शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

चुनावी संकट बन गया कांग्रेस के समक्ष अब अस्तित्व का संकट--सुरेंद्र किशोर



पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने 2017 में ही कह दिया था कि कांग्रेस के समक्ष पहले यदाकदा चुनावी संकट आता रहता था।
पर, अब अस्तित्व का संकट उपस्थित हो चुका है।
कश्मीर पर मोदी सरकार की ताजा कार्रवाई को लेकर कांग्रेस में उभरी गंभीर मतभिन्नता ने जयराम की 
आशंका  सच साबित कर दी है।
 जयराम ने कहा था कि पार्टी ने 1977 में चुनावी संकट का सामना किया।पार्टी ने 1996 से 2004 तक चुनावी संकट का सामना किया।
पर, आज जो कुछ हो रहा है,वह चुनावी संकट नहीं है।वह अस्तित्व का संकट है।
यदि हम अपने दृष्टिकोण में लचीले नहीं हुए तो हम अप्रासंगिक हो जाएंगे।
  जयराम की इस टिप्पणी के अलावा कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर क्या अगस्त के इस महीने में इस बात पर कोई चिंतन चल रहा है कि ‘करो या मरा’े का नारा देने वाली कांग्रेस की आज यह हालत कैसे हुई ? उसके लिए कौन कौन लोग जिम्मेवार रहे ?  
   --कांग्रेस को मजबूत करने के उपाय--
स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक मजबूत प्रतिपक्ष की जरूरत होती है।
पर, आज देश की मुख्य प्रतिपक्षी पार्टी यानी  कांग्रेस की स्थिति डांवाडोल लग रही है।
 पूर्वाग्रहमुक्त लोगों के लिए भी यह चिंता की
 बात है।
पर, कुछ अन्य लोग भी चिंतित हैं जो  कांग्रेसी सत्ता से परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से लाभ उठाते रहे हैं।
जब कांग्रेस सत्ता में थी तो वे लोग ‘कांग्रेस के भक्त’ की तरह ही थे।
इस देश के वैसे अनेक राजनीतिक कार्यकत्र्ता,बुद्धिजीवी व 
लेखक परेशान हैं।उनकी परेशानी इस बात की
है कि कांग्रेस का जल्द से जल्द सशक्तीकरण क्यों नहीं हो पा रहा है।
पर वे उन  मूल कारणों  की चर्चा ही नहीं कर रहे हैं कि कांग्रेस की ऐसी चुनावी दुर्गति हुई ही क्यों ?
 चर्चा कर भी रहे हैं तो बनावटी कारणों की ताकि कांग्रेस के सुप्रीमो को बुरा न लगे।
  हालांकि  बुरा लगने की परवाह किए  बिना पूर्व केंद्रीय मंत्री ए.के.एंटोनी ने असली कारणों की चर्चा कई साल पहले ही कर दी थी।पर हाईकमान ने उस पर कोई ध्यान ही हीं दिया।
2014 के लोक सभा चुनाव में शर्मनाक हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उसके कारणों की जांच का भार ए.के.एंटोनी को दिया था।
  दरअसल जब तक आप बीमारी का असली कारण नहीं जानिएगा तो उसका इलाज कैसे करिएगा ?
कांग्रेस के शुभ चिंतकों को चाहिए कि वे एंटोनी रपट को खुले दिमाग से पढ़ें।
फिर कोई टिप्पणी करें।
 वैसे सबसे बड़ा प्रतिपक्षी दल मजबूत व समझदार बने,यह तो हर लोकतंत्र प्रेमी चाहेगा ही।
पर, कांग्रेस पहले वैसा बनने की क्षमता खुद में विकसित करे।
अब कांग्रेस ऐसे किसी व्यक्ति  को लोक सभा में अपने संसदीय दल का नेता बना देगी जिसे इतना भी नहीं मालूम कि कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र में अब भी है या नहीं तो फिर उस पार्टी का तो भगवान ही मालिक है।
 --अविभाजित बिहार में ‘अगस्त क्रांति’-- 
शहीदों की संख्या-562
जिन्हें फांसी की सजा हुई -26
जो फांसी पर लटक गए--7
फांसी से छूट गए-19
नजरबंद--214
जेल जाने वालों की संख्या--23 हजार 861
सजायाफ्ता  -   4359  
जितने थानों पर स्वतंत्रता प्रेमियों ने अधिकार किया-80
जितने स्थानों पर गोलियां चलीं और लोग मरे-84
सामूहिक जुर्माना- 42 लाख रुपए
यह तो सिर्फ अविभाजित बिहार का आंकड़ा है।इसी तरह पूरे देश में आजादी के मतवालों ने कुर्बानियां दीं।
उनकी कुर्बानियों के कारण ही हम आजाद हुए।
अगस्त के इस ऐतिहासिक महीने में ‘जागृति’ फिल्म के कवि प्रदीप के मशहूर गीत का मुखरा याद आता है--
‘हम लाए हैं तूफान से किश्ती निकाल के,इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भाल के !’ 
   -- और अंत में--
 23 मार्च, 2018 की बात है।
अतिक्रमण की समस्या पर पटना हाई कोर्ट के न्यायाधीश अजय कुमार त्रिपाठी और न्यायाधीश नीलू अग्रवाल का बेंच  अरविंद कुमार की अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
अतिक्रमण पीडि़त जक्कन पुर थाने के प्रभारी भी अदालत में मौजूद थे।
अदालत ने कड़ी फटकार लगाते हुए थाना प्रभारी से पूछा कि ‘इस अतिक्रमण से आपको महीने में कितने की कमाई हो जाती है ?’
   उस मौके पर पटना के ट्रैफिक एस.पी.ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि सभी थाना प्रभारियों को कहा गया है कि अगर आपके इलाके में अतिक्रमण नहीं हटाया गया और अतिक्रमण के कारण यातायात प्रभावित होती है तो उसके लिए आप दोषी माने जाएंगे।
अब सवाल है कि कोर्ट द्वारा  महीनों पहले की गई ऐसी फटकार और कार्रवाई करने के एस.पी.के आश्वासन के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हो रहा है तो अब कोई किसे जिम्मेवार  माने ?
सरकार को ?
खुद को ?
अपनी तकदीर को ?
या फिर ईश्वर को ? 
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--9 अगस्त 2019 के प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से@
   


    अगस्त क्रांति में बिहार प्रांत को एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बताते हुए ब्रिटेन के एक प्रमुख नेता एमरी ने 11 सितंबर 1942 को हाउस आॅफ कामन में कहा था कि 
‘बिहार में उपद्रव विशेष रूप से उग्र है ।’
  इतिहासकार डा.के.के.दत्त के अनुसार ,‘बिहार ने राष्ट्रीय आंदोलन के क्रमबद्ध रुपों में 
अद्भुत और प्रेरक भूमिका निभाई है।
सचमुच विभिन्न कालों में स्वतंत्रता के लिए देश की पुकार पर बिहार का उत्तर मुखर और सफल था।’
  पटना स्थित बिहार विधान मंडल भवन के ठीक सामने ऊंची प्रस्तर पीठिका पर  एक साथ सात शहीदों की मूत्र्तियां लगी हुई हैं।
अगस्त क्रांति के समय ये सचिवालय पर राष्ट्रीय झंडा फहराने के क्रम में शहीद हुए थे। ग्यारह अगस्त 1942 को सचिवालय पर राष्ट्रीय झंडा फहराने के लिए एक बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई थी।
भीड़़ को आगे बढ़ने से रोकने के लिए पुलिस ने 14 राउंड गोलियां चलाईं।
सात छात्र घटनास्थल पर ही शहीद हो गये।  इससे पहले 1917 में चम्पारण में सत्याग्रह की शुरूआत करके गांधी ने बिहार को गर्मा ही दिया था।
   1857 के बाबू वीर कुंवर सिंह के शौर्य को कौन नहीं जानता !

गुरुवार, 8 अगस्त 2019

कल मेरी पत्नी सावन की पूजा के लिए पुश्तैनी गांव
गई थीं।
पता चला कि सारण जिला स्थित खान पुर-भरहा पुर बाजार बंद है।पूजा का सामान बगल के गांव की दुकान से मंगाना पड़ा।
मेरा गांव भरहा पुर है।
पता चला कि स्थानीय व्यवसायी जमालुद्दीन की सड़क दुर्घटना में मौत के शोक व रोष के कारण बाजार बंद रहा।
उस बाजार में संभवतः एक ही मुस्लिम परिवार है जो वहां व्यापार करता है।
पर बहुसंख्यक हिन्दुओं की जमालुद्दीन के प्रति एकजुटता तो देखिए।
  पूजा में बिक्री का भी ध्यान नहीं रखा और दुकानदारों ने बाजार बंद रखा।
जमालुद्दीन हमारे पारिवार के भी मित्र रहे।
  संभवतः इस देश के लाखों गांवों में अत्यंत अल्प संख्या में बसे मुसलमानों के प्रति ऐसा ही परंपरागत लगाव रहा है।
वह लगाव मैंने भी अपने बचपन में गांव में देखा है।
पर, इसी देश की घनी मुस्लिम आबादी से निकले कुछ अल्पसंख्यक नेता गण अपने तेजाबी बयान जारी करते समय अक्सर इस परंपरागत अपनापन को भूल जाते हैं। 
   

  पीपल देवता , वायु प्रदूषण और अल्ट्रा सेक्युलर छवि
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जब हाल में वायु प्रदूषण कंट्रोल से बाहर होने लगा तो
किसी राज्य के मुख्य मंत्री ने अपनी सरकार के वन विभाग के अफसरों से कहा कि आप लोग राज्य में बड़े पैमाने पर पीपल के पेड़ लगवाइए।
  अफसरों ने कहा कि सरकारी स्तर पर पीपल लगाने पर पहले की सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा है।
 याद रहे कि पीपल वृक्ष चैबीसों घंटे आक्सीजन देते
हैं।पीपल पर जल चढ़ाने और पूजा करने की भारतीय संस्कृति के पीछे यही कारण है।क्योंकि यह जीवन दायी है।
 मेरे बचपन में मेरे गांव में पीपल का पौधा कहीं यूं ही उग आया तो उसे जल्दी कोई काटता नहीं था भले उससे दीवाल को क्षति पहुंच रही हो।
न ही कोई सांप मारता था।
कहते थे कि उससे पाप लगता है।
  एक जानकार ने हाल में लिखा  है कि यदि 500 मीटर की दूरी पर पीपल के पेड़ लग जाएं तो वायु प्रदूषण की समस्या समाप्त हो जाएगी।
  अब आप अंदाज लगाइए कि सरकार द्वारा पीपल लगाने पर कभी प्रतिबंध क्यों लगा होगा ?
कुछ अनुमान लगाइए।
ठोस जानकारी भी हो तो बताइए।
इस बीच मैं अनुमान लगाता हूं।
 संभवतः किसी अल्ट्रा सेक्युलर सरकार ने सोचा होगा कि यदि सड़कों के किनारे पीपल के पेड़ लगेंगे तो उसके पास पूजा होने लगेगी।
कहीं- कहीं पीपल देवता के नाम पर छोटी -छोटी वेदियां बैठा दी जाएंगी।
उसके बाद ‘ आइडिया और इंडिया व विश्व दृष्टि रखने वाले अति अल्ट्रा सेक्युलर राजनीतिक’ लोग आरोप लगाएंगे कि सरकार सार्वजनिक धन से मंदिर बनवा रही है।
फिर हमारा वोट बैंक गड़बड़ा जाएगा।
भले वायु प्रदूषण से लोगों की मौत पर मौत होने लगे,पर एक भी वोट नहीं गड़बड़ाना चाहिए।
क्या यह कारण हो सकता है ?
क्या रहा होगा ऐसा कोई कारण ?
यदि पीपल पर प्रतिबंध का किसी जानकार को कोई दूसरा कारण मालूम हो तो जरूर बताएं ताकि ,मेरी यदि है तो, अपनी गलतफहमी दूर कर लूं।  

बुधवार, 7 अगस्त 2019

1977 में हरियाणा में मंत्री पद संभालने से पहले जेपी 
का आशीर्वाद लेने पटना आईं थीं सुषमा स्वराज
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सुषमा स्वराज और उनके पति स्वराज कौशल आपातकाल में जार्ज फर्नांडिस के वकील थे।
तब जार्ज और उनके साथी बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले मंे जेल में बंद थे।
  आपातकाल में किसी सरकार विरोधी राजनीतिक नेता-कार्यकत्र्ता का वकील होना भी बहुत साहस की बात थी।
स्वराज दंपत्ति में वह साहस था।
   जार्ज फर्नांडिस का प्रचार करने सुषमा मुजफ्फर पुर आईं थीं।
उनका भाषण बेजोड़ होता था।इतनी कम उम्र में उतना प्रभावशाली भाषण मैंने पहली बार सुना था।
1977 के विधान सभा चुनाव के बाद सुषमा हरियाणा में 
विधायक बनीं।
उन्हें मंत्री पद की शपथ भी दिलाई गई।उनकी तेजस्विता-योग्यता देखते हुए उन्हें आठ  विभाग मिले थे।
तब तक मैं दैनिक ‘आज’ का संवाददाता बन गया था।
स्वराज कौशल ने मुझे दिल्ली से फोन किया कि आप जेपी से हमारी मुलाकात तय करा दीजिए।
मंत्री पद का कार्य भार संभालने से पहले सुषमा जेपी का आशीर्वाद लेना चाहती हैं।
 स्वराज दंपत्ति नियत समय पर ट्रेन से पटना पहुंचे।
हम तीन उन्हें रिसिव करने के लिए स्टेशन पर थे।
छायाकार कृष्ण मुरारी किशन, मेरे मित्र व सर्चलाइट के संवाददाता लव कुमार मिश्र और मैं।
  सुषमा ने मुझे देखते ही कहा कि बड़ौदा डायनामाइट केस के एफ.आई.आर.में कई जगह आपका नाम आया है।
याद रहे कि आपातकाल में उस केस में मुझे भी सी.बी.आई.बेचैनी से खोज रही थी।पर मैं फरार हो गया था।
खैर हमलोग जेपी के आवास कदम कुआं पहुंचे।
 वहां प्रारंभिक दिक्कत के बाद दंपत्ति की जेपी से मुलाकात हो गई।
  दरअसल जेपी के निजी सचिव सच्चिदानंद इस जिद पर अड़े थे कि जेपी से अशीर्वाद लेने सिर्फ सुषमा ऊपर-यानी पहली मंजिल पर-जाएंगी।
मैंने उनसे देर तक इस बात के लिए बहस की कि उनके पति 
हरियाणा से उनके साथ आए हंै। वे भी समाजवादी आंदोलन के साथी रहे हैं।
ऐसा कैसे होगा कि वे नहीं मिलेंगे ?
 भले हम लोग नहीं मिलें।
खैर किसी तरह स्वराज दंपत्ति जेपी से मिलकर हरियाणा लौट गए।
 दरअसल उनकी बीमारी को ध्यान में रखते हुए जेपी से मुलाकात में कड़ाई बरतना जरूरी था।पर, क्या स्वराज कौशल 
को भी रोकने की कोशिश उचित थी ?
  सुषमा के असामयिक निधन के बाद एक बार फिर एक बात मेरे जेहन में आई।
जो लोग समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं,उन्हें अपने स्वास्थ्य और सुरक्षा पर कुछ अधिक ही ध्यान देना चाहिए।
याद रहे कि अपनी सुरक्षा को नजरअंदाज करने के कारण ही तीन गांधी इस देश में बारी -बारी से हिंसा के शिकार हुए।
 जब मुझसे कम उम्र के लोग गुजर जाते हैं तो मुझे उन पर कुछ अधिक ही गुस्सा आता है।
 मंडल आरक्षण विवाद के समय उनकी भूमिका को छोड़ दें तो  लालू प्रसाद की राजनीतिक और प्रशासनिक शैली मुझे कभी नहीं भाई।
 पर, कुसंयम से उन्होंने जो अपना स्वास्थ्य खराब कर लिया है,उसके कारण उन पर मुझे जरूर गुस्सा आता है।
वे भी मुझसे उम्र में छोटे ही हैं।

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

नागरिकों के लिए समान सिविल संहिता 
और धारा-370 पर डा.लोहिया के विचार
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प्रमुख कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी ने कहा है कि डा.राम मनोहर लोहिया धारा-370 के खिलाफ थे।
ए.एन.आई.से बातचीत में कांग्रेस के पूर्व महा सचिव द्विवेदी ने कहा कि मेरे राजनीतिक गुरू डा.लोहिया हमेशा 370 के खिलाफ रहे।
  उन्होंने यह भी कहा कि मैं व्यक्तिगत हैसियत से यह बात कह रहा हूं,कांग्रेस पार्टी का सदस्य होने के नाते नहीं।
 याद रहे कि द्विवेदी पहले डा.लोहिया के नेतृत्व वाली पार्टी में ही थे।
संभवतः वे 1974 में कांग्रेस में शामिल हुए थे।सन 1967 में डा.लोहिया का निधन हो गया था।
   खुद मुझे सामान्य नागरिक संहिता के बारे में तो डा.लोहिया की राय मालूम है,पर धारा-370 को लेकर उनकी क्या राय थी,यह मुझे याद नहीं ।
पर द्विवेदी ने याद दिला दी।
  चूंकि डा.लोहिया वोट बैंक को ध्यान में रख कर कोई बात नहीं करते थे,इसलिए अधिक उम्मीद इसी बात की है कि उन्होंने 370 की मुखालिफत की हो।
   1967 के आम चुनाव से ठीक पहले किसी संवाददाता  ने डा.लोहिया से सवाल पूछ दिया था,
‘सामान्य नागरिक संहिता के बारे में आपकी क्या राय है ?’
उन्होंने कहा कि मैं उसके पक्ष में हूं।वह तो हमारे संविधान के नीति निदेशक तत्व में शामिल है।
  डा.लोहिया का यह बयान दूसरे दिन अखबारों में प्रमुखता से छपा।
उसके बाद लोहिया के साथियों ने उनसे कहा ,‘डाक्टर साहब,आपने यह क्या कह दिया ?
अब तो आप चुनाव हार जाएंगे।’
इस डा.लोहिया ने जवाब दिया कि मैं सिर्फ चुनाव जीतने के लिए नहीं,बल्कि  देश बनाने के लिए राजनीति में हूं।
  1967 में वे उत्तर प्रदेश के एक ऐसे लोक सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे जहां मुसलमानों की अच्छी -खासी आबदी थी।
कांग्रेस विरोधी हवा के बावजूद डा.लोहिया वहां से सिर्फ करीब चार सौ मतों से ही जीत पाए।
फिर भी उन्होंने अपनी राय नहीं बदली।
   

    मोदी सरकार का जन समर्थन बढ़ा
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कश्मीर के सवाल पर आज देश की जन भावना
पूरी तरह केंद्र सरकार के साथ है,ऐसा साफ -साफ लग रहा है।
 जिन राजनीतिक दलों के नेतागण संसद में इस सवाल पर मोदी सरकार का विरोध कर रहे हैं ,अपवादों को छोड़कर, उनके अनेक परंपरागत वोटर भी उनके खिलाफ बोल रहे हैं।
  बिहार के गांवों से लेकर शहरों तक जहां भी फोन से बात कीजिए ,यही भावना पूर्ण आवाज सुनने को मिल रही है।
  लोगों को लगता है कि एक चीज जो पूरी तरह हमारे पास नहीं थी,उसे हासिल करने के लिए केंद्र सरकार खतरा उठा कर काम कर रही है।
  गृह मंत्री अमित शाह ने तो आज यह भी कह दिया कि
जम्मू कश्मीर के लिए तो हम जान दे देंगे। 
  ऐसी ही जन भावना 1977 में बिहार में जय प्रकाश नारायण के प्रति थी। 
1990 के मंडल आरक्षण आंदोलन के समय भले गोलबंदी  पिछड़ों-अल्पसंख्यकों की ही थी,पर वह व्यापक व सघन थी।
तब जन भावना बिहार में लालू प्रसाद के समर्थन में देखी गई थी।तब भी जो कुछ लोग उस जन उभार को नहीं देखना चाहते थे ,उन्हें नजर नहीं आ रही थी।
  हां, गत लोस चुनाव में जिस तरह कई लोग अंत -अंत तक शुतुरमुर्ग बने रहे ,उसी तरह इस बार भी बने रह सकते हैं,उनकी मर्जी !