सोमवार, 5 अगस्त 2019

मझधार में नैया डोले,
तो माझी पार लगाये।
माझी जो नाव डुबोये,
उसे कौन बचाये !
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कोई कपूत यदि अपने वंश को डूबो दे तो उससे
सिर्फ कोई एक वंश डूबता है।
पर, यदि कोई कपूत किसी संगठन को डूबो दे
तो उस संगठन से जुड़े सैकड़ों वंश डूब जाते हैं।
  अब सवाल है कि सैकड़ों वंशों की महत्वाकांक्षाओं
को डूबने से कैसे बचाया जाए ?
  शायद संभव नहीं।क्योंकि बातें अब बहुत बिगड़ चुकी हैंं।
  बचाने की क्षमता अब बची ही नहीं है।
 ठीक ही कहा गया है-मांझी जो नाव डूबोये तो कौन बचाए !
नतीजतन यह अकारण नहीं है कि कुछ डूबते जहाजों से चूहे निकल-निकल कर सुरक्षित जगहों में शरण ले रहे हैं।
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कृपया कोई राजनीतिक पार्टी या उसके समर्थक इसे अपने
ऊपर न लें।
यह बात किसी व्यापारिक संगठन पर भी लागू होती है।
हालांकि आज कुछ राजनीतिक संगठनों और व्यवसायी
संगठनों में कम ही अंतर रह गया है। 

कश्मीर में अब नहीं तो कभी नहीं
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पी.वी.नरसिंह राव के प्रधान मंत्रित्व काल में
22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद के दोनों
सदनों ने यह सर्वसम्मत प्रस्ताव पास किया था कि 
पी.ओ.के.सहित पूरा जम्मू -कश्मीर भारत का अविभाज्य
अंग है।
  इस संकल्प को अक्षरशः पूरा करने व कश्मीर समस्या को  किसी भी कीमत पर सदा के लिए समाप्त कर देने की जिम्मेवारी मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार की है। 
  जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा इसलिए नहीं दिया गया था कि उसका लाभ उठा कर वहां के कुछ राष्ट्र विरोधी स्थानीय नेता लोग देसी-विदेशी जेहादियों को वहां नंगा नाच करने दें।
  यदि इस बीमारी को कश्मीर में ही दबा नहीं दिया गया तो एक न एक दिन पूरे देश में फैल जा सकती है।
यह खतरा कम से कम मोदी सरकार तो नहीं ही उठाएगी,ऐसी उम्मीद देश कर रहा है।
5 अगस्त 2019--पूर्वाह्न 10 बज कर आठ मिनट 

   
  
  

शनिवार, 3 अगस्त 2019

चोंग्थू साहब छपरा के आयुक्त या सारण के ?!!
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पटना के एक हिन्दी अखबार में पढ़ा कि राॅबर्ट एल.चांेग्थू
को छपरा का प्रमंडलीय आयुक्त बनाया गया है।
आज के ही एक अंग्रेजी अखबार के अनुसार चोंग्थू 
को सारण का प्रमंडलीय आयुक्त बनाया गया है।
ये छपरा क्या है ? !!
ये सारण क्या है ? !!
दोनों एक दूसरे से कितनी दूरी पर है ?
हमलोग तो जानते-सुनते  रहे हैं कि छपरा, सारण का जिला मुख्यालय है।
यह भी कि सारण एक जिले का नाम है और उस प्रमंडल का भी जिसमें सारण जिला भी है।
यानी हमारे हिन्दी अखबार ने चैंग्थू साहब को नाहक डिमोट कर दिया।हालांकि छपरा नाम का कोई प्रमंडल है नहीं। 
पर, अंग्रेजी अखबार ने उन्हें सही जगह पर रखा।
  नब्बे के दशक में दिल्ली के एक अंग्रेजी अखबार के प्रधान संपादक ने मुझसे कहा था कि मैं दिल्ली के अन्य अंग्रेजी पत्रकारों की अपेक्षा इस देश को अधिक जानता हूं।
क्योंकि मैं हिन्दी अखबार भी पढ़ता हूं।
यह और बात है कि उन्होंने गत लोक सभा चुनाव नतीजे के बाद यह लिखा कि मैं मोदी के पक्ष के अंडर करेंट को पहचान नहीं सका।
पर, दस साल पहले हिन्दी प्रदेश के एक मुख्य मंत्री ने मुझसे कहा था कि खबरों के लिए मैं अंग्रेजी अखबार पढ़ता हूं क्योंकि कम समय में ही सटीक जानकारियां मिल जाया करती हैं।

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

किन पर लगे जाम से मरनेवाले मरीजों-घायलों की हत्या का आरोप ! --सुरेंद्र किशोर


पटना हाईकोर्ट ने इसी बुधवार को एक पूर्व सांसद से कहा कि यदि आप सड़क जाम न करने का शपथ पत्र दें तभी हम आपकी अग्रिम जमानत की अर्जी पर विचार करेंगे।
  जाम के खिलाफ इतना बढि़या अदालती निर्णय इससे पहले कभी नहीं आया था।
इससे इस बात का पता चलता है कि अदालत भी जाम से होने वाले और हो रहे नुकसानों को अच्छी तरह समझती है।
  जाम अब किसी एक प्रदेश की समस्या नहीं रही।व्यापक है।
 आए दिन यह खबर आती रहती है कि भीषण सड़क जाम के कारण अस्पताल के रास्ते में ही गंभीर रूप से घायल और बीमार लोगों की जानें चली जाती हैं।
  यह तो एक तरह से हत्या ही है।
ऐसी हत्या के लिए विशेष सजा के प्रावधान के बारे में हमारे जन प्रतिनिधियों ने कभी नहीं सोचा है।
  राजनीतिक नेता व दल तो कभी- कभी ही राजनीतिक कारणों से जाम लगाते हैं।पर, उस जाम का क्या कहें जो रिश्वत के लिए रोज -रोज नगरों में लगते हैं।
  पटना तथा राज्य के अन्य शहरों में आए दिन लग रहे जाम के असली कारणों का पता सबको हैं,सिर्फ उनको छोड़कर जिनके जिम्मे कानून -व्यवस्था, सड़क व्यवस्था और नगर व्यवस्था सही रखने का काम  है।
  --पद लोलुपों के दल-बदल का मौसम-- 
 देश भर में बड़े पैमाने पर दल बदल हो रहे हैं।‘मौसम विज्ञानी’ नेता गण एक खास दिशा में जा रहे हैं।
जहां गुड़ होगा,चीटियां वहीं तो जाएंगी !
पर, आज की ये चिंटियां नए दल में जाकर कब दीमक का रूप ले लेंगी,कुछ कहा नहीं जा सकता।
  कांग्रेस की हवा खराब है तो भाजपा में चले जाओ।भाजपा की हवा खराब होने लगे तो फिर कांग्रेस में चले जाओ।
 इसी तरह की राजनीति दशकों से चल रही है।
 इसीलिए नए राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं को राजनीति में समुचित जगह कम ही  मिल रही है। 
यह स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी नहीं है।
--अगले साल होगा बिहार के दलों का भविष्य तय--
2020 में बिहार विधान सभा का चुनाव होने वाला है।
इस साल लोक सभा का चुनाव हुआ।इस चुनाव में बिहार के राजनीतिक दलों की ताकत की एक झलक मिली।
 कुछ लोग लोक सभा चुनाव नतीजे को दलों की असली ताकत का प्रतिनिधि नतीजा नहीं मानते।वे कहते है कि लोक सभा चुनाव मोदी लहर के कारण राजग जीत गया।पर विधान सभा चुनाव में वह लहर नहीं चलेगी।
 क्या यह तर्क सही है ?
इस सवाल का जवाब 2020 के बिहार विधान सभा चुनाव नतीजे बता देंगे।उन नतीजों के साथ ही कुछ दलों व नेताओं का भविष्य भी तय हो जाएगा। 
 -- एम.एस.धोनी की सकारात्मक पहल--
 मानद लेफ्टिनेंट कर्नल व मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी एम.एस.धोनी कश्मीर में आतंकवाद विरोधी यूनिट में तैनात होंगे।
 इस पृष्ठभूमि में यह महत्वपूर्ण खबर है कि भारतीय सेना में 7000 अफसरों की इन दिनों कमी है।
  कई कारणों से नई पीढ़ी का सेना के प्रति आकर्षण इधर कम हुआ है।
संभवतः इसीलिए आर.एस.एस.ने सैनिक प्रशिक्षण सरस्वती मंदिर स्थापित करने का निर्णय किया है।
  धोनी के सेना में काम करने से भी संभवतः आज के युवाओं का सेना के प्रति आकर्षण शायद थोड़ा बढ़े।
 ब्रिटिश राज परिवार के सदस्यों में भी सेना में काम करने की परंपरा रही है। 
  2007 में यह खबर आई थी कि प्रिंस
हैरी सेना में दस साल तक काम कर चुके हैं और इराक वार में ब्रिटिश फौज की ओर से शामिल होने की जिद कर रहे हैं।
 उनके चचा प्रिंस एंड्रयूज 1982 के फाॅकलैंड वार में शामिल हो चुके थे।द्वीप पर कब्जा करने के लिए  अर्जेन्टिना और ब्रिटेन के बीच हुआ था।
हैरी के दादा किंग जार्ज -6 प्रथम विश्व युद्ध में शामिल हुए थे।
  धोनी अंधेरे में उम्मीद की किरण बन कर उभरे हैं।
चीन और इजराइल सहित 7 देशों में एक खास आयु वर्ग के युवजनों के लिए सेना में कुछ समय के लिए काम करना आवश्यक है।
 गत साल भारतीय संसद की एक समिति ने सिफारिश की है कि केंद्र व राज्य सरकारों की नौकरियों के लिए पहले कुछ समय के लिए सेना में काम करना जरूरी होना चाहिए।
--बंगलादेशी घुसपैठियों की संख्या घटी--
बंगला देशी घुसपैठियों की संख्या अब घट  रही है।
गत माह केंद्र सरकार ने संसद को यह बात बताई।
जानकार लोग बताते हैं कि दरअसल असम में नेशनल रजिस्टर आॅफ सिटिजन्स तैयार होने के कारण ऐसा
हो रहा है।
 वोट के लिए कई  राजनीतिक नेता गण घुसपैठ में मदद करते थे।उनके लिए राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र बनवाते थे।वे अब यह समझ रहे हैं कि रजिस्टर तैयार होने के बाद मतदाता पहचान पत्र नहीं बनवा पाएंगे।
 फिर घुसपैठ कराने से क्या फायदा ?
 यदि देश के अन्य राज्यों में भी नेशनल रजिस्टर आॅफ सिटिजन्स तैयार होने लगे तो देश में घुसपैठ की समस्या लगभग शून्य हो जाएगी।  
यह अच्छी बात है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गत माह राज्य सभा में कहा है कि अवैध घुसपैठियों की पहचान का काम सिर्फ असम तक ही सीमित नहीं रहेगा।
--और अंत में-
कैसा रहेगा यदि सरकार वैसे सरकारी सेवकों के लिए 
मन पसंद पदस्थापन की सुविधा का प्रावधान कर दे  
जिनके सिर्फ दो ही बच्चे हैं ?
क्या इससे परिवार नियोजन का काम थोड़ा आगे नहीं बढ़ जाएगा ?
--कानोंकान-प्रभात खबर-बिहार-2 अगस्त 2019--

‘कांग्रेस गुनहगार पति के मुस्लिम होने पर 3 साल की कैद की सजा का विरोध करती है।
पर दोषी पति के हिन्दू होने पर 7 साल की सजा का इंतजाम करती है।
ऐसे एकतरफा सेक्युलरिज्म के चलते ही कांग्रेस रसातल में पहुंच गई।’
       ---- सुशील कुमार मोदी,
             उप मुख्य मंत्री, बिहार

पटना में एक और विधायक काॅलोनी का प्रस्ताव
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प्रस्ताव है कि पटना के आशियाना-दीघा रोड पर 
विधायक काॅलोनी बसाई जाए।
जिस जमीन पर बसाई जाएगी,वह बिहार राज्य आवास बोर्ड की है।
पटना में कहीं न कहीं एक और विधायक काॅलोनी तो बसाई ही जानी चाहिए।
  पर, दीघा स्थित आवास बोर्ड की उस जमीन पर बसाने से पहले भावी आवेदक विधायकों को अपनी आत्मा से एक सवाल जरुर पूछना चाहिए,
‘क्या उस जमीन के असली हकदारों को धकिया कर
 हम बसेंगे ?’
  आवास बोर्ड की उस जमीन के असली हकदार वे हैं जिनके लिए 1972 में वह जमीन बिहार सरकार ने अधिगृहीत की थी।
राज्य सरकार की योजना थी कि सीमित आय वाले लोगों को पटना में सस्ती जमीन दी जाए।
अस्सी के दशक में उन लोगों से दो -दो हजार रुपए आवास बोर्ड ने अग्र धन के रूप में वसूले।
बाद में उनमें से कुछ आवेदकों के नाम कागज पर वहां के कुछ भूखंड आवंटित भी कर दिए गए। उनसे और भी भारी रकम वसूल ली गई।
   पर कुछ ही साल पहले आवास बोर्ड ने कह दिया कि हम आपको जमीन नहीं दे सकते।
आप अपने पैसे वापस ले लीजिए।
कुछ लोगों ने वापस ले भी लिए।
पर कुछ अन्य लोगों ने वापस नहीं लिए।
  इसलिए नहीं लिए ताकि वे अपनी अगली पीढ़ी के लिए यह सबूत छोड़ जाएं कि राज्य सरकार की वादाखिलाफी के कारण ही उनका परिवार पटना में नहीं बस सका।गांव लौटना पड़ा।
 अब उसी जमीन पर कुछ सर्व शक्तिमान विधायकों की नजरें हैं।
हालांकि दैनिक जागरण में छपी खबर के अनुसार अभी सब कुछ प्रारंभिक स्थिति में है।राज्य सरकार ने तय नहीं किया है।
पर,बात जब विधायकों की है तो देर- सवेर कुछ न कुछ होगा ही।
क्या विधायकगण दूसरों का हक मार कर वहां अपने बंगले बनवाएंगे ?
उन बंगलों में कम से कम उन्हें तो अच्छी नींद नहीं आएगी जिनका जमीर अब भी जिंदा होगा।   

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डा.अनिल सुलभ ने
घोषणा की है कि सम्मेलन के पुस्तकालय को शीघ्र ही आधुनिक रूप दिया जाएगा।
   पढ़े-लिखे लोगों के लिए इससे बेहतर खबर नहीं हो सकती।
यदि उसे एक आधुनिक पुस्तकालय सह संदर्भालय का रूप दिया जा सके तो वह उन महा पुरुषों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी जिन्होंने अपने अथक परिश्रम व लगन से पटना के प्रतिष्ठित कदम कुआं इलाके में एक बड़े भूखंड पर सम्मेलन भवन का निर्माण किया था।