गुरुवार, 12 जुलाई 2018

पूर्व मुख्य मंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह के जन्म दिन --12 जुलाई --के अवसर पर 
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----छोटे साहब में  था अपनी भूलेंं भी गिनाने का नैतिक साहस ---
              
   अधिक साल नहीं हुए जब  सत्येंद्र बाबू उर्फ छोटे साहब की जीवनी प्रकाशित हुई। जब वह तैयार हो रही थी,तभी मुझे उसके बारे में बताया गया था कि उसमें खरी -खरी बातें रहेंगीं।
 बिहार की राजनीति के विदयार्थी की हैसियत से मुझे उस जीवनी की बड़ी प्रतीक्षा थी।
जब प्रकाशित होने में देर हुई तो मैंने उन महानुभावों से कई बार कहा भी था कि भई,जल्दी कीजिए।
  जब वह दीर्घ-प्रतिक्षित पुस्तक आई तो मैं उसे पढ़ गया।उस पुस्तक का नाम ही पढ़ कर लग गया कि वह ईमानदारी से लिखी गई पुस्तक होगी। नाम है, ‘मेरी यादें,मेरी भूलें।’यादें तो अनेक लोग लिखते रहे हैं,पर अपनी भूलें तो कोई- कोई ही लिखता है।अपनी भूलें स्वीकार करना और उसे लिख भी देना बड़ी हिम्मत का काम है।उसके लिए बेजोड़ नैतिक साहस की जरूरत है।ऐसा सोचते हुए वह पुस्तक मैं पढ़ गया। उसे पढ़कर मेरी धारणा कैसी बनी,यह तो मैं बाद में बताऊंगा।पहले एक अन्य सज्जन की धारण बताता हूं।चूंकि मैं चाहता था कि  उसे अधिक से अधिक प्रबुद्ध लोग पढ़ें, इसलिए मैंने एक स्वतंत्रता सेनानी और श्रीबाबू तथा महेश बाबू के प्रशंसक और सहकर्मी को पढ़ने को दिया।उसे पढ़ने के बाद उनकी प्रतिक्रिया थी कि ‘सुरेंद्र जी मेरी धारणा सत्येंद्र बाबू के बारे में अब बदल गई।मुझे अब तक कुछ और बातें ही उनके बारे में बताई जाती थी।जितनी ईमानदारी से उन्होंने यह जीवनी लिखी या लिखवाई है,वह तो अदभुत है। वास्तव में वे एक बड़े आदमी हैंे।’याद रहे कि तब तक छोटे साहब जीवित थे।
  मैंने भी उनसे कहा कि यदि सत्येंद्र बाबू के कुछ जीवित समकालीन नेता भी इसी तरह ईमानदारी से  बिहार कांग्रेस की और राज्य सरकार की कहानियां लिखते तो राजनीति के छात्रों,पत्रकारों  व शोधकर्ताओं का बड़ा भला होता।
   दरअसल पूर्व मुख्य मंत्री  सत्येंद्र नारायण सिंह की जीवनी में सबसे बड़ी खूबी यह है कि उन्होंने अपनी भूलों और गलतियोंे को भी उसी बेबाकी से लिखा है जिस बेबाकी से अपनी उपलब्धियों को । आज तो स्थिति यह है कि अधिकतर नेतागण अपनी सरकार या फिर पार्टी की उपलब्धियों के लिए श्रेय तो खुद ले लेते हैं और विफलताओं का ठीकरा दूसरों  पर फोड़ देते हैं।कुछ नेताओं की यह आदत रही है कि चुनावी जीत का श्रेय तो वे खुद ले लेते हैं,पर चुनावी विफलता के लिए मीडिया या फिर अफवाह फैलाने वाली किसी काल्पनिक शक्ति को जिम्मेदार ठहरा देेते हैं।पर जिस बेबाकी से छोटे साहब ने अपनी भूलों को भी गिनाया है,उससे उनकी उपलब्धियों के बयान पर भी पाठकों को सहज ही विश्वास हो जाता है।पाठक जानते हैं कि भूल-स्वीकार तो  कोई भीतर से ईमानदार नेता या व्यक्ति ही कर सकता है।
समाजवादी राजनीति से पत्रकारिता में आने के कारण अपवाद को छोड़कर मेरे मन में आम कांग्रेसी नेताओं के प्रति प्रारंभिक दिनों में  
कोई श्रद्धा का भाव नहीं रहा।लगता रहा कि आजादी के शहीदों के  सपनों को सत्ता में आने के बाद इन लोगों को याद नहीं रखा। हां, पर वैसे स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति जरूर मेरे मन में इज्जत रही है जिन्होंने आजादी के बाद सत्ता का बेजा लाभ नहीं उठाया।
  पर समय बीतने के साथ ही जब लगभग सारे दलों के अनेक नेतागण  बारी -बारी से केंद्र और राज्य की सत्ता में आने लगे और उनके अच्छे -बुरे कर्मों से लोगबाग अवगत होने लगे तो नेताओं का तुलनात्मक अध्ययन आसान हो गया।
इस नजर देखने पर लगता है कि सत्येंद्र बाबू जैसे नेता  इक्के -दुक्के ही बच गये हैं।लगता है कि आज राजनीति की नई फसल कुछ दूसरे ही ढंग की हो रही है।यह देश और प्रदेश के लिए दुःखद है,पर स्थिति तो आज यही है।ऐसे में सत्येंद्र बाबू को यदाकदा  याद करते रहना 
आज की पीढ़ी के लिए ठीक  रहेगा।
  ‘मेरी यादें मेरी भूलें’ के कम से कम दो प्रसंगों की चर्चा करना चाहूंगा जिनसे उनकी साफगोई और उनकी भावुकता झलकती है।
एक प्रसंग वीरचंद पटेल बनाम के.बी.सहाय चुनाव को लेकर था।सन 1963 मेें कांग्रेस विधायक दल के नेता पद के चुनाव में सत्येंद्र बाबू की मदद से के.बी.सहाय जीत गये थे और वीरू बाबू हार गये थे। सत्येंद्र बाबू ने मेरी यादें मेरी भूलें में लिखा कि ‘चुनाव हो जाने के बाद मैंने जब वीरू बाबू को चुनाव स्थल से बाहर निकलते देखा तो मैं रो पड़ा।मगर कुछ भी बात नहीं हुई।मैं घर चला गया और अपना कमरा बंद कर लिया।मैंने किसी से माला तक नहीं ली और न बधाई स्वीकार की।यहां तक कि जब कष्ण बल्लभ बाबू मेरे घर आये तो मैं उनसे भी नहीं मिला।वह मेरे परिवार के लोगों से मिलकर चले गये।मुझे बेहद दुःख हुआ था।पारिवारिक रिश्ते को धक्का जो लगा था।एक दिन बाद मैं वीरू बाबू के घर गया और उनके पैरों पर गिर कर माफी मांगी।फिर धीरे -धीरे हमलोगों का संबंध पूर्ववत होने लगा।’
  वीरचंद पटेल उर्फ वीरू बाबू से बिहार विभूति डा.अनुग्रह नारायण सिंह का भी कैसा निकट का संबंध था,इसकी चर्चा सत्येंद्र बाबू ने की है।उनके अनुसार ,‘मरने के दस मिन  पहले बाबू जी ने वीरू बाबू को बुला कर कहा था ,‘वीरू मैं तो अब सारा भार  तुम पर छोड़ कर जा रहा हूं।’
‘जब सन 52 में वीरू बाबू को डिप्टी मिनिस्टर बनाया गया,तब बाबू जी को बड़ी चोट लगी थी।बाबू जी ने उन्हें अपने साथ रखा था।श्रम और कषि विभाग का पूरा भार उनको सौंप दिया था। इतने निकट का संबंध हम लोगों के बीच था,पर सन 1963 के नेता पद के चुनाव में यह संबंध दुर्भाग्यवश चरमरा गया।’
   अपने राजनीति फायदे के लिए या फिर अपनी गलती स्वीकारने के लिए अनेक नेताओं द्वारा चोरी -छिपे किसी ताकतवर नेता के पैर पकड़ने की दबी-छिपी घटनाओं की चर्चाएं राजनीति के अंतःपुर में होती ही रहती है।पर शायद किसी अन्य नेता ने ऐसा लिख देने की हिम्मत नहीं की।
   एक अन्य प्रसंग में सत्येंद्र बाबू ने ‘मेरी यादें मेरी भूलें’ में लिखा कि उन्होंने किस तरह अपने ही दल के उम्मीदवार देव शरण सिंह को फतुहा विधान सभा चुनाव क्षेत्र में हरवा दिया।हरवाने के प्रयास में विनोदानंद झा,वीरचंद पटेेल और खुद सत्येंद्र बाबू का हाथ था।
‘देव शरण बाबू 1952 में स्वास्थ मंत्री बनाये गये थे।उस समय वे एम.एल.सी.थे।शायद उनकी अवधि समाप्त हो रही थी और फतुहा क्षेत्र रिक्त हो गया था।
  उस समय कृष्ण बल्लभ बाबू , बिहार केसरी डा.श्रीकृष्ण सिंह के पक्षधर थे। 
उन्होंने यानी कृष्णबल्लभ बाबू ने तय किया था कि अनुग्रह बाबू की मदद लिए बगैर देव शरण सिंह को विजयी बना कर खंडू भाई देसाई की रपट को गलत साबित कर देंगे।स्मरणीय है कि खंडू भाई देसाई ने यह रिपोर्ट केंद्र दी थी कि ‘श्रीबाबू और अनुग्रह बाबू के एक साथ रहे बिना बिहार नहीं चलेगा।’ 
     कृष्ण बल्लभ बाबू के दम्भ को चूर करने के लिए हम लोगांे ने निर्णय किया कि देवशरण सिंह को हरा देना चाहिए।उसी क्षेत्र से शिव महादेव पी.एस.पी.के उम्मीदवार थे।हमलोगों ने उन्हें समर्थन देना शुरू कर दिया।ब्रजनंदन यादव और परमात्मा सिंह को माध्यम बनाया गया।जगजीवन बाबू ने भी जन सभाएं कीं और भाषण किया,पर उन्होंने भी प्रमुख हरिजन नेताओं को बुलाकर कह दिया कि पटना जिला के अध्यक्ष अवधेश बाबू जैसा कहें,चुनाव में आप सभी वैसा ही करें।अंततः देवशरण बाबू सात या आठ सौ मतों से हार गये।’
   कई अन्य नेतागण भी अपने ही दल के प्रतिद्वंद्वी गुट के उम्मीदवारों को हरवाते रहे हैं।पर है किसी में ऐसी हिम्मत कि वह यह बात कबूल भी करे।कुल मिलाकर यही लगता है कि जिसके जीवन में उपलब्धियों  अधिक होती हैं,वही व्यक्ति अपनी पुस्तक का नाम ‘मेरी यादें मेरी भूलें’ रखने का साहस करता है। ऐसे ही रहे सत्येंद्र बाबू।आज जब राजनीति का अर्थ आम तौर पर व्यवसाय 
हो चुका है,राजनीति में बचे -खुचे बेहतर तत्वों को सत्येंद्र बाबू की किताब यानी उनकी बेबाक  जीवनी जरूर पढ़नी चाहिए।शायद वे अपने लिए उससे  कुछ रोशनी ग्रहण कर सकें।--सुरेंद्र किशोर।
@ 2010@

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