रविवार, 5 जनवरी 2020

चार लेन वाले शेरपुर -दिघवारा गंगा
 पुल के निर्माण का काम इसी अगस्त से
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गंगा नदी पर इस साल बिहार में चार बड़े पुलों का निर्माण शुरू हो जाएगा।
पर, इन चारों पुलों में से सबसे महत्वपूर्ण पुल शेरपुुर-दिघवारा 
के बीच का सेतु होगा।
क्योंकि वह पटना रिंग रोड का हिस्सा बनेगा।
  पटना रिंग रोड के निर्माण के बाद रिंग रोड के आसपास नगर विकसित होंगे ।
इससे मुख्य पटना पर से आबादी का बोझ  घटेगा।
या, फिर उस गति से बोझ नहीं नहीं बढ़ेगा जिस गति से अभी बढ़ रहा है।
तेज व अव्यवस्थित ‘‘विकास गति’’ के कारण तरह -तरह की समस्याएं पैदा हो रही हैं।
बढ़ती आबादी का खामियाजा कई तरह से नगरवासियों को भुगतना पड़ता है।
  गत साल की अतिवर्षा जनित बाढ़ के कारण पटनावासियों ने नरक भोगा है।
  अच्छी बात है कि नीतीश सरकार ने लोगों की पीड़ा समझी है।
इसी कारण चार नए पुलों के निर्माण को पूर्व निर्धारित समय से पहले ही शुरू कर देने का निर्णय किया है।
उम्मीद है कि यह काम अब रुकेगा नहीं।
सुरेंद्र किशोर--5 जनवरी 2020
    

 ‘‘धर्मशाला’’ बन जाने से इस देश 
  को आखिर कौन बचाएगा ? !! 
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1.-पाक में श्री ननकाना साहिब पर हमला,सिखों को पीटा।
                     ----दैनिक जागरण,
                           4 जनवरी 2020
टिप्पणी--इस  घटना ने संशोधित नागरिक कानून,
      2019 की उपयोगिता एक बार फिर साबित कर दी।
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2.-नागरिक संशोधन कानून के खिलाफ हुई हिंसा में 
पाॅपुलर फं्रट आॅफ इंडिया शामिल।
                    --रविशंकर प्रसाद
                प्रभात खबर-2 जनवरी 2020
टिप्पणी--यानी इस संगठन ने भारत में अघोषित रूप
 से जेहाद छेड़ दिया है।
  भारत सरकार को चाहिए कि वह भी इसे युद्ध के रूप में ही स्वीकार करे न कि सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या के 
रूप में।
अन्यथा, पहले सरकार  व बाद में जनता पछताएगी।
ध्यान रहे कि पी.एफ.आई. के गठनकत्र्ताओं के मूल संगठन सिमी का यह घोषित लक्ष्य रहा है कि हम हथियार के बल पर भारत में इस्लामिक शासन कायम करेंगे।
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    3.-राष्टीय जांच एजेसी के अनुसार 2013 में केरल के कन्नूर में पी.एफ.आई. और एस.डी.एफ.आई.ने युवाओं को आतंकी प्रशिक्षण देने के लिए शिविर लगाया था।
                            दैनिक जागरण 
                         - 2 जनवरी 2020
टिप्पणी--पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी पी.एफ.आई.से जुड़े महिला संगठन के समारोह में शामिल हो चुके हैं।
दूसरी ओर कर्नाटका में एस.डी.एफ.आई. से चुनावी तालमेल कर कांग्रेस चुनावी लाभ उठा चुकी है।
क्या अंसारी व कांग्रेस उसके लिए देश से माफी मांगेंगे ?
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4.- संशोधित नागरिक कानून पर पुनर्विचार की कोई संभावना नहीं है।सीएए पर सभी पार्टियां एक हो जाएं तब भी भाजपा एक इंच भी पीछे नहीं हटेगी।
                    -- गृह मंत्री अमित शाह, 
                      हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण
                        -4 जनवरी 2020 
टिप्पणी--यह तो ठीक है।
गैर मुस्लिम शरणार्थियों को यहां नागरिकता देने का वायदा तो पिछली कांग्रेसी सरकारें भी कर चुकी हैं।
  पर मोदी सरकार से यह उम्मीद है कि वह राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर पर भी कोई समझौता नहीं करे अन्यथा वोटलोलुपों की मदद से यह देश देर-सवेर धर्मशाला बन जाएगा।
पहले ही करीब एक दर्जन जिलों की हालत वैसी हो रही है।
क्या मोदी सरकार इस देश को धर्मशाला बनाने के लिए सत्ता में आई है ? 
सुरेंद्र किशोर--4 जनवरी 2020
          

शनिवार, 4 जनवरी 2020

   बिहार से राज्य सभा के सदस्य गंगा शरण सिंह ने गांधी,नेहरू,जयप्रकाश सहित अनेक दिग्गज नेताओं को करीब देखा था।
  गंगा बाबू के पास बड़े- बड़े नेताओं के बारे में तरह -तरह के संस्मरणों का खजाना था।
 कुछ संस्मरण मैंने भी गंगा बाबू से सुने थे।
 किसी ने एक बार उनसे पूछा था कि आप उन संस्मरणों को लिख क्यों नहीं देते ?
गंगा बाबू का जवाब था कि यदि सच -सच लिख दूं तो जिन नेताओं को आप स्वर्गीय कहते हैं ,उन्हें आप ‘नारकीय’ कहते लगेंगे।
यानी दिवंगत गंगा बाबू किसी की निजी जिंदगी को सार्वजनिक करना नहीं चाहते थे।उनके सार्वजनिक जीवन
को वे प्रभावशाली मानते थे। 
  हालांकि सब लोग गंगा बाबू जैसे संयमी नहीं हैं।
   वीर सावरकर पर कांग्रेस की ओर से ऐसी पुुस्तिका आई है  कि उस  पर आपत्ति हो रही है ।
इस प्रसंग में मुझे एस.गोपाल और एम.ओ.मथाई की पुस्तकों की याद आ गई।
 जवाहरलाल नेहरू के 13 साल तक निजी सचिव रहे मथाई की किताब में दर्ज  विस्फोटक जानकारियों के सामने सावरकर  वाली जानकारी कुछ भी नहीं है।
  यदि उन और उन जैसी अन्य विस्फोटक पुस्तकों की जानकारियां बाहर आने लगेंगी तो नेहरू-गांधी परिवार को उल्टा पड़ेगा।
  बहुत सारी विवादास्पद जानकारियां तो मेरे पास भी हैं।
पर,मैं उनमें नहीं पड़ता।
पर सावरकर के परिजन व प्रशंसक तो नहीं मानेंगे।
 पता नही,ं कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को ऐसी -ऐसी आत्मघाती  सलाह कौन देता है ?


शुक्रवार, 3 जनवरी 2020


दस साल के भीतर निर्माण ढहने पर विशेष सजा का हो प्रावधान-सुरेंद्र किशोर 
यह कहानी जी.टी.रोड की है।
यह सड़क दिल्ली को कोलकाता से जोड़ती है।
फिर भी इसकी हालत देखिए।
़गत माह यह खबर आई कि कर्मनाशा नदी पर बना पुल
ढह गया।दस साल ही पहले यह पुल बन कर तैयार हुआ था।
घटिया निर्माण के कारण इसके चार में से तीन पिलर क्षतिग्रस्त हो गएए।
दिल्ली से जांच टीम आई।
टीम ने पहली नजर में यह पाया कि पिलर में लगी लोहे 
की छड़ें न सिर्फ घटिया स्तर की हैं,बल्कि अपर्याप्त संख्या में हैं।
 याद रहे कि इस पुल को सौ साल तक ठीकठाक अवस्था में रहना था।
 पर घटिया निर्माण तथा भारी वाहनों के कारण 10 साल में ही बर्बाद हो गया।जबकि उस पुल के बगल में अंग्रेजों के जमाने में बना पुल अब भी चालू अवस्था में है।
    --जानलेवा लापरवाही--
सामरिक दृष्टि से भी इतने महत्वपूर्ण मार्ग के पुल के निर्माण में इतनी बड़ी लापरवाही की हिम्मत वही ठेकेदार और इंजीनियर कर सकते हैं जिन्हें लगता है कि उनका कोई बाल बांका नहीं कर सकता।
  आश्चर्य है कि यह सब ऐसे मंत्री के मंत्रालय से जुड़े निर्माण कवर्य में हो रही है जिस मंत्री को कई लोग कवर्यकुाल बताते नहीं थकते।
 घटिया निर्माण के कारण समय से पहले संरचनाओं के ढह जाने की कहानी न तो नई है और न ही किसी एक सरकार या विभाग से जुड़ी घटना है।
   घटिया निर्माण करने वाले और करवाने वाले इंजीनियरों ,ठेकेदारों तथा अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ विशेष सजा का प्रावधान कानून में करना होगा।   
   --साख कायम रखनी हो तो 
निराधार आलोचनाओं से बचें--
फिल्म अभिनेत्री पायल रोहतगी ने पिछले दिनों नेहरू-गांधी परिवार को लेकर आपत्तिजनक बातें कहीं और लिखी थीं।
उन्हें कुछ दिनों के लिए इस कारण जेल में रहना पड़ा था।
उन पर केस हो गया है।
उन पर तो केस हुआ,पर आपत्तिजनक बातें लिखने वाले अन्य अनेक लोगों पर केस नहीं होते।
इसलिए वे बच जाते हैं।
इससे उनका मनोबल बढ़ जाता है।
वे सोशल मीडिया का दुरूपयोग करते रहते हैं।
  जवाहरलाल नेहरू के पूर्वज के बारे में ऐसी आपत्तिजनक बातें लिखना जिनका कोई सबूत नहीं है,घोर निंदनीय है।
नेहरू के बारे में कहने-लिखने के लिए बहुत सारी बातें हैं।
कुछ सकारात्मक तो कुछ नकारात्मक बातें।
पर, वे सब जानने के लिए तो किसी को पढ़ना पड़ेगा।
खूब पढ़ना पड़ेगा।
उसकी जहमत कितने लोग उठाते हैं ?
इसलिए चर्चा में बने रहने के लिए सुनी-सुनाई अपुष्ट बातों को लेकर कुछ -कुछ लिखते रहते हैं।
ऐसा अन्याय नेहरू ही नहीं बल्कि कुछ अन्य नेताओं के साथ भी होता रहता है।
   सोशल मीडिया इस दौर का उपहार है।
इसका सदुपयोग करिए।
अन्यथा,इस माध्यम पर जब कड़ा पहरा लग जाएगा तो असुविधा होने लगेगी।
 --जिम्मेवार पिता,पर दोष माता पर!--
 बच्ची जनने के कारण महिला की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई।
यह खबर पटना जिले की धनरूआ से आई है।
ऐसी खबरें आती ही रहती है।
ऐसी हत्याएं जागरूकता की कमी के कारण होती हैं।
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार कोई पत्नी शिशु कन्या या शिशु बालक को जन्म देती है,यह बात पति की उत्पत्ति ग्रंथि यानी आनुवंशिकी पर निर्भर करता है।
बालिका  या बालक के मामले में सिर्फ पत्नी की कोई भूमिका नहीं होती।
  किन्तु समाज में फैली  गलत धारणा के कारण शिशु कन्या को जन्म देने वाली स्त्री ही कई बार प्रताडि़त की जाती हैं।
  यदि इसको लेकर जमीनी स्तर जागरूकता अभियान चलाया जाए तो कई घर उजड़ने से बच जाएंगे।
       --और अंत में--
हाल की देशव्यापी हिंसक घटनाओं के पीछे सिमी और पाॅपुलर फं्रट आॅफ इंडिया जैसे अतिवादी संगठनों के नाम आ रहे हैं।
याद रहे कि 2001 में सिमी पर जब प्रतिबंध लग गया तो सिमी के लोगों ने ही इंडियन मुजाहिद्दीन और पी.एफ.आई.बनाए।
 पिछले कुछ दशकों में देश के अनेक प्रममुख नेताओं और बुद्धिजीवियों ने सिमी के बचाव में बयान दिए।
  उन नेताओं से यह उम्मीद की जा सकती है कि वे अब इन संगठनों कव बचाव नहीं करेंगे।अच्छा तो यह होता कि वे अपनी पिछले बयानों के लिए अफसोस जाहिर कर देते।
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3 जनवरी, 2020 को ‘प्रभात खबर’-पटना में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से।

गुरुवार, 2 जनवरी 2020

2020 के लिए संकल्प
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संकल्प है कि इस साल मैं अपनी प्रस्तावित किताबों पर काम करूंगा।
देखना है कि यह काम पूरा होता है या नहीं !
वैसे मेरी तरफ से कोई कमी नहीं रहेगी।
 यह एक दीर्घ प्रतीक्षित योजना है।
मित्रों और प्रकाशकों की मांग भी रही है।
हिन्दुस्तान, पटना में मेरे संपादक रहे नवीन जोशी तो कहते -कहते थक गए कि ‘आप अपना संस्मरण लिखें।’
अब लगता है कि उतने अच्छे इंसान के आदेश का पालन करने की स्थिति मैं आ गया हूं।
पर, चूंकि मेरी क्षमता-योग्यता कम है, इसलिए मैं एक साथ एक ही काम कर सकता हूं। 
इसीलिए सिर्फ अपने मूल काम यानी पत्रकारिता में ही लगा रहा।
  अब पुस्तक लेखन को मुख्य काम बनाना चाहता हूंं।
कुछ किताबों का ‘कच्चा व अधूरा मसौदा’  तो पहले से तैयार हैं।
एक पुस्तक पर तो प्रभाष जोशी के कहने पर काम शुरू किया था,राजकमल के लिए।
उस पर तीन चैथाई काम हो चुका है।
इस बीच वे नहीं रहे।
कुछ अन्य पुस्तकों पर एकत्र सामग्री को फाइनल करने के लिए कुछ और श्रमसाध्य काम करने होंगे।
  कई दशक पहले लखनऊ के जनसंत्ता संवाददाता हेमंत शर्मा मुझे दिल्ली में प्रभात प्रकाशन के मालिक श्यामसुंदर जी के यहां ले गए थे।
उन्होंने मुझे बिहार पर तुरंत एक किताब लिख देने के लिए कहा था।
उससे पहले बिहार पर उर्मिलेश की किताब चर्चित हो चुकी थी।
मैंने तो तब गोलमोल जवाब दे दिया,पर दरअसल उसके लिए मेरे पास समय ही नहीं था।
हां, श्याम सुंदर जी के यहां से यह छाप लेकर जरूर लौटा कि जो जितना बड़ा व्यक्ति होता है,वह उतना विनम्र भी होता है।
यानी विनम्र होने से व्यक्ति के बड़ा होने के चांस अधिक हैं।
अपवादों की बात और है।
यानी,
उतने बड़े प्रकाशक के समक्ष मैंने खुद को छोटा महसूस नहीं किया।
बल्कि उन्होंने महसूस होने ही नहीं दिया।
  खैर, अब तो प्रभात प्रकाशन और भी बड़ा संस्थान हो चुका है।
   फेसबुक पर मेरे इतना अधिक सक्रिय होने का मुख्य उद्देश्य यह रहा कि मैं यह देखूं कि मेरे लेखन में कितने लोगों की रूचि है।
मेरे पास जो तथ्य हैं,उनमें कितना दम है।
  आपके विचार जो भी हों,लोगों-घटनाओं पर आपका आकलन जो भी हों, वे तो अलग -अलग होंगे ही,पर तथ्य सही होने चाहिए।
ठीक ही कहा गया है
--‘‘तथ्य पवित्र हैं और विचार आपके हंै।’’
  यदि आपके पास तथ्य हैं तो पाठक आप पर भरोसा कर सकते हैंं।
इस देश के कुछ बड़े इतिहासकारों के साथ दिक्कत यह है कि वे अपनी सुविधानुसार तथ्यों के साथ भी खिलवाड़ करते रहे हैं। 
हां, तो मैं इस फेसबुकी-परीक्षा में मैं लगभग पास हो गया।
हौसला बढ़ा है।
याद रहे कि मेरे फेसबुक मित्रों में कई अच्छे जानकार लोग शामिल हैं।
--सुरेंद्र किशोर--1-1-2020

बुधवार, 1 जनवरी 2020

इस पोस्ट के साथ वाली तस्वीर पटना के रिटायर पत्रकार शिव नारायण सिंह की है।
तस्वीर धुंधली है,पर उनके चेहरे पर कुछ लकीरें आप देख सकते हैं।
खून की वे लकीरें उनके माथे से कभी टपकी थीं।
टपकी क्या थीं, धार बन कर बही थीं।
पुलिस की जोरदार लाठी लगी थी उन्हें।
अस्सी के दशक में वह उन पत्रकारों के उस नेतृ वर्ग में शामिल थे जो डा.जगन्नाथ  मिश्र के विवादास्पद प्रेस विधेयक के खिलाफ आंदोलनरत थे ।
प्रदर्शन कर रहे थे।
प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपना खून बहा रहे थे।
 तब शिवनारायण सिंह की यह तस्वीर मशहूर साप्ताहिक ‘इलेस्टेटेड विकली आॅफ इंडिया’ 
के ‘कवर’ पर फैला कर पूरे पेज पर छापी गई थी।
  तब उनकी यह तस्वीर प्रेस बिल के खिलाफ आंदोलन की प्रतिनिधि तस्वीर बन गई थी।
  आज यह सब याद दिलाने की  भला क्या जरूरत है !! ?
 दरअसल शिवनारायण जी हम पत्रकारों की आर्थिक स्थिति के भी प्रतिनिधि हैं।
 बिहार के प्रमुख दैनिक आर्यावत्र्त से 2001 में रिटायर होकर शिवनारायण बाबू अपने गांव डिहुली --जिला-समस्तीपुर में रह रहे हैं।
अब वे अस्सी साल के हैं।
1977 में उन्होंने पटना में काम शुरू किया था।
प्रेस कांफ्रंेस में उनके सवाल सटीक व कारगर होते थे ।
उन्होंने प्रेस कांफं्रेस की जीवतंता बढ़ा दी थी।
तब तक मैं भी पेशेवर पत्रकारिता में आ गया था।
वे हम पत्रकारों के नेताओं में से एक थे।  
   इधर बिहार सरकार ने पत्रकारों को पेंशन देना तय किया है।
 शिव नारायण बाबू ने भी आवेदन पत्र दे रखा है।
 प्रशासन आवेदनों की जांच पड़ताल कर रहा है।
 उम्मीद है कि उनके जीवन काल में उन्हें पेंशन मिलनी शुरू हो जाएगी।
  आज नए साल के पहले दिन पर मैंने शिवनारायण बाबू को फोन किया तो पता चला कि अब तक उन्हें पेंशन नहीं मिली है।
   पता नहीं ,अन्य पत्रकारों का क्या हाल है ! 
 मैंने 1970 से ही बड़े-बड़े पत्रकारों को देखा है।
 अपने कार्यकाल में अनेक पत्रकार अपनी कलमों के जरिए  देश-राज्य-समाज के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
तब उनकी हर तरफ से बड़ी पूछ रहती है।
पर, रिटायर हो जाने के बाद वे भुला दिए जाते हैं।
पेंशन की व्यवस्था नहीं रहने के कारण उन्हें उपेक्षा के साथ-साथ अन्य कई तरह की कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ता है।
पत्रकार स्वभाव से स्वाभिमानी होता है,
इसलिए उनकी कठिनाइयां खुल कर सामने भी नहीं आतीं।
यह हाल सिर्फ बिहार या पटना का नहीं है।
पूरे देश का है।
इन दिनों भी कुछ ही पत्रकार होते हैं जो लाखों-करोड़ों -अरबों में खेलते हैं।
दरअसल संवाददाता व संपादक मीडिया नामक महल के कंगूरे होते हैं।
पर नींव की ईंटों की संख्या अधिक होती है जो डेस्क पर आभामंडल से दूर बैठकर काम करते हैं।
वे भी पत्रकार यानी मीडियामेन ही कहलाते हैं।
  पर , उन्हें भला कौन पूछता है !!!  
यदि संस्थान की तरफ से मिल रही तनख्वाह अच्छी रही,तब तो जीवन कट जाता है।
यदि ऐसा नहीं हुआ तो फिर.........!!!  
--सुरेंद्र किशोर--1 जनवरी 2020

    

  किसी अन्य देश में नहीं मिला करती 
  देश विरोधियों को ऐसी शह
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नागरिक संशोधन कानून लागू होने से करीब 2 करोड़ शरणार्थी गैर मुस्लिम इस देश के नागरिक व मतदता बन जाएंगे।
  राष्टीय नागरिक रजिस्टर बनने से करीब 5 करोड़ मुस्लिम
मतदाता सूची से बाहर हो जाएंगे।
   इससे बंगलादेशी मतदाताओं के बल पर चुनाव जीतने और राज करने वालों की राजनीति बदल जाएगी।
उधर मुस्लिम मतदाताओं के घटने से कुछ लोगों की धार्मिक महत्वकांक्षा पूरी होने मेंं बाधा आ जाएगी।ै
हा सकता है कि 2 करोड़ और 5 करोड़ वाली संख्या बढ़ा चढ़ाकर जा रही हो।
  पर मूल बात यही है।
इन दोनों कामों के हो जाने से भी वास्तविक भारतीय की स्थिति में, चाहे वे हिन्दू हों या मुस्लिम कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।
पर सिमी,पी.एफ.आई. और इंडियन मुजाहिद्दीन व उनके विदेशी संरक्षक के लक्ष्य में फर्क पड़ेगा।
  इस देश में आज भी ऐसे मुसलमान बड़ी संख्या में हैं जो सी.ण्.ण्. और एन.आर.सी. के विरोधी नहीं हैं।
  पर जिन्हें गुमराह किया जा रहा है,वे उद्वेलित हैं।चूंकि उधर
वे उद्वेलित हैं,इसलिए वोटलोलुप सेक्युलर दलों के नेता भी देश की सुरक्षा की परवाह किए बिना आंदोलनरत हैं और अतिवादी व देश तोड़क संगठनों की पीठ ठोक रहे हैं।
  मोदी सरकार ने एन.आर.सी.के मामले में अपने पैर पीछे खींच लिए हैं।
  पर समस्या तो बढ़ती जाएगी।
उधर वोट लोलुप दल किस तरह अतिवादी संगठनों को वर्षों से बढ़ावा देते रहे हैं,उसके कुछ उदाहरण नीचे दिए जा रह हैं।उस बढ़ावा से उनका मनोबल बढ़ा है।
ऐसा किसी अन्य देश में नहीं होता।
  यदि मोदी सरकार इस समस्या को हल करने में विफल होगी तो कोई दूसरी कठोर सरकार आएगी जो इसे हल करने की कोशिश करेगी।
यदि कोई जनमत संग्रह हो तो पता चलेगा कि पिछले महीने देश भर में हिंसा कव जो नंगा नाच किया गया और सेक्युलर दलों ने उनकी निेदा करने के बदल पुलिस की ही आलोचना की,उसे आम जनता ने किस रूप् में लिया है।
   अब कुछ पिछली बातें जानिए--
    उत्तर प्रदेश सरकार ने सिमी से जुड़े संगठन पाॅपुलर
फं्रट आॅफ इंडिया पर प्रतिबंध की सिफारिश कंेद्र से करने का निर्णय किया है।
सिमी पर 2001 में ही प्रतिबंध लग चुका है।
पी.एफ.आई. और आई.एम.का गठन सिमी वालों ने ही किया है।
  हथियारों के बल पर भारत में इस्लामिक शासन स्थापित 
करने की कोशिश में लगे इन प्रतिबंधित आतंकी संगठनों की संलिप्तता के सबूत मिलने पर उत्तर प्रदेश सरकार ने यह निर्णय किया है।
इससे पहले केरल की वाम सरकार ने 2918 में पी.एफ.आई.पर प्रतिबंध लगाने की केंद्र से सिफारिश की थी।
झारखंड सरकार पहले ही पी.एफ.आई.पर प्रतिबंध लगा चुकी है।
  ऐसे खतरनाक संगठनों को इस देश के कुछ तथाकथित सेक्युलर दलों के नेताओं ने किस तरह समय -समय पर उन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बढ़ावा दिया,मदद की,उसके कुछ नमूने यहां पेश हैं।
  
   उन्हीं मदद के कारण आज ये अतिवादी संगठन भीतर भीतर इतने ताकतवर हो चुके हैं कि वे देश को हिला रहे हैं।
इन्हें हमारे देश के तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक दलों व बुद्धिजीवियों ने खाद-पानी देकर पनपाया ताकि उन्हें मुसलमानों के बड़े हिस्से के वोट मिल सकें।
   ओसामा बिन लादेन को अपना ‘शेर’ मानने वाले इन संगठनों के बारे में कब किसने क्या कहा,उसकी एक झलक संक्षप में यहां दी जा रही है।
 वैसे पूरी कहानी तो बहुत लंबी व भयानक है।
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सन 2001
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उनकी राष्ट्रविरोधी व हिंसक गतिविधियों को देखते हुए केंद्र सरकार ने 2001 में सिमी पर प्रतिबंध लगा दिया।
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3 सितंबर 2001
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सरकार ने सिमी पर जो प्रतिबंध लगाया है,वह मेरी दृष्टि में जायज नहीं है।
     ---शाही इमाम ,फतेहपुरी मस्जिद
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‘‘गुजरात दंगों के बाद दंगों की प्रतिक्रिया में इंडियन मुजाहिद्दीन का गठन हुआ।’’
         ---डा.शकील अहमद,
     कांग्रेस महा सचिव--21 जुलाई 2013
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सिमी पर प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए था।
--मुलायम सिंह यादव
7 अगस्त 2008
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मन मोहन सिंह सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि सिमी के लोग जेहाद का प्रचार कर रहे हैं और कश्मीर में आतंकवादियों की पूरी मदद
कर रहे हैं।
....टाइम्स आॅफ इंडिया .....21 अगस्त 2008 -- 
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राम विलास पासवान ने सिमी पर लगे प्रतिबंध को हटाने की मांग की।
        ---12 अगस्त 2008 
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कश्मीर के  अलगाववादी नेता 
सैयद अली शाह जिलानी ने कहा कि 
सिमी पर प्रतिबंध नागरिक अधिकार पर हमला है।
--29 सितंबर 2001
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सिमी से प्रतिबंध हटाए जाने के ट्रिब्यूनल के निर्णय पर भाजपा ने केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए इसका ठीकरा गृह मंत्री शिवराज पाटिल पर फोड़ा है।
     ---6 अगस्त 2008
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हालांकि फिर प्रतिबंध लगाना पड़ा
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रेल मंत्री लालू प्रसाद ने कहा कि मैंने हमेशा कहा है कि  सिमी पर प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए।
यदि लगता है तो शिव सेना और दुर्गा वाहिनी पर प्रतिबंध लगना चाहिए।
-----टाइम्स आॅफ इंडिया--7 अगस्त 2008
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यशवंत सिन्हा के नेतृत्व में भाजपा के प्रतिनिधि मंडल ने चुनाव आयोग से मिलकर यह मांग की कि सिमी समर्थक दलों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
   ----19 अगस्त 2008
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सिमी के अहमदाबाद के जोनल सेके्रट्री साजिद मंसूरी ने 2001 में  मीडिया से  बातचीत  में कहा था कि ‘जब हम सत्ता में आएंगे तो सभी मंदिरों को नष्ट कर देंगे और वहां मस्जिद बना देंगे।’ 
मंसूरी का बयान 30 सितंबर 2001 के  अखबार में छपा था। 
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2012 में पश्चिम बंगाल के डी.जी.पी.एन.मुखर्जी ने कहा था कि सिमी के जरिए आई.एस.आई.ने माओवादियों से तालमेल बना रखा है।
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2001 में जब सिमी पर  केंद्र सरकार ने लगाया तो प्रतिबंध के खिलाफ सलमान खुर्शीद सिमी के वकील थे।
तब वे उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे।
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 स्थापना के समय  सिमी जमात ए इस्लामी हिंद से जुड़ा संगठन था।
पर जब 1986 में सिमी ने ‘इस्लाम के जरिए भारत की मुक्ति’ का नारा दिया तो जमात ए इस्लामी हिंद ने उससे अपना संबंध तोड़ लिया।
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केंद्र सरकार ने सिमी पर प्रतिबंध लगाने के लिए जो मापदंड अपनाए,वे अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं।
      ---- इम्तियाज अहमद,
             प्रोफेसर जे.एन.यू
              30 सितंबर 2001
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मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री दिग्विजय सिंह ने राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए सिमी पर प्रतिबंध लगाने का स्वागत किया,पर बजरंग दल पर प्रतिबंध नहीं लगाने के लिए केंद्र सरकार को फटकार लगाई।
   ---पायनियर--29 सितंबर 2001
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भाजपा के पूर्व महा सचिव गोविंदाचार्य ने सिमी की तरफदारी पर रेल मंत्री लालू प्रसाद की आज कड़ी निंदा की और आर.एस.एस.पर प्रतिबंध की मांग को अल्पसंख्यक की राजनीति का हिस्सा करार देते हुए नकार दिया।
------इंदौर--19 अगस्त 2008
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सिमी के संविधान में भारत को मजहबी आधार पर बांटने की बात स्पष्ट रूप से दर्ज है।
-----सी.बी.आई.के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह
   --22 सितंबर 2008 ,राष्ट्रीय सहारा  
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लोकतांत्रिक तरीके से इस्लामिक शासन संभव नहीं है।उसके लिए एकमात्र रास्ता जेहाद है।
-------सिमी सदस्य अबुल बशर--
28 सितंबर 2008--राष्ट्रीय सहारा 
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‘‘जेहाद के नाम पर बिहार में भड़काया जाने लगा है एक वर्ग को।’’
    ----बिहार पुलिस की  खुफिया शाखा की रपट
             22 सितंबर 2001
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