गुरुवार, 11 जुलाई 2019

क्या कांग्रेस का पुनरुद्धार संभव है ?
पूरे देश में इन दिनों अनेक नेता, राजनीतिक विश्लेषक,पत्रकार व बुद्धिजीवी लोग इसी चर्चा में
व्यस्त हैं।
होगा भी या नहीं ?
पर, इस संबंध में मेरी भी एक राय है।
 2014 के लोक सभा चुनाव में अभूतपूर्व हार के बाद ए.के.एंटोनी ने लिखित रूप में हार के कुछ ठोस कारण बताए थे।
सोनिया गांधी ने उनसे पूछा था।
 क्या उन कारणों को दूर किए बिना पुनरुद्धार असंभव है ?
उनमें से दो कारण प्रमुख हैं।
एक अल्पसंख्यक तुष्टिकरण और दूसरा भ्रष्टाचार।
  यहां सामान्य अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण में कोई  समस्या नहीं है।उनके भले के लिए तो हर दल को काम करना ही चाहिए।
पर,कांग्रेस के साथ समस्या है कि वह अल्पसंख्यकों के बीच के अतिवादियों यहां तक कि देशद्रोहियों तक का भी तुष्टिकरण व समर्थन करती रही है।
भ्रष्टाचार का मतलब सामान्य भ्रष्टाचार नहीं बल्कि घोटाला दर घोटाला।कभी- कभी महा घोटाला।
दाल में नमक के बराबर भ्रष्टाचार को तो आज कम ही लोग बुरा मानते हैं।
क्या कांग्रेस इन दो गंभीर बुराइयों को खुद से दूर कर 
सकती है ?
चाहे तो कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व अतिवादी तुष्टिकरण से तोबा  कर सकती है।
घोटालों-महा घोटालों  से दूर हो जाने की गंभीर कोशिश कांग्रेस की राज्य सरकारें तो कर ही सकती हैं ।
यदि ये दो बातें हो जाएं तो पुनरुद्धार की शुरुआत हो सकती है।नरेंद्र मोदी का मुकाबला तो फिर भी उनके लिए मुश्किल काम होगा।
कांग्रेस को ऐसा ठोस राजनीतिक विरोधी आज तक मिला ही नहीं था।
लेकिन मुझे तो लगता है कि वे ऐसा कोई सुधार करने की क्षमता अब खो चुके हैं।
क्योंकि कंबल से रोएं को अलग नहीं किया जा सकता है। 

बुधवार, 10 जुलाई 2019

कुछ संगठनों के स्थापना वर्ष

मुस्लिम लीग -- 1906

हिन्दू महासभा -- 1914

आर.एस.एस -- 1925

रामराज्य परिषद -- 1948

बजरंग दल - 1984

शिवसेना - 1966

सिमी - 1977

पोपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया - 2006

मंगलवार, 9 जुलाई 2019

ज्योति बसु स्मारक


पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के विधान नगर में पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु के नाम पर स्मारक व रिसर्च सेंटर बनने की राह की बाधा अब दूर होने की उम्मीद बंधी है।

पश्चिम बंगाल की बदली हुई राजनीतिक परिस्थिति में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उस 5 एकड़ जमीन के हस्तानांतरण का आश्वासन दिया है।

वाम मोर्चा सरकार के कार्यकाल के आखिरी महीनों में सवा चार करोड़ रुपए की लागत से वह जमीन खरीदी गई थी। पर ममता सरकार ने उस जमीन के हस्तानांतरण की अनुमति नहीं दी थी। यह मामला आठ साल तक लटका रहा।

चलिए, देर से ही नहीं, अब लगता है कि एक ऐसे नेता का स्मारक अब बन सकेगा जिसे तीन-तीन बार प्रधानमंत्री पद का आॅफर मिला था। वह 23 साल तक मुख्यमंत्री रहे। उससे पहले वे उप मुख्यमंत्री रह चुके थे। 

पहला सुख निरोगी काया

जब-जब मैं सुनता हूं कि फलां बड़े नेता की बात उसकी संतान नहीं सुन रही है तो मुझे निम्नलिखित कविता याद आ जाती है।

पहला सुख निरोगी काया,
दूसरा सुख पास में माया।
तीसरा सुख सुलक्षणा नारी,
चौथा सुख पुत्र आज्ञाकारी।।

हालांकि पुत्र को आज्ञाकारी बनाने की पहली शर्त यह है कि खुद पिता नैतिक धाक वाला हो।

गांव में कभी सुना था,
बढ़े पुत्र पिता के धर्मे,
खेती उपजे अपना कर्मे।

सत्य आज शायद ही कोई सुनना चाहता है!

सात जुलाई, 2019 के प्रभात खबर में प्रो.जाबिर हुसैन का आज की राजनीति पर एक विश्लेषात्मक लेख छपा है। वास्तविकता के इतने करीब लेख आमतौर पर नहीं लिखे जाते।

आमतौर पर कोई गंभीर नेता तो ऐसी बातें न तो लिखता है और न बोलता है। पता नहीं, जाबिर साहब से किसी ने यह कहा कि नहीं कि ऐसा लेख लिखना आपके लिए सही नहीं है। क्योंकि सत्य आज शायद ही कोई सुनना चाहता है!

हां, मुझसे 1972 में प्रणव चटर्जी ने जरूर ऐसी बात कही थी। समाजवादियों की फूट और एकता के प्रयास शीर्षक से सुरेंद्र अकेला के नाम से तब मैंने एक लंबा लेख लिख दिया था। लेख 18 सितंबर 1972 के दैनिक ‘प्रदीप’ में संपादकीय पृष्ठ पर छपा था। उसे पढ़कर चटर्जी साहब ने जरूर कहा कि ‘सुरेंद्र जी निजी सचिव को लेख नहीं लिखना चाहिए।’

याद रहे कि मैं राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर कर्पूरी ठाकुर का तब निजी सचिव था। उधर चटर्जी साहब कर्पूरी जी के खासमखास थे। कर्पूरी जी तो संकोची व शालीन व्यक्ति थे। उन्होंने मुझसे इसलिए कुछ नहीं कहा कि मैं नाराज हो जाऊंगा।

दरअसल मैं वहां कोई नौकरी नहीं कर रहा था। कर्पूरी जी के बुलावे पर उनके साथ काम कर रहा था। मुझे समाजवादी आंदोलन की अधिक चिंता थी। सो मैंने लिख दिया था।

संभवतः जाबिर साहब को भी उस आंदोलन की चिंता है जिसके साथ उन्होंने अपने जीवन के बहुमूल्य साल बिताए हैं। महत्वपूर्ण योगदान भी किया है। पर, लगता है कि आज तो ऐसी नेक सलाह की किसी को कोई जरूरत और भी नहीं है।

रविवार, 7 जुलाई 2019

ये 5 सवाल जवाब मांगते हैं


1-19 करोड़ भारतीयों को एक ही वक्त यानी एक ही जून का भोजन मिल पाता है।

जबकि ताजा आंकड़ों के अनुसार इस देश के सिर्फ एक प्रतिशत अमीर लोगों के पास देश की 58 दशमलव 4 प्रतिशत दौलत सिमट गई है।

दौलत के संकेंद्रण की रफ्तार सन 2000 से 2017 की अवधि में सर्वाधिक तीव्र  रही। इस बीच असमानता छह गुनी रफ्तार से बढ़ी।

जबकि, भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्व चैप्टर में लिखा गया है कि ‘आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले कि धन और उत्पादन के साधनों का सर्व साधारण के लिए अहितकारी संकेंद्रण नहीं हो।’

सवाल है कि ऐसी स्थिति लाने के लिए कौन-कौन प्रभावशाली लोग जिम्मेवार रहे हैं ?

2.-जिस देश के अधिकतर अस्पतालों में मरीजों के लिए रूई-सूई, स्टे्रचर-एम्बुलेंस तक की व्यवस्था नहीं है, उस देश के अनेक नेता अरबों रुपए की निजी संपत्ति के मालिक बन बैठे हैं।उनमें से कई नेता करोड़ों के बंगलों में रहते हैं या फिर हाल तक रहते थे। ऐसे नेताओं को शर्म तक क्यों नहीं आती ?


3.- सन 1963 में ही तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष डी. संजीवैया को  इन्दौर के अपने भाषण में यह कहना पड़ा था कि ‘वे कांग्रेसी जो 1947 में भिखारी थे, वे आज करोड़पति बन बैठे। ( 1963 के एक करोड़ की कीमत आज कितनी होगी ?)

गुस्से में बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी कहा था कि ‘झोपडि़यों का स्थान शाही महलों ने और कैदखानों का स्थान कारखानों ने ले लिया है।’ 

आजादी के सिर्फ दो दशकों के भीतर ही इस देश में ऐसी लूट मचाने की छूट किसने दी ? तभी लुटेरों को सजा क्यों नहीं हुई ?

जबकि, आजादी के तत्काल बाद प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि कालाबाजारियों को करीब के लैम्प पोस्ट से लटका दिया जाना चाहिए।


4.-1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कालाहांडी की दरिद्रता से द्रवित होकर यह रहस्योद्घाटन कर दिया था कि हम दिल्ली से 100 पैसे भेजते हैं, पर सिर्फ पंद्रह पैसे ही जनता तक पहुंच पाते हैं।

1947 से 1985 के बीच के लोकतांत्रिक भारत के शासक कौन- कौन थे ? उनमें से किनके शासन काल में एक रुपया कितना अधिक या कम घिसा था ? आज सरकारी धन के घिसने का प्रतिशत क्या है ?

5.-इस देश में आजादी के बाद से ही भ्रष्ट नेताओं -अफसरों और ईमानदार नेताओं और अफसरों के बीच द्वंद्व चलता रहा है। कभी एक पक्ष जीतता है तो कभी दूसरा पक्ष । आज कौन सा पक्ष जीतता नजर आ रहा है और कौन सा पक्ष हारता दिख रहा है ?

उपर्युक्त और अन्य बातों की पृष्ठभूमि में अपने देश का भविष्य आज कैसा दिखाई पड़ रहा  है ? 

शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

एंटोनी समिति की रपट में मौजूद है कांग्रेस के पुनरुद्धार का मंत्र


लोकतंत्र की मजबूती के लिए कांग्रेस यानी मुख्य प्रतिपक्ष का पुनरुद्धार जरूरी है। पर, उसके पुनरुद्धार के लिए यह आवश्यक है कि कांग्रेस अपनी चुनावी दुर्दशा का असली कारण समझे। उसे स्वीकार करे और तत्संबंधी सुधार का प्रयास भी करे।

नब्बे के दशक में समाजवादी नेता मधुलिमये ने भी कहा था कि देश को चलाने के लिए कांग्रेस में सुधार जरूरी है क्योंकि कांग्रेस ही देशव्यापी पार्टी है।

खैर, अभी तो देश को चलाने का भार जनता राजग व नरेंद्र मोदी को सौंप कर निश्चिंत हो गई है। पर एक जिम्मेवार प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने के लिए भी जरूरी है कि कांग्रेस आत्मचिंतन करे। खुद को मजबूत बनाने का वह वास्तविक प्रयास करे।

सिर्फ इस बात की प्रतीक्षा न करे कि मोदी सरकार की छवि जब धूमिल होगी तो जनता खुद ही कांग्रेस को एक बार फिर सत्ता में पहुंचा देगी। ऐसे में कांग्रेस को धोखा हो सकता है। क्योंकि मोदी सरकार की कार्यशैली कुछ अलग ढंग की हैै। इसलिए कांग्रेस खुद भी कुछ उपाय करे।इसके लिए यह जरूरी है कि वह चेहरे के बदले आईना साफ करने में समय बर्बाद न करे। मर्ज सिर में है तो सिर के बदले पैर के इलाज में समय नष्ट न करे।

राहुल गांधी ने अपने इस्तीफे में जो बातें लिखी हैं, वे सब ‘राजनीतिक’ बातें ही हैं। राजनीतिक हलकों में यही माना जा रहा है। कांग्रेस की विफलता के असली कारण 2014 में ही ए.के. एंटोनी समिति ने बता दिए थे। एंटोनी की वह बात आज भी लागू है। उन कारणों का निदान जरूरी है।

2014 के लोकसभा चुनाव में भारी पराजय के बाद पूर्व रक्षामंत्री एंटोनी से कांग्रेस हाईकमान ने कहा था कि वह हार के कारणों का पता लगाएं। एंटोनी ने अपनी रपट में साफ -साफ कह दिया था कि 2014 के लोकसभा चुनाव में हमारी हार इसलिए हुई क्योंकि लोगों में यह धारणा बनी कि कांग्रेस धार्मिक अल्पसंख्यकों के पक्ष में पूर्वाग्रस्त है। इसलिए बहुमत मतदाताओं का झुकाव भाजपा की ओर हुआ।

एंटोनी के अनुसार भ्रष्टाचार, मुद्रास्फीति और दल में अनुशासनहीनता हार के अन्य कारण थे। पर 2014 के बाद कांग्रेस ने एंटोनी समिति की रपट पर कोई ध्यान ही नहीं दिया। बल्कि उसी गलत दिशा में कांग्रेस आगे बढ़ती चली गई। नतीजा सामने है।



राहुल गांधी को धन्यवाद !

इस देश में पदलोलुप नेताओं की अपार भीड़ है। वैसे में राहुल गांधी धन्यवाद के पात्र हैं। पद पर बने रहने के तमाम आग्रहों के बावजूद उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष जैसा महत्वपूर्ण पद अंततः छोड़ ही दिया। 


कैसे बंद हो गवाहों पर दबाव


आदतन अपराधी खास कर बड़े अपराधी यानी माफिया अक्सर अपने खिलाफ जारी मुकदमों के गवाहों को पटा लेते हैं। या, डरा- धमका कर गवाही बदलवा देते हैं। इस तरह वे सजा से बच जाते हैं। फिर वे अगले अपराध कार्य में लग जाते हैं। अपराध बढ़ने का यह एक बड़ा कारण है।

कई बार तो ऐसा होता है कि एक ही अपराधी अनेक मामलों में बारी -बारी से गवाहों को डरा-धमका कर सजा से बच जाते हैं।

गवाह के पलट जाने के कारण कोई आरोपित यदि लगातार दो से अधिक बार सजा से बच जाता है तो तीसरी बार उसके मामले में एक खास उपाय किया जाना चाहिए। उसके खिलाफ गवाह की गवाही पुलिस के साथ—साथ न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-164 के तहत भी दिलवा दी जानी चाहिए।

वैसी स्थिति में पलटी मारने पर गवाह पर मुकदमा भी हो सकता है। उससे गवाह डरेंगे। सामान्यतः अपनी गवाही नहीं बदलेंगे। यदि आरोपित कोई बड़ा अपराधी हो तो गवाह को सुरक्षा देने का पोख्ता प्रबंध भी शासन करे। सुप्रीम कोर्ट ऐसा आदेश कई बार दे चुका है। साथ ही ऐसे मामलों की सुनवाई जल्द से जल्द पूरी हो। ऐसे उपाय करने से अपराध घटेंगे।

भूली बिसरी याद


कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष दामोदरन संजीवैया ने इंदौर में 1963 में कहा था कि ‘वे कांग्रेसी जो 1947 में भिखारी थे, वे आज करोड़पति बन बैठे।’ गुस्से में बोलते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी कहा था कि ‘झोपडि़यों का स्थान शाही महलों ने और कैदखानों का स्थान कारखानों ने ले लिया है।’

इधर संजीवैया के बारे में पढ़ रहा था।यह जानकर आश्चर्य हुआ कि सिर्फ 51 साल की आयु में ही 1972 में उनका निधन हो गया था। पर उससे पहले वे अपनी प्रतिभा और नेकनीयती  के बल पर बड़े -बड़े पदों पर रहे।

पेशे से वकील संजीवैया अनुसूचित जाति से आते थे। वे 1950 में अस्थायी संसद के सदस्य बनाए गए। 1952 में मद्रास मंत्रिमंडल के सदस्य बने। वहां बाद के मंत्रिमंडलों में भी रहे। आंध्र के मुख्य मंत्री भी बने। दलित समुदाय से आने वाले किसी राज्य के वे पहले मुख्य मंत्री थे। 

संजीवैया कांग्रेस अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्रिमंडल के भी सदस्य रहे। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में वे पार्टी में नई जान फूंकना चाहते थे,पर इस बीच उनका निधन हो गया। 

और अंत में



बिहार विधान मंडल के प्रतिपक्षी दलों के विधायकों ने विरोधस्वरूप आम और आम के पौधे लौटा दिए। राज्य सरकार उन्हें उपहारस्वरूप दे रही थी। आम लौटाकर तो अच्छा किया। पर आम के पौधे ले लिए होते तो यह माना जाता कि हमारे विधायकगण पर्यावरण संरक्षण की चिंता करते हैं। 

(5 जुलाई, 2019 के प्रभात खबर-बिहार -में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान में )