सोमवार, 13 नवंबर 2017

विदेशी तो लुटेरे थे ही देसी का भी वही हाल !


जदयू के राज्य सभा सांसद और प्रभात खबर के पूर्व 
प्रधान संपादक हरिवंश ने काले धन को लेकर ‘प्रभात खबर’ में दो हिस्सों में सरल भाषा में महत्वपूर्ण बातें लिखी हैं।
 उसकी कुछ ही लाइनें यहां उधृत कर रहा हूं।
‘नोटबंदी के बाद जिन तीन लाख संदिग्ध कंपनियों के बारे में  पता चला था,जिनके  माध्यम से काले धन की लेनदेन की आशंका है, उनमें से दो लाख 20 हजार कंपनियों का रजिस्ट्रेशन रद किया जा चुका है।’
     ‘.......हमारे देश में एक कंपनी भी बंद करो  तो काले झंडों के जुलूस निकलते हैं।दो लाख से अधिक कंपनियां बंद की गयी।पर कोई समाचार नहीं आ रहा है।’
  ‘......शेल कंपनियों द्वारा निर्यात का फर्जी बिल बना कर विदेशों से भारत में पैसे लाए जाते हैं।ऐसी कंपनियां बनाने वालों में बड़े राज नेता और बड़े कारोबारी शामिल हैं।’
   कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आजादी के बाद से ही  हमारे अधिकतर हुक्मरानों ने इस देश को चारों -डकैतों के लिए अच्छा -खासा चारागाह बना कर रख दिया।
1985 में राजीव गांधी ने यूं ही नहीं , सौ पैसों में से 85 पैसे बीच में गायब कर दिए जाने की  बात नहीं उठाई थी।
  शेल कंपनियां ऐसी डकैती की बहुत बड़ी साधन रही है।इसकी गंभीरता का पता देश में कम ही लोगों को रहा है।
ऐसी सूचनाएं आम जनता की भाषा में देकर हरिवंश ने देश का कल्याण किया है।
  पर दूसरी ओर इसी तरह की भयंकर लूट
की खबर इन दिनों इंडियन एक्सप्रेस दे रहा है।उस पैराडाइज पेपर्स मामले की जांच इस देश की बहु एजेंसी समूह करेगा।
पैराडाइज के दस्तावेज के मुताबिक 714 भारतीय व्यक्तियों और इकाइयों ने भारत सरकार को  बताए बिना विदेश में निवेश किया है।
  अंग्रेजी नहीं जानने वाली जनता उन खबरों को विस्तार से नहीं जान-समझ  पा रही है।
प्रभाष जोशी आज होते तो  संभवतः वे जनहित में उसे पूरा का पूरा अनुवाद करा कर जनसत्ता में भी छापते।
यदि एक्सप्रेस को एतराज होता तो जनसत्ता में  एक दिन बाद ही छपता।एक दिन देर से ही सही, पर देश की अधिकतर आबादी यह जान तो पाती कि आजादी के बाद भी हमारे देश के साथ क्या-क्या होता रहा है।आजादी के पहले इस सोने की चिडि़या को जम कर लूटा ही गया था।
   
  




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