहीं है,उस पर आप अपना मुंह बंद ही रखिए।
नो कमेंट कहना सीखिए।

  पर दरअसल दृश्य मीडिया के इस युग में  ऐसे अनेक नेता उभरकर सामने आ गए हैं जो कुछ भी बोलकर पब्लिसिटी पाने से खुद को रोक ही नहीं पाते।जबकि,
उन्हें  यह सीखना बाकी है कि मीडिया से किस मुद्दे पर किस तरह और दलहित तथा  देशहित में बातेें की जानी चाहिए।


ऐसी सर्वसम्मति के कैसे संकेत ?

  इस देश की सीमा पर कोई हमला भी हो जाता है तो उस मुददे पर भी आम तौर पर संसद या  राजनीति में सर्वसम्मति नहीं होती। महाघोटालों पर भी संसद में सर्वसम्मति नहीं देखी जाती।

पर जब भी सांसदों के वेतन -भत्ते की वृद्धि का प्रस्ताव आता है तो सदन में  सर्वसम्मति हो जाती है। आखिर ऐसा क्यों है  ! ?

 हाल में एक और मामले में संसद में सर्वसम्मति हो गई थी।उसके पीछे क्या है ?
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक  संसद से  सर्वसम्मति से पास हुआ।
पर जब सुप्रीम कोर्ट ने इस  एक्ट को रद कर दिया तो  केंद्रीय कानून मंत्री  ने कहा कि ‘संसद और विधायिका के जरिए लोगों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व होता है।इसे किसी अन्य माध्यम से पूरी दुनिया के संज्ञान में नहीं लाया जा सकता।’

  क्या इस देश के दूसरे लाचार लोगों को उनके हाल पर छोड़कर खुद के वेतन-भत्ते में भारी वृद्धि कर लेने वाले सांसदगण पीएफ पेंशनधारियों को भरोसा दे सकते हैं कि वे पेंशनधरियों की आकांक्षाओं का भी प्रतिनिधित्व करते हैं ?हालांकि इस देश में ऐसे पीडि़तजनों में  सिर्फ पीएफ पेंशनधारी ही नहीं हैं।


सांसद बनाम आम जन

   पटना के एक पत्रकार को आज भी पीएफ पेंशन के रुप में  हर माह 1046 रुपए मिलते हंै। सन् 2005 में यह राशि तय हुई थी। नियमानुसार  उस पत्रकार को आजीवन 1046 रुपए ही मिलेंगे। पर,दूसरी ओर सांसदों के वेतन में दुगुनी वृद्धि का प्रस्ताव है। इस बढ़ोत्तरी की सिफारिश संसदीय समिति ने की है।

 याद रहे कि 2010 में ही सांसदों के वेतन-भत्ते में  300 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। महंगाई और कार्य कुशलता को ध्यान में रखते हुए सांसदों के वेतन-भत्ते में  वृद्धि का प्रस्ताव है।याद रहे कि 1968 में सासंदों का वेतन 400 रुपए और दैनिक भत्ता 31 रुपए थे। क्या तब के सांसद कार्यकुशल नहीं थे ? क्या उन्हें महंगाई की मार नहीं झेलनी पड़ती थी ?

 1963 से 1967 तक सांसद रहे डा.राम मनोहर लोहिया को  निजी कार खरीद लेने की सलाह दी गई थी।इस पर  उन्होंने कह दिया था कि कार का खर्च उठाने लायक मेरी  आय नहीं है।आज कौन सांसद  है जिसने राजनीति और समाज को लोहिया से अधिक प्रभावित किया है ?

 क्या सरकार यह मानती है कि पीएफ पेंशनधारियों पर महंगाई का कोई असर नहीं होता ?


और अंत में

   राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति कानून पर उठे विवाद को लेकर एक न्यायविद् ने सवाल उठाया ।उन्होंने  कहा कि व्यापम घोटाला करनेवाले और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में धांधलियों को पराकाष्ठा पर पहुंचाने वाले नेतागण यदि कभी केंद्र की सत्ता में आ गए तो वे इस  कानून का कितना  सदुपयोग  करंेगे ?

(24 अक्तूबर 2015)


बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

कितना जरुरी चुनाव सुधार !

   भाजपा सांसद गोपीनाथ मुंडे ने  27 जून, 2013 को सार्वजनिक रुप से एक बड़ी बात कह दी।उन्होंने  स्वीकार किया कि  2009 में अपने चुनाव क्षेत्र में उन्होंने आठ करोड़ रुपये खर्च किये।हालांकि उन्होंने चुनाव आयोग को अपने खर्च का जो विवरण दिया था,उसमें उन्होंने अपना खर्च मात्र 19 लाख 36 हजार रुपये बताया था।

    तब नियमतः खर्च की अधिकत्तम सीमा 25 लाख थी ।वह सीमा  2011 में बढ़ कर 40 लाख रुपये हो गई। उसी साल मिलिंद देवड़ा ने अपना चुनावी खर्च 10 लाख 63 हजार रुपये बताया तो राहुल गांधी ने 11 लाख 8 हजार रुपये।सुषमा स्वराज ने   8 लाख 92 हजार रुपये बताया तो शरद यादव ने 15 लाख 89 हजार रुपये।

 अब भला बताइए कि जब मुंडे को आठ करोड़ खर्च करने पड़े तो उसी राज्य से विजयी बड़े नेता शरद पवार को कितने रुपये खर्च करने पड़े होंगे ! यह खुला सत्य है कि इस देश के  अधिकतर नेतागण खर्च तो करोड़ों में करते हैं और आयोग को जो व्योरा देते हैं,वह तय सीमा के भीतर का ही होता है।

  आखिर ऐसा असत्य व अविश्वसनीय आंकड़ा देश के बड़े-बड़े नेता लोग क्यों चुनाव आयोग को समर्पित करते हैं ? यह तो एक मामूली उदाहरण है। ऐसे-ऐसे अनेक कारनामों के कारण  इस देश के अधिकतर नेताओं पर  से जनता का विश्वास उठता जा रहा है।पर, जनता भी आखिर क्या करे ! आखिर उसे इन्हीं नेताओं  में से किसी न किसी को हर पांच साल पर चुुनना पड़ता है।ऐसे में राजनीति और चुनाव प्रक्रिया को सुधारने के लिए सुप्रीम कोर्ट कोई निदेश देता है तो आम लोगों को बड़ी खुशी होती है।पर अधिकतर नेतागण उस फैसले से  नाराज हो उठते हैं।एक बार फिर यही हो रहा है।


सुधार के खिलाफ राजनीतिक वर्ग

  सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के खिलाफ इस बार भी अधिकतर नेतागण  उठ खडे़ हुए हंै। हाल का राजनीतिक इतिहास देखते हुए ऐसी ही उम्मीद की भी जा रही थी।उन फैसलों को निरर्थक करने की कोशिश में शायद जल्दी ही कुछ कदम उठाए जाएंगे।कदम उठाने के पक्ष में केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के साथ साथ  प्रतिपक्ष के भी कुछ  दल हैं। याद रहे कि हाल में बारी -बारी से सुप्रीम कोर्ट ने दो महत्वपूर्ण फैसले किये ।चुनाव सुधार की दिशा में एक ठोस कदम के तहत अदालत ने कहा कि कोर्ट से दोषी करार जन प्रतिनिधियों की सदस्यता तत्काल प्रभाव से खत्म हो जाएगी।एक अन्य निर्णय के तहत देश की सर्वोच्च अदालत  ने कहा कि जेल में रहने पर कोई व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकेगा।


        सुप्रीम कोर्ट के साथ जनता
  एक राष्ट्रीय अखबार ने हाल में अपने पाठकों से एक  सवाल पूछा।वह सवाल यह था कि ‘ क्या आप सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से खुश हैं कि अब जेल में रहने वाले नेता चुनाव नहीं लड़ पाएंगे ?  इसके जवाब में 96 दशमलव 70 प्रतिशत पाठकों ने कहा कि हम खुश हैं। सिर्फ 3 दशमलव 30 प्रतिशत पाठकों ने अपनी नाखुशी जाहिर की।
क्या इस देश के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच इस फैसले पर खुशी और नाखुशी का यही अनुपात है ?हमारे नेतागण आम लोगों के विचारों के कितने पास या कितने दूर हैं ?   टी.वी चैनलों पर नेताओं के उद्गारों और अखबारों में उनके बयानों से इस सवाल का जवाब मिल जाएगा।


नायडु के साथ अन्याय

  इस देश में जब भी हाई टेक और शहरी विकास की चर्चा चलती है तो  कुछ नेतागण तुरंत यह बयान दे देते हैं कि ‘देखा न, हाईटेक के कारण किस तरह चंद्र बाबू नायडु चुनाव हार गये ! ’

   ऐसे बयान संभवतः आंध्र प्रदेश में तब के चुनावी समीकरण  की गैर जानकारी के कारण आते रहते हैं।याद रहे कि आंध्र प्रदेश में लोक सभा और विधान सभा के चुनाव साथ -साथ ही होते हैं।

  1999 के चुनाव में नायडु के दल को 44 प्रतिशत वोट मिले थे।उसमें अल्पसंख्यकों के वोट भी शामिल थे।नायडु मुख्य मंत्री बने थे।नायडु का दल केंद्र में अटल  सरकार का बाहर से समर्थन कर रहा था।

  इस बीच 2002 में गुजरात में  सांप्रदायिक दंगा हो गया।आंध्र  के अल्पसंख्यक नेताओं ने नायडु से कहा कि आप  अब अटल सरकार से अपना समर्थन वापस कर लें।नायडु ने ऐसा नहीं किया।नतीजतन आंध्र के अल्पसंख्यकों ने 2004 के चुनाव में नायडु के दल तेलुगु देशम पार्टी को वोट नहीं दिया। इस कारण टी.डी.पी.का वोट प्रतिशत 44 से घटकर 37 रह गया।

 नतीजतन  नायडु सत्ता से बाहर हो गये ।  अब सवाल उठता है कि क्या 37 प्रतिशत वोट उन्हें  सिर्फ शहरों से मिले थे ? क्या ये मत सिर्फ हाई टेक के कारण मिले थे ? क्या आंध्र में शहरों और हाईटेक के समर्थकों के वोट मिल कर भी 37 प्रतिशत हो सकते हैं ? हां, नौ प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी वाले राज्य में 7 प्रतिशत मतों के कम हो जाने का सीधा मतलब यही था कि वहां भी गुजरात दंगे का असर पड़ गया।ऐसे में हाईटेक और शहरी विकास के क्षेत्र में भी काम करने वाले नेताओं  को भयभीत करना सही नहीं होगा।किसी दल की जीत या हार में एक साथ कई तत्व काम करते हैं।


और अंत में

सुख-शांति के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा यह है कि हमारे पास जो कुछ है,उसे हम कम करके देखते हैं।साथ ही,जो कुछ दूसरे के पास है,उसके बारे में हम बढ़ा -चढ़ाकर आकलन करते हैं।

(जुलाई 2013)

चुनावी घूसखोरी से बिहार को बचाने की चुनौती

एक अध्ययन के अनुसार दक्षिण भारत के तीन राज्य चुनावी घूसखोरी के मामले में
अब तक देश में सबसे आगे रहे हैं। इस बार बिहार में भी कोई अच्छे संकेत नहीं हैं। यहां  इस बार  प्रचार में जितने अधिक पैसे खर्च हो रहे हैं,वह तो अभूतपूर्व है। इस राज्य (Bihar) में भी घूस देकर वोट लेने के छिटपुट प्रयास पहले भी होते रहे हैं।

कई बार उम्मीदवार इस प्रयास में सफल होते रहे हैं तो कई बार विफल।विफल इसलिए भी  होते हैं क्योंकि यह  राजनीतिक रुप से अत्यंत जागरुक प्रदेश है।

यहां अधिकतर मतदाताओं के दिलो दिमाग पर पैसे के अलावा दूसरे तत्व अधिक हावी रहते हैं।पर इस बार क्या होगा ?कई बार प्रलोभनों की अधिकता के बीच कई लोगों के संयम टूट जाते हंै। इस बार जितनी बड़ी संख्या में धनवान उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं,उससे भी यह सवाल उठता है।

 विधान परिषद के हाल के चुनाव में भी पैसे का खूब खेल चला। सवाल है कि क्या इस मामले में  दक्षिण भारत ही अब भी आगे रहेगा ? या फिर बिहार उसका एकाधिकार तोड़ेगा ? इस पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग की जिम्मेदारी बढ़ गई है।उसकी प्रतिष्ठा दांव पर है।


बिगड़े बोल कहीं बिगाड़ न दे किया-धरा !

  सन 1962 के आम चुनाव में सहरसा लोक सभा क्षेत्र में समाजवादी नेता भूपंेद्र नारायण मंडल ने कांग्रेस के ललित नारायण मिश्र को हराया था। पर इस चुनाव के खिलाफ याचिका दायर की गई।आरोप लगा कि भूपेंद्र नारायण मंडल की ओर से  वोट के लिए जातीय आधार पर मतदाताओं से अपील की गई थी। मंडल जी का चुनाव खारिज हो गया था।

  एक पुराने समाजवादी नेता ने बताया कि आज  विधान सभा  चुनाव प्रचार के दौरान  जिस तरह से कुछ नेतागण वोट के लिए मतदाताओं की जातीय और धार्मिक भावनाएं उभारने की कोशिश कर रहे हैं, वे 1962 की अपेक्षा अधिक प्रत्यक्ष और भोंड़ा है।

कल्पना कीजिए कि इस चुनाव के बाद इस आधार पर चुनाव याचिकाएं दायर होने लगें तो क्या होगा ?

क्या पराजित उम्मीदवार इस आधार पर चुनाव याचिका दायर नहीं कर सकता  कि किसी राष्ट्रीय या प्रादेशिक  नेता ने हमारे चुनाव क्षेत्र में आयोजित अपनी सभा में धार्मिक या जातीय भावना उभारी और उसका लाभ उठाकर प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार जीत गया ?

 इस आरोप पर पता नहीं अदालत कैसा रुख अपनाएगी ? इस आशंका को ध्यान में रखते हुए कम से कम चुनाव प्रचार के अगले दौर में तो जातीय और धार्मिक भावनाएं उभारने का प्रयास बंद हो जाना चाहिए।


वंशवाद की आंधी के बीच  अडिग

 वंशवादी राजनीति की आंधी में एक वंशवाद विरोधी नेता आज भी अडिग खड़ा है।
वह नेता हैं राजद के जगदानंद सिंह। जरा ऐसे लोगों की भी चर्चा कर लेनी चाहिए।

राज्य के पूर्व सिंचाई मंत्री श्री सिंह 2009 में बक्सर से लोक सभा के लिए चुन लिए गए थे।
इस कारण उन्हें विधान सभा की अपनी सीट खाली करनी पड़ी थी।

जानकार सूत्रों के अनुसार राजद ने उनसे कहा था कि आप  अपने पुत्र को उप चुनाव में खड़ा करा दीजिए। पर,जगदानंद ने मना कर दिया।

 राजपूत वर्चस्व वाले रामगढ़ चुनाव क्षेत्र से जगदानंद ने एक कार्यकत्र्ता अम्बिका सिंह यादव को राजद का उम्मीदवार बनवा दिया। जगदानंद के पुत्र पिता से विद्रोह करके  भाजपा से खड़ा हो गए। उन्होंने अपने पुत्र को  हरवाकर  राजद उम्मीदवार को जितवा दिया।

 याद रहे कि 1952 से अब तक किसी भी महत्वपूर्ण पार्टी ने रामगढ़ से किसी यादव उम्मीदवार को खड़ा तक नहीं किया था।

 गत लोक सभा चुनाव में जगदानंद हार गए। इन दिनों लोकसभा चुनाव में पराजित कुछ नेता भी विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। क्योंकि किसी सदन का सदस्य बन जाने के बाद आज के अधिकतर नेतागण एक खास तरह की जीवनशैली अपना लेते हैं। वे उसे बनाये रखने के लिए किसी न किसी सदन मेें जल्द से जल्द प्रवेश चाहते हैं।

 पर,इस बार भी जगदानंद ने अपने पुत्र को अपने दल से खड़ा नहीं कराया। न ही अम्बिका यादव का टिकट कटवा कर वे खुद लड़े।


और अंत में

  कुछ दशक पहले तक कई राजनीतिक दल अपने कार्यकत्र्ताओं के लिए अक्सर राजनीतिक प्रशिक्षण शिविर आयोजित करते थे।वह सब अब लगभग बंद है। चुनाव भी कार्यकत्र्ताओं को शिक्षित-प्रशिक्षित करने के अवसर होते थे।आज के चुनाव में जो कुछ हो रहे हैं,उनसे राजनीतिक कार्यकत्र्तागण कैसी शिक्षा ग्रहण करेंगे ?कौन-कौन से र्गिर्हत शब्द ग्रहण करेंगे  ? पता नहीं।

(दैनिक भास्कर, पटना - 17 अक्तूबर,2015)

   

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

आदर्शवादी पीढ़ी के एक संपादक का निधन


एक सौ एक बसंत देख चुके पारसनाथ सिंह संपादकों की उस पीढ़ी के थे जो  लगभग विलुप्त हो रही है। आज उनके गांव में उनका निधन हो गया। वर्षों तक उनके साथ काम करने के अनुभव के बाद मैं यह कह सकता हूं कि उन्होंने कभी अपनी जीवन शैली नहीं बदली। न ही पत्रकारिता के उन मूल्यों से समझौता किया जो उन्होंने अपने पूर्ववर्ती संपादकों  से सीखा था।

  बाबूराव विष्णु पराड़कर को अपना आदर्श मानने वाले पारस बाबू ने हमें विद्याव्यसनी और विनयी बनने का पाठ पढ़ाया। उत्तर प्रदेश और बिहार के तीन अखबारों के संपादक रहे पारसनाथ सिंह ने न तो कभी अपने पद का लाभ उठाया और न ही पत्रकारिता की धौंस जमाई।

हमेशा सीमित आर्थिक साधनों के जरिए ही परिवार चलाते और संतुष्ट रहते उन्हें देखा। उन्होंने अपनी संतानों को भी अच्छे संस्कार दिए। उनके दीर्घ जीवन का राज यह था कि उनका खाने -पीने में भी भारी संयम था। वे अक्सर पैदल चलते देखे जाते थे।
  ऐसा ही अनुशासन वे संपादन कार्यों में भी रखते थे। वे शब्दानुशासन और खबरों के शीर्षक में शालीनता के घोर पक्षधर थे। वे अपने  संवाददाताओं से कहा रहते थे कि वे छोटे-छोटे वाक्य लिखें। साथ ही  स्पष्टता और संक्षिप्तता का भी पूरा ध्यान रखें।

  वे अंग्रेजी की खबरों के हिन्दी अनुवाद को लेकर डेस्क से कहा करते थे कि शब्दानुवाद के बदले भावानुवाद करें। पटना जिले के पुनपुन के पास के तारणपुर के मूल निवासी पारस बाबू ने अपना अधिक समय वाराणसी और कानपुर में बिताया।

बाद में वे बारी-बारी से पटना के दो अखबारों के भी संपादक रहे। अपने जीवन के
अंतिम वर्षों में यह देखकर वे दुःखी रहते थे कि इन दिनों अधितर हिन्दी अखबारों में  शब्दानुशासन पर कम ही ध्यान दिया जाता है। कभी हिन्दी अखबार पढ़कर कई लोग अपनी हिन्दी सुधारते थे।


बुधवार, 16 सितंबर 2015

सवर्ण मुख्यमंत्री के सवाल पर भाजपा का रुख सैद्धांतिक या चुनावी मजबूरी


केंद्रीय राज्य मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा है कि राजग में से कोई भी सवर्ण नेता बिहार का मुख्यमंत्री नहीं बनेगा। गिरिराज सिंह का बयान सैद्धांतिक रूप से गलत है। पर, वह व्यावहारिक रूप से बिलकुल सही है। ऐसा बयान भाजपा के चुनावी हित में भी है।

 जदयू -राजद गठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तो नीतीश कुमार हैं। वह पिछड़ी जाति से आते हैं। पर अब राजग के एक नेता भी यह कह रहे हैं कि यदि राजग को बहुमत मिला तो कोई गैर सवर्ण नेता ही मुख्यमंत्री बनेगा। क्योंकि वे जानते हैं कि किसी सवर्ण को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके राजग सत्ता नहीं प्राप्त कर सकेगा।

   भाजपा का यह रुख सामाजिक न्याय के आंदोलन की निर्णायक जीत है। बिहार सामाजिक न्याय के आंदोलन की भूमि रही है। सबसे पहले समाजवादी विचारक डा.राम मनोहर लोहिया ने ‘पिछड़े पावें सौ में साठ’ का नारा दिया था। तब उन्हें कुछ लोगों ने जातिवादी तक करार दे दिया था।

पर गिरिराज सिंह के बयान से लगता है कि ऐसे मामले में इस देश की राजनीति में आम सहमति बनती जा  रही है। भाजपा इस मामले में कांग्रेस से अधिक चतुर साबित हो रही है। देश और पूरे समाज के लिए यह बेहतर होगा, यदि ऐसी आम सहमति दिल से बने न कि किसी चुनावी रणनीति के तहत।

  ऐसा नहीं है कि बिहार भाजपा में मुख्यमंत्री पद के लिए पिछड़े समुदाय से आने वाले योग्य नेता उपलब्ध नहीं हैं। हाल के वर्षों में उन्हें ऊंचे राजनीतिक पदों पर बिठाया भी जाता रहा है।

पर बिहार भाजपा के कुछ आतुर सवर्ण नेताओं की यह कोशिश रही है कि राजग को बहुमत मिले तो उन्हें ही मुख्यमंत्री पद पर बैठा दिया जाए।

  महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा में भाजपा के नये प्रयोग के बाद बिहार के कुछ सवर्ण नेताओं का मनोबल बढ़ा है। हाल के वर्षों में महाराष्ट्र में मराठा, हरियाणा में जाट और झारखंड में आदिवासी नेता ही मुख्यमंत्री बनते रहे। पर इन तीनों राज्यों में भाजपा ने इस परंपरा को इस बार तोड़ दिया। पर तब नरेंद्र मोदी की जनता में लोकप्रियता अधिक थी। तब पार्टी कोई भी राजनीतिक प्रयोग कर सकती थी। पर बिहार में राजग यह खतरा मोल नहीं ले सकता जहां जदयू-राजद के एक मजबूत गठबंधन से उसका सीधा मुकाबला है।

 इसीलिए गिरिराज सिंह की बात व्यावहारिक और सामयिक है। हालांकि सैद्धांतिक रूप से बात की जाए तो कोई यही कहेगा कि चुने हुए विधायक ही नेता पद का चुनाव करेंगे। पर गिरिराज ऐसा कहकर  अनुमान या अटकलों की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहते।

गुंजाइश रहने पर सामाजिक न्याय की शक्तियां पिछड़ों में यह प्रचार कर दंेगीं कि राजग को बहुमत देने का मतलब है कि एक बार फिर सवर्णों के हाथों में सत्ता सौंपना।
याद रहे कि बिहार में 1990 से गैर सवर्ण ही मुख्यमंत्री रहे हैं।

    लोकतंत्र में आदर्श स्थिति तो यह होनी चाहिए कि विजयी दल अपने बीच से सर्वाधिक योग्य और ईमानदार नेता को ही मुख्यमंत्री के पद पर बैठाए चाहे वह व्यक्ति किसी भी जाति या समुदाय का क्यों न हो ! पर यह तो आज एक सपना ही है।

 अब जरा व्यावहारिक धरातल पर बात की जाए। आज शासन-प्रशासन की स्थिति यह है कि कोई ईमानदार व्यक्ति भी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा हो तो भी शासन व सत्ताधारी राजनीति के लोग उस व्यक्ति की जाति के लोगों के प्रति सहानुभूति दिखाने लगते हैं। यदि शीर्ष पर बैठा पक्षपाती हो तब तो विकास की गंगा उस जाति की जटा में ही पहले समाती है।

   हर जाति या समुदाय के अधिकतर लोग इसलिए भी यह चाहते हैं कि उनकी ही जाति का व्यक्ति मुख्यमंत्री बने। अपवादों को छोड़ दें तो आजादी के बाद के  अनुभव भी यही बताते हैं। हालांकि अब तक जितने मुख्यमंत्री बने हैं, उनमें से कुछ के कार्यकाल में अच्छे काम अधिक हुए तो कुछ अन्य के शासनकाल में गलत काम अधिक। कुल मिलाकर असमान विकास हुआ और राज्य  पिछड़ा ही रह गया।

  पिछले  68 साल में से करीब 35 साल तक सवर्ण ही मुख्यमंत्री रहे। बाकी वर्षों में अल्पसंख्यक, पिछडे़ और दलित बारी-बारी से मुख्यमंत्री पद पर रहे। सवर्णों में से पांच ब्राह्मण, तीन राजपूत और दो कायस्थ मुख्यमंत्री बने।

  गैर सवर्णों में से एक अल्पसंख्यक, 4 यादव, तीन दलित और तीन पिछड़े मुख्यमंत्री बने। यानी राज्य की सभी प्रमुख जातियों से मुख्यमंत्री बने। इसके बावजूद समरुप विकास नहीं हो पाया ।

 पर आज कुछ पिछड़ा नेता यह आरोप लगाते हैं कि देश के अधिकांश संसाधनों पर उन सवर्ण लोगों का ही कब्जा है जिनकी आबादी सिर्फ दस प्रतिशत है। अपेक्षाकृत अधिक कालावधि में सवर्ण ही मुख्यमंत्री रहे जबकि पिछड़ों की आबादी 50 प्रतिशत से भी अधिक है।
  यह अच्छी बात है कि भाजपा के मन में पिछड़ों के प्रति प्रेम जगा है। बेहतर होगा कि बहुमत मिले तो भाजपा गैर सवर्णों में से ही किसी ईमानदार व योग्य व्यक्ति  को ही मुख्यमंत्री बनाए जो समाज के सभी समुदायों पर समान रुप से नजर रखे।

 वे ईमानदारी से काम भी करें। न्याय और विकास करे। साथ ही धन और अन्य संसाधनों का बंटवारा समरुप ढंग से कराने का प्रबंध करे। यदि ऐसा हुआ तो किसी पिछड़े नेता को यह आरोप लगाने का मौका नहीं मिलेगा कि 10 प्रतिशत लोगों ने देश के अधिकतर संसाधनों पर कब्जा कर रखा है।

 याद रहे कि बिहार में गैर सवर्णोे को भी 33 साल शासन चलाने का मौका अब तक मिल चुका है। उम्मीद की जानी चाहिए कि चाहे सत्ता में जो गठबंधन आए,
 पूरी आबादी के बीच जरूरत के अनुसार संसाधनों के समरुप बंटवारे के लिए वह सरकार काम करे।    

बुधवार, 27 मई 2015

बोफर्स सौदे के कई सवालों के जवाब बाकी हैं

चर्चित बोफर्स तोप सौदे में हुए घोटाले को लेकर कई सवाल अब भी अनुत्तरित रह गए हैं। 1986 में संपन्न इस सौदे को लेकर परस्पर विरोधी विचार यदा-कदा आते रहते हैं।आगे भी आते रहेंगे। इस मामले के जानकार लोगों के अनुसार सवाल इसलिए भी अनुत्तरित रह गए क्योंकि इस केस को उसकी तार्किक परिणति तक पहुंचने ही नहीं दिया गया। ऐसा राजनीतिक कारणों से किया गया।

  याद रहे कि इस घोटाले के कारण मलीन हुई कांग्रेस पार्टी को जनता ने 1989 के चुनाव में केंद्र की सत्ता से बाहर कर दिया था।

   इस मामले में एक रोचक मोड़ उस समय आया जब इस देश के आयकर न्यायाधीकरण ने जनवरी, 2011 में कहा कि बोफर्स तोप सौदे में क्वात्रोची और विन चड्ढ़ा को 41 करोड़ रुपए की रिश्वत दी गई थी। ऐसी आमदनी पर भारत में उन पर टैक्स की देनदारी बनती है।

  सवाल है कि न्यायाधिकरण के इस आदेश के बावजूद उन लोगों से टैक्स क्यों नहीं वसूला गया ?

 उपर्युक्त फैसले के बावजूद दिल्ली की सी.बी.आई. अदालत में सी.बी.आई. ने क्वोत्रोची के खिलाफ मामले को वापस लेने की अपील दायर कर दी ।
सी.बी.आई. ने कोर्ट से कहा कि इस केस की मेरिट को दरकिनार करके इस केस को वापस ले लेने की अनुमति दी जाए। 4 मार्च 2011 को सी.बी.आई कोर्ट ने केस वापस लेने की सी.बी.आई. की दलील मान भी ली।

 सी.बी.आई. ने केस की मेरिट को दरकिनार करते हुए इसे कोर्ट से वापस क्यों ले लिया ? 

याद रहे कि अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल मेंे सी.बी.आई. ने ही इस कांड के संबंध में अदालत में 22 अक्तूबर 1999 को आरोप पत्र दाखिल किया था।  उससे पहले वी.पी. सिंह के शासनकाल में 22 जनवरी 1990 को बोफर्स मामले में प्राथमिकी दायर की गई थी।

 1987 में इस घोटाले के प्रकाश में आने के बाद मीडिया में सबूतों के साथ इस घोटाले के बारे में प्रामाणिक खबरें छपती रहीं।इसके बावजूद तब की राजीव गांधी सरकार के कार्यकाल में इस संबंध में प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की गई ?

 24 मार्च, 1986 को स्वीडन की हथियार बनाने वाली कंपनी ए.बी. बोफर्स से इस आश्वासन के बाद सौदा हुआ था कि इसमें कोई बिचैलिया नहीं है।
बिचैलिए की खबर आने पर केस होना चाहिए था।  18 अप्रैल 1987 को स्वीडन रेडियो ने खबर दी कि इस सौदे में भारतीय नेताओं और आला सैन्य अफसरों को रिश्वत दी गई।

  क्या इस सनसनीखेज सौदे की सही जांच होने दी गई ? दरअसल सरकार बदलने के साथ जांच की दिशा भी बदलती गई।

आखिर ऐसा क्यों हुआ ?

इस भटकाव के कारण जब अदालतों को इस मामले की तह में नहीं जाने दिया  गया तो फिर यह आरोप लगाना कितना सही है कि बोफर्स मामले में  मीडिया ट्रायल किया गया ?

  बोफर्स तोप एक अच्छी तोप है। पर विशेषज्ञ बताते हैं कि सौदा तय करते समय उसके साथ प्रतियोगिता फ्रंास की सोफ्मा तोप से थी। कुछ विशेषज्ञों ने सोफ्मा को  बेहतर बताया था। पर सोफ्मा शायद दलाली नहीं देता था।

    किस तरह अलग -अलग दलों की केंद्र सरकारों ने इस मामले में अलग -अलग रुख अपनाया, उसका पहला उदाहरण चंद्रशेखर सरकार का रवैया था। वी.पी. सिंह की सरकार के गिरने के बाद कांग्रेेस की मदद से चंद्रशेखर के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी। इस मामले में उस सरकार की राय वी.पी. सिंह की सरकार की राय से बिलकुल उलट थी।

नरसिंह राव सरकार के एक मंत्री माधव सिंह सोलंकी को मंत्रिमंडल से क्यों हटना पड़ा ? क्या यह बात सही है कि सोलंकी ने बोफर्स मामले की जांच रुकवाने के लिए संबंधित देश के सत्ताधारी व्यक्ति को पत्र दिया था ? ऐसा उन्होंने किसके कहने पर किया ? क्या इतने उलझे मामले के बारे में रिपोर्ट करना मीडिया ट्रायल होता है ?

एक बड़ा सवाल यह भी है कि 1993 में केंद्र सरकार ने क्वात्रोची को इस देश से गैर कानूनी ढंग से क्यों भाग जाने दिया ? 1991 से 1996 तक पी.वी. नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे।

सवाल यह भी है कि 2006 में भारत सरकार  की किस हस्ती के इशारे पर ब्रिटेन में स्थित क्वात्रोची के उस खाते को डिफ्रीज कर  दिया गया जिसमें बोफर्स की दलाली का पैसे होने की खबर थी और उसे 2003 में भारत सरकार ने फ्रीज करवा दिया था ? याद रहे कि 2004 से 2014 तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे।

   जब बोफर्स घोटाले के मामले में खुद केंद्र सरकार का रवैया बदलता रहा और एक खास पार्टी की सरकार ने इस मामले को कोर्ट में हल नहीं होने दिया तो फिर आशंकाएं तो पैदा होंगी ही।कोई कितना भी कहे ,पर जो हाल बोफर्स जांच का किया गया ,उससे यह स्थिति बन गई है कि इतिहास  इस कांड की निष्पक्ष जांच पर बड़ा प्रश्न चिह्न उठाएगा ही। चाहे कोई इसे मीडिया ट्रायल कहे या कुछ और। अपने पापों और गलतियों पर पर्दा डालने के  लिए उल्टे मीडिया पर आरोप लगा देना इस देश की राजनीति के एक बड़े हिस्से की आदत सी हो गई है।    

  (दैनिक जनसत्ता के 27 मई 2015 के अंक में प्रकाशित)
   

गुरुवार, 21 मई 2015

दिल्ली की जंग का असर देश की राजनीति पर


जन लोकपाल विधेयक जब विधानसभा से पास नहीं होने दिया गया तो विरोधस्वरुप केजरीवाल ने 2014 में मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। दिल्ली की जनता ने केजरीवाल के प्रति अभूतपूर्व एकजुटता दिखाते हुए इस साल के चुनाव में कुल 70 में से 67 सीटें ‘आप’ को दे दी।

अब जब यह धारणा बन रही है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘आप’ के बेलौस युद्ध में केंद्र सरकार रोड़े अटका रही है तो इसका अगला राजनीतिक नतीजा क्या होगा ?

    राजनीतिक पे्रक्षकों के अनुसार यदि इस युद्ध में ‘आप’ सरकार शहीद हुई तो न सिर्फ भाजपा का राजनीतिक जलवा कुछ और कम हो जाएगा, बल्कि देश में अरविंद केजरीवाल का जन समर्थन बढ़ जाएगा।

 अनेक लोगों का यह मानना है कि नियमतः भले उप राज्यपाल को कुछ खास अधिकार मिले हुए हों, पर मुख्यमंत्री की मंशा सही है। वे भ्रष्टाचार से ईमानदारी से लड़ रहे हैं। उनको कम से कम उन लोगों का साथ मिलना चाहिए था जो भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते रहे हैं।

 पर साथ देने के बदले दिल्ली में ऐसी स्थिति बन गई है जहां के मुख्यमंत्री अपनी सरकार के मुख्य सचिव तक का खुद चयन नहीं कर सकते ।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ठीक ही कहा है कि ‘राज्य सरकार एक मुख्य सचिव नियुक्त नहीं कर सकती तो वह और क्या कर सकती है ? ’

    खुद मोदी सरकार गैरभाजपा शासित राज्यों में भी राज्यपाल नियुक्त करने से पहले संबंधित मुख्यमंत्री की सहमति ले लेती है। पर जब केजरीवाल को अपना मुख्य सचिव नहीं चुनने देती तो कई लोगों को केंद्र की मंशा पर शक होता है।

 खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकारी भ्रष्टाचार से परेशान रहे हैं। एक साल के शासन के बाद भी देश की अर्थव्यवस्था गतिशील नहीं दिख रही है तो इसका सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार है। दूसरी ओर यदि दिल्ली में एक सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठा रही है तो केंद्र सरकार को चाहिए था कि वह उसे इस काम में बढ़ावा दे।

  गत 14 फरवरी को शपथ ग्रहण के बाद केजरीवाल ने कहा था कि उनकी सरकार दिल्ली को भ्रष्टाचार मुक्त करेगी। क्या ‘आप’ का यह कसूर है कि वह अपना वादा नहीं भूल रही है ?

 18 मई को केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली सरकार में भ्रष्टाचार 70 से 80 प्रतिशत कम हो चुका है। क्या ऐसा दावा केंद्र की मोदी सरकार कर सकती है ?

ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री अपनी सरकार से भ्रष्टाचार हटाना नहीं चाहते हंै। पर वह भ्रष्टाचार का होमियोपैथी इलाज कर रहे हंै जबकि जरुरत सर्जरी की है। केंद्र सरकार की राजनीतिक कार्यपालिका स्तर पर तो  घोटाले की कोई सूचना अब तक नहीं मिली है। पर क्या यही बात प्रशासनिक कार्यपालिका के बारे में कही जा सकती है ?

  यह ध्यान देने की बात है कि केजरीवाल की लड़ाई प्रशासनिक कार्यपालिका से ही अधिक है। होना तो यह चाहिए था कि केंद्र सरकार देशहित में ‘आप’ सरकार से सहयोग करके यह तरीका सीखती कि वह कैसे 70-80 प्रतिशत भ्रष्टाचार कम कर पाई है। इसके बदले यह धारणा बन रही है कि केंद्र सरकार  ‘आप’ सरकार को  सत्ताच्युत करना चाहती है। सवाल है कि दिल्ली राज्य की सरकार से च्युत होने के बाद कहीं पूरे देश में केजरीवाल, भाजपा के लिए राजनीतिक खतरा न पैदा कर दे !

(21 मई 2015 के दैनिक भास्कर के पटना संस्करण में प्रकाशित)