रविवार, 13 अक्टूबर 2019

नई दिल्ली से प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका ‘यथावत’..1.15 अक्तूबर 2019... के अनुसार,
गत लोक सभा चुनाव में बाद 21 जून तक पश्चिम बंगाल में
हुई राजनीतिक हत्याओं में भाजपा के 15 लोग मारे गए।
तृणमूल कांग्रेस के एक व्यक्ति की जान गई।
घायलों में 136 भाजपा कार्यकत्र्ता,16 तृणमूल कार्यकत्र्ता और 5 आम नागरिक थे।एक पुलिसकर्मी भी घायल हुआ।
  यथावत के अनुसार 34 साल में कम्युनिस्ट पार्टी ने जितनी हत्याएं कराईं,तृणमूल कांग्रेस उससे आगे निकल गई है।

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019

हिन्दी गरीब या अमीर !
कुछ मामलों में हिन्दी अमीर तो 
कुछ अन्य मामलों में अंग्रेजी
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बहनोइर्,
साला,
जेठ,
देवर,
नंदोई
और साढ़ू 
के लिए अंग्रेजी में सिर्फ एक शब्द है।
वह है--ब्रदर-इन-ला।
यह है अंग्रेजी की गरीबी 
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सिस्टर-इन-ला के लिए 
हिन्दी में निम्न लिखित शब्द हैं--
भाभी,
अनुज बधू,
साली,
सलहज,
जेठानी,
देवरानी
और ननद।
यह है हिन्दी की संपन्नता
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शीर्ष राजनीति से मुंह मोड़ लेने के बाद क्या राहुल गांधी
अब शादी करके घर बसाएंगे ?
 शादी के बारे में खुद राहुल ने तो कुछ नहीं कहा है।
किन्तु सलमान खुर्शीद ने गत 9 अक्तूबर को यह कह कर लोगों की उत्सुकता बढ़ा दी है कि 
‘हमारे नेता ने ही हमें छोड़ दिया।’
यानी शायद राजनीति नहीं तो शादी सही !!!
अपनी गर्ल फ्रेंड की मौजूदगी के बारे में खुद राहुल ने 2005 में 
कहा था कि ‘वह स्पेनिश है और बेनेजुआला में रहती है।उसका नाम है-वेरोनिका।पर अभी शादी की जल्दबाजी नहीं है।मैंने उसे अभी प्रपोज भी नहीं किया है।
   

जब तक तथाकथित सेक्युलरिस्ट और प्रगतिशील लोग 
मुर्शीदाबाद जैसी घटना पर चुप रहेंगे और तबरेज पर 
हंगामा करते रहेंगे ,तब तक भाजपा आगे बढ़ती रहेगी।
अरे भई ! निंदा करनी है तो दोनों तरह की घटनाओं की निंदा करो।
अन्यथा चुप रहो।
अनजाने में भाजपा के एजेंट तो मत बनो।

भाजपा सहित कुछ दलों के नेताओं ने पटना को डूबोने के लिए संबंधित अफसरों पर भड़ास निकाली है।
सही किया है।
अधिकतर अफसर भी दोषी हैं।
कुछ अधिक ही दोषी हैं।
किन्तु क्या राजनीतिक कार्यपालिका ने अपनी जिम्मेवारी 
निभाई है ?
क्या यह खबर गलत है कि गत 12 साल से  पटना नगर निगम की बैठकों में  कोई सांसद या विधायक शामिल नहीं हुए ?
यदि मंत्री की बात भी अफसर नहीं मानते तो यह बात पहले सार्वजनिक क्यों नहीं हुई ?
केंद्रीय सरकार के स्तर पर भी यह शिकायत आती रहती है कि अफसर राजनीतिक कार्यपालिका के हुकुम की अक्सर अवहेलना करते हैं।
इसीलिए संयुक्त सचिव स्तर पर 200 लेटरल बहाली हुई है।
400 और होने वाली है।
ऐसी स्थिति में बड़े अफसरों को काबू में लाने के लिए संविधान में संशोधन करने पर राजनीतिक कार्र्यपालिका विचार क्यों नहीं करती ?
अपवादों को छोड़कर जन प्रतिनिधि-अफसर मिल बांटकर जब तक सांसद-विधायक फंड की बंदरबांट करते रहेंगे तब तक जन प्रतिनिधियों की अफसरों पर नैतिक धाक कैसे कायम होगी ?

  

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

     राष्ट्रद्रोह पर 1962 का सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
     इसी कसौटी पर अदालतें देखेंगी नए मामले
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26 मइर्, 1953 को बेगूसराय में एक रैली हो रही थी।
फाॅरवर्ड कम्युनिस्ट पार्टी के नेता केदार नाथ सिंह रैली को संबांधित कर रहे थे।
रैली में सरकार के खिलाफ अत्यंत कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने कहा कि 
‘सी.आई.डी.के कुत्ते बरौनी में चक्कर काट रहे हैं।
कई सरकारी कुत्ते यहां इस सभा में भी हैं।जनता ने अंगे्रजों को यहां से भगा दिया।
कांग्रेसी कुत्तों को गद्दी पर बैठा दिया।
इन कांग्रेसी गुंडों को भी हम उखाड़ फकेंगे।’
   ऐसे उत्तेजक व अशालीन भाषण के लिए बिहार सरकार ने केदारनाथ सिंह के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दायर किया।
केदारनाथ सिंह ने हाईकोर्ट की शरण ली।
हाईकोर्ट ने उस मुकदमे की सुनवाई पर रोक लगा दी।
बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई।
सुप्रीम कोर्ट ने आई.पी.सी.की राजद्रोह से संबंधित धारा  
को परिभाषित कर दिया।
  20 जनवरी, 1962 को मुख्य न्यायाधीश बी.पी.सिन्हा की अध्यक्षता वाले संविधान पीठ ने कहा कि ‘देशद्रोही भाषणों और अभिव्यक्ति को सिर्फ तभी दंडित किया जा सकता है,जब उसकी वजह से किसी तरह की हिंसा, असंतोष या फिर सामाजिक असंतुष्टिकरण बढ़े।’
 चूंकि केदारनाथ सिंह के भाषण से ऐसा कुछ नहीं हुआ था,इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने केदारनाथ सिंह को राहत दे दी।
   हाल में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम केदारनाथ सिंह बनाम बिहार सरकार वाले जजमेंट पर कायम है।
देशद्रोह के हाल के कुछ मामलों को अदालतें 1962 के उस निर्णय की कसौटी पर ही कसेंगी।

व्यवस्था सुधारने के लिए नालियों की सफाई के खर्चे का आॅडिट जरुरी-सुरेंद्र किशोर


क्या पिछले कुछ वर्षों में पटना की नालियों की सही ढंग से सफाई हुई थी ?
  इस मद में कितने खर्च हुए और उसका कितना सदुपयोग हुआ ?
पटना के लोगों की यह आम धारणा है कि नाले-नालियों  की समुचित सफाई नहीं होती ।
वैसे तो थोड़े ही समय में उम्मीद से अत्यंत अधिक वर्षा भारी जल जमाव का मूल कारण रहा।पर नालों की पूरी सफाई हुई होती तो लोगों को थोड़ा कम कष्ट होता।
पटना की साफ-सफाई को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कुछ साल पहले पिछले  मेयर के समक्ष सार्वजनिक रुप से अपना गुस्सा जाहिर किया था।
पर कुव्यवस्था ऐसी है जो सुधरने का नाम ही नहीं लेती।
आए दिन नगर निगम के विवादास्पद कामों को लेकर खबरें आती रहती हैं।
 नगरवासियों के इस बार के अपार कष्ट को देखते हुए राज्य सरकार को चाहिए कि वह भ्रष्टाचार और काहिली के लिए जिम्मेवार अफसरों और कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे ताकि लोगों के ‘घाव’ पर थोड़ा मलहम लग सके।
  आश्चर्य है कि भारी खर्च के बावजूद मुहल्लों से संप हाउसों तक पानी नहीं पहुंचते।कहीं पहंुचते भी हैं तो अधिकतर संप हाउस काम नहीं करते।
  --1975 की बाढ़ का एक दृश्य-
पश्चिमी पटना की एक संपन्न बस्ती में सहायता पहुंचाने वालों की नाव एक मकान से आकर टिकी।छत पर एक स्त्री खड़ी थी।
बगल में दो छोटे- छोटे बच्चे।
भूख और प्यास से कुम्हालाये हुए चेहारों पर आतंक और बेबसी के भाव !
48 घंटे के बाद उस तरफ मदद देने वाले लोग पहुंचे थे।
छत और नाव के बीच की दूरी कुछ अधिक थी और हाथ से किसी चीज को पकड़ पाना संभव नहीं था।
   कार्यकत्र्ताओं ने कहा कि कोई रस्सी लटका कर उसके सहारे पानी ऊपर खींच लें।
  रस्सी घर में नहीं थी।
स्त्री की आंखों से निरंतर आंसू गिर रहे थे।
कुछ न मिलने पर उसने अपनी साड़ी नीचे लटका दी।
कार्यकत्र्ता ने कोने में बंधी गांठ खोली तो उसमें एक परची मिली।
अंग्रेजी में लिखा था कि ‘मेरे पति दौरे पर हैं।’
राहत पाकर उसे कुछ तसल्ली हुई होगी।उसका ख्याल था कि अगर उसके पति घर पर होते तो उसे इस तरह की स्थिति से न गुजरना पड़ता।
लेकिन जिनके पति घर पर थे उनकी भी तो वही हालत थी !
--कानून के दुरुपयोग के खिलाफ--
अनुसूचित जाति और जनजाति --उत्पीड़न से संरक्षण --कानून पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा निर्णय आ गया है।
अब यह कानून अपने मूल रुप में है।उससे पहले 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस कानून के तहत गिरफ्तारी से पहले सरसरी तौर पर पुलिस आरोप की सत्यता की जांच कर ले।
  खैर अब अलग ढंग से इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के उपाय करने होंगे।
अपने मुख्य मंत्रित्व काल में मायावती ने इस कानून के दुरुपयोग को रोकने का ठोस उपाय किया था।
उसका सकारात्मक असर भी हुआ था।
इस उद्देश्य से राज्य मुख्यालय ने  तब उत्तर प्रदेश के सारे जिलों के आरक्षी अधीक्षकांे को सर्कुलर भेजा था।उसमें दुरुपयोग रोकने का उपाय बताया गया था।
  सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय से उत्पन्न नई परिस्थिति से निपटने के लिए मायावती शासन काल के उस सर्कुलर को अन्य राज्य मंगवा ले।
ताकि न किसी को गलत ढंग से फंसाया जा सके और न ही  अनुसूचित जाति -जनजाति के किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई ज्यादती हो। 
--यासिन मलिक पर मुकदमा--
जे.के.एल.एफ. के अध्यक्ष यासिन मलिक पर 1990 में भारतीय वायु सेना के चार अफसरों की हत्या का मुकदमा चल रहा है।
वह अभी जेल में बंद है।वीडियो कांफ्रंेसिंग के जरिए सुनवाई होगी।
  सामूहिक हत्या यह एक ऐसा मुकदमा है जिसके आरोपित यासिन यह स्वीकार कर चुका  है कि उसने हत्याएं की थीं।
उसकी स्वीकारोक्ति दिल्ली की एक बड़ी पत्रिका में बहुत पहले छप चुकी है।
पत्रिका के साथ इंटरव्यू में यासिन मलिक ने उन हत्याओं को  औचित्यपूर्ण भी ठहराया था।
यह पता नहीं चल सका है कि उस पत्रिका के संवाददाता को गवाह के रुप में कोर्ट में पेश करने का अभियोजन पक्ष का कोई इरादा  है या नहीं।
  करीब 30 साल पहले हुई इन हत्याओं के मुजरिम को यह व्यवस्था हाल तक पालती-पोसती रही।
2006 में तो यासिन मलिक ने प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह से मुलाकात भी की थी।
 -- और अंत में--
सोशल मीडिया पर जाली खबरों को रोकने के इसे  आधार जोड़ने का सुझाव आया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि सरकार इंटरनेट के दुरुपयोग 
नहीं रोक सकती तो हम इस पर विचार करेंगे।
  जानकार लोग कह रहे हैं कि सोशल मीडिया को आधार से जोड़ने के लिए संबंधित कानून में संशोधन करना पड़ेगा।
जो कुछ करना पड़े ,पर सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकना ही होगा।
इस कारगर मीडिया को प्रामाणिक बनाए रखना अधिक जरुरी है।यह आम  लोगों की आवाज का एक कारगर प्लेटफार्म है। 
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--4 अक्तूबर 2019 के प्रभात खबर-बिहार-में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से।