मंगलवार, 12 मार्च 2019

इन दिनों इस देश के बैंक सर्विस चार्ज के नाम पर 
उपभोक्ताओं का खूब दोहन कर रहे हैं।
 सीमित आय वाला  एक नौजवान इसको लेकर भारी गुस्से में रहता है।शायद इसी कारण वह गैर राजनीतिक युवक नरंेद्र मोदी के खिलाफ हो गया है।
  पता नहीं, दोहन की ऐसी खबरें प्रधानमंत्री तक पहुंचती भी है या नहीं ! मुझे भी सर्विस चार्ज कुछ ज्यादा ही लगता है।
  वैसे वह तो नौजवान है।गुस्सा जायज है।
एक अति बुजुर्ग को एक अत्यंत मामूली बात को लेकर मुख्य मंत्री का विरोधी होते देखा।पहले वे भारी समर्थक थे।
वे रोज बिहार विधान परिषद के स्मोकिंग रूम में बैठते थे।
अब दिवंगत हो चुके हैं।
 कई साल पहले की बात है।एक दिन वे रिक्शे से सिंचाई भवन की ओर से सचिवालय में प्रवेश करने लगे।संतरी ने उन्हें रोक दिया।
  फिर क्या था ! वे आग बबूला हो गए।स्मोकिंग रूम  लौट आए।
उसके बाद लगातार मुख्य मंत्री की बात -बात में आलोचना करने लगे।
बैंकों के अतिशय सर्विस चार्ज के लिए भले आप प्रधान मंत्री को परोक्ष रूप से जिम्मेदार मान लेंं, पर क्या कोई मुख्य मंत्री ने  संतरी को ऐसा आदेश दे सकता है कि फलां नेता जी का रिक्शा भीतर जाने नहीं देना ?
 इस बहाने एक अंतिम किन्तु  महत्वपूर्ण जानकारी।
    आजादी हुई ही थी।उन दिनों गांधी जी पटना में ही थे।
जमशेद पुर के एक बहुत बड़े नेता उनसे मिलने सड़क मार्ग से 
पटना आ रहे थे।
गांधी जी समय के बड़े पाबंद थे।यह बात उस नेता को मालूम थी।
  पर दुर्भाग्य यह हुआ कि फतुहा के पास रेलवे क्रासिंग का फाटक बंद था।
टे्रन आने ही वाली थी।जहां तहां सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे।गोरखा सिपाहियों का जहां  पहरा था।
   नेता जी ने फाटक खोल देने के लिए कहा।गोरखा  तैयार नहीं हुआ।
नेता जी अत्यंत गुस्सेल थे।उन्होंने गोरखा को एक थप्पड़ कस कर मार दिया।उसने उन्हें गोली मार दी।
नेता जी का निधन हो गया।
बाद में यह खूब प्रचार हुआ कि इसमें राज्य के एक बहुत बड़े सत्ताधारी नेता का हाथ था।
 उस नेता जी के निजी सचिव रहे एक बंगाली बाबू  बहुत बाद में कहीं मिले थे।उन्होंने ही मुझसे कहा कि वे बड़े गुस्सेल थे।  
    

सोमवार, 11 मार्च 2019

‘राजवंशीय’ लोकतंत्र के बढ़ते कदम-एक और चुनाव



मशहूर पत्रकार नीरजा चैधरी ने 2003 में लिखा था कि ‘भारतीय राजनीति मात्र 300 परिवारों तक सीमित है।’
नीरजा ने यह भी लिखा था कि ‘हर व्यवसाय में डिग्री की जरूरत होती है।लेकिन राजनीति ऐसा पेशा है जहां बेटा बड़ी आसानी से बाप की राह को अपना सकता है।’
@पंजाब केसरी-30 नवंबर 2003@
  पिछले 16 साल में ऐसे परिवारों की संख्या कितनी बढ़ी है ?
 यह संख्या बढ़कर अभी 565 हुई या नहीं ?
कब तक हो जाएगी ? 2019 के चुनाव में कितने नए परिवार जुड़ेंगे  ?
याद रहे कि अंगे्रजों के शासनकाल में हमारे यहां 565 राज घराने थे।
  राज घरानों को जन कल्याण से कम ही मतलब रहता था।
उस जमाने में कलक्टर रहे एक आई.सी.एस.अफसर ने लिखा है कि जिले में कहीं दैविक विपदा या अगलगी वगैरह होने पर राहत के लिए पैसे बिलकुल नहीं होते थे।हमलोग स्थानीय व्यवसायियों से विनती करके कुछ पैसे एकत्र करते थे।उन्हीं पैसों से विपदापीडि़त बेसहारा लोगों को थोड़ी राहत पहुंचाते थे।
लोकतंत्र के राजवंशीय शासक अपने वोट बैंक के अलावा कितनों को राहत पहुंचाते रहे हैं ?
  ताजा खबर जय पुर से है।
इंडिया टूडे लिखता है कि ‘सभी निगाहें अब वैभव गहलोत पर लगी है कि अब वे चुनावी पारी शुरू करने का संकेत देते हैं या नहीं।’ 
आज के अधिकतर राजनीतिक परिवारों के चाल, चरित्र और  चिंतन उन रजवाड़ों से ही मिलते -जुलते लगते हैं।
  जिस तरह पहले से ही यह तय रहता था कि जय पुर राज घराने के  जय सिंह के बाद राम सिंह उनके उत्तराधिकारी होंगे।राम सिंह के बाद माधो सिंह और उनके बाद सवाई मान सिंह उत्तराधिकारी होंगे,उसी तरह आज के डायनेस्टिक डेमोक्रेसी के दौर में कई राजनीतिक दलों में यह उत्तराधिकार सूची पहले से तय है।
  उस दल को सत्ता मिलने पर यह भी तय है कि कौन मुख्य मंत्री या प्रधान मंत्री होगा।दल के मसले पर अंतिम निर्णय किसका होगा।
 कम्युनिस्ट व संघ परिवार से जुड़े दल को छोड़कर आज अधिकतर दलों का यही हाल है।
कम्युनिस्ट तो विलुप्त हो रहे  हंै।उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि उसे न तो सामाजिक न्याय की कोई समझ है और न ही राष्ट्रवाद की।वैसे आर्थिक मामले में ईमानदारी औरों से अधिक है। 
कल्पना कीजिए कि भाजपा भी किसी कारणवश कभी विलुप्त होने लगे तो इस देश की राजनीति में क्या बचेगा ?
बच जाएंगे नए ‘राजनीतिक घराने’ ! लोकतंत्र के राजवंशीय घराने।
उनके मुख्य लक्षण होंगे -जातिवाद, संप्रदायवाद, अपराध और धनलोलुपता !
इनमें से कुछ लक्षण तो भाजपा व कम्युनिस्ट दलों में भी हैं।
पर पराकाष्ठा तो दूसरी ओर ही है।
 नीरजा चैधरी के 300 घरानों की संख्या में  अब तक कितनी बढ़ोत्तरी हुई है ?
इस चुनाव के बाद और कितने घराने बढ़ेंगे ?
यह संख्या बढ़कर 565 तक कब पहुंच जाएगी ?
 अंत में--परिवारवाद तो लगभग हर दल में है।पर,परिवारवाद और परिवारवाद में भी भारी अंतर है। 
 एक राजनीतिक परिवार अपनी पूरी पार्टी निजी कारखाने की तरह अपनी अगली पीढ़ी को सौंप जाता है।
 कुछ दूसरे दलों में ऐसा नहीं है।पर उनमें भी कुछ नेताओं यानी एम.पी.एम.-एल.ए.के परिजन टिकट पा जाते हैं या मंत्री बन जाते हैं।हालांकि वह भी सही नहीं है।उससे राजनीतिक कार्यकत्र्ता घटते हैं।
 वैसे इन दिनों एम.पी.-एम.एल.ए.फंड के ठेकेदार वह कमी पूरी कर रहे हैं।इसीलिए ये फंड बंद भी नहीं हो रहे हैं।   
  

-मतदान का प्रतिशत बढ़ाने से बढ़ेगी लोकतंत्र की सार्थकता-सुरेंद्र किशोर-


सन 2014 के लोक सभा चुनाव में बिहार में करीब 44 प्रतिशत मतदातागण बूथों पर नहीं पहुंचे थे।यानी मतदान का प्रतिशत 56 ही रहा था।
ऐसा नहीं कि उन्हें वहां पहुंचने से रोक दिया गया था।
बल्कि वे अपनी मर्जी से नहीं गए।
क्या इस बार मतदान का प्रतिशत बढ़ेगा ?
उम्मीद तो की ही जानी चाहिए।क्योंकि बिहार राजनीतिक रूप से अत्यंत जागरूक प्रदेश है।
इतने ही जागरूक प्रदेश पश्चिम बंगाल में पिछले लोक सभा चुनाव में 82 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट डाले थे।अच्छे काम के लिए किसी से स्पद्र्धा  करने में कोई हर्ज नहीं।
  अन्य राज्यों के साथ- साथ बिहार में भी अगले चुनाव नतीजे को लेकर अभी से अटकलें लगाई जा रही हैं।
इस चुनाव में नरेंद्र मोदी केंद्र में हैं।कोई मोदी जी को जितवाना चाहता है तो कई अन्य लोग उन्हें सत्ता से हटाना चाहते हंै।ठीक ही है।यही तो लोकतंत्र है।
बिहारी समाज भी इस सवाल पर दो हिस्सों में बंट गया है।
यदि आप हराना चाहते हैं तौभी आपको मतदान केंद्र पर जाना ही चाहिए।जितवाने की इच्छा रखने वालों की तो प्रतिष्ठा का सवाल है।
  इसलिए ऐसा हो कि जो 44 प्रतिशत लोग पिछली बार मतदान केंद्रों पर नहीं पहुंच सके थे ,वे इस बार जरूर पहुंचे।
लोकतंत्र के प्रेमियों की इसमें बड़ी जिम्मेवारी बनती है।
--निपुण चालकों को ही मिले ड्राइविंग लाइसेंस--
मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने गत साल औरंगाबाद में ड्राइविंग ट्रेनिंग एंड ट्राफिक रिसर्च संस्थान का समारम्भ किया।
सड़क सुरक्षा की दिशा में यह  सराहनीय पहल है।
  पर बड़ी समस्या यह है कि जिन्हें ड्रायविंग लाइसेंस दिए जा रहे हैं ,उनमें अधिकतर निपुण चालक नहीं हैं।यह समस्या तो पूरे देश में है,पर बिहार में कुछ अधिक ही है।यहां भी  गैर जिम्मेदार अभिभावक अपने नाबालिग  संतान को ,जिनके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं होता ,अपनी गाड़ी दे देते हैं।वे किशोर वय  कई बार में भीषण दुर्घटनाएं कर देते हैं।
 हाल में दिल्ली में चार आॅटोमेटेड टेस्ट ड्राइविंग सेंटर खोले गए हैं।
उनमें 20 तरह की ड्राइविंग स्किल की जांच होगी।
जांच की वीडियो रिकाॅर्डिंग करायी जाएगी।
मुझे मालूम नहीं कि बिहार में ऐसी व्यवस्था है या नहीं।क्या राज्य सरकार इस दिशा में सोच रही है ?
बिहार में  नए लाइसेंस देने से पहले ऐसी जांच होनी चाहिए। साथ -साथ पुराने लाइसेंसधारियों की निपुणता की भी जांच होनी चाहिए।
 चालकों को  यह भी शिक्षा दी जाए कि वे सड़कों पर अनावश्यक हाॅर्न न बजाएं।
  यदि कोई अभिभावक अपने लाइसेंस रहित परिजन को सड़क पर चलाने के लिए अपनी गाड़ी दे दे तो उस अभिभावक का ड्राइविंग लाइसेंस रद होना चाहिए।पता नहीं ,पहले से ऐसा कोई नियम है या नहीं !  
    --ये ‘गोदी मीडिया’ क्या है !--
पत्रकारिता की एक बुनियादी नैतिकता है।
यदि मीडिया किसी नेता पर आरोप लगाती है तो उस आरोप के संबंध में उस नेता का भी पक्ष आरोपों के साथ -साथ ही दे दिया जाना चाहिए।
 यदि एकतरफा उस आरोप के प्रचारित होने से प्रतिद्वंद्वी नेता को राजनीतिक लाभ मिलता है तो ऐसा प्रचार करने वाली  मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ कहा जा सकता है।
 यह बात सभी पक्षों की मीडिया पर लागू होती है।
ऐसी पक्षधरता चाहे मोदी की, की जाए या मोदी विरोधियों की,
 दोनों पक्षधर मीडिया को गोदी मीडिया ही कहना न्यायोचित होगा।
हां, गोदी मीडिया के इस ताजा दौर में इस देश में मीडिया का एक हिस्सा ऐसा भी है जिसका अपना कोई एजेंडा नहीं।
  कुछ पुराने लोग यह सवाल करते हैं कि इस देश में  ‘गोदी मीडिया’ कब नहीं थी ?
  वैसे भी चुनावों का इतिहास बताता है कि मीडिया का चुनाव नतीजे पर बहुत ही कम असर पड़ता रहा  है।
 यदि असर पड़ता होता तो 1995 के बिहार विधान सभा चुनाव में लालू प्रसाद के दल को बहुमत नहीं मिलता।
इसी तरह इंदिरा गांधी को 1971 के लोक सभा चुनाव में जीत हासिल नहीं होती।
--घोटालों से जुड़ी खबरों के स्त्रोत-- 
राफेल खरीद से संबंधित फाइल की चोरी हो गई।उसके आधार पर एक अखबार ने खबर छापी।
अखबार कह रहा है कि हम खबर के स्त्रोत के बारे में किसी को कुछ भी नहीं बताएंगे।
 ठीक ही है।
महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि चोरी की फाइल के आधार पर किसी ने खबर क्यों छापी।सवाल यह है कि उस फाइल को पढ़ने पर कोई आरोप बनता है या नहीं।यह देखना अब सुप्रीम कोर्ट के जिम्मे है।
  खैर इस बहाने इस तरह की दो अन्य कहानियां याद आ गईं।
बोफर्स घोटाले को लेकर तत्कालीन केंद्र सरकार के खिलाफ जारी अभियान में शामिल एक व्यक्ति को उससे संबंधित सरकारी फाइल की जेरोक्स  काॅपी मिल गई।
 जब सवाल पूछा गया तो उस व्यक्ति ने कहा कि न्यूजपेपर्स हाॅकर  सुबह -सुबह अखबारों के साथ उस कागज को भी मेरे दरवाजे पर फेंक गया।
  अस्सी के दशक में पटना हाईकोर्ट में पटना अरबन कोआपरेटिव बैंक घोटाले से संबंधित मामले की सुनवाई हो रही थी।
लोकहित याचिकाकत्र्ता शिवनंदन पासवान ने एक सरकारी फाइल की जेराॅक्स  काॅपी अदालत में पेश कर दी थी।
बचाव प़क्ष के वकील ने सवाल उठाया,यह सरकारी कागज आपको कहां से मिला ?
  याचिकाकत्र्ता के वकील ने कहा कि एक कौआ अपनी चोंच में एक कागज लटकाए याचिकाकत्र्ता के  मकान की छत के ऊपर उड़ रहा था।संयोगवश वह कागज  छत पर गिर गया। 
       --भूली बिसरी याद--
29 फरवरी, 2004 के अखबार में एक खबर छपी थी जिसका 
शीर्षक सनसनीखेज था--
‘परिवार का पेट भरने के लिए विधायकी छोड़ी।’
 है न सनसनीखेज ! एक नजर में इस खबर पर संभवतः कुछ लोगों को विश्वास ही न हो।
 पूरे परिवार के लिए सात पुश्त का इंतजाम करने के लिए अनेक लोग विधायक या सासंद बनना चाहते हैं, उस देश में ऐसी अनहोनी बात !
यह तो विचित्र किन्तु सत्य हैं !
कहानी पश्चिम बंगाल की है।
सी.पी.एम.की विधायक ज्योत्स्ना सिंह ने जब विधायिकी छोड़ी तो उन्होंने यही कारण बताया कि सरकारी नौकरी करने के लिए मैंने ऐसा किया।क्योंकि विधायक के रूप में मुझे इतने पैसे नहीं मिल सकते जिससे  परिवार का पेट भर सकूं।
कम्युनिस्ट दलों में आम तौर पर लोग ईमानदार होते हैं।पर यह तो ईमानदारी की पराकाष्ठा है।
26 फरवरी 2004 को पश्चिम बंगाल विधान सभा की सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद कहा कि मैं अपने बेहद गरीब परिचवार के पेट पालने के लिए नौकरी करने के लिए  विधान सभा की सदस्यता छोड़ रही हूं।
वह बर्दवान जिले के खांडाघोष निर्वाचन क्षेत्र से चुनी गई थीं।
उनके परिवार में दोनों भाई बेरोजगार हैं।
 ज्योत्स्ना ने राज्य सरकार में विकास परियोजना सर्वेक्षक के पद पर ज्वाइन किया।
 जिस देश बड़ी-बड़ी नौकरियां छोड़ कर विधायक और सांसद का चुनाव लड़ने की होड़ लगी रहती है।वहां कोई मामूली नौकरी के लिए विधायिकी छोड़ दे,यह अचंभित करने वाली सुखद खबर है।
 पर, इसका श्रेय उस वाम सरकार को भी मिलना चाहिए जिसने जायज -नाजायज तरीके से अधिक से अधिक धन बटोरने की छूट-सुविधा तब वहां के विधायकों नहीं दी थी।
खुद पूर्व मुख्य मंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य कोलकाता के पाम एवेन्यू मंे दो बेड रूम के फ्लैट में रहते हैं।वे करीब एक दशक तक मुख्य मंत्री रहे।
       --और अंत में-
पंचायतों के चुनाव दलगत आधार पर कराए जाने की सलाह सही है।
दरअसल अभी पंचायतों के लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों पर कोई अंकुश नहीं है।उन्हें अच्छे काम करने की भी पूरी छूट है जितनी छूट विवादास्पद काम करने की।
यदि वे किसी दल से जुड़े होंगे तो ,उस दल का कुछ अंकुश तो उन पर रहेगा।
उन्हें दल के कारण भी वोट मिलेगा तो साथ ही डर इस बात का भी रहेगा कि अगली बार टिकट कट भी सकता है।
@कानोंकान-प्रभात खबर-बिहार-8 मार्च 2019@

  
  

रविवार, 10 मार्च 2019

मुफस्सिल पत्रकार याद नहीं रहे केंद्र सरकार को
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भारत सरकार ने खेती से लेकर अखबार बेचने का काम 
करने वालों तक को 3000 रुपए मासिक पेंशन देने का
 निर्णय किया है।
इसके लिए रजिस्ट्रेशन भी शुरू हो चुका है।
इस तरह 127 प्रकार के काम करने वालों को पेंशन की सुविधा मिलेगी।
यह ऐतिहासिक कदम है।
लगता है कि क्वात्रोचि व माल्या जैसे लुटेरों और उनके संरक्षकों की जेबों में जाने से सरकारी पैसे अब थोड़ा बच रहे हैं तो कमजोर वर्ग के लोगों की ओर सरकार ने ध्यान दिया है।
हालांकि ऐसी लूट अभी पूरी तरह रुकी नहीं है।रुकेगी तो पेंशन की राशि बढ़ेगी।
  इस सिलसिले में भारत सरकार ने अखबार बेचने वालों को तो याद रखा,पर अखबार तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान देने वालों को वह भूल गई।
 मुफस्सिल संवाददाता और फ्रीलांस जर्नलिस्ट शोषित तबका है जिन पर शायद ही किसी का ध्यान जाता है।
जबकि, अखबार तैयार करने में ये भी उतनी ही महत्वपूर्ण 
भूमिका निभाते  हैं जितना लाखों रुपए का वेतन पाने वाले।

शुक्रवार, 8 मार्च 2019

सन 1984 के लोक सभा चुनाव की पूर्व संध्या पर  
एक अखबार ने तय किया कि कांग्रेस 
को हरा देना है।
यानी देश भर से ऐसी रिपोर्टिंग करवानी है जिससे लगे कि  
कांग्रेस हार रही है।
पर अंततः हुआ क्या ?
कांग्रेस को 404 सीटें मिल गईं।
दूसरी ओर उस अखबार का प्रसार जो गिरना 
शुरू हुआ,वह रुका ही नहीं।
वही काम आज जो अखबार कर रहे हैं ,उनके 
सामने चुनाव के बाद अपने अखबार को बचा
 लेने की समस्या आ सकती है।
नोट--पूछिएगा मत कि वह कौन सा अखबार था।
अनुमान से किसी अखबार का आप नाम भी नहीं लिखेंगे। 

गुरुवार, 7 मार्च 2019

 पिछले 13 साल में बिहार में गंगा नदी पर 14 पुल 
निर्मित,निर्माणाधीन तथा प्रस्तावित हुए।
बिहार में गंगा की कुल लंबाई 445 किलोमीटर है।
सिर्फ पटना जिले को उत्तर बिहार से जोड़ने वाले पुलों की कुल संख्या अगले कुछ साल में  9 हो जाएगी। 
  इससे गंगा के उत्तर में एक ‘नया पटना’ बसने की संभावना प्रबल हो जाएगी।नया पटना दिघवारा से सोन पुर के बीच बसेगा।
अभी पटना के एक प्रमुख उप नगर का विकास बिहटा में हो रहा है जो प्रादेशिक राजधानी से पश्चिम है।
 उप नगरों के बसने के कारण मुख्य पटना पर से आबादी का बोझ घटेगा। इससे प्रदूषण की समस्या भी घटेगी। भूजल का  दोहन कम होगा।


  

  इतिहास से सीखो,अन्यथा उसे दोहराओ
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बाबर के पास तोप थी ,किंतु राणा सांगा के पास तलवार।
राणा सांगा के पास तोप होती तो शायद वे नहीं हारते।
फिर तो इस देश का इतिहास कुछ और होता।
   विजयी लोगों का इतिहास ज्यादा चमकीला बनाया जाता है।इसीलिए दिल्ली में बाबर के नाम पर तो सड़क है,पर राणा सांगा के नाम पर नहीं।
   प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि यदि हमारे पास राफेल विमान होते तो हम इस बार अधिक कारगर होते।
पर यू.पी.ए.शासन काल में राफेल का सौदा दस साल तक क्यों टलता रहा था ?
कारण के बारे में कम कहना और अधिक समझना !
बहुत सी बातें तो अखबारों में आ ही चुकी हैं।
 हमारा देश बार-बार आपसी फूट और हथियारों की कमी के कारण हारा।
 1962 का चीन युद्ध इसका ताजा उदाहरण है।
बाद में सी.पी.एम.में शामिल नेताओं ने तब कहा था कि
चीन ने भारत पर नहीं बल्कि भारत ने ही चीन पर हमला किया। 
जब हथियार बेहतर हुए तो हम जीते।जैसे 1965 और 1971 ।
ब्रिटिश इतिहासकार सर जे.आर.सिली ने लिखा है कि ‘भारत की पराधीनता के प्रमुख कारण भारतीय सामंतों के परस्पर संघर्ष, भारतीय जनता के धार्मिक तथा सामाजिक अन्तरविरोध और देश के लिए बाहरी खतरों के प्रति उदासीनता आदि थे।’
याद रहे कि ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत विजय पर सिली ने किताब लिखी है।
  आज की स्थिति में तब की अपेक्षा कितना परिवत्र्तन हुआ है ? ? ? ! ! !
26 दिसंबर, 2008 को मुम्बई में आतंकी हमला हुआ।
ए.टी.एस.प्रधान हेमंत करकरे ने जो बुलेट प्रूफ जैकेट पहन रखा था,उसे छेद कर आंतकी की गोली उनके शरीर में लग गई और उन्हें बचाया नहीं जा सका।
  उस छेद वाली बुलेट प्रूफ बंडी को कुछ लोगों ने घटना के बाद ही गायब कर दिया था।
चूंकि बुलेट प्रूफ बंडियों की खरीद में घोटाला हुआ था,इसलिए तत्संबधित फाइल भी सरकारी आॅफिस से गायब कर दी गई।
 उधर 2009 में ही भारतीय सेना ने अपने लिए एक लाख बुलेट प्रूफ बंडी की केंद्र सरकार से मांग की थी।पर,नहीं मिली।कारण वही जो थे राफेल खरीद को लेकर  थे।
मौजूदा सरकार ने एक लाख 86 हजार बुलेट प्रूफ बंडी के आॅर्डर दिए हैं। 
  अब चर्चा जैश ए मोहम्मद के बालाकोट शिविर पर हमले की।
नेशनल टेक्निकल रिसर्च आॅर्गनाइजेशन द्वारा किए गए सर्विलांस के अनुसार करीब 300 मोबाइल बालाकोट में सक्रिय थे।
 यानी तीन सौ व्यक्ति वहां थे जब भारत ने हमला किया।
पर हमारे कुछ प्रतिपक्षी नेता सबूत मांग रहे हैं।
2015 में अरब सागर में पाकिस्तानी आतंकियों ने अपनी नाव को खुद ही विस्फोटकों से उड़ा लिया था।
क्योंकि भारतीय सुरक्षाकर्मी उनका पीछा करने लगे थे।वे मुम्बई हमले की तरह एक और हमला करने के लिए समुद्री मार्ग से आगे बढ़ रहे थे।
पर इसी एन.टी.आर.ओ. के सर्विलांस के कारण उनकी गतिविधि पकड़ में आ गई थी।
एन.टी.आर.ओ.का गठन 2004 में हुआ था।यह संगठन पी.एम.ओ. के तहत काम करता है।
पर यू.पी.ए.शासन काल में इसका कितना इस्तेमाल हुआ,यह पता नहीं चला सका है।
 ए.के.एंटानी समिति ने 14 अगस्त 2014 को सोनिया गांधी को रपट दी थी।उसमें अन्य बातों के अलावा यह भी कहा गया था कि हमारी हार का एक कारण मुस्लिम तुष्टिकरण भी है।
 पर क्या कांग्रेस ने एंटोनी जैसे ईमानदार नेता की रपट पर ध्यान दिया ?
नहीं दिया । क्यों ?
 क्योंकि इतिहास से सीखने की हमारी आदत कम है।उसे दोहराने की अधिक।