शनिवार, 3 नवंबर 2018

सच्ची कथा का ‘मोरल’ !
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1.- नाम मत पूछिएगा।नाम लिख कर बेकार किसी झंझट में 
पड़ने से क्या लाभ !
ऐसी घटना इस देश के किसी भी कोने में हो सकती है।
  एक धनपशु के बिगड़ैल पुत्र ने अपनी दनदनाती महंगी कार
से दो गरीबों को कुचल कर मार दिया।
पिता ने पैसे और पैरवी के बल पर उसे  बचा लिया।
  कुछ साल बाद उस पुत्र ने अपनी सनसनाती कार को दुर्घटनाग्रस्त करके खुद को ही मार लिया।
याद रहे कि दुर्घटना उसने जानबूझ कर नहीं की थी।बेचारा 
होश में नहीं था।
ऐसी स्थिति में भारी दुःख में पड़े उसके माता-पिता क्या सोच रहे होंगे ?
यही न कि यदि उसे पहली ही गलती के कारण हल्की सजा हो गयी होती तो शायद वह दूसरी गलती नहीं करता।
उसकी जान तो बची रहती।
खैर, धन के नशे में डूबे उस अभागे किन्तु अदूरदर्शी माता-पिता के समक्ष पछताने के सिवा कोई चारा नहीं रहा।पर ऐसे अन्य बिगड़ैल बेटों के माता-पिता तो ऐसी घटनाओं से सबक ले ही सकते हैं।होशियार व्यक्ति दूसरों की गलती से सीख लेता है।पर बेवकूफ लोग खुद कर के देखते हैं।
2.- अब कहानी एक अन्य हस्ती की।इनका भी नाम पूछने या कहने से कोई लाभ नहीं। इस देश ऐसे कई हो सकते हैं।
उन्होंने सत्ता के मद में चूर होकर जब सरकारी धन को लूटना शुरू किया तो अखबारों ने भी लूट की उनकी कहानी लिखनी शुरू कर दी।
नेता जी ने ऐसे पत्रकारों से  चुन-चुन कर बदला लिया। किसी को कोस कर , किसी को धमका कर तो किसी को नौकरी से निकलवा कर।
पर जब उनकी धनलोलुपता परवान चढ़ी तो वे मजबूत कानूनी फंदे में फंस गए।
शरीर थकने लगा।उससे निकलने का कोई चारा नहीं रहा।
जीवन के अंतिम दिनों में वे उस पत्रकार की तारीफ करने लगे जिस पर वे कभी सर्वाधिक नाराज रहा करते  थे।उसे नौकरी से निकलवाया भी था।
    शायद उन्हें मरने से पहले यह महसूस हुआ होगा कि काश ! उस पत्रकार की पहली ही तेजाबी खबर को  चेतावनी  के रूप में लिया होता तो जीवन की संध्या बेला में हमारी यह गत नहीं होती।
उस पत्रकार के बारे में उनका ‘मृत्यु पूर्व बयान’ था,‘फलां पत्रकार संत है।फकीर है। 24 कैरेट का सोना है।’
इन शब्दों में उनका अव्यक्त प्रायश्चित भी छिपा था।
 काश ! इस देश के अन्य धनलोलुप नेता, अफसर और दूसरे  पेशे के लालची लोग उस दिवंगत नेता के ‘अनुभव’ व प्रायश्चित  से सबक लेते तो वे भी परेशानी से बचते और सरकारी -गैरसरकारी खजाने भी  सुरक्षित रहते।  




  
  --राजनीति में सही-गलत का पैमाना-- 
         --सुरेंद्र किशोर-- 
प्रशंसा,प्रगति,उपलब्धि और शक्ति को संभाल लेना किसी भी व्यक्ति के लिए दुष्कर काम रहा है। राजनीति  सहित विभिन्न क्षेत्रों के ढेरों शक्तिशाली लोगों के इतिहास को देख कर यह साफ नजर आता है।जो संभाल लेते हैं,लोग उनका यश गाते हैं।लोग उन्हें श्रद्धा से याद करते हंै।उनके निधन के बाद आम लोग उनकी प्रतिमाएं लगाते हैं।
जो नहीं संभाल पाते उनमें से किसी का मंत्री पद छूट जाता है तो किसी को जेल की रोटी खानी पड़ती है।
कोई हाशिए पर जाकर विस्मृत हो जाता है।किसी अन्य के साथ कुछ और होता है।
उम्र के  आखिरी पड़ाव में जब होश ठिकाने आते हैं,तब तक देर हो चुकी होती है।
निधन के बाद उनकी प्रतिमाएं लगाने के लिए आम तौर पर सिर्फ रिश्तेदार उपलब्ध होते हैं।
यह और बात है कि कुछ ऐसी हस्तियांे के संदर्भ में कानून अपना काम करता है,कुछ अन्य के बारे में नहीं करता।कुछ लोगों के लिए दिक्कतें तब बढ़ जाती हैं जब वे समझ लेते हैं कि कानून के हाथ इतने लंबे नहीं कि वे मुझ तक पहुंच सकें।
  एक कहावत है,‘कुछ लोग महान पैदा होते हैं।कुछ लोग  त्याग -तपस्या से महान बनते हैं।पर कुछ लोगों पर महानता थोप दी जाती हैं।’
जिन लोगों पर महानता थोपी जाती है,उनके भटकने की  संभावना अधिक रहती  है।
दरअसल  नेताओं खास कर सांसदों -विधायकों को ही खुद ही तय कर लेना होता है कि उन्हें वेतन-भत्ते के रुप में कितने पैसे लेने हैं।
 इस  क्षेत्र के कई लोगों के दिमाग अपार पैसों ने भी खराब कर दिए हैं।
पैसे से भी मद पैदा होता है जो भटकाव  पैदा करता है।
तुलसी दास ने भी लिखा कि ‘प्रभुता पाई काहि मद नाहीं !’
हालांकि इसी देश में एक दूसरी दुनिया भी है।भले छोटी है।
कई बार सांसद और  विधायक रहे धनबाद के ए.के.राय  के बुढापे में देखभाल उनके एक मित्र का परिवार कर रहा है।
ए.के.राय ने शायद ही किसी से शिकायत की है कि पैसे के अभाव में उनकी ठीक से देखभाल नहीं हो पा रही है।इंजीनियर रहे उस नेता ने न तो शादी की और न ही अपने बुढापे के लिए कोई धन जोड़ा।ऐसे कई नेता हैं।
 बिहार के दो बार मुख्य मंत्री और एक बार उप मुख्य मंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद हेमवती नंदन बहुगुणा उनके गांव गए थे।कर्पूरी ठाकुर की पुश्तैनी झोपड़ी देख कर बहुगुणा रो पड़े थे।
स्वर्गीय  कर्पूरी ठाकुर  अपने बाल -बच्चों के लिए घर के नाम पर वही छोड़ गए थे जबकि वे 1952 से ही विधायक थे और एक अपवाद को छोड़कर कभी कोई चुनाव नहीं हारे।
परिणामस्वरूप हर साल उनके जन्म दिन व पुण्य तिथि पर उन्हें याद करने के लिए विभिन्न दलों व संगठनों के बीच बिहार में होड़ मची रहती है। 
 दूसरी ओर, अपनी राजनीतिक व प्रशासनिक ताकत का गलत इस्तेमाल करने वालों को देखिए।वे  सदा अपने बाल- बच्चों के लिए अपार धन एकत्र करने के चक्कर में रहते हैं।उनमें से कई लोगों की जवानी भले ठीक से कट गयी हो ,परंतु बुढ़ापे में उन्हें कष्ट या फिर अपयश भोगते देखा जा सकता है।
 यह जानते हुए भी कि कफन में जेब नहीं होती,ऐसे लोग अपनी जेब को बोरा का दर्जा दे देते हैं।
 किसी  तरह की ‘सत्ता’ के साथ दौलत,शराब और शबाब की भूमिका विनाशकारी साबित होती है।
हालांकि वैसे लोग भी हैं जिन्हें प्रभुता पा लेने के बावजूद   मद नहीं होता।
 पर, महत्वपूर्ण क्षेत्रों के सारे लोग ऐसे भाग्यशाली नहीं होते ।
  डा.राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि राजनीति करने वालों को अपना परिवार खड़ा नहीं करना चाहिए,
क्योंकि उसके साथ मोह पैदा हो जाता है।
खुद लोहिया ने  परिवार खड़ा नहीं किया।
नतीजतन अन्याय के खिलाफ उनके समझौताविहीन संघर्ष में उनके हाथ रोकनेवाला कोई नहीं था।
  कहा गया है कि ‘सीजर की पत्नी को संदेह से ऊपर होना चाहिए।’पर यह कहावत तो  लोकलाज का ध्यान रखने वालों के लिए है।
 हमारे देश में तो समय -समय पर अधिकतर सत्तावनों ने 
लोकलाज को तिलांजलि दी है और आज भी दे रहे हैं।
इस समस्या पर कैसे काबू पाया जाए,इस पर सोच विचार आज अधिक जरूरी है।
सत्तावान का मतलब सिर्फ राजनीतिक क्षेत्र के सत्तावानों से नहीं है।
वोट बैंक की राजनीति के इस दौर में अनेक नेताओं के लिए लोकलाज शब्द अप्रासंगिक होता जा रहा है।
  पर अच्छी बात यह है कि कुछ लोगों,संगठनों व समूहों के लिए अब भी लोकलाज प्रासंगिक है।पिछले दिनों  लोकलाज 
के कारण ही केंद्रीय सत्ता अपने मंत्री एम.जे.अकबर से इस्तीफा लेने को  मजबूर हुई।
 किसी भी कीमत पर सत्ता तक पहुंचने की कोशिश करने वाले विवादास्पद लोगों से इस देश की राजनीति खुद को बचा ले तो यह देश के लिए बेहतर होगा।
विभिन्न क्षेत्रों के ऐसे व्यक्तियों की पहचान मुश्किल नहीं है ।ऐसे लोग समय -समय पर अपनी ही  पिछली राजनीतिक धारणाओं-मान्यताओं को भुलाकर नए गठबंधन के साथ होते रहे हैं।
कई मामलों में ऐसे लोगों का विवादास्पद अतीत सर्वज्ञात भी होता है।
 इतने बड़े देश में कोई व्यक्ति न तो जरूरी है और न ही अपरिहार्य ही।राजनीतिक दल यह  बात   ध्यान में रखें तो उन्हें कभी किसी विवादास्पद प्रकरण को लेकर उलझन में नहीं पड़ना पड़ेगा।
  गठबंधन की राजनीति कई बार किसी दल के शीर्ष नेतृत्व 
को समझौते करने को विवश करती है।
परंतु  यदि थोड़ा राजनीतिक खतरा मोल लेने की क्षमता हो तो गरिमा गिराने वाले समझौतों से बचा जा सकता है।
यदि  कोई प्रधान मंत्री या मुख्य अपनी गठबंधन सरकार के किन्हीं  दलों  के मोल -तोल की प्रवृति से परेशान है  तो वह ऐसे दलों व नेताओं को निशाना बनाते हुए  नए चुनाव की घोषणा कर सकता है।चुनाव प्रचार में वह लोगों से कह सकता है कि हम जनता के भले के लिए बहुत कुछ करना चाहते हैं,पर ये दल व नेता हमें वैसा नहीं करने दे रहे हैं और देश को अस्थिर करने के काम में लगे हैं।
ऐसे में आसार इसी के हैं कि उसके दल को बहुमत मिल जाएगा,क्योंकि अधिकतर भले लोग ही वोट देते हैं।कुछ पिछले चुनावी इतिहास भी यही कहते हंै। 
यदि ऐसे चुनाव होने लगें तो केंद्र कौन कहे,कई राज्यों में भी
तोलमोल करने वाले स्वार्थी दलों व नेताओं से मुक्ति पायी जा सकेगी।@  2 नवंबर, 2018 के दैनिक जागरण में प्रकाशित @  




















1--There is no safe level of alcohol      consumption.
2--A recent study,published in Lancet,reported
   that alcohol use is leading risk factor for diseases worldwide ,accounting for nearly 10
percent of global deaths .
3--This study covered 195 countries and locations,and was followed up from 1990 till 2016 for both men and women.
4--It was also reported that that beyond 50 years of age ,cancer accounted for a large proportion of total alcohol attributable deaths.
     --------Isha Khosla in The indian Express.
                      --20 Oct.2018


शुक्रवार, 2 नवंबर 2018


छठ पर्व के लिए  शुद्ध गंगा जल पहुंचाने का शासन  करे उपाय  
प्रयाग कुम्भ को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने चमड़े के कारखानों को तीन महीने के लिए बंद कर देने का आदेश दे दिया है।
यदि कुम्भ के लिए ऐसा हो सकता है तो छठ पर्व के लिए क्यों नहीं ?
जबकि गंगा किनारे के छठवर्तियों की कुल आबादी कुम्भ में जुटने वालों से कम नहीं है।छठवर्ती कई राज्यों में फैले हैं।
साधु-संतों ने सरकार को धमकी दी है कि यदि प्रयाग में शुद्ध गंगा जल की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की गयी तो वे कुम्भ के शाही स्नान का बहिष्कार कर देंगे।
उनकी मांग जायज है।
गंगा के किनारे चमड़े के कारखानों की स्थापना की अनुमति देकर सरकार ने गंगा के साथ जो अन्याय किया है,उसकी क्षतिपूत्र्ति आखिर कौन करेगा ?
सरकार  ही तो करेगी।वह कर भी रही है।
याद रहे कि तीन महीने तक चमड़ा कारखाने को बंद रखने से चमड़ा उद्योग को 12 सौ करोड़ रुपए का नुकसान होगा।
फिर भी योगी सरकार ने गत सितंबर में ही यह आदेश जारी कर दिया कि इस साल 15 दिसंबर से अगले साल 15 मार्च तक 264 कारखाने बंद रहेंगे। ये कारखाने कान पुर और उन्नाव जिलों मेंं गंगा किनारे स्थित
 हैं।
  --छठ पर्व में गंगा जल का महत्व--
 छठ पर्व के अवसर पर  बिहार,उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से,झारखंड और पश्चिम बंगाल के लोग गंगा के किनारे सूर्य को अघ्र्य देते हैं।इस अवसर पर गंगा स्नान भी होता है।
साथ प्रसाद बनाने में भी गंगा जल का इस्तेमाल होता है।
 अभी बिहार में जो गंगा जल है,उसमें गंगा का जल कितना है और कितना नदी-नाले का जल है,यह कहना मुश्किल है।
उसे छूने से भी बीमारियों  का खतरा  है।
चाहे गंगा जल कितना भी गंदा हो जाए ,नदी के पास के लोग  छठ पर्व के अवसर पर डूबते और उगते सूर्य को  अघ्र्य देने गंगा किनारे जाएंगे ही ? ऐसे में सरकारांे का यह कत्र्तव्य है कि वे दूषित गंगा जल से लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा करे।
इस महीने के मध्य मंे छठ पर्व है।
क्या चमड़ा उद्योग की बंदी की अवधि बढ़ायी नहीं जा सकती है ? या फिर कम से कम छठ के ठेकुआ बनाने के लिए शुद्ध गंगा जल की आपूत्र्ति उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नहीं की जा सकती ? 
वायु प्रदूषण से कौन दिलाएगा मुक्ति
सड़कों पर अतिक्रमण और वायु में प्रदूषण !
अब यही इस देश के अधिकतर नगरों -महा नगरों की पहचान है।
हर साल जाड़े में यह समस्या बढ़ जाती है।पर जाड़ा समाप्त होने के बाद सरकारें व संबंधित गैर सरकारी एजेंसियां सो जाती हैं। 
  जिस तरह सड़कों पर से अतिक्रमण हटाने का काम सालों भर चलता रहता है,उसी तरह वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सालों भर प्रयास की जरूरत है।
पर हमारे देश की  सरकारें इतनी नरम हैं कि वायु प्रदूषण के कारकों के खिलाफ सख्त व असरदार कार्रवाई ही नहीं कर पाती।
नतीजतन आम लोग भारी परेशानी में पड़ते रहते हैं।
अदालतें बार-बार निदेश देती हैं,पर शासन के लोग 
सुस्त रहते हैं।
दरअसल सरकार चलाने वाले लोग तो ए.सी.गाडि़यों में चलते हैं।
इसलिए वे क्या जानें सड़कों का असली हाल क्या है !
यह अब खुला तथ्य है कि भारी वायु प्रदूषण अनेक लोगों की जानें ले रहा है।यह धीमा जहर है।
शासक गण कम से कम उनकी जान बचाने के लिए तो कुछ कड़ाई करें !
देश की कई अदालतों ने कई बार सरकारों से कहा कि 15 साल से अधिक के वाहनों को सड़कों से हटा दिया जाए।
पटना जैसे नगर में तो पुराने आॅटो -ट्रक-बस अधिक खतरनाक बन चुके हैं।किसी सरकार के लिए लोगों की जान से अधिक कोई दूसरी चीज महत्वपूर्ण नहीं होनी चाहिए।वायु प्रदूषण के कारकों के खिलाफ  कठोर से हिचकने वाली सरकारें अपने मूल काम  से विमुख हो रही हंै।
जब लोगों के लिए सांस लेना दुश्वार हो जाए तो भी प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं होगी ?  
--प्राथमिक शालाओं में गढ़ी जाती 
की पीढि़यां--  
एक मशहूर कहावत है कि ‘किसी भी राष्ट्र की नियति प्राथमिक शालाओं की कक्षाओं में गढ़ी जाती है।’
अंग्रेजों के शासन काल में इस देश में स्कूलों व काॅलेजों में क्रमशः हेड मास्टर और प्राचार्य बनाने के लिए लगभग सामान्य योग्यता की जरूरत होती थी।
उदाहरण के लिए आर.एफ.कूपर 1915 से 1920 तक जी.बी.बी.काॅलेज के प्राचार्य थे।
वही कूपर साहब 1924 से 1926 तक रांची जिला स्कूल के हेड मास्टर  रहे।कुछ दिनों तक वे पटना काॅलेजिएट स्कूल के हेड मास्टर भी थे।
ऐसे 13 काॅलेज प्राचार्यों  की सूची मेरे पास है जो स्कूलों के हेड मास्टर भी रहे।
आजादी के बाद के कुछ वर्षों तक भी बिहार की स्कूली शिक्षा ठीकठाक  रही।
 इससे पता चलता है कि  स्कूली शिक्षा को अंग्रेज कितना अधिक महत्व देते थे। पर इस देश और प्रदेश में आज क्या हो रहा है ?
आज बिहार में एक अलग तरह की  होड़ मची है।
कुछ संबंधित लोग एक तरफ शिक्षा को सुधार कर उसे फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं तो कुछ अन्य प्रभावशाली लोग उस कोशिश को विफल करने पर अमादा हैं।देखना है कि इस ‘युद्ध’ में अंततः कौन जीतता है।
   --भूली बिसरी याद--
सी.बी.आई.के निदेशक आलोक वर्मा के नई दिल्ली स्थित सरकारी आवास के पास आई.बी.के चार व्यक्तियों को जासूसी के आरोप में गत माह गिरफ्तार किया गया था।
हालांकि गृह मंत्रालय ने बाद में कहा कि वे जनपथ जैसे महत्वपूर्ण इलाके में सामान्य सरकारी सुरक्षा ड्यूटी पर थे।वे किसी अफसर की जासूसी नहीं कर रहे थे।
इस घटना के बाद जनपथ पर ही 1991 में हुई एक घटना की याद आ गयी।
पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी जनपथ स्थित 10 नंबर की कोठी में रहते थे।उनके आवास के सामने 2 मार्च 1991 को हरियाणा खुफिया पुलिस के दो जवान प्रेम सिंह और राज सिंह को पकड़ लिया गया।
तब हरियाणा में गैर कांग्रेसी सरकार थी।
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार राजीव गांधी की जासूसी करवा रही है।
इस घटना से गुस्साए कांग्रेस ने चंद्र शेखर सरकार से  अपना समर्थन वापस ले लिया था।प्रधान मंत्री ने इस्तीफा दे दिया और लोक सभा के चुनाव हो गए।
पर हकीकत यह थी कि राजीव गांधी की जासूसी नहीं हो रही थी।
दरअसल  हरियाणा के उन नेताओं पर नजर रखी जा रही थी जो राजीव गांधी से मिलने आते थे।दरअसल देवी लाल के दोनों पुत्रों ओम प्रकाश चैटाला और रणजीत सिंह के बीच राजनीतिक रस्साकसी चल रही थी।
 हरियाणा पुलिस को रणजीत सिंह और देवीलाल की पार्टी के दूसरे असंतुष्टों पर नजर रखनी थी।याद रहे कि तब देवीलाल चंद्रशेखर के साथ थे।कांग्रेेस चंद्र शेखर सरकार से कुछ अन्य कारणों से असंतृष्ट थी,इस बीच हरियाणा पुलिस जासूसी का बहाना  राजीव गांधी
को मिल गया।उन्होंने चंद्रशेखर सरकार को मिल रहे कांग्रेस के समर्थन को वापस ले लिया।चंद्र शेखर ने प्रधान मंत्री पद से इस्तीफा देकर चुनाव कराने की राष्ट्रपति से सिफरिश कर दी।
 ---और अंत में --
  मालेगांव विस्फोट कांड में राष्ट्रीय जांच एजेंसी की विशेष अदालत ने इसी मंगलवार को ले.कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर सहित सात आरोपितों पर आतंकी साजिश व हत्या  के आरोप तय कर दिए।
 उधर हाशिम पुरा सांप्रदायिक नर संहार मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को निचली अदालत का निर्णय पलटते हुए 16 पी.ए.सी.जवानों को उम्रकैद की सजा सुनाई।
 अब दूसरे पक्ष को भी चाहिए कि वह याकूब मेमन जैसे आतंकियों के लिए आधी रात में सुप्रीम कोर्ट की बैठक नहीं करवाएं।
 जाति-धर्म पर विचार किए बिना जिसका जितना कसूर हो ,उसे तौल कर उतनी सजा मिलती रहेगी तो इस देश में जातीय-सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने में काफी सुविधा होगी।
@2 नवंबर, 2018 के प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक काॅलम कानोंकान से@

चिकित्सकों के प्रति आभार 
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1.-डा.शिव नारायण सिंह --सन 1972 में शिव नारायण बाबू से दिखाने उनके यहां  गया था।
तब वे पटना के राजेंद्र नगर में रहते थे।
उन्होंने मुझे देखने के बाद आई.डी.पी.एल.निर्मित सस्ती दवा लिख दी।गैस की दवा थी।संभवतःएक टेबलेट दस पैसे की आती थी।
मैंने बहुत आग्रह किया तो उन्होंने कुछ पैथोलाॅजिकल जांच लिख दी।वे कह रहे थे कि क्यों पैसे खर्च करोगे ?तुम्हारे पास बहुत पैसे हैं क्या ? तुम्हें उसकी आवश्यकता नहीं है। 
फिर भी मैंने जांच कराई।रिपोर्ट लेकर दिखाया तो उन्होंने कहा कि ‘कहा था न कि तुम्हें इसकी कोई जरूरत नहीं है।’
बता दूं कि मेरा उनसे कोई परिचय नहीं था।
हालांकि मेरा अपना एक ‘परिचय’ तब भी था।
2.-डा.सुनील कुमार सिंह -मशहूर नेत्र चिकित्सक और मेरे रिश्तेदार सुनील जी की एक खास  सलाह मुझे काम आ रही है।उन्होंने कहा है कि कम्प्यूटर पर काम करते समय बीच- बीच में ‘पामिंग’ करते रहिए।
मैं वैसा वर्षों से करता हूं।
 इस व कुछ अन्य उपायों से मेरी आंखों में कोई तकलीफ नहीं है।अब तक मोतियाबिंद का भी आपरेशन नहीं कराना पड़ा है।
3.-कई साल पहले मैं पेट की बीमारी से अत्यंत परेशान था।चैबीसों घंटे दर्द रहता था।मुझे लगता था कि बचूंगा नहीं।
एलोपैथिक के बाद आयुर्वेदिक चिकित्सा भी कराई।
 तकलीफ दूर नहीं हुई।
स्वयं प्रकाश मुझे डा.एस.चंद्रा के यहां ले गए।
डा.चंद्रा ने जादू कर दिया।
डा.चंद्रा ने पहले एम.बी.बी.एस.की पढ़ाई की।उसके बाद होमियोपैथी पढ़ी।पटना के यार पुर में बैठते हैं।
4.-यह तब की बात है जब मैं आशियाना नगर फेज वन में रहता था।
उसी सड़क पर जिस पर मशहूर व चर्चित चिकित्सक डा.अजय कुमार का मकान है।लगभग रोज ही उनके घर पर सुबह की चाय व गपशप का अवसर मिलता था।
डा.अजय यानी बाहर-भीतर से एक तरह का व्यक्तित्व-स्नेहिल और सबके सुख-दुःख में साथ देने वाले। 
संयोग से मुझे वही बीमारी परेशान करने लगी जिसके वे  
विशेषज्ञ हैं।
उनसे मैंने प्रोस्टेट का आपरेशन कराया।
अब राहत है।
आपरेशन से पहले कई लोगों ने मुझे सलाह दी थी कि कहीं बाहर जाकर आपरेशन करा लीजिए।मैंने कहा कि मुझे डा.अजय पर पूरा भरोसा है।मैं सही था।
5.-अपने सर्वाइकल स्पोंडोलाइटिस के लिए मधुरेश की सलाह पर मैंने शिवहर के होमियोपैथ चिकित्सक डा.शालिग्राम सिंह से फोन पर बात की। 
मुझे कई साल पहले एक बड़े एलोपैथिक चिकित्सक ने कहा था कि इस बीमारी का इलाज होमियोपैथ में है।
शालिग्राम बाबू की बताई दवा काफी कारगर लग रही है।
मुझसे बातचीत में सीतामढ़ी के मेरे मित्र नागेंद्र प्रसाद सिंह ने भी शालिग्राम बाबू की तारीफ की।
मैंने पहले  जो भी दवाएं लीं, वह ‘रिलीफ’ देती थी।मुझे अब लग रहा है कि शालिग्राम बाबू की दवा ‘रिपेयर’ कर रही है।हालांकि यह अभी मेरा अंतिम निष्कर्ष नहीं है।
जाड़े में यह बीमारी अधिक कष्ट देती है।इस बार ठंड शुरू हो जाने के बावजूद मुझे पहले जैसा कष्ट नहीं है।
   हां, उनसे यह पूछना है कि ठीक हो गया,ऐसा लगने पर भी दवा और कितने लंबे समय तक ली जानी चाहिए।क्या होमियोपैथिक दवाओं का भी साइड इफेक्ट होता है ?
6.-
और अंत में
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राजा बाजार के होमियोपैथिक चिकित्सक डा.सुरेश प्रसाद के साथ मेरे और मेरे परिवार का अनुभव अच्छा रहा है।
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इलाज से उपर्युक्त व इनके अलावा भी जिन चिकित्सकों से मुझे व मेरे परिवार को लाभ पहुंचा है,उन्हें धरती का भगवान मान कर उनके प्रति मैं आभार प्रकट करता हूं।इस पेशे में भी कुछ धनलोलुप लोग आ गए हैं।पर वैसे लोग किस पेशे में नहीं हैं ?
निःस्वार्थ सेवा के क्षेत्र में डा.अरूण तिवारी का मुकाबला किस अन्य पेशे के कितने लोग कर सकते हैं ?



सन् 1978 में बिहार के तत्कालीन मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर ने डा.राम मनोहर लोहिया के घनिष्ठ मित्र की भी पैरवी नहीं सुनी 
थी।
पैरवी चीनी मिल मालिकों की तरफ से की गयी थी।
ध्यान रहे कि कर्पूरी जी की पार्टी के सर्वोच्च नेता डा.लोहिया का 1967 में ही निधन हो चुका था।
उन दिनों की राजनीति ऐसी थी कि यदि डा.लोहिया के जीवन काल में उनके मित्र ने ऐसी पैरवी की होती तो मित्रता टूट गयी होती।
 कर्पूरी सरकार ने 1978 के अक्तूबर में 16 निजी चीनी मिलों का सरकारीकरण कर दिया।
  इससे देश के उद्योगपतियों में तहलका मच गया।उस निर्णय को उलटने के लिए बड़ी-बड़ी पैरवी आने लगी।
पर सबसे आश्चर्यजनक पैरवी उस लोहिया-मित्र की ओर से आई।उस पैरवी के लिए वे पटना में आकर जम गए।लोहिया के साथ काम कर चुके बिहार के समाजवादी चकित थे।
पर, वह भारी पैरवी भी अंततः काम नहीं आई।
  

गुरुवार, 1 नवंबर 2018

बोफर्स चाय ! बोफर्स चाय !!
1989 के लोक सभा चुनाव कवर करने जब हम संवाददाता गांवों में जाते  थे तो कई ग्रामीण बाजारों की  चाय दुकानों पर हम चाय वालांे को  यह आवाज लगाते सुनते थे।
 जो लोग राफेल की तुलना आज बोफर्स से करते हैं,उन्हें  उन बाजारों में ऐसी आवाज अभी नहीं सुनाई पड़ेगी।
उसका एक खास कारण है।
राफेल विवाद में अभी एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व की कमी है।
वह है स्विस बैंक या किसी अन्य विदेशी बैंक का कोई खाता
नंबर जिसमें मौजूदा प्रधान मंत्री या उनके किसी खास करीबी का पैसा जमा हो।
वह राफेल की दलाली का पैसा हो।
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि राफेल सौदे में ऐसे किसी खाते का अस्तित्व ही नहीं होगा।
पर है भी तो वह तथ्य अभी तक बाहर नहीं आया है।
सब मिल कर जोर लगाएं और वैसे किसी खाते का पता लगा कर लोगों को बताएं जिस 1988 में पटना में वी.पी.सिंह ने बताया था।
फिर देखिए किस तरह आसमान में उड़ रही नरेंद्र मोदी की पतंग की डोर कट जाती है जिस तरह राजीव गांधी की कट गयी थी। 
  मेरी जानकारी के अनुसार सिर्फ इसी खाते तक पहुंच के अभाव में राफेल कथा अभी गांव -गांव की कहानी नहीं बन पा रही है।