सोमवार, 21 जनवरी 2019

हर खेत को पानी के सुंदर सपने को पूरा करने में सावधानी जरूरी



बिजलीकरण का संुदर सपना लगभग पूरा हो रहा है।
अब सरकार हर खेत को पानी देने के सुंदर सपने को पूरा करने के लिए सचेष्ट है।
बिहार सरकार की यह कोशिश ऐतिहासिक है।
पर संकेत हैं कि बड़ी संख्या में बंद पड़े राजकीय नलकूपोंं को फिर से चालू करने की बड़ी योजना शुरू हो सकती है।
वह भी अच्छी बात है।
पर, उस सिलसिले में इस बात पर ध्यान रखना जरूरी है कि हम कितना भूजल निकालने जा रहे हैंं।क्या उतने के पुनर्भरण
 का भी देर सवेर प्रबंध हो सकेगा ?
यदि हो सकेगा तो बहुत अच्छा।यदि नहीं तो हम आगे के जल संकट के लिए तैयार रहें।हालांकि इस संबंध में कोई पक्की बात विशेषज्ञ ही बता सकते हैं।
पर इस देश का ‘पारंपरिक विवेक’ खेती के लिए  भूजल की जगह सतही जल के इस्तेमाल के पक्ष में रहा है।
इसीलिए हजारों साल से भूजल संकट नहीं रहा।
संयुक्त राष्ट्र विश्व जल विकास रपट, 2015 के अनुसार कुछ दशकों में बिहार में जल संकट गंभीर हो सकता है।
सतही जल संपदा के मामले में बिहार एक धनी राज्य है।फिर भी भूजल को निकालने की होड़ लगी रहती है, पुनर्भरण की चिंता किए बिना। 
  --जल संरक्षण पर गांधीवादी नजरिया--
पूर्व मंत्री व कट्टर गांधीवादी जगलाल चैधरी से  उनके चुनाव क्षेत्र के लोग अक्सर कहा करते थे कि चैधरी जी ,सिंचाई के लिए नल कूप की व्यवस्था करवा दीजिए। 
उनका जवाब होता था कि नलकूप लगाने से पाताल का पानी सूख जाएगा।
यह साठ के दशक की बात है।उस समय जल संकट आज जैसा नहीं था।पर चैधरी जी को आज के संकट का पूर्वानुमान था।गांधीवादी शिक्षा का उन पर असर जो था।
खेतों में सिंचाई के लिए सतही जल के इस्तेमाल के तरीके उपलब्ध हैं।कुछ राज्यों में इस पर काम हो चुके हैं।
पर यदि नलकूप की भी जरूरत हो तो जल पुनर्भरण का प्रबंध होने पर आने वाले जल संकट से उबरा जा सकता है।
 --अनुकरणीय कदम--
जस्टिस ए.के.सिकरी ने लंदन स्थित राष्ट्रमंडल सचिवालय मध्यस्थता न्यायाधीकरण में नामित करने के केंद्र सरकार
 के प्रस्ताव पर दी गयी अपनी सहमति वापस ले ली है। 
विवाद के बाद जस्टिस सिकरी ने यह कदम उठाया है।
यानी जस्टिस सिकरी उन चंद लोगों में शामिल हो गए है जिन्हें पद से अधिक अपनी प्रतिष्ठा प्यारी होती है।
उनके वंशज भी उन पर गर्व करेंगे।
 इस अवसर पर इसी तरह का एक प्रसंग याद आ गया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूत्र्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने 
1975 में इंदिरा गांधी का लोक सभा चुनाव रद कर दिया  था।
1977 में इंदिरा गांधी की जगह मोरारजी देसाई प्रधान मंत्री बने।
देसाई सरकार ने उन्हें एक बड़े पद का आॅफर दिया था।उन्होंने उसे तत्काल ठुकरा दिया।रिटायर जस्टिस सिन्हा ने कहा था कि मुझे पुस्तकें पढ़ने और 
बागवानी करने से बेहतर कोई दूसरा सुखद काम नहीं लगता।
--नार्को-डीएनए के लिए
 स्वीकृति जरूरी क्यांे ?--
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जांच के दौरान पुलिस यदि फिंगर प्रिंट उठाती है और उसके लिए उसके पास मजिस्ट्रेट के आदेश नहीं हैं तो भी ये फिंगर प्रिंट  अमान्य नहीं होंगे।
ये फिंगर प्रिंट  कोर्ट मेें स्वीकार्य साक्ष्य होंगे।
  काश ! सुप्रीम कोर्ट का ऐसा ही निर्णय नार्को टेस्ट और डी.एन.ए. जांच को लेकर भी किसी दिन आ जाता।
 कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि आरोपी की पूर्वानुमति के बिना उसका न तो नार्को टेस्ट हो सकता है और न ही डी.एन.ए.जांच।
 सुप्रीम कोर्ट  का यह निर्णय इस देश के अनेक खूंखार अपराधियों के लिए कवच बन गया है।
यदि सुप्रीम कोर्ट अपने इस निर्णय को पलट दे तो देश में गंभीर अपराधों पर काबू पाने में सुविधा होगी।
जरूरत के अनुसार सुप्रीम कोर्ट अपने पिछले निर्णयों को पलटता भी रहा है।
--शराब की कमाई से खतरनाक हथियार--
खबर है कि बिहार में अन्य लोगों के अलावा शराब के अवैध धंधे में अनेक छोटे-बड़े अपराधी भी लगे हुए हैं।
 अधिकांश धंधा पुलिस के सहयोग से चल रहा है।
एक तीसरी बात भी निकल कर  आ रही है।
शराब के धंधे में लगे छोटे अपराधी  अब बड़े अपराधी बनने की प्रक्रिया में हंै।क्योंकि वे बड़े पैमाने पर ए.क.े -47 और अन्य छोटे घातक आग्नेयास्त्र खरीद रहे हैं।शराब के धंधे में अपार पैसा जो है !
  जिस अपराधी के पास जितना अधिक घातक हथियार होता है,वह उतना ही बड़ा अपराधी माना जाता है !बाद में वह राजनीतिमें भी अपनी भूमिका निभाता है।
फिलहाल ,ये अपराधी आने वाले दिनों में पुलिसकर्मियों के समक्ष भी खतरा पैदा करेंगे जब पुलिसकर्मी  किसी केस में उन्हें गिरफ्तार करने जाएंगे।
यानी शराब के धंधे में मददगार पुलिसकर्मी अपने लिए भस्मासुर तैयार कर रहे हैं। 
--भूली बिसरी याद--
एक अप्रैल, 1997 को दिल्ली की एक अदालत में उस समय
अजीब दृश्य उपस्थित हो गया जब झामुमो सांसद शैलेंद्र महतो ने कहा कि मेरे बैंक  खाते में जमा रिश्वत की राशि सरकार जब्त कर सकती है।
याद रहे कि सांसदों को रिश्वत देने के मामले में झामुमो के 4 सासंदों सहित 21 अभियुक्तों पर मुकदमा चल रहा था।
उससे पहले 22 मार्च को दिए गए अपने इकबालिया बयान में शैलेंद्र महतो ने यह स्वीकार किया था कि 28 जुलाई 1993 को 
पी.वी.नरसिंह राव सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ वोट देने के लिए उन्होंने बतौर रिश्वत 40 लाख रुपए प्राप्त किए थे।
इसमें से 39 लाख 80 हजार रुपए मैंने पंजाब नेशनल बैंक की नौरोजी नगर स्थित शाखा में जमा कर दिए।बीस हजार रुपए अपने व्यक्तिगत खर्च के लिए रख लिए।
 नरसिंंह राव के वकील आर.के.आनंद ने कोर्ट में कहा कि शैलेंद्र महतो दंड से बचने के लिए सरकारी गवाह बनना चाहता है।उसे बचकर नहीं जाने देना चाहिए।यह पूर्व सांसद रिश्वत प्राप्तकत्र्ता होने के कारण ज्यादा बड़ा अपराधी है।
याद रहे कि झामुमो सांसद शिबू सोरेन, सूरज मंडल, साइमन मरांडी और शैलेंद्र महतो ने यह स्वीकार किया था कि उन्हें 
‘देशहित में’ नरसिंह राव की अल्पमत सरकार को सदन में गिरने से बचाने के एक करोड़ 20 लाख रुपए दिए गए थे।हमने सरकार को बचाया  भी। 
बाद मंे यह मामला सुपी्रम कोर्ट में गया तो सबसे बड़ी अदालत ने इस पर कुछ करने से साफ इनकार कर दिया।कहा कि संसद के अंदर किए गए किसी काम 
के खिलाफ अदालत कोई कार्रवाई नहीं कर सकती, चाहे वह रिश्वत लेने का मामला ही क्यों न हो।अदालत ने कहा कि 
इसमें संविधान ने हमारे हाथ बांध रखे हैं।
 यानी ऐसे रिश्वतखारों के खिलाफ कार्रवाई के लिए संविधान में संशोधन की जरूरत है।पर इतने साल के बाद भी किसी सत्ताधारी दल ने अब तक संशोधन  दिशा में कोई पहल नहीं की।पता नहीं,कब किस दल को नरसिंह राव की तरह ‘देशहित में’ अपनी सरकार बचाने की जरूरत आ पड़े !
-और अंत में-
जनता पार्टी के शासन काल में प्रधान मंत्री के पद को लेकर 
तीन बुजुर्ग नेता आपस में भिड़े हुए थे।तब किसी ने कहा था कि प्रधान मंत्री की कुर्सी को हटा कर वहां एक बेंच लगा दिया जाना चाहिए।
  पर 2019 के लिए देश में जितनी संख्या में प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार नजर आ रहे हैं,उसे मद्दे नजर रखते हुए अब एक बंेच से भी काम नहीं चलेगा !
  मूल बात यह है कि यदि  किसी बड़े पद के लिए भी किसी तरह की  न्यूनत्तम योग्यता की  घोषित या अघोषित अनिवार्यता न रह जाए तो ऐसी ही स्थिति पैदा हो  जाती है।
@18 जनवरी, 2019 के प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@


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