शनिवार, 5 मई 2018

आज भी याद आते हैं ‘फिरंगिया’ के लेखक प्रिंसिपल मनोरंजन बाबू

मैंने जब छपरा के राजेंद्र काॅलेज में अपना नाम लिखवाया, उससे करीब तीन या चार साल पहले ही मनोरंजन बाबू उस काॅलेज के प्राचार्य पद से रिटायर हो चुके थे। पर बाद में भी  कालेज में अक्सर उनका नाम बहुत आदर से लिया जाता था। कोई उनके एक गुण की चर्चा करता तो कोई उनकी  दूसरी  उपलब्धियों की।उनकी मशहूर रचना ‘फिरंगिया’ तो अनेक लोगों की जुबान पर थीं।

वे मूलतः अंग्रेजी के शिक्षक थे, पर वे भोजपुरी बहुत सहजता से बोलते-लिखते थे। फिरंगिया भोजपुरी में ही है। एक बार कालेज परिसर में  कुछ छात्र किसी बात पर शोर कर रहे थे। मनोरंजन बाबू उनके पास गए। उन्होंने छात्रों से भी कविता में बात कर  ली।
‘ हड़बड़ कइले, गड़गड़ होई, बढ़-चढ़ बात करे ना कोई !’
इस पर वे हंसते हुए अपने -अपने क्लास में चले गए।
दरअसल उनकी नैतिक धाक का कमाल था।

मनोरंजन बाबू ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में  एम.ए. अंग्रेजी में टाॅप किया था। मदन मोहन मालवीय  उन्हें बी.एच.यू. में ले गए। वहां कुछ दिनों तक उन्होंने अंग्रेजी पढ़ाई। बाद में राजेंद्र कालेज में प्राचार्य होकर आ गए।
असहयोग आंदोलन के समय मनोरंजन बाबू ने ‘फिरंगिया’ नाम से  देशभक्ति का गीत लिखा।बाद में वह गीत स्वतंत्रता सेनानियों की जुबान पर था।

एक शिक्षक,एक प्रशासक व एक साहित्यकार के रूप में उन्होंने अपना एक विशेष स्थान बनाया था। हालांकि उनके प्रशंसकों को यह अफसोस रहा कि उन्होंने अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों में व्यस्त रहने के कारण अधिक लेखन नहीं किया। जबकि उनमें लेखन प्रतिभा अद्भुत थी। हालांकि  उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखी थीं।
1942 में वे बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के मोतिहारी अधिवेशन के अध्यक्ष हुए थे। 

 वैसे राजेंद्र काॅलेज को एक बेहतर काॅलेज बनाने में उनका योगदान अतुलनीय रहा। उन दिनों भी बिहार में ऐसे कम ही काॅलेज थे जहां आर्ट, साइंस और काॅमर्स तीनों की पढ़ाई होती थी। राजेंद्र कालेज में भी ऐसा था।
राजेंद्र काॅलेज के विस्तृत परिसर और बड़े -बड़े क्लास रूम और समृद्ध प्रयोगशालाओं को तो मैंने एक छात्र के रूप में खुद भी देखा और उपयोग किया था। 

 मुझे भी इस बात का अफसोस रहा कि मैं उन्हें वहां काम करते नहीं देख सका था। पर उनके नाम की सुगंध तब भी मौजूद थी। फिलहाल देश प्रेम जगाने वाली उनकी ऐतिहासिक रचना ‘फिरंगिया’ यहां प्रस्तुत है।
संभव है कि मुझसे उसकी एक- दो पंक्तियां छूट गयी हों।--

      --फिरंगिया--
 सुन्दर सुघर भूमि भारत के रहे रामा,
आज उहे भइल मलीन रे फिरंगिया।
अन्न-धन-जन -बल बुद्धि सब नास भइल,
कवनो  के ना रहल निसान रे फिरंगिया।
----
जहवां थोड़े ही दिन पहिले होत रहे,
लाखों मन गल्ला और धान रे फिरंगिया।
उंहवे पर आज रामा मथवा पर हाथ धके,
बिलखी के रोवे ला, किसान रे फिरंगिया।
------
घिउवा आ दूधवा के नदिया बहत जहां,
उहवां बहेला रक्तधार रे फिरंगिया।
जहवां के लोग सब खात ना अघात रहे,
रुपया से रहे मालामाल रे फिरंगिया।

उहें आज जेने जेने अखियां घुमा के देखीं,

तेने तेने देखबे कंगाल रे फिरंगिया।
हमनी के पसु से रे हालत खराब कइले,
पेटवा के बल रेंगवउले रे फिरंगिया।
-----
एको जो रोऊवा निरदोसिया के कलपी ते,
तोर नास होई जाई सुन रे फिरंगिया।
दुखिया के आह तोर देहिया के भसम कै देई,
जरि भुनि होई जइबे रे फिरंगिया।
----
स्वाधीनता हमनी के नामो के रहल नाहीं,
अइसन कानून के बा जाल रे फिरंगिया।
प्रेस एैक्ट, आर्म्स ऐक्ट, इंडिया डिफेंस एैक्ट,
सब मिली कइलस ई हाल रे फिरंगिया।
-----
भारत के छाती पर भारत के बचपन के,
बहल रक्तवा के धार रे फिरंगिया।
घरे लोग भूख मरे गेहुंआ विदेस जाए,
कइसन बा विधि के विधान रे फिरंगिया।
-----
मरदानापन अब तनिको रहल नाहीं,
ठकुरसुहाती बोले रे फिरंगिया।
रात दिन करेले खुसामद सहेबवा के,
सहेले विदेसिया के लात रे फिरंगिया।
-------
चेति जाउ,चेति जाउ भैया रे फिरंगिया तें,
छोड़ दे अधरम के पंथ रे फिरंगिया।
छोड़ के कुनीतियां सुनीतिया के बांह गहु,
भला तोर करी भगवान रे फिरंगिया।
------ 

 मेरी राय है कि हिमाचल प्रदेश की दिवंगत सरकारी अफसर  शैल बाला शर्मा की सार्वजनिक स्थान में मूत्र्ति लगायी जानी चाहिए।हमने इस देश में न जाने कितने कानून तोड़कों की मूत्र्तियां लगा रखी हैंं।क्योंकि वे राजनीति में थे।हालांकि मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जिनकी भी मूत्र्तियां लगी हैं,वे सब के सब कानून तोड़क ही थे । 
एक कानून पालक अफसर की भी तो मूत्र्ति लग जाए।
हिमाचल प्रदेश के कसौली में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने की कोशिश करते समय एक कानून तोड़क ने हाल में शैल बाला की गोली मार कर हत्या कर दी।
शैल बाला सहायक टाउन प्लानर के पद पर तैनात थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने होटल मालिक द्वारा किए गए अवैध निर्माण को हटाने का आदेश दिया था।शर्मा उस आदेश के पालन की कोशिश कर रही थीं।
  इस देश में अवैध निर्माण को आम तौर पर देर-सवेर नियमित कर दिया जाता है।दिल्ली में यह खूब होता है।
लगभग पूरे देश में अवैध निर्माण व अतिक्रमण को घूस लेकर संबंधित सरकारी कर्मी नजरअंदाज करते रहते हैं।
कसौली के हत्यारा होटल मालिक विजय सिंह ठाकुर ने भी यही समझा था कि रिश्वत के बल पर वह अपने अवैध निर्माण को आज या कल  नियमित करवा ही लेगा।
पर जब शैल बाला ने उससे रिश्वत लेने से इनकार कर दिया तो उसे गोली खानी पड़ी।
  इस देश की कुछ सबसे बड़ी समस्याओं में एक समस्या यह भी है कि यहां कानून के शासन का ताकतवर लोग खुलेआम मजाक उड़ाते रहते हैं।
अवैध निर्माणों को किसी भी हालत में कहीं भी नियमित नहीं किया जाएगा,इस आशय का एक अत्यंत कड़ा कानून बनना चाहिए।मेरी राय है कि उस कानून का नाम शैल बाला के नाम पर रखा जाना चाहिए।
    

शुक्रवार, 4 मई 2018

----पर्यावरण शिक्षा पर सुप्रीम कोर्ट की बात कब मानंेगी सरकारंे--


देश में बढ़ते प्रदूषण और बिगड़ते पर्यावरण संतुलन की डरावनी खबरों के बीच सुप्रीम कोर्ट का एक निदेश बार -बार याद आता है।
  वह निदेश 22 नवंबर, 1991 का है।
एम.सी.मेहता की जनहित याचिका पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने निदेश दिया था कि प्राथमिक से लेकर विश्व विद्यालय स्तर पर पर्यावरण विज्ञान की पढ़ाई पृथक और अनिवार्य विषय के रूप में शुरू कराई जाए।पर इस निदेश का पालन  आंशिक रूप से ही हो सका है। 
  इस निदेश की मंशा यह थी कि कम से कम इससे नयी पीढि़यां तो पर्यावरण को लेकर जागरूक होंगी।
मौजूदा और पिछली पीढि़यों ने तो पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ने के लिए जो कुछ  किए हैं,उसके कुपरिणाम तो हम भुगत ही रहे हैं।अभी और भुगतेंगे।
  पर 1991 के बाद संभवतः इस देश की किसी भी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक निर्णय-निदेश को अक्षरशः लागू नहीं होने दिया।किसी ने आरोप लगाया था कि इसके पीछे ‘भूगोल लाॅबी’ सक्रिय रही है।
जहां- तहां लागूू हुआ भी तो वह रस्म अदायगी के लिए ही।
गत साल मार्च में भी केंद्र सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि देश के 306 विश्व विद्यालयों ने अब तक 
सुप्रीम कोर्ट के निदेश का पालन नहीं किया है।
प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा तो राज्य सरकारों के हाथों में है।
 याद रहे कि  कुछ सरकारों व शिक्षण संस्थानों ने पर्यावरण विषय को किसी अन्य विषय के साथ मिलाकर अपने कत्र्तव्यों की इतिश्री कर ली है।
 हालांकि सुप्रीम कोर्ट का निदेश पृथक व अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाने के लिए है।
जहां भी पर्यावरण विज्ञान की अलग से पढ़ाई होती है ,वहां के छात्रों की इस मामले में जागरूकता देखते ही बनती है।
वैसे छात्र अपने घरों में भी भरसक वैसा माहौल बनाते हैं।
 कल  यह खबर आई कि विश्व के टाॅप 10 प्रदूषित शहरों में पटना सहित बिहार के तीन शहर शामिल हैं ।स्वाभाविक ही है कि उस पर राज्य के नगर विकास मंत्री सुरेश शर्मा ने कहा कि इस मामले में पब्लिक को भी सचेत होना चाहिए।
 पर सचेत होने के पहले उसे समस्या को लेकर जागरूक भी तो होना होगा।यदि छात्र-छात्राओं को इस विषय को अनिवार्य व पृथक विषय के रूप में पढ़ाया जाए तो उन विद्यार्थियों के परिजनों  को भी जागरूक करने में मदद मिलेगी।
आज की पीढ़ी तो कम ही जागरूक है।यदि शैक्षणिक संस्थाओं में पर्यावरण की पढ़ाई  होगी तो अगली पीढि़यां भी सचेत होंगी और जागरूक भी । 
--लिंक रोड का चैड़ीकरण--
बिहार की एक ऐसी ग्रामीण सड़क को मैं जानता हूं जो सिर्फ चार किलोमीटर लंबी है,पर वह दो महत्वपूर्ण नेशनल हाईवे को जोड़ती हैं।
यदि इस ग्रामीण सड़क को राष्ट्रीय राज मार्ग का दर्जा मिल जाए पर आसपास के हजारों लोगों का आना -जाना आसान हो जाएगा।साथ ही इससे कई अन्य जगहों को जाम से  मुक्ति मिल सकती है।
  राज्य में ऐसी अन्य छोटी सड़कंे ंभी होंगी जिन पर कम ही खर्च करके उसका अधिक लाभ लिया जा सकता है।
कहीं ऐसी छोटी सड़कें दो स्टेट हाईवे को जोड़ रही हैं तो कहीं दो नेशनल हाईवे को। 
---कर्नाटका चुनाव में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं--
कर्नाटका के पूर्व लोकायुक्त एन.संतोष हेगडे ने कहा है कि कर्नाटका के विधान सभा चुनाव में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं है।
सन  2011 में अवैध खनन के खिलाफ तत्कालीन लोकायुक्त हेगडे ने एक महत्वपूर्ण रपट दी थी।तब कर्नाटका में भाजपा की सरकार थी।सन 2013 के कर्नाटका विधान सभा चुनाव में उसका असर पड़ा।भाजपा सरकार को हरा कर कांग्रेस सत्ता में आ गयी।कांग्रेस ने चुनाव में उस रपट को खूब भुनाया।
पर हेगडे के अनुसार कांग्रेस की कर्नाटका सरकार ने अवैध खनन करने वालों के खिलाफ गत पांच साल में कोई कार्रवाई नहीं की।
इस चुनाव में तो अवैध खनन से जुड़े सात लोगों को भाजपा ने अपने दल का उम्मीदवार बना दिया है।कांग्रेस ने भी ऐसे दो लोगों को टिकट दिए हैं।हेगडे कहते हैं कि राजनीतिक दल सत्ता में आने के लिए कोई भी आश्वासन दे देंगे और सत्ता में बने रहने के लिए कुछ भी करंेगे।
---स्मार्ट फोन ने घटाया परिजनों के बीच संवाद--
मानो ईमेल व मोबाइल फोन काफी नहीं थे,अब तो स्मार्ट फोन 
परिवार के भीतर व परिवारों के बीच रहे -सहे संवाद पर भी डाका डाल रहे हैं। 
 फिल्म अभिनेता अनुपम खेर कहते हैं कि सूचना और संवाद के नये उपकरणों का प्रचलन बढ़ने के बाद समाज और परिवार में संवादहीनता लगातार बढ़ती जा रही है।यह स्थिति चिंताजनक है।
  खेर  क्या कहेंगे,अनेक लोग यह महसूस रहे हैं।कोई किसी से मिलने उसके जाता भी है तो अपने साथ स्मार्ट फोन की ‘लत’ भी लेते जाता है।हाल चाल सुख -दुःख पूछने की जगह अतिथि व कई मामलों में तो मेजबान  की अंगुलियां भी स्मार्ट फोन पर व्यस्त हो जाती हैं।
  कुछ संवेदनशील लोग इस ‘विषम’ होती  स्थिति में एक पहल कर सकते हैं।किसी मित्र,परिचित,रिश्तेदार के यहां आप जाएं तो स्मार्ट फोन अपने घर में ही छोड़ जाएं।
या फिर मेजबान  के घर के बाहर ही अपनी कार या स्कूटर में छोड़ दें।
फिर देखिए आप कैसा फर्क आप महसूस करते हैं !
   ---भूली-बिसरी याद--
आजादी के कुछ ही वर्षों के बाद पंजाब के खेतों में सिंचाई का
प्रबंध तब की कांग्रेसी सरकार ने कर दिया था। यानी किसानों की सबसे बड़ी समस्या का समाधान हो चुका था।
इस स्थिति में गैर कांग्रेसी दलों के नेताओं के सामने एक बड़ी कठिनाई थी।आखिर चुनावों में वे क्या कह कर कांग्रेस के खिलाफ किसानों को गोलबंद करें और वोट लें !
 समस्या तो बड़ी थी। फिर भी एक -दो नेताओं ने रास्ता निकाल ही लिया।
साठ-सत्तर के दशकों में एक नेता अक्सर किसानों की सभाओं में एक खास बात कहते थे।
वे कहा करते थे कि यह कांग्रेस सरकार आपके खेतों में जो पानी भेजती है,उसकी  तो सारी बिजली पहले ही निकाल लेती है।इसीलिए तो आपकी फसल कम होती है !
  जो नेता यह बात  कहते थे, वे लोक सभा का चुनाव भी जीत जाते थे।
हालांकि इस सवाल को लेकर अटकल  लगायी जा सकती है कि वे इस भाषण के कारण जीतते थे या किन्हीं अन्य सकारात्मक कारणों से ?
  पर पानी से बिजली निकाल लेने वाली उनकी बात तो गलत थी ही।जाहिर है कि यह मतदाताओं को गुमराह करने वाली बात थी।
क्या राजनीतिक लाभ के लिए जनता के बीच झूठ बोलने का वह पहला ठोस उदाहरण था ? पता नहीं।
  पर आज के विभिन्न दलों के अनेक नेतागण अपने राजनीतिक फायदे के लिए रोज -रोज जनता के बीच और अपने मीडिया -बयानों के जरिए झूठ पर झूठ बोलते जाते हैं। ऐसे में  यह पूछने  का लोभ होता है कि इनके ‘आदि पुरूष’ वही सज्जन थे जिन्होंने  सिंंचाई के पानी से बिजली निकाल लेने की थ्योरी दी थी ?हां,यह मानना पड़ेगा कि आज के सारे 
नेता झूठ ही नहीं बोलते ।कुछ सत्य बोलते हैं।या चुप रहते हैं।हां,अर्ध सत्य बोलने वालों की संख्या अधिक है।
दरअसल राजनीति को कुछ लोगों ने ऐसा पेशा बना दिया है जिसके बारे में कहा जाने लगा है कि मोटी चमड़ी और झूठ इसके अनिवार्य अंग हैं।एक और अनिवार्य अंग  है ।पर,उसके  बारे में कुछ कहने का कानूनी अधिकार सामान्यतः कोर्ट को ही है। 
    ---और अंत में---ं
सत्ता या लाभ के किसी छोटे-बड़े पद से हटाए जाने के सात साल बाद तक भी कोई नेता यदि अपनी मूल पार्टी को नहीं छोड़ता है तो उसे 
सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया जाना चाहिए।
ज्यादा कुछ नहीं तो एक ‘लाॅयल्टी प्रमाण पत्र’ तो दिया ही जा सकता है।यदि यह  ठीक नहीं लगे तो हर दल को अपने पास एक ‘लाॅयल्टी रजिस्टर’ तो रखना ही चाहिए।

बिहार के राज्यपाल ‘शिक्षा-दैत्यों’ की गुफा में प्रवेश 
कर रहे हैं।
देखना है कि अंततः गुफा से बाहर कौन निकल पाता है।
अब तक तो शिक्षा दैत्य यानी शिक्षा माफिया ही  बाहर निकलते रहे हैं।
हालांकि सत्यपाल मलिक ने कठोर संकल्प किया है कि ‘मैं बी.एड.काॅलेजों के अवैध कारोबार को बंद करा कर मानूंगा।मुझे राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री का मैंडेट है।’
 दरअसल बिहार मंे तो प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक की हालत जर्जर है। पर उसे ठीक करने की शुरूआत कहीं से तो होनी चाहिए।अच्छा है कि उच्चत्तर स्तर से ही शुरूआत हो।
1972 में तत्कालीन मुख्य मंत्री केदार पांडेय ने उच्च शिक्षा को पटरी पर लाने का सफल प्रयास किया था।उस कारण उनका नाम इतिहास में दर्ज हो गया।
लगता है कि सत्यपाल मलिक का नाम भी उसी तरह दर्ज होगा।
यह अच्छी स्थिति है कि मलिक जी को इस मामले में प्रधान मंत्री व मुख्य मंत्री का सहयोग मिलेगा। 
 मलिक जी गत सात महीने से बिहार के राज्यपाल हैं।राज्यपाल विश्व विद्यालयों के चांसलर होते हैं।विश्व विद्यालयों के मामले में उनके पास राज्य सरकार से भी अधिक शक्ति प्राप्त है।
  बहुत वर्षों के बाद किसी  राज्यपाल ने उच्च शिक्षा की दुर्दशा की ओर सचमुच ध्यान दिया है।
मन मोहन  सरकार ने एक नमूना राज्यपाल बहाल किया  
था।उनका नाम था-देवानंद कुंवर।
 विधान मंडल के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित करने आए थे।
बीच में ही कांग्रेसी विधायक ज्योति ने उनसे सवाल पूछ दिया-‘आजकल  वी.सी. की बहाली में आपके यहां  क्या रेट चल रहा है ?’
 इसी पृष्ठभूमि में मौजूदा राज्यपाल  सत्यपाल जी ने एक समारोह में कल कह दिया कि ‘बिहार में शायद ही कोई नेता होगा जिनका बीएड काॅलेज नहीं है।ऐसे काॅलेजों में गैर कानूनी तरीके से नामांकन होता है।मैंने कार्रवाई की तो सब मेरे खिलाफ हो गए।पर मैं किसी से डरने वाला नहीं हूं।’
राज्यपाल ने यह भी कहा कि अगस्त में संयुक्त प्रवेश प्रतियांगिता परीक्षा होगी।उसमें उत्तीर्ण छात्रों का ही बीएड कोर्स में दाखिला होगा।
 पर अब एक बड़ा सवाल है ।उस प्रवेश परीक्षा में कदाचार को राज्यपाल महोदय कैसे रोकेंगे ? सोच लें।कोई नवीन
कार्य योजना बना लें।जरूरत पड़े तो केंद्रीय अर्ध सैनिक बलों की मदद लें।
कहीं भी कदाचार करवाना शिक्षा-दैत्यों के लिए  आसान रास्ता है।तू डाल डाल तो हम पात पात ! बिहार सरकार किसी आशंकित छात्र आंदोलन के भय से कदाचार पर कारगर कार्रवाई नहीं कर पाती।नतीजतन शिक्षा के मामले में पीढि़यां बर्बाद हो रही हैं।
जिनके पास पैसे हैं,वे अपने बाल- बच्चों को बाहर भेज कर पढ़वाते हैं।पर गरीब व पिछड़े घर के विद्यार्थियों का भगवान ही मालिक है।
राज्यपाल मलिक का ताजा बयान भीषण प्रदूषण में साफ हवा के झोंके की तरह है।उन्होंने लोगों से अपील की है कि वे उनके इस सफाई अभियान में सहायता करें।
आम लोगों की दुआएं तो उनके साथ हैं।पर यहां तो हर क्षेत्र में निहितस्वार्थियों की भरमार है।
 इस पोस्ट पर भी उसकी झलक मिलेगी !
उनसे कोई उम्मीद न करें।राज्यपाल व राज्य सरकार डंडे का सहारा लें।बिहार की मौजूदा और आनेवाली पीढि़यां उन्हें दुआ दंेगी। 
बीमारी गंभीर रूप धारण कर लेती है तो कड़वी दवा  जरूरी हो जाती है।कड़वी दवा दीजिए या होने वाले कैंसर से मरने दीजिए।दोनों में एक ही रास्ता है।
   
  

गुरुवार, 3 मई 2018

‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ पर मैं खुशवंत सिंह को याद कर रहा हूंं। पर, उन्हें ही क्यों ? इसलिए कि वे आपने पाठकों की भी स्वतंत्रता के  प्रबल पक्षधर थे। जब वे ‘इलेस्ट्रेटेड वीकली आॅफ इंडिया के संपादक थे तो उन्होंने अपने पाठकों की उन चिट्ठियों को भी छापा जिनमें उन्हें खुशामद सिंह, संजय गांधी के चमचा और न जाने क्या -क्या लिखा रहता था।

2005 में  खुशवंत सिंह ने ‘आउटलुक’ को दिए गए इंटरव्यू में  कहा भी था कि ‘ संजय गांधी के कहने पर मैं दुबारा  संपादक बना था।’ सरदार जी  1969 से 1977 तक इलेस्ट्रेटेड विकली आॅफ इंडिया के संपादक थे। बाद में  वे ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के संपादक बने।

इंदिरा गांधी के एक बार फिर 1980 में सत्ता में आ जाने के बाद संजय गांधी ने खुशवंत सिंह को कुछ आॅफर दिए। खुशवंत सिंह के अनुसार, संजय ने कहा ‘आप ब्रिटेन में भारत के  उच्चायुक्त या दुनिया में कहीं के राजदूत बनना चाहते हों या फिर राज्यसभा के सदस्य और हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक ।’ खुशवंत जी ने कहा कि मुझे बाद वाला प्रस्ताव बेहतर लगा।
खुशवंत ने कहा कि एक दो बार प्रधान मंत्री (इंदिरा गांधी) के दफ्तर से संदेश आया कि मैं ऐसा करूं, या ऐसा न करूं, लेकिन मैंने उसकी परवाह नहीं की।
इंदिरा जी के बारे में उन्होंने लिखा कि इंदिरा मुझे पसंद करने लगी थीं। क्योंकि मैं संजय का समर्थन कर रहा था। दरअसल संजय पर गलत आरोप लगा कर आक्रमण किए जा रहे थे। मैं सभी आरोपों की तह में गया, उन्हें गलत पाया।

यानी खुशवंत सिंह अपनी शर्तों पर काम करते थे। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। पर अनेक लोग यह मानते हैं कि वे एक अत्यंत योग्य लेखक व पत्रकार थे। हालांकि उन्हें पत्रकार रहना अधिक पसंद था। वे उन कुछ लोगों के कथन से असहमत थे कि ‘पत्रकारिता साहित्य की हरामी औलाद है।’  वे कहते थे कि आज मेरी जो प्रसिद्धि है, वह पत्रकारिता के कारण है।

यूनेस्को की अपनी नौकरी छोड़कर लेखक पत्रकार के अनजाने से पेशे में खुशवंत सिंह आ गए थे। पर वीकली के संपादक के रूप में उन्होंने कमाल किया था।

इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनीं तो न्यूयार्क टाइम्स ने उन पर लिखने के लिए कहा था। सरदार जी ने लिखा कि इंदिरा गांधी सरकार में एक क्लर्क का काम करने लायक भी नहीं हैं क्योंकि वह मैट्रिक पास भी नहीं हैं।
सम्पादकों के बारे में खुशवंत ने कहा था कि ‘संपादक जो सबसे बड़ी गलती करते हैं, वह यह कि वे अपना उत्तराधिकारी तैयार नहीं करते।’

बुधवार, 2 मई 2018

समाजवादी नेता डा.राम मनोहर लोहिया को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने की मुख्य मंत्री नीतीश कुमार की मांग उचित है।
हालांकि उन्हें ‘भारत रत्न’ मिले या नहीं,लोहिया सचमुच भारत के रत्न ही थे।ऐसे रत्नों के बारे में कई कारणों से देश को खास कर नयी पीढ़ी को कम ही जानकारियां हैं।
न सिर्फ चरित्र की दृष्टि से बल्कि विचारों की दृष्टि से भी लोहिया  महान नेता थे।
उनकी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं था।
एक गरीब देश के नेता लोहिया सामान्य जीवन जीते थे।
उन्होंने न तो शादी की,न घर बसाया और न कोई मकान बनाया।
वे कहते थे कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों को अपना परिवार खड़ा नहीं करना चाहिए।
उनके पास न तो कोई बैंक खाता था और न ही कोई निजी कार।जबकि वे 1963 और 1967 में लोक सभा के सदस्य चुने गए थे।लोहिया जब लोक सभा में बोलने के लिए खड़ा होते थे तो सत्ता पक्ष सहम जाता था।
 उनका निजी खर्च कैसे चलता था ?
मान लिया कि लोहिया जी को कोलकाता से पटना आना है।कोलकाता का कोई साथी पटना तक के लिए टिकट कटा देता था।साथ ही उनके पाॅकेट में राह खर्च के लिए कुछ पैसे रख देता था।वे पैसे बहुत कम ही होते थे।
 पटना आए।एक- दो दिन रहे।फिर उन्हें इलाहाबाद जाना है।पटना का कोई साथी इलाहाबाद का टिकट कटा देता था।साथ में कुछ राह खर्च।
आगे चले जाते थे।इसी तरह वे देश भर में भ्रमण करते रहते थे।
जब सांसद बने तो उनके एक सहयोगी ने कहा कि अब आप कार खरीद लीजिए।
उन्होंने कहा कि अभी टैक्सी पर महीने का जो मेरा खर्च है,उसे जोड़ो।फिर कार-पेट्रोल-ड्रायवर का खर्च अलग से जोड़ो।
यदि वह टैक्सी से कम आएगा तो खरीद लूंगा।
जाहिर है कि कार का खर्च टैक्सी से कम नहीं आया।
  इस देश को एक देशज राजनीतिक -सामाजिक विचारधारा देने वाले और अपनी खास राजनीतिक रणनीति से पहली बार एक साथ सात राज्यों में कांग्रेस को चुनाव में हरवा देने वाले लोहिया की मौत कैसे हुई ? एक आम आदमी की तरह।
दरअसल वे जर्मनी में प्रोस्टेट का आपरेशन कराना चाहते थे।वहां के एक विश्व विद्यालय ने व्याख्यान के लिए उन्हें बुलाया था।आने -जाने का खर्च विश्वविद्यालय दे रहा था।पर आपरेशन का खर्च 12 हजार रुपए था।
  तब बिहार सहित कई राज्यों में लोहिया की पार्टी के नेता मंत्री थे।
लोहिया ने कहा कि जहां हमारी सरकारें हैं,वहां से मेरे आपरेशन के लिए चंदा नहीं आएगा।
लोहिया ने अपने दल के एक नेता से कहा कि वे मजदूरों से चंदा लेकर 12 हजार का इंतजाम करें।उस नेता को चंदा एकत्र करने में देर हो गयी।इस बीच प्रोस्टेट का आपरेशन जरूरी हो गया।
दिल्ली के वेलिंगटन अस्पताल में 1967 में आपरेशन हुआ।डाक्टर की लापारवाही से आपरेशन विफल रहा।परिणामस्वरूप  लोहिया को बचाया नहीं जा सका।
 उससे पहले का एक प्रकरण  मुझे मशहूर साहित्यकार डा.खगेंद्र ठाकुर ने सुनाया था।
एक दिन उन्होंने लोहिया जी को भाागलपुर में एक सरकारी बस में बैठे देखा।बस दुमका जाने वाली थी।पूछा तो लोहिया जी ने बताया कि  राम नंदन मिश्र से मिलने जा रहा हूं।
ठाकुर जी ने मुझसे कहा कि इतने बड़े नेता और ऐसी सादगी ! आसानी से उनके लिए एक कार का प्रबंध हो सकता था।
तब उनके ही दल के कर्पूरी ठाकुर बिहार सरकार में उप मुख्य मंत्री थे।पर लोहिया निजी कामों के लिए सरकारी साधन के इस्तेमाल के खिलाफ थे।  
लोहिया जी के बारे में इस तरह की बहुत सारी बातें हैं।

    

मंगलवार, 1 मई 2018

हंगामे के बिना ही संसद को हिलाया था बिहार से सांसद मधु लिमये ने

उनके जन्म दिन के अवसर पर मधु लिमये पर लिखा अपना एक पुराना लेख मैं यहां प्रस्तुत  कर रहा हूं।
--------------------

                         
बिहार के मुंगेर व बांका से बारी- बारी से लोकसभा में चार बार गये मधु लिमये ने यह सिखाया था कि किसी हंगामे के बिना भी विधायका में किस तरह कटु सत्य भी प्रभावकारी तरीके से बोले जा सकते हैं।

 पर इसके लिए सदन के नियमों की बेहतर जानकारी होनी चाहिए और उसके इस्तेमाल की सलाहियत भी।यह सब सन 1964 में बिहार से पहली बार लोक सभा में गये मधु लिमये को अच्छी तरह आता था।दुःख की बात है कि आज विधायिकाओं में अपनी बातें  कहने के लिए भाजपा व कांग्रेस जैसे बड़े दलों को भी  अक्सर हंगामे का सहारा लेना पड़ता है।जबकि, मधु लिमये तो ‘वन मैन आर्मी’ थे।संसद व विधान सभाओं  की गरिमा का अवमूल्यन आज की तरह ही  जारी रहा तो इस देश की लोकतांित्रक व्यवस्था के प्रति ही लोगों के मन में इज्जत घट जाएगी।यह और भी दुःख की बात है कि आज संसद या फिर विधायिका की गरिमा घटाने में करीब- करीब सभी दलों का योगदान है।ऐसे में मधु लिमये जैसे सभा -चतुर नेता अधिक ही याद आते है।

वैसे बिहार से चुनाव जीत कर संसद के दोनों सदनों में बारी -बारी से  गये नामी -गिरामी राष्ट्रीय नेताओं  नेताओं की भी कमी नहीं रही।उन बड़े नेताओं व काबिल पार्लियामेंटेरियनों में बिहारी भी थे और गैर बिहारी भी।पर सबमें मधु लिमये का स्थान बेजोड़ था।आजादी के बाद बिहार से लोक सभा व राज्य सभा के संदस्य बने नेताओं में जे.बी.कृपलानी, अशेाक मेहता, जार्ज फर्नाडिस, आई.के.गुजराल, युनूस सलीम, कपिल सिब्बल, रवींद्र वर्मा, नीतीश भारद्वाज, मीनू मसानी, लक्ष्मी मेनन और एम.एस. ओबराय प्रमुख थे। पर इनमें मधु लिमये का स्थान अलग था।

इनके कारण भी बिहार और मुंगेर के नाम दुनिया भर में गौरवान्वित हुए।मधु लिमये का बिहार से कुछ खास तरह का लगाव भी रहा।वे बिहार से मात्र सांसद ही नहीं थे बल्कि वे राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के साथ-साथ   बिहार की समस्याओं को भी समान ऊर्जा व मनोयोग से संसद के भीतर व बाहर उजागर करते थे।बिहार पर उनके लेखन व भाषण  चर्चित हुए। 

हंगामे के बिना आज जिन छोटे -बड़े सांसदों व दलों के लिए अपनी बातें कह पाना कठिन होता है,उन्हें मधु लिमये की संसदीय शैली से इस मामले में अब भी कुछ सूत्र सीख लेना चाहिए । हालांकि यह थोड़ा कठिन दिमागी कसरत का काम है जिससे हमारे अधिकतर नेता जरा दूर ही रहना चाहते हैं।

समाजवादी विचारक व सभा चतुर मधु लिमये का जन्म 1 मई 1922 को पूणे में हुआ था।उनका निधन 8 जनवरी 1995 को दिल्ली में हुआ।वे दो बार मुंगेर (1964 और 1967) और दो बार बांका (1973 और 1977) से लोकसभा सदस्य चुने गये। सांसद के रूप में मधु लिमये ने तत्कालीन केंद्र सरकार को इतना हिला दिया था कि इंदिरा गांधी ने 1971 में तत्कालीन बलशाली कांग्रेसी नेता व शेरे बिहार के नाम से चर्चित राम लखन सिंह यादव के सामने अपनी आंचल पसार कर उनसे यह आग्रह किया था कि  आप मुंगेर और बाढ़ की  सीटें हमें विशेष तौर पर उपहार में दे दीजिए।

यानी इंदिरा जी मधु लिमये और तारकेश्वरी सिंहा को किसी भी कीमत पर हरवाना चाहती थीं।इस काम में यादव जी ने उनकी भारी मदद भी की थी। दोनों हार गए थे।लालू प्रसाद से पहले राम लखन जी ही बिहार के यादवांें के सबसे बड़े नेता थे।
 वैसे भी तब गरीबी हटाओ का नारे का इंदिरा जी के पास बल  था।  पर दो साल बाद ही यदि मधु लिमये एक उप चुनाव के जरिए बिहार के ही बांका से लोकसभा मे ंचले गये थे तो यह उनके प्रति बिहारी कृतज्ञ मानस का उपकार का भाव ही था। मधु ने बिहार का नाम ऊंचा ही किया था। मधु लिमये की चर्चा करने पर कुछ  विदेशी राजनयिक भी दिल्ली में यह पूछते थे कि वे कहां से चुनाव जीतते हैं ? याद रहे कि मुंगेर या बांका  चुनाव क्षेत्र ब्राहमण बहुल नहीं माना जाता।इस सूचना  के बाद कई विदेशी राजनयिकों  के मन में यह बात भी कुलबुलाने लगती थी कि तब क्यों बिहार को जातिवादी राज्य कहा जाता है ? 

मधु लिमये ने ऐसे समय में लोक सभा में अपनी संसदीय योग्यता की धाक जमाई थी जब के स्पीकर सरदार हुकुम सिंह लोहियावादी समाजवादी सांसदों के सदन में खड़ा होने के साथ ही उन्हें  तत्काल बैठा देने की कोशिश करने लगते थे। क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि वे जवाहर लाल नेहरू या इंदिरा गांधी  के खिलाफ कोई कटु बात बोल दंे। नेहरू 1964 तक प्रधान मंत्री थे।नेहरू के कटु आलोचक व अदमनीय समाजवादी नेता डा.राम मनोहर लोहिया ने 1963 में लोक सभा में प्रवेश करने के साथ ही नेहरू पर ऐसे कठोर प्रहार शुरू कर दिये थे कि स्पीकर सदा सतर्क रहते थे।

पर यदि मधु के पास संसदीय फोरम के इस्तेमाल की चतुराई थी, तो उन्हें अपनी बात कहने से 
 स्पीकर रोक भी नहीं सकते थे। स्पीकर उन दिनों  लोक लाज का काफी ध्यान रखने वाले नेता हुआ करते  थे।संविधान व लोक सभा की कार्य संचालन नियमावली का सहारा लेकर जब मधु लिमये  प्रस्ताव व सूचनाएं देते थे तो उन पर चर्चाएं कराने पर स्पीकर मजबूर हो जाते थे। इस तरह संसदीय ज्ञानों का उपयोग करके मधु लिमये देश व समाज के लिए काफी कुछ कर पायेे।

उनसे सकारात्मक ईष्र्या रखने वाले एक अन्य समाजवादी चिंतक व पूर्व सांसद किशन पटनायक ने मधु लिमये के बारे में उनके निधन के बाद  लिखा था कि ‘एक श्रेष्ठ कोटि के सांसद के रूप में मधु की प्रतिष्ठा हुई।मंत्रियों के भ्रष्टाचार के विरोध में उनका हमला इतना कारगर होने लगा था कि बड़े नेताओं में उनके प्रति भय हुआ। सन 1964 से 1967 के बीच सांसद के रूप में उनका जो उत्थान हुआ ,उसका मैं सदन के भीतर प्रत्यक्षदर्शी था। संसदीय प्रणाली व संविधान के बारे में उनका ज्ञान अद्वितीय था। मधु लिमये शुरू से मेरे लिए आदर, ईष्र्या व असंतोष के पात्र रहे। मेरे स्वभाव में है कि ईष्र्या उस व्यक्ति के लिए होती है जिसके लिए मेरे मन प्यार होता है।’
   गौरव की बात है कि मधु लिमये जैसे संसदीय महारथि सिफ्र्र बिहार से ही सांसद रहे। काश ! बिहार को वैसा गौरव  एक बार फिर मिल पाता ।