मंगलवार, 14 नवंबर 2017

शालीन हंसी और चुटीले व्यंग्यों से संसद को जीवंत बनाये रखते थे पीलू




बात उस समय की है जब पीलू मोदी भारतीय लोक दल में थे।संभवतः वे दल के राष्ट्रीय महा सचिव थे।उसके नेता चैधरी चरण सिंह थे और बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर भी उसी दल में थे।
 पीलू मोदी पटना आए थे।भालोद के राज्य कार्यालय में मोदी एक आराम कुर्सी पर बैठे थे।
  बगल की एक कुर्सी पर बैठकर कर्पूरी ठाकुर उनसे बातचीत कर रहे थे।
  कर्पूरी जी ने कहा कि ‘मोदी साहब, यदि आप बिहार पार्टी के लिए एक हेलिकाॅप्टर का प्रबंध कर दें तो हम विधान सभा की आधी सीटें जीत जाएंगे।’
  इस पर बिना देर किए मोदी ने कहा कि ‘दो का प्रबंध कर देता हूं।पूरी सीटें जीत जाओ।अरे भई, चुनाव हेलिकाॅप्टर से नहीं जीते जाते।’
  हंसी में बात आई -गई हो गयी।
देर तक पास में बैठ कर मैं उन दोनों दिग्गजों की बातें सुनता रहा था।
उस संवाद के जरिए  मुझ पर पीलू मोदी ने एक छाप छोड़ दी।
 उनके बारे में अधिक जानने की कोशिश करने लगा।जाना भी। उनके साथ सबसे बड़ी बात यह थी कि वे सदाबहार व्यक्तित्व के धनी थे।
उनके समकालीन पत्रकार शरद द्विवेदी ने उनके बारे में लिखा है कि ‘पीलू मोदी की भाषण कला,अंग्रेजी भाषा पर अद्वितीय अधिकार, वाक् पटुता और सुलझे हुए विचार सभी को आकर्षित करते थे।कटाक्ष करने में वह माहिर थे।उनके कटाक्ष और हाजिरजवाबी सुनने वालों को हंसा देते थे।जिसकी भाषा ऐसी होती थी कि कटाक्ष के शिकार भी उनका आनंद लेते थे।
लेकिन कभी किसी के लिए बुरी भावना उनके मन में नहीं थी।
पत्रकार सी.एस.पंडित के अनुसार ‘ उस घटना को शायद ही कोई भूल सकता है जब एक दिन संसद के केंद्रीय हाल में पीलू मोदी अपने गले में एक पट्टा पहन कर आए जिस पर लिखा था ‘ मैं सी.आई.ए.का एजेंट हूं।’ यह उस आलोचना का जवाब था जो संसद में कुछ दिन पहले सत्तारूढ़ दल की ओर से की गयी थी।
  पीलू मोदी, सर होमी मोदी के पुत्र थे जो संयुक्त प्रांत के गवर्नर रह चुके थे।
पीलू मोदी के भाई रूसी मोदी टिस्को के चेयरमैन थे।
पीलू ने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में वास्तु शिल्प की पढ़ाई की थी।
वहां पीलू मोदी जुल्फिकार अली भुट्टो के रूम मेट थे।
पीलू की एक चर्चित किताब है ‘जुुल्फी माई फं्रेंड।’ वह 1973 में लिखी गयी।
  14 नवंबर 1926 को जन्मे पीलू मोदी का 29 जनवरी 1983 को निधन हो गया।तब वे राज्य सभा के सदस्य थे।
उससे पहले पीलू मोदी 1967 और 1971 में गोधरा से लोक सभा के लिए चुने गए थे।पर वे 1977 में हार गए थे।
1960 में स्थापित स्वतंत्र पार्टी के संस्थापकों में एक पीलू मोदी राज गोपालाचारी के करीबी थे।
  कम ही लोग जानते हैं कि दिल्ली के ओबराय होटल की वास्तु रचना पीलू मोदी ने ही की थी।
 पर वे देश में जिस नयी राजनीति की रचना करना चाहते थे,वह काम वे पूरा नहीं कर सके।
 वे कहा करते थे कि इस देश के 50 हजार बदमाश विभिन्न तरह की ताकत की कुर्सियों पर बैठ कर अपनी स्वार्थ सिद्धि कर रहे हैं।
उनको सबक सिखाने  के लिए हम 5 लाख युवक -युवतियों की फौज बनाना चाहते हैं।
इस सिलसिलमें वे करीब डेढ़ लाख नाम एकत्र भी कर चुके थे।पर इस बीच उनका निधन हो गया।
  यानी सदाबहार व्यक्तित्व के स्वामी पीलू लोगों को हंसाने के अलावा गंभीर काम में भी लगे रहते थे।वे एक पत्रिका भी निकालते थे। 
 वे बाहर -भीतर से एक थे।
एक बार उन्हें जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का
प्रयास कुछ लोगों ने किया था।पर उस राह में शराब बाधक बन गयी।जनता पार्टी से जुड़े किसी बड़े गांधीवादी नेता ने मोदी से पूछवाया कि क्या आप शराब भी पीते हैं ? पीलू ने बिना देर किए कह दिया हां, अवश्य पीता हंू, ।इसी आधार पर उनका नाम कट गया।पर उन्हें इसकी कोई चिंता नहीं थी।
 इस संबंध में पीलू के एक समकालीन सांसद ने लिखा है कि हम सब जानते हैं कि पीलू का पीना महीने में एकाध बार ही होता है।फिर भी पीलू ने कह दिया था कि ‘मैं जो खाउं, जो पीउ, वह मेरा अधिकार है।इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं मानूंगा।’
 चैथी लोक सभा में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के डा.राम मनोहर लोहिया ने लोक सभा में एक निजी विधेयक पेश किया था।लोहिया का प्रस्ताव था कि किसी भी व्यक्ति का खर्च प्रति माह 15 सौ रुपए से अधिक नहीं होना चाहिए।
स्वतंत्र पार्टी के एक सांसद ने उस विधेयक का सदन में मजाक उड़ाया।
सांसद का कहना था कि लोहिया का मजाक उड़ाने का निदेश उनकी पार्टी ने दिया था।
 पर पीलू मोदी ने इसे लोहिया का अपमान माना।उस संासद को लेकर पीलू लोहिया के आवास पर गए।
सांसद ने लोहिया के सामने अपने किए पर अफसोस प्रकट किया।
लोहिया ने उस सांसद से कहा कि  ‘तुमने तो यह  असंभव मांग कर दी कि मैं लोगों की मनोवृत्ति बदलूं। अरे भई, मैं संन्यासी तो हूं नहीं।राजनीति का खिलाड़ी हूं।’   
 @ मेरा यह लेख 14 नवंबर, 2017 के फस्र्टपोस्ट हिंदी में प्रकाशित@ 


   

चीन युद्ध के बाद अगर नेहरू लंबी जिंदगी जीते तो बदल जाती भारत की विदेश नीति




    चीन और सोवियत संघ से झटके खाने के बाद यदि प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू कुछ अधिक दिनों तक जीवित रहते तो वे संभवतः भारत की विदेश नीति को पूरी तरह बदल देते।
  उसका असर घरेलू नीतियों पर भी पड़ सकता था।
 चीन के हाथों भारत की शर्मनाक पराजय के दिनों के कुछ दस्तावेजों से यह साफ है कि नेहरू के साथ न सिर्फ चीन ने धोखा किया बल्कि सोवियत संघ ने भी मित्रवत व्यवहार नहीं किया।
 याद रहे कि जवाहर लाल नेहरू उन थोड़े से उदार नेताओं में शामिल थे जो समय -समय पर अपनी गलतियों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते रहे।
 कांग्रेस पार्टी के भीतर भी कई बार वे अपने सहकर्मियों की राय के सामने झुके।
1950 में नेहरू ने पहले तो राज गोपालाचारी  को राष्ट्रपति बनाने की जिद की, पर जब उन्होंने देखा कि उनके नाम पर पार्टी के भीतर आम सहमति नहीं बन रही है तो नेहरू बेमन से राजेंद्र बाबू के नाम पर राजी हो गए।ऐसा कुछ अन्य अवसरों पर भी हुआ था।
उन्होंने समाजवादी व प्रगतिशील देश होने के कारण चीन और सोवियत संघ पर पहले तो पूरा भरोसा किया,पर जब उन लोगों ने धोखा दिया तो नेहरू टूट गए।उन्होंने अपनी पुरानी लाइन के खिलाफ जाकर अमेरिका की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया।
अमेरिका के भय से ही तब चीन ने हमला बंद कर दिया था।
  यह आम धारणा है कि 1962 में सोवियत संघ ने कहा कि ‘दोस्त भारत’ और ‘भाई चीन’ के बीच के युद्ध में हम हस्तक्षेप नहीं करंेगे।
 पर  मशहूर राजनीतिक टिप्पणीकार व कई पुस्तकों के लेखक ए.जी.नूरानी ने 8 मार्च , 1987 के  साप्ताहिक पत्रिका  इलेस्ट्रेटेड वीकली आॅफ इंडिया में एक लंबा लेख लिख कर यह साबित कर दिया कि सोवियत संघ की सहमति के बाद ही चीन ने 1962 में भारत पर चढ़ाई की थी।
 उस लेख में नूरानी ने सोवियत अखबार ‘प्रावदा’ और चीनी अखबार पीपुल्स डेली में 1962 में छपे संपादकीय को सबूत के रूप में पेश किया है।
  उससे पहले खुद तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू वास्तविकता से परिचित हो चुके थे।
 इसीलिए उन्होंने अमेरिका के साथ के अपने ठंडे रिश्ते को भुलाकर 
राष्ट्रपति जाॅन एफ.कैनेडी को मदद के लिए कई त्राहिमाम संदेश भेजे।
  उससे कुछ समय पहले कैनेडी से नेहरू की एक मुलाकात के बारे में खुद कैनेडी ने एक बार कहा था कि ‘नेहरू का व्यवहार काफी ठंडा रहा।’
 चीन ने 20 अक्तूबर, 1962 को भारत पर हमला किया था।
चूंकि हमारी सैन्य तैयारी लचर थी।हम ‘पंचशील’ के मोहजाल में जो फंसे थे ! नतीजतन चीन हमारी जमीन पर कब्जा करते हुए आगे बढ़ रहा था।
 उन दिनों बी.के.नेहरू अमेरिका में भारत के राजदूत थे।
नेहरू का कैनेडी के नाम त्राहिमाम संदेश इतना दयनीय और समर्पणकारी था कि नेहरू के रिश्तेदार बी.क.े नेहरू कुछ क्षणों के लिए इस दुविधा में पड़ गए कि इस पत्र को व्हाइट हाउस तक पहुंचाया जाए या नहीं।पर खुद को सरकारी सेवक मान कर उन्होंने वह काम बेमन से कर दिया।दरअसल उस पत्र में अपनाया गया रुख उससे ठीक पहले के नेहरू के अमेरिका के प्रति विचारों से  विपरीत था।
 लगा कि इस पत्र के साथ नेहरू अपनी गलत विदेश नीति और घरेलू नीतियों को बदल देने की भूमिका तैयार कर रहे थे।
  शायद नयी पीढ़ी को मालूम न हो, इस देश की कम्युनिस्ट पार्टी  इस सवाल पर दो हिस्सों  में बंट गयी ।
एक गुट मानता था कि भारत ने ही चीन पर चढ़ाई की थी।
 याद रहे कि नेहरू ने 19 नवंबर, 1962 को कैनेडी को लिखा था कि ‘न सिर्फ हम लोकतंत्र की रक्षा के लिए बल्कि इस देश के अस्तित्व की रक्षा के लिए भी चीन से हारता हुआ युद्ध लड़ रहे हैं।इसमें आपकी तत्काल सैन्य मदद की हमें सख्त जरूरत है।’
भारी तनाव, चिंता और डरावनी स्थिति के बीच उस दिन नेहरू ने अमेरिका को दो -दो चिट्ठियां लिख दीं।
इन चिट्ठियों को पहले गुप्त रखा गया था ताकि नेहरू की दयनीयता देश के सामने न आए।
पर चीनी हमले की 48 वीं वर्षगाठ पर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने उन चिट्ठियों को छाप दिया।
  याद रहे कि आजादी के बाद भारत ने गुट निरपेक्षता की नीति अपनाने की घोषणा की थी।
पर वास्तव में कांग्रेस सरकारों का झुकाव सोवियत लाॅबी की ओर
था।
यदि नेहरू 1962 के बाद कुछ साल और जीवित रहते तो अपनी इस असंतुलित विदेश नीति को बदल कर रख देते।
पर एक संवदेनशील प्रधान मंत्री, जो देश के लोगों का ‘हृदय सम्राट’ था, 1962 के  धोखे के बाद भीतर से टूट चुका  था।इसलिए वह युद्ध के बाद सिर्फ 18 माह ही जीवित रहे।
  चीन युद्ध में पराजय से हमें यह शिक्षा मिली कि किसी भी देश के लिए राष्ट्रहित और सीमाओं की रक्षा का दायित्व सर्वोपरि होना चाहिए।भारत सहित विभिन्न देशों की जनता भी आम तौर इन्हीं कसौटियों पर हमारे हुक्मरानों को कसती रहती है। 
@ फस्र्टपोस्ट हिंदी में 14 नवंबर, 2017 को मेरा यह लेख प्रकाशित हुआ@




    

सोमवार, 13 नवंबर 2017

विदेशी तो लुटेरे थे ही देसी का भी वही हाल !


जदयू के राज्य सभा सांसद और प्रभात खबर के पूर्व 
प्रधान संपादक हरिवंश ने काले धन को लेकर ‘प्रभात खबर’ में दो हिस्सों में सरल भाषा में महत्वपूर्ण बातें लिखी हैं।
 उसकी कुछ ही लाइनें यहां उधृत कर रहा हूं।
‘नोटबंदी के बाद जिन तीन लाख संदिग्ध कंपनियों के बारे में  पता चला था,जिनके  माध्यम से काले धन की लेनदेन की आशंका है, उनमें से दो लाख 20 हजार कंपनियों का रजिस्ट्रेशन रद किया जा चुका है।’
     ‘.......हमारे देश में एक कंपनी भी बंद करो  तो काले झंडों के जुलूस निकलते हैं।दो लाख से अधिक कंपनियां बंद की गयी।पर कोई समाचार नहीं आ रहा है।’
  ‘......शेल कंपनियों द्वारा निर्यात का फर्जी बिल बना कर विदेशों से भारत में पैसे लाए जाते हैं।ऐसी कंपनियां बनाने वालों में बड़े राज नेता और बड़े कारोबारी शामिल हैं।’
   कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आजादी के बाद से ही  हमारे अधिकतर हुक्मरानों ने इस देश को चारों -डकैतों के लिए अच्छा -खासा चारागाह बना कर रख दिया।
1985 में राजीव गांधी ने यूं ही नहीं , सौ पैसों में से 85 पैसे बीच में गायब कर दिए जाने की  बात नहीं उठाई थी।
  शेल कंपनियां ऐसी डकैती की बहुत बड़ी साधन रही है।इसकी गंभीरता का पता देश में कम ही लोगों को रहा है।
ऐसी सूचनाएं आम जनता की भाषा में देकर हरिवंश ने देश का कल्याण किया है।
  पर दूसरी ओर इसी तरह की भयंकर लूट
की खबर इन दिनों इंडियन एक्सप्रेस दे रहा है।उस पैराडाइज पेपर्स मामले की जांच इस देश की बहु एजेंसी समूह करेगा।
पैराडाइज के दस्तावेज के मुताबिक 714 भारतीय व्यक्तियों और इकाइयों ने भारत सरकार को  बताए बिना विदेश में निवेश किया है।
  अंग्रेजी नहीं जानने वाली जनता उन खबरों को विस्तार से नहीं जान-समझ  पा रही है।
प्रभाष जोशी आज होते तो  संभवतः वे जनहित में उसे पूरा का पूरा अनुवाद करा कर जनसत्ता में भी छापते।
यदि एक्सप्रेस को एतराज होता तो जनसत्ता में  एक दिन बाद ही छपता।एक दिन देर से ही सही, पर देश की अधिकतर आबादी यह जान तो पाती कि आजादी के बाद भी हमारे देश के साथ क्या-क्या होता रहा है।आजादी के पहले इस सोने की चिडि़या को जम कर लूटा ही गया था।
   
  




नटवर लाल ः इसके जैसा ना कोई था,ना होगा


      
आज के ‘नटवर लालों’ से चाहे जो भी समानता  हो ,पर 
आज का कोई ‘नटवर लाल’ 84 साल की उम्र में हथियारबंद संतरियों को धोखा देकर तो फरार नहीं ही हो सकता !
 इस मामले में मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव उर्फ नटवर लाल 
को ‘न भूतो न भविष्यति’ ही माना जा सकता है।
25 जून 1996 की बात है।दिल्ली रेलवे स्टेशन पर नटवर लाल कान पुर जाने वाली ट्रेन का इंतजार कर रहा था।डाक्टरी जांच के लिए उसे कान पुर जेल से दिल्ली लाया  गया था।
उसके साथ दो संतरी और एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे।
लाचार नटवर लाल को बेंच पर लिटाकर चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी व्हील चेयर  लौटाने चला गया। एक संतरी टिकट का प्रबंध करने गया।बचे संतरी को नटवरलाल ने चाय के लिए भेज दिया।
पर जब वह चाय लेकर लौटा तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गयी।
  नटवर लाल तो फरार हो चुका था।
वह पहले भी कई बार फरार हो चुका था, पर इस फरारी के बाद वह पुलिस के हाथ कभी नहीं आया।
 जब नटवर लाल के एक करीबी रिश्तेदार के घर श्राद्ध हुआ तो मान लिया गया कि मिथिलेश श्रीवास्तव अब दुनिया में नहीं हैं।
 एक बार नटवर लाल ने कहा था कि जीरादेई ने दो राष्ट्रीय पुरूषों को जन्म दिया।
--डा.राजेंद्र प्रसाद और मुझे।वे राष्ट्रपति बने और मैं चतुर कलाकार !
पर लोग मुझे कलाकारी को ठगी का नाम देते हैं।
याद रहे कि जीरादेई बिहार के अविभाजित सारण जिले में है।
अब वह सिवान जिले में है।हालांकि यह संयोग ही है कि उसी जीरादेई विधान सभा क्षेत्र से  राजद नेता और चर्चित मो.शहाबुद्दीन पहली बार विधायक बने थे।अब वे तिहाड़ जेल में हैं।
 ‘दुनिया का कोई जेल गब्बर सिंह को अधिक दिनों तक बंद नहीं रख सकता।’ शोले में गब्बर सिंह ने तो यह डायलाॅग बाद में बोला ।किंतु नटवर लाल तो उससे पहले यह कहा करता था कि कोई भी जेल मुझे एक साल से अधिक समय तक नहीं रख सकता।वह आठ या नौ बार फरार हो चुका  था।
पहली बार 1957 में वह लखनउ जेल से और दूसरी बार 1963 में आंध्र प्रदेश के जेल से फरार हुआ था।
अपने पूरे ‘नटवरी जीवन’ में वह करीब 400 लोगों को ठगा था।उसने लगभग 3 करेाड़ रुपए की ठगी की।
विभिन्न राज्यों की अदालतों ने उसे कुल मिलाकर करीब 150
साल की सजा दी थी।
 वह कहा करता था कि मैंने कभी गरीबों और मध्यम वर्ग के लोगों को नहीं ठगा।बड़े लोगों को ठगा और गरीबों के साथ मिल बांट कर खाया।
उसने दो तीन लोगों से अधिक  कभी अपने गिरोह में शामिल नहीं किया।
 एक बार वह नई दिल्ली के एक आभूषण बिक्रेता के यहां गया और खुद को नारायण दत्त तिवारी काव निजी सहायक बताया।
उसने दुकानदार का विश्वास जीत लिया और एक लाख 60 हजार रुपए के जेवर लेकर फरार हो गया।
 रेलवे में राजस्व कलक्टर रघुनाथ प्रसाद श्रीवास्तव को बेटा 
नटवर लाल पढ़ा लिखा था।अंग्रेजी बोलता था और किसी के हस्ताक्षर की हू ब बहू नकल कर लेता था।
पचास-साठ के दशकों में बिहार के गांवों में यह चर्चा थी कि नटवर लाल ने केंद्र सरकार
से कह रखा है  कि यदि वह अनुमति दे तो वह भारत सरकार का सारा कर्ज भुगतान करवा देगा।
उसे लगता था कि वह किसी भी कर्जदार देश के संबंधित अधिकारी के हस्ताक्षर की नकल करके  यह काम कर सकता है।
 वह फर्जी बिल्टियों द्वारा रेलवे से माल छुड़वा कर बेचता था।
चूंकि उसके पिता रेलव में थे,इसलिए वह वहां के काम का जानकार हो गया था।
उसने ठगी की शुरूआत वाराणसी से की थी।
वह एक सेठ के यहां उसके बच्चे को ट्यूशन पढ़ाने के लिए रखा गया था।
चर्चा है कि नटवर लाल ने अपनी बीमार बेटी के इलाज के लिए सेठ जी से एडवांस मांगा।नहीं मिला।बेटी मर गयी।उसने अमीरों को लूटने का मन बना लिया।
 1980 की बात है।लखनउ की एक अदालत ने उसे पांच साल की सजा दी थी।
सजा सुनाने के बाद जज साहब ने नटवर लाल से पूछा कि तुम यह सब कैसे करते हो ?
नटवर ने कहा कि ‘आप हुजूर, एक रुपए का नोट अपनी जेब  से निकाल कर देंगे ?’
जज साहब ने नोट उसकी तरफ बढ़ा दिया।
नटवर ने उस नोट को अपनी जेब में रखा और मुस्कराते हुए कहा कि ‘ठीक इसी तरह !’
जज साहब देखते रह गए और नटवर सिपाहियों के साथ कोर्ट रूम से बाहर निकल गया।
 नटवर लाल के बारे में एक  दिलचस्प किस्सा है।
उन दिनों भी वह एक  जेल में था।उसकी पत्नी  उसे अक्सर पत्र लिखती थी।चिट्ठियांे में कोई न कोई शिकयत रहती थी।पत्र सेंसर होकर नटवर लाल को मिलता था।एक दिन जेलर ने पूछा कि तुम जवाब क्यों नहीं देते ?अपनी पत्नी को नटवर ने जवाब में लिखा कि तुम परेशान मत हो।खेत के बीच में जहां मेड़ बनी है,मैंने वहां कुछ सोना गाड़ रखा है।एक हाथ मिट्ठी खोदने पर तुम्हंे एक पोटली मिलेगी।सारा सोना मत बेचना।जेल से छूटते ही मैं तुमसे मिलूंगा।
उधर खेत में सोना गड़े होने की खबर सुनकर पुलिस का एक दस्ता उसके गांव रवाना हो गया।जेल पुलिस ने चिट्ठी नहीं भेजी।पुलिस ने खुद जाकर सोने की तलाश में सारी जमीन की जुतवाई-खुदाई करवा दी।
 न कुछ मिलना था और न मिला।कुछ महीने बाद नटवर की पत्नी जेल में मिलने आई और उसने जेलर को यह कहते हुए धन्यवाद दिया कि मेरे खेत काफी दिनों ंसे खाली पड़े थे ,कोई जोतने वाला नहीं था।
आपकी मेहरबानी से इस बार अच्छी फसल हुई है। 
--सुरेंद्र किशोर।
@ 13 नवंबर, 2017 को फस्र्टपोस्ट हिंदी में प्रकाशित@     
   

  

रविवार, 12 नवंबर 2017

अवैध निर्माण में मददगार अफसरों को कब मिलेगी सजा !



पटना हाई कोर्ट के आदेश से फुलवारी शरीफ के अपार्टमेंट के 
अवैध हिस्से को तोड़ने क़ा काम शुरू हो गया है।
 कहीं भी कोई ताजा निर्माण टूटते हुए देखना अच्छा नहीं लगता।
टूटने से एक साथ कई लोगों का नुकसान जो हो जाता है !
पर यदि निर्माण अवैध है तो उसे टूटना ही चाहिए।
 कानून के शासन वाले राज्य में यह जरूरी है। 
पर, आखिर ऐसी स्थिति आती ही क्यों  है ? दरअसल बिल्डरों के लोभ और खरीदारों की लापारवाही का यह नतीजा है।
   पर क्या सिर्फ वही लोग दोषी हैं ?
ऐसे अवैध निर्माण पूरे बिहार कौन कहे ,पूरे देश में जहां -तहां होते रहते हैं।अदालतें आदेश देकर उन्हें कहीं -कहीं तुड़वाती भी रहती हैं।
मध्य पटना के बंदर बगीचा मुहल्ले में हाल में एक आलीशान अपार्टमेंट के अवैध हिस्से टूटे।
 यह अच्छी बात है कि उस मामले में दोषी बिल्डरों को सुप्रीम कोर्ट ने भी राहत नहीं दी।
 पर नगर निगम, नगर परिषद और पी.आर.डी.ए. तथा इस तरह के अन्य निकाय  के संबंधित अधिकारियों की ऐसे मामलों में कैसी भूमिका रहती है ?
जाहिर है कि वे आम तौर पर अवैध निर्माणकत्र्ताओं से मिले हुए होते हैं।कारण सबको मालूम है।सारे अवैध निर्माणों की तरफ अदालतों की नजरंे जा भी नहीं सकतीं।
 अब सवाल है कि किसी अपार्टमेंट के बन जाने के बाद नगर निकाय के संबंधित अफसर बिल्डर्स को अकुपेंसी सर्टिफिकेट यानी भोगाधिकार देते भी हैं क्या ?
क्या वे उससे पहले यह सुनिश्चित कर लेते  हैं कि निर्माण कार्य पास किए गए नक्शे के अनुकूल हुआ या विचलन  है ?
अधिकतर मामलों में  अधिकारी ऐसा नहीं करते।
 फुलवारी शरीफ में जो अपार्टमेंट टूट रहे हैं,उनके बिल्डरों को संबंधित अफसर ने भोगाधिकार प्रमाण पत्र दिया था ?
क्या नगर निकाय के अफसरों की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि निर्माण कार्य जारी रहते समय ही वे स्थल निरीक्षण करें ?
 यदि वे अपने कत्र्तव्य का पालन नहीं करते तो क्या उनके लिए  सजा की सुनिश्चित व्यवस्था  है ? यदि नहीं है तो वैसा प्रावधान किया जाएगा ?
दरअसल ऐसे मामलों में जब तक सभी संबंधित पक्षों को सबक सिखाने लायक सजा नहीं मिलेगी, तब तक अवैध निर्माण होते रहेंगे और उनमें से कुछ टूटते भी रहेंगे।
सब तो कोर्ट नहीं जा सकते ।इसलिए अपुष्ट खबर यह भी है कि पटना में ही अब भी जितने अपार्टमेंट नक्शे के अनुसार बने हैं,उससे कम विचलन करके नहीं बने हैं।
  एन.एच.निर्माण में विलंब से शादियां रुकीं--
पटना-कोइलवर नेशनल हाईवे के निर्माण का काम कई साल से लटका हुआ है।नतीजतन उस इलाके के किसान अपनी जमीन के
भविष्य को लेकर असमंजस में हैं।यानी उन्हें  यह पता ही नहीं चल रहा है कि उनका कौन सा भूखंड नेशनल हाईवे में जाएगा और कौन नहीं जाएगा।
 आम तौर पर किसानों को अपनी लड़कियों की शादियों के लिए अपनी जमीन बेचनी पड़ती है।
उसके सामने समस्या यह है कि वह कौन जमीन बेचें और कौन न बेचंे।खरीदार भी असमंजस में रहते हैं।
प्रस्तावित नेशनल हाईवे के पास पड़ने वाले फुलवारीशरीफ अंचल के सिर्फ एक गांव में मेरी जानकारी के अनुसार एक दर्जन शादियां कुछ साल से रुकी हुई हैं।क्या सरकार इस मानवीय पक्ष पर विचार करते हुए हाईवे के लिए जमीन के अधिग्रहण के प्रस्ताव को जल्द मंजूरी देगी ? या फिर हाईवे का स्थल बदलना है तो वह काम भी वह जल्द करेगी  ताकि जरूरी शादियां तो शीघ्र संपन्न हो सकंे ?  
डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर योजना कितनी सफल--
 अस्सी के दशक में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने यह स्वीकार किया था कि हम आपके विकास के लिए सौ पैसे निर्धारित  करते हैं तो उसमें से विकास पर वास्तव में 15 पैसे ही लग पाते हैं। यानी 85 पैसे बिचैलियों की जेबों में चले जाते हैं।
मौजूदा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी  ने यह दावा किया है कि डायरेक्ट बेनिफिट टा्रंसफर योजना शुरू करके हमने बिचैलियों के काम तमाम कर दिए हैं।
 काश ! मोदी जी  का यह दावा सही होता।
  इस दावे के विपरीत सुदूर जगहों से मिल रही खबरों के अनुसार अनेक मामलों में सरकारी बैंक  के अधिकारी बिचैलियों के जरिए  अब भी लाभुकों से पहले ही एक खास राशि की उगाही करवा लेते हैं।तभी भुगतान होता है।
क्या यह खबर सही है ? सही है तो कितने प्रतिशत की लूट अब भी हो रही है ?
उस लूट में कौन -कौन लोग शामिल हैं ?
क्या सरकार इस खबर की नमूने के तौर पर खुफिया जांच करवाएगी ?
आरोप सही पाए जाने पर दोषी लोगों को सजा देगी और दिलवाएगी ?
यदि सरकार ऐसा नहीं करेगी तो जिस चुनावी लाभ की कल्पना सत्ताधारी पार्टियां कर रही हैं, वह अनिश्चित हो जाएगा।
लोकल ट्रेन  बढ़ने से घटेगा पटना में प्रदूषण---
पटना के पास गंगा नदी पर रेल सह सड़क पुल बनाने का एक उद्देश्य यह भी रहा है कि इससे पटना पर आबादी का दबाव कुछ घटेगा।यानी पास के जिलों के मूल निवासी अपने ही जिले में अपना घर बनाएंगे और उससे राजधानी पर आबादी का बोझ कम होगा।आबादी का कम बोझ यानी महा नगर में कम प्रदूषण।
 पर इस दिशा में अधूरी कोशिश ही हो रही है।
पटना से छपरा के बीच सिर्फ एक जोड़ी ही पैसेंजर ट्रेन उपलब्ध हैं।
यदि आॅफिस आने -जाने के लिए सिवान और पटना के राजेंद्र नगर के बीच एक जोड़ी और पैसेंजर ट्रेन चलाई जाए तो कुछ कर्मचारी पटना में अपना निजी मकान बनाने के बदले अपने मूल निवास में ही बस सकते हैं।
इन दिनों दिल्ली में गैस चैंबर जैसे हालात हैं।यदि हम प्रदूषण की समस्या के प्रति लापारवाह रहे तो वैसी स्थिति पटना में भी 
आ जाने में देर नहीं लगेगी ।
हाल के वर्षों में मध्य पटना में कई बड़े निर्माण हुए हैं।बुद्ध स्मृति पार्क, कन्वेंशन सेंटर और  बिहार म्युजियम।ये भीड़ बढ़ाने वाले स्थल हैं।अधिक भीड़ यानी अधिक गाडि़यां और अधिक प्रदूषण।इनका निर्माण नगर से बाहर होना चाहिए था।पर, खैर अब तो हो गया।
पर इस तरह का कोई अगला निर्माण मध्य पटना में होगा तो वह इस महा नगर को गैस चैंबर बनाने में ही मददगार ही होगा।  
जाति के नाम पर वोट मांगने पर कितनी कार्रवाइयां !---
जन प्रतिनिधित्व कानून, 1952 की धारा - 123@3@ में यह स्पष्ट प्रावधान  है कि जो उम्मीदवार जाति, समुदाय,धर्म  या भाषा  के नाम पर  वोट मांगेगा,विजयी होने पर उसका चुनाव रद हो जाएगा।
यदि यह काम उम्मीदवार की सहमति से उसका चुनाव  एजेंट या कोई अन्य व्यक्ति भी करता है तो भी उस उम्मीदवार का चुनाव रद हो जाएगा।
  चुनाव आयोग के सूत्र बताते हैं कि ऐसे मामलों में चुनाव के दौरान चुनाव आयोग के प्रतिनिधि जहां -तहां अनेक एफ.आई.आर. तो दर्ज करा देते हैं ,पर चुनाव के बाद स्थानीय पुलिस उस पर कोई कार्रवाई ही नहीं करती।
 आयोग पुलिस को स्मार पत्र देते -देते थक जाता है, फिर भी कुछ नहीं होता।
   कोई सजा नहीं होने के कारण  भावनाएं उभारने वाले उम्मीदवार और उनके लोग फिर अगले चुनाव में भी वही काम करते हैं।
 क्या देश की सरकारें पुलिस से ऐसी प्राथमिकियोें के आंकड़े एकत्र करवा कर सजा दिलाने के लिए कुछ करेंगी ?  
        और अंत में---
  कांग्रेस ने सरदार पटेल के साथ कैसा व्यवहार किया,उसका 
सबसे बड़ा उदाहरण जग जाहिर है ।सरदार साहब को  1991 में ही ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया जा सका।
जबकि, सरदार  पटेल से पहले एम.जी.आर.,कामराज, वी.वी.गिरि,बी.सी.राय , जी.बी.पंत, राज गोपालाचारी और डा.आम्बेडकर को भारत रत्न मिल चुका था। इन लोगों को बारी -बारी से सर्वोच्च सम्मान देते समय नेहरू-इंदिरा-राजीव को  सरदार पटेल याद नहीं रहे ।
  प्राथमिकताएं तो देखिए ! अब इस बात पर शोर गुल क्यों कि सरदार की बड़ी मूत्र्ति कोई और क्यों बनवा रहा है ? पटेल तो हमारे हैं।तुम्हारे होते तो पटेल को नेहरू के साथ ही ‘भारत रत्न’ मिल गया होता।
@ कानोंकान-प्रभात खबर -बिहार -10 नवंबर 2017@

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

  पटना के पास गंगा नदी पर रेल सह सड़क पुल बनाने का एक उद्देश्य यह भी रहा है कि इससे इस प्रादेशिक राजधानी  पर आबादी का दबाव कुछ घटेगा।यानी, गंगा पार के जिलों के मूल निवासी अपने ही  घर में रह कर पटना रोज आ -जाकर नौकरी कर सकेंगे। उससे पटना  पर आबादी का बोझ कम होगा।आबादी का कम बोझ यानी बनते महा नगर में कम प्रदूषण।
 पर इस दिशा में अभी अधूरी कोशिश ही हो रही है।
पटना से सारण  के बीच सिर्फ एक जोड़ी ही पैसेंजर ट्रेन उपलब्ध है।
यदि आॅफिस आने -जाने के लिए सिवान और पटना के राजेंद्र नगर स्टेशनों के बीच एक जोड़ी पैसेंजर ट्रेन चलाई जाए तो कुछ कर्मचारी पटना में अपना निजी मकान बनाने के बदले अपने मूल निवास में ही बने रह सकते हैं।
इन दिनों दिल्ली में गैस चैंबर जैसे हालात हैं।यदि हम प्रदूषण की समस्या के प्रति लापारवाह रहे तो वैसी स्थिति पटना में
भी आ जाने में देर नहीं लगेगी ।
हाल के वर्षों में मध्य पटना में कई बड़े निर्माण हुए हैं।बुद्ध स्मृति पार्क, कन्वेंशन सेंटर और  बिहार म्युजियम।ये भीड़ बढ़ाने वाले स्थल हैं।अधिक भीड़ यानी अधिक गाडि़यां और अधिक प्रदूषण।इनका निर्माण नगर से बाहर होना चाहिए था।पर, खैर अब तो हो गया।
पर इस तरह का कोई अगला निर्माण मध्य पटना में होगा तो वह इस महा नगर को गैस चैंबर बनाने में ही मददगार होगा।  
@ कानोंकान-प्रभात खबर  से @

राजनीति के अपराधीकरण का इलाज--


   सुप्रीम कोर्ट ने बीते दिनों केंद्र सरकार को सांसदों और विधायकों के खिलाफ जारी आपराधिक मुकदमों की जल्द सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन का
 आदेश  दिया है।
 राजनीति के अपराधीकरण  के खिलाफ सर्वोच्च अदालत की इस पहल को  सराहनीय माना जा रहा है।
 पर  कुछ अन्य महत्वपूर्ण सवाल और मुददे भी इससे जुडे़ हुए  हंै जो दशकों से अनुत्तरित हैं।
क्या गवाहों की सुरक्षा के बिना अत्यंत प्रभावशाली लोगों के खिलाफ जारी किसी मुकदमे को उनकी तार्किक परिणति तक पहुंचाया जा सकता है ?
 क्या अधिकतर विवेचना अधिकारियों  की मौजूदा लचर कार्य शैली में सुधार के बिना सुप्रीम कोर्ट का उद्देश्य पूरा हो पाएगा ?
 क्या नार्को टेस्ट और ब्रेन मैपिंग पर रोक से संबंधित खुद सुप्रीम कोर्ट के 2010 के आदेश को पलटे बिना सुप्रीम कोर्ट के ताजा  आदेश का सकारात्मक असर हो पाएगा ? 
  इसलिए यह भी उम्मीद की जा रही है कि राजनीतिक तंत्र को दागियों से मुक्त करने के अच्छे उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट की ओर से कुछ अन्य दिशा - निदेश भी आने चाहिए।  
  इस देश की पुलिस, हत्या के मामले में जितने लोगों के खिलाफ अदालतों में आरोप पत्र दाखिल करती हैं,उनमें से सिर्फ 10 प्रतिशत आरोपितों  को ही सजा हो पाती है।बलात्कार के मामले में यह प्रतिशत सिर्फ 12 है।
 अधिकतर मामलों में गवाह अदालत  में जाकर बदल जाते हैं।क्योंकि वे अपार राजनीतिक, प्रशासनिक तथा बाहुबल की  ताकत से लैस आरोपियों ं  के सामने टिक नहीं पाते।वे डर जाते हैं।
  अमेरिका और फिलीपीन्स सहित दुनिया के कई देशों में गवाहों की सुरक्षा के लिए कई कानूनी तथा अन्य उपाय किए गए हैं।अमेरिका में 8500 गवाहों और उनके 9900 परिजनों को 1971 से ही मार्शल सर्विस सुरक्षा दे रही है।
खुद इस देश के सुप्रीम कोर्ट ने पिछले ही साल केंद्र सरकार को निदेश दिया था कि वह गवाहों की सुरक्षा के उपाय करे।
 सन् 1958 में ही इस देश के विधि आयोग ने गवाहों की सुरक्षा के उपाय करने के लिए केंद्र सरकार को सुझाव दिए थे।पर कुछ नहीं हुआ।
  इस तरह की अनेक कमियों के कारण आपराधिक मामलों में पूरे देश में सजा का औसत प्रतिशत सिर्फ 45 है। सन 1953 में यह प्रतिशत 64 था।हां,इस मामले में सी.बी.आई. थोड़ा बेहतर नतीजे जरूर देती है। फिर भी विकसित देशों के मुकाबले यहां की स्थिति दयनीय ही कही जाएगी।अमेरिका में सजा का प्रतिशत 93 है तो जापान में 99 प्रतिशत।
 इस देश में सत्तर के दशक से ही  सजा के  प्रतिशत में गिरावट शुरू हो गयी थी।
यह संयोग नहीं है कि राजनीति के अपराधीकरण का भी वही शुरूआती दौर था।जिन राज्यों में राजनीति का  अपराधीकरण अधिक हुआ है,उन राज्यों में सजा का प्रतिशत भी अन्य राज्यों की अपेक्षा कम है।
  न सिर्फ गवाह ताकतवर आरोपित के प्रभाव में  आ जाते हैं बल्कि अनेक जांच अधिकारी भी  रिश्वत के प्रभाव  से बच नहीं पाते।
वैसे भी पुलिस में भ्रष्टाचार का क्या हाल है,यह किसी से छिपा नहीं है।
  इसलिए गवाहों की सुरक्षा के साथ-साथ  मुकदमे के अनुसंधान के काम में लगे जांच पदाधिकारियों पर भी नजर रखने का विशेष प्रबंध करना पड़ेगा।बेहतर तो यह होगा कि धनवान लोगों के केस देखने वाले जांच पदाधिकारियों पर भ्रष्टाचार विरोधी दस्ते नजर रखें।
 समय सीमा के भीतर सांसदों-विधायकों के खिलाफ चल रहे मुकदमों की सुनवाई पूरी कर लेने के मामले में कोई भी ढील आरोपितों को मदद पहुंचाने के समान ही साबित होती है।
   सजा के बाद पूरे जीवन में फिर कभी चुनाव नहीं लड़ने के प्रावधान का भी सवाल सामने है।दरअसल  वह किए बिना लोकतंत्र को इस गंदगी से मुक्त नहीं किया जा सकता।
 पर इस पर केंद्र सरकार की शुरूआती प्रतिक्रिया से कोई खास उम्मीद नहीं बंधती।क्योंकि आजीवन प्रतिबंध लगाने की लोकहित याचिकाकत्र्ता की मांग पर सरकारी वकील ने गत 1 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि ‘इस पर विचार हो रहा है।’ 
 सरकारी सूत्रों ने अलग से बताया कि इस पर तो राजनीतिक दलों में आम सहमति की जरूरत पड़ेगी।
  समस्या है कि ऐसे मामलों में राजनीतिक दलों में आम तौर से कोई आम सहमति नहीं बन पाती।क्योंकि यह सांसदों के वेतन-भत्ते और सुविधाएं बढ़ाने का मामला तो है नहीं !
उस पर तो आम सहमति मंे कभी कोई देर नहीं होती।
 इसी आम सहमति के चक्कर में केंद्र की राजग सरकार को 2002 में फजीहत झेलनी पड़ी थी।क्या केंद्र की राजग सरकार मौजूदा मामले में भी उसकी पुनरावृत्ति चाहती है ? पता नहीं।
 याद रहे कि  सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में  सख्त आदेश देकर केंद्र सरकार के उस निर्णय को बदल दिया था जिसके तहत  केंद्र सरकार ने उम्मीदवारों के बारे में निजी सूचनाएं देने की पहले कानूनी मनाही कर दी थी।
   उम्मीदवारों के लिए शैक्षणिक योग्यता,आपराधिक मुकदमे और संपत्ति का व्योरा देना जरूरी  तभी हो सका था जब सुप्रीम कोर्ट ने सन 2002 में  ऐसा करने के लिए केंद्र की राजग  सरकार  को स्पष्ट आदेश दे दिया ।उससे पहले तत्कालीन केंद्र सरकार  इसके लिए कत्तई तैयार ही नहीं थी।तब के एक केंद्रीय मंत्री ने मीडिया को बताया था कि हमारे मामले कई बार आयकर महकमे में लंबित रहते हैं,फिर हम आय व संपत्ति का विवरण सार्वजनिक कैसे कर सकते हैं ?      
 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया था कि जन प्रतिनिधि बनने की इच्छा रखने वालों को महत्वपूर्ण सूचनाएं सार्वजनिक करनी ही होंगी।इन सूचनाओं में शैक्षणिक योग्यता,आपराधिक रिकार्ड और संपत्ति के विवरण शामिल हैं।
   केंद्र सरकार ने तब सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को पसंद नहीं किया।अधिकतर  राजनीतिक दल भी नहीं चाहते थे कि ऐसी व्यक्तिगत सूचनाएं जग जाहिर की जाएं।नतीजतन सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को बेअसर करने के लिए केंद्र सरकार ने तब राष्ट्रपति से  अध्यादेश जारी करवा दिया।बाद में उसे संसद ने पास करके कानून का भी दर्जा दे दिया।पर सुप्रीम कोर्ट ने उस कानून को रद कर दिया। उसके बाद ही उपर्युक्त सूचनाएं नामांकन पत्र के साथ उम्मीदवार देने को बाध्य हो रहे हैं।
  यानी जिस देश के अधिकतर राजनीतिक दल व नेतागण अपने बारे में ऐसी ‘निर्दोष’ सूचनाएं भी सार्वजनिक करने को तैयार नहीं रहे  हैं,वे अपराधियों को चुनाव लड़ने से हमेशा के लिए रोकने के लिए खुद कोई कानून बनाने को तैयार हो जाएंगे,ऐसा फिलहाल लगता नहीं है।
  याद रहे कि लोकहित याचिका कत्र्ता ‘लोक प्रहरी’ और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट से यह गुहार की है कि सजायाफ्ता नेताओं को चुनाव लड़ने से हमेशा के लिए वंचित कर दिया जाना चाहिए।क्योंकि सरकारी कर्मचारी या जज को सजा हो जाए तो उन्हें फिर से नौकरी नहीं मिलती।
यह समानता के अधिकार से संबंधित संवैधानिक प्रावधान के खिलाफ है कि सजा की अवधि पूरी कर लेने के छह साल बाद नेता फिर से चुनाव लड़ने के योग्य माने जाएं।
 उम्मीद है कि 13 दिसंबर को जब इस मामले की अगली सुनवाई होगी तो केंद्र सरकार आजीवन प्रतिबंध के मामले में अपनी अंतिम राय सर्वोच्च न्यायालय को बता पाएगी।
चुनाव आयोग तो ऐसे प्रतिबंध के पहले से ही पक्ष में है।
  उधर खुद सुप्रीम कोर्ट को इस बात पर भी विचार करना होगा कि 2010 के उसके ही एक निर्णय का आपराधिक न्यायिक प्रक्रिया पर कैसा असर पड़ रहा है।
  याद रहे कि  सुप्रीम कोर्ट ने मई, 2010 में यह कहा था कि अभियुक्त की सहमति के बिना उसका न तो नार्काे एनालिसिस टेस्ट हो सकता है और न ही ब्रेन मैपिंग।उस पर झूठ बताने वाली मशीन का भी इस्तेमाल नहीं हो सकता।
  अब इस बात पर विचार करने की भी जरूरत है कि इस आदेश के बाद जांच अधिकारियों  को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है।याद रहे कि 2010 के बाद जाने -माने कानून तोड़क अक्सर ऐसी जांच से साफ इनकार कर देते हैं।         
@मेरे इस लेख का संपादित अंश 10 नवंबर, 2017 के दैनिक जागरण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित@