शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

बकलोल उत्तराधिकारी !
कभी सुना था कि दुनिया के एक बहुत बड़े आद्योगिक घराने के मालिक के बकलोल उत्तराधिकारी ने अपने अर्ध पागलपन में  उलूल -जलूल हरकतों, बातों और क्रिया कलापों से अपने पारिवारिक उद्योग -धंधों को समाप्त प्रायः कर दिया था।
   खैर, वह तो निजी औद्योगिक घराना था।पूर्वजों के सामने यह मजबूरी थी ।वे  एकमात्र संतान को उत्तराधिकार नहीं सौंपते तो किसे सौंपते ?
पर, किसी राजनीतिक पार्टी के लिए तो ऐसी कोई मजबूरी नहीं हो सकती ! यदि इस देश में कभी किसी वंशवादी राजनीतिक पार्टी के सामने ऐसी कोई समस्या आ जाए तो वह अपने  पूर्ण विनाश से पहले ही चेत जाए ! उसका चेत जाना लोकतंत्र के हक में  सही कदम होगा।
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि वह समस्या इस देश में आ ही चुकी है।
पर,यदि कोई पार्टी,अपने  नेतृत्व के लिए सिर्फ एक ही वंश पर निर्भर हो तो देर -सवेर ऐसी समस्या आ ही सकती है।
सदा तो ऐसा नहीं होगा कि उस वंश की हर संतान अर्ध -पागलपन और बकलोलपन की समस्या से मुक्त ही हो !

चुनावी भविष्यवाणियां
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इस चुनाव के नतीजे को लेकर तरह -तरह की 
भविष्यवाणियां की जा रही हैं।
राजनीतिक नेताओं की भविष्यवाणियों को परे रख दें।
वे तो अपनी -अपनी लाइन पर ही बोलेंगे।मजबूरी है।
पर जो लोग राजनीति से अलग हैं,भले उनकी विचारधारा जो भी हो,उनकी भविष्यवाणियों पर गौर करें।
 उन में से कुछ प्रमुख व नामी -गिरामी लोगों की भविष्यवाणियां नोट कर लें।
  23 मई को रिजल्ट से उन्हें मिला कर देखें।
जिनकी भविष्यवाणी रिजल्ट से अधिक करीब लगे,उनकी भविष्यवाणियों को आगे भी गंभीरता से लिया करें।
अगले ही साल बिहार विधान सभा का चुनाव भी होने वाला है।काम आएगा।
अपनी इच्छा को भविष्यवाणी के रूप में पेश करने वालों से सावधान हो जाने का यह अच्छा अवसर है।

भई, मुकेश अम्बानी भी कमाल के आदमी हैं !
सबसे बड़े व्यवसायी होते हुए भी उन्होंने सत्ता की कत्तई परवाह नहीं की और मुम्बई में कांग्रेस उम्मीदवार मिलिंद देवड़ा को अपना समर्थन दिया।
मेरी जानकारी में राहुल बजाज के बाद मुकेश ही ऐसे व्यापारी हैं जिन्होंने अपने मन की करी।इस तरह उन्होंने उपकार का बदला भी चुकाया।
  एक तरह वे अपने वचन पर भी खरा उतरे ।
मुकेश अम्बानी ने कभी रंजन भट्टाचार्य से कहा था कि ‘कांग्रेस तो अब अपनी दुकान है।’@-नीरा राडिया टेप@
 रंजन भट्टाचार्य यानी अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा  गोद लिए गए परिवार के एक सदस्य।
@19 अप्रैल 2019@

गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

‘मोदी’ नामक वोट बैंक कितना मजबूत ?
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‘मोदी’ शब्द भी एक वोट बैंक बन चुका है।
यह कितना मजबूत ‘वोट बैंक; है या कितना कमजोर ? 
यह तो चुनाव रिजल्ट ही बताएगा।
पर, बिहार के गांवों से मिल रही छिटपुट सूचनाओं के अनुसार अनेक लोग कह रहे हैं कि हम तो मोदी को वोट दंेगे।
यानी वे न तो किसी उम्मीदवार को वोट दे रहे हैं और  न किसी ही पार्टी को। 

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

चुनाव आयोग ने इस बार एक नया आदेश जारी किया है।
आदेश के अनुसार उम्मीदवारों को अपने आपराधिक रिकाॅर्ड का विवरण तीन बार समाचार पत्रों में छपवाना होगा।
नाम वापसी की आखिरी तारीख बीत जाने के बाद और मतदान के दिन से पहले तीन बार छपवाना होगा।
पहले दौर के मतदान बिहार में हो चुके हैं।दूसरा दौर होने ही वाला है।
 इस आदेश का कितना पालन हो रहा है ?
आपने प्रमुख समाचार पत्रों में लोक सभा उम्मीदवारों की ओर से छपे ऐसे विवरण देखे हैं ?-17 अपै्रल 2019


        केंद्र सरकार की लापारवाही 
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1.-भ्रष्टों पर वार को नहीं मिली इजाजत
2.-मुकदमा चलाने के लिए सरकार की मंजूरी 
का इंतजार कर रहा सी वी सी
3.-सी.वी.सी.यानी केंद्रीय सतर्कता आयुक्त ने 79 भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ मांगी मुकदमे की इजाजत
4.-लेकिन मंजूरी प्रदान करने में हीला -हवाली कर रही कंेद्र सरकार
5. 13 बैंक कर्मियों के खिलाफ भी होना है निर्णय,नहीं मिली   मंजूरी
6.-सबसे ज्यादा नौ मामले कार्मिक मंत्रालय के पास पड़े हैं लंबित
         -----राष्ट्रीय सहारा, पटना, 16 अप्रैल, 2019
  

इलेक्शन रेफरेंस
मतदान प्रक्रिया पर शक
 करने की कहानी पुरानी
        सुरेंद्र किशोर
मतदान प्रक्रिया की प्रामाणिकता पर शक करने की परंपरा कोई नई नहीं है।
हालांकि अब तो मतदान से पहले ही शक किया जा रहा है।
1971 में मतदान के बाद शक किया गया था।
 ‘गरीबी हटाओ’ के लोक लुभावन नारे की लहर पर सवार होकर इंदिरा गांधी ने 1971 के लोक सभा का चुनाव भारी बहुमत से जीत लिया था।उससे पहले उन्होंने कुछ गरीबपक्षी कदम भी उठाए थे।
 पर चुनाव नतीजे आने के बाद जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष बलराज मधोक ने आरोप लगाया कि यह चुनावी जीत रसियन  स्याही के बल पर हासिल की गई।
 मधोक के  आरोप पर कम ही लोगों ने भरोसा किया,पर इस आरोप ने कुछ देर के लिए हलचल जरूर मचा दी थी।
1971  में  मधोक भी कांग्रेस के शशिभूषण से  हार गए थे।
मधोक ने कहा कि ‘मुझे शशिभूषण ने नहीं बल्कि अदृश्य स्याही ने हराया है।मैं कुछ ऐसा रहस्य खोलने जा रहा हूं जिससे पूरा देश हिल जाएगा।’
  मधोक के अनुसार, मतपत्रों पर पहले से ही अदृश्य स्याही लगी हुई थी।
 अदृश्य स्याही से गाय- बछिया के सामने निशान पहले से ही लगा था।
वह मतपेटी में जाने के बाद कुछ समय में अपने -आप उभर आता है।
उधर मतदाता के द्वारा लगाया गया निशान अपने- आप मिट जाता है।’
  इस आरोप पर चर्चा  के लिए मधोक विरोधी दलों के नेताओं से मिले तो किसी ने उनके इस आरोप को गंभीरता से नहीं लिया।
  एक विवेकशील नेता ने तब कहा था कि ‘पराजित नेता हार को झुठलाने की कोशिश करने की जगह हार के सही कारणों की पहचान करें।अन्यथा ऐसे बेसिर पैर के आरोप से प्रतिपक्ष की प्रतिष्ठा कम होगी।’
दरअसल प्रतिपक्ष के कुछ बड़े नेताओं को यह बात  समझ में  नहीं आ रही थी कि जब अविभाजित कांग्रेस के बड़े -बड़े सम्मानित व ताकतवर माने जाने वाले  नेतागण इंदिरा गांधी की कांग्रेस के विरोध में थे तो भी इंदिरा गांधी जीत कैसे गईं। 
@इस लेख का संपादित अंश आज के दैनिक भास्कर,पटना  में प्रकाशित@