शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

--मनिआर्डर इकाॅनोमी से स्वावलंबन की ओर सारण--



एक चर्चित कहावत है। अमेरिका ने सड़कें बनायीं और सड़कों ने अमेरिका को बना दिया।इस कहावत से सड़कों के महत्व का पता चलता है।
  इधर बिहार के सारण जिले में सड़कों के साथ- साथ पुल और फ्लाई ओवर  भी बन रहे हैं।वह भी ऐसा -वैसा फ्लाई ओवर नहीं।बल्कि डबल डेकर यानी दो मंजिला फ्लाई ओवर।वह छपरा शहर में बनेगा।इसी बुधवार को उसका शिलान्यास हो गया।
उस अवसर पर मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा की है कि गंगा नदी पर दाना पुर से दिघवारा तक एक नया पुल भी बनेगा।
किसी ठोस शुरूआत के बिना मुख्य मंत्री ऐसी घोषणा नहीं करते।इसलिए सारण के लोग यह समझ कर खुश हंै कि यह पुल बनेगा जरूर ।यानी  प्रस्तावित दाना पुर-दिघवारा गंगा पुल पर काम भी जल्द ही शुरू हो जाएगा।
  उम्मीद है कि सरकार लोगों की इस  उम्मीद को जल्द ही पूरा करेगी। 
वह प्रस्तावित पुल पटना महा नगर को सारण जिले से जोड़ने वाला दूसरा गंगा पुल होगा।
पहला  पुल जेपी सेतु हाल ही में बन कर तैयार हुआ है।
वह चालू है।उसका लाभ लोगों को मिलने लगा है। गांधी सेतु भी बहुत दूर नहीं है।
उधर बबुरा-डोरी गंज गंगा पुल ने भी भोज पुर और सारण के बीच की दूरी घटा दी है।
  सारण में मढ़ौरा और दरिया पुर के रेल कारखाने ने भी वहां के लोगों की उम्मीदें बढ़ाई हंै।
  पर सबसे अधिक लाभ प्रस्तावित दाना पुर-दिघवारा पुल से होने की उम्मीद है।
इससे गंगा के उत्तर में उप नगर विकसित होने की उम्मीद बढ़ी है।
 यमुना पार की तरह।
अविभाजित सारण जिले को कभी मनी आर्डर इकाॅनोमी वाला जिला कहा जाता था।
यानी देश के किसी भी जिले की अपेक्षा सारण के लोगों को  बाहर से  सबसे अधिक मनिआर्डर मिलते  थे।बाहर कमाने गए  उनके परिजन उन्हें भेजते थे।
 यानी कम जमीन और सघन आबादी वाले इस जिले से काम की तलाश में बहुत सारे लोग बाहर चले जाते रहे हैं।आज भी जाते हैं।
 यदि सारण जिले की ओर सरकार व जन प्रतिनिधियों का ध्यान गया है तो वह अकारण नहीं है।किन्हीं खास जिलों को अत्यंत पिछड़ा छोड़कर आप पूरे राज्य को विकसित नहीं बना सकते।
 सारण जिला लालू प्रसाद का भी राजनीतिक क्षेत्र रहा है। वे वहां से सासंद व विधायक हुआ करते थे।सन 1990 में जब वे मुख्य मंत्री बने तो उन्होंने इस जिले को पूर्ण रोजगार मुक्त जिला बनाने 
के अपने निर्णय की घोषणा की।आवेदन मांगे गये।लाखों आवेदन आए।उन आवेदनों पर कोई निर्णय हो, उस बीच मंडल आरक्षण आंदोलन शुरू हो गया।फिर तो उस सरकार की कार्य शैली ही बदल गयी।
हालांकि बाद में रेल मंत्री के रूप लालू प्रसाद ने मढ़ौड़ा और दरिया पुर में रेल कारखाने की स्थापना की शुरूआत की।वैसे  उन पर ठोस काम हाल में ही  हो सका ।कुल मिला कर अब यह उम्मीद की जा सकती है कि एक पिछड़े इलाके का  विकास अब तेज होगा।
     --सारण का रिकाॅर्ड--
सारण जिला स्थित  सोन पुर का रेलवे प्लेटफार्म कभी देश का सबसे लंबा प्लेटफार्म था।
पर अब गोरखपुर ने वह स्थान ले लिया है।
सोन पुर का पशु मेला अब भी देश का सबसे बड़ा मेला माना जाता है।
इधर छपरा में जब  डबर डेकर फ्लाईओवर बन कर तैयार होगा तो वह अपने ढंग का देश का सबसे बड़ा फ्लाई ओवर होगा।
साथ ही, अब यह भी उम्मीद की जानी चाहिए कि सारण देर सवेर देश के 
 गरीब जिलों में से एक नहीं रहेगा।    
   --चुनाव वर्ष के चरचे--
सन 2019 में लोक सभा का चुनाव होने वाला है।
यानी यह जो चल रहा है ,वह चुनाव वर्ष है।चुनाव पूर्व की राजनीतिक गतिविधियां शुरू भी हो चुकी  हैं।
चुनाव वर्ष में कुछ खास बातें व चर्चाएं होती हैं।उन खास बातों में
दो बातों की यहां चर्चा कर ली जाए।
एक तो ज्योतिषियों की बन आती है।
दूसरी बात यह भी होती है कि कुछ नेता लोग अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कई बार बे सिर पैर की बातें फैलाने की कोशिश करने लगते हैं।
 सन 1989 के लोक सभा चुनाव से ठीक पहले एक पत्रिका ने देश के दस नामी ज्योतिषियों की चुनावी भविष्यवाणियां छापी थीं।उनमें से नौ की भविष्यवाणी गलत निकली।उनके मुकाबले चुनाव सर्वेक्षणों और  अखबारों की भविष्यवाणियां वास्तविकता के  अपेक्षाकृत अधिक करीब थीं।
  इसके साथ ही कुछ नेताओं की ऐसी संपत्तियों का भी ‘खुलासा’ होने लगता है जो उनके पास होती ही नहीं हैं।
अब तो खैर अनेक नेताओं के पास बहुत संपत्ति आ चुकी है,पर जब संपत्ति काफी कम हुआ करती थी,तब से ऐसी अफवाहें उड़ती रही है।
 1977 की बात है।जब मोरारजी देसाई प्रधान मंत्री बने तो कुछ लोगों ने यह उड़ा दिया कि मोरारजी क्लाथ मिल्स भी उन्हीं का है।
 सच्चाई का पता बाद में चला।
 मोरारजी देसाई  के पास न तो कोई मकान था और न कोई जमीन।
गुजरात के बुलसर में उनके पास पुश्तैनी मकान था।उसमें उनके भाई भी हिस्सेदार थे।मोरारजी के कहने पर उनके भाई इस बात पर राजी हो गए कि वह मकान गल्र्स स्कूल को दे दिया जाए।दे दिया गया।
     --कैसे रहे सदन में शांति--
 राज्य सभा की नियम पुनरीक्षण समिति ने अपनी अंतरिम सिफारिश में कहा है कि हंगामा करने वाले सदस्यों की सदस्यता अपने -आप समाप्त हो जाने का नियम होना चाहिए।
 इसके लिए सदन की  कार्य संचालन नियमावली में जरूरी बदलाव हो जाना चाहिए।
दूसरी सिफारिश यह है कि राज्य सभा का प्रश्न काल 11 बजे से शुरू हो।
पहले ऐसा ही होता था।पर कुछ साल पहले 12 बजे से शुरू होने लगा।
पीठासीन अधिकारियों के आदेश का लगातार उलंघन करने वाले सदस्यों के लिए यदि कोई ठोस व सबक सिखाने लायक  सजा की व्यवस्था 
हो जाए तो वह लोकतंत्र के लिए सही रहेगा।
      --एक भूली-बिसरी याद---
स्वतंत्रता सेनानी व पूर्व केंद्रीय मंत्री महावीर त्यागी ने लिखा है कि 
‘ 14 मई 1947 को बापू बहुत थके हुए थे कि उनसे मिलने डा.विधान चंद्र राय आए।उनके स्वास्थ्य को देखकर उनसे कहा कि ‘यदि आपको अपने लिए नहीं तो जनता की अधिक सेवा कर सकने के लिए आराम लेना  आपका धर्म नहीं हो जाता ?’
बापू बोले,‘हां,यदि लोग मेरी कुछ भी सुनें और मैं लोगों के और सत्ताधीश मित्रों के लिए किसी उपयोग का हो सकूं तो जरूर ऐसा करूं।’
परंतु अब मुझे नहीं ंलगता कि मेरा कहीं भी कोई उपयोग है।भले ही मेरी बुद्धि मंद हो गयी हो फिर भी इस संकट के काल में आराम करने की बजाय ‘करना या मरना’ ही पसंद करूंगा।मेरी इच्छा काम करते- करते
और राम रटन करते -करते मरने की है।मैं अपने अनेक विचारों में अकेला पड़ गया हूं।फिर भी अपने अनेक मित्रों के साथ दृढ़ता से भिड़ने का साहस ईश्वर मुझे दे रहा है।’
त्यागी लिखते हैं,‘उन दिनों केंद्र और सभी प्रदेशों में राष्ट्रीय सरकारों की स्थापना हो चुकी थी,पर हमारे मंत्रिमंडलों का जो रहन -सहन और कार्य प्रणाली थी,उससे बापू खुश नहीं थे।
लोगों की शिकायत थी कि अनेक त्याग व बलिदान के सहारे कांग्रेस एक महान संस्था बनी है और इसका इतिहास बहुत उज्ज्वल है फिर भी शासन की सत्ता हाथ में आने से कांग्रेसी उन गुणों को खोते जा रहे हैं और पद प्राप्ति के लिए अनुचित रूप से स्पद्र्धा कर रहे हैं।
        ---और अंत में---ं
महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘एक बार हमारे देश में पंचायती राज स्थापित हो जाए तो जनमत वह कर पाएगा जो हिंसा कभी नहीं कर सकती।’
आज की पंचायती व्यवस्था को देखकर क्या यह लगता है कि बापू  का सपना पूरा हुआ ?  
@ 13 जुलाई 2018 के प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@





किसानों की आय में वृद्धि के बिना कैसे बढ़ेंगे उद्योग-धंधे !


मन मोहन सिंह सरकार ने सन 2010 में धान के लिए न्यूनत्तम समर्थन मूल्य 50 रुपए बढ़ा दिए थे।उस सरकार ने 2008 के लिए 155 रुपए कर दिए थे।
 उनकी सरकार ने 2012-13 के लिए 170 रुपए बढ़ाए।
याद रहे कि 2009 में लोकसभा चुनाव हो चुका था।
 2014 में चुनाव होने वाला था।
अब जब 2019 में लोक सभा चुनाव होने वाला है तो नरेंद्र मोदी सरकार ने एम.एस.पी.में रिकाॅर्ड 
बढ़ोत्तरी कर दी है।याद रहे कि 2015-16 मेें मोदी सरकार ने मात्र 50 रुपए की बढ़ोत्तरी की थी।
 यानी विभिन्न सरकारें चुनावों को ध्यान में रखकर किसानों की चिंता करती रही है।
 उधर उद्योगपतियों और व्यापारियों पर सरकारी बैंकों के जरिए अरबों रुपए लुटाने में सरकार अतिरिक्त उदारता बरतती रही है।कभी जानबूझकर तो कभी अनजाने में।
  देश में उद्योग भी बढ़ने ही चाहिए।अधिक कर्जे उद्योग के लिए ही मिलते  हैं।
पर जब तक कृषि व कृषकों का आथर््िाक विकास नहीं होगा,तब तक उद्योग कैसे बढ़ेंगे ?
कारखानों में उत्पादित माल को खरीदने वालों की पहले संख्या तो बढाइए।
  इस साल सरकार न्यूनत्तम समर्थन मूल्य के जरिए देश के किसानों को 15 हजार  करोड़ रुपए देने जा रही है। 
  मोटा- मोटी अनुमान के अनुसार इनमें से करीब 5 हजार करोड़ रुपए फिर भी बिचैलिए खा जाएंगे।
पांच हजार करोड़ रुपए किसान अपनी खेती में लगाएंगे।
बचे 5 हजार करोड़ रुपए में से किसान अपने बच्चों के लिए पोशाक ,जूता, स्टेशनरीज , थैला और परिवार के लिए  जरूरी सामान खरीदंेगे जिनका उत्पादन  छोटे -बड़े कारखानों में होता है।
  इससे कारखानों के मुनाफा बढ़ेंगे।और नये कारखाने लगेंगे।
 यानी खेती के साथ- साथ उद्योग का भी विकास होगा।
पर आजादी के बाद से ही हमारी सरकारों ने कृषकों की आय बढ़ाने के बदले कारखानों के विकास की ओर  अधिक ध्यान दिया।सरकार ने पब्लिक सेक्टर इकाइयों को बढ़ाया ताकि सफेदपोश लोगों को अधिक से अधिक नौकरियां दी जा सके।पर पब्लिक सेक्टर के लिए जितनी कठोर ईमानदारी व कार्य कुशलता की जरूरत होती है, उन पर ध्यान नहीं दिया गया।नतीजतन अधिकतर लोक उपक्रम सफेद हाथी बनते चले गये।
याद रहे कि आज भी इस देश के करीब 70 प्रतिशत आबादी खेती से जुड़ी है।
अन्य अनेक तरीकों से कृषकों की आय बढ़ानी जरूरी है।  
--बहुद्देश्यीय जल प्रबंधन परियोजना--
सारण प्रमंडल  की मही नदी पर प्रस्तावित बहुद्देश्यीय जल
प्रबंधन परियोजना पर प्रारंभिक काम शुरू हो गया है।
यह छोटी नदी गंडक नदी से निकल कर गोपालगंज और  सिवान होते हुए सारण जिले के  छितु पाकर गांव के पास गंगा नदी में मिल जाती है।
 इस प्रस्तावित परि योजना के तहत इस नदी में कई चेक बांध बना कर पानी को रोकने का प्रावधान होगा।स्लूइस गेट  आवाजाही के लिए पुल का भी काम करेंगे।
मछली पालन संभव होगा।सिंचाई के लिए सालों भर पानी उपलब्ध रहेगा।इस नदी के पानी को साफ करके  पेय जल के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।
वर्षा जल रुकने के कारण भूजल स्तर को बनाये रखने व बढ़ाने में सुविधा होगी।
पर इसके साथ ही इस नदी में पास की जो नदी आकर मिलती है,उसके लिए भी ऐसी ही बहुद्देश्यीय योजना बनाने की जरूरत है।
  रिटायर हेड मास्टर राघव प्रसाद सिंह की सलाह पर मुख्य मंत्री ने इस नदी परियोजना पर शुरूआती काम शुरू करवा दिया है।
 राज्य के अन्य जिलों में भी ऐसी छोटी -छोटी नदियों पर ऐसी परियोजनाएं बनें तो  प्रदेश के किसानों की आय बढ़ेगी।
    -- उधर क्या हो रहा यह सब !--
डी.एन.ए.टेस्ट के लिए किस तरह के सेम्पुल फारंेसिक साइंस लेबोरेटरीज में भेजे जाएं,इस विधा की पक्की जानकारी डाक्टरों को होनी चाहिए।
पर दुःखद स्थिति है कि ऐसी बुनियादी जानकारी भी अनेक डाक्टरों को नहीं है।
एक अन्य खबर के अनुसार आरक्षण कोटे की बनिस्पत भारी डोनेशन देकर मेडिकल काॅलेजों में दाखिला करवाने और डाक्टर बन कर निकलने वालों से डाक्टरी पेशा का स्तर  अधिक गिर रहा है।
 डाक्टरी पेशा की बात कौन करे, अब तो सी.बी.एस.ई.अपनी परीक्षा की काॅपियां जांच करने वाले ऐसे योग्य शिक्षक भी नहीं खोज पा रहा है जो माक्र्स की सही- सही टोटलिंग भी कर सके।
 आए दिन यह खबर आती रहती है कि परीक्षाओं में गलत प्रश्न पत्र सेट कर दिए जाते हैं।इससे सेटरों के स्तर का पता चलता है।जब देश में शिक्षा-परीक्षा का स्तर ही लगातार नीचे की ओर जा रहा हो तो क्या कहना ?
 हाल में यह खबर आई कि लाॅ कालेज के छात्रों ने धमकी दे दी कि यदि आप परीक्षा में चोरी नहीं करने देंगे तो हम परीक्षा का बहिष्कार कर देंगे।
 नयी नौकरी पाए जो  शिक्षक लगातार तीन बार जांच परीक्षा में फेल कर जा रहे हैं,उनकी नौकरी भी बनाए रखी जा रही है।
बिहार के डी.जी.पी.ने पिछले दिनों कहा था कि कई जांच अधिकारियों को कानून का सामान्य ज्ञान भी नहीं है। अपने देश में यह सब क्या हो रहा है ?
--एक भूली बिसरी याद-- 
  पूर्व उप प्रधान मंत्री जगजीवन राम की पुण्य तिथि पर उनकी याद में दो शब्द।
 बाबू  जग जीवन राम जब सन 1984 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सासाराम लोक सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे,तब एक बात राजनीतिक हलकों में तैर रही थी।
वह यह कि तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी चाहते थे कि बाबू जी को लोक सभा में होना चाहिए।
 याद रहे कि इंदिरा जी की हत्या के कारण तब कांग्रेस के पक्ष में देश भर में सहानुभूति की लहर थी।
 तब कांग्रेस बिहार की लोक सभा की 54 सीटों में से 48 सीटें जीत गयीं थी।‘बाबू जी’ भी जीते जरूर,पर सिर्फ 13 सौ मतों से।
इस तरह  हमेशा चुनाव जीतने का उनका रिकाॅर्ड कायम रह गया।
सन 1986 में उनका निधन हो गया।
याद रहे कि जग जीवन राम को लोग ‘बाबू जी’ कहा करते  थे।
 1977 में प्रधान मंत्री पद के लिए जग जीवन राम का नाम जरूर आया था।पर मोरारजी देसाई उनसे बीस पड़े।
सबसे बड़ी बात यह थी कि मोरारजी पूरे आपातकाल  जेल में थे ।उन्होंने पेरोल पर छूट जाने की कोई कोशिश तक नहीं की।दूसरी ओर तब के मंत्री जगजीवन राम ने  संसद में इमरजेंसी की मंजूरी का प्रस्ताव पेश किया था।
चुनाव की घोषणा के बाद ही जगजीवन बाबू ने कांग्रेस छोड़ी थी।
   जगजीवन राम में  इतने अधिक  गुण थे जो किसी नेता को महान बना देने के लिए पर्याप्त हैं।उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति के लिए अपना निजी कैरियर छोड़कर आजादी की लड़ाई में शामिल हो जाना भी एक बड़ी बात थी। ंवे प्रभावशाली वक्ता व कुशल प्रशासक के रूप में चर्चित हुए।जिस मंत्रालय को उन्होंने संभाला,उसमें बेहतर काम हुए।उन्हें इस देश व समाज की बेहतर समझ थी। बांग्ला देश युद्ध के समय वे रक्षा मंत्री थे।
--और अंत में--
पंजाब के मुख्य मंत्री अमरेंदर सिंह ने आदेश दिया है कि इस बात का पता लगाने के लिए सरकारी सेवकों की वार्षिक स्वास्थ्य परीक्षण होगा कि वे नशीली
दवाएं लेते हैं या नहीं।
  दरअसल ड्रग्स के ओवरडोज लेने  से पंजाब में बढ़ रही मौतों के कारण राज्य सरकार चिंतित है।
वहां के एक मंत्री ने सलाह दी है कि बड़े पुलिस अफसरों की भी  ऐसी ही जांच होनी चाहिए।उधर यह भी मांग उठी है कि मुख्य मंत्री सहित सभी जन प्रतिनिधियों की भी जांच जरूरी है।
याद रहे कि पिछले पंजाब विधान सभा चुनाव में अकाली-भाजपा सरकार की हार का एक बड़ा  कारण यही था।आरोप था कि 
पिछली  सरकार ड्रग्स माफिया को संरक्षण दे रही थी।
ऐसा ड्रग टेस्ट अन्य राज्यों में भी होना चाहिए।
@6 जुलाई 2018 को प्रभात खबर -बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@




गुरुवार, 12 जुलाई 2018

पूर्व मुख्य मंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह के जन्म दिन --12 जुलाई --के अवसर पर 
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----छोटे साहब में  था अपनी भूलेंं भी गिनाने का नैतिक साहस ---
              
   अधिक साल नहीं हुए जब  सत्येंद्र बाबू उर्फ छोटे साहब की जीवनी प्रकाशित हुई। जब वह तैयार हो रही थी,तभी मुझे उसके बारे में बताया गया था कि उसमें खरी -खरी बातें रहेंगीं।
 बिहार की राजनीति के विदयार्थी की हैसियत से मुझे उस जीवनी की बड़ी प्रतीक्षा थी।
जब प्रकाशित होने में देर हुई तो मैंने उन महानुभावों से कई बार कहा भी था कि भई,जल्दी कीजिए।
  जब वह दीर्घ-प्रतिक्षित पुस्तक आई तो मैं उसे पढ़ गया।उस पुस्तक का नाम ही पढ़ कर लग गया कि वह ईमानदारी से लिखी गई पुस्तक होगी। नाम है, ‘मेरी यादें,मेरी भूलें।’यादें तो अनेक लोग लिखते रहे हैं,पर अपनी भूलें तो कोई- कोई ही लिखता है।अपनी भूलें स्वीकार करना और उसे लिख भी देना बड़ी हिम्मत का काम है।उसके लिए बेजोड़ नैतिक साहस की जरूरत है।ऐसा सोचते हुए वह पुस्तक मैं पढ़ गया। उसे पढ़कर मेरी धारणा कैसी बनी,यह तो मैं बाद में बताऊंगा।पहले एक अन्य सज्जन की धारण बताता हूं।चूंकि मैं चाहता था कि  उसे अधिक से अधिक प्रबुद्ध लोग पढ़ें, इसलिए मैंने एक स्वतंत्रता सेनानी और श्रीबाबू तथा महेश बाबू के प्रशंसक और सहकर्मी को पढ़ने को दिया।उसे पढ़ने के बाद उनकी प्रतिक्रिया थी कि ‘सुरेंद्र जी मेरी धारणा सत्येंद्र बाबू के बारे में अब बदल गई।मुझे अब तक कुछ और बातें ही उनके बारे में बताई जाती थी।जितनी ईमानदारी से उन्होंने यह जीवनी लिखी या लिखवाई है,वह तो अदभुत है। वास्तव में वे एक बड़े आदमी हैंे।’याद रहे कि तब तक छोटे साहब जीवित थे।
  मैंने भी उनसे कहा कि यदि सत्येंद्र बाबू के कुछ जीवित समकालीन नेता भी इसी तरह ईमानदारी से  बिहार कांग्रेस की और राज्य सरकार की कहानियां लिखते तो राजनीति के छात्रों,पत्रकारों  व शोधकर्ताओं का बड़ा भला होता।
   दरअसल पूर्व मुख्य मंत्री  सत्येंद्र नारायण सिंह की जीवनी में सबसे बड़ी खूबी यह है कि उन्होंने अपनी भूलों और गलतियोंे को भी उसी बेबाकी से लिखा है जिस बेबाकी से अपनी उपलब्धियों को । आज तो स्थिति यह है कि अधिकतर नेतागण अपनी सरकार या फिर पार्टी की उपलब्धियों के लिए श्रेय तो खुद ले लेते हैं और विफलताओं का ठीकरा दूसरों  पर फोड़ देते हैं।कुछ नेताओं की यह आदत रही है कि चुनावी जीत का श्रेय तो वे खुद ले लेते हैं,पर चुनावी विफलता के लिए मीडिया या फिर अफवाह फैलाने वाली किसी काल्पनिक शक्ति को जिम्मेदार ठहरा देेते हैं।पर जिस बेबाकी से छोटे साहब ने अपनी भूलों को भी गिनाया है,उससे उनकी उपलब्धियों के बयान पर भी पाठकों को सहज ही विश्वास हो जाता है।पाठक जानते हैं कि भूल-स्वीकार तो  कोई भीतर से ईमानदार नेता या व्यक्ति ही कर सकता है।
समाजवादी राजनीति से पत्रकारिता में आने के कारण अपवाद को छोड़कर मेरे मन में आम कांग्रेसी नेताओं के प्रति प्रारंभिक दिनों में  
कोई श्रद्धा का भाव नहीं रहा।लगता रहा कि आजादी के शहीदों के  सपनों को सत्ता में आने के बाद इन लोगों को याद नहीं रखा। हां, पर वैसे स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति जरूर मेरे मन में इज्जत रही है जिन्होंने आजादी के बाद सत्ता का बेजा लाभ नहीं उठाया।
  पर समय बीतने के साथ ही जब लगभग सारे दलों के अनेक नेतागण  बारी -बारी से केंद्र और राज्य की सत्ता में आने लगे और उनके अच्छे -बुरे कर्मों से लोगबाग अवगत होने लगे तो नेताओं का तुलनात्मक अध्ययन आसान हो गया।
इस नजर देखने पर लगता है कि सत्येंद्र बाबू जैसे नेता  इक्के -दुक्के ही बच गये हैं।लगता है कि आज राजनीति की नई फसल कुछ दूसरे ही ढंग की हो रही है।यह देश और प्रदेश के लिए दुःखद है,पर स्थिति तो आज यही है।ऐसे में सत्येंद्र बाबू को यदाकदा  याद करते रहना 
आज की पीढ़ी के लिए ठीक  रहेगा।
  ‘मेरी यादें मेरी भूलें’ के कम से कम दो प्रसंगों की चर्चा करना चाहूंगा जिनसे उनकी साफगोई और उनकी भावुकता झलकती है।
एक प्रसंग वीरचंद पटेल बनाम के.बी.सहाय चुनाव को लेकर था।सन 1963 मेें कांग्रेस विधायक दल के नेता पद के चुनाव में सत्येंद्र बाबू की मदद से के.बी.सहाय जीत गये थे और वीरू बाबू हार गये थे। सत्येंद्र बाबू ने मेरी यादें मेरी भूलें में लिखा कि ‘चुनाव हो जाने के बाद मैंने जब वीरू बाबू को चुनाव स्थल से बाहर निकलते देखा तो मैं रो पड़ा।मगर कुछ भी बात नहीं हुई।मैं घर चला गया और अपना कमरा बंद कर लिया।मैंने किसी से माला तक नहीं ली और न बधाई स्वीकार की।यहां तक कि जब कष्ण बल्लभ बाबू मेरे घर आये तो मैं उनसे भी नहीं मिला।वह मेरे परिवार के लोगों से मिलकर चले गये।मुझे बेहद दुःख हुआ था।पारिवारिक रिश्ते को धक्का जो लगा था।एक दिन बाद मैं वीरू बाबू के घर गया और उनके पैरों पर गिर कर माफी मांगी।फिर धीरे -धीरे हमलोगों का संबंध पूर्ववत होने लगा।’
  वीरचंद पटेल उर्फ वीरू बाबू से बिहार विभूति डा.अनुग्रह नारायण सिंह का भी कैसा निकट का संबंध था,इसकी चर्चा सत्येंद्र बाबू ने की है।उनके अनुसार ,‘मरने के दस मिन  पहले बाबू जी ने वीरू बाबू को बुला कर कहा था ,‘वीरू मैं तो अब सारा भार  तुम पर छोड़ कर जा रहा हूं।’
‘जब सन 52 में वीरू बाबू को डिप्टी मिनिस्टर बनाया गया,तब बाबू जी को बड़ी चोट लगी थी।बाबू जी ने उन्हें अपने साथ रखा था।श्रम और कषि विभाग का पूरा भार उनको सौंप दिया था। इतने निकट का संबंध हम लोगों के बीच था,पर सन 1963 के नेता पद के चुनाव में यह संबंध दुर्भाग्यवश चरमरा गया।’
   अपने राजनीति फायदे के लिए या फिर अपनी गलती स्वीकारने के लिए अनेक नेताओं द्वारा चोरी -छिपे किसी ताकतवर नेता के पैर पकड़ने की दबी-छिपी घटनाओं की चर्चाएं राजनीति के अंतःपुर में होती ही रहती है।पर शायद किसी अन्य नेता ने ऐसा लिख देने की हिम्मत नहीं की।
   एक अन्य प्रसंग में सत्येंद्र बाबू ने ‘मेरी यादें मेरी भूलें’ में लिखा कि उन्होंने किस तरह अपने ही दल के उम्मीदवार देव शरण सिंह को फतुहा विधान सभा चुनाव क्षेत्र में हरवा दिया।हरवाने के प्रयास में विनोदानंद झा,वीरचंद पटेेल और खुद सत्येंद्र बाबू का हाथ था।
‘देव शरण बाबू 1952 में स्वास्थ मंत्री बनाये गये थे।उस समय वे एम.एल.सी.थे।शायद उनकी अवधि समाप्त हो रही थी और फतुहा क्षेत्र रिक्त हो गया था।
  उस समय कृष्ण बल्लभ बाबू , बिहार केसरी डा.श्रीकृष्ण सिंह के पक्षधर थे। 
उन्होंने यानी कृष्णबल्लभ बाबू ने तय किया था कि अनुग्रह बाबू की मदद लिए बगैर देव शरण सिंह को विजयी बना कर खंडू भाई देसाई की रपट को गलत साबित कर देंगे।स्मरणीय है कि खंडू भाई देसाई ने यह रिपोर्ट केंद्र दी थी कि ‘श्रीबाबू और अनुग्रह बाबू के एक साथ रहे बिना बिहार नहीं चलेगा।’ 
     कृष्ण बल्लभ बाबू के दम्भ को चूर करने के लिए हम लोगांे ने निर्णय किया कि देवशरण सिंह को हरा देना चाहिए।उसी क्षेत्र से शिव महादेव पी.एस.पी.के उम्मीदवार थे।हमलोगों ने उन्हें समर्थन देना शुरू कर दिया।ब्रजनंदन यादव और परमात्मा सिंह को माध्यम बनाया गया।जगजीवन बाबू ने भी जन सभाएं कीं और भाषण किया,पर उन्होंने भी प्रमुख हरिजन नेताओं को बुलाकर कह दिया कि पटना जिला के अध्यक्ष अवधेश बाबू जैसा कहें,चुनाव में आप सभी वैसा ही करें।अंततः देवशरण बाबू सात या आठ सौ मतों से हार गये।’
   कई अन्य नेतागण भी अपने ही दल के प्रतिद्वंद्वी गुट के उम्मीदवारों को हरवाते रहे हैं।पर है किसी में ऐसी हिम्मत कि वह यह बात कबूल भी करे।कुल मिलाकर यही लगता है कि जिसके जीवन में उपलब्धियों  अधिक होती हैं,वही व्यक्ति अपनी पुस्तक का नाम ‘मेरी यादें मेरी भूलें’ रखने का साहस करता है। ऐसे ही रहे सत्येंद्र बाबू।आज जब राजनीति का अर्थ आम तौर पर व्यवसाय 
हो चुका है,राजनीति में बचे -खुचे बेहतर तत्वों को सत्येंद्र बाबू की किताब यानी उनकी बेबाक  जीवनी जरूर पढ़नी चाहिए।शायद वे अपने लिए उससे  कुछ रोशनी ग्रहण कर सकें।--सुरेंद्र किशोर।
@ 2010@

बुधवार, 11 जुलाई 2018

 कई दशक पहले इस देश में एक  कहावत प्रचलित थी।वह यह कि ‘गंुडे और गली के कुत्ते की जिंदगी दस  से पंद्रह साल की ही होती है।’
पर जब से गुंडों को जातीय और राजनीतिक संरक्षण मिलने लगा,तब से उनकी आयु बढ़ गयी है।हां,बेचारे गली के कुत्ते 
की जिंदगी उतनी ही पर अभी ठिठकी हुई है।  

प्रभाष जोशी के बारे में धर्मवीर भारती के उद्गार !
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एक यशस्वी संपादक व अद्भुत  पत्रकार होने के साथ ही प्रभाष जोशी आले दर्जे के इन्सान भी थे।
वे ‘जनसत्ता’ परिवार के मुखिया की तरह थे।
एक साथ इस देश के अनेक लोग यह मानते थे कि प्रभाष
 जी उन्हें ही सबसे अधिक प्यार करते हैं।
 बड़ी- बड़ी बातें सोचने, अनोखे ढंग से लिखने के साथ-साथ निजी संबंधों को दिल की गहराइयों से निभाने की अद्भुत  क्षमता वाले व्यक्ति को ईश्वर ने समय से पहले यानी 2009 में बुला लिया।
  उनकी षष्टिपूत्र्ति पर प्रभाष जोशी के बारे में धर्मवीर भारती ने इन शब्दों में अपने उद्गार व्यक्त किए थे।
‘दिल्ली से जितना अब घबराता हूं उतना ही तब भी घबराता था।
अजीब शहर है।पत्रकारिता की दुनिया में जिससे भी मिलो ,पता चलता था कि वह अभी -अभी फलां मिनिस्टर से मिल कर आ रहा है और अमुक समस्या पर उन्हें क्या करना चाहिए ,उसकी रणनीति तय करने में बड़ी देर हो गई।
या फिर मिलेगा तो तपाक से हाथ मिलाकर कहेगा ,अरे भाई साहब, कब आए दिल्ली ?
पता ही नहीं चला।मिलूंगा।अभी जरा जल्दी में हूं।कमाल का शहर है,यहां कोई मिनिस्टर से मिलकर आ रहा होता था,या मिनिस्टर से मिलने जा रहा होता था।
बाकी कोई बात ही नहीं।
कौन सम्पादित करता है इसे ?
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‘वे एम.एम.टी.सी.के वरिष्ठ जन संपर्क अधिकारी थे।
उनकी मेज के बगल में हिन्दी-अंग्रेजी के दर्जनों समाचार पत्रों के ताजे संस्करण पड़े रहते थे।
मुझमें पत्रकारिता की जिज्ञासु वृत्ति जाग जाती और उलट पुलट कर अखबारों का जायजा लेने लगता था।
एक अखबार देखा-जनसत्ता।
पढ़ा तो और आकर्षक लगा।
समाचारों का बहुत संगत चयन,शीर्षकों में एक अनोखापन,सनसनी से बचता,फिर भी ध्यान खींचने वाला।
 अंदर की सामग्री देखी,जानदार टिप्पणियां,तीखी चुटीली लेकिन मर्यादित।भाषा में अंग्रेजी अनुवाद का नकलीपन नहीं,बल्कि हिन्दी का सहज आत्मीय प्रभाव।
दो तीन दिन बाद तो यह हाल हुआ कि पहुंचते ही सबसे पहले ढूंढ़कर जनसत्ता की प्रति निकालना और पढ़ना शुरू कर देना।
अखबार पढ़कर ही सुरेंद्र और उनकी महफिल की तरफ मुखातिब होता।इस रुख को सुरेंद्र ने भांप लिया।
एक दिन बोले-जनसत्ता में कुछ धर्मयुग के काम का मसाला मिल रहा है क्या ?
‘ नहीं यार, ये अखबार मुझको बहुत अच्छा लग रहा है।जिन्दा दिल,जागरूक और तेज नजर वाला ।  कौन संपादित करता है इसे ?’
मैंने पूछा।
 ‘मिलेंगे ?मेरे मित्र हैं प्रभाष।गोयनका जी उन्हें लाए हैं।फोन करूं उन्हें ?’
मैं संकोच में पड़ गया।कोई परिचय नहीं।
आखिर तय हुआ कि उनके दफ्तर में चलेंगे।
बिना फोन  किए अकस्मात।
दफ्तर दूर नहीं था।
इंडियन एक्सप्रेस की इमारत में एम.एम.टी.सी.का दफ्तर था।
दो चार मंजिल नीचे उतर कर  जनसत्ता का दफ्तर।
सुरेंद्र ने अपनी दो -चार फाइलें निबटार्इं और बोले चलिए !
प्रभाष जी पहले सम्पादक थे दिल्ली में जो न किसी मिनिस्टर से मिलने जा रहे थे और न मिल कर आए थे।अपने दफ्तर में, अपने केबिन में अपनी मेज पर बैठे अपने अखबार के किसी पृष्ठ का ले -आउट देख रहे थे।सादा कुत्र्ता ,धोती,सांवला पर 
आबदार चेहरा।
सुरेंद्र ने परिचय कराया तो तपाक से उठे ,मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर बोले,‘आपको नहीं मालूम।मैं इन्दौर में था,तब से धर्मयुग का फैन हूं।
आपसे मिलने की कितनी इच्छा थी।शरद जोशी से आपकी कितनी बातें सुनी हैं।’
सुबहे बनारस,शबे मालवा 
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प्रभाष जी बड़ी विनम्रता से हंसे,और फिर बातों का सिलसिला शुरू हो गया।
प्रभाष बातें करने लगे इन्दौर की।फिर तो असली मुद्दों पर बातें होने लगीं।यानी इलाहाबाद के लोक नाथ की मिठाइयां अच्छी होती हैं,या इन्दौर के सराफे की,इन्दौर ज्यादा हरा- भरा है या इलाहाबाद ।
अंत में समन्वय यहां हुआ कि सुबहे बनारस ,शामे अवध और शबे मालवा।यह थी प्रभाष जोशी से पहली भेंट।
वो सुखद अहसास
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जब उन्होंने जनसत्ता में ‘कागद कारे’ लिखना शुरू किया तो मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि अपने सहज आत्मीय संस्पर्श से वे अपने लेखन को कितना रसमय भी बना सकते हैं।
और विषय भी कितने विविध !
राजनीतिक समस्या से लेकर क्रिकेट के चैक्के -छक्के तक।
इतने बहुआयामी व्यक्तित्व में कुछ इनसानी कमजोरियां भी होंगी हींं।
एक कमजोरी तो मैं बता ही सकता हूं।वह है उनकी अतिशय भावुकता,जो कभी -कभी निर्बंध हो उठती हैं।कभी अगर विवेक कमजोर पड़ता है तो हमारी सदा प्रसन्नवदना भाभी @जिन्हें वे विनोद में भैन जी कहते हैं@संभाल लेती हैं।
ये दोनों इसी तरह हंसते -बोलते बने रहें और इनकी गहरे पैठनेवाली ,रस भरी लेखनी अविराम गति से चलती रहे।इसी शुभ कामना के फूल मैं उनकी षटिपूत्र्ति पर अर्पित करता हूं।प्रभाष जी महाराज इन्हें स्वीकार करें।’
@भारती जी के उद्गार सुरेश शर्मा संपादित पुस्तक ‘प्रभाष पर्व’ से@
@ 11 जुलाई 2018@

15 जुलाई दिवंगत प्रभाष जोशी का जन्म दिन है।
आज से 15 जुलाई तक यशस्वी पत्रकार व जनसत्ता के प्रधान संपादक रहे प्रभाष जी की याद में संक्षेप में मैं कुछ-कुछ  सामग्री प्रस्तुत करता रहूंगा।
 उनके बारे में डा.नामवर सिंह के कुछ वाक्य प्रस्तुत हैं--
‘लगातार पन्द्रह वर्षों तक किसी अखबार में एक काॅलम का जारी रहना अपने आप में एक मिसाल है।सिर्फ ‘कागद कारे’ को ही पढ़ने के लिए मेरे जैसे बहुत से लोग रविवारी जनसत्ता लेते रहे हैं।
 ‘कागद कारे’ एक तरह से आज का महा भारत है और उसके लेखक प्रभाष जी आधुनिक व्यास।
फर्क सिर्फ यह है कि व्यास को लिखने के लिए गणेश की मदद लेनी पड़ी ,जबकि प्रभाष जी लिखने के मामले में भी स्वयंसेवी रहे सिर्फ एक अपवाद को छोड़कर और वह भी आपद्धर्म में।
इस प्रक्रिया में क्रमशः जो ग्रंथ तैयार हुआ, वह भी महा भारत की तरह ही एक साथ इतिहास भी है और काव्य भी विविध उपाख्यानों के साथ लगभग डेढ़ दशकों का एक महाख्यान !
  पन्द्रह वर्षों के बाद आज ‘कागद कारे’ का एकत्र प्रकाशन एक तरह से युगांत का सूचक है।महाभारत को भी युगांत की  संज्ञा दी गयी है।
1992 से भारतीय लोकतंत्र में एक नए युग का आरम्भ हुआ था जिसकी चरम परिणति का आभास 2008 में होने लगा है।
ऐसी स्थिति में अभी तक के समग्र ‘कागद कारे’ का प्रकाशन निश्चय ही एक ऐतिहासिक घटना है।
  व्यास की तरह प्रभाष जी ने यह दावा तो नहीं किया कि ‘ जो कुछ यहां है ,वह दूसरी जगह भी है और जो यहां नहीं है वह कहीं नहीं है।’फिर भी समग्रतः कागद कारे में कथित युगांत का प्रतिबिम्ब पर्याप्त समावेशी है।यदि इस युग के चरित नायकांे पर दृष्टिपात करें तो सबसे पहले खंड ‘जीने के बहाने’ में अंकित चरित्रों की सूची पर ही सरसरी नजर दौड़ा लेना काफी है।
20 राजनीतिक नेता हैं तो उनसे अधिक सामाजिक कार्यकत्र्ता हैं।एक दर्जन साहित्यकार हैं तो आधे दर्जन संगीतकार,चित्रकार और फिल्म निर्माताओं की भी  छवियां सुशोभित  हैं।खेल जगत और उसमें भी क्रिकेट तो प्रभाष जी की अपनी रूचि का विशिष्ट क्षेत्र है।इसलिए उस दुनिया की यदि 16 विभूतियां जगमगाती हुई दिखें तो क्या आश्चर्य !
उल्लेखनीय है कि प्रभाष जी की इस चित्रशाला में देश के यशस्वी उद्योगपतियों को भी सम्मान के साथ स्थान दिया गया है।
तात्पर्य यह है कि प्रभाष जी का प्रस्तुत ‘रचनावृत्त’ कोरा वृतांन्त नहीं बल्कि महाभारत की तरह हाड़-़मांस के जीते -जागते इन्सानों से पूरी तरह आबाद है।’
@ 10 जुलाई 2018@

मंगलवार, 10 जुलाई 2018

  आप जो मछली खाते हैं,उनमें से अधिकांश कई दिन पहले पानी से निकाली गयी होती है। अधिक मात्रा में फार्मलिन नामक रसायन का इस्तेमाल करके  उसे सड़ने से बचाया जाता है।
 फार्मलिन से कैंसर पैदा होता है।
  आज के ‘हिन्दू’ की खबर के अनुसार 30 में से 11 नमूनों की जांच से मछली में फार्मलिन पाया गया।
  इससे पहले हिन्दू ने ही गत जनवरी में अंडों के बारे में चैंकाने वाली खबर दी थी।
रोगों से बचाने के लिए मुर्गों को जो एंटी बायटिक कोलिस्टीन दिया जाता है,वह मानव शरीर के लिए घातक  है।
ऐसे कोलिस्टीन युक्त मुर्गे खाने वाले व्यक्ति जब खुद  बीमार पड़ेंगे तो उन पर कोई भी एंटीबाॅयोटिक काम नहीं करेगा।
क्योंकि कोलिस्टीन को ‘लास्ट होप’ कहा जाता है।
  गत मई में प्रभात खबर ने खबर दी थी कि पटना रेलवे जंक्शन के पास सड़न और गंदगी में केमिकल से बड़े पैमाने पर पनीर बना कर दूर- दूर तक भेजा जा रहा है।
यह बात उस समय की है जब अटल जी प्रधान मंत्री थे।
पटना हवाई अड्डे पर उन्हें जो मिनरल वॅाटर परोसा गया, वह नकली था।
कान पुर में तब के प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह के साथ भी वही हुआ था।
 इस देश में जो दूध बेचा जा रहा है,उसमें से 85 प्रतिशत नकली है।
अधिकतर दवाओं और  भोज्य व खाद्य पदार्थ का भी यही हाल है।
‘पैथोलाॅजिकल जांच पर करोड़ों रुपए कमीशन डाक्टरों को मिलता है।’@प्रभात खबर-16 दिसंबर 2017@
कितना गिनाएं ?
कुछ के साथ तो फिलहाल जीना ही पड़ेगा।पर जब मुर्गा से अधिक प्रोटीन मूंगफली में उपलब्ध है तो मुर्गा क्यों खाना  ?
अंग्रेजों के जमाने में पटना नगर पालिका  के डाक्टर मांस के लिए काटे जाने से पहले हर बकरे की मेडिकल जांच कर लेते थे।पता नहीं किसके शरीर में टी.बी.की बीमारी हो जो लोगों के शरीर तक  पहुंच जाए !
पर अब तो इस तरह की सनसनीखेज खबरें छपने के बाद भी 
आम तौर पर कहीं की कोई सरकार सबक सिखाने वाली कोई कारगर कार्रवाई नहीं करती।क्योंकि कार्रवाई करने पर एक तो ‘आय’ बंद हो जाएगी या फिर जातीयता व सांप्रदायिक वोट बैंक लाॅबी नाराज हो जाएगी।इस तरह अपना देश ऐसे ही मौत की ओर सड़कता जाता है।
  इसलिए जब तक इस देश में सिंगा पुर के लीन कुआन यू @ 1923-2015@की तरह कोई लोक कल्याणकारी  तानाशाह न पैदा हो जाए, तब तक मुर्गा,अंडा तथा मांस खाना तो आप छोड़ ही सकते हैंं।इसके विकल्प मौजूद भी हैं।
हां,पर ,ऐसा तानाशाह नहीं हो जो अपनी गद्दी बचाने के लिए या फिर अपनी संतान को उत्तराधिकारी बनाने के लिए तानाशाह बने।भ्रष्ट-जातिवादी-परिवारवादी तानाशाह ऊपर लिखी बुराइयों को खत्म नहीं कर पाएगा।