रविवार, 8 जुलाई 2018

  खबर मिल रही है कि आरा के भाजपा सांसद 
व केंद्रीय मंत्री आर.के.सिंह अपने चुनाव क्षेत्र में एक 
खास शैली की राजनीति कर रहे हैं।वे किसी व्यक्ति 
का व्यक्तिगत काम नहीं करते।
हालांकि वे सार्वजनिक काम मंे लगे रहते हैं।
देखना है कि व्यक्तिगत काम से साफ मना कर देने
वाले सासंद दुबारा चुनाव जीत पाते हैं या नहीं।
वह एक प्रयोग ही होगा।
  वैसे अतिशय व्यक्तिगत काम करने वाले भी चुनाव हारते रहे हैं।
अविभाजित शाहाबाद जिले के ही एक कांग्रेसी सांसद व्यक्तिगत काम के लिए मशहूर थे।
उन्होंने अपने चुनाव क्षेत्र के एक बड़े गांव के एक प्रभावशाली व्यक्ति के अविभाजित परिवार के चार बेरोजगारों को बारी -बारी से नौकरी दिलवा दी।
पर पांचवें की नहीं लगवा सके तो वह प्रभावशाली व्यक्ति नेता जी से सख्त नाराज हो गया।अगले चुनाव में उनके खिलाफ वोट दिया और अपने लोगों से भी दिलवाया।पता नहीं, वे उस कारण हारे या किन्हीं अन्य कारणों से।पर नौकरियां दिलवाने वाले नेता जी भी अगला चुनाव हार गए।यह बात उस नेता जी ने ही हमारे एक परिचित को बताई थी।

शनिवार, 7 जुलाई 2018

2016 में पनामा पेपर्स के जरिए रहस्योद्घाटन हुआ और 
पाकिस्तान के पूर्व प्रधान मंत्री नवाज शरीफ को कल दस साल की सजा हो गयी।
  इतनी जल्दी सजा भारत में होने लगे तो इस गरीब देश का कल्याण हो जाए।
 पर, यहां तो दशकों लग जाते हैं।
फिर भी अधिकतर भ्रष्ट नेता बच जाते हैं।
ध्यान रहे कि पनामा पेपर्स में कुछ भारतीयों के भी नाम आए हैं।
पर, एक समानता इन दो  देशों के नेताओं के बीच  जरूर देखी जा सकती है।
भारत में किसी नेता के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुकदमा शुरू होता है तो वह कहता है कि चूंकि उसने  जनता का कल्याण किया है,इसलिए हमारे राजनीतिक विरोधी हमारे  खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई कर रहे हैं। 
  नवाज ने भी यही कहा है।उन्होंने कहा कि चूंकि हमने जनता को जनरलों व जजों की गुलामी से आजाद कराया,इसलिए हमें  सजा मिली।
पर,उन्होंने इस आरोप पर कोई सफाई नहीं दी कि उन्होंने लंदन में चार आलीशान फ्लैट्स किस जायज कमाई से  खरीदे।कितनी समानता है दोनों देशों के भ्रष्ट नेताओं के बीच !
इन गरीब देशों की जनता से टैक्स के जरिए मिले पैसों से आलीशान जीवन बिताने वाले कुछ नेताआंे को यदि अदालत छोड़ देती है तो खुदा उसे सजा दे देता है।
 याद रहे कि नब्बे के दशक में बेनजीर भुट्टो ने इंगलैंड में 350 एकड़ का जो आलीशान राज महल नुमा फार्म हाउस ‘अर्जित’ किया था,उसके डायनिंग टेबुल
की कीमत एक लाख 20 हजार पौंड थी।उसे  इटली से मंगाया गया था।
  हालांकि विदेशों में अर्जित कुछ भारतीय नेताओं की संपत्ति की खबरें भी अब  आने लगी हैं।पर पता नहीं उन्हें कब सजा मिलेगी।यहां तो देर से मिला न्याय, न्याय नहीं होता।  

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

--आरक्षण वर्गीकरण का अनावश्यक विरोध--


      संसद के मौनसून सत्र में सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने वाले विधेयक को नए सिरे से लाने की तैयारी में है।
देखना है कि इस बार विपक्ष इस विधेयक पर क्या रवैया अपनाता है ?
यह सवाल इसलिए क्योंकि कांग्रेस ने ओ.बी.सी.के 27 प्रतिशत आरक्षण के वर्गीकरण के विरोध में खड़े होने का संकेत दिया है।
ऐसा करके वह एक राजनीतिक जुआ ही खेल रही है।
  इससे पहले  1990 में राजीव गांधी ने ओबीसी आरक्षण के वी.पी.सिंह सरकार के निर्णय का लोक सभा में विरोध करके कांग्रेस को पिछड़ों से दूर करने का काम किया था।
तब कांग्रेस ने गैर आरक्षित वर्ग के हितों का ध्यान रखा और आज वह पिछड़ों के बीच के संपन्न हिस्से के हितों का ध्यान  रख रही है।
अपेक्षाकृत संपन्न  पिछड़ों का प्रतिनिधित्व करने वाली पर्टियां इन दिनों कांग्रेस की सहयोगी पार्टियां हैं। 
 ध्यान रहे कि  1990 के बाद  कांग्रेस को कभी लोक सभा में  खुद का बहुमत नहीं मिला।
  इधर केंद्र की राजग सरकार ने मंडल आरक्षण व्यवस्था में सुधार के सिलसिले में आरक्षण के 27 प्रतिशत कोटे को तीन हिस्सों में बांट देने की पहल शुरू कर दी है।अगले चुनाव से पहले यह काम पूरा हो जाएगा।
2011 में ही राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने इसकी सिफारिश केंद्र सरकार से की थी।
आयोग की राय थी कि इसके वर्गीकरण से लगभग सभी पिछड़ी जातियों को आरक्षण का लाभ समरूप ढंग से मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।
अभी उसका लाभ अपेक्षाकृत सपन्न पिछड़ों को ही अधिक मिल पा रहा है।
साथ ही केंद्रीय सेवाओं में पिछड़ा कोटे की  सिर्फ 11 प्रतिशत @क्लास -तीन की नौकरियों में@सीटें ही भर पा रही हैं।वर्गीकरण से यह प्रतिशत बढ़ सकता है।
पर, मनमोहन सिंह सरकार ने जाहिर कारणों से इस सिफारिश को लागू नहीं किया। 
  कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हाल में कहा है कि ‘ 27 प्रतिशत आरक्षण का वर्गीकरण करके राजग  सरकार पिछड़ांे की सौदेबाजी की ताकत को कम करने जा रही है।’
ऐसा कहते समय राहुल गांधी ने अति पिछड़ों के हितों का ध्यान नहीं रखा।उन्होंने अपने राजनीतिक सहयोगी दलों के नेताओं की राजनीति का अधिक ध्यान रखा।
दरअसल 1990 का मंडल आरक्षण समाज के कमजोर वर्ग के सशक्तीकरण के लिए था।
उस आरक्षित 27 प्रतिशत सीटों को अब तीन भाग में बांटने का उद्देश्य यह है कि पिछड़ों में जिस तबके को आरक्षण का लाभ अभी  कम  मिल रहा है,उन तक  उसका वाजिब  लाभ पहुंचाया जाए।
 बिहार सहित देश के करीब एक दर्जन राज्यों की  सरकारों ने जब राज्य की नौकरियों में  अति पिछड़ों के लिए अलग से आरक्षण कोटा तय किया  तो उससे अति पिछड़ों को समुचित लाभ मिलना शुरू हो गया।पहले आरक्षण का अधिकांश लाभ दबंग पिछड़े ही उठा लेते थे।याद रहे कि पिछड़ा समुदाय में अति पिछड़ों की जनसंख्या अधिक और दबंग -संपन्न पिछड़ों की संख्या अपेक्षाकृत कम है।
‘पिछड़े पावें सौ में साठ’ के  नारे के प्रणेता डा.राम मनेाहर लोहिया ने भी कहा था कि आरक्षण का लाभ प्रारंभिक वर्षों में संपन्न पिछड़े ही उठाएंगे।बाद में अन्य उठाएंगे।
पर अब तो मंडल आरक्षण लागू हुए 25 साल हो गए।
फिर 27 प्रतिशत कौन कहे ,11 प्रतिशत सीटें ही भर पा रही हैं।पर कांग्रेस राजनीतिक कारणों से समाज की इस सच्चाई से आज भी मुंह मोड़ रही है।
दरअसल  कांग्रेस ने आजादी के बाद से ही कभी पिछड़ों की वास्तविक समस्याओं को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं समझा।
 पचास के दशक में ही केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद -340 के तहत पिछड़ों की हालत पर विचार के लिए काका कालेलकर आयोग का गठन जरूर कर दिया था,पर उसकी मंशा कुछ और ही थीं।
कालेलकर आयोग ने पिछड़ों के लिए नौकरियों में आरक्षण की सिफारिश केंद्र सरकार से की।पर केंद्र सरकार ने उसे रिजेक्ट कर दिया।बहाना यह था कि खुद कालेलकर ने रपट में विपरीत टिप्पणी की थी। 
  साथ ही, तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सन 1961 में देश के सभी मुख्य मंत्रियों को लिखी अपनी चिट्ठी में कहा कि ‘ मैं जाति के आधार पर आरक्षण  के खिलाफ हूं।’
नेहरू की चिट्ठी संविधान के अनुच्छेद -340 की मंशा के खिलाफ थी। यही स्थिति राजनीतिक कार्यपालिका की भी रही।
बिहार  जैसे बड़े राज्य की विधान सभा में  जब भी  कांग्रेस को बहुमत मिला,कांग्रेस ने किसी गैर सवर्ण को मुख्य मंत्री नहीं बनाया।
जबकि, कांग्रेस के पास  पिछड़ों के अपेक्षाकृत अधिक शालीन व ईमानदार नेता उपलब्ध थे।
  नतीजतन पिछड़ी आबादी का झुकाव क्षेत्रीय दलों की ओर होने लगा।
 यदि खुद कांग्रेस ने उन्हें आगे बढ़ाया होता तो पिछड़ों को शालीन व बेहतर नेता उपलब्ध होते। उससे आम पिछड़ों का आज की अपेक्षा अधिक कल्याण होता।
 यहां तक कि कांग्रेस की सरकार ने काका कालेलकर आयोग के बाद कोई आयोग भी नहीं बनाया।मोरार जी देसाई के नेतृत्व में गठित पहली गैर कांग्रेसी सरकार ने बी.पी.मंडल के नेतृत्व में पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया।
 उस आयोग ने 1980 में ही अपनी सिफारिश केंद्र सरकार को सौंप दी थी।
पर कांग्रेस सरकार ने उसे लागू नहीं किया।
मंडल आयोग को लेकर कांग्रेस शासन काल में संसद में तीन बार लंबी चर्चा हुई थी।हर बार सरकार की ओर से कहा गया कि इस आयोग की रपट लागू नहीं किया जा सकता है।
  पर, जब 1989 में वी.पी.सिंह के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकार बनी तो उसने 1990 में केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया।
 उस पर देश भर में भारी हंगामा हुआ।कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व आरक्षण के सख्त खिलाफ था।
राजीव गांधी ने उस मसले पर लोक सभा में तीन घंटे तक भाषण किया।
उन्होंने अपने भाषण में समूची मंडल रपट को खारिज कर देने की कोशिश की।
उस भाषण के कारण पिछड़े वर्ग के लोग कांग्रेस का रुख समझ गए।
इतना ही नहीं, सितंबर 1990 में हुई कांग्रेस कार्य समिति और राजनीतिक मामलों की समिति की साझी बैठक में आरक्षण को लेकर भारी मतभेद सामने आया।
इंडिया टूडे में तब छपी  तत्संबंधी खबर के अनुसार उस साझी बैठक में ‘राजीव गांधी ने मणि शंकर अय्यर का तैयार किया गया एक प्रस्ताव पेश किया।
प्रस्ताव में मंडल आयोग की रपट को एक तरह से पूरी तरह ठुकरा देने की बात कही गयी थी।
पर जैसे ही बैठक शुरू हुई पार्टी जाति व वर्ग के आधार पर बंटी नजर आई। बसंत साठे ने मंडल रिपोर्ट पर हमला बोलते हुए कहा कि वी.पी.सिंह जाति व्यवस्था में फिर से जान फूंक रहे हैं।पार्टी को इसका मुकाबला करना चाहिए।
इसके खिलाफ बोलने के लिए बी. शंकरानंद,सीता राम केसरी, पी.शिव शंकर,डी.पी.यादव और एम.चंद्र शेखर जैसे पिछड़े वर्ग के नेता खड़े हुए।
उनका तर्क था कि कांग्रेस हमेशा दलितों के लिए लड़ी है।अब हम मंडल रिपोर्ट का विरोध कैसे कर सकते हैं ?
मजबूरन राजीव गांधी को बीच का रास्ता अपनाना पड़ा।
बहुमत की राय यही रही कि मंडल आयोग की रपट को पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया जा सकता।’
पर इस संबंध में राजीव गांधी के संसद के भाषण ने ही पिछड़ों में यह संदेश भेज दिया कि पहले की ही तरह कांग्रेस की राय आरक्षण के खिलाफ है।कुछ आरक्षण पर कांग्रेसियों के व्यवहार-वक्तव्य-आचरण से भी यही प्रकट हुआ।
उससे पहले 1978 में कर्पूरी ठाकुर की सरकार ने बिहार में पिछड़ों के लिए 26 प्रतिशत आरक्षण लागू किया तौभी कांग्रेस की राय उसके प्रति सकारात्मक नहीं थी।
यहां तक कि तब सत्ताधारी जनता पार्टी भी बंटी हुई थी।
कर्पूरी ठाकर के इस निर्णय के खिलाफ जारी आरक्षण विरोधी आंदोलन से तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जनसंघ घटक के उन कुछ विधायकों को समझा बुझाकर अलग किया था जो आरक्ष्ण का सड़कों पर विरोध कर रहे थे।
  यह संयोग नहीं था कि अगले साल यानी 1979 में कर्पूरी ठाकुर की सरकार को हटाकर जो सरकार बनी, उसे कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था।
  बिहार का आरक्षण मुंगेरी लाल आयोग की रपट पर आधारित था।
1971 में तत्कालीन   कर्पूरी ठाकुर सरकार ने ही  मुंगेरी लाल आयोग का गठन किया था।
 यानी न तो मंडल आयोग के गठन में कांग्रेस का हाथ था और न ही मुंगेरी लाल आयोग के गठन में।
आज भी कांग्रेस आरक्षण के वर्गीकरण का विरोध करके अपने पैरों में ही कुल्हाड़ी मार रही है।
----सुरेंद्र किशोर 
@मेरे  इस लेख का संपादित अंश 5 जुलाई 2018 के दैनिक जागरण में प्रकाशित@
       




बुधवार, 4 जुलाई 2018

 सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद अब केंद्र सरकार को 
चाहिए कि वह दिल्ली की केजरीवाल सरकार को काम करने दे।
 उससे ‘आप’ सरकार की प्रामाणिकता की भी जांच हो जाएगी।क्योंकि अभी तक तो वह यह कहती रही है कि केंद्र की शह पर एल.जी.काम नहीं करने दे रहे हैं।
यदि केजरीवाल सरकार ने अंततः अच्छा यानी चैंकाने वाला काम किया तो उससे न सिर्फ दिल्ली की जनता को लाभ मिलेगा बल्कि देखा-देखी देश में राजनीति में  एक 
ईमानदार व कर्मठ शैली विकसित होगी।
चाहेंगे तो अन्य दल उससे सीख सकेंगे।
  ‘आप’ में सब ईमानदार नहीं हैं।भाजपा में सब बेईमान भी नहीं हैं।पर अन्य दलों की अपेक्षा ‘आप’ में अधिक ईमानदार व जन सेवी नेता हैं।
एक बार राहुल गांधी ने भी कहा था कि हम आम आदमी पार्टी से सीखेंगे।यह और बात है कि उन्होंने कुछ हीं सीखा।
  अब केंद्र सरकार को चाहिए कि वह अपनी दिल्ली पुलिस को भ्रष्टाचार मुक्त और कुशल बना कर ‘आप’ सरकार से स्वस्थ प्रतियोगिता करे।इससे भाजपा यानी राजग की छवि और भी अच्छी होगी।यह कहने की जरूरत नहीं है कि मन मोहन सिंह सरकार की अपेक्षा नरेंद्र  मोदी सरकार की छवि कुल मिलाकर बेहतर है। 

मंगलवार, 3 जुलाई 2018

-- एक बड़े भ्रष्ट कांग्रेसी नेता को जेल भेजने के कारण इंदिरा ने छीन लिया था नंदा से गृह मंत्रालय--

गुलजारी लाल नंदा के जन्म दिन @4 जुलाई @पर उन्हें श्रद्धांजलि
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-  ‘मैंने एक बड़े कांग्रेसी नेता को भ्रष्टाचार में पकड़ कर जेल भेज दिया था।
इससे काफी लोग नाराज हो गये और उन लोगों ने षड्यंत्र करके मुझे गृह मंत्रालय से हटवा दिया।भ्रष्टाचार दूर करने के लिए पहले राज नेताओं को अपना आचरण सुधारना होगा।’
    यह बात स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने कोलकात्ता की चर्चित साप्ताहिक पत्रिका ‘रविवार’ से बातचीत में कही थी।@रविार-13 अगस्त 1978@
  याद रहे कि 19 अगस्त, 1963 से 14 नवंबर, 1966 तक नंदा जी देश के गृह मंत्री रहे।
यानी ने पिता  जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें गृह मंत्री बनाया और बेटी इंदिरा गांधी ने वह विभाग उनसे छीन लिया।
‘रविवार’ के लिए बातचीत कर रहे वासुदेव साह को इस संबंध में नंदा जी ने 1978 में बताया था कि ‘पहले की अपेक्षा भ्रष्टाचार अब काफी बढ़ गया है।इमरजेंसी में यह सबसे अधिक था।
नेहरू जी के कैबिनेट में पहले मैं योजना देखता था।
मेरी योजना को भ्रष्ट अफसर आगे नहीं बढ़ने देते थे।
मैंने नेहरू जी से इसकी शिकायत की।
उन्होंने प्रशासन में सुधार के लिए मुझे गृह मंत्रालय दिया।
मैंने उस विभाग के माध्यम से कुछ काम किया।
देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक वातावरण बनने लगा।
पर इसी बीच मैंने एक कांग्रेसी को भ्रष्टाचार में पकड़ कर जेल भेज दिया।’
   याद रहे कि नंदा जी दो बार कार्यवाहक प्रधान मंत्री भी रह चुके थे।जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद बारी -बारी से ये मौके आये थे।
  गुलजारी लाल नंदा का 4 जुलाई 1898 को सियालकोट में जन्म हुआ था।उनका निधन 15 जनवरी, 1998 को अहमदाबाद में हुआ।जब वे मरे, तब उनके पास न तो कोई अपना मकान था और न ही आय का कोई जरिया।स्वतंत्रता सेनानी शील भद्र याजी ने उनसे जबरन स्वतंत्रता सेनानी पेंशन योजना के आवेदन पत्र पर दस्तखत करा लिया था।पता नहीं चला कि वे उस राशि को स्वीकार भी करते थे या नहीं। 
ं अहमदाबाद में बसी उनकी पुत्री पुष्पा बेन नाइक ही  जीवन के आखिरी दिनों में उनकी सेवा में लगी रही।
    अपने कार्यकाल के अनुभवों के आधार पर नंदा जी ने बातचीत में यह भी कहा था कि  ‘भ्रष्टाचार दूर करने के लिए राजनेताओं को पहले अपना आचरण सुधारना होगा।दरअसल हमारे यहां के अधिकतर नेता भ्रष्ट हैं।वे नैतिकता को आवश्यक नहीं मानते।
कभी -कभी वे कहते भी हैं कि राजनीतिक व्यक्ति कोई साधु -संन्यासी नहीं होते।
दरअसल वे यह तथ्य भूल जाते हैं कि जीवन के अन्य क्षेत्रों के प्रति भी उनकी  जिम्मेदारी है।
दरअसल राजनेताओं के भ्रष्ट आचरण का फायदा उठाने में अफसर बड़े तेज होते हैं।नेताओं की इन्हीं कमजोरियों का फायदा उठा कर वे भ्रष्टाचार करते हैं।
  लेकिन यदि किसी ईमानदार मंत्री से भ्रष्ट अफसर का झगड़ा हो जाए तो अफसर के भ्रष्टाचार को सामने लाकर उसे सजा देनी चाहिए।’
  एक सवाल के जवाब में गुलजारी लाल नंदा ने यह भी कहा था कि ‘यहां दाल में नमक के बराबर भ्रष्टाचार हो तब न ! यहां तो पूरी दाल भ्रष्टाचार से भरी हुई है।उनसे कहा गया था कि थोड़ा बहुत भ्रष्टाचार तो सारे संसार में है।क्या मूल समस्या यह नहीं है कि भ्रष्टाचार को न्यूनत्तम स्तर पर कैसे रखा जाए ?’
    उनसे जब बातचीत रिकार्ड की गई थी, तब केंद्र में मोरारजी देसाई की सरकार थी।नंदा जी ने जनता पार्टी के नेताओं से यह अपील की कि पहले आप नैतिक होइए, तब  लोगों को नैतिक बनायें।नंदा जी ने कहा कि जनता पार्टी के लोग अपनी संपत्ति की घोषणा करने की बात कह चुके हैं,पर अभी तक उन्होंने यह काम किया नहीं।
   नंदा जी का चरित्र उन अन्य अधिकतर स्वतंत्रता सेनानियों से अलग था जो आजादी के बाद सत्ता में पहुंचे थे।
   सांसद और मंत्री नहीं रह जाने के बाद नंदा के पास अपनी आय का कोई 
जरिया नहीं था।वे अपनी संतान और अपने शुभचिंतकों से भी कोई धनराशि स्वीकार नहीं करते थे।उनके दो पुत्र भी थे।नंदा जी ने हरियाणा के कैथल में आश्रम सहित एक गोशाला अपने कुछ विश्वासपात्रों के माध्यम से विकसित की  थी। पर उससे भी नंदा जी को निकाल दिया गया था।करीब बीस साल तक केंद्रीय मंत्री रह चुकने के बावजूद वे दिल्ली की डिफेंस कालानी के किराए के मकान में रहने लगे थे।पर किराया देने में जब वे असमर्थ हो गये तो वे अहमदाबाद अपनी बेटी के पास चले गये।
  इस बीच कई प्रधान मंत्रियों और दिल्ली प्रशासन ने उन्हें मकान देने का अॅाफर दिया,पर वे राजी नहीं हुए।गांधीवादी नंदा यह मानते थे कि बिना श्रम किये जनता से टैक्स में मिले  पैसे लेना पाप है।काश ! आज के अधिकतर हुक्मरान नंदा जी की इस बात पर थोड़ा भी ध्यान देते तो इस देश की ऐसी हालत नहीं होती, जैसी हो गयी  है।  
             ---सुरेंद्र किशोर

सोमवार, 2 जुलाई 2018

कल ‘डाक्टर दिवस’ के अवसर पर मुझे 
पटना के ही दो डाक्टर अनायास याद आ गए।
दोनों में से किसी से मिला नहीं हूं।
पर दोनों के बारे में सुन रखा है।
एक जन सेवी तो दूसरे पैसे के पीछे पागल।
   डा.अरूण तिवारी ने जब प्रैक्टिस शुरू की थी,तब उनकी फीस मात्र दो  रुपए थी।अब बढ़कर 50 रुपए हो गयी है।
 उनक पुत्र आंशुमान तिवारी के अनुसार 
बिजली बिल व स्टाफ के वेतन के खर्च में बढ़ोत्तरी के कारण फीस बढ़ानी पड़ी। 
उनके मार्ग दर्शक और पटना के बड़े चिकित्सक रहे दिवंगत डा.शिव नारायण सिंह से प्रेरित होकर डा.तिवारी ऐसा करते हैं।यहां तक कि वे गरीब व असहाय लोगों से कोई फीस भी नहीं लेते। बल्कि दवा का भी प्रबंध कर देते हैं।
 पटना के गुलबी घाट के पास प्रैक्टिस कर रहे डा.तिवारी इतने योग्य चिकित्सक हैं कि दूर- दूर के मरीजों की  यह इच्छा रहती है कि वे एक बार अरूण तिवारी से दिखा लेते।
  धरती के एक ऐसे भगवान डा.तिवारी के बीच एक अर्थकामी डाक्टर की भी चर्चा कर ली जाए।
मेरे ड्रायवर को न्यूरो समस्या थी।उसने पटना के एक नामी चिकित्सक से संपर्क किया।उस डाक्टर साहब ने एक साथ दस दवाएं लिख दीं।
मैंने गुगल में देखा --डुप्लीकेशन लगा ।
ड्रायवर की स्थिति बिगड़ती गयी।फिर उसने डा.गोपाल प्रसाद सिंहा से दिखाया।उन्होंने आधी दवाएं लिखीं और वह ठीक हो गया।
 1972 में मैं डा.शिव नारायण सिंह के यहां गया था।उन दिनों में राजेंद्र नगर में रहते थे।गैस समस्या थी।मैंने उनसे आग्रह किया कि आप मेरे खून-पखाना-पेशाब का पैथोलाॅजिकल टेस्ट लिख दीजिए।
उन्होंने पूछा कि क्या तुम्हारे पास बहुत पैसे हैं ? मैंने कहा कि नहीं।फिर क्यों पैसे बर्बाद करना चाहते हो  ? उसकी कोई जरूरत नहीं।मैंने जिद की तो लिख दिया।जांच रपट लेकर गया तो उन्होंने कहा कि कहा था न कि इसकी कोई जरूरत नहीं है।तुम्हारा सब कुछ ठीक है।फिर भी उन्होंने आई.डी.पी.एल.में बनी अत्यंत सस्ती दवा लिख दी।शायद कुछ पैसे की आती थी।
कुछ पैसों में ही मेरी समस्या दूर हो गयी।




-- झारखंड आंदोलन के स्तम्भ रहे बागुन सुम्ब्रई ने की थी 57 शादियां--




अनेक विशेषताओं से भरे  प्रमुख आदिवासी नेता बागुन सुम्ब्रई झारखंड आंदोलन के स्तम्भ थे।उन्होंने अविभाजित बिहार की राजनीति को भी अपने ढंग से प्रभावित किया था।
 94 साल की उम्र में गत माह उनका निधन हो गया।      लीजेंड्री हाॅकी प्लेयर व आदिवासी नेता जयपाल सिंह  के 1963 में कांग्रेस में शामिल हो जाने के बाद एन.ई.होरो के साथ मिलकर बागुन ने झारखंड आंदोलन को आगे बढ़ा दिया था।
 वे अलग झारखंड प्रदेश की मांग कर रहे थे।
हालांकि वे आदिवासी नेता होने के बावजूद अन्य लोगों के साथ भी अच्छा व्यवहार करते थे।
 साधु वेशधारी बागुन ने न सिर्फ 57 शादियां की थीं बल्कि वे चार बार विधायक और पांच बार सांसद भी रहे।उससे पहले वे 15 साल मुंडा और 12 साल मुखिया थे।वे और उनकी पत्नी मुक्तिदानी अविभाजित बिहार में  मंत्री भी रहे।
 बागुन की एक पत्नी तुलसी देवगम ने जब एक बच्ची को जन्म दिया था,उस समय बागुन की उम्र 85 साल थी।
बागुन सुम्ब्रई ने कई बार दल बदला,पर उनका जनाधार कम नहीं हुआ।
कहा जाता है कि हर शादी के बाद उनका जनाधार बढ़ जाता था।
 सुकर पूरती ने उनकी जीवनी लिखी है।एक बार जब पूरती से उनसे पूछा कि ‘क्या आपने  52 शादियां की हैं ?’  उस पर उन्होंने न तो हां कहा और न ना।पर बाद में  पटना के पत्रकार नलिन वर्मा को सुम्ब्रई ने बताया था कि मैंने  57 शादियां की हैं।यह बात और है कि उनमें
से अधिकतर लड़कियों की उन्होंने बाद में दूसरी शादी करवा दी।वे जिस ‘हो’ समुदाय से आते थे ,उसमें 
बहु पत्नीवाद उस संस्कृति का हिस्सा है।बागुन ने कहा था  कि इसे बुरा नहीं माना जाता।ं
  अविभाजित बिहार की राजनीति को प्रभावित करने वाले बागुन  सिंहभूम जिले के निवासी थे।उन्होंने  जब 1942 में अपनी पहली शादी की तो उसकी भी  कहानी फिल्मी रही।दिवंगत सुम्ब्रई ने खुद कभी मीडिया को बताया था कि उनकी पहली पत्नी दासमती के पिता से उनके पिता की सोलह साल से खूनी दुश्मनी चल रही थी। दोनों पक्षों की कई जानें जा चुकी थीं।इस खानदानी दुश्मनी को समाप्त करने के लिए युवा बागुन ने चुपके से दासमती से मुलाकात की।उसे बताया कि हमलोग शादी कर लें तो दो परिवारों की दुश्मनी समाप्त हो जाएगी।दासमती राजी हो गई।शादी हो गईं।दुश्मनी समाप्त भी 
हो गई।पर बागुन के पिता इस शादी से खुश नहीं थे।वे अपने पुत्र की कहीं और शादी चाहते थे।
फिर पिता की इच्छा के तहत बागुन ने 1945 में चंद्रावती से दूसरी शादी की।
    बागुन सुम्ब्रई की तीसरी घोषित शादी मुक्तिदानी से हुई।मुक्तिदानी खिलाड़ी थी।और घमंडी भी।
एक अवसर पर उसने बागुन को गाली दे दी।बागुन ने तय किया कि इसका घमंड तोड़ने के लिए इससे शादी कर लेनी चाहिए।बागुन सुम्ब्रई ने मुक्तिदानी को अपने प्रेमपाश में फंसा ही लिया।1959 में दोनों की शादी हो गई।मुक्तिदानी से शादी बागुन के जीवन में हलचल पैदा करने वाली साबित हुई।यही नहीं कि मुक्तिदानी 1977 और 1980 में विधायक और 1983 में बिहार सरकार में मंत्री बनीं बल्कि उन्होंने बागुन सुम्ब्रई की अगली शादी का जी जान से विरोध भी किया।मुकदमेबाजी हुई और दोनों के बीच मारपीट भी।यह भी आरोप लगा कि मुक्तिदानी ने बागुन को जहर देने की कोशिश की थी।
    मुक्तिदानी ने विश्वनाथ, विमल और मुन्नी को जन्म दिया।विश्वनाथ सुम्ब्रई  भी एक सवर्ण  लड़की से प्रेम विवाह करके कभी चर्चा में आए थे।बाद में विश्वनाथ की 1994 में रांची में एक दुर्घटना में मौत हो गई।पर विश्वनाथ ने अपने पिता के साथ संघर्ष में अपनी मां का साथ दिया।
यह नौबत तब आई जब अस्सी के दशक में बागुन ने चाईबासा की एक नर्स बेबी रोजम्मा से शादी कर ली।मुक्तिदानी ने इसका हिंसक विरोध किया।न सिर्फ रोजम्मा के साथ मारपीट की गई बल्कि 
मुक्तिदानी ने इस शादी के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में केस भी कर दिया।बहुपत्नीवाद में विश्वास रखने वाले इस आदिवासी नेता पर उनकी  किसी पहली पत्नी ने केस किया था तो वह मुक्तिदानी ही थीं।।केस तो रोजम्मा ने भी सन 1988 के अप्रैल में मुक्तिदानी और उनके बेटों पर किया था।आरोप लगाया गया था कि मुक्तिदानी और उनके बेटों ने  गुंडों के साथ नर्सेज होस्टल में जाकर रोजम्मा पर हमला किया।हमलावरों के पास घातक हथियार थे।मुक्तिदानी ने रोजम्मा के बाल पकड़ कर पीटा।वह बेहोश हो गई।
      यह सब तब तक चला जब तक रोजम्मा केरल नहीं लौट गई।बाद में तो मुक्तिदानी ने बागुन की सेवा की जब वे बीमार हो गए थे ।अब मुक्तिदानी नहीं रहीं। अपनी राजनीतिक उपलव्धियों के लिए भी जाने जाते हैं ,पर बहुपत्नीवाद के कारण उनका राजनीतिक योगदान थोड़ा मद्धिम रहता था।
  बाल और दाढ़ी बढ़ाए और सिर्फ धोती लपेटकर पहनने वाले श्री सुम्ब्रई ने कई रिकार्ड बनाए हैं।बागुन सुम्ब्रई के साथ कभी शिबू सोरेन काम करते थे।खुद बागुन ग्रेट आदिवासी नेता जयपाल सिंह के सहकर्मी थे।
 बागुन 1967 में पहली बार बिहार विधान सभा के सदस्य बने थे।साठ -सत्तर के दशकों में अविभाजित बिहार में  जब मिलीजुली सरकारों का दौर चल रहा था तो बार- बार दल बदल कर मंत्री पद पाने वाले कुछ विधायकों में उनका भी नाम था। 1977 में वे 
सिंहभूमि से निर्दलीय सांसद चुने गए।बाद में तो वे कई बार अलग -अलग दलों के टिकट पर सांसद बनें ।
यदि बागुन के जीवन पर कोई फिल्म बने तो वह खूब चलेगी,ऐसा फिल्मों के जानकार लोग बताते हैं। 
@मेरा यह लेख 2 जुलाई 2018 को फस्र्टपोस्ट हिन्दी पर
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