सोमवार, 21 जनवरी 2019

हिंदुत्व पर सुप्रीम कोर्ट के 1995 के फैसले के धमाके की गूंज अब भी कायम



    सन 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हिंदुत्व धर्म नहीं,बल्कि जीवन शैली है।
मुख्य न्यायाधीश जे.एस.वर्मा के नेतृत्व वाले खंडपीठ के इस जजमेंट की गूंज अब भी बाकी है।
 इस निर्णय को पलटने की कोशिश अब तक विफल रही है।इस बीच गत साल पूर्व प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह ने ए.बी.बर्धन स्मारक भाषणमाला में बोलते हुए इस निर्णय को गलत बताया था।
  हालांकि जस्टिस वर्मा ने इस्लाम धर्म के विशेषज्ञ मौलाना वहीदुद्दीन खान को उधृत करते हुए तब कहा था कि हिंदुत्व का मतलब भारतीयकरण हो गया है।
  महाराष्ट्र विधान सभा के दो शिव सेना सदस्यों की चुनाव याचिकाओं  पर सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर 1995 को जो ऐतिहासिक निर्णय दिया,उसकी छिटपुट चर्चा अक्सर चुनावों के समय हो जाती है जब प्रचार में कोई हिंदुत्व शब्द का इस्तेमाल करता है।संभव है कि अगले चुनावमें भी हो !
उससे पहले बंबई हाईकोर्ट ने  शिव सेना विधायकों के चुनावों को रद कर दिया था।आरोप था कि उनके प्रचारकों बाल ठाकरे और प्रमोद महाजन ने सांप्रदायिक घृणा फैलाई थी और धर्म के नाम पर वोट मांगे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने एक विधायक के खिलाफ हाई कोर्ट का निर्णय तो कायम रखा ,पर दूसरे विधायक के मामले में निर्णय उलट दिया।
वैसे उस मशहूर जजमेंट से पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक शिवसेना नेता को उनके इस बयान के लिए फटकारा था कि महाराष्ट्र देश का पहला ‘हिंदू राज्य’ होगा। 
 एक तरफ जहां कई हलकों में इस जजमेंट की आलोचना हुई,वहीं तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा था कि ‘अदालत ने हिंदुत्व की हमारी विचार धारा पर न्यायिक मुहर लगा दी।’         
  स्वाभाविक तौर पर ही राजनीतिक हलकों में इस फैसले पर मिली जुली प्रतिक्रिया हुई।न्यायिक क्षेत्र में भी यही हाल रहा।
मशहूर वकील पालकीवाला ने इस निर्णय पर अचरज जाहिर करते हुए  कहा कि इस पर पुनर्विचार के लिए सुप्रीम कोर्ट का 11 सदस्यीय पीठ कायम होना चाहिए।
हालांकि शिव सेना सुप्रीमो बाल ठाकरे इस निर्णय से संतुष्ट नहीं थे।
उन्होंने कहा कि हमें कुछ हद तक ही इंसाफ मिला है।
क्योंकि पाकिस्तानी मुसलमानों और पाकिस्तान समर्थक मानसिकता वाले इस देश के  मुसलमानों का मामला कायदे से सुप्रीम कोर्ट के सामने नहीं आया।
दूसरी ओर मशहूर वकील ननी पालकीवाला ने कहा कि यह दो दशक पहले आपातकाल की वैधानिता को दी गयी चुनौती को याद दिलाता है।तब देश के सात हाई कोर्ट इंदिरा गांधी के खिलाफ थे,पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के सामने समर्पण कर दिया था।
याद रहे कि उस केस के सिलसिले में एटाॅर्नी जनरल नीरेन डे ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि यदि शासन आज किसी की जान भी ले ले तो भी उसके खिलाफ अदालत की शरण नहीं ली जा सकती।क्योंकि इमरजेंसी में मौलिक अधिकार स्थगित कर दिया गया है।सुप्रीम कोर्ट ने नीरेन डे की बात मान ली।  
 हिंदुत्व पर 1995 के जजमेंट के बारे में भाजपा नेताओं के वकील अरूण साठे ने कहा था कि चुनाव कानून वाकई बहुत तकनीकी है।ऐसे मामलों में आरोपों को पूरी तरह साबित होना जरूरी है।
  विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष विष्णु हरि डालमिया ने इस जजमेंट पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि हिंदुत्व के प्रचार में कानूनी बाधा अब दूर हो गयी है।
 स्वाभाविक ही है कि इस पर भाजपा विरोधी दलों व बुद्धिजीवियों की  प्रतिक्रियाएं विरोध में थीं।
चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का था,इसलिए भाजपा विरोधी दल व अन्य संगठन संभल कर सार्वजनिक तौर पर बोले।पर उन्होंने इस जजमेंट को  उलटवा देने का प्रयास जारी रखा।
 तिस्ता सेतलवाड ने सुप्रीम में याचिका भी दायर की ।पर उन्हें सीमित सफलता ही मिली।
 सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय कायम रह गया कि ‘हिंदुत्व का मतलब भारतीय करण है और उसे धर्म जैसा नहीं माना जाना चाहिए।’पर इतना जरूर कहा कि धार्मिक भावनाएं जगा कर वोट लेना गलत है।
क्या इस जजमेंट ने वैसे लोगों के बीच भी भाजपा व संघ परिवार की स्वीकार्यता बढ़ाई जो तब तक उनसे अलग थे ?
यह यक्ष प्रश्न है जिसका अब तक कोई ठोस व प्रामाणिक जवाब सामने नहीं आया है।
@मेरा यह लेख फस्र्टपोस्ट हिन्दी में प्रकाशित @
    

हर खेत को पानी के सुंदर सपने को पूरा करने में सावधानी जरूरी



बिजलीकरण का संुदर सपना लगभग पूरा हो रहा है।
अब सरकार हर खेत को पानी देने के सुंदर सपने को पूरा करने के लिए सचेष्ट है।
बिहार सरकार की यह कोशिश ऐतिहासिक है।
पर संकेत हैं कि बड़ी संख्या में बंद पड़े राजकीय नलकूपोंं को फिर से चालू करने की बड़ी योजना शुरू हो सकती है।
वह भी अच्छी बात है।
पर, उस सिलसिले में इस बात पर ध्यान रखना जरूरी है कि हम कितना भूजल निकालने जा रहे हैंं।क्या उतने के पुनर्भरण
 का भी देर सवेर प्रबंध हो सकेगा ?
यदि हो सकेगा तो बहुत अच्छा।यदि नहीं तो हम आगे के जल संकट के लिए तैयार रहें।हालांकि इस संबंध में कोई पक्की बात विशेषज्ञ ही बता सकते हैं।
पर इस देश का ‘पारंपरिक विवेक’ खेती के लिए  भूजल की जगह सतही जल के इस्तेमाल के पक्ष में रहा है।
इसीलिए हजारों साल से भूजल संकट नहीं रहा।
संयुक्त राष्ट्र विश्व जल विकास रपट, 2015 के अनुसार कुछ दशकों में बिहार में जल संकट गंभीर हो सकता है।
सतही जल संपदा के मामले में बिहार एक धनी राज्य है।फिर भी भूजल को निकालने की होड़ लगी रहती है, पुनर्भरण की चिंता किए बिना। 
  --जल संरक्षण पर गांधीवादी नजरिया--
पूर्व मंत्री व कट्टर गांधीवादी जगलाल चैधरी से  उनके चुनाव क्षेत्र के लोग अक्सर कहा करते थे कि चैधरी जी ,सिंचाई के लिए नल कूप की व्यवस्था करवा दीजिए। 
उनका जवाब होता था कि नलकूप लगाने से पाताल का पानी सूख जाएगा।
यह साठ के दशक की बात है।उस समय जल संकट आज जैसा नहीं था।पर चैधरी जी को आज के संकट का पूर्वानुमान था।गांधीवादी शिक्षा का उन पर असर जो था।
खेतों में सिंचाई के लिए सतही जल के इस्तेमाल के तरीके उपलब्ध हैं।कुछ राज्यों में इस पर काम हो चुके हैं।
पर यदि नलकूप की भी जरूरत हो तो जल पुनर्भरण का प्रबंध होने पर आने वाले जल संकट से उबरा जा सकता है।
 --अनुकरणीय कदम--
जस्टिस ए.के.सिकरी ने लंदन स्थित राष्ट्रमंडल सचिवालय मध्यस्थता न्यायाधीकरण में नामित करने के केंद्र सरकार
 के प्रस्ताव पर दी गयी अपनी सहमति वापस ले ली है। 
विवाद के बाद जस्टिस सिकरी ने यह कदम उठाया है।
यानी जस्टिस सिकरी उन चंद लोगों में शामिल हो गए है जिन्हें पद से अधिक अपनी प्रतिष्ठा प्यारी होती है।
उनके वंशज भी उन पर गर्व करेंगे।
 इस अवसर पर इसी तरह का एक प्रसंग याद आ गया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूत्र्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने 
1975 में इंदिरा गांधी का लोक सभा चुनाव रद कर दिया  था।
1977 में इंदिरा गांधी की जगह मोरारजी देसाई प्रधान मंत्री बने।
देसाई सरकार ने उन्हें एक बड़े पद का आॅफर दिया था।उन्होंने उसे तत्काल ठुकरा दिया।रिटायर जस्टिस सिन्हा ने कहा था कि मुझे पुस्तकें पढ़ने और 
बागवानी करने से बेहतर कोई दूसरा सुखद काम नहीं लगता।
--नार्को-डीएनए के लिए
 स्वीकृति जरूरी क्यांे ?--
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जांच के दौरान पुलिस यदि फिंगर प्रिंट उठाती है और उसके लिए उसके पास मजिस्ट्रेट के आदेश नहीं हैं तो भी ये फिंगर प्रिंट  अमान्य नहीं होंगे।
ये फिंगर प्रिंट  कोर्ट मेें स्वीकार्य साक्ष्य होंगे।
  काश ! सुप्रीम कोर्ट का ऐसा ही निर्णय नार्को टेस्ट और डी.एन.ए. जांच को लेकर भी किसी दिन आ जाता।
 कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि आरोपी की पूर्वानुमति के बिना उसका न तो नार्को टेस्ट हो सकता है और न ही डी.एन.ए.जांच।
 सुप्रीम कोर्ट  का यह निर्णय इस देश के अनेक खूंखार अपराधियों के लिए कवच बन गया है।
यदि सुप्रीम कोर्ट अपने इस निर्णय को पलट दे तो देश में गंभीर अपराधों पर काबू पाने में सुविधा होगी।
जरूरत के अनुसार सुप्रीम कोर्ट अपने पिछले निर्णयों को पलटता भी रहा है।
--शराब की कमाई से खतरनाक हथियार--
खबर है कि बिहार में अन्य लोगों के अलावा शराब के अवैध धंधे में अनेक छोटे-बड़े अपराधी भी लगे हुए हैं।
 अधिकांश धंधा पुलिस के सहयोग से चल रहा है।
एक तीसरी बात भी निकल कर  आ रही है।
शराब के धंधे में लगे छोटे अपराधी  अब बड़े अपराधी बनने की प्रक्रिया में हंै।क्योंकि वे बड़े पैमाने पर ए.क.े -47 और अन्य छोटे घातक आग्नेयास्त्र खरीद रहे हैं।शराब के धंधे में अपार पैसा जो है !
  जिस अपराधी के पास जितना अधिक घातक हथियार होता है,वह उतना ही बड़ा अपराधी माना जाता है !बाद में वह राजनीतिमें भी अपनी भूमिका निभाता है।
फिलहाल ,ये अपराधी आने वाले दिनों में पुलिसकर्मियों के समक्ष भी खतरा पैदा करेंगे जब पुलिसकर्मी  किसी केस में उन्हें गिरफ्तार करने जाएंगे।
यानी शराब के धंधे में मददगार पुलिसकर्मी अपने लिए भस्मासुर तैयार कर रहे हैं। 
--भूली बिसरी याद--
एक अप्रैल, 1997 को दिल्ली की एक अदालत में उस समय
अजीब दृश्य उपस्थित हो गया जब झामुमो सांसद शैलेंद्र महतो ने कहा कि मेरे बैंक  खाते में जमा रिश्वत की राशि सरकार जब्त कर सकती है।
याद रहे कि सांसदों को रिश्वत देने के मामले में झामुमो के 4 सासंदों सहित 21 अभियुक्तों पर मुकदमा चल रहा था।
उससे पहले 22 मार्च को दिए गए अपने इकबालिया बयान में शैलेंद्र महतो ने यह स्वीकार किया था कि 28 जुलाई 1993 को 
पी.वी.नरसिंह राव सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ वोट देने के लिए उन्होंने बतौर रिश्वत 40 लाख रुपए प्राप्त किए थे।
इसमें से 39 लाख 80 हजार रुपए मैंने पंजाब नेशनल बैंक की नौरोजी नगर स्थित शाखा में जमा कर दिए।बीस हजार रुपए अपने व्यक्तिगत खर्च के लिए रख लिए।
 नरसिंंह राव के वकील आर.के.आनंद ने कोर्ट में कहा कि शैलेंद्र महतो दंड से बचने के लिए सरकारी गवाह बनना चाहता है।उसे बचकर नहीं जाने देना चाहिए।यह पूर्व सांसद रिश्वत प्राप्तकत्र्ता होने के कारण ज्यादा बड़ा अपराधी है।
याद रहे कि झामुमो सांसद शिबू सोरेन, सूरज मंडल, साइमन मरांडी और शैलेंद्र महतो ने यह स्वीकार किया था कि उन्हें 
‘देशहित में’ नरसिंह राव की अल्पमत सरकार को सदन में गिरने से बचाने के एक करोड़ 20 लाख रुपए दिए गए थे।हमने सरकार को बचाया  भी। 
बाद मंे यह मामला सुपी्रम कोर्ट में गया तो सबसे बड़ी अदालत ने इस पर कुछ करने से साफ इनकार कर दिया।कहा कि संसद के अंदर किए गए किसी काम 
के खिलाफ अदालत कोई कार्रवाई नहीं कर सकती, चाहे वह रिश्वत लेने का मामला ही क्यों न हो।अदालत ने कहा कि 
इसमें संविधान ने हमारे हाथ बांध रखे हैं।
 यानी ऐसे रिश्वतखारों के खिलाफ कार्रवाई के लिए संविधान में संशोधन की जरूरत है।पर इतने साल के बाद भी किसी सत्ताधारी दल ने अब तक संशोधन  दिशा में कोई पहल नहीं की।पता नहीं,कब किस दल को नरसिंह राव की तरह ‘देशहित में’ अपनी सरकार बचाने की जरूरत आ पड़े !
-और अंत में-
जनता पार्टी के शासन काल में प्रधान मंत्री के पद को लेकर 
तीन बुजुर्ग नेता आपस में भिड़े हुए थे।तब किसी ने कहा था कि प्रधान मंत्री की कुर्सी को हटा कर वहां एक बेंच लगा दिया जाना चाहिए।
  पर 2019 के लिए देश में जितनी संख्या में प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार नजर आ रहे हैं,उसे मद्दे नजर रखते हुए अब एक बंेच से भी काम नहीं चलेगा !
  मूल बात यह है कि यदि  किसी बड़े पद के लिए भी किसी तरह की  न्यूनत्तम योग्यता की  घोषित या अघोषित अनिवार्यता न रह जाए तो ऐसी ही स्थिति पैदा हो  जाती है।
@18 जनवरी, 2019 के प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@


शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

याद कीजिए 2015 । बिहार विधान सभा का चुनाव होने
वाला था।
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कह दिया था कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए।
फिर क्या था !
लालू प्रसाद ने घोषणा कर दी कि यह चुनावी लड़ाई अगड़ों और पिछड़ों के बीच है।
क्योंकि भाजपा सत्ता में आएगी तो हमारा आरक्षण समाप्त कर देगी।
नतीजतन पिछड़ों के वोट से पहले से जीत रहे अधिकतर भाजपा उम्मीदवार 2015 में हार गए।
हुकुम देव नारायण यादव के पुत्र भी उम्मीदवार थे।
वे उस क्षेत्र के यादवों से कहते रह गए कि आरक्षण समाप्त नहीं होगा।पर मतदाता नहीं माने।
हुकुमदेव जी जैसे नेताओं को भाजपा में ‘अतिथि कलाकार’ माना जाता है।
 अब राजद के ‘अतिथि कलाकार’ रघुवंश प्रसाद सिंह कह रहे हैं कि राजद सवर्ण आरक्षण के खिलाफ नहीं है।
जब लोगों ने हुकुमदेव जी की बात नहीं सुनी तो रघुवंश जी की कैसे सुन लेंगे ?


बात बहुत पुरानी है।
एक टोपी बेचने वाला अपनी टोपियों के गट्ठर के साथ 
दोपहर एक पेड़ के नीचे सो गया।
 उस पेड़ के ऊपर बहुत सारे बंदर थे।
वे एक -एक कर नीचे उतरे और एक -एक टोपी लेकर पेड़ पर जा बैठे।
टोपी वाले के सिर पर एक टोपी बची थी।
उसने बंदरों को दिखा कर वह टोपी अपने सिर से उतार कर जमीन पर फेंक दी।
बंदर तो नकल करते हैं।
बारी- बारी से सभी बंदरों ने अपनी -अपनी टोपियां जमीन पर फेंक दी।टोपी वाले ने टोपियां समेटीं और वह आगे निकल पड़ा।
   टोपी वाले ने अपने पुत्र को यह कहानी बता रखी थी।
टोपी वाले का बेटा भी एक दिन उसी रास्ते टोपी  बेचने निकला।
उसी पेड़े के नीचे जाकर सो गया।
बंदरों ने फिर वही काम दुहराया।
उसी उम्मीद में जूनियर  टोपी वाले ने भी अपने सिर की टोपी जमीन पर फेंक दी।
पर इस बीच बंदरों ने शिक्षा ग्रहण कर ली थी।एक बंदर पेड़ से नीचे उतरा और वह टोपी भी लेकर ऊपर चला गया।
  यानी इस बीच बंदर ने तो शिक्षा ग्रहण कर ली थी।पर टोपी वाले ने नहीं।
 बहुत पहले यह कहानी मैंने आचार्य रजनीश से सुनी थी।
 अब आज के बारे में सोचिए।
  जयचंद ने पृथ्वीराज चैहान के सफाए में  मोहम्मद गोरी की मदद की थी।पर जयचंद का सफाया कैसे हुआ ? कोई कल्पना कर सकता है कि खुद गोरी ने जयचंद का भी काम तमाम कर दिया था ?
 हां, ऐसा ही हुआ था।
यह एक ऐसा प्रकरण है जिससे शिक्षा ग्रहण की जा सकती थी।
 शिक्षा यह कि कैसे -कैसे लोगों की हमें मदद करनी चाहिए और कैसे -कैसे लोगों की मदद बिलकुल नहीं।
 पर लगता है कि हम में से कम ही लोगों ने ऐसी कोई शिक्षा ग्रहण की है।

बुधवार, 16 जनवरी 2019

संदर्भ--जस्टिस सिकरी ने पद ठुकराया
-------------------------
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू 
ने कहा है कि ‘प्रशासनिक व्यवस्था में दुष्ट, भ्रष्ट और धूत्र्त अधिकारी होते हैं।ऐसे अधिकारियों की आलोचना का अधिकार है।
इसके साथ ही ईमानदार लोग भी होते हैं जिनका सम्मान होना चाहिए।लेकिन दुख की बात है कि मीडिया को अच्छे लोग नहीं दिखाई देते।आप किसी भी शख्स को यूं ही नहीं बदनाम नहीं कर सकते।‘

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

  पटना साहिब से अभी ‘बिहारी बाबू’ सांसद हैं।जिस क्षेत्रसे शत्रुघ्न सिन्हा सांसद हैं, उस क्षेत्र पर यदि देश भर की नजरें हैं, तो स्वाभाविक ही है।
खास कर इसलिए भी कि वे अब भाजपा से विद्रोही हो गए हैं।
 उनके उम्दा कलाकार होने के कारण मैं उनका भारी प्रशंसक हूं।खुद को बिहारी बाबू कहलाना पसंद करने के कारण भी   प्रशंसक हूं।
जब अधिकतर बिहारी लोग  बिहार के बाहर खुद को बिहारी कहलाना पसंद नहीं करते थे,उस समय सतरू भैया  बिहारी बाबू बने।
हालांकि उनके ‘राजनीतिक व्यवहार’ का मैं प्रशंसक नहीं हूं।
मुझसे बाहर के कुछ  लोगों ने फोन पर पूछा,क्या होगा बिहारी बाबू के चुनाव क्षेत्र में ?
मैंने बताया कि अगली बार  बिहारी बाबू दूसरे ही दल से लड़ेंगे,यह तो तय है।
अब सवाल यह है कि उनका मुकाबला किससे होगा और वह कितना कारगर रहेगा।
 स्वाभाविक है कि भाजपा में इस क्षेत्र से कई टिकट के उम्मीदवार हैं।क्योंकि जो बिहारी बाबू को हराएगा और यदि राजग की सरकार फिर बनेगी तो उसके  मंत्री बनने का चांस रहेगा।
 मैं अभी यह नहीं कह रहा हूं कि बिहारी बाबू हार ही जाएंगे।
पर जैसी सामाजिक बुनावट पटना साहिब की है,उसमें भाजपा का चांस बेहतर रहेगा,ऐसा जानकार लोगों का मानना है।
हालांकि इस संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता कि यह सीट जदयू के कोटे में चला जाए।
चर्चा है कि इस सीट के लिए भाजपा में टिकट केे एक प्रत्याशी को दिल्ली में मीडिया का प्रभार मिल गया।
दूसरे सिक्किम के प्रभारी बन गए।तीसरे को भी भाजपाने कोई अन्य जिम्मेदारी दे दी।
  अब बचे आर.के.सिन्हा जो राज्य सभा में भाजपा के सदस्य भी हैं।मैं नहीं जानता।पर यदि आर.के.सिन्हा भाजपा के टिकट के प्रत्याशी हैं तो यह स्वाभाविक ही है।सुना है कि हैं।
सत्तर के दशक में आर.के.सिन्हा यानी रवीन्द्र किशोर चर्चित पत्रकार थे।अब  वे हिन्दुस्तान समाचार ग्रूप के अध्यक्ष है।
उनके पत्रकार होने के कारण मेरी उनसे भारी सहानुभति है।
बातचीत में भी विनम्र हैं।लोगों के सुख -दुख में शामिल रहते हैं।यदि भाजपा उन्हें टिकट देती है तो वह उसका सही निर्णय   होगा।
 कई लोग मानते हैं कि वे बिहारी बाबू का कारगर मुकाबला कर पाएंगे। मुझे भी ऐसा लगता है।पर अभी तो सब कुछ भविष्य के गर्भ  में है।  

रविवार, 6 जनवरी 2019

ड्रायवर रखने में सावधानी बरतें नेतागण
-----------------------
पूर्व रेल मंत्री सी.के.जाफर शरीफ के बारे मंे यह कहानी मैंने 
तभी सुनी थी।
पर, मैंने उस पर पूरा विश्वास नहीं किया था।
पर, जब कर्नाटका के पत्रकार मनोहर यडवट्टि ने पाक्षिक पत्रिका ‘यथावत’ के ताजा अंक में वही बात लिख दी तो मुझे लग गया कि अन्य लोगों को भी यह कहानी बतानी चाहिए ।ताकि, कम से कम बड़े नेतागण व महत्वपूर्ण लोग  अपना ड्रायवर रखने में सावधानी बरतें।
 हाल में जाफर शरीफ के  निधन के बाद मनोहर यडवट्टि ने उस किस्से को कुछ इस तरह लिपिबद्ध किया,
  ‘गरीब परिवार में जन्मे और अल्प शिक्षित जाफर शरीफ जवानी के दिनों में कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर के नेता एस.निजलिंगप्पा के संपर्क में आए।उनके निजी सहायक और ड्रायवर के रूप में अपने कैरियर की शुरूआत की।’
@ यह बात उस समय की है जब 
निजलिंगप्पा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे।@
‘इस कारण जाफर शरीफ को बड़े नेताओं के बीच होने वाली बातचीत और राजनीतिक योजनाओं आदि के बारे में भी जानकारी रहती थी।
जब कांग्रेस में इंदिरा गांधी के नेतृत्व को लेकर विवाद की शुरूआत हुई ,उस समय निजलिंगप्पा इंदिरा गांधी के खिलाफ हो गए।
एक दिन कार में कहीं जाते वक्त निजलिंगप्पा अपने कुछ अन्य सहयोगियों के साथ इंदिरा गांधी को सबक सिखाने की योजना पर बातचीत कर रहे थे।
इस बातचीत को जाफर शरीफ ने ध्यान से सुना और उसके  तुरंत बाद वे राजधानी दिल्ली के लिए रवाना हो गए।
प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को सारी बातें विस्तार से बतार्इं।
उससे इंदिरा गांधी को अपने खिलाफ बनाई जा रही सारी योजनाओं की जानकारी मिल गई।
हालांकि इसके लिए जाफर शरीफ को विश्वासघाती तक की संज्ञा दी गयी।
लेकिन इंदिरा गांधी उनकी निष्ठा से काफी प्रभावित हुईं।1969 में कांग्रेस का विभाजन हो गया।
1971 में जब संसदीय चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी ने जाफर शरीफ को कनक पुरा संसदीय क्षेत्र से पार्टी का टिकट दिया।
वह जीते भी।
इंदिरा गांधी ने उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया।
इंदिरा गांधी के रहते उनका कद हर समय ऊंचा बना रहा।’