बुधवार, 8 मई 2019


अनुत्तरित हैं बोफर्स सौदे के कई प्रश्न
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     -सुरेंद्र किशोर- 
अभी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने राजीव गांधी का नाम लिए बिना बोफर्स तोप सौदे की चर्चा की।
इससे कांग्रेस के नेता और कुछ अन्य लोग आपे से बाहर हो गए।
लेकिन यह समझने की जरूरत है कि जब तक बोफर्स तोप सौदे को लेकर उठे प्रश्न अनुत्तरित बने रहते हैं तब तक उनसे पीछा नहीं छूटने वाला है।
  जनहित याचिका के रूप में अब भी बोफर्स का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।सी.बी.आई.ने भी इस केस को फिर से खोलने की अपील सुप्रीम कोर्ट से की थी।अदालत ने देर हो जाने के आधार पर सी.बी.आई. की याचिका को नामंजूर करते हुए कहा कि अजय अग्रवाल की लोकहित याचिका पर जब सुनवाई होगी तब आप अपना भी पक्ष रख सकते हैं।
हालांकि सी.बी.आई.ने यह तर्क भी दिया था कि बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देर को ध्यान में नहीं रखते हुए आडवाणी तथा अन्य के खिलाफ फिर से सुनवाई करने का आदेश दे दिया ।  
खैर, यह सभी पक्षों के हक में होगा कि  बोफर्स सौदे से संबंधित मुकदमे को तार्किक परिणति तक पहुंचा दिया जाए।
 यह बात उन लोगों के हक में अधिक होगी जो यह मानते हैं कि इस सौदे में राजीव गांधी का कोई हाथ नहीं था।
  लेकिन यह तभी हो सकेगा जब इससे संबंधित कुछ महत्वपूर्ण सवालों के जवाब मिल जाएं।
 जब भी कोई व्यक्ति बोफर्स सौदे से राजीव गांधी या किसी अन्य का नाम जोड़ता है तो सवाल उठाया जाता है कि किसी अदालत ने राजीव गांधी को दोषी तो नहीं ठहराया है।
यह बात सही है।नहीं ठहराया है,
पर सवाल है कि क्या अदालतों को इस मामले में ंकाम करने दिया गया ? 
क्या जांच एजेंसियों को भी काम करने दिया गया ?
 सच तो यह है कि सरकार बदलते ही जांच एजेंसियों के रुख भी बदलते रहे।
क्या बोफर्स से संबंधित मुकदमे की सुनवाई लोअर कोर्ट से होते हुए अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची ? 
क्या पहुंचने दी गई ?
जब दिल्ली हाईकोर्ट ने  राजीव गांधी और अन्य आरोपितों को दोषमुक्त घोषित किया तो क्या जांच एजेंसी को सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की इजाजत केंद्र सरकार ने दी ? 
नहीं दी।पूछे जाने पर तत्कालीन प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह ने कहा कि ‘सरकार गैर जरूरी अपीलों में नहीं जाती।’
जिस घोटाले के पैसे दो बैंक खातांे में पाए जा चुके थे ,उस मामले को भी सरकार ने गैर जरूरी समझा। आखिर क्यों ?
   खुद भारत सरकार के आयकर अपीलीय न्यायाधीकरण ने भी 3 जनवरी 2011 को कहा कि बोफर्स तोप सौदे में ओट्टावियो क्वात्रोचि और विन चड्ढा को 41 करोड़ रुपए दलाली  दी गई थी।
ऐसी आय पर उन पर भारत में टैक्स की देनदारी बनती है।
सवाल है कि  उनसे टैक्स की वसूली क्यों नहीं हुई  ?
 बोफर्स  दलाली मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जे.डी.कपूर ने 4 फरवरी 2004 को राजीव गांधी को क्लीन चीट दे दी।अदालत ने हिन्दुजा बंधुओं  को भी आरोप मुक्त कर दिया।
 सन 2009 में सी.बी.आई.ने अदालत से क्वात्रोचि के खिलाफ दायर केस को वापस करने की अनुमति मांगी।
  दिल्ली हाईकोर्ट के क्लीन चीट वाले निर्णय के खिलाफ अपील क्यों नहीं की गई जबकि  जानकारों के अनुसार हाईकोर्ट ने ठोस सबूतों को अनदेखी करते हुए वैसा जजमेंट दिया था ?
इस सवाल का जवाब अनुत्तरित है ।
  इस मामले को जरा शुरू से देखें।
24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडन की कंपनी ए.बी.बोफर्स के बीच 1437 करोड़ रुपए का 400 हाउजर फील्ड गन खरीद के लिए अनुबंध हुआ।
  16 अप्रैल 1987 को स्वीडेन रेडियो ने यह खबर प्रसारित की कि इस सौदे में प्रमुख भारतीय नेताओं और प्रमुख रक्षा अधिकारियों को रिश्वत दी गई। 
जब यह खबर भारतीय मीडिया में जोर- शोर से छपने लगी तो केंद्र सरकार ने कहा कि इस सौदे में कोई दलाली नहीं दी गई।
एक तरफ इनकार और दूसरी तरफ सबूत पर सबूत आने लगे।
बोफर्स तथा उस समय के कुछ अन्य घोटाले लोस चुनाव के मुख्य मुद्दा बन गए।
प्रतिपक्ष हमलावर था और सरकार बचाव की मुद्रा में ।पूरा 1989 लोक सभा चुनाव बोफर्स घोटाले के मुद्दे पर लड़ा गया।गांव -गांव बोफर्स शब्द प्रचलित हो गया।लोगों ने इसे संवदेनशील मामला माना क्यांेकि
देश की रक्षा से जुड़ा था।
राजीव गांधी सत्ता से हटे।
वी.पी.सिंह प्रधान मंत्री बने।
वी.पी.सिंह सरकार के कार्यकाल में  सी.बी.आई.ने जनवरी, 1990  में इस मामले में केस दर्ज किया।
अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में सन 1999 और 2000 में आरोप पत्र दाखिल किए गए।
आरोप पत्र में राजीव गांधी का नाम 20 बार आया है।
 जब- जब कांग्रेस या कांग्रेस समर्थित सरकार बनी बोफर्स मामले की जांच में  पूरी ढिलाई हुई ।
 मुकदमे को रफादफा करने की कोशिश हुई।
 स्वीडेन की नेशनल आॅडिट ब्यूरो ने 4 जून 1987 को कह दिया था कि बोफर्स में दलाली खाई गई है।उसके बाद से सत्ताधारी नेताओं ने दोषियों को बचाने की जोरदार कोशिश शुरू कर दी।
वे किसे बचा रहे थे ? और क्यों ?
1988 में वी.पी.सिंह ने पटना की जन सभा में स्विस बैंक की लंदन शाखा के उस बैंक खाते का नंबर भी जाहिर कर दिया जिसमें दलाली के पैसे जमा थे।
फिर भी सरकार व जांच एजेंसियों ने कोई कार्रवाई नहीं की।
उल्टे बी.शंकरानंद के नेतृत्व में गठित संयुक्त संसदीय समिति 
ने कह दिया कि कोई दलाली नहीं ली गई है।
 पर सरकार बदलने पर जांच शुरू हुई तो पता चला कि वी.पी.सिंह द्वारा बताया गया खाता नंबर सही है।
1990 में ही उस खाते को जब्त करवा दिया गया था।
पर 2006 में केंद्र सरकार ने एक अफसर लंदन भेज कर उस खाते को चालू करवा दिया।जबकि उसी दिन सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश आया कि खाते को चालू नहीं किया जाएगा।
उस खाते में क्वात्रोचि के करीब 21 करोड़ रुपए थे।उसे उसने निकाल भी लिया।
बोफर्स केस में नाम आने के बाद क्वात्रोचि 1993 में भारत छोड़कर इटली भाग गया।
उसे भगाने में किसने मदद की ?
सरकार ने क्वात्रोचि को लाभ पहुंचाने के लिए ऐसा कदम क्यों उठाया ?
  इस मामले को लेकर विदेश मंत्री माधव सिंह सोलंकी को मंत्री पद से क्यों हटना पड़ा ?
पी.वी.नरसिंंह राव के प्रधान मंत्रित्वकाल में विदेश मंत्री दावोस गए थे।वे अपने साथ एक नोट  भी ले गए थे।सोलंकी ने स्विस विदेश मंत्री से आग्रह किया था कि वे जांच एजेंसी को 
सहयोग न करें क्योंकि बोफर्स केस राजनीति से प्रेरित है।यह जानकारी जब भारत आई तो देश में भारी हंगामा हुआ तो माधव सिंह सोलंकी को मंत्री पद छोड़ना पड़ा था।
सोलंकी आखिर किसे बचाना चाहते थे ? किसने उन्हें स्विस विदेश मंत्री से ऐसा कहने के लिए कहा था ?
  18 अगस्त 2016 को मुलायम सिंह यादव ने लखनऊ में कहा था कि रक्षा मंत्री के रूप में मैंने बोफर्स की फाइल गायब करवा दी थी।
उन्होंने यह भी  कहा कि चूंकि बोफर्स तोप ने अच्छा काम किया ,इसलिए मैंने उस केस को आगे बढ़ाने में रूचि नहीं ली।
सवाल है कि  सी.बी.आई.ने मुलायम से क्यों नहीं पूछा  कि आपने किसके दबाव मंंे ऐसा किया ? याद रहे कि मुलायम सिंह यादव उस सरकार के मंत्री थे जो कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चल रही थी।
क्या सचमुच बोफर्स तोप  अच्छी है ?
  अच्छी तो है,पर फ्रंेच तोप सोफ्मा से बेहतर नहीं है।
सोफ्मा को भी तब भारत में बेचने की कोशिश हुई थी।
 तत्कालीन सेनाध्यक्ष ने सोफ्मा खरीदने की ही सिफारिश सरकार से की थी।
 पर सरकार बोफर्स के पक्ष में थी क्योंकि सोफ्मा कंपनी किसी को दलाली नहीं देती थी।
बोफर्स देती थी।
 बाद में उच्चस्तरीय  निदेश  पर सेनाध्यक्ष ने अपनी राय बोफर्स के पक्ष में दे दी।
सरकार में कौन थे जो बोफर्स की खरीद में पूरी रूचि ले रहे थे ?
 पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल के.सुंदरजी ने 7 फरवरी 1997 को  कहा कि इस बात में संदेह की बहुत कम गुंजाइश है कि बोफर्स तोप सौदे की दलाली को छिपाने में तत्कालीन प्रधान मंत्री कार्यालय सक्रिय था।
मुझे बताया गया कि स्वर्गीय राजीव गांधी को बचाने के लिए ऐसा किया गया।  
  सुंदरजी ने यह भी कहा कि तत्कालीन रक्षा राज्य मंत्री अरुण सिंह सरकार से इस्तीफा देने के बाद मेरे पास आए और कहा कि केवल एक व्यक्ति की खाल बचाने के लिए इस प्रकरण को छिपाया गया।
पूछे जाने पर सुंदर जी ने खोल दिया।कहा कि जाहिर है कि वे तत्कालीन प्रधान मंत्री का जिक्र कर रहे थे।
@ मेरे इस लेख का संपादित अंश 8 मई 2019 के दैनिक जागरण में प्रकाशित@





      

क्या आप किसी नेता को दिल्ली में पढ़ रहे अपने पुत्र का लोकल गार्जियन बनाना पसंद करेंगे ?
क्या आपको ऐसे नेता मिल पाएंगे ?
संभव है कि ऐसे नेता आपको मिल भी जाएं।
पर क्या कभी इस देश के मतदातागण सिर्फ वैसे ही नेता को चुनकर संसद में भेजेंगे जिसे वे अपने पुत्र का लोकल गार्जियन बनाने लायक समझते हैं ?
 यह और बात है कि वह नेता किसी का लोकल गार्जियन बनता है या नहीं।

उधार की बौद्धिकता से भारतीय कम्युनिस्टों का बुरा हाल 
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माकपा महा सचिव  सीताराम येचुरी ने कहा है कि रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों से यह साबित होता है कि हिन्दू भी हिसंक हो सकते हैं।
 येचुरी हिंसक होने और अपने बचाव में युद्ध करने में अंतर नहीं कर पाए।
 तलवार के बल पर दुनिया भर में धर्म परिवत्र्तन कराने वालों की ओर से येचुरी ने सुविधापूर्वक अपनी नजरें फेर रखी हैं।
 येचुरी को इतना भी नहीं मालूम कि रावण ने सीता का अपहरण किया था।
युद्ध उस कारण हुआ।
वह युद्ध इतना न्यायपूर्ण था कि एक ब्राह्मण रावण की हत्या के बावजूद श्रीराम को आम व खास ब्राह्मणों का आशीर्वाद मिला था।
  उधर युद्धिष्ठिर व उनके भाइयों को दुर्याेधन पांच गांव भी देने को तैयार नहीं था जबकि राजपाट में वे आधे के हकदार थे।
साथ ही द्रोपदी का चीर हरण हुआ था।
उस समय के भगवान कृष्ण पाण्डु पुत्रों के साथ थे।
 नन्दीग्राम में गरीबों की जमीन हड़पने के कारण गद्दी से उतरे कम्युनिस्टगण समकालीन इतिहास से भी तो कुछ नहीं सीखते।
भारत जैसे गरीब देश में कम्युनिस्टों के लिए बहुत संभावनाएं थीं।
 पर इस देश व समाज को समझने में विफल कम्युनिस्ट अपने अंतिम दिन गिन रहे हंै।फिर भी वे तुष्टिकरण के चक्कर में गलत -सलत बोलते जा रहे हैं।
 पिछड़ों के लिए आरक्षण की जरूरत कम्युनिस्टांे को कभी समझ में नहीं आई।यह बात भी समझ में नहीं आई कि भाजपा विरोध के नाम पर राज्यों व केंद्र में भ्रष्ट सरकारों को समर्थन करते जाओगे तो भाजपा बढ़ेगी, घटेगी नहीं ।
 हद तो तब हो गई जब हाल में केरल सी.पी.एम. के सचिव ने यह बयान दे दिया कि अमरीका,आस्ट्रेलिया और भारत चीन को घेरने में लगे हुए हैंं।
भारत को कौन -कौन देश घेरने में लगे हैं,इसकी चिंता उन्हें नहीं है।बल्कि चीन ने 1962 में भारत पर हमला किया तो इन्हीं कम्युनिस्टों ने कहा कि भारत ने ही चीन पर हमला किया था।
इसी कारण कम्युनिस्ट पार्टी टूटी भी। 
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय कम्युनिस्टों की भूमिका जगजाहिर है।
 खुद चीन अपने यहां के जेहादियों से किस तरह निपट रहा है, यह भी तो यहां के कम्युनिस्ट कभी सीख लेते !
 अपनी गलत,उटपटांग  व उधार की नीतियों के कारण इस देश के कम्युनिस्ट नेतृत्व ने इस देश की सर्वहारा जनता को कुछ अनजाने में, कुछ अज्ञानतावश और  व भरपूर बौद्धिक अहंकार के कारण धोखा ही तो दिया है ! उनमें से अनेक लोगों को भाजपा की शरण में जाने को भी बाध्य कर दिया।
     

मंगलवार, 7 मई 2019

     बिला जाएगा वोट बैंक
     --  सुरेंद्र किशोर --   

यदि अनिवार्य मतदान से ‘वोट  बैंक’ की विवादास्पद राजनीति की बुराइयां कम होती हंै तो इसे आजमाया जाना चाहिए।
  आस्ट्रेलिया और मैक्सिको सहित  दुनिया के 22 देशों में मतदान करना अनिवार्य है।
वहां की अनिवार्यता के तर्क व कारण कुछ और भी हो सकते हैं।पर भारत में पिछले कुछ दशकों से वोट बैंक की  राजनीति ने प्रशासन व राजनीति को जितना नुकसान पहुंचाया है,उतना किसी अन्य एक तत्व ने नहीं।
  राजनीति और प्रशासन में सत्तर के दशक से यह बीमारी घर कर गई।तब चार सामाजिक समूहों के बल पर केंद्र मे सरकार सत्ता में थी।अब तो इसने विकराल रूप धारण कर लिया है।यह राजनीति राज्यों में यह अपना खूब रंग दिखा रही है। 
 किसी राज्य में मात्र दो सामाजिक समूहों का अपना वोट बैंक बनाइए और तालमेल करके राज्य की  सत्ता पा लीजिए।
सिर्फ उन सामाजिक समूहों की जरूरतों को पूरा करते रहिए ।आप अगली बार भी चुनाव जीत सकते हैं।कमी पड़े तो इसी तरह के वोट बैंक के किसी अन्य ‘स्वामी  दल’ से चुनावी समझौता कर लीजिए।
 पूरे समाज के सम्यक विकास की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी।आराम कीजिए।पैसे कमाइए।समय आने पर अगली पीढ़ी को सत्ता सौंपने कव इंतजाम कर दीजिए।
 इसी तरह के बड़े गठजोड़ों 
के जरिए केंद्र की सत्ता हासिल की ही जा सकती है।हासिल होती भी रही है।
  हाल के दशकों के अनुभव बताते हैं कि जातीय व साम्प्रदायिक वोट बैंक के सहारे सत्ता में आने वाले दलों के राज में भ्रष्टाचार और अपराध अपेक्षाकृत अधिक होते हैं।क्या इस समस्या के समाधान के लिए कोई उपाय नहीं होना चाहिए !
  इस बीच नीति आयोग के मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी 
अमिताभ कांत ने कहा है कि 
‘आस्ट्रेलिया में भी चुनाव चल रहे हैं।वहां मतदान अनिवार्य है।और ऐसा न करने पर 20 डालर का जुर्माना लगता है।
जेल भी हो सकती है।शहरी भारत में मध्य वर्ग और अमीरों की मतदान को लेकर बेरुखी को देखते हुए भारत में भी इसे आजमाया जाना चाहिए।’
  यदि सचमुच कभी अमिताभ कांत की बातों पर गौर किया गया और यहां भी मतदान अनिवार्य हो गया तो जातीय -साम्प्रदायिक वोट बैंक के आधार पर राजनीति करने वाले कुछ दलों  की खटिया खड़ी हो सकती है।कई दुकानें बंद हो सकती हैं।
  कोई भी सामाजिक वोट बैंक 10 से 20 प्रतिशत तक की आबादी का  ही होता  है।
  यदि 90 प्रतिशत  वोट पड़ने लगेंगे तो वोट बैंक के दायरे वाले 10-20  प्रतिशत वोट उस 90 प्रतिशत में बिला जाएंगे।महत्वहीन हो जाएंगे।चुनाव नतीजोें को शायद ही प्रभावित कर सकें।
 आस्टे्रलिया में मतदान करना अनिवार्य है।फिर भी वहां औसतन 90 प्रतिशत ही मतदान हो पाता है।सौ प्रतिशत नहीं।
  हमारे यहां अभी अनिवार्य नहीं है।फिर भी लोक सभा के मौजूदा चुनाव के पहले फेज में  त्रिपुरा में 81 दशमलव 8 प्रतिशत मतदान हुए।यानी लगभग 82 प्रतिशत।आस्ट्रेलिया से सिर्फ आठ  प्रतिशत कम।
इस बार पश्चिम बंगाल में भी उस फेज में 81 प्रतिशत वोट पड़े हैं।
 अन्य राज्यों में मतदान का प्रतिशत जरूर अभी काफी कम है।
पर अनिवार्य करने पर वहां भी 90 प्रतिशत पहुंच ही सकता है।
  जब अधिक लोग मतदान करने लगेंेगे तो आम राजनीतिक दल व नेता भी मतदाताओं के प्रति उदासीन नहीं रह पाएंगे।
 उधर  जातीय -साम्प्रदायिक वोट बैंक के किले में सुरक्षित रहने वाले दल व उनके नेता भी नींद से जगेंगे।
 उन्हें अपनी पुरानी राजनीतिक शैली को बदलने के बारे में सोचना पड़ेगा।अन्यथा समय के साथ वे विलोपित हो जाएंगे। 
यह छिपी हुई बात नहीं है कि जातीय और साम्प्रदायिक वोट बैंक के किले में सुरक्षित दलों व नेताओं के शासन काल में  भ्रष्टाचार और अपराध कुछ अधिक ही होते हैं।वे यह समझते हैं कि हमारी सारी गलतियों को हमारा वोट बैंक नजरअंदाज  कर देगा।
  जो दल जातीय-साम्प्रदायिक वोट बैंक पर कम निर्भर हैं,उनके समक्ष  विकास -कल्याण कार्यक्रमों को करने की मजबूरी रहती है।उन्हें काम पर ही वोट मिलते हैं,भावना पर नहीं। 
   वोट बैंक वाले दल हर चुनाव में अपने खास मतदाताओं के सामने एक काल्पनिक भय दिखा कर उन्हें अपने साथ बांधे रखते हैं। 
कोई नेता कहता है कि हमारी जाति को उचित सम्मान नहीं मिल रहा है।इस काम में फलां दल या जाति बाधक है।इसलिए उन्हें हराना है।
कोई दूसरा नेता कहता है कि हमारे आरक्षण पर खतरा है।कोई कुछ कहता है तो कोई कुछ अन्य बात।
सारी बातें मंच से ही नहीं कही जाती।
कई बातें कानोंकान सफर कराई जाती है।
   कई साल पहले कतिपय भाजपा नेताओं ने यह संकेत दिया था कि हम मतदान अनिवार्य  कर सकते हैं।
यदि नरेंद्र मोदी की सरकार अगली बार भी सत्ता में आ गई तो वह अमिताभ कांत के सुझाव पर विचार कर सकती है।क्या भाजपा नेताओं की मंशा को भांप कर ही अमिताभ कांत ने लिखा है कि आस्टे्रलिया की तरह भारत में भी आजमाया जा सकता है ? पता नहीं।
  पर यदि कोई सरकार इसे कार्य रूप दे दे तो वह काम व्यापक जनहित में होगा।
   दुनिया के कुछ देशों में  मतदान नहीं करने पर सजा का प्रावधान है।
   भारत में वह कुछ ज्यादा ही हो जाएगा।इसलिए यहां की सजा यही हो सकती है कि कुछ समय के लिए कतिपय सरकारी सुविधाएं रोक दी जाए जो मतदान करने न जाएं।
इसका सकारात्मक असर होगा।धीरे -धीरे लोगों को आदत लग जाएगी।
   वोट बैंक की ताकत के बल पर अभी अनेक चुनाव क्षेत्रों में बाहुबली और धनवान उम्मीदवार आसानी से चुनाव जीत जाते हैं।यदि अनिवार्य मतदान के कारण ऐसे उम्मीदवार हारने लगेंगे तो अनिवार्य मतदान की कठोरता भी लोगों को बुरा नहीं लगेगी।
   आज तो औसतन  60-70  प्रतिशत मतदाता ही इस देश में मतदान करते हैं और मतों के भारी बंटवारे के कारण 20 -25 प्रतिशत या उससे भी कम मत पाने वाले उम्मीदवार भी कई बार चुनाव जीत जाते हैं।कुछ दफा  तो ऐसा भी होता है कि जिस उम्मीदवार की जमानत जब्त हो जाती है,वह भी चुन लिया जाता है।
    यदि अस्सी -नब्बे प्रतिशत मतदाता मतदान करने लगे तो जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंकों के सौदागर अत्यंत कम वोट पाकर  चुनाव नहीं जीत पाएंगे।भारत में आम तौर पर किसी चुनाव क्षेत्र में किसी धार्मिक या जातीय समूह  की आबादी 20-25  प्रतिशत से अधिक नहीं है।अपवादस्वरूप कुछ ही क्षेत्र ऐसे हैं जहां बात इसके विपरीत है।
   यदि कोई जातीय या धार्मिक समूह अधिकतर चुनाव क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं होंगे तो नेतागण भी सिर्फ सांप्रदायिक या जातीय आधार
पर ही अपनी पूरी राजनीति और रणनीति तय नहीं करेंगे।
इससे देश का भी भला होगा।
  जातीय व साम्प्रदायिक वोट बैंक की एक बड़ी बुराई हाल के वर्षों से  सामने आई है।
 आज तो जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक की खातिर कई नेता व दल इस देश को तोड़ने व कमजोर करने वाली शक्तियों को भी ताकत पहुंचाने से बाज नहीं आ रही हैं। यह अधिक खतरनाक स्थिति है।
@4 मई, 2019 के राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित@

बुधवार, 1 मई 2019

पटना में गंगा नदी पर गांधी सेतु का शिलान्यास जिस दिन हुआ,उसी दिन राहुल गांधी का जन्म हुआ था।
शिलान्यास समारोह में मंच पर ही प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी 
को यह खुशखबरी दी गई थी।
  पर एक और संयोग देखिए।
 बाद के वर्षों में गांधी सेतु की ठीक से देखभाल नहीं होने के कारण दस साल में ही वह जर्जर हो गया।
उसी तरह लगता है कि राहुल गांधी की भी ठीक देखभाल नहीं हुई।
  गांधी सेतु की तो इन दिनों भारी मरम्मत हो रही है।पूरा सुपर स्ट्रक्चर बदला जा रहा है।
यदि किसी व्यक्ति में कुछ कमी रह गई हो तो उसमें सुधार के लिए क्या किया जाए ?
 आज सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी को फटकारा है।
क्या सुधार की दिशा मंे इस फटकार का कोई असर पड़ेगा ?
पता नहीं।
जरूरत तो हेवी मरम्मत की रही है,पर वंशवादी राजनीति में 
भला किसी राजकुमार में बेहतर गुण विकसित करने की कोशिश करने का जोखिम कौन उठाए ! ?


इस भीषण गर्मी में भी अधिकतर छोटे- बड़े नेता लोग निरंतर प्रचार कार्य में लगे हुए हैं।
  मंच पर कभी  बेहोश हो जाने के बाद भी फिर काम
में लग जा रहे हैं।अस्पताल में शायद ही कोई भर्ती हो रहा रहा है।कोई थकावट नहीं,कोई बीमारी नहीं।
 इन्हीं नेताओं में से कुछ के खिलाफ यदाकदा मुकदमे चलते रहते हैं।ये लोग जेल भी जाते हैं।
पर जेल क्या जाएंगे,गिरफ्तार होते ही अधिकतर नेता अस्पतालों में भर्ती हो जाते हैं।

यदि बिहार के आरा में इस बार भी आर.के.सिंह जैसे ‘अ-राजनीतिक’ और ईमानदार उम्मीदवार जीत गए तो मेरी समझ से दो बातें मानी जाएंगी।
  पहली बात तो यह कि इस बार भी जबर्दस्त मोदी लहर चली ।
साथ ही, यह भी माना जाएगा कि दलाल, भ्रष्ट और इस तरह के कुछ अन्य तत्व इतने अधिक प्रभावकारी नहीं रहे जो ‘मोदी लहर’ को भी काट सकें।