सोमवार, 19 मार्च 2018

 जे.बी.कृपलानी की आज पुण्य तिथि है।सन 1982 में इसी दिन उनका निधन हो गया।
यदि आप आज  की नयी पीढ़ी के किसी व्यक्ति से पूछेंगे कि कृपलानी जी कौन थे तो शायद वह नहीं बता सकेगा।
इसलिए  मैं  बता दूं कि  उस समय वही कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे जब देश आजाद हो रहा था।
पर 1951 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था।
उन्होंने किसान मजदूर प्रजा पार्टी बनाई।1952 के चुनाव के बाद  सोशलिस्ट पार्टी के साथ उसका विलय हो गया।नाम पड़ा प्रजा सोशलिस्ट पार्टी। 
 कृपलानी जी को लोग ‘दादा’ कहते थे।यह नाम उन्हें बिहार के ही एक क्रांतिकारी ने दिया था।
वह क्रांतिकारी राम विनोद सिंह, कृपलानी जी के छात्र थे।
सिंध में जन्मे कृपलानी बिहार के मुजफ्फर पुर के एल.एस. कालेज में शिक्षक थे।तब इस कालेज का नाम कुछ और था।
कृपलानी जी गांधी जी से प्रभावित होकर कांग्रेस में शामिल होने से पहले क्रांतिकारियों के साथ थे।
राम विनोद सिंह भी क्रांतिकारी जमात में थे।
राम विनोद सिंह, जो बाद में कांग्रेस के विधायक  बने, सारण जिले के मलखाचक के मूल निवासी थे।राम विनोद बाबू जब सख्त बीमार थे तो कृपलानी जी उनसे मिलने पटना आए थे।
 पर ऐसा ही व्यवहार तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने कृपलानी जी के साथ नहीं किया।अनेक लोगों को यह शिकायत रही कि कृपलानी जी का जब निधन हुआ था तो प्रधान मंत्री  विदेश यात्रा पर चली गयीं।उन्हें स्थगित कर देनी चाहिए थी।पर सवाल है कि जब डा.राजंद्र प्रसाद के निधन  के बाद जवाहर लाल नेहरू ने अपनी जय पुर यात्रा स्थगित नहीं की तो इंदिरा गांधी विदेश यात्रा कैसे स्थगित कर देतीं ! खैर जिसकी जो मर्जी !
बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष ने कृपलानी जी के निधन पर शोक प्रस्ताव रखना चाहा।पर उसकी मंजूरी नहीं मिली।विरोध में प्रतिपक्षी सदस्यों ने सदन से वाक आउट किया।
 कृपलानी जी ने आजादी के आंदोलन में सक्रिय सुचेता से 
प्रेम विवाह किया था।
कुछ कारणवश उनका प्रेम जब लंबा खिंचने लगा और शादी की कोई आहट नहीं आ रही  थी तो गांधी जी ने हस्तक्षेप करके शादी करवाई थी।सुचेता जी बाद में उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री बनीं।
कृपलानी जी के निधन के बाद मशहूर पत्रकार व विचारक राज किशोर ने ‘रविवार’ में लिखा था कि ‘कृपलानी जी की किसी से नहीं पटी क्योंकि वे झूठ और आडंबर से एक क्षण के लिए भी समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे।
वे अपनी वाणी का इस्तेमाल चाबुक की तरह करते थे।इसकी तनिक भी परवाह नहीं करते थे कि उनसे कौन आहत हो रहा है।लेकिन इसके पीछे उनका अहं या आत्म मुग्धता नहीं होती थी।वे सार्वजनिक जीवन में शुद्धि के लिए चिंतित रहते थे।’
 जय प्रकाश नारायण का अमृत महोत्सव पटना के गांधी मैदान में मनाया जा रहा था।मैं भी संवाददाता के रूप में शामिल था।
उसमें कृपलानी जी ने जो भाषण दिया ,वह सुनकर मुझे नया अनुभव हुआ।
 ऐसे अवसरों पर उस व्यक्ति का सिर्फ गुणगान ही किया जाता है जिसका अमृत महोत्सव मनाया जाता है।पर कृपलानी जी ने जेपी की उपस्थिति जेपी की कमियों की  भी विस्तार से चर्चा की थी।पर किसी ने उसे बुरा नहीं माना।
क्योंकि सब जानते थे कि ऐसे ही हैं कृपलानी जी।


शनिवार, 17 मार्च 2018

 1972 की बात है।कर्पूरी ठाकुर बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे।
विधान सभा भवन स्थित अपने आॅफिस के मुख्य टेबल पर उनके निजी सचिव व कर्पूरी जी के लिए दोपहर का खाना आया।
   निजी सचिव खाना खाकर पहले ही उठ गया।हाथ धोने बेसिन की ओर चला गया।
उसने जूठी थाली टेबल पर ही छोड़ दी।
कर्पूरी जी ने जब अपना खाना खत्म किया तो उन्होंने एक हाथ से अपनी और दूसरे हाथ से अपने निजी सचिव की थाली उठाई और कमरे के बाहर रख दिया।कर्पूर्री जी भी हाथ धोने चले गए।
बेसिन थोड़ा दूर था।
इस बीच निजी सचिव आ गया।वहां पहले से बैठे प्रणव चटर्जी ने निजी सचिव से पूछा, ‘आपको पता है कि आपकी थाली किसने उठाई ?’
निजी सचिव ने कहा कि दुर्गा ने उठाया होगा।दुर्गा कैंटीन का स्टाफ  था।
बक्सर के  पूर्व विधायक  प्रणव जी ने कहा कि ‘नहीं आपकी जूठी थाली खुद कर्पूरी जी उठाई और बाहर रखा।’
यह सुनकर  निजी सचिव शर्मिंदा हो गया। 
 यदि कर्पूरी जी की जगह कोई अन्य नेता, खास कर आज का कोई नेता होता तो उस स्थिति में वह क्या करता ?

चारा घोटालेबाजों  ने समिति की छपी रपट 
भी नहीं होने दी थी विधान सभा में पेश
         
 पशु पालन माफिया ने घोटाले से संबंधित निवेदन समिति की एक रपट को बिहार विधान सभा में पेश तक होने से भी रोक दिया था।
उस पर कोर्रवाई की बात कौन कहे !
यह अस्सी के दशक की बात है।उस छपी रपट में पशु पालन घोटाले का विस्तृत ब्योरा था।
  समिति ने अपनी रपट में मामले की जांच सी.बी.आई.से कराने की जरूरत बताई  थी।
 याद रहे कि अस्सी के दशक में बिहार में कांग्रेस की सरकार थी।
लालू प्रसाद ने 1990 में मुख्य मंत्री पद संभाला।उसके बाद तो घोटालेबाजों ने सारी सीमाएं तोड़ दी।
  संभवतः इस देश के लोकतांत्रिक इतिहास की यह पहली घटना होगी कि छपी रपट को पेश होने से रोक दिया जाए।
विधान सभा की किसी समिति की रपट का प्रकाशन  स्पीकर के लिखित आदेश के बाद होता है।निवेदन समिति की रपट को छापने का आदेश तत्कालीन स्पीकर ने दे दिया था।
रपट छप भी गयी।
पर जब उसे सदन में पेश करने का अवसर आया तो पशु पालन माफियाओं ने उसे पेश ही नहीं होने दिया।
 राम लखन सिंह यादव के सभापतित्व वाली उस समिति ने स्थल निरीक्षण करके हजारों संबंधित  लोगों से बात की थी।रपट में यह लिखा गया कि किस तरह पशुपालन विभाग के पैसों की लूट मची है और किस तरह की उच्चस्तरीय साठगांठ चल रही है।
  रपट में सी.बी.आई.से जांच कराने की जरूरत महसूस की गयी।
याद रहे कि समितियों की रपट सदन में पेश होने के बाद उस रपट पर सदन की मुहर लग जाती है।
 उसके बाद अब सरकार की जिम्मेदारी होती है कि उस रपट की सिफारिश पर आगे क्या कार्रवार्र्ई करती है।
पर वह रपट तो पेश ही नहीं हुई।
पर उसकी एक काॅपी इन पंक्तियों के लेखक के पास जरूर आ गयी थी।कुछ अन्य पत्रकारों को भी मिली थी।
 उस रपट के बारे में निवेदन समिति के सभापति राम लखन सिंह यादव ने कहा था कि ‘रपट मैंने बहुत कठिनाइयों के बाद छपवायी थी।
 बहुत टाल मटोल के बाद मेरे आग्रह पर रपट को विधान सभा के  कार्यक्रम में रखना तय हुआ था।’राम लखन सिंह यादव बाद में केंद्र में मंत्री भी हुए थे।
सी.बी.आई. ने 1996 में जब चारा घोटाले की जांच शुरू की तो उसने विधान सभा सचिवालय से उस रपट के बारे में जानकारी लेनी चाही।
 उसे पता चला कि उस रपट की काॅपी गायब है।
 जिस संबंधित बैठक में उस रपट को सदन में पेश नहीं करने का निर्णय हुआ था,उस बैठक कार्यवाही पुस्तिका भी विधान सभा सचिवालय से गायब कर दी गयी थी।
 तब  पूरे विधान सभा सचिवालय पर  माफियाओं के  असर की चर्चा राजनीतिक व मीडिया सर्किल में होती रहती थी।
 1985 से मार्च, 1989 तक प्रो.शिवचंद्र झा बिहार विधान सभा के स्पीकर थे।प्रो.झा ने इस संबंध में बताया था कि ‘लंबे समय से पशु पालन विभाग के संबंध में कोई विधायक प्रश्न नहीं पूछते थे।
पूछते भी थे तो उनका सवाल सदन में नहीं आ पाता था।
इस पृष्ठभूमि में एक विधायक नवल किशोर शाही ने पशुपालन विभाग में भ्रष्टाचार से संबंधित 19 जुलाई 1985 को एक निवेदन प्रस्तुत किया।
उसे मैंने स्वीकृत किया और वह मामला निवेदन समिति को जांच के लिए सौंप दिया गया।
पर उस रपट के सदन में पेश होने से पहले ही मैंने स्पीकर पद से इस्तीफा दे दिया।
मैं नहीं जानता कि उस रपट का क्या हश्र हुआ।जितनी मेरी जानकारी है,उसके अनुसार वह रपट सदन में पेश नहीं की गयी।’  
   माफियाओं का विधान सभा सचिवालय पर असर का एक दूसरा उदाहरण नब्बे के दशक में सामने आया।
एक पत्र के जवाब में 1996 के जून में विधान सभा सचिवालय ने सी.बी.आई.को लिखा कि 
1990 से 1995 तक बिहार विधान सभा में पशुपालन विभाग से संबंधित एक भी सवाल सदन में नहीं पूछा गया।संसदीय इतिहास की यह एक अनोखी घटना थी।
  राजनीतिक हलकों में अलग से इस बात की चर्चा होती रहती थी कि जैसे ही कोई विधायक पशु पालन विभाग से संबंधित कोई सवाल विधान सभा सचिवालय में जमा करता था, उसकी खबर संबंधित पशुपलान माफिया को लग जाती थी।
  पशुपालन माफिया संबंधित विधायक से अलग से मिल लेता था।
विधायक ‘संतुष्ट’ हो जाता था।
इसलिए प्रश्न के सदन तक पहुंचने की नौबत ही नहीं आती थी।
बिहार विधान सभा की लोक लेखा समिति के पूर्व सभापति डा.जगदीश शर्मा को चारा घोटाले में दोषी ठहराते हुए रांची की सी.बी.आई. की विशेष अदालत ने हाल में सात साल की सजा दी है।
नब्बे के दशक में डा.शर्मा जब सभापति थे तो उन्होंने मुख्य मंत्री को एक पत्र लिखा था।चारा घोटालेबाजों को लाभ पहुंचाने के लिए शर्मा ने लिखा कि सरकार की कोई एजेंसी पशु पालन विभाग पर  घोटाले के आरोपों की जांच नहीं करेगी।उसकी जांच हमारी लोक लेखा समिति करेगी।
 ऐसा पत्र लिख कर उन्होंने निगरानी जांच रोकवायी और खुद भी जांच नहीं की।मामला को लटकाए रखा।
बाद में पता चला कि डा.शर्मा ने ऐसी चिट्ठी स्पीकर की अनुमति के बिना ही मुख्य मंत्री को लिखी थी।

  


 यदि सपा और बसपा मिल कर चुनाव लड़ेंगी तो 2019 में
उत्तर प्रदेश में लोक सभा की 80 में से सिर्फ 23 सीटें ही भाजपा को मिल पाएंगी।
हाल के उप चुनावों का यही संदेश है।
 चुनावी आंकड़ों के गहन विश्लेषण से यही तस्वीर बनती है।
पर, बिहार के हाल के उप चुनावों ने यह संकेत दिया है कि यह राज्य 2019 में राजग को खुश कर सकता है।
 ऊपर से  देखने से तो यही लगता है कि बिहार की तीन सीटों में से दो सीटों पर राजद को जीत मिली है।
पर विधान सभा क्षेत्रवार विश्लेषण से दूसरी ही तस्वीर सामने आती है।
बिहार में अररिया लोक सभा और जहानाबाद तथा भभुआ विधान सभा क्षेत्रों में उप चुनाव हुए थे।इन क्षेत्रों में पिछली बार जिस दल को सफलता मिली थी,उन्हीें दलों को इस बार भी मिली।
अररिया लोक सभा क्षेत्र के नीचे पड़ने वाले छह विधान सभा 
क्षेत्रों में से इस उप चुनाव में चार में राजद हार गया है।
दो मुस्लिम बहुल क्षेत्रों यानी अररिया और जोकी हाट में राजद को इतने अधिक वोट मिल गए  कि राजद उम्मीदवार लोक  सभा पहुंच गया।वहां आक्रामक वोटिंग हुईं।
 याद रहे अररिया विधान सभा क्षेत्र में  मुस्लिम आबादी 59 प्रतिशत और जोकी हाट में 70 प्रतिशत है।
 यानी बिहार के जिन चुनाव क्षेत्रों में यादव -मुस्लिम की मिली -जुली आबादी निर्णायक  है,वहां से राजद को अब भी उम्मीद बनी हुई है।
याद रहे कि भभुआ विधान सभा  क्षेत्र में भाजपा को पिछली बार की अपेक्षा इस उप चुनाव में अधिक वोट मिले हैं।भाजपा उम्मीदवार की जीत हुई है।उधर जहानाबाद व अररिया में राजद विजयी रहा।
यानी यदि हाल के उप चुनावों को विधान सभा चुनाव क्षेत्रों की दृष्टि से देखें तो बिहार की इन आठ विधान सभा सीटों में से पांच में राजग की जीत हुई है।
 पर ,उत्तर प्रदेश में राजग के बारे में फिलहाल यही कहा जा सकता है कि ‘गईल गईया पानी’ में ।
  अब नरेंद्र मोदी तो इंदिरा गांधी हैं नहीं जो 1969 की तरह रौद्र रूप दिखाएंगे ! इंदिरा गांधी ने तब बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर के और राजाओं के प्रिवी पर्स-विशेषाधिकर समाप्त करके पांसा पलट दिया था।वैसे भी न तो मोदी जी, इंदिरा जी की तरह एकाधिकारवादी हैं और न ही भाजपा पर नरेंद्र मोदी वैसा वर्चस्व है जैसा इंदिरा जी का अपनी पार्टी पर था।
वैसे आज भी बैंक-प्रिवी पर्स जैसे करने को तो इस देश में कई काम बाकी हैं।

पूर्व मुख्य मंत्री अखिलेश यादव ने हाल में कहा  कि परीक्षा में थोड़ा बहुत पूछ लेना नकल नहीं।
योगी सरकार के नकल विरोधी अभियान की आलोचना करते हुए अखिलेश ने यह भी कहा कि ‘90 प्रतिशत लोगों ने अपने छात्र जीवन में परीक्षा में थोड़ी -बहुत पूछताछ की होगी।मैंने भी की है।’
 इस बयान के बाद यह सवाल उठता है कि क्या फूल पुर-गोरख पुर लोस उप चंुनाव पर भी सरकार के नकल विरोधी कदमों का असर पड़ा है ?क्या  भाजपा उम्मीदवारों की हार का यह भी एक कारण रहा ?
1992 में कल्याण सिंह सरकार ने  नकल विरोधी कानून बनाया था।कानून बहुत कड़ा था।
मुलायम सिंह यादव ने 1993 के  उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया।
उसका चुनावी लाभ भी सपा को मिला।कल्याण सिंह की पार्टी सत्ता से बाहर हो गयी।
इन दिनों पूरे देश में नकल माफिया सक्रिय हैं।इससे प्रतिभाओं का बड़े पैमाने पर हनन हो रहा है।
फिर भी देश की अधिकतर सरकारें कारगर कार्रवाई नहीं कर पा रही हैं।
क्योंकि उन्हें चुनाव हारने का डर है।
कहां जा रहा है अपना देश ? ़ 

 रक्षा मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति ने कहा है कि
बजट प्रावधान सेना की जरूरतों के अनुपात में बहुत कम है।
यह भी खबर आई है कि चीन सीमा तक रेल लाइन बनाने के लिए भी अपनी सरकार के पास धन की कमी है।
 केंद्र सरकार संसाधनों की कमी का रोना रोती रहती है।
जानकार लोग बताते हैं कि इस देश में सरकारी साठगांठ से  टैक्स की भारी चोरी के कारण भी संसाधनों की कमी रहती है। 
इस स्थिति में देश की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहने वाले नागरिकों से यह उम्मीद की जाती है कि  वे अपने आसपास के टैक्स चोरों के बारे में  सूचना सरकार व संबंधी एजेंसियों को  दें ताकि देश की सुरक्षा के पोख्ता प्रबंध के लिए पैसों की कमी नहीं रहे।
 इंदिरा गांधी के शासन काल में युवा तुर्क कांग्रेसी सांसद चंद्र शेखर ने सरकार को ऐसी सूचना दी थी।इसके बदले चंद्र शेखर जी को केंद्र सरकार ने नकद इनाम भी दिया था।  
  


शुक्रवार, 16 मार्च 2018

2019 के लिए गठबंधन के दलों के बीच सीटों के बंटवारे की चुनौती


राजग और महा गठबंधन अपने घटक दलों के बीच सीटों का बंटवारा किस अनुपात में करेंगे ? यह एक बड़ा सवाल है।
याद रहे कि अगले लोक सभा चुनाव को लेकर करीब एक साल पहले से ही राजनीतिक दल तरह -तरह की तैयारियां शुरू कर देते हैं। बिहार में लोक सभा की कुल 40 सीटें हैं।
 राजग के चार घटक दल हैं।
भाजपा, जदयू, लोजपा और उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाली आर.एस.एल.पी।
उधर राजद के साथ कांग्रेस और कुछ अन्य छोटे दल हैं।
जीतन राम मांझी और शरद यादव जैसे प्रमुख नेता भी राजद के साथ हैं।
अब लालू प्रसाद पर यह निर्भर करेगा कि वे एन.सी.पी.,बसपा तथा कम्युनिस्ट दलों को भी साथ लेते हैं या नहीं।
   वैसे पता नहीं चला है कि गत साल राजग में एक बार फिर शामिल होने के समय इस मुद्दे पर  भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से नीतीश कुमार की कोई बातचीत हुई है या नहीं।
पर उम्मीद की जाती है कि इन दो दलों के शीर्ष नेतृत्व आपस में बात कर किसी नतीजे पर पहुंच जाएंगे।
पर असल समस्या लोजपा और आर.एस.एल.पी.के साथ हो सकती है।
 2014 के लोस चुनाव के समय  राजग में जदयू नहीं था।
भाजपा ने लोजपा  के लिए सात और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के लिए तीन  सीटें छोड़ी थीं।
भाजपा ने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा था।
राजग को कुल 31 सीटें जीती थीं।
पर 2009 के लोक सभा चुनाव में भाजपा ने 15 और जदयू ने 25 सीटों पर लड़कर कुल 32 सीटें हासिल की थी।
2015 के विधान सभा चुनाव में राजद और जदयू ने आधी -आधी सीटें आपस में बांट ली थी।
इससे जदयू के महत्व का पता चलता है।
अब अगली बार ये चार दल सीटों का किस अनुपात में बंटवारा करेंगे,यह देखना दिलचस्प होगा।
 कई बार टिकट के बंटवारे के सवाल पर भी  गठबंधनों का स्वरूप  बनने और बिगड़ने लगता है।
  चूंकि महा गठबंधन के पास लोक सभा की सीटें पहले से बहुत कम हैं, इसलिए वे आपसी बंटवारे मंे लचीलापन अपनाने की स्थिति हैं।
पर सब कुछ राजद की उदारता पर निर्भर करता है।
यह काम आसान नहीं है।
    सी.पी.आई.को भी मिला था
    संवेदना वोट का लाभ----
1972 के बिहार विधान सभा चुनाव में दक्षिण बिहार के राम गढ़ क्षेत्र से सी.पी.आई.के मजरूल हसन खान ने चुनाव जीता था।
पर चुनाव के तत्काल बाद उनकी हत्या कर दी गयी थी।
उप चुनाव हुआ तो सी.पी.आई.ने उनकी पत्नी शहीदुन  निशा को वहां से उम्मीदवार बना दिया।
वह विजयी रहीं।कम्युनिस्ट पार्टियां आम तौर पर परिवारवाद में विश्वास नहीं करती हैं।इसके बावजूद यदि उसने दिवंगत की विधवा को खड़ा कराया तो इसलिए ताकि सीट जीतने में कोई दिक्कत नहीं हो।
पार्टी के जन समर्थन के साथ- साथ संवेदना-सहानुभति वोट का लाभ भी शहीेदुन निशा को मिला था।
   बिहार में हुए हाल के उप चुनावों में राजद और भाजपा उम्मीदवारों को यदि संवेदना-सहानुभूति का भी चुनावी लाभ मिला तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं।
कदाचार रोकने का भी चुनाव पर असर---
पूर्व मुख्य मंत्री अखिलेश यादव ने हाल में कहा है कि परीक्षा में थोड़ा बहुत पूछ लेना नकल नहीं।
योगी सरकार के नकल विरोधी अभियान की आलोचना करते हुए अखिलेश ने यह भी कहा कि ‘90 प्रतिशत लोगों ने अपने छात्र जीवन में परीक्षा में थोड़ी -बहुत पूछताछ की होगी।मैंने भी की है।’
 इस बयान के बाद यह सवाल उठता है कि क्या फूल पुर-गोरख पुर उप चंुनाव पर भी नकल विरोधी कदमों का असर पड़ा है ? भाजपा उम्मीदवारों की हार का यह भी एक कारण रहा ?
1992 में कल्याण सिंह सरकार ने  नकल विरोधी कानून बनाया था।कानून बहुत कड़ा था।
मुलायम सिंह यादव ने 1993 में उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया।
उसका चुनावी लाभ भी सपा को मिला।कल्याण सिंह की पार्टी सत्ता से बाहर हो गयी।
इन दिनों पूरे देश में नकल माफिया सक्रिय हैं।इससे प्रतिभाओं का बड़े पैमाने पर हनन हो रहा है।
फिर भी सरकारें कारगर कार्रवाई नहीं कर पा रही हैं।
क्योंकि उन्हें चुनाव हारने का डर है।
कहां जा रहा है अपना देश ? ़ 
पश्चिम बंगाल की सराहनीय पहल--- 
प्रश्न पत्रों को  लीक किए जाने से रोकने के लिए पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने एक खास उपाय किया है।
प्रश्न पत्रों के सीलबंद पैकेट्स के स्टिकर पर माइक्रो चीप लगा दिए जाएंगे।
उस माइक्रो चीप का संबंध परीक्षा बोर्ड आफिस के सर्वर से होगा।
जैसे ही सील को तोड़ा जाएगा ,उसकी सूचना तत्क्षण बोर्ड आफिस को मिल जाएगी।
देखना है कि नकल माफिया इस उपाय की कैसी काट निकालते हंै !पर है यह नायाब उपाय ! 
1989 से पहले के कागजी सबूतों अनुपलब्ध----
जुलाई, 1997 में चारा घोटाले की जांच कर रही सी.बी.आई.के सूत्रों ने बताया था कि 1989 से पहले के घोटाले की जांच इसलिए नहीं हुई क्योंकि उस अवधि के तत्संबंधी सरकारी दस्तावेज आसानी से उपलब्ध नहीं थे।
कुल घोटाले का 80 प्रतिशत घोटाला 1989 और उसके  बाद के वर्षों में हुआ।इस अवधि के  आरोपी और कागजात आसानी से उपलब्ध थे।
1977 और 1989 के बीच की अवधि के घोटालों के कागजात व आरोपियों की तलाश में काफी समय लग सकते थे।साथ ही यह भी आशंका थी कि पता नहीं कि ंिफर भी वे मिलेंगे या नहीं।
सी.बी.आई.सूत्रों ने तब यह भी बताया था कि चारा घोटाले के मुख्य आरोपित डा.श्याम बिहारी सिंहा ने अन्य बातों के अलावा यह भी बताया था कि बिहार के एक पत्रकार को उसने 50 लाख और दूसरे को दस लाख रुपए दिए थे।पर इस लेनदेन का सबूत उपलब्ध नहीं था।यह भी नहीं कि उन लोगों ने इस रुपए के बदले घोटालेबाजों को किस तरह और क्या लाभ पहंुचाया।
 एक भूली बिसरी याद---
  सर्वोदय नेता जय प्रकाश नारायण 
ने 1973 में अपने निजी आय-व्यय 
का विवरण प्रकाशित किया था।वह विवरण साप्ताहिक पत्रिका ‘एवरीमेन’ में छपा था।
जेपी के अनुसार रैमन मैगसेसे पुरस्कार के साठ हजार रुपए 
बैंक में जमा हैं।उसके सूद से मेरा खर्च चलता है।
इसके अलावा सिताब दियारा की अपनी जमीन की पैदावार  काम आती है।
फर्नीचर मुझे मेरे मित्र डा.ज्ञान चंद ने दिया है।
बाहर आने -जाने और कपड़ों का खर्च मेरे कुछ मित्र दे दिया करते हैं।
दरअसल तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की एक टिप्पणी के जवाब में जेपी ने अपने खर्चे का विवरण प्रकाशित किया था।
इंदिरा जी ने कहा था कि ‘जो लोग अमीरों से पैसे लेते हैं,उन्हें भ्रष्टाचार के बारे मंे बात करने का कोई अधिकार नहीं।’
 इस पर जेपी ने यह भी लिखा  था कि ‘अपना पूरा समय समाज सेवा में लगाने वाला ऐसा कार्यकत्र्ता जिसकी आय का अपना कोई स्त्रोत न हो ,अपने साधन संपन्न करीबी  मित्रों की मदद के बिना काम नहीं कर सकता।अगर इंदिरा जी के मापदंड सब जगह लगाए जाएं तो गांधी जी सबसे भ्रष्ट व्यक्ति निकलेंगे क्योंकि उनके तो पूरे दल की सहायता उनके अमीर प्रशंसक ही करते थे।’  
     और अंत में---
रक्षा मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति ने कहा है कि
बजट प्रावधान सेना की जरूरतों के अनुपात में बहुत कम है।
उधर केंद्र सरकार संसाधनों की कमी का रोना रोती रहती है।
जानकार लोग बताते हैं कि इस देश में  टैक्स की भारी चोरी के कारण संसाधनों की कमी रहती है। 
इस स्थिति में देश की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहने वाले नागरिकों से यह उम्मीद की जाती है कि  वे अपने आसपास के टैक्स चोरों के बारे में  सूचना सरकार व संबंधी एजेंसियों को  दे ताकि देश की सुरक्षा के पोख्ता प्रबंध के लिए पैसों की कमी नहीं रहे।
@कानोंकान-प्रभात खबर-बिहार-16 मार्च 2018@