शनिवार, 16 जून 2018

  गया गैंग रेप की घटना जितनी शर्मनाक है,उतनी ही दुःखदायी भी।
जब राज्य में पोस्को में सजा का प्रतिशत सिर्फ तीन हो ,वहां बलात्कारियों का मनोबल तो बढ़ेगा ही।
लगता है कि बिहार में आपराधिक न्याय व्यवस्था की कमर टूट रही है।
यदि यह सब जारी रहा तो न तो राज्य में पूंजी निवेश होगा और न ही तेज विकास ।
 उम्मीद की जानी चाहिए कि राज्य सरकार तथा अन्य संबंधित लोग कुछ ऐसा उपाय करेंगे ताकि गया की घटना अंतिम साबित हो।
  पिता को बांध कर बेटी-पत्नी के साथ बलात्कार !
 किसके बूते कुछ राक्षस ऐसी हैवानियत करते हैं ?

शुक्रवार, 15 जून 2018

सिर्फ अपनी अंगुलियों से बड़े -बड़े ताले खोल देने वाले एक डाकू की कहानी

बिहार के अविभाजित सारण जिले का एक डाकू कोई भी ताला किसी भी औजार की मदद के बिना ही खोल देता था। ताला कितना भी मजबूत हो, उसके लिए सिर्फ उस डाकू की अंगुलियां ही पर्याप्त थीं। अदालत इस आरोप पर भरोसा नहीं कर के हर बार उस डाकू को सजामुक्त कर देती थी।

चम्पारण जिले के एक दूसरे व्यक्ति ने एक ऐसा ताला बनाया था जिसे उसके परिवार का सदस्य ही खोल सकता है। वह ताला अब भी मौजूद है और खोलने वाला भी। दोनों कहानियां पिछली सदी की हैं।

जगन्नाथ मंदिर के खजाने की चाभी खो जाने की ताजा खबर के साथ ही उन तालों की कहानियां याद आ गईं।

सारण की कहानी तो वहां के एक मशहूर वकील हेमचंद्र मित्रा ने लिखी है। ‘मेरे संस्मरण’ नाम से उनकी किताब अंग्रेजी में छप चुकी है। मित्रा छपरा बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी थे। मित्रा ने सन 1898 में छपरा जिला अदालत में वकालत शुरू की थी। वे एक नामी व तेजस्वी वकील थे। उन दिनों अविभाजित सारण जिले के सिवान अनुमंडल के एक डाकू पर यह आरोप था कि वह मजबूत से मजबूत ताले को भी अपनी अंगुलियों से ही खोल देता था। वह इस काम के लिए किसी चाभी या किसी अन्य औजार का इस्तेमाल नहीं करता था।


सिवान के एस.डी.ओ. ने उस पर सी.आर.पी.सी की धारा -110 के तहत कानूनी कार्रवाई कर रखी थी। उसने उस कार्रवाई के खिलाफ छपरा कोर्ट में अपील की। उसने ए.एच. मित्रा को अपना वकील रखा। कोर्ट में कई गवाहों ने बताया कि वह सिर्फ अपनी अंगुलियों से ताला खोल देता हैं। मित्र ने यह दलील पेश की कि कोई भी व्यक्ति सिर्फ अंगुलियों से कोई ताला खोल ही नहीं सकता है। अनेक गवाहों को गलत बताते हुए कोर्ट ने मित्र के तर्क को माना और डाकू को रिहा कर दिया।

मेरे संस्मरण में यह कहानी लिखते समय मित्र ने लिखा कि ‘ट्रूथ इज स्ट्रेंजर दैन फिक्सन।’ मित्र ने अपनी किताब में उस डकैत का नाम नहीं लिखा है। उन दिनों फोटो का आज जैसा चलन तो था नहीं। कई महीनों के बाद वह डाकू किसी अन्य केस के सिलसिले में वकील मित्र के यहां गया। मित्र ने उससे पूछा कि क्या इस आरोप में सच्चाई भी है कि तुम सिर्फ हाथ की अंगुलियों की मदद से ही ताले खोल देते हो ?

वकील ने यह सवाल इसलिए भी पूछा क्योंकि उन्हें लगा था कि सारे के सारे गवाह झूठ तो नहीं हो सकते। इस सवाल पर उस डाकू ने मुस्कराते हुए कहा कि यह आरोप सही है। उसने मित्र से कहा कि कोई ताला लाइए। मित्र ने लिखा है कि उन्होंने एक मजबूत ताले को बंद करके उस डाकू को दे दिया। उसे उसने अपने हाथ में लिया। मित्र लिखते हैं कि मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि जब उसने अपने हाथों से ही उस ताले को तुरंत खोल दिया। उसने मेरी आंखों के सामने ही यह काम इतनी जल्द कर दिया कि मैं कुछ समझ नहीं पाया।

पांच किलोग्राम का ताला, जिसे कोई खोल नहीं सकता था

कुछ इसी तरह की कहानी संदीप भास्कर ने हाल में टेलिग्राफ में लिखी है। सन 1940 में बेतिया के नारायण प्रसाद ने 5 किलोग्राम का एक ताला बनाया था। उस ताले की खूबी यह है कि उसे नारायण प्रसाद के सिवा कोई और नहीं खोल सकता था। बाद में नारायण प्रसाद ने यह हुनर अपने पुत्र लाल बाबू को सिखा दिया। अब वह अजूबा ताला सिर्फ लाल बाबू या उनके कोई परिवारीजन ही खोल सकते हैं। दरअसल उसे खोलने के लिए एक खास तरह की ‘हाथ की सफाई’ चाहिए। वह कौशल सिर्फ उस परिवार को ही हासिल है।

1940 में बेतिया के महाराजा ने एक प्रदर्शनी आयोजित की थी। नारायण प्रसाद ने उस ताले को  उस प्रदर्शनी में शामिल किया। महाराजा ने घोषणा की कि जो भी उस ताले को खोल देगा, उसे चांदी के 11 सिक्के दिए जाएंगे। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला। लाल बाबू के अनुसार महाराजा ने उस ताले को खरीदने की इच्छा जाहिर की। नारायण प्रसाद ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया।

इतना ही नहीं 1972 में गादरेज इंडिया लिमिटेड ने उस ताले के पेटेंट का अधिकार मांगा। उसके बदले 1 लाख रुपए देने का आॅफर दिया। पर नारायण प्रसाद को यह स्वीकार नहीं था। दरअसल नारायण का परिवार उस हुनर को अपनी संतानों तक ही सीमित रखना चाहता है।

1972 में तत्कालीन मुख्यमंत्री केदार पांडेय ने जो चम्पारण जिले के ही मूल निवासी थे, ताला व राइफल कारखाना खोलने में मदद करने का इस परिवार को आश्वासन दिया था। पर वह पूरा नहीं हो सका। लालबाबू के अनुसार कुछ पैसे तो एकत्र किए गए, पर कारखाने के लिए वे काफी नहीं थे। आश्चर्य है कि बाद के मुख्यमंत्रियों का ध्यान भी उस परिवार के इस हुनर की ओर  नहीं गया!   

राजेंद्र काॅलेज (छपरा) : जरा याद कर लें प्राचार्य भोला प्रसाद सिंह को


18 दिसंबर, 1967 की बात है। बिहार के अनेक राजनीतिक तथा गैर राजनीतिक संगठनों ने राजभाषा संशोधन विधेयक के खिलाफ ‘बिहार बंद’ का आह्वान किया था। मैं उन दिनों संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े क्रांतिकारी विद्यार्थी संघ की सारण जिला शाखा का सचिव था। हम छात्रों ने इस अवसर पर छपरा में जुलूस निकालने का निर्णय किया था। उस दिन मैं सुबह सात बजे ही एक रिक्शे पर माइक लेकर राजेंद्र कालेज के गेट पर पहुंच गया।



मैं छात्रों से क्लास का बहिष्कार करके जुलूस में शामिल होने की अपील कर रहा था। जिस दिन काॅलेज में असामान्य स्थिति रहती थी, उस दिन राजेंद्र कालेज के प्राचार्य भोला प्रसाद सिंह समय से पहले ही काॅलेज पहुंच जाते थे। उस दिन भी पहंुच गए थे।

वे गेट पर मेरे पास आए और मुझसे कहा कि ‘तुम यहां से माइक लेकर चले जाओ।’ जब मैंने हटने से इनकार कर दिया तो उन्होंने कहा कि ‘तुमसे मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी।’ मैंने कहा कि मैं आज आपका हुक्म नहीं मानूंगा। दरअसल मेरे साथ छात्र थे और उस काॅलेज के प्रो. राम श्रेष्ठ मिश्र का भी मुझे समर्थन हासिल था।

उसके बाद काॅलेज के अहाते में छात्रों -प्राध्यापकों की एक सभा बुलाई गयी। कई छात्रों और प्राध्यापकों ने जुलूस के खिलाफ अपनी राय जाहिर की। अंत में प्रो. रामश्रेष्ठ मिश्र बोलने को खड़े हुए। वे बोल ही रहे थे कि बगल के एक वृक्ष से एक काग कांव- कांव करता हुआ उड़ा। इस पर भोला बाबू ने कहा कि ‘ देखो काग बोल रहा है। आज जरूर कुछ बुरा होगा।’

विरोध के बावजूद हमने जुलूस निकाला। सैकड़ों छात्र जुलूस में शामिल हो गए। हमारा संगठन मजबूत था। पर इतने बड़े जुलूस की मुझे भी उम्मीद नहीं थी। मुझे कुछ शंका होने लगी। संभवतः भोला बाबू को यह लगता था छात्रों की जमात को मैं संभाल नहीं पाऊंगा।

जब जुलूस के रास्ते में नये -नये युवक जुड़ने लगे तो  मेरी शंका बढ़ गयी। क्योंकि वे अनजान चेहरे थे। लगा कि जुलूस के जरिए तोड़-फोड़ करवाने की कोई बाहरी राजनीतिक साजिश थी। याद रहे कि उन दिनों बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकार चल रही थी। खैर, भोला बाबू की आशंका सच होने वाली थी और हो ही गयी। जुलूस छपरा कोर्ट परिसर स्थित स्टेट बैंक के पास पहुंचा। वहां जुलूस में शामिल कुछ युवक अनियंत्रित हो गए। बैंक के गार्ड ने गोली चला दी। एक राहगीर मारा गया। जुलूस तितर -बितर हो गया।

हालांकि इसको लेकर किसी छात्र की गिरफ्तारी नहीं हुई। दरअसल उस जुलूस का आयोजन मैंने ही किया था। संभवतः भोला बाबू को यह लग गया था कि मेरे जैसे अपरिपक्व व्यक्ति के लिए जुलूस में शामिल छात्रों -युवकों को नियंत्रित कर पाना संभव नहीं होगा। उन्हें ठीक ही लगा था।

खैर, दूसरी घटना कुछ समय बाद की है।

16 जनवरी, 1968 को बिहार विधानसभा भवन के समक्ष संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का प्रदर्शन होने वाला था। उससे दो दिन पहले हमने सारण जिले में कुछ नेताओं के साथ सघन भ्रमण कर लोगों को पटना पहुंचने का संदेश दिया था। थककर चूर हो गया था। जुकाम हो गया।

इसलिए मैं खुद पटना नहीं जा सका। 16 जनवरी की शाम में जब भोला बाबू ने मुझे काॅलेज परिसर में देखा तो पूछा कि ‘तुम लोगों का प्रदर्शन है न। तुम यहां हो ?’ उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि ‘तुम जीवन में कुछ नहीं कर सकते। कभी नेता नहीं बनोगे।’

यह एक अभिभावक की फटकार थी। वे मुझे राजनीति में आगे बढ़ते देखना चाहते थे। मेरी बी.एससी. परीक्षा का रिजल्ट हो चुका था। मैं अंक पत्र लेने काॅलेज गया था। भोला बाबू अपने कक्ष के सामने खड़ा होकर उन कुछ छात्रों को समझा रहे थे जो छात्रसंघ का चुनाव कराने की जिद पर अड़े थे। मैं भोला बाबू के पीछे से गुजरा। थोड़ा आगे बढ़ने पर उन्होंने मुझे वापस बुलाया। पूछा, ‘पास कर गए?’

जब मैंने ना कह दी तो उन्होंने हड़ताली लड़कों का ध्यान मेरी ओर खींचते हुए अभिनय की मुद्रा में कहा कि ‘देखो, यही था जो फाटक पर माइक लेकर कहता था, साथियों साथ दो। और आज जब फेल हो गया तो मुझसे मिले बिना ही जा रहा है। तुम लोगों की भी यही हालत होगी।’ फिर मेरी ओर मुखातिब होकर उन्होंने कहा कि ‘कोई बात नहीं। फिर परीक्षा दो। मैं तुम्हारी मदद करूंगा।’ दरअसल मैं फेल कैसे नहीं करता! पढ़ाई-परीक्षा मेरी प्राथमिकता से काफी दूर चली गयी थी।

शिक्षक के रूप में उनके अतुलनीय योगदान की चर्चा किए बिना बात पूरी नहीं हो सकती। भोला बाबू केमिस्ट्री पढ़ाते थे। मैं विज्ञान का छात्र होने के कारण उनका क्लास करता था। राजेंद्र कालेज में विज्ञान संकाय में छात्र बहुत थे। इसलिए भोला बाबू सबको एक साथ शामियाना में बैठाकर पढ़ाते थे। रसायन शास्त्र जैसे निरस और जटिल विषय को इस तरह से मनोरंजक ढंग से पढ़ा देते थे कि उसे फिर घर  जाकर पढ़ने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। लगातार घंटों तक पढ़ाते जाना उनके ही वश की बात थी। हमें हमेशा उनके क्लास की प्रतीक्षा रहती थी।

बी.एससी. फेल कर जाने के बाद मैं पटना रहने लगा था। समाजवादी साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकमुख’ में काम करने लगा। उसके संपादक प्रो. देवी दत्त पोद्दार थे। इस बीच मेरे एक शुभचिंतक ने मुझे सलाह दी कि पहले तुम गे्रजुएट तो हो जाओ। बाद में जीवन में जो करना हो, करो। मुझे बात अच्छी लगी।

मैं गांव लौट गया। सारण जिला संसोपा के आॅफिस सेके्रट्री के रूप में काम करने लगा। मुझे हर माह सौ रुपए मिलते थे। साथ ही राजेंद्र काॅलेज में ही हिस्ट्री आॅनर्स में दाखिला करा लिया। आॅनर्स के साथ पास भी कर गया।
इस बीच भोला बाबू से मेरा पहले जैसा संपर्क नहीं रहा। गांव से रोज ट्रेन से छपरा जाता था। क्लास करना और पार्टी आॅफिस में काम करना। इसी में समय बीत जाता था।

इस बीच 26 अप्रैल, 1971 को यह दुःखद खबर मिली कि भोला बाबू की काॅलेज परिसर में ही किसी ने हत्या कर दी। मेरे लिए तो सदमे वाली खबर थी। मैंने ‘सारण संदेश’ में उन पर संस्मरणात्मक लेख लिखा था।

किन्हीं और के लिए भोला बाबू जो कुछ भी हों, पर मेरे लिए तो भोला बाबू अभिभावक तुल्य थे। मैं उनके शिक्षक रूप से सर्वाधिक प्रभावित था। कमेस्ट्री का वैसा बढि़या टीचर मैंने नहीं देखा।

(नोट-आपने ध्यान दिया होगा। मैं उन शिक्षकों के बारे में फेसबुक पर बारी-बारी से लगातार लिख रहा हूं जिन्होंने मुझे किसी न किसी रूप से प्रभावित किया। या जिनके बारे में पढ़कर -जानकर प्रभावित हुआ हूं। अगली बार किन्हीं अन्य गुरू देव के बारे में लिखूंगा।)

यहां थोड़े से अपवादों की बात नहीं कर रहा हूं

जिस देश की मुख्य धारा की राजनीति व उसके अधिकतर राज नेताओं के समक्ष भ्रष्टाचार, जातिवाद,एकांगी  धर्मनिरपेक्षता   और वंशवाद के खिलाफ बोलना-लिखना  ईश-निंदा के समान हो । दूसरी ओर जहां सदाचार, ईमानदारी,जन सेवा  तथा  शुचिता के पक्ष में बोलने-लिखने  को बेवकूफी या कभी -कभी ‘अपराध’ की श्रेणी में रखा जाए,तो वहां की  लोकतांत्रिक व्यवस्था के  भविष्य को कितना सुरक्षित माना जाना चाहिए ? 

 संभव है कि यह सब अभी पूरी तरह खुलेआम नहीं हो रहा हो। पर, इसी तरह के कर्मों, बोलियों और मानसिकता  के संकेत मिलने शुरू हो चुके हैं। 
हां, इस बिगड़ती स्थिति के बावजूद अत्यंत थोड़े से अपवाद अब भी राजनीति में भी है और कुछ नेताओं में भी। क्या 1947 में किसी ने कल्पना की थी कि सौ साल पूरे होने से पहले ही इस देश की मुख्य धारा की राजनीति इतनी पतित हो जाएगी ?

मंगलवार, 12 जून 2018

दोहरे मापदंड की एक और मिसाल

संघ परिवार को लेकर कांग्रेसियों-कम्युनिस्टों का एक बार फिर दोहरा रवैया सामने आया है। तथाकथित ‘सेक्युलर’ जमात का कोई बड़ा नेता जब आर.एस.एस. से संपर्क साधता है तो उसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठती। पर कोई दूसरा नेता जब संघ मुख्यालय जाता है तो हाय -तौबा मचा दिया जाता है। कहा जाता है कि संघ परिवार को प्रतिष्ठा दी जा रही है। उसे ताकतवर बनाया जा रहा है। इससे भाजपा ताकतवर होती है।

जबकि संघ परिवार के ताकतवर बनने के कारण कुछ और होते हैं। दरअसल तथाकथित सेक्युलर जमात की कमजोरियों -विफलताओं का लाभ संघ परिवार को मिलता रहा है। पर सेक्युलर जमात उन कमजोरियों पर काबू पाने की जगह आरोप-प्रत्यारोप से ही अपना काम निकाल लेना चाहती है। इन दिनों उनका प्रयास देश में महागठबंधन बनाकर संघ परिवार यानी भाजपा यानी राजग को पराजित करने का है। संभव है कि वे उसमें सफल भी हो जाएं। पर क्या वह जीत स्थायी होेगी?

हाल के कुछ उपचुनाव नतीजों ने सेक्युलर जमात का मनोबल बढ़ाया है। पर, जब तक सेक्युलर जमात अपनी कमजोरियों पर काबू पाने की कोशिश नहीं करेगी तब तक उसे कोई स्थायी राजनीतिक लाभ नहीं मिलेगा। इस बीच वह जमात आरोप -प्रत्यारोप से ही अपना काम चला लेना चाहती है। पर उन आरोपों में भी दोहरा मापदंड नजर आता है।  

एक राजनीतिक दल जब भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाता है तो उसे बुरा नहीं माना जाता।पर दूसरे दल को ऐसी छूट देने को सेक्युलर जमात तैयार ही नहीं है।

नेहरू, इंदिरा और लाल बहादुर शास्त्री 

यदि 1963 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को बुलाया था तो कम्युनिस्टों व कांग्रेसियों के लिए वह कोई हर्ज की बात नहीं थी। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि बुलाने की खबर ही सही नहीं है। यदि नहीं बुलाया गया था तो बुलाने की उस खबर का कांग्रेस खंडन क्यों नहीं करती ? जबकि खुद जवाहर लाल नेहरू ने तब कहा था कि ‘मेरी पार्टी का संघ के साथ वैचारिक मतभेद हो सकता है, पर जब देश संकट में हो तो हम सबको एकजुट होकर काम करना चाहिए।’ बाद के वर्षों में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिल्ली की ट्राफिक व्यवस्था के संचालन का भार संघ को दिया था तो भी कोई एतराज नहीं हुआ।

पर, जब पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी इस महीने नागपुर गए तो माकपा महासचिव सीताराम येचुरी को इस बात से सख्त एतराज था कि प्रणव जी ने वहां गांधी हत्याकांड की चर्चा क्यों नहीं की! कांग्रेस के कुछ नेताओं ने पहले तो उन्हें जाने से ही रोकने की कोशिश की। नहीं माने तो उन लोगों ने कुछ आशंकाएं भी जाहिर कीं। पर, प्रणव मुखर्जी वहां से जब एक संतुलित भाषण देकर आए तो कांग्रेसी ठंडे पड़ गए। पर उनमें से कुछ कांग्रेसियों के मन में यह मलाल फिर भी रहा कि वे गए ही क्यों ?  

ऐसा ही मलाल उन्हें इंदिरा गांधी को लेकर नहीं हुआ था जब 1977 में संघ परिवार के निमंत्रण पर तत्कालीन प्रधानमंत्री ने विवेकानंद राॅक मेमोरियल का उद्घाटन किया था। तब किसी कम्युनिस्ट या कांग्रेसी नेता ने संघ की पृष्ठभूमि को लेकर कोई विवाद खड़ा करने की कोशिश नहीं की।
यह नहीं कहा गया कि इंदिरा जी ने वहां गांधी हत्याकांड का मामला क्यों नहीं उठाया।

जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी को लेकर कोई कांग्रेसी या कम्युनिस्ट आज भी सवाल नहीं उठा रहा हैं। इस पर भी कोई चर्चा नहीं है कि देश के सामने जो संकट उस समय था, उतना ही बड़ा संकट आज है या नहीं।

पर प्रणव मुखर्जी की नागपुर यात्रा पर तरह -तरह की बातें की गयी। कुछ कम्युनिस्ट नेता अब भी मीन -मेख निकालने में लगे हैं। एक बड़े कम्युनिस्ट नेता यह उम्मीद कर रहे थे कि जिसके आमंत्रण पर जाओ, उसके यहां जाकर उसे ही खरी -खोटी सुना कर वापस आ जाओ। कम से कम प्रणव मुखर्जी की यह संस्कृति नहीं रही है।

इससे पहले भी संघ को लेकर कई कम्युनिस्ट नेता समाजवादियों पर भी आरोप लगाते रहे हैं।
आरोप बे सिर पैर का है। क्योंकि कम्युनिस्टों की कसौटी मानी जाए तो ऐसा ही आरोप खुद उन पर भी है। उनका आरोप यह रहा है कि सोशलिस्टों ने ही संघ परिवार के लिए इस देश में राजनीतिक जमीन तैयार की। यानी संघ -जनसंघ-भाजपा को मजबूत किया। 

इस संबंध में भी उनका तर्क यह है कि जनसंघ और बाद में भाजपा के साथ मिली -जुली सरकार बनाकर सोशलिस्टों ने संघ परिवार को समाज मेंं प्रतिष्ठा भी दिला दी। उससे पहले उसे राजनीतिक तौर पर अछूत माना जाता था।

दरअसल 1966-67 में प्रतिष्ठा तो सी.पी.एम. के नेताओं को भी मिली जो 1962 में अपनी चीनपक्षी रवैये के कारण अलग -थलग पड़ गए लगते थे। दरअसल 1967 के आम चुनाव के बाद में देश के सात राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बन गयीं। बाद में अन्य दो राज्यों में कुछ कांग्रेसी विधायकों के दलबदल के कारण कांग्रेसी सरकारें गिर गयीं। वहां भी गैर कांग्रेसी सरकारें बन गयीं।

बिहार और उत्तर प्रदेश के मंत्रिमंडलों में एक साथ सी.पी.आई. और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य शामिल किए गए थे। उन सरकारों में जनसंघ के प्रतिनिधि भी थे। देश में सोशलिस्टों व जनसंघियों ने पहली बार सत्ता में हिस्सेदारी की थी। पर उन मंत्रिमंडलों में सी.पी.आई. के प्रतिनिधि भी तो थे। यदि सोशलिस्टों ने इस तरह जनसंघ को बढ़ाया और सम्मानित किया तो उसका श्रेय सी.पी.आई. को भी तो जाता है। आखिर वे उन मंत्रिमंडलों में क्यों शामिल हो गए थे जिनमें जनसंघ भी था ?

पर सी.पी.आई. के नेता खुद को उसके लिए जिम्मेदार नहीं मानते। दोहरे मापदंड का इससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है ? याद रहे कि 1966 में डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कुछ गैर कांग्रेसी दलों को एक साथ आने पर राजी किया था। उनका तर्क था कि गैर कांग्रेसी दलों के आपस में मिलने के सिवा और कोई उपाय नहीं है। क्योंकि कांग्रेस प्रतिपक्ष के वोट के बंटवारे का लाभ उठाकर चुनाव—दर चुनाव सत्ता हासिल करती जा रही है। 

परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से भाजपा के साथ थे कम्युनिस्ट

यही नहीं, सन 1989 में जब केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी तो भाजपा और कम्युनिस्ट उस सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे थे। क्या उससे भाजपा की ताकत नहीं बढ़ी ? यानी परोक्ष या प्रत्यक्ष ढंग से भाजपा के साथ काम करने के बावजूद  कम्युनिस्ट खुद को जिम्मेदार नहीं मानते, पर दूसरे दल को जिम्मेदार जरूर ठहरा देते हैं।

सन 2014 के लोकसभा चुनाव में राजग की भारी जीत के बाद कांग्रेस ने पूर्व रक्षामंत्री ए.के. एंटोनी के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई। हार के कारणों की जांच का भार उसे दिया गया। जून, 2014 में एंटोनी ने अन्य बातों के साथ-साथ यह भी कहा कि ‘मुस्लिम तुष्टिकरण कांग्रेस की हार का मुख्य कारण है। जनता में संतुलित धर्म निरपेक्षता वाली हमारी साख अब नहीं रही।’

जो बात एंटोनी ने नहीं कही, वह यह है कि राजग खासकर भाजपा के उभार का दूसरा बड़ा कारण मनमोहन सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। याद रहे कि अपने शासनकाल में जांच के बदले मनमोहन सरकार उन आरोप को गलत बताती रही। इससे जनरोष बढ़ा जिसका लाभ सबसे बड़े विपक्षी गठबंधन यानी राजग को मिला। यानी राजग की जीत में राजग से अधिक यू.पी.ए. सरकार का ‘योगदान’ था।

हाल के दिनों में भी कुछ नेता यह कहते रहे कि यह सब सोशलिस्टों की ही कारस्तानी है।
अधिकतर राजग विरोधी दल आज भी उन दो प्रमुख कारणों को समाप्त करने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं जो 2014 में हार के कारण बने थे। इसके बदले वे दलीय गठजोड़ पर जोर दे रहे हैं।यानी गुण के बदले मात्रा पर जोर है। पता नहीं, यह कितना कारगर व स्थायी साबित होगा? 

पर आम धारणा यही है कि अपनी हर विफलता के लिए किसी और दोषी ठहराकर कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता।

(मेरे इस लेख का संपादित अंश 10 जून 2018 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)

उपचुनाव नतीजों से आगे के संकेत

बिहार में आप यदि किसी स्कूली छात्र से भी पूछेंगे कि जिस चुनाव क्षेत्र में 70 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी हो तो वहां से कौन पार्टी जीतेगी तो वह बिना देर किए बता देगा-राजद।

जोकी हाट में यही हुआ है। वहां 70 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। इसलिए जोकी हाट विधानसभा क्षेत्र में राजद उम्मीदवार की जीत को किसी लालू वाद से कोई संबंध नहीं है। वैसे कोई कुछ भी कहे, पर पूरे बिहार में मुस्लिम और यादव मतदाताओं के अधिकतर वोट उसे ही मिलेंगे जिस उम्मीदवार पर लालू प्रसाद की मुहर होगी। चाहे राजद गठबंधन जितनी सीटें जीते।

राज्य के जिन चुनाव क्षेत्रों में यादव-मुस्लिम वोटर मिलकर निर्णायक होंगे, वहां अगले किसी भी चुनाव में राजद या उसके सहयोगी दल ही जीतेंगे। यह बात पिछले कई चुनावों मेंं भी साबित हुई है। इक्के—दुक्के अपवादों की बात और है। इस बार भी जोकीहाट में यह साबित हुई।

जोकीहाट में जीत के बाद राजद का यह कहना कि यह लालूवाद की जीत है, एक राजनीतिक बयानबाजी से कुछ अधिक नहीं। इसे एक नया जुमला भी कह सकते हैं। इसी तरह की बयानबाजी बिहार में हुए गत मार्च के उपचुनाव के बाद भी हुई थी।

मार्च में अररिया लोकसभा चुनाव क्षेत्र और भभुआ तथा जहानाबाद विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव हुए थे। खाली होने से पहले जो सीट जिसके पास थी, वह उस दल को मिली। यानी न तो किसी की हार हुई न किसी की जीत। फिर भी उस रिजल्ट को भी कुछ इसी तरह परिभाषित किया गया। हालांकि मार्च उपचुनाव के रिजल्ट का सघन विश्लेषण किया जाए तो उससे राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन को खुश होने का कोई कारण नहीं था। 

यदि कोई दलीय गठबंधन आठ में से पांच विधानसभा सीटें जीत जाए तो उसे खुशी मनानी चाहिए या उस अन्य गठबंधन को खुश होना चाहिए जिसे उनमें से सिर्फ तीन ही सीटें ही मिलीं ?

अररिया लोकसभा उपचुनाव नतीजे को विस्तार से समझिए। राज्य में अररिया लोकसभा और भभुआ तथा जहानाबाद विधानसभा क्षेत्रों के लिए 11 मार्च को उपचुनाव हुए थे।

 राजद ने अररिया और जहानाबाद सीटें जीतीं।पहले भी ये सीटें उसी के पास थीं। भाजपा ने भी अपनी भभुआ सीट बचा ली।

 2014 के लोक सभा चुनाव में अररिया से राजद के तसलीमुद्दीन विजयी हुए थे। 2015 के विधान सभा चुनाव में भभुआ

से भाजपा और जहानाबाद से राजद की जीत हुई थी । राजद,जदयू और कांग्रेस ने महा गठबंधन बना कर 2015 को बिहार विधान सभा का चुनाव लड़ा था। 

मार्च के  उप चुनावों के नतीजे के गहन अध्ययन से राजग को फायदा मिलता नजर आया। अररिया लोक सभा चुनाव क्षेत्र के भीतर छह विधान सभा क्षेत्र हैं। उप चुनाव में छह में से चार सीटों पर राजग की बढ़त रही और सिर्फ दो सीटों पर राजद को बढ़त मिली। इसमें भभुआ को मिला दें तो राजग  कुल पांच विधान सभा सीटों पर राजद से आगे रहा।

    हां, मार्च के उप चुनाव नतीजों से यह बात साफ हुई थी कि  राजद के पक्ष में मुस्लिम -यादव समीकरण के मतों की एकजुटता पहले की अपेक्षा बढ गय़ी। मतदान में आक्रामकता भी बढ़ी। हालांकि अररिया लोक सभा उप चुनाव में अल्पसंख्यक मतदाताओं के ध्यान में नरेंद्र मोदी अधिक थे।अगले लोक सभा चुनाव में भी वैसा ही रहने की उम्मीद है।

   नरेंद्र मोदी की लहर के बावजूद सन 2014 के लोक सभा चुनाव में मुस्लिम-यादव  बहुल क्षेत्र अररिया से राजद के तसलीमुद्दीन विजयी हुए थे। तसलीमुद्दीन के निधन से सीट खाली हुई थी। तसलीमुद्दीन के पुत्र सरफराज आलम मार्च में  राजद के उम्मीदवार थे।उप चुनाव में सरफराज विजयी रहे।

सरफराज हाल तक जदयू विधायक थे।उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया। उसके बाद राजद की ओर अपने पिता की सीट पर उम्मीदवार बने। अररिया लोक सभा क्षेत्र के भीतर पड़ने वाले जोकीहाट और अररिया विधान सभा चुनाव क्षेत्रों में राजद को भारी बढ़त मिली।

दशकों से वह तसलीमुददीन के प्रभाव वाला इलाका रहा। तसलीमुददीन भी कई बार सांसद व विधायक रहे। केंद्र में राज्य मंत्री भी थे। फिर भी गत लोक सभा उप चुनाव में अररिया के  चार विधान सभा खंडों में भाजपा के उम्मीदवार प्रदीप कमार सिंह को बढ़त मिल गयी।

    इसके अलावा भभुआ विधान सभा चुनाव क्षेत्र में भाजपा की जीत से राजग बिहार में चुनावी भविष्य के प्रति आशान्वित हुआ।क्योंकि वहां जातियों की दृष्टि से लगभग मिलीजुली  आबादी है।

 यानी भभुआ विधान सभा क्षेत्र तथा अररिया लोक सभा चुनाव क्षेत्र के नीचे पड़ने वाले चार विधान सभा खंडों के चुनाव नतीजे को देखकर यह तब भी कहा गया   कि बिहार की राजग सरकार से आम लोगों का अभी मोहभंग नहीं हुआ है।इसलिए कि ऐसी ही मिलीजुली आबादी वाले बिहार में अधिकतर विधान सभा क्षेत्र हैं।मिलीजुली आबादी यानी  जातीय दृष्टि से भी मिली जुली आबादी वाला चुनाव क्षेत्र । 

  हां, राजद के वोट बैंक यानी एम.वार्इ. वर्चस्व वाले चुनाव  क्षेत्र  अररिया और जहानाबाद में राजद उम्मीदवारों के पहले की अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन को लेकर तरह -तरह के अनुमान लगाए गए।क्या लालू प्रसाद के जेल जाने से  मतदाताओं के एक वर्ग में बढ़ी सहानुभूति के कारण उनके वोट बैंक में एकजुटता और आक्रामकता बढ़ी  ?

क्या दिवंगत जन प्रतिनिधियों के परिजन के लिए मतदाताओं में भारी सहानुभूति के कारण वोट बढ़े  ? या कोई और बात रही ? पर सवाल यह भी है कि क्या अगले किसी चुनाव में बिहार के वैसे चुनाव क्षेत्रों में भी राजद को बढ़त मिलेगी जहां यादव-मुस्लिम वोट निर्णायक नहीं हैं ?

यदि ऐसा हुआ तो माना जाएगा कि वह लालू वाद की जीत है।

लाूल प्रसाद की राजनीतिक ताकत का अनुमान लगाने के लिए दो पिछले चुनावों की चर्चा प्रासंगिक होगी। राजद और लोजपा ने 2010 में   बिहार विधान सभा चुनाव मिल कर लड़ा था। 243 सदस्यीय विधान सभा में इन्हें 25 सीटें आईं।

चारा घोटाला केस में सन 2013 में लालू प्रसाद को पहली बार सजा हुई थी।
सजा की घोषणा के तत्काल बाद राजद नेताओं ने कहा था कि हम अब लोक सभा की सभी 40 सीटें जीत लेंगे।क्योंकि जनता लालू प्रसाद को परेशान करने का बदला लेगी।

पर 2014 के लोक सभा चुनाव में राजद को बिहार में सिर्फ 4 सीटें ही मिलीं। हाल के उप चुनाव नतीजे भी पूरे बिहार में राजद के लिए कोई खास उम्मीद नहीं जगा रहे हैं। वैसे दल का हौसला बनाये रखने के लिए बड़े -बड़े दावे तो हर दल करता ही  रहता  है।यदि राजद भी कर रहा है तो उसमें किसी कोई एतराज नहीं होना चाहिए।

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जोकीहाट विधान सभा उप चुनाव रिजल्ट--2018

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शाहनवाज आलम -राजद- 81240

मुर्शीद आलम---जदयू--40016

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अररिया लोक सभा क्षेत्र--उप चुनाव-मार्च,2018

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 विधान सभा क्षेत्र--  राजग --- महागठबंधन

नरपत गंज--        88349 ---- 69697

रानी गंज ----     82004 ---- 66708

फरबिस गंज         93739 -----74498

सिकटी-------   87070 ----- 70400

जोकी हाट-----   39517------120765

अररिया------    56834 ----- 107260

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(3 जून 2018 को हस्तक्षेप -राष्ट्रीय सहारा -में प्रकाशित)


    

  



कलियुग : जब राजा ही अपनी प्रजा को लूटेगा


महाभारत काल में अर्जुन के पोते परीक्षित को वेद व्यास के पुत्र शुकदेव ने जो कथा सुनाई थी, वह शुक सागर नामक प्राचीन ग्रंथ में संग्रहीत है। शुक देव मुनि राजा परीक्षित को बताते हैं कि कलियुग में क्या- क्या होने वाला है। तब कैसा समाज होगा और राजा कैसे -कैसे होंगे। 

लगे हाथ उन्होंने यह भविष्यवाणी भी कर दी थी, एक समय ऐसा भी आयेगा, जब राजा ही अपनी प्रजा को लूटेगा। मध्य युगीन राजाओं के बारे में तो ऐसा नहीं सुना गया कि वे अपनी ही प्रजा को लूटते थे। यह जरूर सुना गया कि उनमें से कुछ शासक पराजित राज्य की प्रजा को जरूर लूटते थे। पर, आधुनिक लोकतांत्रिक भारत के कुछ शासकों के बारे में जरूर यह खबर आती रहती है कि किस तरह वे अपनी ही जनता के विकास और कल्याण के लिए आवंटित पैसों को लूट कर अपने घर भर रहे हैं।

पर्यावरण दिवस के अवसर पर निराला बिदेसिया ने गत 5 जून को प्रभात खबर में लिखा है कि ‘आज जिन विषयों को लेकर दुनिया चिंतित है, उन सबकी चर्चा वेद व्यास ने महाभारत में हजारों साल पूर्व ही की थी। युधिष्ठिर मार्कण्डेय ऋषि से कलियुग में प्रलय काल और उसके अंत के बारे में जानना चाहते हैं।

इसका उत्तर मार्कण्डेय ऋषि देते हैं - ‘कलियुग के अंतिम भाग में प्रायः सभी मनुष्य मिथ्यावादी होंगे, उनके विचार और व्यवहार में अंतर आएगा। धरती पर मनुष्य अपनी करनी से प्रलय की संभावना बनाएगा।................।’

निराला ने थोड़ा लंबा लिखा है। अच्छा लिखा है। जिन्हें इच्छा हो, महाभारत और शुक सागर फिर से खुद ही पढ़ लें।

इन दिनों सोशल मीडिया पर आ रही सूचनाओं से कई अच्छी चीजों का पता चल रहा है तो कुछ लोगों की इस मनोभावना का भी पता चलता है कि उन लोगों को बेहतर समाज बनाने में योगदान करने में कोई रूचि नहीं है। उनकी प्राथमिकताएं अलग हैं।

शायद हमारे प्राचीन ऋषियों ने पहले ही यह सब सूंघ लिया था।